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योगेन्द्र किसलय : साहित्य के अनथक पथिक

बुलाकी शर्मा
सूर्य रथ पर
तुम पहुँचो
मैं पैदल ही आ जाऊँगा
और यदि कहीं
टूट गया तुम्हारा पहिया
तो मैं तुम्हें
मारग में ही पा जाऊँगा।
मुझे लगता है, राजस्थान साहित्य अकादमी के विशिष्ट साहित्यकार सम्मान और रांगेय राघव पुरस्कार से समादृत कवि-कथाकार योगेन्द्र किसलय ने यह कविता अपने स्वाभिमानी व्यक्तित्व पर ही रची होगी। उन्होंने कभी किसी तरह का समझौता नहीं किया, किसी सूर्य रथ की प्रतीक्षा नहीं की और न ही कभी इसकी आकांक्षा की। विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन सन्देश एकला चलो रे को अंतिम साँस तक आत्मसात किए, आम जन के दर्द को अपनी रचनाओं में स्वर देते हुए, अकेले ही पैदल, बिना किसी अपेक्षा - उम्मीद के पूरे आत्मविश्वास से साहित्य के अनथक पथिक बने रहे।
जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में शारीरिक व्याधियों ने उन्हें बहुत परेशान किया, किन्तु पूरे साहस से वे उनका मुकाबला करते रहे। ऐसा शख्स जो हर समय लोगों से घिरा रहता हो, लेकिन दुर्योग से बीमारी की मार से घर में अकेले रहने को विवश होना पडे, तब शारीरिक से ज्यादा मानसिक यंत्रणा त्रस्त करने लगती है। योगेन्द्र किसलय जी को भी ऐसी त्रासद स्थितियों का सामना करना पडा। वे हरफनमौला थे। साहित्य के साथ शिक्षा, खेल आदि अनेकानेक क्षेत्रों में निरन्तर सक्रिय रहने वाले। हरेक क्षेत्र में मौलिक और विशिष्ट पहचान । वे जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष रहे। क्रिकेट प्रेमियों में वे वी.पी. सिंह साहब के रूप में प्रिय थे, तो कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच वी. पी. सिंह सर के रूप में आदरणीय, वहीं साहित्य जगत में योगेन्द्र किसलय के रूप में प्रतिष्ठित। व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक। खेल के मैदान में साहित्य चर्चा से परहेज और साहित्यिक दुनिया में बॉल-बल्ले से मुक्त। हरेक क्षेत्र में वे अपना सर्वस्व देने में लगे रहे। साहित्यिक मित्र कहते भी कि अपनी प्रतिभा को यूँ अलग-अलग क्षेत्रों में खर्च करना बन्द कर सिर्फ साहित्य में सक्रिय रहें । किन्तु वे बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न थे। एक जगह सिमट कर रहना उनके स्वभाव में नहीं था।
सबके बीच रहने, उठने - बैठने वाले किसलयजी को जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में परकिनसन (कम्पन) की बीमारी ने बेहाल रखा। इससे पहले फेंफडे की बीमारी के कारण दिल्ली में ऑपरेशन कराना पडा और अफसोस कि ऑपरेशन के बाद एक फेंफडा ही बच पाया। परकिनसन की लाइलाज बीमारी से पूरे शरीर में कम्पन होता रहता। लिखने में बहुत कष्ट होता, फिर भी वे कागज पर कलम से अपने भावों को उकेरने की कोशिश करते। लिखे बिना चैन भी तो नहीं मिलता सृजक को। वे कहते भी थे, कविताएँ तो जैसे-तैसे लिख लेता हूँ, किन्तु कहानियाँ नहीं लिख सकता। कई कहानियों के प्लाट दिमाग में चक्रवात मचा रहे हैं लेकिन इतना परिश्रम काँपते हाथों से कैसे हो सकता है। लेकिन बीमारी को उन्होंने अपने मन पर हावी नहीं होने दिया। एक बार मैंने उनकी बीमारी को लेकर चिन्ता की तो मुस्कराकर बोले, यह रईसी रोग है बुलाकी। महान मुक्केबाज मोहम्मद अली को भी यही रोग है। ऐसे रईसी रोग का वह भी इलाज नहीं करा पाया, तब मेरा क्या! उन्हें अपनी बीमारी से ज्यादा पीडा नगर के साहित्यकारों की उदासीनता पर होती। कहते, मैं साक्षात मृत्यु का स्पर्श करके आया हूँ। मिजाजपुर्सी के लिए पहले साहित्यकार बंधु आया करते थे, किन्तु अब किसी को अपने साथी के हाल जानने की फुर्सत नहीं है। यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, डॉ नंद किशोर आचार्य मेरी बीमारी को लेकर व्यथित रहे, बराबर मिलने आते हैं ... दिल्ली से सुधीर तैलंग कईं बार मिलने आए ...बहुत भरोसा था साहित्यकार मित्रों पर, लेकिन वे आये ही नहीं। उनकी इस आंतरिक पीडा को मैंने तब महसूस किया जब मैं दैनिक भास्कर में साप्ताहिक स्तम्भ शख्सियत लिखा करता था। उनसे मिलने गया, तब उन्होंने गुस्से में बहुत व्यथित स्वर में कहा था, नगर के साहित्यकारों ने मुझे मरा मान रखा है, फिर तुम क्यों आए? मैंने अपने स्तम्भ शख्सियत में 13 अक्टूबर, 1998 को उनकी सृजन यात्रा पर संस्मरात्मक आलेख लिखा- मृत्यु का स्पर्श कर लौटे हैं योगेन्द्र किसलय। इस आलेख से नगर के साहित्यिक माहौल में हचचल पैदा हो गई। आकाशवाणी केन्द्र को भी उनका स्मरण हो आया और उनकी रचनाओं की रिकार्डिंग करने उनके घर पहुँच गए। साहित्यकार उनसे मिलने, कुशलक्षेम पूछने पहुँचने लगे। साहित्यिक संस्थाओं ने आत्मीय आयोजन कर उन्हें अभिनंदित-सम्मानित किया। रचनाकार मूलतः संवेदनशील होता है। लेखकों के प्रति जो नाराजगी थी वह साथियों के पुनः मिलते आते रहने से दूर हो गई। उन्हें शारीरिक व्याधियों की पीडा कम महसूस होने लगी और साहित्यिक चर्चाओं से सुकून मिलने लगा।
उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद जिले के गाँव भींवरी में 10 जनवरी, 1939 को जन्मे योगेंद्र किसलय बीकानेर के कलमकारों की कलम के हमेशा प्रशंसक रहे। वे यहाँ के साहित्यिक वातावरण से प्रभावित रहे थे । वे मानते थे कि जैसा सौहार्दपूर्ण माहौल बीकानेर में है वैसा किसी अन्य नगर में नजर नहीं आएगा। यहाँ के साहित्यिक वातावरण से सम्मोहित होकर उन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से त्यागपत्र दे दिया और सन 1963 में राजकीय डूँगर महाविद्यालय बीकानेर आ गए। निश्चित ही उस समय यहाँ का साहित्य परिवेश उच्च कोटि का था। आपस में अपनत्व भाव था। लेखकों के बीच आत्मीय संवाद था। राष्ट्रीय स्तर के कवि- साहित्यकार यहाँ आते रहते थे। पण्डित विद्याधर शास्त्री के मार्गदर्शन में नागरी भण्डार में साहित्यिक गोष्ठियों होती रहती थी जहाँ छन्दबद्ध रचनाओं के साथ नई कविता को भी खुले मन से सुना और सराहा जाता था।
किसलय जी की बीकानेर आने से पहले ही राष्ट्रीय फलक पर कवि-कथाकार के रूप में पहचान बनने लगी थी। आगरा से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका युवक द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानी एक थरमस की मौत प्रथम स्थान प्राप्त कर चुकी थी जिसके निर्णायक मंडल में रावी जैसे ख्यात साहित्यकार भी थे। बाल्यकाल में ही उनमें साहित्य के प्रति लगाव पैदा हो गया था। उनके पितामह कवि कर्ण अपने समय के सुपरिचित कवि रहे थे। क्षेमचंद्र सुमन ने दिवंगत साहित्यकारों पर केंद्रित ग्रन्थ में कवि कर्ण की सृजन यात्रा का विशेष उल्लेख भी किया है। अपने पितामह की छन्दबद्ध रचनाएँ पढते हुए उनके बालमन में भी सृजन की हूक उठने लगती । तब उन्होंने लम्बी छन्दबद्ध कविता लिखी आँखें। उनके किशोर मन पर भारत विभाजन त्रासदी का गहरा असर पडा और उन्होंने किशोरावस्था में हिटलर नामक कहानी लिखकर अपनी व्यथा को अभिव्यक्ति दी। मुक्तक, गज़ल, गीत, कविता, कहानी, बाल कहानी आदि वे किशोर वय से ही लिखने लगे किन्तु इनके प्रकाशन के प्रति उदासीनता बनी रही। वे स्वयं मानते थे कि व्यवस्थित रूप से साहित्य सृजन वे बीकानेर आकर ही कर पाए। यहाँ की सृजनात्मक सक्रियता ने उन्हें भी सक्रिय बना दिया। प्रसिद्ध कवि- चिन्तक डॉ. नंदकिशोर आचार्य के माध्यम से हिन्दी के वरेण्य साहित्य मनीषी अज्ञेय से उनके आत्मीय सम्बन्ध बने और उन्होंने अपने सम्पादन में प्रकाशित पत्रिका नया प्रतीक में उनकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित कीं। उन्होंने बताया था कि एक बार वे अज्ञेयजी से मिलने गए तब उन्होंने ससंकोच अपनी एक एकांकी हमारे देखते देखते का पहला ड्राफ्ट उन्हें पढने के लिए दिया। अज्ञेयजी को वह इतनी पसन्द आई कि उन्होंने उसे उसी रूप में नया प्रतीक में प्रकाशित किया। इस एकांकी में उन्होंने चार पात्रों के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों का बारीकी से विश्लेषण किया था ।
किसलय जी ऐसे साहित्यकार थे जिन्हें प्रगतिशील भी अपना मानते थे और कलावादी भी, किन्तु वे स्वयं किसी वाद से बँधकर नहीं रहे। स्वयं को सिर्फ रचनाकार ही मानते थे। उनका कहना था, यह द्वन्द्व आलोचकों द्वारा बेवजह खडा किया गया है। ऐसे द्वन्द्व से साहित्य का हित नहीं, अहित ही हुआ है। आलोचकों ने एक कुर्सी पर मुक्तिबोध को बैठा दिया है और दूसरी पर अज्ञेय को। अज्ञेय ने धूमिल पर, रेणु पर नया प्रतीक के अंक निकाले, प्रगतिशील कवियों को हमेशा स्थान दिया, अन्दाजा लगाइए कि सही में प्रगतिशील कौन है। हरेक रचनाकार मूलतः प्रगतिशील होता है, वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की पैरवी करता है, समानता पर बल देता है, गरीबों की पीडा को वाणी देता है, इस रूप में मैं प्रगतिशील हूँ लेकिन प्रगतिशीलता का छाता लेकर नहीं घूमता। कवि को उसके कर्म से पहचानिए। परम्परावादी, कलावादी, प्रगतिशील, जनवादी आदि भेद बेकार हैं । समाज से जुडकर लिखिए। समाज से कटकर छद्म रूप से लेखन करने को मैं बेमानी समझता हूँ।
उन्होंने सन 1973 में प्रकाशित अपने पहले कविता संग्रह और हम की भूमिका में भी स्पष्ट लिखा कि वे किसी आन्दोलन, नारे या अखाडे से असम्बद्ध हैं और उन्होंने चिन्तन, यथार्थ और संवेदना के धरातल पर कविताएँ लिखी हैं । सन 1986 में प्रकाशित अपने कविता संग्रह फासले कायम है का आमुख एक हकीकत उन्होंने काव्यमय लिखा और बहुत तीखेपन से कवियों के छद्म को बेनकाब किया । वे लिखते हैं -
व्यर्थ है,
कोरी बकवास ।
ये और कुछ भी हो सकती हैं
मगर कविताएँ कदापि नहीं ।

मैं जानता हूँ

क्योंकि मैं भी तुम्हीं में से एक हूँ ।
सो मैं जानता हूँ
कि ये तुम्हारे सर पर चढकर नहीं बोलतीं
तुम उन पर सवार होते हो
घुडसवारी करते हो
जब कि जिंदगी में एक फर्लांग भी
तुम दौडकर नहीं गए।
कथित प्रयोगधर्मिता के नाम पर कविता को बेचने की शर्मनाक कोशिश करने वाले कवियों की हकीकत बयां करते हुए वे उन पर तीक्ष्ण प्रहार करते हुए कहते हैं-
मैंने प्रयोग किए -
कविता नहीं बिकी
मैंने उसे बौद्धिकता दी
कविता नहीं बिकी
मैंने उसे नंगा कर दिया
कविता नहीं बिकी ।
क्यों नहीं बिकी यह
जब मैं ऐसा चाहता था
जब मैं बहुत पहले बिक चुका था?

और जो कविताओं में क्रांति और विद्रोह की बातें करते हैं किन्तु स्वयं समझौतापरस्त और सुविधाभोगी हैं, ईमानदारी की बातें करते हुए शब्दों का कारोबार करते हैं, किसलयजी ने उन्हें भी नहीं बख्शा । उन पर कटाक्ष करते हुए हुए कहते हैं -
मैं कविता में विद्रोह भरता रहा
और खुद डरता रहा
लेखकीय ईमानदारी की पताका हाथ में लिए
शब्दों का रुजगार करता रहा । ...
मैं कायर था
मगर मेरी कविता में साहस था
मैं समझौतापरस्त था
मगर मेरी कविता सरकश थी ...
मेरी कितनी असंगतियों को ओढ -
ढो रही है कविता
यह कविता नहीं
मेरे पंगु विचारों की दम तोडती बैसाखी है
जिसे मैं अपनी काँख में दबाए घूम रहा हूँ ।
किसलयजी की अधिकांश कविताओं का स्वर व्यंग्यात्मक है । उन्होंने कविताओं में स्वयं को यानी मैं को कटघरे में खडा किया, जबकि मूलतः मैं के बहाने उन्होंने हमारे समय और समाज में दोहरा - तिहरा चरित्र ओढे लोगों को कटघरे में खडा कर उनसे सचेत और सावधान रहने के लिए चेताया। आजादी के बाद जिस तरह से जीवन मूल्यों का अवमूल्यन होने लगा, नैतिकता की बातें केवल किताबों की शोभा बनती गई, व्यावहारिक जीवन में हम पाप और पुण्य को अपने स्वार्थवश नए तरह से परिभाषित करने लगे और कवि किसलय को ये स्थितियां पीडादायक लगती रहीं। उन्होंने अनेक कविताओं में बहुत तीखेपन से इन पर व्यंग्य किया। उनकी कविता पाप का पक्षधर का यह अंश दृष्टव्य है -
हर पाप / मेरे लिए पुनीत है / क्योंकि पुण्य नहीं भरवा सकता मेरी गाडी में पेट्रोल / नहीं भेज सकता हर गर्मी में मुझे पहाडों पर / मेरी पत्नी सिने - तारिकाओंका ऐश्वर्य जीती है / मेरे बच्चे शुद्ध अंग्रेजी पाठशालाओं में पढते हैं / और इंद्रसभा को झुठलाती है मेरी रंगशाला / इन्हीं कारणों से मैं / पाप का पक्षधर हो गया हूँ / और सुखी हूँ।
भ्रष्टाचारी और बेईमान वे ही कहलाते हैं जो पकड में आते हैं । अधिकांश को तो अवसर मिल न पाने से विवशता से ईमानदार रहना पडता है - हम सभी ईमानदार हैं / और इसलिए सम्माननीय / क्योंकि हम कभी पकडे नहीं गए। (तुमने शायद यही चाहा था कविता से )। रहस्यमई महल के निर्माता कविता में भी उन्होंने नैतिक मूल्यों के ह्वास, बढती स्वार्थवृत्ति और समझौतावादी प्रवृत्ति पर गहरी चोट की है हम जो बिके/ बिकते ही चले गए। जब हमें बिकने के लिए बाजार में बैठने से लाज- शर्म नहीं, तब खरीदारों को दोष कैसे दे सकते हैं? इसीलिए वे आगे कहते हैं-कुछ लोग कभी गुलाम नहीं होते /और कुछ कभी आजाद नहीं होते। समाज की बेहतरी के लिए यदि हम टूटते हैं या बिखरते हैं तो उसका मानी है-मैं टूटता रहता हूँ / बेहतर गढाव के लिए / मैं बिखरता रहता हूँ / और भी जडाव के लिए। (मैं टूटता रहता हूँ कविता से)।
जनकवि हरीश भादानी के सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका वातायन में प्रकाशित उनकी लंबी कविता प्रलाप अपने समय में बहुचर्चित रही। आत्मकथात्मक शैली की इस कविता में कवि ने स्वयं को केंद्र में रखकर तत्कालीन समसामयिक मुद्दों को बेबाकी से रखा । इस कविता की जनपक्षधरता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि मध्यप्रदेश के एक साहित्यिक समारोह में डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय ने वातायन का वह अंक सबके सामने लहराते हुए चैलेंज किया था कि आज कौन है ऐसा कोई कवि, जो साहस के साथ प्रलाप जैसी असरदार कविता लिख सकता है? प्रलाप कविता की मारक क्षमता का अहसास कराने के लिए उसका एक छोटा-सा अंश-
बुद्धिजीवी !
तुम्हें पद्मश्री मिली या नहीं ?
मिलेगी ।
यश, धन, सम्मान...
मगर उन्हीं को जो खरीद लिए गए हैं
जो वफादार हैं
पालतू हैं
और जरूरत के वक्त
जो आग पर पानी छिडक जाते हैं ।
उनके कवि पर मणि मधुकर ने लिखा, योगेंद्र किसलय की कविताओं में एक आत्मीय उजास है । जैसे किसी लंबे रास्ते में चहेते से चेहरे, पेड और बेचैनियों के अस्त-व्यस्त रंग पीछे छूट कर भी हमेशा के लिए साथ हो जाते हैं । उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ है । मामूली लगने वाली स्थितियों को भी गैरमामूली ढँग से कहने की उनकी रचनात्मक क्षमता अद्भुत है।
मामूली लगने वाली स्थितियों को गैरमामूली तरीके से कहने का हुनर हम उनकी कहानियों में भी देख सकते हैं। उनकी कहानियों के पात्र, परिवेश और परिस्थितियाँ सभी आसपास के हैं और यथार्थपरक हैं। उनके कहानी संग्रह अपनी अपनी जगह तथा औरत क्या होती है की कहानियों में निम्न और मध्यम वर्ग की व्यथा का संवेदनात्मक चित्रण हुआ है । इतनी बडी, आफत, औरत क्या होती है, पतन, मंगली, बेवकूफ, माँ-बेटी जैसी कई कहानियों में औरत के अंतर्मन को टटोलते हुए उसके दर्द को उजागर किया गया है, वहीं अपनी अपनी जगह कहानी में कुत्तों को प्रतीक बनाकर वर्ग वैषम्य पर करारा कटाक्ष है। हैमर, परतें, वसूली, दो पतली टांगों का भय, सफलता आदि उनकी अन्य उल्लेखनीय कहानियाँ हैं। उनकी कहानियों पर सन 1963 में बिसन सिन्हा ने टिप्पणी की थी, जो कोई भी इस उम्र में हैमर और आफत लिख सकता है वह निश्चय ही ए श्रेणी का साहित्यकार बनेगा। सोचिए कि प्रख्यात कहानी लेखक सामरसेट मॉम यदि इसी विषय पर लिखता तो कैसे लिखता।
योगेंद्र किसलय ने साहित्य की विविध विधाओं में लिखा। बालकों के स्वस्थ मनोरंजन और ज्ञान वर्धन के लिए उन्होंने बच्चों के लिए कहानियाँ लिखीं जो काला गुलाब, राजपूत की पगडी, अपना अपना जीवन आदि उनके बाल कथा सग्रहों में शामिल हैं। आलोचना के क्षेत्र में भी उनका उल्लेखनीय अवदान रहा। प्रेमचंद की चर्चित कहानी पूस की रात की पुनर्विवेचना करते हुए उसे उनके मोहभंग की कहानी सिद्ध किया, वहीं एमिली डिकिन्स के साहित्य की आलोचनात्मक दृष्टि से मीमांसा की। राजस्थान साहित्य अकादमी से उनके सम्पादन में राजस्थान के कवि भाग-2 का प्रकाशन हुआ वहीं शिक्षा विभाग, राजस्थान से उनके सम्पादन में शिक्षकों की चुनिन्दा रचनाओं का संग्रह चेहरों के बीच आया। बीकानेर नरेश महाराजा गंगासिंह के जन्म शताब्दी वर्ष पर सन ऑफ दि सॉयल नामक वृहद ग्रँथ का भी उन्होंने सम्पादन किया। उन्होंने कई अंग्रेजी कविताओं का हिन्दी में रूपांतरण किया वहीं उनकी कुछ कविताओं के गुजराती सहित अन्य प्रांतीय भाषाओं में अनुवाद हुए हैं ।
प्रायः अधिकांश साहित्यकारों के मन की यह पीडा है कि आलोचकों द्वारा उनके सृजन पर यथोचित ध्यान नहीं दिया गया, उनके सृजन का वांछित मूल्यांकन नहीं किया गया। किसलयजी को भी यह दर्द सालता रहा। वे स्वयं आलोचक थे, कॉलेज शिक्षा से सम्बद्ध थे, अंग्रेजी के प्राध्यापक थे फिर भी प्राध्यापकीय आलोचना के वे स्वयं बहुत तीखे आलोचक थे। उनका मानना था कि हिन्दी प्राध्यापक गम्भीरता से अध्ययन-मनन नहीं करते किन्तु स्वयं को स्वयम्भू आलोचक मानते हुए साहित्य में फतवे जारी करते रहते हैं। ऐसे ही एक महान आलोचक का उन्होंने एक रोचक वाकया बताया कि उनके एक हिन्दी प्राध्यापक साथी ने उनका मात्र एक मुक्तक पढ रहा था और उन्होंने उसी के आधार पर उनके समग्र साहित्य का मूल्यांकन करते हुए उन्हें रूमानी कवि सिद्ध कर दिया। वह मुक्तक था -
हर फूल सूल से तकरार नहीं करता
हर माली उपवन से प्यार नहीं करता
खुद ही गिर पडती है कलियों पर शबनम
हर तन सजने को श्रृंगार नहीं करता।
यह वाकया बताकर उन्होंने पीडा से कहा था,अफसोस है कि ऐसे प्राध्यापक खुद को गर्व से आलोचक मानते हैं और कॉलेज में छात्रों को हिन्दी साहित्य पढा रहे हैं। ऐसे आलोचक हिंदी साहित्य का नुकसान कर रहे हैं।
आलोचना के क्षेत्र में ठोस और गम्भीर काम कर के वे ऐसे कथित आलोचकों को बताना चाहते थे कि आलोचना क्या होती है किंतु परकिनसन जैसी घातक व्याधि ने उनके मन में उमड-घुमड रहे विचारों को कलमबद्ध नहीं करने दिया । पूरे शरीर में कम्पन होता रहता। काँपते हाथ में लिखने के लिए कलम थामते कैसे। इस बीमारी से पहले उन्होंने एक उपन्यास लिखना शुरू कर रखा था। उसके चालीस- पचास पृष्ठ लिखे जा चुके थे किंतु बाद में उसे पूरा नहीं कर पाए। अपने पितामह कवि कर्ण के समग्र सृजन को सुव्यवस्थित- सम्पादित करने का उनका सपना भी अधूरा रह गया। कबीर की प्रासंगिकता और उनके सामाजिक सरोकारों पर एक पुस्तक लिखने की योजना थी, विस्तृत नोट्स तैयार थे किंतु यह काम भी नहीं हो सका। किशोरवय में रचित मुक्तकों को पुस्तकाकार लाने की ललक पर भी इस पाजी बीमारी ने ग्रहण लगा दिया। पूरी जीवटता से वे परकिनसन व्याधि से मुकाबला करते रहे किन्तु अंततः 65 वर्ष की उम्र में इस व्याधि ने 19 अप्रेल, 2004 को उन्हें हमेशा के लिए हमसे छीन लिया। उन्होंने अपने बहाने हम सबके सामने जो प्रश्नवाचक रखे, वे आज भी वैसे ही प्रश्नवाचक बने हुए उत्तर की प्रतीक्षा में हैं -
मैं प्रश्नवाचक पैदा हुआ
प्रश्नवाचक ही जिया
और प्रश्नवाचक ही मरूँगा

क्या यही पर्याप्त नहीं है ?
मुझे कोई हक नहीं है
उत्तर माँगने का ?

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सम्पर्क - सीताराम द्वार के सामने,
जस्सूसर गेट के बाहर,
बीकानेर - 334004 मो. 9413939900
मेल : bulakisharma@gmail.com