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अब पहुँची हो तुम

रिया चन्द
...वे भाषा में
रचनात्मकता चाहते हैं
मैं जीवन में...
कवि महेशचंद्र पुनेठा अपनी कविता छुपाना और उघाडना में कहते हैं कि वे रचनात्मक भाषा से ज्यादा रचनात्मकता से भरे जीवन को तवज्जो देते हैं। जीवन की रचनात्मकता ऊँची परवाज भरने में ही नहीं, छोटे-छोटे कदम बढाकर सुकून पाने में भी है। अपने आस-पास हो रही घटनाओं को समझना और उन पर सवाल करना जीवन की रचनात्मकता ही है। कवि महेश पुनेठा भी अपने आस-पास चल रही हलचल से खुद को दूर नहीं कर पाए और रच डाला एक कविता संग्रह। गाँव में सडक टाइटल की उनकी कविता की विषयवस्तु पर संग्रह का नाम अब पहुँची हो तुम रखा गया है।
कवि महेश चंद्र पुनेठा, छोटा कश्मीर कहे जाने वाले पिथौरागढ के बाशिन्दे हैं। आपने राजनीति शास्त्र से एम.ए किया और वर्तमान में आप देवलथल के राजकीय इन्टर कॉलेज में अध्यापन कर रहे हैं। कई नई पहलों की शुरुआत करने का श्रेय आपको जाता है, जिसमें से एक दीवार पत्रिका भी है। आफ कविता संग्रह - भय अतल में, पंछी बनती मुक्ति की चाह और सरकार की आवाज, शैक्षिक अनुभव और लेखों के संग्रह- दीवार पत्रिका और रचनात्मकता, और शिक्षा के सवाल प्रकाशित हो चुके हैं।
समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित अब पहुँची हो तुम 123 पन्नों का काव्य संग्रह है। इसमें कविताएँ हैं। वह कविताएँ जो बुनी गई हैं समाज के ताने-बाने के रेशों से। कवि अपनी कविताओं को साहित्यिक जामा पहनाकर जटिलता की ठोस जमीन पर नहीं रखना चाहते। वे अपने साहित्य के जरिये ऐसी बातें कहना चाहते हैं जो न केवल बौद्धिकजनों तक ही रहे, बल्कि सामान्य लोगों तक भी पहुँचे। उनकी कविताओं में उस समाज का मनोरम चित्रण है जहाँ महिलाएँ, हाशिए के समुदाय और मजदूर वर्ग ठीक उसी तरह तमाम संसाधनों और मौकों से दूर हैं, जिस तरह एक खेत के किनारे में लगी फसल खाद-पानी से वंचित रहकर पैरों तले दब जाती है।
हमारे इस समाज ने महिलाओं को काम के बोझ, गैर बराबरी, दुख और तमाम तरह की यातनाओं के सिवाय कुछ नहीं दिया है। हमारे पितृसत्तात्मक समाज की इमारत में नींव की ईंट की सरीखी एक महिला और उसका योगदान हमेशा अँधियारे कुँओं में कैद होकर रह जाता है। गर एक महिला एक कदम बढाने के लिए बढती है कई हाथ उस कदम को पीछे करने में जुट जाते हैं। कवि की कल्पना में एक महिला जब अपने जीवन के खुशनुमा हसीन पल लिखने बैठी तब वह सोचती ही रह गयी, लेकिन कुछ याद नहीं आन पडा। वहीं दूसरी ओर कवि कहते हैं -
वह दुख लिखने लगी
लिखती रही
लिखती रही
लिखती ही रह गयी।
नहीं लौट पायी वह
अबकी बार पेनकिलर लेकर
पति को उसकी लाश लेकर लौटना पडा।
ये चन्द पँक्तियाँ क्या कुछ नहीं कहतीं! लिहाजा, हर उस परिस्थिति में रहने के बावजूद जो उसके लिए माकूल नहीं होती, एक महिला, परिवार, काम और जिम्मेदारियों के नाम पर अपनी जान तक की परवाह नहीं करती। ममता से भरी महिला अपने परिवार-बच्चों के लिए अपनी ख्वाहिशों, सपनों और खुशियों की आग से खाना पकाया करती है। आर्थिक स्थिति की तंगी के कारण वह अपने अन्दर नासूर हो रही पहाड जैसी बीमारी को पेन किलर और गोलियों के हरे पत्तों से छलने की नाकाम कोशिश एक बार नहीं, बार-बार करती है। दर्द ही कभी-कभी बेवफा हो जाता है और उसका साथ नहीं देता। लेकिन, जब काम उरूज पर होता है, खेती-बाडी देखनी होती है तब एक बार फिर वह महिला एक और पेनकिलर से काम चला लेती है। और आखिर में वह खुद को ही भूल जाती है। सब उसको भूल जाते हैं।
अपनी दूसरी कविता तुम्हारी तरह होना चाहता हूँ में कवि स्त्री की सहजता का वर्णन करते हुए जाहिर करते हैं कि एक स्त्री किस तरह मौके ढूँढ ही लेती है अन्जान से भी बात शुरू करने के, खुश होने के। शायद सामने वाली स्त्री के भीतर भी अपनी जैसी ही एक स्त्री की छाया देखना चाहती हो। शान्तिप्रिय, सहनशील, और अपने ख्वाबों, ख्वाहिशों और खुशियों को जिम्मेदारियों की नोंक पर रखने वाली! यह उस स्त्री की तबियत का हिस्सा है कि उसे छुटपन से ही सिखा दिया जाता है सहज, सहनशील और निर्मल होना। शायद इसीलिए अधिकतर स्त्रियाँ त्यागी, सहज और निर्मल स्वभाव की होती हैं क्योंकि उन्हें बकायदा तैयार किया जाता है। एक लडकी होना और लडकी जैसा दिखाई देना सिखाया जाता है!
चाहे एक स्त्री को स्त्री बनाना हो या नफरत के बीज बोने हों, इसमें हमारे समाज की ही भागीदारी होती है। डर, नफरत और लोकतन्त्र के पहरुवे कविता में कवि लिखते हैं -
यह तो चिन्ताजनक है ही
अपने से भिन्न के प्रति
नफरत से भर जाना
इससे भी अधिक चिन्ताजनक है
इसे देशभक्ति समझ बैठना।
एक समाज की संरचना होती ही कुछ ऐसी है जिसमें एक शक्तिशाली धडा कमजोर वर्ग पर शासन करता है। इन दोनों वर्गों में संघर्ष चलता रहता है और इसी तरह समाज आगे बढता है। लेकिन समाज का गुटों में बँटकर एक दूसरे वर्ग के खिलाफ नफरत से सराबोर हो जाना समाज को समावेशी नहीं रहने देता। इसमें सत्ता का भी अहम योगदान होता है। जनता के उन्माद और आक्रोश से बचने के लिए नफरत के फुहारे छोडे जाते हैं। दंगे-फसाद होते हैं। और सबसे अहम बात यह है कि इन दंगे-फसादों से सत्ताधारी जमात पर कोई फर्क नहीं पडता। इनकी कीमत वो व्यक्ति चुकाता है जिसे अपनी जिन्दगी में भी हर तरह से जूझना ही पडता है। कुछ यही बात कही गई है लोकतन्त्र के राजा कविता में। कविता की कुछ पंक्तियाँ यूँ हैं -
इसमें
न राजा मरता है
न राजकुमार
न मंत्री
न उसके परिवार का कोई सदस्य।
एक ओर तो नफरत के बीज बोए जाते हैं वहीं दूसरी ओर बडे-बडे वादे किए जाते हैं। वर्तमान विकास के मॉडल, सौदागर जिसकी दुहाईयाँ देते नहीं थकते, में कुदरत के लिए कोई जगह नहीं है। आधुनिकीकरण की आड में हम कराहती धरती को नजरअन्दाज कर संसाधनों का पतन करते ही जा रहे हैं। पर्यावरणविद् लेस्टर ब्राउन के शब्दों में - हमें यह पृथ्वी अपने पुरखाओं से विरासत में नहीं मिली है; हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है। शाब्दिक अर्थ से ज्यादा बात की तह तक जाने की जरूरत है। आज जिस हद तक हम अपनी पृथ्वी को नुकसान पहुँचा चुके हैं उसका हक हमें कतई नहीं है। धरती विरासत में मिली कोई धरोहर नहीं है, बल्कि इस पर आने वाली पीढियों की भी बराबर हिस्सेदारी है। जिस हाल में हम संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं उसी हाल में आने वाली पीढी भी करे, यह हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए।
स्थायी नीतियों पर काम करने के बजाय पर्यावरण की नजाकत को हर तरह से चैलेंज किया जा रहा है। बडे-बडे डैम बन रहे हैं। भले ही डैम के अपने कई फायदे हों, लेकिन पर्यावरण के पहलू से देखा जाए तो एक बहती नदी को बाँधकर डैम बना देना और इतनी भयानक मशीनों के इस्तेमाल से हमारी धरती पर असर तो होता ही है। हिमालय की तलहटी पर बसे राज्य उत्तराखंड में डैम बनाना खतरे से खाली नहीं है। हिमालय आज भी अपने युवाकाल में बढ रहा है, इसमें तमाम तरह के बदलाव आ रहे हैं। ऐसे भूभाग में पँचेश्वर डैम जैसे प्रस्तावित प्रोजेक्ट चिन्ताजनक हैं। कवि इस स्थिति पर भी अपनी नजर बनाए हुए हैं। इस परिपेक्ष्य में कवि ने नौ कविताएँ लिखी हैं। उनमें से एक कविता की कुछ पंक्तियाँ कहती हैं कि -
पहली बार नहीं दिखाए जा रहे हैं यह सपने
वे सपनों के सौदागर हैं
जब जब पडी उन्हें जमीन की जरूरत
वे सपनों के पैकेज लेकर आ गए।
कवि कहते हैं कि जिन लोगों को पहले कई सपने दिखाए गए थे वे आज भी इन सपनों की लाश लिए घूमते हैं। उनकी आँखें पथरा गई हैं उन सपनों की तलाश में जो बाकी डैम बनाने से पहले उस क्षेत्र के निवासियों को दिखाए गए थे। बडे-बडे वादों के बदले लोगों की जमीन-जायदाद, उनके सपनों के घर, वो आँगन जहाँ खेला करते थे बचपन में, पानी के नल जहाँ पर लम्बी लाइनें लगती थी पानी भरने वालों की, सब खरीद लिए जाते हैं। ये बात समझने की जरूरत है कि एक नदी को बाँधकर डैम बनाने के न सिर्फ पारिस्थितिक दुष्परिणाम हैं, बल्कि हमें सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर भी इसका खामियाजा भुगतना पडता है। डैम बनने के दौरान महज लोगों का ही विस्थापन नहीं होता, वहाँ की संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज सब दफन हो जाते हैं विकास के भार तले।
कवि अपनी कविताओं से देश की विविधता को भी उकेरते हैं। मेरी रसोई - मेरा देश शीर्षक से कवि ने सैंतीस कविताएँ लिखी हैं। रसोई और उसकी सामग्रियों से देश का बिम्ब पाठक के सामने रखा गया है। उनकी एक कविता कुछ इस तरह है -
सुस्वादिष्ट भोजन बनाना ही है क्या
अच्छे रसोइये की पहचान
सबको मिले उनके हिस्से का भोजन
यह कौन सुनिश्चित करेगा
एक थाली में छप्पन व्यंजन
दूसरी में सूखी रोटी भी नहीं
क्या कहेंगे आप ऐसे रसोइये के बारे में?

इस कविता से हमारे देश की विडम्बना साफ झलकती है। मुट्ठी भर लोगों के पास इतने संसाधन हैं कि उनकी आने वाली कई पीढियाँ बिना कुछ करे ही जी सकती हैं। वहीं दूसरी ओर लाखों करोडों लोगों के पास आज पेट भरने के लिए भी संसाधन नहीं हैं। हाल ही की एक रिपोर्ट बताती है कि देश के केवल 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की 64 प्रतिशत सम्पत्ति है। यह स्थिति भारत के दो विपरीत आयामों को सामने रखती है। अन्तरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीतने वाले उपन्यास द व्हाइट टाइगर में अरविन्द अडिगा भी भारतीय समाज के दो चेहरों, प्रकाश और अन्धकार को दर्शाते हैं। प्रकाश में संसाधनयुक्त लोग रहते हैं, जबकि अन्धकार में संसाधनविहीन। यही बात कार्ल माक्र्स की क्लास थ्योरी भी कहती है कि समाज में एक धडे का वर्चस्व बाकी धडों पर हमेशा ही बना रहता है।
प्रकाश का त्योहार दीपावली पूरे देश में बेहद ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। हर घर में दिए जलाए जाते हैं। लेकिन कवि का मानना है कि इस प्रकाश के बीच कई कोनों में अभी भी अँधेरा कायम है। अभी भी कई दहलीजों में दिए जलने बाकी हैं। लगता है यह प्रकाश का त्यौहार प्रकाश में रहने वालों के लिए ही है। कवि को जलती मोमबत्तियाँ रोते हुए बच्चों के आँसुओं की तरह दिखती हैं। यही आँसू उन तमाम बच्चों को जर्जर परिस्थितियों में भी जीने की ताकत देते हैं। दर्द से निकलती आह को आदत में ले आने की ताकत! कितना खतरनाक है कविता में कवि कहते हैं-
कितना खतरनाक है इस तरह
चोट - चुभन - आवाज का
पीढी दर पीढी आदत में ढल जाना।
जिन पहाडों को देख हमारे मुँह से अनायास ही निकल पडता है - ब्यूटिफुल, मैग्नीफिसेंट आदि, उनका जीवन इतना आसान नहीं। वहाँ सडक का इन्तजार करते-करते लोग खुद शहर जा चुके हैं। गर्भवती महिला प्रसव पीडा से भर उठती है अस्पताल पहुँचने तक। अगर कोई बीमार पड जाए, कोई साधन नहीं है वहाँ अस्पताल तक जाने का। कई मर्तबा जान भी चली जाती है! खडे पहाडों में चढकर घास काटती औरतें गिर जाती हैं नदी या खाई में। पहाडों में यह बात आम-सी है। जानवरों के आतंक, चट्टान से गिरते पत्थर और फसल बर्बादी की आशंका हमेशा बनी रहती है। अब तो पहाडी गाँव भी भूतिया होने लगे हैं। वह बस रह गई हैं यादें! पहाडों की इस स्थिति का वर्णन किया है- पहाड का जीवन कविता में।
वह भूख ही थी
जो उन्हें घर से दूर ले गयी
यह भूख ही है
जो उन्हें घर लौटा लायी
वे भूख के हाथों खेल रहे हैं
भरे पेट इस खेल के बारे में
केवल विमर्श किया जा सकता है।
लॉकडाउन के दौरान मजदूर की स्थिति का वर्णन करती हैं यह पँक्तियाँ। कोरोना वायरस तो सभी के लिए प्रतिकूल ही था, लेकिन हाशिए के समुदायों और मजदूर वर्ग को इस कारण कई परेशानियाँ झेलनी पडी। हमारी सार्वजनिक नीतियों में इनके लिए कम ही जगह नजर आती है। यही कारण है किसी भी विपत्ति के दौरान इस तबके को ही सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पडता है। क्या विडम्बना है कि जिनके बगैर कोई काम सम्भव नहीं लगता, उनके लिए ही हमारे पास सामाजिक सुरक्षा के कोई उपाय नहीं हैं! भले ही हम लोकतान्त्रिक देश के तौर पर कहते हैं कि भारत में सभी को बराबर मौके मिलने चाहिए, लेकिन असलियत सभी के सामने है। कागज़ के टुकडे में चन्द कानूनों को लिख देना बेहद आसान है। जब बात इन्हें लोगों की जिन्दगियों में उतारने की आती है तब यह काम उतना ही कठिन हो जाता है।
अपने परिवेश और देश की आबोहवा के सिवाय कवि की नजर वैश्विक स्तर पर चल रही हलचल पर भी है। आज के समय के इजराईल-फिलिस्तीन में हिंसा के संकट पर भी कवि अपनी चिन्ता ज़ाहिर करते हैं। इजराईल के जेरुसलम शहर की अपनी ऐतिहसिक अहमियत है। दुनिया के तीन धर्म - यहूदी, इस्लाम और ईसाई, जेरुसलम से ही जन्मे। आज इस शहर की मिट्टी हिंसा और नफरत के खून से सींची जा रही है। जहाँ कभी मानवता का डेरा था, आज वहाँ जमीन के टुकडे पर आधिपत्य पाने की लडाई है। इस तर्ज पर कवि लिखते हैं -
हे! दुनिया के प्राचीन शहर
क्या कभी तुम्हें लगता है
कि पवित्र भूमि की जगह तुम
काश! एक निर्जन भूमि होते।
समाज, पर्यावरण, धर्म-द्वेष, जातिगत असमानता, स्त्री की मनोरमता, व्यक्तिगत अनुभव आदि विषयों को समेटाता काव्य संग्रह अब पहुँची हो तुम वाकई सोचने पर मजबूर करता है। हर एक कविता अपने आप में हजारों किस्से कहानियाँ बयाँ कर रही है। कविताओं की तहरीर बेहद ही सरल और सहज है। आँचलिक भाषा का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। भले ही कविताएँ कवि महेश पुनेठा की कलम से लिखी गई हैं, लेकिन इनकी स्याही समाज से भरी गई है।
सम्पर्क - नानकमत्ता स्कूल, नानकमत्ता
यू.एस.नगर, (उत्तराखण्ड) पिन- 262311U
riyachand1118@gmail.com