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निर्मल सृजन : कुछ सूत्र, कुछ संशय

प्रियदर्शन
बिना किसी आलोचकीय उपक्रम के निर्मल वर्मा की ख्याति जैसे उत्तरोत्तर बढती जा रही है। उनके पाठकों का संसार बडा होता जा रहा है। इसकी क्या वजहें हैं?
1 निर्मल वर्मा की भाषा के जादू के बारे में काफी कुछ लिखा और बोला जा चुका है। वह रोशनी और अँधेरे के बीच झरती एक झीनी-सी भाषा है। वह स्मृति की परतों को खरोंचती हुई-सी, बहुत सारे कोलाहल के बीच चुप बैठी-सी, सब कुछ साफ आँखों से देखती और काँपती कलम से लिखती हुई-सी भाषा है।
2 उनकी भाषा में वह अनजाना पश्चिम हमारे लिए खुलता है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बहुत मान देता है और इसी चेतना से विकसित हुई सांस्कृतिक मनःस्थली को अपना संसार बनाता है। (हालाँकि वह पश्चिम भी शायद अब बहुत तेजी से धूमिल हो रहा है।) पब, बियर, पुराने रेकॉर्ड्स, छतों की छोटी पार्टियाँ, अनिश्चय के धुँधलके में होने वाली दोस्तियाँ, एक-दूसरे को, और खुद को पहचानने का जतन- यह सब इस सांस्कृतिक संसार के साहित्यिक उत्पाद हैं जो बहुत आकर्षित करते हैं। हालाँकि मुझे खूब एहसास है कि उत्पाद और आकर्षित करते हैं, जैसे पदों का इस्तेमाल कर मैं साहित्य में गरिमा का जो तत्त्व माना जाता है, उसको कुछ कम कर रहा हूँ और उसे बाजार की वस्तु में बदल रहा हूँ। लेकिन जिस उपभोक्तावादी संस्कृति या अपसंस्कृति से आक्रांत समय में हम रह रहे हैं, उसमें भी क्या साहित्य उपभोग की एक वस्तु में नहीं बदल गया है और निर्मल के पाठकों की संख्या इस वजह से भी नहीं बढ रही है कि वह देशकाल से परे ऐसा साहित्य रचते हैं जो एक तरह के निर्वात में जी रहे लोगों की आत्मा की क्षुधा मिटाता है?
3. लेकिन मेरी समझ में एक तीसरी चीज भी है जो निर्मल वर्मा को आज के समय में कुछ ज्यादा प्रासंगिक और आत्मीय बनाती है। उनके चरित्र आधुनिकता के एकान्त से उपजे हुए चरित्र हैं, उनकी वेदनाएँ अपने संसार से तुकतान न बैठा पाने वाले ऐसे किरदारों की वेदनाएँ हैं जो भटकते रहने को अभिशप्त हैं, जो लन्दन से दिल्ली आकर भारत को खोजते हैं, किसी नक्सली दुनिया की तलाश कर और इससे ऊब कर फिर से अपनी यातना के बनाए घर में जा बसते हैं और एक- दूसरे से जानना चाहते हैं कि सुख और दुख क्या होते हैं, कहाँ मिलते हैं। एक चिथडा सुख इसका अप्रतिम उदाहरण है जिसमें बिट्टी, इरा, डैरी या नित्ती भाई जैसे चरित्र दिल्ली की सडकों पर भटकते, बरसाती में पार्टी करते, चेखव? और स्ट्रिनबर्ग के नाटकों के रिहर्सल करते खुद को पहचानने और खो देने के खेल में लगे रहते हैं। आधुनिकता का यह अकेलापन आज और वेधक हुआ है और यह भी एक वजह है कि निर्मल के रचनात्मक साहित्य में एक बडी दुनिया अपने आप को प्रतिबिंबित पाती है।
4. हालाँकि निर्मल के इस पूरे रचना संसार को सिर्फ आधुनिकता केंद्रित समय में सीमित कर देना उनके साथ अन्याय होगा। सच यह भी है कि उनकी कहानियाँ जितना बाहर घटती हैं, उतना ही चेतना के भीतर भी। उनके चरित्र जैसे अपने भीतर बार-बार अपनी एक दुनिया रचते, तोडते और फिर बनाते मिलते हैं। हमारे समय में यह भीतर लगातार सिकुडता जा रहा है। हमारे पास उस में झाँकने की फुरसत नहीं है, यह एहसास भी नहीं है कि हमारे भीतर कोई ऐसा भीतर है। निर्मल ठीक इसी अँधेरे में उतरते हैं और हम ठगे से उनकी रोशनी में खुद को फिर से पहचानने की कोशिश करते हैं। यही नहीं, उनके किरदार अपनी दी हुई जिंदगी को- बल्कि अपनी जी हुई जिंदगी को- नए सिरे से रचने और जीने की कोशिश करते हैं। अंतिम अरण्य इस कोशिश का एक दिलचस्प उदाहरण है। यह वह जगह है जहाँ हम उनको वर्जीनिया वुल्फ, जेम्स ज्वॉयस या टॉमसमान जैसे उन लेखकों को श्रेणी में खडा कर सकते हैं जो मन के अँधेरे कोनों की परिक्रमा कर हमें कुछ और बना जाते हैं। निर्मल की वास्तविक महानता दरअसल इस दुनिया की खोज में है।
5. लेकिन निर्मल इतने भर नहीं हैं। यहाँ तक वे बिल्कुल स्वीकार्य हैं। मगर इसके बाद की यात्रा एक तरह का वैचारिक संकट पैदा करती है। उनकी एक व्यापक विचार भूमि है जिसे अमूमन भारतीयता और आध्यात्मिकता की उनकी तलाश से जोडा जाता है। दिलचस्प यह है कि हम पाते हैं कि निर्मल वर्मा की इस वैचारिक यात्रा के साझेदार घटते जा रहे हैं। जहाँ निर्मल अकेले हैं, जहाँ वे निहत्थे-निरुपाय हैं, वहाँ वे अवेध्य भी हैं और ऐसे मानवीय भी कि उनकी उँगली पकड कर चलने का मन करता है। लेकिन जैसे ही निर्मल विचारधारा का कवच पहनते है, जैसे ही वे भारतीयता का हथियार उठाते हैं, उनकी असाधारणता अदृश्य हो जाती है, ऐसा लगता है कि वे उस बाहर को देखने को कतई तैयार नहीं हैं जिसकी कई विडम्बनाओं की चोट ने भारतीय समाज को तार-तार कर रखा है, जख्मी छोडा हुआ है। इन जख्मों के इलाज के लिए निर्मल वर्मा के पास न कोई नश्तर मिलता है और न कोई मरहम। उल्टे वे इस संदिग्ध अध्यात्म के बीच बडे अनुभवों की लगभग बेमानी-सी खोज और उसकी खोखली अभिव्यक्ति में लगे दिखाई पडते हैं। अंतिम अरण्य के अन्तिम हिस्सों का कर्मकाण्डी अध्यात्म एक पाठक के रूप में हमें विचलित करता है कि हम क्या पढ रहे हैं। आलोचक कृष्णमोहन ने बडी सख्त भाषा में कुम्भ से जुडे निर्मल वर्मा के संस्मरणों की जो बखिया उधेडी है, वह अपने अतिरिक्त तल्ख स्वर के बावजूद तार्किक लगती है और निर्मल की इसे आध्यात्मिक यात्रा पर नए सिरे से विचार करने को मजबूर करती है। कई बार लगता है कि मूलतः आधुनिक भावबोध में पगे निर्मल जब परम्परा की खोज में निकलते हैं, जब भारतीयता को पहचानने की कोशिश करते हैं, तो उसे भी वे व्याख्या के आधुनिक औजारों से परखते हैं और वे उसके उन तत्त्वों की अनदेखी करते हैं जो सदियों की धूल-मिट्टी के साथ उसमें चले आए हैं और जो उसके कई रूपों को कई स्तरों पर अस्वीकार्य बनाते हैं।
6. हम सब जानते हैं कि निर्मल वर्मा ने अपनी साहित्यिक यात्रा एक कम्युनिस्ट के तौर पर शुरू की थी और चेकोस्लोवाकिया में जब उन्होंने सोवियत टैंकों का आतंक देखा, तब वे साम्यवाद से पूरी तरह विमुख हो गए। निश्चय ही यह एक ईमानदार प्रतिक्रिया रही होगी, लेकिन इस मायने में इकहरी साबित हुई कि इसके बाद अपनी पिछली आस्था की राख से जो निर्मल पैदा हुए उन्होंने यथार्थ को सीधे चश्मे से देखना जैसे हमेशा-हमेशा के लिए बन्द कर दिया। उसकी जगह उन्होंने भारतीयता का जो नया शरण्य और अरण्य चुना, उसकी आभा में डूबे-डूबे उन्होंने बहुत सारे यथार्थ की व्याख्या करने की कोशिश की। बेशक, बाहर का वेधक यथार्थ उन्हें कभी-कभी चुभता है। एक चिथडा सुख में एक फुटपाथ पर अपने कजिन के साथ खाना खा रही बिट्टी किनारे पडे जूठे के लिए लपकती देखती है और वह स्तब्ध-कातर कुछ और हो जाती है। लेकिन यह अनुभव अंततः किस तरह रूपान्तरित या किस रूप में विसर्जित होता है? बहुत गहरे दुख में, जिसकी स्मृति देर तक बिट्टी का पीछा करती है, उसके अवचेतन में कहीं गडी रहती है।
7. दरअसल इस मोड पर निर्मल की व्याख्या दो तरह की प्रतिक्रियाओं की गुंजाइश देती है। आप चाहें तो सिहरते हुए उस मनुष्यतारहित कातरता को महसूस कर सकते हैं जो उनका साहित्य पैदा करता है और आप चाहें तो निर्मल वर्मा की इस बात के लिए आलोचना कर सकते हैं कि भूख और अभाव के इस दृश्य को वे कोई वैचारिक रूप नहीं देते, कोई ठोस विचारधारात्मक आधार नहीं देते। लेकिन निर्मल अंततः जो हैं वे इस तरह के राजनीतिक या वैचारिक करेक्टनेस के लिए नहीं बने हैं। इसमें संदेह नहीं कि इसके बिना भी वे हमारी चेतना में धँसे रहते हैं।
8. मगर यह भी सच है कि इस विचार यात्रा में वे फिर से अकेले और बहुत बडी आबादी के लिए अप्रासंगिक जान पडते हैं। उनके पास भारतीय देशकाल के बडे प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते। लेकिन हम ऐसे उत्तरों के लिए निर्मल वर्मा के पास क्यों जाएँ? निर्मल वर्मा का समग्र साहित्य दरअसल याद दिलाता है कि साहित्य की संवेदना एक बात है और विचार का संवहन दूसरी बात। साहित्य कईं बार विचार को छोडकर आगे बढ जाता है। टॉलस्टॉय कहीं से माक्र्सवादी नहीं थे, लेकिन लेनिन ने उनकी व्यापक अपील के आगे घुटने टेके और उनका सम्मान किया। निर्मल का साहित्य निर्मल की विचारधारा को पीछे छोडता है और अपना एक अलग पाठक वर्ग बनाता है।
9. बेशक यह खयाल आता है कि निर्मल वर्मा आज के राजनीतिक परिदृश्य में होते, तो कहाँ खडे होते? कभी उन पर बीजेपी के पक्ष में बयान जारी करने का आरोप लगा था। हालाँकि साल 2000 में जी टीवी के लिए मैंने उनसे एक इन्टरव्यू के दौरान जब यह बात पूछी, तो उन्होंने दृढता से इससे इनकार किया था। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि वे उन दिनों भारतीय जनता पार्टी के प्रति सदय थे। हमारे समय में भी कई लेखक खुलकर नरेंद्र मोदी सरकार का स्वागत करते रहे हैं। 2014 में निर्मल वर्मा के अनन्य प्रशंसक उदयन वाजपेयी ने जनसत्ता में लेख लिख कर इसे हिंदू परंपराओं का पुनरोदय या पुनरुत्थान जैसा कुछ बताया था। वरिष्ठ लेखक रमेशचंद्र शाह ने भी तब लेख लिखा था। तब से अब तक इन लेखकों की राय बदली है या नहीं, यह नहीं मालूम।
10. निस्संदेह निर्मल वर्मा को पढना मुझे भी भाता है। एक चिथडा सुख मेरे पसन्दीदा उपन्यासों में एक है। उनसे मुलाकात की कुछ बेहद स्निग्ध स्मृतियाँ मेरे पास हैं। इसमें सन्देह नहीं कि वह अपने मूल्यों के प्रति ईमानदार और निर्मम लेखक थे। लेकिन इसी ईमानदारी और निर्ममता का तकाजा है कि हम उनकी सीमाओं को भी समझे। वे हमारे समय के बडे लेखक हैं जिनकी कीर्ति और बडी होती जा रही है, लेकिन अकेले उनसे हमारा काम नहीं चलने वाला, हमें प्रेमचंद और रेणु वाली परम्परा भी चाहिए जिसमें हम अपने सामाजिक यथार्थ को अपनी भावभूमि से देख सकें।

सम्पर्क : ई-4, जनसत्ता सोसाइटी सेक्ट-9
वसुन्धरा, गाजियाबाद-201012
मो. 9811901398