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निर्मल वर्मा के उपन्यासों में शिल्प.विधान

मुकेश सैनी
अंग्रेजी भाषा में शिल्प के लिए फार्म शब्द का प्रयोग किया जाता हैए जिसे हिन्दी में रूप शब्द से अभिहित किया जाता है। हिन्दी शब्दकोश के अनुसार इसके अर्थए बनावटए गठनए आकृतिए लक्षणए अवस्थाए दशा व सौंदर्य आदि होते हैं। 1 इसके अतिरिक्त अनेक विद्वानों ने भी शिल्प विधि को स्पष्ट करने का प्रयास किया हैए यथा . डॉण् ओम शुक्ल के मतानुसार . कला की रचना में जिन तरीकोंए रीतियों और विधाओं का उपयोग किया जाता है वे ही उन कला की शिल्प विधि के नाम से पुकारी जाती है।2 डॉण् सत्यपाल चुघ के मतानुसार . उपन्यास रचना में जिस प्रक्रिया से लक्ष्य तथा संवेदनानुभूतिए उसके तत्त्वोंए कथानकए पात्रए वातावरण आदि में परिणत होकर औपन्यासिक रूप का निर्माण करते हैं। वही उसकी शिल्प विधि है।3 इस प्रकार कहा जा सकता है कि भाषाए शैलीए छन्दए अलंकारए प्रतीकए बिम्बए विशेषणए उपमान इत्यादि रचनाकार की वे शिल्प विधियाँ हैं जिनके माध्यम से वह अपने उद्देश्यए दृष्टिकोण और विषय.वस्तु की अभिव्यक्ति करता है।
निर्मल वर्मा के उपन्यासों का शिल्प विधान अपने नवीन कोणों एवं संभावनाओं में उभरकर सामने आता है। अपने उपन्यासों में उन्होंने अभिव्यंजना के नए क्षितिजों को उद्घाटित करने का भरसक प्रयास किया है। स्वातन्त्र्योत्तर साहित्य में कथ्य एवं संवेदना के अनुरूप शिल्प में पर्याप्त परिवर्तन देखने को मिलता है। निर्मलजी ने अपने कथ्य को सशक्त बनाने के लिए भाषा, बिम्ब और प्रतीक को नवीन सन्दर्भों में अभिव्यक्त किया है। उनके साहित्य में ये शिल्पगत विशेषताएँ बखूबी देखी जा सकती हैं।
निर्मलजी के उपन्यासों में शिल्पगत सूक्ष्मता व नवीनता सहज ही देखी जा सकती है। अपने उपन्यासों में उन्होंने कलात्मक बुनावट, आत्मकथात्मक शैली, स्थूल घटना तत्त्व की क्षीणता, स्मृत्यावलोकन, सांकेतिकता इत्यादि का बखूबी पालन किया है। उन्होंने बिम्बों, प्रतीकों और संकेतों का अत्यन्त कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है। इनके माध्यम से उन्होंने निराकार स्थितियों एवं भावों को सजीव व साकार रूप प्रदान किया है। इन्हीं शिल्पगत विशेषताओं के कारण उनके साहित्य को कलात्मक बुनावट की संज्ञा दी जाती है। उनके कथा-साहित्य में कलात्मक बुनावट पर अपना मत प्रकट करते हुए शिवप्रसाद सिंह कहते हैं - निर्मल वर्मा की कहानियाँ तथा उपन्यास एक कलात्मक बुनावट की चीजें हैं। यह बुनावट काफी सादी पर सचेत है। इसी बुनावट के कारण सभी प्रकार की स्थितियाँ, परिवेश, चरित्र और अनुभूतियाँ आपस में इस तरह समन्वित हो जाती हैं कि उनके भीतर कहीं भी बिलगाव दिखाई नहीं पडता। एक हल्की, किन्तु भीगे-भीगे रंगों की दुलाहट आवश्यकतानुसार सर्वत्र छा जाती है। इसमें कठोर, मृदु, नीरस-सरस सभी प्रसंग अपनी सजीवता पा लेते हैं। यही कारीगरी गाढे रंगों की चित्रकारी की तरह नहीं, हल्की मरोडों से युक्त पेंसिल ड्राईंग की तरह है, जिसमें सादगी है, साथ ही आधुनिक ढंग की सुरुचि सम्पन्न गरिमा भी।4
निर्मल वर्मा के उपन्यास कथ्य, शैली एवं संवेदना की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। उनका वे दिन उपन्यास इसका अप्रतिम उदाहरण है जिसका संपूर्ण ढाँचा कलात्मक बुनावट पर आधारित है। समूचा उपन्यास आदि से अंत तक एक विशेष लय व गति में प्रवहमान रहता है। इसमें चित्रकला और संगीत कला का मिला-जुला समन्वय है, साथ ही कविता की लयात्मकता उपन्यास को अत्यन्त आकर्षक बनाती है। उपन्यास का अंत भी रूढ व सामान्य नहीं है। रायना की विदाई में लेशमात्र भी नाटकीयता दिखाई नहीं देती, अपितु उसकी विदाई अत्यन्त सहज तरीके से सम्पन्न होती है। यही सहजता उनके अन्य उपन्यासों में भी दिखाई देती है। उनके यहाँ कथा बँधी-बँधायी न होकर स्वच्छंद एवं मुक्त है। यही कारण है कि न तो कथानक का आरंभ ही आकर्षक है और न ही आश्चर्यजनक अवसान। यहाँ सर्वत्र एक संवेदना-सी छाई हुई है जो सतत प्रवाही जीवन-लय से सहज-संबद्ध है।
निर्मलजी का लाल टीन की छत उपन्यास भी इसी श्रेणी का है जो कलात्मक बुनावट का सर्वोत्कृष्ट नमूना है। इस उपन्यास में प्राचीन प्रणालियों को समाप्त करने का भरसक प्रयास किया गया है। यहाँ कथानक और चरित्र-चित्रण पर ध्यान देने के बजाय आन्तरिक स्थितियों का अधिक उल्लेख किया गया है। उपन्यास की संरचना एक विशिष्ट लय व लचीलेपन को लिए हुए है। सम्पूर्ण उपन्यास का विकासऋम अपने परिवेश के साथ उतार-चढाव के रूप में गतिमान रहता है। उन्होंने अपने उपन्यास एक चिथडा सुख और रात का रिपोर्टर में भी घटनाओं की सुन्दर योजना की है। रात का रिपोर्टर में आपातकालीन आतंक, मानसिक अंतर्द्वन्द्व व राजनीतिक दबावों का प्रमुखता से वर्णन किया गया है। अनूठे बिम्बों और प्रतीकों के प्रयोग से आपातकालीन भयग्रस्त वातावरण जागृत हो उठा है।
निर्मल वर्मा के उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में रचे गए हैं जिसमें रचनाकार स्वयं पात्र या भोक्ता होता है। उदाहरण के लिए उनके वे दिन उपन्यास की शुरुआत आत्मकथात्मक शैली से होती है। यहाँ एक प्रमुख पात्र इण्डी अपनी कथा का बखान करते हुए कहता है- यही समय होता था। यही घडी। मैं कुर्सी पर बैठा रहा करता था... एक ठंडी सी सिहरन को अपनी समूची देह में दबाता हुआ। सामने खिडकी थी, शीशों पर कुहरा जम गया था। मैंने रुमाल निकाला। फिर उसे आँखों पर दबाकर मेज पर सिर टिका लिया। मैं देर तक ठिठुरता रहा।5 इसी प्रकार अन्तिम अरण्य उपन्यास के आरम्भ में कथानायक मैं मेहरा साहब के आगमन को निहारता है - वह आ रहे हैं। मैं उन्हें दूर से देख सकता हूँ। मैं कोशिश करता हूँ कि यह जान सकूँ कि वह किसी के साथ हैं या अकेले? लेकिन यह असम्भव है। वह ढलान के ऐसे कोण पर हैं, वहाँ दूसरा हो भी, तो दिखाई नहीं दे सकता। मैंने कोशिश छोड दी है।6
उपन्यासों के अतिरिक्त निर्मलजी ने लंदन की एक रात, पराए शहर में, तीसरा गवाह, डायरी का खेल, एक दिन का मेहमान, बुखार, अमालिया, सूखा, अन्धेरे में, लवर्स इत्यादि कहानियों में भी इस शैली का भरपूर और सफल प्रयोग किया है। उनकी प्रसिद्ध कहानी कव्वे और काला पानी की शुरुआत आत्मकथात्मक शैली में ही हुई है, यथा- मास्टर साहब पहले व्यक्ति थे, जिनसे मैं उन निर्जन, छोटे, उपेक्षित पहाडी कस्बे में मिला था। पहले दिन ही.... मैं बस से उतर ही रहा था, तो देखा सारा शहर पानी में भीग रहा है, भुवाली में धूप, रामगढ पर बादल और यहाँ बारिश। हमारी बस ने तीन घंटों के दौरान तीन अलग-अलग मौसम पार कर लिए थे।7
अपने कथा-साहित्य में निर्मलजी ने स्वयं को एक कथानायक के रूप में उपस्थित किया है। वे पाठक को यह समझाना चाहते हैं कि उनकी जिन्दगी में आने वाले सुख-दुःख मात्र काल्पनिक कथानक नहीं है, वरन् उनकी जिंदगी का एक अटूट हिस्सा है। वे स्वयं इस सन्दर्भ में कहते हैं - मुझे यह लगता है कि अब तक मैं जो लिखता आ रहा हूँ उसमें मेरा आत्म जीवन ही सबसे अधिक रूपांतरित होकर आता रहा है।8
निर्मल वर्मा के औपन्यासिक साहित्य में घटना सूत्रों की अत्यन्त क्षीणता दिखाई देती है। स्वयं निर्मलजी को अपने उपन्यासों के विकास-क्रम और उसे चरम परिणति तक पहुँचाने के लिए घटना तत्त्वों की तनिक भी आवश्यकता नहीं पडती। वे घटनाओं का स्थूल रूप में चित्रण भी नहीं करते। इस विषय में डॉ. रेखा शर्मा कहती हैं - उनकी कृतियों में घटनाएँ आती हैं, लेकिन इतनी सरल और लयबद्ध गति में कि घटना घटी, यह ठोस अहसास नहीं होता। यहाँ अकस्मात् कुछ नहीं घटा है और असल में यह घटना के बजाय होना ज्यादा है। होने के साथ ही कुछ घटता है, जिसमें होगा इस उपन्यास में तीव्रतर बन गया है। इसलिए यहाँ औपन्यासिक क्रिया बाहर के बजाय आन्तरिक और मानसिक अधिक है।9
अपने औपन्यासिक साहित्य में निर्मलजी सांकेतिकता का भरपूर प्रयोग करते हैं फिर चाहे वे चरित्र के बारे में कह रहे हों या घटनाओं के बारे में। अपने उपन्यासों में वे स्थूल यथार्थ की अपेक्षा सूक्ष्म यथार्थ का अधिक चित्रण करते हैं, जिसकी अभिव्यक्ति के लिए वे सांकेतिकता का सहारा लेते हैं। इस सन्दर्भ में डॉ. रेखा शर्मा कहती है - निर्मल ठोस निरूपण में नहीं मानते। वे मानते हैं कि यथार्थ तो झाडी में दुबका रहता है। झाँककर जितना दिख सके उतना ठीक। यही उनकी कृतियों में भी होता है, कोई ठोस चित्रण नहीं, संकेतों से जितना समझा जाए वह ठीक है।10 लाल टीन की छत में काया के रोने के पश्चात प्राकृतिक परिवेश का पहले से ज्यादा प्रकाशमान होना हृदय के हल्के होने व गिन्नी का सुरंग की ओर खिंचते जाना नियति का स्पष्ट संकेत करते हैं। इसके अलावा उपन्यास में गिरजाघर से लकडी चुराकर ले जाने वाले लोगों का प्रसंग भी वर्णित है। यह प्रसंग व्यक्ति की उस मानसिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जहाँ उस व्यक्ति ने लोगों के लिए अपने प्राण अर्पित किए हैं, वहीं उसी प्रार्थना मंदिर से लकडियाँ चुराने वाले कुछ इस तरह के स्वार्थी लोग भी शामिल हैं जो मंदिर की लकडियों को चुराकर बेच खाते हैं। उपन्यास के अन्त में निर्मलजी ने काया के रजस्वला होने के घटनाचक्र को भी संकेतों के माध्यम से जाहिर किया है - अचानक मुझे लगा, मैं हल्की हो गई हूँ, सबसे मुक्त और स्वच्छ... मेरा शहर दब गया था, हमेशा के लिए - और मैं उस पर उगी वसन्त की घास और कीचड में लिथडी बर्फ से अपना खून पोंछ रही थी, मैं घास पर लौट रही थी, मैं हो गई थी। मैं ईश्वर के पास पहुँचकर उसके परे निकल गयी।11 एक चिथडा सुख में मुन्नू के कई कथनों से इरा-नित्ती भाई और बिट्टी-डैरी के बारे में संकेत मिलते हैं। एक स्थल पर मुन्नू, नित्ती भाई के विषय में कहता है - नीले गालों पर छोटे-छोटे सफेद उगे हुए बाल। मैंने कभी किसी आदमी को अपने प्रति इतना लापरवाह नहीं देखा था - मानो उनका अपने शरीर से कोई रिश्ता न हो।12 नित्ती भाई की स्वयं के प्रति ऐसी लापरवाही उनके अंतःस्तल में छिपी मायूसी, अधूरेपन और उलझन भरी परिस्थिति की ओर संकेत करती है। इस प्रकार यह उपन्यास पूर्णतः सांकेतिकता पर आधारित है।
निर्मलजी का गद्य काव्यगत लय और भावात्मकता का बेजोड नमूना है। वे गद्य में शब्दों का प्रयोग बेहद सजग होकर कुशलतापूर्वक करते हैं। निर्मल वर्मा की व्यक्ति के अंतर्मन तक पहुँचने की शैली भी अन्य कवियों की भाँति ही है। अपने उपन्यास वे दिन में उन्होंने रायना के जीवन के सुख-दुःख के तमाम क्षणों का काव्यात्मक शैली में अत्यन्त सजीव चित्रण किया है। इसी प्रकार लाल टीन की छत में लामा का आतंक, मौसम का हाल, सर्दियों से पहले का वातावरण, काया के लिए माँ का अजनबीपन, मकान का बेगानापन, पहाडों की उदासीनता इत्यादि को काव्यात्मक भाषा के जरिये प्रकट किया गया है- मन्दिर की फीकी दोपहरी रोशनी में उसे सचमुच यह भ्रम होने लगा कि वह दूसरी काया है। सबकी आँख बचाकर रेंगती हुई अपनी पुरानी देह से बाहर निकल आयी है। आधी रात अपने घर के छज्जे पर अकेले लेटी है, नंगी और निश्चल, बाहर जहाँ खुद वह अपने से अलग है, खुद अपनी देह का बुलावा दूसरी देह से सुनती है, उन बनैले जानवरों की तरह, जो सोचते नहीं किन्तु आसपास के सन्नाटे, झाडियों की सरसराहट या खुद अपने भीतर की करवट नए सिरे से सूँघने लगते हैं। अचानक भाँप जाते हैं कि यह सन्नाटा है, यह सरसराहट, यह करवट एक दूसरी दुनिया की है, जहाँ माया का मोह और मोह का असीम आतंक है.... और काया उससे आगे नहीं जा सकती थी।13 इस तरह के लाक्षणिक प्रयोग भाषा को अलंकृत करने के साथ-साथ उसे काव्यात्मक रूप प्रदान करते हैं। कृष्णा सोबती के शब्दों में - निर्मल का पूरा मिजाज टैम्परामेंट कवि मन का है। वही इन्टैनसिटी, वही रोमानियत, वही अधखुली आँखों से यथार्थ को अबूरकर डालने की लापरवाही।14
निर्मलजी भाषा का अधिकारपूर्वक प्रयोग करते हैं। अपने गद्य में वे भाषा को उसकी मूर्तता एवं पूर्ण पारदर्शिता में प्रयुक्त करते हैं। वे अपनी भाषा के माध्यम से स्थितियों के हल्के से हल्के परिवर्तन को मूर्त करने की सामर्थ्य रखते हैं। उन्होंने संगीत की लय, अरूप गन्ध और धुँधले रंग को पकडने व समझने का अथक परिश्रम किया है। निर्मलजी सादृश्यों की सृष्टि करने में सिद्धहस्त हैं। वे उलझी हुई संकुल अनुभूतियों को सादृश्य द्वारा अभिव्यक्त करते हैं, साथ ही इसके द्वारा वे अमूर्त भावों को पाठक-वर्ग तक ठोस रूप में पहुँचाने का कार्य भी करते हैं। वे दिन में इण्डी की मनःस्थिति का वर्णन इसी प्रकार का है - ... मैं किसी दायरे के इर्द-गिर्द एक खरगोश के पीछे भाग रहा हूँ - एक सफेद मुलायम-सी चीज, जो सिर्फ सिर की चकराहट थी। चकराहट का भी कैसा अजीब रंग होता है... बादल-सी हल्की और सफेद सिर की नसों के बीच तिरती हुई।15 यहाँ नशे में निमग्न एक उनींदे-से अस्थिर मन की स्थिति को निर्मलजी ने बादल और खरगोश के सादृश्य द्वारा अभिव्यक्ति प्रदान की है।
किसी सशक्त भाषा के लिए प्रभावशाली बिम्बों का होना अत्यन्त आवश्यक है। निर्मलजी इसी श्रेणी के लेखक हैं। वे प्रभावशाली बिम्बों का प्रयोग करने में सिद्धहस्त हैं। लाल टीन की छत उपन्यास में वे चाँद निकलने के दृश्य का बिम्ब इस तरह प्रस्तुत करते हैं- मकान की एक दीवार अब भी धूप में टँगी थी। छत के ऊपर चाँद निकल आया था - आधे से भी छोटा - सेब की एक फाँक जैसा, जो रात आने की प्रतीक्षा में निस्पन्द-सा जान पडता था।16 चाँद निकलने का ठीक ऐसा ही एक दृश्य बिम्ब एक चिथडा सुख में भी उपस्थित है- ऊपर चाँद निकल आया था, बहुत छोटा एक सफेद कटे हुए नाखून-सा। अब पहले जैसा धुँधलका नहीं था, न कोई परदा, न परछाई, न धुंध। हर चीज अपने में अकेली, ठोस खडी थी। गमले, कुर्सियाँ, दरियों पर बैठे लोग।17
निर्मलजी स्वर को दृश्य रूप देने में कभी उसे रूपक या बिम्ब रूप में प्रस्तुत करते हैं तो कभी उसका मानवीकरण करते हैं। वे दिन उपन्यास में उन्होंने नदी की आवाज का मानवीकरण करते हुए उसे पूर्णतः मूर्तिमान कर दिया है- यह नदी की आवाज है, यह हवा से बिल्कुल अलग है... इतनी ऊँचाई से उसका स्वर धीमी-सी थपथपाहट-सा लगता था, कभी वह एकदम बुझ जाता था। तब हवा बीच में आ जाती थी.... उनके और उस स्वर के बीच एक सफेद-सा सूनापन। फिर वह उठता था, अपने आप, एक कमजोर आग्रह की तरह, जैसे वह अपने को हवा से मुक्त करने के लिए छटपटा रहा हो।18 इसी प्रकार अन्तिम अरण्य में उन्होंने मेहरा साहब की पत्नी की हँसी को काव्यात्मक भाषा के द्वारा सजीव बिम्ब के रूप में अभिव्यक्ति प्रदान की है- अचानक मुझे वह हँसी सुनायी देती है... सफेद दाँतों की चमकीली पाँत से पहाडी झरने की तरह कल-कल करती हुई... उनकी हँसी, जिन्हें दफनाया जा रहा था। वह ऐसे हँसा करती थीं, जैसे वे बच्चे, आँख मिचौनी खेलते हुए अपने छिपे हुए कोने से हँसते हैं, जब उन्हें खोजने वाला उन्हें देखकर पास से गुजर जाता है।19
साहित्य में एक ओर जहाँ बिम्बों का प्रयोग अनुभव के समग्र सम्प्रेषण के लिए किया जाता है, तो वहीं दूसरी ओर प्रतीकों का प्रयोग विचारों को कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त करने के लिए किया जाता है। प्रतीक अपने आप में कई गूढ अर्थ लिए हुए होता है, जिसके माध्यम से उपन्यासकार व्यक्ति की मनःस्थिति, उसके भावों और कठिन परिस्थितियों को एक अलग ही रूप में चित्रित करते हैं।
निर्मलजी के प्रतीक सूक्ष्म व अमूर्त संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। अपने प्रतीकों के माध्यम से उन्होंने साहित्य के सौंदर्य में वृद्धि की है। उनके साहित्य में काल व स्थान के अतिरिक्त अनेक पात्र भी प्रतीक रूप में अवस्थित हैं। उनके वे दिन उपन्यास की नायिका रायना का एक पर्यटक के तौर पर यहाँ-वहाँ भटकना उसकी मानसिक अस्थिरता का प्रतीक है। वहीं लाल टीन की छत की काया किशोरवय का प्रतिनिधित्व करती हुई स्वयं अपने आप में एक प्रतीक है। इसी प्रकार एक चिथडा सुख की बिट्टी जहाँ कला में जीवन का अर्थ खोजने का असफल प्रयत्न कर रहे कलाकारों का प्रतीक है, तो वहीं रात का रिपोर्टर में आपातकालीन परिस्थितियों से घिरा हुआ रिशी भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग के प्रतीक के रूप में अवस्थित है।
एक चिथडा सुख में निर्मलजी ने अनेक महत्त्वपूर्ण बातों को अत्यधिक प्रभावी बनाने के लिए उपयुक्त प्रतीकों का प्रयोग किया है। उपन्यास का मुख्य प्रतीक है - बौने का चिथडा- कुछ देर पहले जिस देह पर जोगिया चोगा था, वहाँ अब एक अधमरा चिथडा डोल रहा था। वह उसे सहलाने लगा, ऊपर से नीचे तक फिर उसे उतार दिया, तहाकर समेट लिया, आगे बढा बिट्टी के पैरों पर उसे रख दिया। यह सुख है, मुन्नी, देखो, हाथ लगाकर देखो, सचमुच का सुख।20 यहाँ पर चिथडा, जिसकी प्राप्ति की आशा से सुख जुडता है, के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ है। लेकिन जब उसकी प्राप्ति होती है तो यह सुख मात्र चिथडा बनकर रह जाता है। ठीक यही बात लेखक इस प्रतीक के द्वारा बतलाना चाहते हैं। उपन्यास में अन्य प्रतीकों में मदर टेरेसा, कोढी और भिखारी बच्चे की वह तस्वीर है, जो बिट्टी की गरीबों के साथ दुःख बाँटने व उनके बीच जिंदगी गुजारने की आकांक्षा को दर्शाता है।
निर्मल वर्मा के कथा साहित्य की एक अनुपम विशेषता है- उनके उचित शब्दों का चयन और उनकी योजना। भाषा चाहे कोई भी क्यों न हो उसमें उचित शब्दों का चयन एवं योजना पूर्णतः भावों के अनुरूप ही की जानी चाहिए। विशेषतः एक साहित्यकार के लिए इस क्षेत्र में सजग रहना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है, क्योंकि अनुचित शब्दों के प्रयोग से भाषा में अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती। इस दृष्टि से देखा जाए, तो निर्मलजी का शब्द-चयन एवं शब्द-संयोजन उनके विस्तृत एवं अथाह ज्ञान की ओर इशारा करता है। निर्मलजी अपने कथा साहित्य में उचित शब्दों के चयन व उनकी योजना के लिए देशकाल का पूर्णतः ध्यान रखते हैं। जहाँ एक ओर उनकी भाषा में संस्कृत की तत्सम शब्दावली के प्रयोग से कविता का बोध होता है, वहीं दूसरी ओर वह अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से आधुनिक भी बन जाती है। अपने उपन्यासों में उन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू के साथ-साथ बोलचाल के शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है। उनकी कई कहानियों के शीर्षक अंग्रेजी में ही हैं, यथा- पिक्चर पोस्टकार्ड, लवर्स। इसके अतिरिक्त उनके अधिकतर पात्र भी विदेशी नामधारी हैं, यथा - मारिया, फ्रांज, मिस जोसुआ, मेलन्कोविच, जाक, रायना रैमान, अन्नाजी, हॉलबॉख इत्यादि। अपने साहित्य में उन्होंने विदेशी नगरों का उल्लेख भी बहुतायत से किया है, यथा- वियना, वेनिस, प्राग, लंदन इत्यादि। उनके उपन्यासों से उद्धृत कुछ अंग्रेजी शब्दों एवं वाक्यों के उदाहरण देखिए -
अंग्रेजी शब्द -
वे दिन -कॉरीडोर क्रिसमस, डाइनिंग होल, टूरिस्ट
एजेंसी, रिसीवर
एक चिथडा सुख- क्यूबिकल, पार्ट, थिएटर,
स्टेज, ग्रीन-रूम
अन्तिम अरण्य- यूनिवर्स, मिस्टीरियस, पोस्ट
ऑफिस, फिलोसफी
अंग्रेजी वाक्य-
एक चिथडा सुख- लेट अस गो टु द कजिन्स।
रात का रिपोर्टर- वीकेस्ट लिंक इन द चेन।
निर्मल वर्मा ने जहाँ अपने शिल्प-विधान में अंग्रेजी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग किया है, वहीं उन्होंने अंग्रेजी शब्दों का हिन्दीकरण भी बखूबी किया है। उन्होंने अपने उपन्यासों में अंग्रेजी शब्दों को हिंदी व्याकरण के अनुसार तोड-मरोड कर प्रयुक्त किया है। अंग्रेजी शब्दों में हिंदी कारक-चिह्नों का योग कर उन्हें नवीन रूप प्रदान किया है। ऐसे शब्द विशेषतः बहुवचन से संबंधित हैं। यथा -
वे दिन- बेंचों, ओवरकोटों
लाल टीन की छत- ड्रामें
रात का रिपोर्टर- स्पीचों, ग्लेशियरों
निर्मल वर्मा के उपन्यास वे दिन में स्थानीय प्रभाव के कारण चेक वाक्य भी आए हैं, जिसकी वजह से उपन्यास की स्वाभाविकता में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है, यथा-
वे दिन
ताके वाशे जेना (आपकी स्त्री भी?)
नेनी मोय जना (वह मेरी स्त्री नहीं है।)
बैल्मी हैस्का (वह बहुत सुन्दर है।)
ये स्तेने हैस्का (उससे कोई अंतर नहीं पडता
वह बहुत सुन्दर है।)
अपने औपन्यासिक साहित्य में निर्मलजी ने अंग्रेजी शब्दों के अतिरिक्त संस्कृत की तत्सम शब्दावली का भी भरपूर प्रयोग किया है। ये शब्द इस प्रकार हैं -
वे दिन- हास्यास्पद, व्यावसायिक
लाल टीन की छत- मंत्रमुग्ध, अविश्वसनीय,
अवसन्न, निर्विकार, निस्पंद, आतंकित
एक चिथडा सुख- मूच्र्छित, उत्तेजित, गोपनीय,
आग्रह
रात का रिपोर्टर- गति, प्रलोभन, कृतज्ञता, अनुमति,
प्रतीक्षा,
अन्तिम अरण्य- यातनापूर्ण, वार्तालाप, मृत्यु
निर्मल वर्मा के शिल्प-विधान में उर्दू शब्दावली का भी बहुतायत से प्रयोग हुआ है। उनके उपन्यासों में वर्णित कुछ उर्दू शब्दों का विवरण इस प्रकार है र्‍ -
वे दिन- अखबार, दस्तखत, दफतर, अफवाह
लाल टीन की छत- खानाबदोश, खुद-ब-खुद,
दस्तक, खजाना
एक चिथडा सुख- बेतहाशा, मजाक, नुमाइश
रात का रिपोर्टर- गलत फहमी, रोशनदान, तकलीफें
अन्तिम अरण्य- शक्की, खौफनाक
इसके अतिरिक्त अपने शिल्प-विधान में निर्मलजी ने साधारण बोलचाल के शब्दों का भी भरपूर प्रयोग किया है। उदाहरण के तौर पर उनके उपन्यासों में आए ऐसे बोलचाल के कुछ शब्द इस प्रकार हैं -
वे दिन- दूभर, लौंदा, मद्धिम, सुर
एक चिथडा सुख- गूदड, धुँधलका, छीना-झपटी,
मुँडेर, झक्कड
रात का रिपोर्टर- टोहने, अधलेटा, कुल्हड, धब्बा,
गुनगुनी, पोटली
अन्तिम अरण्य- खुरपी, बुँदकियाँ, दालान
अपने शिल्प-विधान में निर्मलजी ने ध्वनियुक्त शब्दों का भी बखूबी प्रयोग किया है। ये शब्द वातावरण को ध्वनित करते हैं, जिससे एक बिम्ब उभरता है, तत्पश्चात अर्थग्रहण बडी आसानी से किया जा सकता है। उनके उपन्यासों से उद्धृत कुछ ध्वनियुक्त शब्द उदाहरणस्वरूप यहाँ देखे जा सकते हैं-
वे दिन- भुनभुनाती, खटखटाहट, डबडबाती,
थरथराहट
लाल टीन की छत- झिपझिपाती, झिंझोडना,
छटपटाती, सरसराहट
एक चिथडा सुख- गडगडाहट, भन्नाकर, गट-गट,
टपटपाहट
रात का रिपोर्टर- घुर्र-घुर्र, खडखडाहट, घुरघुराहट,
फडफडाती
अन्तिम अरण्य- सरसराहट, गुनगुनाहट, भडभडाकर
निर्मल वर्मा के उपन्यासों में भाषा व शैली के विविध रूप देखने को मिलते हैं। उन्होंने मुहावरे, सूक्तियाँ, नवीन उपमान एवं नवीन विशेषण का प्रचुरता से अपनी भाषा में प्रयोग किया है।
उन्होंने अपने औपन्यासिक साहित्य में मुहावरों को एक विशिष्ट संदर्भ में प्रयुक्त किया है, जिससे उनकी भाषा को पूर्णता की प्राप्ति होती है। उदाहरणस्वरूप उनके उपन्यासों से कुछ मुहावरे यहाँ उद्धृत हैं -
लाल टीन की छत- खानाबदोश बाबू जो घर के न घाट के। थाह पा ली। उन्हें ताना दें। उसका चेहरा अचानक पीला पड गया।
एक चिथडा सुख- काँटा-सा कसकने लगा। धूल
छानते।
अन्तिम अरण्य- आँखों में धूल झोंककर, आँखें
फाडे देख रहा था।
इस प्रकार निर्मलजी ने अपने उपन्यासों में मुहावरों को एक विशिष्ट संदर्भ प्रदान कर अपनी भाषा को रचनात्मक रूप देने का सफल प्रयास किया है। मुहावरों के अलावा उन्होंने अपने उपन्यासों में अनेक स्थलों पर सूक्तियों का प्रयोग भी किया है, यथा -
- जहाँ जिद न हो, वहाँ बचपन हो सकता है...
यह मुझे अस्वाभाविक-सा लगता था।21
- जिन लोगों के सामने दूसरा रास्ता खुला रहता
है, वे शायद ज्यादा सुखी नहीं हो पाते।22
उपर्युक्त सूक्तियाँ निर्मलजी के उपन्यासों में नवीन विचारों, अनुभूत सत्यों, सूक्ष्मता, मर्मस्पर्शिता इत्यादि को प्रकट करती हैं।
निर्मल वर्मा की भाषा में विशेषणों का आधिक्य है। अपने विचारों को सामान्य पाठक वर्ग तक सम्प्रेषित करने के लिए वे नित्य नवीन विशेषणों का आश्रय लेते हैं, यथा -
वे दिन- तीखी, सफेद और आकारहीन हवा, भूरी-
सी आहट
लाल टीन की छत- तितरी धूप, अश्लील-सा
आकर्षण
एक चिथडा सुख- भूरा-सा आलोक, पीली-सी
शान्ति, उज्ज्वल-सा विस्मय
अपनी भाषा को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए निर्मलजी ने अपने शिल्प-विधान में नवीन विशेषणों के साथ-साथ नवीन उपमानों का भी बखूबी प्रयोग किया है। इन नवीन उपमानों के प्रयोग से निर्मलजी की काव्यात्मकता, कुशल शब्द-चयन शक्ति एवं कल्पना शक्ति का सहज ही ज्ञान हो जाता है।
वे दिन
उपमेय उपमान
शहर का शोर घरों के बीच एक गिरता
हुआ नोट
चाह का डर और सुख सूखी गर्म रेत पर चमकने वाली नंगी हड्डी
लाल टीन की छत
उपमेय उपमान
चढाई पर का रिक्शा रेंगती हुई मक्खी
थूक जुबान का पसीना
इसके अतिरिक्त निर्मलजी ने अपने उपन्यासों में रूपकों का भी बढ-चढकर प्रयोग किया है। मौजूदगी की पोटली, जिद की गुठली, उम्मीद का सिरा, धूप के छल्ले, स्मृति की गन्ध इत्यादि अनेक रूपक निर्मलजी की भाषा में चार चाँद लगा देते हैं। अपनी भाषा में उन्होंने विराम चिह्नों का भी पूर्णतः सजगता के साथ प्रयोग किया है। वे आवश्यकतानुसार अल्प विराम, अर्द्ध विराम, पूर्ण विराम, प्रश्नवाचक चिह्न एवं विस्मयादिबोधक चिह्नों का भी बखूबी प्रयोग करते हैं।
निर्मलजी की भाषा ताजगी एवं नयेपन से युक्त एक ऐसी भाषा है, जो उन्हें अपने समकालीन कथाकारों से जुदा करती है। उनकी भाषा ऐतिहासिक परम्परा एवं मान्यताओं को आत्मसात् करने के साथ ही समय की गति के अनुरूप चलने वाली साहित्यिक भाषा है। अपनी भाषा में उन्होंने अपनी सूक्ष्म संवेदन दृष्टि, बिम्ब और रूपकों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है, जो उन्हें काव्य के अत्यधिक सन्निकट ले जाते हैं। इसीलिए उनके गद्य में पद्य की सी गतिशीलता एवं लयात्मकता दिखाई देती है। पर इससे भाषा के सम्प्रेषण में कोई व्यवधान पैदा नहीं होता, ना ही वह कृत्रिम या बनावटी ही लगती है।
अपने औपन्यासिक साहित्य में निर्मलजी ने अंग्रेजी शब्दों एवं वाक्यों का प्रयोग भी बखूबी किया है, जो विदेशी सभ्यता एवं शिष्टाचार को दर्शाते हैं। यदि वे उन अंग्रेजी शब्दों की जगह उनके समानार्थी हिंदी शब्दों को रखते तो वहाँ की सभ्यता, संस्कृति, परिवेश एवं रीति-रिवाज कभी साकार नहीं हो पाते। अतः उनके साहित्य में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग उचित एवं तर्कसंगत प्रतीत होता है। उनके उपन्यासों की कोमलकांत पदावली उनकी भाषा को साहित्यिक बनाती है, तत्सम् शब्द उसकी ऐतिहासिक सम्पृक्तता को स्पष्ट करते हैं, वहीं उर्दू शब्द उसे हिन्दुस्तानी बनाते हैं। डॉ. नामवर सिंह के मतानुसार - निर्मल वर्मा ने स्थूल यथार्थ की सीमा पार करने की कोशिश की है। उन्होंने तात्कालिक वर्तमान का अतिऋमण करना चाहा है... यहाँ तक कि शब्द की अभेद्य दीवार को लाँघकर शब्द के पहले के मौन जगत में प्रवेश करने का भी प्रयत्न किया है। वहाँ जाकर प्रत्यक्ष इन्द्रियबोध के द्वारा पहलुओं के मूल रूप को पकडने का साहस दिखाया है।23 इस प्रकार निर्मलजी स्थूल यथार्थ की अपेक्षा तात्कालिक वर्तमान का चित्रण करना अधिक उचित मानते हैं।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि निर्मलजी में अपने समय के अनुभूत वस्तुसत्य को नए रूपक गढकर नये प्रभाव उत्पन्न करने का सामर्थ्य है, जो पाठक-मन को कोमल स्नेह एवं नाजुक-सौंदर्य के संस्पर्श से चमत्कृत कर देता है। निर्मल वर्मा के कथा-साहित्य में तमाम प्रकार के शैल्पिक नियम, विधियाँ और तरीके सन्निहित हैं, जिनके माध्यम से विषय-वस्तु को विस्तार देते हुए वे किसी भी घटना, दृश्य, पात्र-वार्तालाप, वातावरण और देश-काल की सजीव झांकी प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं।
संदर्भ : -
1. वर्मा, कथाकार निर्मल से उद्धृत, इष्टवाल, (डॉ.) नरेन्द्र, श्याम प्रकाशन, जयपुर, 2001
2. शुक्ल, (डॉ.)ओम - हिंदी उपन्यास की शिल्प विधि का विकास, पृ. 17-18
3. चुघ, (डॉ.)सत्यपाल प्रेमचंदोत्तर हिन्दी उपन्यासों की शिल्पविधि, इलाहाबाद, 1968, पृ.10
4. सिंह, शिवप्रसाद : आधुनिक परिवेश और नवलेखन, इलाहाबाद, 1970, पृ. 82
5. वर्मा, निर्मल : वे दिन, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 9
6. वर्मा, निर्मल : अन्तिम अरण्य, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2000, पृ. 9
7. वर्मा, निर्मल : कव्वे और काला पानी, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1999, पृ. 102
8. (संपा.) वाजपेयी, अशोक : निर्मल वर्मा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1990, पृ. 39
9. शर्मा, (डॉ.)रेखा, निर्मल वर्मा और सुरेश जोशी का कथा साहित्य, किताबघर, नयी दिल्ली, 1994, पृ. 126
10. शर्मा, (डॉ.) रेखा : निर्मल वर्मा और सुरेश जोशी का कथा साहित्य, किताबघर, नयी दिल्ली, 1994, पृ. 128
11. वर्मा, निर्मल : लाल टीन की छत, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 231
12. वर्मा, निर्मल एक चिथडा सुख, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2008, पृ. 82
13. वर्मा, निर्मल : लाल टीन की छत, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 106
14. सोबती, कृष्णा : सोबती एक सोहबत, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1989, पृ. 223
15. वर्मा, निर्मल : वे दिन, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 31
16. वर्मा, निर्मल : लाल टीन की छत, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 175
17. वर्मा, निर्मल : एक चिथडा सुख, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2008, पृ. 52
18. वर्मा, निर्मल र्‍ वे दिन, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 115
19. वर्मा, निर्मल : अन्तिम अरण्य, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2000, पृ.11
20. वर्मा, निर्मल : एक चिथडा सुख, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2008, पृ. 154
21. वर्मा, निर्मल : वे दिन, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 40
22. वर्मा, निर्मल : वे दिन, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 58
23. सिंह, (डॉ.) नामवर कहानीः नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1976, पृ. 65

सम्पर्क चिमनाराम माली का कुआं, कालूबास, वार्ड नं. 38, श्रीडूंगरगढ- 331803, बीकानेर (राजस्थान).
मो. नं.- 8559841982