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भोजपुरी के यूरोपीय विद्वान

शुभनीत कौशिक
अठारहवीं सदी के आखरिी वर्षों में प्राच्यवादियों ने भारतीय इतिहास, भाषा व साहित्य, कला और संस्कृति में गहरी रुचि लेना आरम्भ किया। वर्ष 1784 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना और विलियम जोंस सरीखे विद्वानों की उपस्थिति ने इस प्रक्रिया को और गति दी। एशियाटिक सोसाइटी की बैठकों में उस दौरान यूरोपीय विद्वानों द्वारा दिए गए व्याख्यानों, सोसाइटी की पत्रिका में छपे लेखों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अध्ययन हेतु प्राच्यवादियों द्वारा किए गए आरम्भिक प्रयासों की झलक मिलती है। उन्नीसवीं सदी में जेम्स प्रिंसेप सरीखे विद्वानों ने इसे और आगे बढाया। जहाँ प्राच्यवादियों की रुचि संस्कृत भाषा व साहित्य और प्राचीन भारत से जुडी ऐतिहासिक सामग्री के अध्ययन, संकलन और अनुवाद में रही। वहीं उन्नीसवीं सदी में धीरे-धीरे अंग्रेजों ने आधुनिक भारतीय भाषाओं के गहन अध्ययन में रुचि दिखाना आरम्भ किया। इसी ऋम में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जॉन बीम्स, जॉर्ज ग्रियर्सन, ह्यू-फ्रेजर सरीखे विद्वानों ने भोजपुरी भाषा और सहित्य का अध्ययन किया और इससे जुडे लेख एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल और लंदन स्थित रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिकाओं में प्रकाशित किए। इन विद्वानों के भोजपुरी सम्बन्धी अध्ययन का विवरण आगे प्रस्तुत है।
जॉन बीम्स (1837-1902)
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जिन यूरोपीय विद्वानों ने भोजपुरी भाषा और साहित्य पर उल्लेखनीय काम किया, उनमें जॉन बीम्स का नाम अग्रणी है। फरवरी 1867 में जॉन बीम्स ने रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में पश्चिमी बिहार में बोली जाने वाली भोजपुरी पर एक व्याख्यान दिया था। उस वक्त बीम्स चम्पारन के जिला मजिस्ट्रेट थे। अगले ही वर्ष जॉन बीम्स का यह महत्त्वपूर्ण लेख जर्नल ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में छपा।
उपर्युक्त लेख में बीम्स ने भोजपुरी भाषा के क्षेत्र-विस्तार और उसकी ध्वनियों की विस्तृत चर्चा करने के साथ ही भोजपुरी-अंग्रेजी की एक संक्षिप्त शब्दावली भी तैयार की। साथ ही, उन्होंने भोजपुरी क्षेत्र के, विशेषकर चंपारन के पुरातात्विक स्थलों के महत्त्व की भी चर्चा की थी। अपने इस लेख की शुरुआत ही बीम्स इन शब्दों से करते हैं- भोजपुरी बोली चम्पारन, सारण, शाहाबाद, गाजीपुर, आजमगढ और गोरखपुर के ब्रिटिश जिलों में बोली जाती है और इसे बोलने वालों की संख्या 50 लाख है।
भाषाविज्ञान के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान देने वाले जॉन बीम्स को प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी सुनीति कुमार चटर्जी ने आर्य भाषा परिवार के तुलनात्मक अध्ययन का पुरोधा कहा है। भाषाओं के प्रति बीम्स का गहरा अनुराग इंग्लैण्ड में ही प्रकट हो चला था, जहाँ उन्हें हैलेबरी कॉलेज में संस्कृत और फारसी की परीक्षा में सर्वाधिक अंक मिले थे। अंग्रेजी, जर्मन, इतालवी, लैटिन और ग्रीक आदि भाषाओं के जानकार बीम्स ने हिंदुस्तान आकर बांग्ला, पंजाबी, उर्दू और हिन्दी पर अपनी पकड बनाई।
बीम्स की इन भाषाओं में पारंगतता उन्हें तुलनात्मक भाषाविज्ञान की ओर ले गई और 1867 में उन्होंने भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का निरूपण करते हुए अपनी किताब आउटलाइंस ऑफ इंडियन फिलोलॉजी लिखी। उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में भारत के आर्य भाषा परिवार पर उनका ग्रन्थ कंपेरेटिव ग्रामर ऑफ द मॉडर्न आर्यन लैंग्वेजेज ऑफ इण्डिया तीन जिल्दों में छपा।
उल्लेखनीय है कि जॉन बीम्स हैलेबरी कॉलेज से आने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आखिरी बैच के अधिकारी थे। जनवरी 1856 में प्रशिक्षण के लिए बीम्स हैलेबरी कॉलेज में चुने गए। बंगाल सिविल सेवा का सदस्य बनने से पूर्व उन्होंने पंजाब और गुजरात में भी अपनी सेवाएँ दीं। चम्पारन का मजिस्ट्रेट बनने से पहले बीम्स अम्बाला, लुधियाना, शाहाबाद और पूर्णिया में तैनात रहे। चम्पारन में अंग्रेज निलहों के विरुद्ध हिंदुस्तानी रैयत का साथ देने के कारण बीम्स को कुछ समय के लिए निलम्बित कर दिया गया था। जिसकी वजह से वे इंग्लैंड लौट गए। किन्तु साल भर बाद ही बीम्स की सेवा बहाल करते हुए उन्हें उडीसा के बालासोर का कमिश्नर बनाया गया। बाद में, वे कटक और चटगाँव में भी कमिश्नर रहे।
भाषाविज्ञान के साथ-साथ इतिहास में भी जॉन बीम्स की गहरी रुचि रही। बीम्स के इतिहास विषयक लेख जर्नल ऑफ द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल, इंडियन एंटिकक्वेरी, इंडियन ऑब्जर्वर जैसी पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित हुए। बीम्स ने हिंदुस्तान में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपने अनुभवों को अपने संस्मरण में दर्ज किया है, जो मेमायर्स ऑफ ए बंगाल सिविलियन शीर्षक से प्रकाशित है।
विलियम क्रुक (1848-1923)
औपनिवेशिक भारत में धार्मिक और लोक जीवन को समझना हो, उत्तर भारत की विभिन्न जातियों के बारे में जानना हो या फिर देहात और खेती के बारे में जानना हो, विलियम क्रुक की किताबें इन सभी के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं। लोकगीतों में गहरी रुचि रखने वाले विलियम क्रुक ने जॉन बीम्स जैसे उन अध्येताओं की परम्परा को भी आगे बढाया, जिन्होंने भोजपुरी के लोकगीतों का अध्ययन किया था। कैम्ब्रिज से पढाई करने के बाद विलियम क्रुक वर्ष 1871 में सिविल सेवा के अधिकारी के रूप में भारत आए। यहाँ उन्होंने अपना लगभग पूरा सेवाकाल पश्चिमोत्तर प्रान्त (आगरा व अवध) के एटा, सहारनपुर, गोरखपुर और मिर्जापुर जैसे जिलों में बिताया।
क्रुक की चर्चित पुस्तक द पॉप्युलर रिलीजन एंड फोक-लोर ऑफ नॉदर्न इण्डिया 1894 में जब प्रकाशित हुई, तब वे मिर्जापुर के जिलाधिकारी थे। दो साल बाद ही इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। क्रुक का कहना था कि हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रूप पर तो ढेरों किताबें लिखी गई हैं, लेकिन आमजन के लोक विश्वास, रीति-रिवाज, मान्यताओं पर विद्वानों ने अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। क्रुक की यह किताब उसी कमी को पूरा करने का एक प्रयास थी। क्रुक की मंशा थी कि उनकी यह किताब लोक विश्वास और लोकगीतों के प्रति अधिकारी वर्ग, शिक्षित भारतीयों और यूरोपीय विद्वानों की रुचि जगाए।
क्रुक ने नॉर्थ इंडियन नोट्स एंड क्वेरीज का सम्पादन भी किया, जो आज भी उत्तर भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास को जानने-समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत है। गौरतलब है कि नोट्स एंड क्वेरीज पत्रिका के प्रकाशन की शुरुआत कैप्टन आर.सी. टेम्पल ने की थी। आरम्भ में यह पत्रिका पंजाब नोट्स एंड क्वेरीज शीर्षक से प्रकाशित हुई। किन्तु जब 1885 में टेम्पल को बर्मा में सैन्य अभियान में शामिल होने के लिए जाना पडा, तो टेम्पल ने इस पत्रिका के सम्पादन का दायित्व विलियम क्रुक को दिया। क्रुक ने ही इस पत्रिका का नाम बदलकर नॉर्थ इंडियन नोट्स एंड क्वेरीज रखा।
उन्नीसवीं सदी में जब भारत में भाषाविज्ञान, पुरातत्व, अभिलेखों, मुद्राओं, प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन का बोलबाला था। तब क्रुक ने ग्रामीण भारत में आम लोगों के रोजमर्रा जीवन, उनके लोकविश्वास, लोकगीतों और लोककथाओं की ओर रुख किया। पण्डित रामगरीब चौबे के साथ मिलकर क्रुक ने उत्तर भारत में लोकगीतों और लोककथाओं का संकलन शुरू किया। उनके यह संकलन इण्डियन एंटीक्वेरी, नोट्स एंड क्वेरीज आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। क्रुक द्वारा संकलित इन गीतों में 1857 के विद्रोह की अनुगूँज भी सुनाई देती है।
साधना नैथानी ने विलियम क्रुक और रामगरीब चौबे द्वारा संकलित लोकगीतों और लोककथाओं का संकलन पुस्तक रूप में प्रकाशित किया है। साथ ही, साधना नैथानी ने अपनी पुस्तक इन क्वेस्ट ऑफ इंडियन फोकटेल्स में विलियम क्रुक और रामगरीब चौबे के हवाले से औपनिवेशिक काल में लोकगीतों के अध्ययन और उसके अध्येताओं के बारे में विस्तारपूर्वक लिखा है। क्रुक ने ही हिंदुस्तान के देहात और खेती से जुडी शब्दावली का कोश भी रुरल एण्ड एग्रीकल्चरल ग्लासरी शीर्षक से तैयार किया। उत्तर भारत की विभिन्न जातियों और जनजातियों के बारे में जानने के लिए उनकी पुस्तक ट्राईब्स एंड कास्ट्स ऑफ द नॉदर्न इंडिया एक अहम स्रोत है।
1895 में सेवानिवृत्त होकर इंग्लैण्ड वापस लौटने के बाद भी क्रुक ने लोकगीतों का अध्ययन जारी रखा। वे 1911 में इंग्लैंड की फोक लोर सोसाइटी के सभापति बने और 1915 से लेकर मृत्यपर्यंत वे इस सोसाइटी की पत्रिका फोक लोर के सम्पादक भी रहे। इसके साथ ही क्रुक बिहार एण्ड उडीसा रिसर्च सोसाइटी के भी सदस्य रहे और सोसाइटी की पत्रिका में भी उन्होंने अनेक लेख लिखे थे।
ह्यू फ्रेज़र
उन्नीसवीं सदी में जिन यूरोपीय विद्वानों ने भोजपुरी भाषा और साहित्य पर उल्लेखनीय काम किया, उनमें ह्यू फ्रेज़र का नाम उल्लेखनीय है। प्रशासनिक अधिकारी के रूप में गोरखपुर के कसया सब-डिविजन में काम करते ह्यू फ्रेज़र ने भोजपुरी लोकगीतों का संकलन और अनुवाद किया था। जो 1883 में जर्नल ऑफ द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल में छपा था। उक्त लेख का शीर्षक था- फोकलोर फ्राम ईस्टर्न गोरखपुर (नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज)।
भोजपुरी के ये लोकगीत ह्यू फ्रेजर ने मूलतः पश्चिमोत्तर प्रान्त के गैजेटियर सीरीज में प्रकाशित करने के लिए एफ.एच. फिशर को भेजे थे। किन्तु जब तक लोकगीतों का यह संग्रह और उनका अंग्रेजी अनुवाद एफ.एच. फिशर तक पहुँचा, तब तक गोरखपुर गैजेटियर प्रकाशन के लिए जा चुका था। इसलिए फिशर ने उक्त लेख व अनुवाद को बंगाल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका में प्रकाशन हेतु डॉक्टर हार्नली को भेज दिया।
फ्रेजर द्वारा संकलित इन गीतों में कजरी, ठुमरी के साथ-साथ जँतसारी और बिरहा के गीत भी सम्मिलित थे। गीतों के साथ भोजपुरी क्षेत्र की कुछेक कहावतों को भी फ्रेजर ने इसमें शामिल किया था। फ्रेजर द्वारा संकलित एक ऐसे ही जँतसारी गीत को देखे :
मोरा पिछुअरवा रे निबिया के गछिया
से निबिया सीतल जुरि छाँन
रे दैया! निबिया सीतल जुरि छाँन
ओहि तरे ऐलें रे जुलमि सिपहिया
से पगिया अटकि गैले डार।
रे दैया! से पगिया अटकि गैले डार।
गौरतलब है कि उक्त लेख का संपादन भाषाविज्ञानी जॉर्ज ग्रियर्सन ने किया था। ग्रियर्सन ने फ्रेजर द्वारा संकलित उक्त गीतों के अन्त में एक लम्बी टिप्पणी लिखी थी। जिसमें तुलनात्मक भाषाविज्ञान के नजरिए से भोजपुरी के इन गीतों पर विचार किया गया था। अपनी टिप्पणी के आखरि में ग्रियर्सन ने लिखा था कि मैं यह उम्मीद रखता हूँ कि लोकगीतों का यह दिलचस्प संकलन दूसरे अधिकारियों और विद्वानों को इस बात की प्रेरणा देगा कि वे भी फ्रेजर और फिशर की तरह अपने क्षेत्रों के लोकगीतों का संकलन तैयार करेंगे और उसे एशियाटिक सोसाइटी को भेजेंगे। जिससे निश्चय ही भाषा और साहित्य की हमारी समझ समृद्ध हो सकेगी।
जॉर्ज ग्रियर्सन (1851-1941)
भारतीय भाषाओं के बारे में लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया जैसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक-शृंखला का संपादन करने वाले जॉर्ज ग्रियर्सन ने भोजपुरी का भी गहन अध्ययन किया। भोजपुरी के बारे में लिखे गए उनके लेख जर्नल ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी और जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल आदि महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में छपे थे। वर्ष 1884 में ग्रियर्सन ने सम बिहारी फोक-सांग्स शीर्षक से एक लेख रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका में लिखा था। उस वक्त ग्रियर्सन एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के सदस्य होने के साथ-साथ पटना के कार्यवाहक मजिस्ट्रेट भी थे।
इस लेख में प्रकाशित भोजपुरी के लोकगीत ग्रियर्सन ने बाबू शिवनंदन लाल राय की मदद से एकत्र किए थे, जो उस समय डिप्टी मजिस्ट्रेट थे और आरा के रहने वाले थे। खुद शिवनंदन लाल ने शाहाबाद की महिलाओं से सुनकर ये गीत लिपिबद्ध किए थे। अकारण नहीं कि ग्रियर्सन ने महिलाओं को लोकगीतों का महान संरक्षक कहा है।
उल्लेखनीय है कि उसी समय बंगाल सरकार द्वारा बिहारी भाषा और उसकी बोलियों से जुडे व्याकरण ग्रन्थों की पुस्तकमाला प्रकाशित की जा रही थी। जिसमें ग्रियर्सन के साथ डॉक्टर हार्नली भी शामिल थे। ग्रियर्सन ने 1884 में छपे इस लेख में मैथिली, मगही और भोजपुरी को बिहारी भाषा की बोलियाँ कहा है। उस वक्त तक जहाँ ग्रियर्सन मैथिली भाषा और उसके व्याकरण पर एक लेख लिख चुके थे, वहीं डॉक्टर हार्नली ने गौडीय भाषा के व्याकरण पर एक पुस्तक लिखी थी। ग्रियर्सन के लेख में संकलित इन गीतों में बारहमासा, सोहर, झूमर, जतसार, विवाह गीत शामिल थे। जैसा कि नाम से पता चलता है बारहमासा गीत हिंदू वर्ष के महीनों के अनुसार रचे गए गीत थे। ग्रियर्सन द्वारा संकलित कुछ बारहमासा राम और कृष्ण से भी सम्बन्धित हैं। जबकि कुछ में विरहिणी द्वारा अपने विरह की पीडा को अभिव्यक्त किया गया है। एक उदाहरण देखें -
चढले माँस असाढ बादर घन घमण्ड दल साजि के
हमें बिरहिनी तेजि के पिया रहे कहीं छाइ के।।
सावन माँस सोहावन, हे सखि, सावन पिया मन भावहीं।
कवन बिरहिनी जादू कीन्हा कन्त घर आवत नहीं।।
ग्रियर्सन ने इन गीतों को नागरी लिपि में प्रकाशित किया। साथ ही, उनका अंग्रेजी में गद्यानुवाद भी प्रस्तुत किया। अब उस गीत का एक अंश देखें, जिसे ग्रियर्सन ने शुद्ध भोजपुरी का निकटतम उदाहरण माना है :
आली रे
बिनु शाम सुन्दर मैं ना जिबों रे।।
पहिल माँस जब कातिक लाग
हम के छाडि पिया भैले बनिजार।
नाँचत अहीर चरावत गाइ
बिनु पिया कातिक मोहि न सोहाइ।।
इसी बीच बिहारी भाषा और उसकी बोलियों के व्याकरण पर आधारित ग्रियर्सन की पुस्तक सेवन ग्रामर्स ऑफ द डायलेक्ट्स एंड सब-डायलेक्ट्स ऑफ द बिहारी लैंग्वेज के पाँच खण्ड भी प्रकाशित हो चुके थे। 1884 में प्रकाशित इस पुस्तक के दूसरे खण्ड में ग्रियर्सन ने भोजपुरी के बारे में लिखा। जिसमें ग्रियर्सन ने बिहार, पश्चिमोत्तर प्रान्त के पूर्वी हिस्से और मध्य प्रान्त के उत्तरी हिस्से में बोली जाने वाली भोजपुरी के बारे में विस्तार से लिखा। भोजपुरी के व्याकरण के बारे में लिखते हुए ग्रियर्सन ने शाहाबाद, सारण और बलिया में बोली जाने वाली भोजपुरी को सबसे शुद्ध माना। आजमगढ, जौनपुर और बनारस में व्यवहार में आने वाली भोजपुरी की पश्चिमी उपबोली की चर्चा करते हुए ग्रियर्सन ने जे.आर. रीड के आजमगढ सेटलमेंट रिपोर्ट का भी हवाला दिया। इस पुस्तक के परिशिष्ट में ग्रियर्सन ने भोजपुरी लोककथाओं, लोकगीतों के संकलन के साथ ही भोजपुरी संवाद का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। इन कथाओं और गीतों के संकलन में ग्रियर्सन को बिसेसर प्रसाद (सारण), मुंशी राधालाल (शाहाबाद) से सहायता मिली।
उपर्युक्त पुस्तक के प्रकाशित होने के दो वर्ष बाद 1886 में ग्रियर्सन का एक अन्य लेख जर्नल ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में सम भोजपुरी फोक-सांग्स शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस लेख में ग्रियर्सन ने बिहारी भाषा के मुद्रित साहित्य के अभाव की चर्चा की है। बिहारी भाषा के साहित्य और उसके भौगोलिक विस्तार पर विचार करने के साथ ही ग्रियर्सन ने लोकगाथाओं आल्हा-उदल, नयका बनजारा और विजयमल आदि का भी विवरण दिया है। इस लेख में ग्रियर्सन ने विशेष रूप से बिरहा की चर्चा की है और उनका अंग्रेजी में गद्यानुवाद भी किया है। ग्रियर्सन के अनुसार बिरहा में आमजन के अंतरंग विचार और कामनाएँ अभिव्यक्त होती हैं। बिरहा के साथ-साथ घाँटो, जतसार आदि गीत भी ग्रियर्सन ने इस लेख में संकलित किए हैं। ग्रियर्सन द्वारा संकलित एक बिरहा यहाँ प्रस्तुत है-
सुमिरी गाओं राम, सुमिरी भैया लछुमन
सुमिरी गाओं सकल जहान
सुमिरी गाओं एहि माता ए पिता के
जिनि लारिका से कैली हां सेआन।।
विलियम आर्चर (1907-1979)
बीसवीं सदी के तीसरे दशक में बिहार में प्रशासनिक अधिकारी रहते हुए विलियम आर्चर (1907-1979) ने भोजपुरी गीतों का एक महत्त्वपूर्ण संकलन तैयार किया, जो बिहार एण्ड उडीसा रिसर्च सोसाइटी द्वारा भोजपुरी विलेज सांग्स शीर्षक से प्रकाशित हुआ। लोकगीतों का यह संकलन आर्चर ने अपने कायस्थ सहयोगी संकटा प्रसाद के साथ तैयार किया। ये गीत शाहाबाद क्षेत्र के कायस्थ परिवारों की महिलाओं से सुनकर लिपिबद्ध किए गए थे। इस संकलन में सगुन, तिलक, शिव विवाह, हलदी, सहला, जाग, मंगल, विवाह, सोहाग, परिछन, कोहबर, जेवनार, झूमर, टापा, सोहर, मुंडन, चैता, कजली, बरसाती, रोपनी सोहनी और जतसार के गीत शामिल थे। हिंदी में यह पुस्तक भोजपुरी ग्राम्य गीत शीर्षक से पटना लॉ प्रेस द्वारा प्रकाशित की गई।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पढाई के दौरान ही विलियम जॉर्ज आर्चर के मन में सहित्य के प्रति गहरा अनुराग पैदा हुआ। कैम्ब्रिज के दिनों में विलियम आर्चर टी.एस. इलियट, आई.ए. रिचर्ड्स, एफ.आर. लीविस, बर्टरेण्ड रसेल के लेखन से गहरे प्रभावित रहे। उसी दौरान उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की और नवम्बर 1931 में बिहार में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में तैनात हुए।
अगले पन्द्रह वर्षों तक विलियम आर्चर बिहार के विभिन्न जिलों में नियुक्त रहे। जहाँ वे शाहाबाद और दरभंगा जिले में सब-डिविजनल ऑफिसर रहे, वहीं छोटा नागपुर में जॉइंट मजिस्ट्रेट और डिप्टी कलेक्टर रहे। छोटा नागपुर और बाद में संथाल परगना में डिप्टी कमिश्नर रहते हुए विलियम आर्चर ने ओराँव, खरिया, हो, संथाल और मुण्डा जनजातियों के गीतों का संकलन किया और उन्हें पुस्तक रूप में छापा। इसी दौरान वे प्रसिद्ध समाजशास्त्री वैरियर एल्विन के सम्पर्क में आए, जो मध्यभारत में गोंड जनजातियों के साथ रह रहे थे। जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ, उस वक्त विलियम आर्चर नागा पहाडियों में तैनात थे, जहाँ वे फरवरी 1948 तक रहे।
चालीस के दशक में जनजातियों के लोकगीतों और उनकी कला के संदर्भ में विलियम आर्चर ने मैन इन इण्डिया पत्रिका में अनेक लेख और टिप्पणियाँ लिखीं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1942 में मैन इन इंडिया के सम्पादक समाजशास्त्री शरतचंद्र रॉय के निधन के बाद अगले छह सालों तक विलियम आर्चर इस पत्रिका के सम्पादक भी रहे।
सहित्य के साथ-साथ कला के प्रति उनके गहरे लगाव ने उन्हें राय कृष्ण दास, डॉक्टर मोतीचन्द्र और गोपी कृष्ण कनोरिया जैसे कला-मर्मज्ञों, मुकुल दे सरीखे चित्रकारों और हुमायूँ कबीर जैसे विद्वानों का आत्मीय बनाया। ओराँव, संथाल और नागा जनजातियों के जनजीवन, कला, संस्कृति और लोकगीतों पर भी विलियम आर्चर ने उल्लेखनीय काम किया। इस काम में उनकी साझीदार रहीं, उनकी पत्नी मिल्ड्रेड आर्चर, जो स्वयं भी कला की गम्भीर अध्येता थीं।
भारत में रहने के अंतिम दौर में विलियम आर्चर ने पहाडी और राजपूताना क्षेत्र की चित्रकला का गहन अध्ययन शुरू किया, इसके लिए उन्होंने काँगडा, गढवाल और राजपूताना (बूँदी, कोटा) के इलाकों का लगातार दौरा किया। और भारत से इंग्लैण्ड वापस लौटने के बाद उन्होंने पहाडी और राजपूताना की चित्रकला पर अनेक पुस्तकें लिखीं।
ए.जी. शिरेफ
बीसवीं सदी में जिन यूरोपीय विद्वानों द्वारा भोजपुरी भाषा व साहित्य का गहन अध्ययन किया गया, उनमें ए.जी. शिरेफ भी प्रमुख हैं। भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी ए.जी. शिरेफ ने वर्ष 1936 में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका में लोकगीतों को आधार बनाकर एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था हिंदी फोक-सांग्स। शिरेफ का यह लेख समीक्षा लेख की तरह था, जिसमें मुख्यतः रामनरेश त्रिपाठी की पुस्तक ग्राम गीत और कविता कौमुदी की चर्चा की गई थी। साथ ही, शिरेफ ने जॉर्ज ग्रियर्सन और जोगेंद्र नाथ राय के उन लेखों का भी हवाला दिया था, जो क्रमशः भोजपुरी और बैसवाडी लोकगीतों के बारे में थे। इनमें से ग्रियर्सन का लेख जहाँ जर्नल ऑफ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में छपा था, वहीं जोगेंद्र नाथ राय का लेख एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की पत्रिका में छपा था।
शिरेफ अपने लेख का आरम्भ रामनरेश त्रिपाठी के उस रोमांचक अनुभव से करते हैं, जो उन्हें रेलमार्ग से जौनपुर से इलाहाबाद की यात्रा करते हुए देहाती महिलाओं के गाए हुए एक गीत को सुनकर हुआ था। वह लोकप्रिय गीत था रेलिया बैरन पिया को लिए जाय रे! उस गीत से रामनरेश त्रिपाठी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लोकगीतों के संकलन को ही अपना ध्येय बना लिया। भोजपुरी लोकगीतों के संकलन हेतु रामनरेश त्रिपाठी ने बनारस, आजमगढ, बलिया, गाजीपुर और जौनपुर आदि जगहों की यात्राएँ कीं। रामनरेश त्रिपाठी की अनूठी पुस्तक ग्राम गीत उनकी इन्हीं यात्राओं का नतीजा थी।
शिरेफ ने अपने लेख में ग्राम गीत में संकलित कुछ चुनिन्दा गीतों के न सिर्फ अंग्रेजी में अनुवाद किए, बल्कि इन लोकगीतों की तुलना अंग्रेजी और जर्मन लोकगीतों से भी की। जिन गीतों की चर्चा शिरेफ ने की है उनमें जहाँ विवाह के गीत शामिल थे, वहीं 1857 के विद्रोह और वीर कुँवर सिंह और उनके भाई अमर सिंह से जुडी लोकगाथाएँ भी शामिल थीं।
उक्त लेख के प्रकाशित होने के दो वर्ष बाद 1938 में शिरेफ ने मलिक मुहम्मद जायसी की कृति पद्मावत के अंग्रेजी अनुवाद का जिम्मा उठाया। उस वक्त वे फैज़ाबाद के कमिश्नर थे। शिरेफ से पूर्व सुधाकर द्विवेदी के सहयोग से जॉर्ज ग्रियर्सन पद्मावत के कुछ अंशों का अनुवाद अंग्रेज़ी में कर चुके थे। किन्तु अस्वस्थता के कारण वे उसे पूरा नहीं कर सके। अंततः शिरेफ ने पद्मावत का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, जो वर्ष 1944 में कलकत्ता स्थित एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल द्वारा प्रकाशित किया गया। इसमें उन्होंने पण्डित रामनरेश त्रिपाठी और पण्डित कान्तानाथ पाण्डे का सहयोग भी मिला था। शिरेफ द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित पद्मावत के दूसरे संस्करण पर आधारित था, जो काशी नागरी प्रचारिणी सभा से छपा था। इसके एक दशक बाद जब वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा संपादित पद्मावत का प्रकाशन साहित्य सदन (चिरगाँव) से हुआ, तब शिरेफ ने उस पुस्तक की समीक्षा लिखी थी।

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