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साँसों के ग्रामोफोन पर जीवन का रितुरैण

जगदीश गिरी
कवि
जो दर्द से भरे दिल नहीं जानता
और नागरिक
जो गर्व से भरी सत्ताएँ नहीं जानते
जीवन के जरूरी रितुरैणों से बाहर
सिवानों पर
एकाकी सियारों की तरह जीते हैं
मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसे पडाव आते रहे हैं जो सभ्य-समाज के लिए बदनुमा दाग की तरह देखे जाते हैं। इतिहास के ये कालखण्ड मनुष्यता के लिए गहरे सबक हैं कि दुनिया के किसी भी इलाके में जब भी तानाशाही और आततायी सत्ता का वर्चस्व कायम हुआ है, तो इसने मनुष्यता के लिए गहन संकट पैदा किया है। यद्यपि इतिहास के इन थपेडों से जूझते-टकराते हुए मनुष्यता का जहाज अपने गंतव्य की ओर बढता रहा है। तूफानों और बवण्डरों का दौर लम्बा नहीं चलता। यह क्षणिक होता है, लेकिन जब भी ऐसे क्षण आते हैं वे मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को बहुत गहरा घाव दे जाते हैं। यह कठिन समय सभ्यता का परीक्षण काल भी होता है। संकट के दौर में ही उन कमजोरियों पर दृष्टि जाती है जो सामान्यतः दिखाई नहीं देती। सभ्य दिखने वाले चेहरों का नकाब भी ऐसे ही समय में उतरता है। यह दौर समाज-वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, कवियों,कलाकारों को अपने सिद्धांतों का पुनः विश्लेषण करते हुए मानव- मनोविज्ञान को फिर से देखने-समझने के लिए प्रेरित करता है। इससे यह भी पता चलता है कि किन-किन रूपों और परिस्थितियों में मनुष्य के भीतर का पशु जाग्रत होकर उसकी समूची चेतना को ग्रस लेता है और उसे एक हिंसक प्राणी में तब्दील कर देता है। अपने भीतर के पशुत्व पर विजय पाने की मानवीय लालसा में रचे गए तमाम शास्त्र और ग्रन्थ सहसा झूठे पड जाते हैं तथा वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का दुरुपयोग मनुष्यता के विनाश के लिए होने लगता है। कुतर्कों का जाल रचकर घृणा फैलाई जाती है और हिंसा को समाधान की तरह प्रस्तुत किया जाने लगता है। इसका सबसे भयावह और पीडादायक परिणाम यह होता है कि जिन लोगों से मनुष्यता के पक्ष में खडे होने और आततायी शक्तियों से लडने की सर्वाधिक अपेक्षा होती है वही लोग या तो आततायी के पक्ष में खडे दिखाई देते हैं अथवा मौन धारण कर लेते हैं। इस चुप्पी को वर्चस्वशाली शक्तियाँ अपने हक में इस्तेमाल करती हैं और वे खुलेआम मानवीय मूल्यों को नष्ट-भ्रष्ट करते हुए असहमतियों की आवाज को दबा देती हैं। दया, करूणा, सत्य, अहिंसा, प्रेम और बंधुता जैसे शाश्वत मूल्यों को आउटडेटेड घोषित करने का विमर्श रचा जाता है।
दुर्भाग्य से हम ऐसे ही कालखण्ड में जीने के लिए विवश हैं। इस वक्त दुनिया भर में फासीवादी-पूँजीवादी शक्तियाँ सिस्टम का दुरुपयोग करते हुए सत्ता के शिखर पर काबिज हो चुकी हैं। पिछले दो-तीन दशकों में फासीवाद बडी तेजी से दुनिया भर में प्रसारित हुआ है। उसके हथियार नए नहीं हैं, लेकिन रणनीति नई है। साम्प्रदायिकता, राष्ट्रवाद, नस्लवाद के पुराने फार्मूले में इस बार बाजारवाद का तडका है। भूमण्डलीकरण के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने तीसरी दुनिया के देशों को अपना चारागाह बना लिया है और उनके लिए मुनाफे से बडा कोई मूल्य नहीं है।
सूचना एवं संचार माध्यमों पर भी इनका कब्जा हो गया है इससे झूठ को विभिन्न कोणों से सत्यापित कर सत्याभास रचना आसान हो गया है। दर्द से कराहते मनुष्य के लिए झूठ के कोलाज से गौरवबोध का सृजन किया जा रहा है।
सत्ता के केन्द्र में इन वर्चस्ववादी ताकतों के होने का गहरा असर समाज में दिखाई दे रहा है। एशिया से अमेरिका तक सर्वत्र सामाजिक विद्रूपताओं को पुनः स्थापित किया जा रहा है। वंचित वर्गों विशेषकर दलितों, स्त्रियों,नीग्रों और अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलने की गति बढ गई है। हाशिए के लोगों पर अत्याचार बढे हैं और उनकी आवाज दबाई जा रही है।
गाँव उजड रहे हैं। शहरों में कच्ची बस्तियों में रहने वाले लोगों पर विकास और सौन्दर्यीकरण के नाम पर जुल्म ढाए जा रहे हैं। लोगों के पारम्परिक काम- धंधे बर्बाद कर दिए गए हैं और उन्हें कार्पोरेट ताकतों के रहम-ओ- करम पर ही जीवित रहने की इजाजत है। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। जल, जंगल और जमीन को बचा लेने की जद्दोजहद में आदिवासी समुदाय लड रहे हैं, लेकिन सत्ता के दमन-चऋ का वे शिकार हो रहे हैं। लोगों के संवैधानिक अधिकारों और प्राकृतिक अधिकारों में लगातार कटौती की जा रही है।
ऐसे भयानक समय में प्रतिरोध का मार्ग क्या हो? मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं की रक्षा का भार कौन ले? हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि शिरीष कुमार मौर्य की कविताएं इन्हीं सवालों से मुठभेड करती हैं और एक बेहतर समाज की रचना के लिए कवियों (कलाकारों) और नागरिकों की सामूहिक चेतना को झकझोरती हैं।
उनके अब तक प्रकाशित काव्य- संग्रहों पहला कदम, शब्दों के झुरमुट में, पृथ्वी पर एक जगह, जैसे कोई सुनता हो मुझे, दन्त कथा और अन्य कविताएँ सांसों के प्राचीन ग्रामोफोन सरीखे इस बाजे पर और हाल ही में प्रकाशित रितुरैण से गुजरते हुए बराबर यह महसूस होता है कि लुप्त होती मनुष्यता और करूणा की खोज में उनका कवि पृथ्वी के हरेक हिस्से में भटकता फिरता है और लगातार विरल होते जा रहे कोमलतम भावों की तलाश में असफल होने पर प्रलाप करता है। क्रूर होती दुनिया में एक संवेदनशील कवि की यही नियति है। ऐसे ही किसी क्षण में उसे लगता है-
क्रूर और गलत रूपकों में रहते हुए
अब हमें बिम्बों की नहीं
अपने पिछवाडे एक जबरदस्त
लात की जरूरत है।
क्रूरता का प्रतिकार हिंसा से नहीं बल्कि लुप्त होती संवेदनाओं को जुटाकर ही किया जा सकता है। यह काम कवि और कलाकार कर सकते हैं और सजग नागरिक इसमें सहयोगी हो सकते हैं। कवियों को पीडितों की आवाज बनना होगा और नागरिकों को तानाशाही सत्ता के खतरे के प्रति सचेत रहना होगा। तानाशाह और क्रूर सत्ताएँ नागरिकों को जाति, धर्म, नस्ल, रंग, लिंग, भाषा, क्षेत्र आदि अनेक छद्म विमर्शों के जरिए विभाजित करती हैं और उनके जरूरी मसलों को नजरअंदाज करने की कोशिश करती हैं। वे नागरिकों को उनके निहित स्वार्थों में धकेल कर सामूहिक चेतना को प्रतिस्थापित कर देती हैं। पीडित को उसके दर्द के अहसास से भी वंचित कर देती हैं। अतिशय झूठ और कोलाहल के कोलाज में दर्द की रेखाएँ स्पष्ट होते हुए भी किसी को दिखाई नहीं देती। बकौल कवि-
जनता को मनुष्य से घोडे में बदल देना सत्ताओं की पुरानी ख्वाहिश रही है।
और इन दिनों सत्ता की यह ख्वाहिश लगभग पूरी हो गई है। पीडित को ही सरेआम अपराधी ठहराया जा रहा है और नागरिकों का बहुत बडा वर्ग इससे सहमति जताता है। भूखे- नंगे लोगों को योगासन द्वारा स्वस्थ रहने की कला सिखाई जा रही है और घंटा-ध्वनियों से महामारी का मुकाबला करने का आह्वान किया जा रहा है।
सूर्य नहीं,
सत्ता भुजंग के समक्ष
प्रणामासन करते खडे हैं मेरे जन
मरदूदों
उन्हें नमस्कार नहीं,
थोडे प्रकाश की जरूरत है।
कवि देखता है कि पूरी दुनिया में मूर्खताएँ सत्तासीन हैं और मानवीय करुणा को तिलांजलि दे दी गई है। मूल्यों और संवेदनाओं से रहित दुनिया मृतकों की दुनिया में बदल चुकी है-
मृतकों का संसार बढता जा रहा है
उसे और बढाने कुछ लोग आ रहे हैं तेजकदम
शिरीष की खासियत है कि वे विचार के महीन तन्तु के सहारे अपनी कविताओं का वितान बुनते हैं। मनुष्य के कोमल भावों के रंगों से उन्हें सजाते हैं। गहन उदासी और अवसाद को भाषा में रूपान्तरित करते हुए यथावसर आक्रोश और व्यंग्य के जरिए पाठक की चेतना को झनझना देते हैं। वे लोक के अंतर्मन में पैठकर अपनी कविता में नए मुहावरे गढते हैं और स्त्री-मन की गहरी समझ को अपनी रचनाओं में बरतते हुए उन्हें तरल बनाते हैं। रितुरैण तो चैत में मायके की याद में गाए जाने वाले स्त्री गीत ही हैं लेकिन इन गीतों और ऋतुओं के बदलने पर गाए जाने वाले गीतों के बहाने लुप्त हो रहे मानवीय मूल्यों को सहेजने की पुरजोर कोशिश है।
कवि की दृढ मान्यता है कि इस हिंसक- सभ्यता के निर्माण में पुरुषों के दम्भ और घृणा की बडी भूमिका है। हत्या, बलात्कार, दंगा और युद्ध पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अहंकार की ही परिणति है। जो कुछ बेहतर बचा हुआ है वह स्त्रियों की बदौलत ही है तथा यदि अच्छी चीजों को बचाना चाहते हैं, तो वह भी स्त्री की तरह संवेदनशील होकर ही बचाया जा सकता है । स्त्री ही है जो -
इबादत कर रही है वर्षों
से लगभग बिलखती हुई- सी
वह कहीं नहीं दिख रहे
चंद रिश्तों की खैर माँग रही है
आशा की धुँआती पीली-सी लौ जलाए
यकीनन वह एक स्त्री ही है
जिसे हम जैसे कमजर्फ कवि
अपने बिम्बों में मन की फफून्द समझ बैठते हैं
इससे जाहिर है कि कवि एक सुकुमार-सी दुनिया रचना चाहता है जहाँ सब सुकून से रह सकें। जहाँ किसी रोहित वेमूला को आत्महत्या करने के लिए विवश न किया जाए, जहाँ किसी पेशावर कोकरीझार में फूल -से बच्चों की हत्याओं पर अट्टहास न हो, जहाँ तोगडियों और इमामों के फतवे न हों, जहाँ लोगों को जाडे की रातों में ठण्ड से ठिठुरना न पडे, जहाँ रोज- रोज गाँधी की हत्या न हो, जहाँ स्त्रियों और कमजोरों पर अत्याचार न हो, जहाँ केवल 62 लोगों के कब्जे में दुनिया की अधिकतम पूँजी न हो (हरकू का प्रलाप), जहाँ हत्या को कला में बदलने का षड्यंत्र न हो, जहाँ किसी कलावादी कवि की कलम न हो बल्कि इस दुनिया में चैत में गाए जाने वाले रितुरैण हों, जहाँ मनुष्यता की इबादत करती स्त्रियाँ हों, प्रेम में गहरे तक धँसे दुर्धर्ष हृदय कौने हों, मेहनतकश अपने जनों के लिए सृजन हो, कविता में वीरेन डंगवाल की चारखानेदार पुरानी कमीज हो, लोगों का रक्त नीला नहीं बल्कि लाल हो, जहाँ जूठा-मीठा स्वाद हो, और हो ऐसी दुनिया जहाँ लोगों को अपना जीवन सिर्फ खुजाने नहीं, मानवीय गरिमा के साथ जीने का अवसर हो।
यद्यपि शिरीष जानते हैं कि ऐसी आदर्श जगह गढना सहज कार्य नहीं है इसीलिए वे संघर्ष का मार्ग चुनते हैं अपने लिए। वे आह्वान करते हैं कि कवि को सदैव बसन्त की ही इच्छा नहीं रखनी चाहिए जहाँ सब कुछ हरा-भरा हो बल्कि उसे शिशिर का शीत और ग्रीष्म का घाम सहते हुए जेठ में गुलमोहर खिलाने का प्रयत्न करते रहना चाहिए।
उनका कवि जो बदलाव समाज में देखना चाहता है उसे अपनी कविता में भी सिद्ध करने का प्रयत्न करता है। उनकी कविता का मुहावरा बिलकुल नया है और स्थापित काव्य-रुढियों के बरक्स नवीन बिम्ब और प्रतीक गढने की कोशिश है जो कविता को कलावाद और स्थापित सौन्दर्यशास्रीय प्रतिमानों से दूर अपने जनों के करीब ले आती है।
वे जानते हैं कि अपने जनों के प्रति प्रतिबद्धता के बगैर सिर्फ कविता करने से राजनीति और समाज में कोई बदलाव मुश्किल है। इसलिए प्रतिबद्ध कवि को राजनेता की तरह बात करने से बचना होगा।
राजनेता
इस समय की बात करते हैं
किसी और समय की बात करता है
कवि
राजनीति और कविता दोनों ही समाज का नेतृत्व करती है, लेकिन राजनीति और कविता में बुनियादी अंतर होता है। राजनीति तात्कालिक लाभ और स्वार्थपरता पर केन्द्रित होती जा रही है जबकि कविता समाज में मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को बचाए रखने के लिए बहुत ही महीन ढंग से काम करती है जो कि स्थायी महत्त्व का काम है। इसलिए शिरीष अपने समानधर्मा कवियों से आग्रह करते हैं कि -
जबकि
कविता बमुश्किल ही कुछ बदलाव लाती है
राजनीति और समाज में
कवियों को चाहिए कि अपने जनों से बात करते
किसी और समय में वे मर जाएँ
वे कविता में विचार के पैरोकार हैं। विचार के बगैर कविता का कोई मूल्य नहीं। जिस प्रकार पुराने सडे-गले पत्ते नवीन कोंपलों के निमित्त गलकर जैविक खाद में तब्दील होते रहते हैं, ठीक वैसे ही जड संस्कारों और रुढियों की जैविक खाद में नए विचारों की नई कौंपलें फूटती रहनी चाहिए अन्यथा क्रूर और हत्यारे समय में कविता का वृक्ष ठूंठ हो जाएगा। यदि दुनिया में कहीं भी मनुष्यता पर संकट आए, तो उसे कविता में ध्वनित होना ही चाहिए। उनका कवियों से सीधा सवाल है कि
हत्याएँ होती रहीं तुम कितना मरे?
ऐसे तो पेड भी नहीं कटते
जैसे काटे गए मनुष्य
तुम कितना कटे?
उनका यह सवाल मर गया देश और जीवित रह गए तुम? की ही तरह तीखा और स्पष्ट है। मुक्तिबोध को बार-बार याद करते हुए शिरीष उसी दुर्निवार अभिव्यक्ति की तलाश करते हैं जो अपने समय को अभिव्यक्त कर सके। पूर्व-परम्परा में वे मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह, वीरेन डंगवाल, दूधनाथ सिंह, शैलेश मटियानी, राजेंद्र यादव को याद करते हैं, तो मानवाधिकार कार्यकर्ता बलराज पुरी, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार और इतिहासकार प्रो. बिपिन चन्द्रा का भी स्मरण करते हैं। इससे कवि की प्रतिबद्धता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। बिपिन चन्द्रा की स्मृति में लिखी गई गजल का यह शेर मुल्क के हालात को बयां करने के लिए काफी है -

बुझते ही जा रहे हैं सारे चिराग घर के
इतिहास लिखने वाला इतिहास हो गया है।
नामवरजी का चले जाना साहित्य और समाज के लिए कितनी बडी क्षति है, इसे व्यक्त करते हुए कविता की यह पंक्ति बेहद मार्मिक और अर्थगर्भित है कि हिन्दी में कोई बडा न रहा। बडा शब्द की व्यंजकता हिन्दी जगत् में नामवर जी के होने का महत्त्व स्पष्ट कर देती है।
अपने पुरखों को याद करते हुए वे परम्परा के महत्व को तो स्वीकार करते ही हैं, साथ ही नए मार्ग का संधान करने का साहस भी जुटाते हैं। इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वे वसन्त के नहीं, शिशिर और ग्रीष्म के कवि हैं। निराला के गुलाब की तरह शिरीष भी वसंत को एक रूपक में बरतते हैं। निराला के यहाँ गुलाब पूँजीवादी सभ्यता का रूपक बनकर आता है तो शिरीष के यहाँ वसन्त। आधुनिक पूँजीवादी सभ्यता और इसके तथाकथित विकास के मानकों ने पूरी पृथ्वी को ही तबाह कर दिया है। भौतिक-समृद्धि की अन्धी दौड ने धरती पर जीवधारियों का साँस लेना ही दूभर कर दिया है। ऐसे वसन्त को कैसे सराहें? यह जानते हुए कि-
समृद्धि के ढेर पर बैठी सभ्यता
सुकून नहीं
कचरा ज्यादा पैदा करती है
इस कचरे को जलाने के लिए कवि को ग्रीष्म का इंतजार है। यह वसन्त लहू से नहाया हुआ है। कभी धर्म के नाम पर तो कभी नस्ल के नाम पर बह रहा लहू इस वसंत की रक्ताभ देह के लिए जरूरी बना दिया गया है। हैरानी की बात है कि इसकी चपेट में साधारण जन भी आ गए हैं। सृष्टि का सबसे मूल्यवान तत्त्व प्रेम कहीं खो गया है। कवि की इच्छा इसी प्रेम और मनुष्यता को बचा लेने की है, जबकि वह जानता है कि -
धर्म हर बार प्रेम के विरुद्ध खडा होता है
धर्म को बचाने जितना आसान नहीं है
प्रेम को बचा पाना
तमाम विद्रूपताओं और विडम्बनाओं के बावजूद इतनी भर जिद मेरी कि न्यूनतम मनुष्यता तो होनी ही चाहिए का संकल्प लेकर निकले शिरीष अपनी कविता के जरिए अपने जनों के पक्ष में डटे रहना चाहते हैं। उनकी कविताएँ क्रूरता के विरुद्ध मनुष्यता की आस में/ चहुंओर से घेरते असाधारण के विरुद्ध/ साधारण की याद में/अन्याय के बीच रहते अपने जनों के लिए/न्याय की प्रतीक्षा में लिखी गई एक वसीयत की मानिंद है जो मानवीय करूणा और न्याय के पक्ष में अमिट दस्तावेज है।
***
संदर्भ -
इस आलेख में उदधृत कविताएँ शिरीष कुमार मौर्य के निम्नांकित काव्य संकलनों से ली गई हैं -
1. रितुरैण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2020
2. साँसों के प्राचीन ग्रामोफोन सरीखे इस बाजे
पर, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2017

सम्पर्क - एल- 09 बी, राजस्थान विश्वविद्यालय परिसर, जयपुर
मो. 9468669808