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लेखकों के घर

ब्रजरतन जोशी
भारतीय ज्ञान परम्परा में पर्यटन का पर्याप्त महत्त्व रहा है। हमारी परम्परा में पर्यटन के लिए कहा गया है कि बिना पर्यटन मानव अन्धकार प्रेमी होकर रह जाएगा। विश्व के कईं विद्वानों ने बिना विश्व दर्शन के ज्ञान को अधूरा माना है। पर्यटन साहस, रोमान्च और ज्ञान संचार की त्रयी है। यहाँ हम देशाटन और पर्यटन के बीच के अन्तर के साथ आगे बढेंगे। देशाटन में जहाँ आर्थिक पक्ष अहम् रहता है वहीं पर्यटन में ज्ञानात्मक पक्ष की महत्ती भूमिका होती है।
पर्यटन का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि इसके माध्यम से क्षेत्र की अद्वितीयता, संस्कृति और वातावरण को जीवन्त बनाए रखने में मदद मिलती है।
लेखकों के जीवन को करीब से जानने वाले जिज्ञासुओं के लिए लेखकों के जन्म स्थान, निवास, कार्यस्थल और अन्यान्य जगहें इस अर्थ में विशिष्ट होती हैं क्योंकि उनके माध्यम से वे अपने रचनाकार के अनुभव जगत को करीब से जानने, उसके सहचार होने का नैसर्गिक सुख अर्जित करते हैं। पर्यटन का एक उपक्षेत्र सांस्कृतिक पर्यटन का ही एक उपांग साहित्यिक पर्यटन कहा जाता है।
लेखकों के शहर, घर या उनके आस-पास का परिवेश, भूगोल साहित्य पर्यटन के केन्द्र में होते हैं। पर साहित्य पर्यटकों के लिए ये स्थल किसी तीर्थ से कम नहीं होते।
क्योंकि लेखकों की अनुभवयात्रा में उनके मकान, आवास या निवास भर नहीं होते, वहाँ केवल वास होता है, वह भी आत्म का।
लेखकों का वास अस्तित्व के साथ संवेदन लय के एकमेक होने का वास होता है। जहाँ कुछ अन्य है ही नहीं, एकत्त्व का बोध ही सर्वस्व है। इसलिए उनसे जुडे स्थल, उनके नहीं वरन् सूक्ष्म दृष्टि से देखें, तो जीवन के वे पक्ष हैं जिन्हें साधारण मनुष्य अपनी आँख से देखते हुए देख नहीं पाता। उनके रचना संसार में आए वर्णन, परिवेश, यात्रा आदि के स्थानों को जब वह अपनी आँख से देखता है और अपने पढे-सुने-गुने को महसूस करता है, तो जिस अपूर्व, अवाक आनन्द की लब्धि उसे होती है, वह अनिर्वचनीय जैसी होती है।
बतौर एक साहित्यिक पर्यटक जब हम किसी लेखक के घर की या उस स्थान की यात्रा करते हैं, जहाँ उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा व्यतीत हुआ है, तो हमारी पुस्तकीय जानकारी मानसिक तृप्ति के रास्तों पर आगे बढती है जिसकी गलियों, स्मृतिपुलों और परिवेश सहित यात्रा की विविध छवियाँ साकार हो उठती हैं। दुर्भाग्य से हमारी व्यवस्था में सांस्कृतिक पर्यटन के उपक्षेत्र साहित्यिक पर्यटन पर विशेष ध्यान नहीं जा पा रहा है।
अभी विगत माह मैं भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में एक माह के लिए सह-अध्येतावृत्ति पर कार्यशील रहा।
चूँकि मैं साहित्यिक पर्यटन के पिछडेपन से वाकिफ था। अतः वहाँ जाते ही मैंने अपने दो प्रिय लेखकों से जुडे महत्त्वपूर्ण स्थलों के बारे में स्थानीय मित्रों एवं मार्गदर्शकों से पर्याप्त जानकारी जुटाई।
शिमला का सम्बन्ध भारत के इतिहास साहित्य गगन के दो विशिष्ट महानुभव और विश्वस्तरीय लेखकों से रहा है जिनमें एक तो हिमाचल के ही यशस्वी पुत्र निर्मल वर्मा हैं दूसरे कविकुलगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर का। निर्मल वर्मा का जन्म शिमला के लोअर कैथू के हरबर्ट विला में हुआ और आरम्भिक जीवन के करीब ग्यारह वर्ष भज्जी हाऊस (जो कि अब राजकीय सम्पत्ति है) के दूसरे तल पर बीता। जहाँ उनके अद्भुत लेखकीय संस्कार के प्रारम्भिक बीज पडे।
हम अक्सर यह समझते हैं कि बचपन की यादें उम्र के साथ ढीली-ढाली होती हुई छूटती जाती है, पर सजग और संवेदनशील लेखकीय जीवन के परिपक्व अनुभवों का सारा संसार प्रायः उसी बचपन के खाली पन्नों पर अपनी ही किसी अद्भुत लिपि में ठहरा रहता है जो आगे चलकर स्वयं को अपने पूरे अर्थों के साथ प्रकाशित करती है।
निर्मल वर्मा के जीवन के प्रारम्भिक ग्यारह वर्षों के वे तमाम अनुभव, जो उनकी कालजयी रचनाओं के रोमान्चक संसार से आते हैं, का जीवन्त दर्शन आपको लोअर कैथू के भज्जी हाऊस की बॉलकॉनी और एननडेल को देखकर होता ही है, साथ ही आफ सामने पहाड, प्रकृति, शान्ति, एकान्त, टॉयट्रेन की अविस्मरणीय छवियाँ दृश्यमान हो उठती हैं।
भज्जी हाऊस के ठीक बगल में रहने वाले अनिल जसल, संदीप शर्मा और नितीन पुरी बताते हैं कि उन्होंने निर्मल वर्मा को तो कभी नहीं देखा, लेकिन हर वर्ष यहाँ काफी संख्या में लोग उनका यह मकान व परिक्षेत्र देखने आते हैं, तो अपने हिमाचली बेटे के इस गौरव से उस क्षण हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। वे बताते हैं कि भज्जी हाऊस में चार परिवार रहते थे। दो ऊपर-दो नीचे। निर्मल वर्मा का परिवार ऊपरी हिस्से में रहता था। भज्जी हाऊस के ठीक सामने लोअर कैथू का वह शताधिक वर्ष पुराना शिमला का सैकण्ड ओल्डेस्ट स्थल भी है। आज लोअर कैथू थोडा भीड-भाड वाला रिहायशी इलाका हो गया है। वहाँ जाने पर ही इस अहसास को सघन अनुभूत किया जा सकता है कि आज से 70-80 साल पहले इस परिक्षेत्र की प्राकृतिक सौन्दर्य आभा-प्रभा कैसी रही होगी। पहाडों के घुमावदार रास्ते, पगडण्डियाँ और शान्त व एकान्त प्रकृति का परम वैभव यहाँ देखते ही बनता है।
भज्जी हाऊस की पहली यात्रा मैंने अकेले की और दूसरी यात्रा में मेरे साथ डॉ. राधामणि, डॉ. रमा दूधमाँडे और डॉ. शिल्पा जिवरग थीं। अपनी दूसरी यात्रा में जब हम भज्जी हाऊस के पहले तल के बरामदें से चारों ओर की प्राकृतिक छवियों को निहार रहे थे, तो आस-पास के नीचे बने घरों की लालटीन छत्तों को देखकर लालटीन की छत का स्मरण सबको एक साथ हो आया। मेरे तीनों विद्वान साथी हिन्दी प्राध्यापक हैं, तीनों ने जमकर भज्जी ऊास की विडियो रिकार्डिंग की, फोटो लिए। उनका कहना था कि अब जब हम निर्मल वर्मा के बारे में अपनी कक्षा में बात करेंगे, तो हमारे साथ जीवन्त स्मृतियाँ होंगी।
मेरा मानना है कि जब हम लेखकों से जुडे स्थलों पर जाते हैं, तो उनकी चेतन-अचेतन स्मृतियाँ सहज जाग उठती हैं, हमारा रक्त प्रवाह भी उसी गति और लय में निबद्ध हो उठता है, जिन भू-दृश्यों, प्राकृतिक बिम्बों को देख लेखक का बाल मन किसी उद्दाम आवेग रहित सौन्दर्य से भर उठा होगा। तब किसी ने सोचा भी नहीं कि इस पहाडी बचपन के ये वृत्तान्त आने वाले कल के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज और संस्कृति के उजले अध्यायों में शुमार हो जाएँगे। लेखकों के स्थल अपनी भू-आकृति, स्थापत्य और संरचना के कारण हमारे वैशिष्ट्य का हिस्सा नहीं बनते वरन् उनके पात्रों, चरित्रों, दृश्यों, परिवेश और अन्तर्मन की छाप के उन पदचिह्नों के कारण वे हमारे लिए अति महत्त्वपूर्ण हो उठते हैं। एक पाठक के लिए इन स्थलों के सम्पर्क में आना मानो लेखकीय व्यक्तित्व के सम्पर्क में आने का ही जीवन्त अनुभव होता है। निर्मल का पाठक अगर लोअर कैथू, एननडेल, अलूचे, खूबानियों, पहाडों, एकान्त के साथ खूबसूरत भू-दृश्यों को देखता है, तो उसके लिए निर्मललोक की यात्रा सहज, आसान और अविस्मरणीय हो उठती है। आपका मन एक खास उमंग, तरंग और भावबोध से भर उठता है। भाषा के साथ निर्मलजी का जो ट्रीटमेन्ट रहा या कहें जैसी अद्भुत भाषा वे रचते हैं उसके उत्स का अहसास वहाँ जाते ही एक सामान्य नागरिक को भी होने लगता है। आपका सिर सम्मान से झुककर अपने प्रिय लेखक को आशिष देता है कि तुम जीवन के अनंत, अस्पर्शी और अज्ञात की तहों को खरोंच-खरोंच कर नहीं वरन् बिना किसी हडबडी-गडबडी के उसके तार-तार, रेशे-रेशे हमारे सामने खोलते जाओ और हमें जीवन को जरा और नजदीक से देखने के काबिल बनाते जाओ। लेखक या कलाकार और कुछ नहीं करता बस आपकी आँखों, चेतना और आत्मा पर आए धुँधलके को अपनी उजास भरी लेखनी से आलोकित कर देता है, जैसा निर्मल वर्मा अपने लेखन में करते हैं जो उन्हें एक विश्वस्तरीय रचनाकार होने का गौरव प्रदान करता है। निर्मल वर्मा का लेखन इतना निर्मल है कि इसकी तुलना हम उस शिशु से कर सकते हैं जो अपने प्रारंभिक जीवन में समस्त रसों को हडबडी में चखने की जल्दी में लगा होता है, पर निर्मल लेखन की सीमा में प्रवेश करते ही उसकी आस्वाद क्षमता और संवेदनशील होकर उसे ठहर-ठहर कर खाने को मजबूर कर देती है। और तब उसे भाषा के रस का अपूर्व आनन्द उपलब्ध होता है।
शिमला में ही भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के बगल से बालूगंज की ओर जाने वाले मार्ग पर आठ महीने के लिए कवि कुलगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर के बडे भाई सत्येन्द्रनाथ आकर ठहरे थे। उन्हीं के साथ सप्ताहभर का समय रवीन्द्रनाथ ने भी वहाँ गुजारा था। क्योंकि उनके बडे भाई सत्येन्द्रनाथ अपनी पत्नी नन्दिनी बोस (जो कि विशिष्ट संगीतकार थीं) के साथ यहाँ ठहरे थे। (1893-94) में। अतः मैंने संस्थान जाते ही इसके बारे में जानकारी जुटाना शुरू किया। अधिकांश को इसके बारे में ज्यादा जानकारी ही नहीं थी, बस यह पता था कि रवीन्द्र यहाँ आए थे।
मैंने संस्थान के अखिलेश पाठक से इस बारे में जानने की कोशिश की, तो उन्होंने बताया कि यह तो हमारे संस्थान के बिल्कुल बगल में ही है। पैदल ही जाया जा सकता है, पर वहाँ अब कुछ नहीं है, सिवाय एक पत्थर के जिस पर आप जो बता रहे हैं वह विवरण अंकित है।
मैं उस स्थान पर दो बार गया। पहली बार अकेले और दूसरी बार राधामणिजी के साथ। मैंने ठीक उस बरामदे में जाकर चूडाधार की पहाडियों को देखा, तो सहसा सोनारतरी (सोने की नाव) की पर्वत श्रृंखलाओं की उन आठ कविताओं का स्मरण हो आया, जिनकी रचना गुरुदेव इसी अहाते में बैठकर चूडाघार की पर्वत शृंखलाओं को देखते हए की थी। पर अब यह स्थल ठीक वैसी अनुभूति देने में सक्षम नहीं है, क्योंकि आस-पास की बसावट एवं पर्वत श्रृंखलाओं के बीच में हटने-घटने से वे बिम्ब अब नहीं उभरते जो उन कविताओं के पठन से हमारे अहसास में उभरता है।
दोनों ही लेखकों से स्थलों पर इन दोनों के बोर्ड या कहे शिलालेख हैं, पर वे उपेक्षित हैं। भज्जी हाऊस में तो इन दिनों पुनः निर्माण का काम चल रहा है। हरबर्ट विला अब किसी परिवार की निजी सम्पत्ति हो चुका है। गुरुदेव का वह किराए का मकान, वह कक्ष आज भी वहाँ वैसा ही है, पर उसके मकान मालिक दिल्ली में रहते हैं, गर्मियों में दो-तीन माह के लिए आते हैं, तभी खुलता है। हाँ, वे जब होते हैं, तो आने वाले पर्यटक को पूरा कक्ष व मकान अच्छी तरह दिखाते हैं।
अस्तु, इन दो स्थलों की यात्रा के बाद मेरे मन में यह प्रश्न उठा कि क्या हम सचमुच विवेकवान समाज हैं? हमने क्या प्रगति की? हमारे अद्भुत पूर्वजों के वे स्थल जहाँ से उन्होंने इसी मानवीय जीवन के अन्तर्जगत एवं बाह्यजगत के वे अछूते कोने हमें दिखाए, जिनको देखना हमारे लिए संभव नहीं था। उनके इन महत्त्वपूर्ण स्थलों को हम या हमारी व्यवस्था क्यों नहीं सहेज पा रही है।
तेजी से संस्कृति को छीलता, रौंदता, प्रचण्ड तकनीक बहुल आवेग से बढता समय बहुत जल्द ही हमसे यह सुख भी छीन लेगा। यात्रा से लौटते-लौटते मेरे मन में ऐसी आशंकाएँ और गहराने लगीं।
अपने प्रदेश-नगर का इस संदर्भ में देखता हूँ, तो पाता हूँ कि वाकई हम कहाँ जा रहे है? यह कौन-सी डगर है जो हमें हमारे पूर्वजों की स्मृतियों से हमें वंचित करती जा रही है? हम कब जागेंगे? कब समझेंगे? कब जानेंगे?
हाँ, सुकून की बात यह रही कि जब इन सब पीडाओं को लेकर मैं हिमाचल के वर्तमान संस्कृति सचिव राकेश कँवर से मिला तो मन कुछ आश्वस्ति से भरा। उनके पास सांस्कृतिक दृष्टि और सोच को पाकर मैं कुछ उत्साहित हुआ और जब उन्होंने बताया कि जल्द ही शिमला में हिमाचल के यशस्वी लेखक पुत्रों की एक दीर्घा को अमली जामा पहनाया जा रहा है। आनेवाले दिनों में यह स्वप* साकार हो। आमीन।
लेकिन हम सब को इस विचार के साथ आगे बढना होगा कि हर समाज का एक सांस्कृतिक चेहरा भी होता है। जिसे उसके सृजनशील व्यक्तित्व बनाते हैं। हमें अपने ही चेहरे की रक्षा करनी है। किसी ओर के नहीं। हम अपने-अपने शहर-प्रदेश के उन विराट व्यक्तित्वों से सम्बन्धित स्थानों की पडताल करें, उनके बारे में जानकारियाँ साझा करें और समाज को इस सम्पदा के महत्त्व से अवगत करावें।
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हमारा प्रयास होता है कि हम मधुमती के हर अंक को अफ लिए महत्त्वपूर्ण बनाएँ। इस बार भी यह कोशिश की है। कितना कामयाब हुए हैं, यह तो आप ही बता पाएँगे। इस अंक में अप्रतिम शब्द शिल्पी निर्मल वर्मा के लेखन पर तीन आलेख हैं। एक स्मृति लेख अपने समय की विशिष्ट प्रतिभा योगेन्द्र किसलय पर है, जिसे उतनी सघुराई से बुलाकी शर्मा ने लिखा है। इसके अलावा इस अंक में मुक्तिबोध पर विजयबहादुर सिंह, कृष्णा सोबती पर अनुपमा तिवारी, पारसी थिएटर पर शैलेन्द्र चौहान, अष्टभुजा शुक्ल पर सदाशिव श्रोत्रिय, शिरिष मौर्य पर जगदीश गिरी, भोजपुरी के यूरोपीय विद्वानों से परिचय करता शुभनीत कौशिक का अलोख एवं मन्दिर स्थापत्य पर अपनी गंभीर दृष्टि से हमारी जानकारियों को परिपक्व करता नर्मदाप्रसाद उपाध्याय के लेख के साथ कमलनयन शल्य द्वारा एक नितान्त ही अछूते विषय की परते खोलता गाँधी और उत्तर आधुनिकता विषय पर लेख सहित कुल बारह आलेख, समकालीन विश्व के अनूठे चिन्तक युवाल नोआ हरारी का अखिलेश पाठक द्वारा अनुवाद, दो संस्मरण, चार कहानियाँ और कवियों की कविताई के साथ चार महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की समीक्षा भी आफ सम्मुख है। शेष कॉलम यथावत है।
आप अपना खूब ख्याल रखें। कोविड अनुरुप व्यवहार के पालन में कोताही न बरतें।
इन्हीं शुभभावनाओं के संग -
- ब्रजरतन जोशी