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भारतीय मन्दिर स्थापत्यः आस्था के सजीव रूपायन

नर्मदाप्रसाद उपाध्याय
मन्दिर आस्था के आकाश में उदित हुआ वह इन्द्रधनुष है जिसकी दिव्य आभा के बीच अपने आराध्य प्रकट होते हैं। मन्दिर शब्द का निर्माण मंद धातु से हुआ है जिसके मूल में जडता का भाव है। जडता का यह भाव मंद से बने मंदर में प्रमुखता से उभरा है। मंदार पर्वत की अचलता से यह सम्बद्ध है। वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद ने सूत्र रूप में इसका वर्णन लिखा। इस दर्शन में ईश्वर को अपरिवर्तनीय बताते हुए जड या अचल बताया गया है। इसलिए मन्दिर ईश्वर के ही प्रतीक हैं।
इसी अचलता के कारण मंदार अर्थात पर्वत के समान निर्मित हुए ईश्वर के आवास को मंदर या मन्दिर कहा गया। वैदिक साहित्य में गोपुर, महावन तथा तोरण जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है। मन्दिर का पहिला उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में है। मन्दिर के लिए महाकाव्यों और सूत्रग्रंथों में मन्दिर की अपेक्षा देवगृह, देवायतन, देवकुल आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। मन्दिर को तमिल में कोविल, कन्नड में देवस्थान और गुडी, तेलुगु में आलयम तथा मलयालम में क्षेत्रम कहा जाता है। मन्दिर शब्दावली के अंतर्गत कलश, गोपुरम, रथ, उरुश्रृंग, जगती, स्तंभ, शुकनास, अंतराल, तोरण, गवाक्ष, आमलक तथा अधिष्ठान जैसे शब्द भी आते हैं। मन्दिर स्थापत्य सम्बन्धी नाम जैसे प्रतिरथ, भूमि, विमान, पंचायतन, भद्ररथ व कर्णरथ प्राचीन साहित्य में मिलते हैं।
विद्वानों ने यह भी एक निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य पर्वतों की गुफााओं में आश्रय तलाशता था तथा इस प्रकार की गुफााओं में साधना करने के स्थान परवर्तीकाल में पवित्र स्थानों के रूप में मान्य किए गए व कालान्तर में ये मन्दिर के रूप में संभवतः विकसित हुए। बौद्ध युग में अस्थि और अन्य भौतिक अवशेषों को संरक्षित करने की परम्परा आरम्भ हुई जिनमें इन अस्थियों को संरक्षित किया गया जिन्हें स्तूप कहा गया। मन्दिर इन्हीं स्तूपों के आगामी विकास हैं।
बुद्ध का जब महापरिनिर्वाण हुआ तो उनकी देह को अग्नि को समर्पित किया गया और देह के विलीन होने पर अस्थियों को उनके शिष्यों ने बाँटकर स्तूपों में सुरक्षित रख दिया। स्तूप वस्तुतः छोटे पत्थरों से बना वह गोल स्मारक है जिन्हें बुद्ध और उनके अनुयायियों की अस्थियाँ, बाल तथा दाँत रखे गए।
स्तूपों की ऐतिहासिकता ईसा से चौथी व तीसरी सदी तक जाती है। आरम्भ में तो नहीं, लेकिन कालान्तर में स्तूप बडे कलात्मक बने। आरम्भ में लकडी के आकार बनाए जाते थे और बाद में ठोस पत्थरों को इन आकारों के आधार पर स्तूप के रूप में मूर्त कर दिया जाता था। कारले, कान्हेरी और बेदसा के आरम्भिक स्तूप इसके उदाहरण हैं।
यह मान्यता है कि अकेले सम्राट अशोक ने 84000 स्तूप बनवाए, किन्तु यह अतिशयोक्ति है। जैन परम्परा में भी यद्यपि स्तूप निर्मित हुए, किन्तु स्तूप की मूल अवधारणा बौद्ध है। स्तूपों के आकार भी आठ प्रकार के बनाए गए जो बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग के प्रतीक थे। बाद में इन्हें पुनः विभाजित कर स्तूपों में संरक्षित किया गया। जिस प्रकार मन्दिर को भगवान की देह स्वरूप ही मान्य किया जाता है, उसी तरह स्तूप को भी बुद्ध के निर्वाण का स्वरूप माना गया। स्तूप के प्रमुख हिस्सों के रूप में वेदिका या रेलिंग बनाई गई ताकि उसकी सुरक्षा हो सके, मेधी या कुर्सी जिस पर स्तूप आधारित हो तथा अण्ड अर्थात उसके गोलाकार हिस्से को निर्मित किया गया। अस्थियों की सुरक्षा के लिए हर्मिका, धार्मिक चिन्ह के रूप में छत्र व उसे सहारा देने के लिए यष्टि व मेधी पर चढने के लिए सीढियों के रूप में सोपान बनाए गए। वास्तुकला की दृष्टि से साँची, सारनाथ, भरहुत, पिपरहवा और गान्धार क्षेत्र के स्तूप प्रसिद्ध हैं। इनमें से भरहुत का वह स्तूप अपने शिल्प के कारण विख्यात है जो दूसरी सदी ईसा पूर्व में बनाया गया था तथा जिसके अवशेष अभी कोलकाता के इंडियन म्यूजियम में संरक्षित हैं। भरहुत, सतना के निकट अवस्थित था, लेकिन अब वहाँ केवल एक वृत्ताकार स्थानभर दिखाई देता है तथा शेष स्तूप कोलकाता में इंडियन म्यूजियम में संरक्षित है। इसका व्यास लगभग 68 फुट था।
सारनाथ में बुद्ध ने ज्ञान दिया था। सारनाथ का स्तूप अशोक के समय का है जिसका व्यास लगभग 60 फुट था। वहाँ गुप्त काल में सुन्दर धामेख स्तूप बना। नागार्जुनकोण्डा के स्तूप की मूर्तिकला बडी सुप्रसिद्ध है। इसे इक्ष्वाकुओं के समय में तीसरी व चौथी सदी के बीच बनाया गया।
अमरावती के महान संगमरमरी स्तूप ईसा पूर्व बने। इनमें बुद्ध के मानव रूप में रूपान्तरण को देखा जा सकता है। इसके अवशेष अभी चेन्नई व ब्रिटिश संग्रहालय लंदन में हैं। अनेक प्राचीन स्तूपों के अवशेष राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली सहित देश-विदेश के संग्रहालयों में हैं।
इन स्तूपों में सबसे भव्य हैं साँची के वे स्तूप जो बुद्ध के समय बने लेकिन शुंग वंश के शासकों ने दूसरी सदी ईसा पूर्व में उनका परिवर्धन किया। साँची में यद्यपि मानव रूप में बुद्ध उत्कीर्ण नहीं हैं, लेकिन उनके जन्म से लेकर उनके परिनिर्वाण तक और उनकी जातक कथाओं को बडे भावप्रवण रूप में उत्कीर्ण किया गया है। साँची में लोक जीवन को जहाँ एक ओर उकेरा गया वहीं दूसरी ओर वहाँ के तोरणों पर वे शालभंजिकाएँ उत्कीर्ण की गईं जो विश्व कला की अमर धरोहर हैं। साँची के स्तूप भारत में पाषाणी शिल्प के आरम्भिक उदाहरण हैं। इन्हें बहुत परिश्रम से बनाया गया था। ये 25 बरसों में बने। कपिलवस्तु और कश्यप पैनल के निर्माण में सबसे अधिक समय लगा।विदिशा के हाथीदाँत पर कार्य करने वाले शिल्पियों ने पत्थर पर अपने बारीक कौशल को साकार किया, हजारों स्थानीय शिल्पी रात दिन लगे और दानदाताओं ने खुले मन से दान दिया।उनके नाम ब्राह्मी लिपि में वहाँ उत्कीर्ण हैं।
स्तूप के माध्यम से दर्शन की अभिव्यक्ति की गई। बुद्ध दर्शन के तत्त्वों को स्तूप के विभिन्न अंगों के रूप में आकार दिया गया। इह लोक से परलोक तक की आध्यात्मिक यात्रा स्तूप पर लगे अक्ष और उसके अष्टांगों तक में व्यक्त की गई । उसका आकार कमल के समान रखा गया जो एक दार्शनिक प्रतीक है।स्तूप के शिल्प के आधार पर भी उन्हें वर्गीकृत किया गया। शारीरिक, पारिभोगिक, उद्देशिका और पूजार्थक।
अशोक ने कपीसी में 100 फीट ऊँचा और पेशावर के निकट 300 फीट ऊँचा स्तूप भी बनवाया था।
भरहुत और साँची में उत्तर भारत में भव्य स्तूप बने तो अमरावती, जग्यापेठा, भट्टीप्रोलू और ग्रन्थासाला में भी मनोहारी स्तूप दक्षिण में निर्मित हुए। इनमें साँची को छोडकर अब ये शेष स्तूप भग्न स्मारक भर हैं। इन स्तूपों के आसपास चारदीवारी भी थी और विहार भी लेकिन वे अब नहीं हैं। इनमें कृष्णा नदी के तट पर आन्ध्र राजाओं की राजधानी में बना ईसा से 200 वर्ष पूर्व का संगमरमरी अमरावती का भग्न स्तूप भव्यतम है। ये स्तूप गंगा घाटी से दक्षिण के दोनों छोरों तक निर्मित किए गए । अजंता की चित्रावली में स्तूप चित्रित किए गये तथा वहाँ स्तूप भी बने। जैसा कि पूर्व में उल्लिखित किया गया है स्तूप मन्दिरों के पूर्व में निर्मित किए गए। लेकिन गुप्त काल के बाद मन्दिर निर्माण त्वरित गति से हुआ।
भारत में स्थापत्य तथा वास्तुकला की उत्पत्ति हडप्पाकालीन मानी जाती है तथा इसकी निरंतरता भी बनी रहती है। सिंधु घाटी सभ्यता या हडप्पा सभ्यता का काल 3500-1500 ईस्वी पूर्व तक माना जाता है। इस काल में नगर बने जिसकी योजना इस तरह की थी जिसमें सडकें एक-दूसरे को समकोण में काटती थीं। हडप्पा व मुअनजोदडो इस सभ्यता के प्रमुख नगर थे। यहाँ की इमारतों के निर्माण में पक्की ईंटों, पत्थर व लकडी का भी प्रयोग किया जाता था। मुअनजोदडो में मातृका व नाचती हुई लडकी की धातु की मूर्ति भी मिली है जिससे यह स्वाभाविक अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में ऐसी स्थापत्य रचनाएँ होती होंगी, जिनमें मूर्तियाँ रखी जाती हों।
मौर्यकाल में स्मारक व स्तंभ बने व लकडी का भी काफी प्रयोग हुआ। अशोक के समय से भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग आरम्भ हो गया। यह माना जाता है कि अशोक ने ही श्रीनगर (कश्मीर) व ललितपाटन (नेपाल) नामक नगरों की स्थापना की थी। बौद्ध ग्रंथों में अशोक के द्वारा 84000 स्तूपों के निर्माण का अतिशयोक्तिपूर्ण उल्लेख है, किन्तु स्थापत्य के दृष्टिकोण से साँची, भरहुत, बोधगया, अमरावती व नागार्जुनकोण्डा के स्तूप प्रसिद्ध हैं। अशोक के स्तम्भों की विशेषता यह है कि उन पर पॉलिश किया गया जो आज भी चमकता है। पाश्चातवर्ती काल में शुंग, कुषाण व सातवाहन वंशों का शासन हुआ। उत्तर भारत में शुंग और कुषाण तथा दक्षिण में सातवाहन राजाओं ने शासन किया। इन शासकों के काल में स्तूप, गुफाा मन्दिर, विहार आदि बने। भरहुत का स्तूप शुंग काल में पूर्ण हुआ। ओडिशा में जैनियों ने हाथीगुम्फा व रानीगुम्फा जैसी गुम्फाओं का निर्माण कराया। अजन्ता की कुछ गुफााएँ भी इसी दौरान बनीं। इस काल में गान्धार शैली का भी विकास हुआ तथा मथुरा शैली भी विकसित हुई।
मन्दिर निर्माण के आरम्भिक दौर के मन्दिरों में तिगवा के विष्णु मन्दिर (जबलपुर, म.प्र.), भूमरा के शिव मन्दिर (सतना, म.प्र.), नचना कुठार के पार्वती मन्दिर (पन्ना, म.प्र.), देवगढ के दशावतार मन्दिर (ललितपुर, उ.प्र.) तथा भीतरगाँव मन्दिर (कानपुर, उ.प्र.) आदि को चिन्हित किया गया है।
राजस्थान में दूसरी सदी ईसा पूर्व के चित्तौड के निकट घोसुण्डी में जो अभिलेख मिला है उसके अनुसार नारायण वाटक का निर्माण विष्णु को समर्पित करने के लिए किया गया। इसमें विष्णु को समर्पित गरुड स्तम्भ का भी निर्माण हुआ। उल्लेखनीय है कि इसी प्रकार का विष्णु को समर्पित एक गरुड स्तम्भ विदिशा में विद्यमान है जिसे खामबाबा के नाम से जाना जाता है। इसे हेलियोडोरस नामक एक वैष्णव भक्त ने विष्णु मन्दिर के सामने निर्मित कराया था। यह मन्दिर अब विलुप्त हो चुका है, किन्तु यह स्तंभ अभी विद्यमान है। यह भी लगभग इसी काल का है।
अवतारवाद की अवधारणा ने मन्दिरों के निर्माण को प्रत्येक युग में गति दी। सबसे पहिले भवन रूप में मन्दिर निर्माण गुप्तकाल में आरम्भ हुआ। जिसे आज हम मन्दिर के रूप में मान्यता देते हैं। इस काल में न केवल मन्दिर वास्तु का विकास हुआ, अपितु शास्त्रीय नियम भी निर्धारित हुए।
यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि भारत में दवताओं की पूजा अत्यंत प्राचीनकाल से प्रचलित है तथा यह भी उल्लेख मिला है कि चीनी यात्री इत्सिंग ने गुप्त शासक श्रीगुप्त के द्वारा मिलि-क्या-सी-क्या-पोनो (सारनाथ) में चीनी यात्रियों के लिए मन्दिर बनाए जाने का उल्लेख किया है। इस प्रकार श्रमण परम्परा में भी मन्दिर निर्मित हुए। चन्द्रगुप्त द्वितीय के मंत्री वीरसेन (शाब) के द्वारा उदयगिरि की गुफा में भगवान शिव के लिए गुफा मन्दिर बनवाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। कार्तिकेय के मन्दिर के निर्माण का उल्लेख कुमारगुप्त के मिलसद अभिलेख से ज्ञात होता है तथा अनेक मन्दिरों के जीर्णोद्धार तथा एक सूर्य मन्दिर के निर्माण कराने सम्बन्धी जानकारी मंदसौर के अभिलेख से मिलती है।
गुप्तकालीन व पूर्व गुप्तकालीन मन्दिर जिनका अनेक स्थानों पर प्राप्त हुए हैं जिनमें साँची, शंकरगढ, दहपर्वतया (असम), भीतरगाँव, अहिच्छत्र तथा गढवा शामिल हैं।
यहाँ यह उल्लेख समीचीन होगा कि गुप्तकाल के मन्दिर शनैः शनैः उस पंचायतन शैली के मन्दिरों में परिवर्तित हुए जिसमें पाँच देवों के गृह निर्मित किए जाते थे। ये मन्दिर वर्गाकार हैं तथा इसके प्रमाण भूमरा और देवगढ के मन्दिर हैं। यह कहा जा सकता है कि पंचायतन प्रारूप के मन्दिर, वर्गाकार मन्दिरों के विकसित रूप हैं। इस प्रक्रिया में गर्भ गृह के चारों ओर अतिरिक्त देवालय बनाए गए। भूमरा मन्दिर के गर्भ गृह के सामने चबूतरे के दोनों कोनों पर देवालय निर्मित किए गए हैं। गर्भ गृह पीछे के भाग में है। भूमरा का मन्दिर देवगढ से पूर्ववर्ती है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मन्दिरों के शिखरों के स्थापत्य में भी परिवर्तन होता रहा। शिखर गर्भ गृह के ऊपर बनी हुई एक वास्तु संरचना है जिसमें अनेक तल, गवाक्ष, कर्णश्रृंग, शुकनाशा, आमलक, कलश, बीजपूरक व ध्वजा होती हैं। शिखर की रचना कोणीय भी हो सकती है।
आरंभिक काल के मन्दिरों में शिखर नहीं होते थे। वे सपाट छत से आवृत्त थे लेकिन बाद में यह सपाट छत धीरे-धीरे ऊंची उठती गई तथा गर्भ गृह के ऊपर पिरामिड के आकार का स्वरूप निर्मित होता गया। बाद में अनेक तल वाले शिखर भी बने। शिखर प्रासाद के विभिन्न तल क्रमशः ऊपर की ओर छोटे होते गए हैं। इसका उदाहरण नचना कुठार का वह मन्दिर है जिसमें प्रथम कक्ष पर दूसरे व तीसरे कक्ष जिन्हें खण्ड कह सकते हैं, दिखाई देते हैं। बाद के काल में शिखर बनाने के वास्तु कौशल में निरंतर प्रगति होती रही।
गुप्तकालीन प्रमुख मन्दिरों में सपाट छत का तिगवा का मन्दिर है जो जबलपुर (मध्यप्रदेश) के निकट है। इसके सामने चार स्तम्भों का मण्डप निर्मित है। जबलपुर के निकट तिगवा से लगभग 5 कि.मी. पूर्व में भी गुप्तकाल का ही लाल पत्थर का एक छोटा शिव मन्दिर मिला है। भूमरा का मन्दिर भी सतना (मध्यप्रदेश) के निकट अवस्थित है। यह शिव मन्दिर है जिसका निर्माण पांचवीं सदी के मध्य हुआ माना जाता है। भूमरा के निकट अजयगढ के पास नचना कुठार में एक शिव मन्दिर व उसके सामने पार्वती मन्दिर है। इस मन्दिर की विशेषता यह है कि पार्वती मन्दिर के द्वार के दोनों ओर द्वारदेवियों के रूप में यमुना व गंगा को उत्कीर्ण किया गया है तथा मन्दिर की बाहरी भित्तियों पर युगल शिल्प निर्मित हैं जो खजुराहो के मान्मथ शिल्पों के पूर्ववर्ती शिल्प कहे जा सकते हैं। मन्दिर परिसर में बुद्ध की मूर्ति सहित अनेक मूर्तियाँ भी बिखरी पडी हैं। पशुपतिनाथ की भांति शिवलिंग का शिल्प है। यह गुप्तकाल में एक भव्य मन्दिर के रूप में अवस्थित रहा होगा। इस स्थान को वर्तमान में चौमुखानाथ भी कहते हैं।
देवगढ (ललितपुर) के पास गुप्तकालीन विष्णु मन्दिर जिसे दशावतार मन्दिर भी कहते हैं अद्भुत हैं। इसका विस्मयकारी अलंकरण तथा दशावतार के उत्कीर्णन मनमोहक हैं। देवगढ का मन्दिर गुप्तकाल के मन्दिर निर्माण का आरम्भिक उदाहरण है जिसका निर्माण छटवीं सदी में हुआ। यह गुप्तकाल के उत्कृष्टतम मन्दिरों में से एक है। कानपुर के निकट ही उसके दक्षिणी भाग में भीतरगाँव का गुप्तकालीन मन्दिर है जिसे ईंटों से निर्मित किया गया है तथा इस पर शिखर भी है। इन दोनों मन्दिरों की विषयवस्तु रामायण, महाभारत व पुराणों से ली गई है।
गुप्तकालीन मन्दिरों की यह विशेषता है कि उन्हें प्रायः ऊँचे चबूतरों पर बनाया गया है तथा इन मन्दिरों की छतें शिखरविहीन बनाई गईं जो अपने आकार में चपटी थीं किन्तु आगामी काल में मन्दिरों के शीर्ष पर शिखर बनाए जाने लगे तथा भित्तियों पर उत्कीर्णन किए गए। मन्दिर के भीतर एक चौकोर अथवा वर्गाकार कक्ष बनाया जाता था जिस पर मूर्ति प्रतिष्ठित की जाती थी। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा मार्ग बना होता था तथा गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर बने चौखट के दोनों ओर मकरवाहिनी गंगा तथा पूर्ववाहिनी यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण की जाती थीं। इन गुप्तकालीन मन्दिरों में अधिकांश पाषाण से निर्मित हैं केवल भीतरगाँव व एक और मन्दिर जो सिरपुर में अवस्थित है ईंटों से निर्मित हैं।
इन मन्दिरों के लगभग सौ वर्ष पूर्व के मन्दिर क्रमशः साँची और उदयगिरि (विदिशा के निकट) में हैं किंतु ये देवगढ के मन्दिर की तुलना में साधारण हैं। देवगढ का मन्दिर पंचायतन शैली का गुप्तकालीन स्थापत्य का श्रेष्ठ मन्दिर है। गुप्तोत्तरकालीन मन्दिरों में तनेसर का कृत्तिकाओं का मन्दिर, झालरापाटन का शीतलेश्वर मन्दिर व कंसुआ (कोटा) का शैव मन्दिर प्रमुख हैं।
भारत में उत्तर और दक्षिण भारत में अलग-अलग शैलियों में मन्दिर बने और मुसलमानों के आगमन के बाद स्थापत्य की शैली में भी समन्वय हुआ। उत्तर भारत में मन्दिर स्थापत्य में सौन्दर्य प्रतिष्ठित हुआ, खजुराहो, कोणार्क और रणकपुर से माउण्ट आबू तक के मन्दिरों में जबकि दक्षिण भारत में वैराट्य ने अपने उत्कर्ष को इन महान मन्दिरों के रूप में प्रकट कर दिया। दक्षिण भारत की मन्दिर सरिणी इसका उदाहरण है।
दक्षिण भारत के विशाल मन्दिर हमारे पुरखों के स्थापत्य कौशल के प्रमाण हैं। इन मन्दिरों में से कुछ प्रमुख मन्दिर हैं तमिलनाडु स्थित चिदम्बरम नटराज मन्दिर, ऐरातेश्वर, बृहद्देश्वर, अरुंचलेश्वर, महाबलीपुरम, कैलाशपुरम, मीनाक्षी, नरग्रेशु, रामस्वामी मन्दिर कुंभकोणम, रामनाथ स्वामी मन्दिर रामेश्वरम, कैलासपुरम, श्रीरंगम, सुचिंद्रम, थिल्लै नटराज, अन्नामलाई,, एकम्बेश्वर, जम्बुकेश्वर और त्यागराज। कर्नाटक के कुछ प्रमुख मन्दिर हैं, मुरुदेश्वर, बदामी, चेत्रकेशव, ऐहोल, पट्टादकल, हम्पी, विजयनगर, पापनाथ, भूतनाथ, विरुपाक्ष और विट्ठल। आन्ध्र प्रदेश का सबसे विश्वप्रसिद्ध मन्दिर तिरुपति बालाजी और तेलंगाना का लक्ष्मी नरसिंह, हजार खम्बा, संगमेश्वर ज्ञान सरस्वती। यह सूचि बहुत छोटी है जो दक्षिण भारत के विशाल मन्दिरों की झांकी प्रस्तुत करती है।
दक्षिण भारत के इन विशाल भारतीय मन्दिरों के स्थापत्य की तुलना दिनकरजी जब ताजमहल से करते हैं, तो विल डूराण्ट के हवाले से कहते हैं कि इन मन्दिरों के पार्श्व में ताजमहल वैसा ही लगता है जैसे नाटकों के बगल में संगीत और अपनी ओर से जोडते हुए उपमा को उसके शीर्ष पर पहुँचाते हुए कहते हैं जैसे वाल्मीकि के पार्श्व में कालिदास, जैसे तुलसी के पार्श्व में बिहारी या घनानन्द।
दक्षिण भारत के ये महान विशालकाय मन्दिर वास्तव में वास्तु के वाल्मीकि और तुलसी हैं।
उत्तर भारत में अनेक मन्दिर हैं लेकिन प्रमुख महत्त्वपूर्ण मन्दिर हैं काशी विश्वनाथ मन्दिर वाराणसी, उत्तरप्रदेश, श्रीजगन्नाथ मन्दिर, पुरी, ओडिशा, सूर्य मन्दिर कोणार्क, ओडिशा, श्रीमहाकालेश्वर मन्दिर उज्जैन, मध्यप्रदेश, एकलिंगनाथजी मन्दिर, उदयपुर, राजस्थान, श्रीद्वारकाधीश, गुजरात, श्रीकृष्ण जन्मभूमि मन्दिर, मथुरा, श्रीदक्षिणेश्वर मन्दिर, कोलकाता, श्रीसिद्धिविनायक मन्दिर, मुंबई, कंदरिया महादेव मन्दिर, खजुराहो, केदारनाथ, उत्तराखण्ड, गंगोत्री मन्दिर, उत्तराखण्ड, श्रीनाथजी मन्दिर, नाथद्वारा, ब्रह्मा मन्दिर, पुष्कर, बद्रीनारायण मन्दिर, उत्तराखण्ड, रघुनाथ मन्दिर, जम्मू, श्रीसोमेश्वर स्वामी मन्दिर, गुजरात, श्री अम्बाजी मन्दिर, बनासकांठा, गुजरात, शीतला माता मन्दिर, गुडगाँव, मनसा देवी मन्दिर, हरिद्वार, श्री बैजनाथ मन्दिर, हिमाचल, श्री बैद्यनाथ मन्दिर, झारखण्ड, श्री लिंगराज मन्दिर, भुवनेश्वर, त्रिपुरेश्वरी मन्दिर, उदयपुर, त्रिपुरा, श्री मुक्तेश्वर मन्दिर, भुवनेश्वर, यमुनोत्री मन्दिर, उत्तराखण्ड, श्रीमुण्डेश्वरी मन्दिर, बिहार, श्रीमहालसा नारायणी देवी मन्दिर, पोण्डा, गोवा, श्रीसूर्य मन्दिर, मोढेरा गुजरात, कामाख्या मन्दिर, गुवाहाटी, असम, त्रयम्बकेश्वर मन्दिर, महाराष्ट्र, दन्तेश्वरी मन्दिर, छत्तीसगढ, श्री महालक्ष्मी मन्दिर, कोल्हापुर, महाराष्ट्र, श्रीलक्ष्मीनारायण मन्दिर, चम्बा, हिमाचल प्रदेश, भद्र मारूति मन्दिर, महाराष्ट्र, तुलजा भवानी मन्दिर, महाराष्ट्र, श्री सलासर हनुमान मन्दिर, सलासर, राजस्थान, श्रीनैना देवी मन्दिर, हिमाचल प्रदेश, श्रीशान्ता दुर्गा मन्दिर, कावालेम, गोवा, जगद्पिता ब्रह्मा मन्दिर, पुष्कर, श्रीविष्णुपद मन्दिर, गया, श्रीबद्रीनारायण मन्दिर, बद्रीनाथ, श्रीचौंसठ योगिनी मन्दिर, ओडिशा, श्रीकैलाशनाथ मन्दिर, एलोरा, श्रीमेहंदीपुर बालाजी, मेहंदीपुर राजस्थान, हनुमानधारा, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, श्रीसाई बाबा मन्दिर, शिरडी, महाराष्ट्र, शनि मन्दिर, शिंगणापुर, महाराष्ट्र, श्री महाकालिका मन्दिर, पावागढ, गुजरात, बाबा अमरनाथ, कश्मीर, जम्मू और कश्मीर, श्रीवैष्णोदेवी मन्दिर, जम्मू, जम्मू और कश्मीर, श्री गजानन महाराज, शेगाँव, महाराष्ट्र, श्री बाबा रामदेव मन्दिर, रुणिचा धाम रामदेवरा, राजस्थान, ओंकारेश्वर महादेव मन्दिर, ओंकारेश्वर, मध्यप्रदेश, श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर महाराष्ट्र, श्री घ्रंशनेश्वर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र।
ये कुछ प्रमुख मन्दिर उत्तर भारत के हैं। सभी बारह ज्योतिर्लिंग, चारों धाम तथा अष्टविनायक सहित अनेक पवित्र गुफामन्दिरों सहित पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल स्थित अनेक मन्दिर हिन्दुओं की आस्था के केंद्र हैं। इस दृष्टि से यह सूची बहुत छोटी है। ये मन्दिर हिन्दुओं की आस्था के अद्भुत सजीव स्थापत्य अंकन हैं।
हिन्दू मन्दिरों के मूल स्वरूप का निर्माण गर्भगृह, मण्डप, शिखर और वाहन जैसे चार भागों में बंटा होता है। मन्दिरों के पूजा गृह के तीन प्रकार होते हैं। पहला संधर प्रकार जो प्रदक्षिणा पथ होता है, दूसरा निरंधर प्रकार है जिसमें प्रदक्षिणा पथ नहीं होता तथा तीसरा सर्वातोभद्र जिसमें हर ओर से प्रवेश होता है। गर्भगृह में मुख्य देवता की मूर्ति की स्थापना होती रही तथा मण्डप-खम्भों पर आधारित मन्दिर के प्रवेश कक्ष का आकार उत्तरोत्तर बढता चला गया। शिखर मन्दिर का शीर्ष भाग उत्कृष्टता के साथ उत्तर भारत में निर्मित किया जाने लगा जिसे रेखा शिखर कहा गया व दक्षिण भारत में इसे विमान के नाम से जाना गया। मन्दिरों में वाहन भी बनाए गए जो अधिष्ठाता देवता की सवारी के लिए तैयार किए गए।
मन्दिरों का यह मूल स्वरूप क्रमशः स्पष्ट होता रहा। अपने आरंभिक काल में मन्दिरों का यह स्वरूप नहीं था। मौर्यकाल शिल्प और कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण काल है। मौर्य शासक अपनी स्थापत्य और वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं। राजस्थान में किए गए उत्खनन में मौर्यकालीन प्राचीन मन्दिरों के अवशेष प्रकट हुए हैं। राजस्थान में जयपुर के बैराठ जिले में ईसा पूर्व तीसरी सदी का एक गोलाकार ईंट तथा इमारती लकडी से निर्मित मन्दिर मिला है। इस मन्दिर में लकडी के छब्बीस अष्टभुजाकार स्तंभ थे तथा 23 मीटर व्यास का यह मन्दिर चूने से पलस्तर की गई ईंटों का बना था। इसका प्रवेश एक छोटी-सी ड्योडी से था जो पूर्व दिशा में थी तथा जो लकडी के दो स्तंभों पर टिकी थी व जिसके चारों ओर एक प्रदक्षिणा पथ भी था जो सात फीट चौडा था।
साँची में उत्खनन के दौरान एक मन्दिर (क्र. 40) मिला जिसकी योजना बैराठ के मन्दिर के प्रायः समान थी। पुराविदों का यह मानना है कि पत्थर से बने इस मन्दिर की अर्द्ध गोलाई वाली योजना में इसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ भी था तथा यह मन्दिर एक ऊँची आयताकार अधिष्ठान पर बनाया गया था तथा दोनों छोरों पर बनी सीढियों से इसमें प्रवेश करना संभव था। समय के साथ अब बहुत परिवर्तनों के कारण इसकी मूल रूपरेखा में परिवर्तन हो गया है तथा लकडी की संरचना भी समाप्त हो गई है।
साँची में ही ईस्वी सन् 400 में निर्मित एक मन्दिर (क्र.17) मिला है। यह एक छोटा-सा मन्दिर है जिसमें लगाए गए पत्थर छोटे हैं लेकिन व्यवस्थित पंक्तियों में हैं। छत भी पृथक है वह इसलिए ताकि ड्योडी की ऊँचाई गर्भगृह की तुलना में कम हो। इस मन्दिर में पानी की निकासी के लिए भी परनाले बनाए गए तथा चार स्तंभ निर्मित किए गए जिन पर सुंदर नक्काशी है।
एक अन्य मन्दिर (क्र.18) पत्थर से बना हुआ व अर्द्धवृत्ताकार स्वरूप में निर्मित साँची में मिला जिसका आंतरिक भाग संभवतः लकडी से बनाया गया था। इस मन्दिर का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी सदी का है। भव्य स्तंभों और भित्ति स्तंभों वाले इस वृत्ताकार मन्दिर के वर्तमान अवशेष काफी बाद की अवधि के लगभग सातवीं सदी के हैं तथा यह कहा जाता है कि इस मन्दिर में मध्यकाल तक पूजा अर्चना की जाती रही।
अपने मूल रूप में एक प्राचीन संरचनात्मक मन्दिर कर्नाटक के ऐहोल में है जो पत्थरों से बना हुआ है। मन्दिर में गर्भगृह या एक आम चौकोर कक्ष है जिसके सामने एक आच्छादित बरामदा तथा ड्योडी है जिसमें पत्थर की छत को सहारा देते चार भारी स्तंभ हैं। इस मन्दिर का निर्माण संभवतः सन् 300 से 350 ईस्वी के बीच किया गया।
ऐहोल का लडखन मन्दिर पाँचवीं सदी में निर्मित किया गया। इस मन्दिर में प्रदक्षिणा पथ इस प्रकार निर्मित किया गया ताकि वह चारों ओर दीवार से घिरा हुआ हो। अंधेरे गलियारे में प्रकाश और हवा के लिए छिद्रित जालियाँ बनाई गईं। प्रवेश द्वार की ड्योडी अपेक्षाकृत छोटी रखी गई। छत को ढलावदार बनाया गया तथा उसमें परनाले भी वर्षा के पानी की निकासी के लिए बनाए गए। गर्भगृह की छत कुछ ऊँची रखी गई। इमारत के ऊपर पहली बार बुर्ज बनाने का प्रयास किया गया जो भविष्य में निर्मित होने वाले विशाल शिखर का पूर्वज कहा जा सकता है। इसके पीछे यही कारण था कि दूर से शिखर दर्शन किए जा सकें।
इसी प्रकार ईस्वी सन् 550 में ऐहोल में एक अर्द्धवृत्ताकार दुर्गा मन्दिर निर्मित किया गया जिसमें ऊँचा मंच बनाया गया तथा लडखन मन्दिर की तरह एक अँधेरे प्रदक्षिणा पथ के स्थान पर स्तम्भों पर टिके ऐसे खुले बरामदे का निर्माण किया गया जो प्रदक्षिणा पथ का काम करता था। छिद्रित जालियों के स्थान पर मन्दिर के आसपास स्तम्भों वाले बरामदे को निर्मित किया गया था ताकि हवा व रौशनी पर्याप्त रूप से प्राप्त हो सके। इस मन्दिर में भी बुर्ज बनाया गया। स्तम्भों की पंक्ति के नीचे नक्काशी की गई। पत्थर के तिरछे टुकडों को प्रयुक्त किया गया ताकि वह कडी को दृढता प्रदान कर सके। यह निर्माण वास्तुकला की दृष्टि से क्षैतिज निर्माण था।
सारनाथ का महाबोधि मन्दिर भी दूसरी सदी ईस्वी में निर्मित हुआ जिसका चौदहवीं सदी में पुनरुद्धार हुआ जिसके कारण चारों कोनों पर भारी बुर्ज बनाए गए तथा इनके बीचों बीच एक ऊंचे मंच पर 55 मीटर का खडा बुर्ज निर्मित किया गया तथा सात मंजिला ऊंचा सीधे किनारों वाला एक पिरामिड भी बनाया गया जो स्तंभों और चैत्यों में बने हुए आलों से जुडा हुआ था। महाबोधि मन्दिर के आसपास सात समूह भी थे जिनमें से दो ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदियों के थे तथा पाँचवाँ छटवीं सदी का था जो अपनी प्रतिमाओं के कारण सुप्रसिद्ध था।
चट्टानों को काटकर दक्षिण भारत में मन्दिर बनाए गए। ये चेन्नई से लगभग पचास कि.मी. दूर निर्मित हैं तथा स्थानीय भाषा में इन्हें रथ कहा जाता है। इन्हें पाण्डवों से जोडा जाकर द्रौपदी रथ कहा गया। द्रौपदी रथ में एक चौकोर कक्ष है, लेकिन ड्योडी नहीं है। इसकी छत अपने आकार से उस बंगाली झोपडी का आभास कराती है जिसे विशेष रूप से बंगाल के विष्णुपुर में अवस्थित मन्दिरों में बनाया गया था। इन इमारतों में बाद में कुछ ऊपरी मंजिलें भी जोडी गईं तथा पिरामिड आकार के शिखर निर्मित किए गए। ऐसे रथ भी बने जिनकी लम्बी और बेलनाकार छत हाथी की पीठ (गजपृष्ठकर) की भाँति थी। ऐहोल के दुर्गा मन्दिर तथा भुवनेश्वर के वैताल देउल इसके उदाहरण हैं। द्रौपदी रथ की तरह धर्मराज रथ व अर्जुन रथ का भी निर्माण किया गया।
महाबलीपुरम में तीन मंजिला गणेश रथ का निर्माण किया गया। इसे विद्वान एक सुंदर एकाक्षमक मन्दिर मानते हैं। इसे एक योद्धा के रूप में निर्मित किया गया है। चौपहिया गाडी के समान छत के तीन छोरों के समन्वय पर स्थापित किया गया इसका कलश मानव मस्तक की भांति प्रतीत होता है जिसे त्रिशूल रूपी शिरोवस्त्र से सुसज्जित किया गया है। छत भी अलंकृत रूप से बनाई गई है जिस पर फूलदान के आकार के नौ कलश हैं जो कालांतर में गोपुरम के रूप में विकसित हुए।
समुद्र तट पर ही महाबलीपुरम का सातवीं सदी का शोर मन्दिर है। धर्मराज रथ से यह कम से कम चार गुना विशाल है। मन्दिर के इर्द गिर्द एक विशाल दीवार है जिसमें निर्धारित दूरी पर सिंह के भित्ति स्तंभ वाला पल्लव शैली का परकोटा है। इसकी बाहरी ओर की दीवार पर बैठी हुई बेलों की आकृतियाँ निर्मित की गई हैं। यह मन्दिर ऐसा प्रतीत होता है मानो समुद्र तट पर कोई समाधिस्थ योगी तन्मय होकर बैठा हो।
आठवीं सदी में उक्त मन्दिर के निर्माण के पाश्चात वहाँ के शासक राजसिंह ने काँचीपुरम के कैलाशनाथ मन्दिर का निर्माण कराया जो आकार में अधिक विशाल है तथा एक आयताकार प्रांगण में स्थित कैलाशनाथ मन्दिर के रथ जैसे दिखने वाले प्रकोष्ठों की श्रृंखला से बना है। यहाँ पल्लव शैली के सुंदर अलंकरण दिखाई देते हैं। इनमें गर्भगृह, मण्डप, प्रदक्षिणा पथ तथा एक ड्योडी विद्यमान है।
काँचीपुरम के पल्लव शासकों और शिल्पियों ने समुद्र तट पर उपलब्ध चट्टानों और शिलाखण्डों का प्रयोग किया तथा उनसे अखण्डित मन्दिर व छोटे शिलाखण्डों को काटकर सिंह, हाथी, वृषभ आदि की मूर्तियों को निर्मित किया गया।
विद्वानों का यह मानना है कि छठवीं सदी तक उत्तर और दक्षिण भारत में मन्दिर वास्तुकला की शैली लगभग समान थी लेकिन छठवीं सदी के बाद प्रत्येक क्षेत्र का भिन्न-भिन्न दिशाओं में विकास हुआ। दक्कन और ओडिशा इन दोनों क्षेत्रों में उत्तर और दक्षिण शैली के मन्दिर साथ-साथ पाए जा सकते हैं। ओडिशा में विमान व मुख्य पूजा स्थल पर निर्मित मन्दिर का बुर्ज भारतीय वास्तुकला के अन्यतम आविष्कारों में से एक है तथा विद्वान भारतीय गोपुरम की तुलना में इसे कहीं क्रियात्मक दृष्टि से अधिक परिष्कृत मानते हैं। दक्षिण भारत में जो गोपुरम मन्दिरों में निर्मित किए गए हैं वे बेलनाकार बुर्ज हैं जो गर्भगृह के ऊपर नहीं है अपितु केवल अलंकृत प्रवेश द्वार है।

भारतीय वास्तुकार वास्तव में मन्दिर के आसपास के स्मारकों को अधिक महत्त्वपूर्ण बनाना चाहता था क्योंकि मूल मन्दिर के गर्भगृह में देवता निवास करते थे। ओडिशा में शिखर का विशाल और भव्य आकार ईश्वर की दिव्य उपस्थिति का परिचायक है। जगन्नाथ मन्दिर के शिखर पर नियमित रूप से ध्वजा का चढाया जाना तथा उसका विपरीत दिशा में फहराना जगत प्रसिद्ध है। जगन्नाथ मन्दिर तथा भुवनेश्वर के लिंगराज मन्दिर के शिखर विश्वविख्यात हैं।
भुवनेश्वर के वैताल देउल का मन्दिर अद्भुत है जिसकी आकृति ढोल के आकार की है। यह आठवीं सदी में निर्मित हुआ तथा इसे शक्ति पन्थ का मन्दिर कहा जाता है। वास्तविक ढोल के आकार की छत अलंकृत है तथा क्रमानुसार कम होते हुए एक दूसरे के ऊपर रखे हुए ढाँचों पर टिकी है। यह छत प्राचीन झोपडी की छप्पर वाली छत की पाषाणी अनुकृति है। इस प्रकार की छत प्राचीनकाल से आज तक बंगाल और उसके आसपास के पूर्वी क्षेत्रों में देखी जा सकती है।
भुवनेश्वर का राजरानी मन्दिर भी वास्तुकला की एक अप्रतिम कृति है। लालित्य की उत्कृष्टता मन्दिर के जगमोहन और विमान के आकार को साथ लाकर दर्शाई गई है जिससे उसकी पूर्णता का आभास होता है। धरती से छत्ते का आकार ऊपर की ओर उठता है और उसकी एक मीनार गर्भगृह के ऊपर जाकर धीरे से मुड जाती है। मन्दिर में शिखर पर शिखर निर्मित किए गए हैं। कुछ चिन्तक मानते हैं कि हिमालय की ऊँची चोटी से प्रेरणा लेकर छोटे-छोटे शिखर इस मन्दिर में निर्मित किए गए। इसका यह भी संदेश है कि मनुष्य की आत्मा का किस प्रकार आरोहण होता है और वह सर्वशक्तिमान आत्मा से मिलने की यात्रा किस प्रकार सम्पन्न करती है। ओडिशा ही नहीं अपितु भारत के प्रत्येक क्षेत्र में निर्मित मन्दिरों के वास्तु की पृष्ठभूमि में यही दर्शन निहित है।

ओडिशा के मन्दिरों की वास्तु की विशिष्टता उनका अलंकरण है तथा दूसरी विशिष्टता जिसका ऊपर उल्लेख किया गया भारी और दिव्य शिखर हैं। भुवनेश्वर में सातवीं सदी के मध्य जो परशुरामेश्वर मन्दिर निर्मित किया गया उसके गर्भगृह के ऊपर भारी शिखर दिखाई देता है तथा नीचे सपाट छत वाले मण्डप में नर्तक-नर्तकियों तथा संगीतकारों की सुंदर मूर्तियाँ हैं।
ओडिशा में ही ब्रम्हेश्वर मन्दिर जो काफी बाद में सन् 1060 ईस्वी में निर्मित किया गया वह पंचायतन शैली का एक सुंदर मन्दिर है किन्तु इसका शिखर सहसा ही आमलक के नीचे मुडा हुआ प्रतीत होता है, जबकि राजरानी मन्दिर का शिखर अपने सौन्दर्य की दृष्टि से विलक्षण है।
ऊपर लिंगराज मन्दिर का उल्लेख किया गया है, यह 1000 ईस्वी में निर्मित किया गया था। यह 36.50 मीटर ऊंचा भव्य और विशाल मन्दिर है जिसमें गर्भगृह, विशाल कक्ष, नृत्य कक्ष तथा भेंट अर्पित करने के लिए कक्ष बने हैं। लिंगराज के आसपास अतिरिक्त पूजा स्थल भी हैं। इसके शिखर की ऊँचाई राजरानी मन्दिर के शिखर से पाँच गुना अधिक है। यह भव्यता में अद्भुत है। जगमोहन की निचली छतों की संख्या नौ और ऊपरी छतों की संख्या सात है जिन्हें हाथी, घुडसवार फौज तथा पैदल सेना को उत्कीर्ण करते हुए चित्रित किया गया है। यहाँ वास्तु के लालित्य की पराकाष्ठा है जिसमें सुन्दर स्त्रियाँ, पाश में बंधे हुए प्रेमी युगल तथा उडते हुए शेर चित्रित किए गए हैं। इस स्मारक की परिपक्व योजना इतनी सन्तुलित है कि मन्दिर का प्रत्येक भाग परिपूर्ण दिखाई देता है और इसका अद्भुत शिखर इतना मनोहर है कि उसने इस मन्दिर को भारतीय वास्तुकला की एक महान कृति के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है। यह उस समय की तकनीक का चमत्कार है कि पत्थर से इतने बडे आकार के शिखर को निर्मित कर उसके नीचे देवता को प्रतिष्ठित कर दिया गया।
भुवनेश्वर में सन् 1278 में अनन्त वासुदेव मन्दिर निर्मित किया गया। इस मन्दिर की विशेषता यह है कि यह मन्दिर एक अलंकृत चबूतरे पर खडा हुआ है तथा शैव स्थल पर वैष्णव आराधना को समर्पित यह ओडिशा का एकमात्र मन्दिर है। इसकी योजना भी लिंगराज मन्दिर के समान ही है तथा छतों के समूह यहाँ अधिक भव्य हैं। इसके गर्भगृह और जगमोहन की दीवारों पर तत्कालीन राजाओं और उनकी पत्नियों के उत्कीर्णन हैं।
न केवल ओडिशा अपितु भारतीय मन्दिरों की भव्यता का अद्भुत उदाहरण कोणार्क का सूर्य मन्दिर है जिसका निर्माण गंग शासक नरसिंह वर्मन ने सन् 1250 ईस्वी में कराया था। इस भव्य तथा विशाल मन्दिर की परिकल्पना सूर्य के रथ के रूप में की गई थी जिसे सात घोडे खींच रहे हैं तथा जिस रथ के बारह जोडी अलंकृत पहिए हैं। इस विशाल मन्दिर के अंदर एक गर्भगृह है जिसके ऊपर एक तिरछे आकार का शिखर, एक नृत्य कक्ष तथा एक जगमोहन है जो समान धुरी पर बने हैं, यहाँ तीन प्रवेश द्वार वाली एक विशाल अहाते की दीवार भी है। वर्तमान में गर्भगृह और जगमोहन दोनों एक विशाल चबूतरे पर खडे हैं तथा इन पर हाथियों के साथ अलंकरणों से भरी पूरी कामुक भंगिमाओं वाली मूर्तियाँ उत्कीर्णित हैं। यद्यपि गर्भ गृह और नृत्य कक्ष की छतें गिर चुकी हैं लेकिन जगमोहन की छत अभी विद्यमान है। यह एक विशाल छत है जिस पर तीन पंक्तियाँ हैं व आकर्षक स्त्री आकृतियाँ, करताल बजाते लोग व नर्तक यहाँ उत्कीर्णित हैं। कोणार्क का यह सूर्य मन्दिर अपने आपमें तत्कालीन स्थापत्य का सुन्दर उदाहरण है। खजुराहो की भाँति इस मन्दिर की भित्तियों पर मिथुन मूर्तियाँ अंकित हैं। यद्यपि ये मूर्तियाँ उतनी परिष्कृत नहीं हैं जितनी की खजुराहो की, किन्तु ये उसी विषय पर केन्द्रित हैं तथा पाश्चातवर्ती काल की हैं। खजुराहो की मन्दिर सरिणी का निर्माण काल नवीं से ग्यारहवीं सदी के बीच का काल है जबकि यह मन्दिर तेरहवीं सदी में निर्मित हुआ। निश्चित ही उस समय की तांत्रिक जीवनशैली का प्रभाव खजुराहो की तरह इन अंकनों पर है। इस मन्दिर का शिखर बहुत भारी था जो बाद में गिर गया। इसी तरह इसकी सूर्य मूर्तियाँ व अन्य भित्तियाँ भी भग्न हुईं, समुद्र किनारे अवस्थित होने के कारण समुद्र की क्षारीय हवाओं के प्रभाव ने भी यहाँ के शिल्प में क्षरण उत्पन्न किया किन्तु इनके बावजूद भी इस मन्दिर की भव्यता में आज भी चुंबकीय आकर्षण है।
दक्षिण भारत में पट्टादकल के महत्त्वपूर्ण मन्दिरों का निर्माण आठवीं सदी के पूर्वार्द्ध में हुआ तथा इन पर पल्लव प्रभाव स्पष्ट है। भगवान शिव के लोकेश्वर स्वरूप को समर्पित पट्टादकल का विरुपाक्ष मन्दिर जो कर्नाटक में अवस्थित है का निर्माण ईस्वी सन् 740 में राजा विक्रमादित्य की रानी ने करवाया था तथा इसे काँचीपुरम के शिल्पियों और वास्तुकारों ने निर्मित किया था इसलिए यह काँचीपुरम के कैलाशनाथ मन्दिर की अनुकृति के रूप में दिखाई देता है। इस मन्दिर की भव्यता अद्भुत है। इसमें अलग-अलग प्रदक्षिणा पथ व पूजा स्थल मण्डप बनाए गए हैं। चौकोर शिखर में काफी ऊपर उठी हुई मंजिलें निर्मित की गई हैं तथा अनेक स्तम्भ निर्मित हैं। इसका निर्माण बिना गारे के जोडे गए शिलाखण्डों से उस निर्माण पद्धति से किया गया है जो आरंभिक द्रविड शैली की निर्माण शैली थी।
दक्षिण भारत में मन्दिर वास्तुकला की जिस द्रविड शैली ने अपना विकास पाया उसका काल आठवीं सदी से तेरहवीं-चौदहवीं सदी का है।
दक्षिण भारत में बहुतायत से मन्दिर बने तथा आज भी वहाँ हजारों मन्दिर हैं व उनका निर्माण भी प्रायः सुरक्षित हैं इसका बडा कारण यह है कि दक्षिण भारत को उस प्रकार के विदेशी हमलों का सामना नहीं करना पडा जिस प्रकार का सामना उत्तर भारत के मन्दिर निर्माताओं को करना पडा। दक्षिण भारत में जो मन्दिर बने वे उस शैली के थे जो अपने आपमें पूरे नगर को समेट लेती थी। मन्दिर परिसर में अनेक अहाते जोडे जाते थे व सबसे अन्दर की ओर मुख्य मन्दिर हुआ करता था। दक्षिण भारत में जो विशालकाय मन्दिर बने उनमें वह वृहदेश्वर मन्दिर भी शामिल है जो उसी समय निर्मित हुआ जब भुवनेश्वर में राजरानी मन्दिर का निर्माण कराया गया। इस मन्दिर का शिखर पिरामिड आकार का है तथा निरंतर अवरोहात्मक मंजिलों से बना है। ज्यों-ज्यों मन्दिर में ऊपर की ओर बढते हैं वैसे-वैसे इसका आकार संकरा होता जाता है तथा इसका शीर्ष गुंबद के आकार का है। यह मन्दिर प्रायः महाबलीपुरम के तट पर बने मन्दिरों की तरह है। सम्पूर्ण मन्दिर बाहर व अंदर से सुंदर मूर्तियों से अलंकृत है। इस मन्दिर में 190 फीट ऊँचे पिरामिड के आकार के विमान में अवरोह क्रम में तेरह मण्डल हैं। यह मन्दिर 5003200 फीट के परिसर में अवस्थित है जिसमें एक गर्भगृह, विशाल कक्ष, नट मण्डप तथा स्तंभों वाला विशाल कक्ष है। यह सब एक ही धुरी पर बने हुए हैं।
एलोरा का प्रसिद्ध कैलाशनाथ मन्दिर भारतीय वास्तुशिल्प का अद्भुत उदाहरण है। एक पहाड को काटकर इस मन्दिर का निर्माण किया गया है। इसे आठवीं सदी ईस्वी के बीच राष्ट्रकूट राजा कृष्ण ने बनवाया था। इस मन्दिर में तथा महाबलीपुरम के विभिन्न मन्दिरों में साम्य है। एलोरा के मूर्तिकारों ने चट्टान के नीचे तीन खाइयों को खोदा और फिर ऊपर से लेकर नीचे तक पत्थरों को तराशना आरम्भ किया। इस मन्दिर के विभिन्न भाग हैं। प्रवेश द्वार मण्डप, विमान और मण्डप, नन्दी के लिए स्तम्भों वाला एक मन्दिर तथा शिव के बैल। यह मन्दिर बाह्य और आन्तरिक रूप से भव्य मूर्तियों के शिल्पांकन से सजाया गया है। ये शिल्प शिव-पार्वती, सीता हरण तथा रावण के पर्वत हिलाने पर केन्द्रित हैं।
मैसूर के होयसल शासकों ने बारहवीं व तेरहवीं सदी में सोमनाथपुर, बेलूर और हेलीबिद में मन्दिरों का निर्माण कराया। ये मन्दिर अपने अद्भुत शिल्प के कारण जाने जाते हैं। इनमें सोमनाथपुर का केशव मन्दिर तथा हेलीबिद व बेलूर के होयसल मन्दिर अलंकृत हैं तथा इनकी सज्जा देखते ही बनती है। इनमें वनस्पतियों व पुष्पों का सुंदर उत्कीर्णन किया गया है। कोई भी स्थान नक्काशीरहित नहीं है। विमान तारे के आकार के हैं जिनमें बहिर्गत और पुनर्प्रवेशी कोण हैं जो अलंकृत हैं। पुष्पों और लताओं के अतिरिक्त मानवाकृतियाँ तथा देवी-देवताओं की विशाल मूर्तियाँ भी हैं।
आठवीं से बारहवीं सदी के बीच भारत के उत्तरी भाग में कलात्मक गतिविधियाँ निरंतर रूप से सम्पन्न होती रहीं। पूर्वी-दक्षिण एशिया के विशाल भागों पर शासन करने वाले पाल शासकों के काल में बौद्ध तथा हिन्दू धर्म के अनेक केन्द्र स्थापित हुए। लगभग 750 ईस्वी के आसपास सत्ता सम्भालने वाले पाल शासकों ने भगवान बुद्ध के जन्म क्षेत्र मगध में जो बिहार के दक्षिणी भाग में है वहाँ पाल शैली को स्थापित किया तथा वहाँ जो प्रारंभिक बौद्ध अवशेष हैं वे इन्हीं पाल शासकों के समय के हैं। पाल-सेन शासकों के समय में अनेक धार्मिक इमारतों का निर्माण व जीर्णोद्धार हुआ किन्तु अब इस काल की वास्तुकला प्रायः विलुप्त हो गई है लेकिन विभिन्न ग्रंथों में जो संदर्भ मिलते हैं उनसे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि इस काल में सुन्दर मन्दिरों का निर्माण एक विशिष्ट शैली में किया गया होगा। वर्तमान बांग्लादेश में पहाडपुर के मन्दिरों का विशेष महत्त्व है। पहाडपुर को प्राचीनकाल में सोमपुरा कहा जाता था। आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध में या नवीं सदी के पूर्वार्द्ध में एक स्वस्तिकाकार स्तूप का निर्माण यहाँ किया गया जो उत्तर से दक्षिण तक सौ मीटर से भी अधिक लम्बा है। अहाते की दीवार में 177 अलग-अलग कक्ष हैं जो कभी इस मन्दिर का हिस्सा थे। पहाडपुर की मूर्तियों का अपना विशेष महत्त्व है।
प्राचीन मन्दिरों के अंतर्गत सन् 1059 से 1080 के बीच राजा भोज के भतीजे उद्यादित्य के द्वारा उदयपुर में एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया गया था जिसे नीलकण्ठ या उदयेश्वर मन्दिर कहते हैं। इस मन्दिर में शिखर पर एक अमलशिला अथवा गुलदान रखा गया है तथा शिखर और मण्डल दोनों सुरक्षित हैं। यह मन्दिर पिरामिडी छत, ड्योडी तथा आधार से शिखर तक जाती चार सपाट पट्टियों से अलंकृत है तथा इसके बीच के स्थान को विभिन्न अलंकरणों से अलंकृत किया गया है।
मध्यप्रदेश में निर्मित मन्दिरों में सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्र हैं खजुराहो के चन्देलकालीन मन्दिर।
खजुराहो के पुराने मन्दिरों के अवशेष लगभग 21 वर्ग किलोमीटर में खजुराहो गाँव के आसपास फैले हुए हैं। मान्यता है कि वहाँ कुल 85 मन्दिरों का निर्माण हुआ होगा जिनमें से 25 अभी भी सुरक्षित हैं। नागर शैली के ये मन्दिर भारतीय शिल्प-कला के प्रतिनिधि उदाहरण हैं।
खजुराहो के मन्दिरों के निर्माण की परम्परा हर्षदव (900-925) के समय से होती है, यों यदि जैन मन्दिरों के पुनरुद्धार से यह परम्परा जोडी जाए तो यह छठवीं-सातवीं शताब्दी से जुडती है। हर्षदेव के समय में चौंसठ योगिनी मन्दिर तथा लालगाँव महादेव के मन्दिर निर्मित हुए। हर्षदेव का उत्तराधिकारी यशोवर्मन था (925 से 950) । वह शक्तिशाली शासक था। उसने 940 ई. में कालंजर का दुर्ग राष्ट्रकूटों से जीता। खजुराहो में मिले शिलालेख के अनुसार यशोवर्मन ने एक विष्णु मन्दिर का निर्माण किया, यह मन्दिर अब लक्ष्मण मन्दिर के नाम से जाना जाता है। यशोवर्मन के पुत्र धंग (950-1002) का शासन सर्वाधिक उल्लेखनीय है। यह शक्तिशाली शासक एक महान योद्धा होने के साथ-साथ विलक्षण कलाप्रेमी था। उसके समय में विश्वनाथ तथा पार्श्वनाथ मन्दिर बनाए गए। एक शिलालेख जो 954 ई. का है, खजुराहो में मिला है जिसमें धंग की मृत्यु का वर्णन है, उसकी आयु सौ वर्ष दर्शाई गई है। धंग का पुत्र गण्ड था (1002 से 1017)। उसके काल में वैष्णव तथा सूर्य मन्दिर बने जिन्हें वर्तमान में जगदंबी तथा चित्रगुप्त मन्दिर कहा जाता है। गंड का पुत्र विद्याधर (1017 से 1026) अपने समय का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसी के समय 102 फीट ऊँचा कंदरिया महादेव का मन्दिर बनाया गया जो खजुराहो की मन्दिर सरणी का केन्द्र है।
वास्तुशास्त्र की दृष्टि से ये मन्दिर आदर्श हैं। नागर शैली (इन्डो-आर्यन) के ये उत्कृष्टतम उदाहरण हैं। सभी मन्दिर ऊँचे मंच पर बने हैं। देवतायन के अग्रभाग में अन्तराल, और फिर महामण्डप बने हैं। महामण्डप के आगे अर्द्धमण्डप हैं। देवतायन के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ हैं। इनको प्रकाशमान रखने के लिए विशाल झरोखे हैं। बाह्य आकार-प्रकार में श्रृंग, शिखर और विमान यहाँ के मन्दिरों के प्रभावकारी लक्षण हैं। खजुराहो के कुछ मन्दिर पंचायतन शैली के बने हैं। इन मन्दिरों के अलिन्द के कोनों पर चार गर्भगृह निर्मित हैं जिनमें मन्दिर के देवता के उपदेवताओं की स्थापना की गई है। कहीं-कहीं मण्डप के सामने देव वाहन के लिए एक और गर्भगृह बनाया गया है। अर्द्धमण्डप मन्दिर के बाहरी तोरणद्वार में समाप्त हो जाता है। मन्दिर के गर्भगृह में मूल प्रतिमा या शिवलिंग है। गर्भगृह के पश्चात् अर्द्धमण्डप और महामण्डप के शिखर मुख्य शिखर से क्रमशः निम्न होते चले जाते हैं। कन्दरिया महादेव में उकेरी गई अप्सराओं के विभिन्न अंकन हैं जो अलग-अलग उद्देश्यों को परिलक्षित करते हैं। गज, अश्व, वृश्चिक, वानर तथा शुक के साथ अंकित अप्सरा में पाँचों तांत्रिक शक्तियाँ, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण और बाजीकरण की प्रतीति होती है। इन मन्दिरों में उत्कीर्णित हर शिल्प का अपना संकेत और अभिप्राय है।
राजस्थान के राजपूत राजाओं ने अपने समय में वास्तु शिल्प का अद्भुत विकास किया। मारुगुर्जर वास्तुकला तथा होयसल मन्दिर वास्तुकला के बीच जुडाव को कुछ विद्वानों ने रेखांकित किया है। इस महामारु शैली को अनेक नामों से संबोधित किया गया है इसे मेदपाठ शैली भी कहा गया है। विद्वानों ने राजस्थान के स्थापत्य की दो प्रमुख शैलियों महामारु और मारुगुर्जर को रेखांकित किया है।
इस शैली का विस्तार मरु प्रदेश से लेकर आभानेरी, चित्तौड व उपरमालपट्टी तक हुआ। अपने उत्कर्ष काल में चित्तौड, आभानेरी तथा ओसियाँ में प्रमुख मन्दिर बने। ओसियाँ में प्रतिहार राजा वत्सराज के द्वारा आठवीं सदी में महावीर मन्दिर बनवाया गया जो सबसे प्राचीन जैन मन्दिर है। राजा कक्कुक ने 861 ईस्वी में घटियाला (जोधपुर) में जैन अम्बिका मन्दिर बनवाया। महामारु शैली में निर्मित अधिकांशतः मन्दिर विष्णु या सूर्य को समर्पित हैं। इनमें मोढेरा का सूर्य मन्दिर जो गुजरात में है वह इस शैली का पहला मन्दिर है। इनके अलावा चन्द्रावती के मन्दिर व देलवाडा के विमलशाह तथा तेजपाल द्वारा बनवाए गए मन्दिर भी उल्लेखनीय मन्दिर हैं। मारु-गुर्जर शैली को सोलंकी शैली भी कहा जाता है।
गुर्जर प्रतिहारकाल के अन्य मन्दिर नागदा का सास-बहू मन्दिर, खेड (बाडमेर) का रणछोडजी का मन्दिर, कैकीन्द का नीलकण्ठेश्वर मन्दिर, सीकर का हर्षनाथ मन्दिर व सिरोही का ब्रह्माणस्वामी मन्दिर प्रसिद्ध हैं। गुर्जर प्रतिहार शैली का अंतिम व सबसे भव्य मन्दिर सोमेश्वर मन्दिर है। खेडू को राजस्थान का खजुराहो भी कहा जाता है।
यह शैली मथुर शैली से प्रभावित थी। उल्लेखनीय है कि राजस्थान का प्राचीन नाम मरुदेश था तथा गुजरात को गुर्जरत्रा कहा जाता था। इन दोनों की सीमा पर स्थित श्रीमाल नगर जो जालौर या भीनमाल के नाम से भी जाना जाता है में एक राजवंश का उदय हुआ जिसका नाम गुर्जर-प्रतिहार पडा। इनके काल में जो स्थापत्य की जो दो शैलियाँ विकसित हुईं उनका नाम महामारु और मारु-गुर्जर है। प्रख्यात पुराविद श्री एम.ए. ढाकी के अनुसार महा-मारु शैली मुख्य रूप से मारवाड, साँभर, सूरसेन अथवा करौली, भरतपुर क्षेत्र जिसे गोपाल पाल के नाम स भी जाना गया तथा मेवाड के अंतिम छोर बिजौलिया और टोंक के कुछ भागों में विकसित हुई जबकि मारु-गुर्जर शैली मेदपाट अथवा मेवाड, गुर्जर देस अर्थात अर्बुदा या आबु व गुर्जर देस-अनारता व गुजरात के कुछ क्षेत्रों में पल्लवित और विकसित हुई। अधिकांश विद्वान मानते हैं कि मारु-गुर्जर मन्दिर वास्तुकला पूर्णतः पश्चिम भारतीय वह वास्तुकला है जो उत्तर भारत की वास्तुकला से भिन्न है तथा मारु-गुर्जर वास्तुकला तथा होयसल मन्दिर वास्तुकला के बीच में एक जुडाव है।
राजस्थान में आरम्भ में छोटे-छोटे मन्दिर बनाए गए जिनमें केवल एक कक्ष होता था जिसके साथ दालान जुडा रहता था। बाद में चौथी-पाँचवीं सदी में स्थापत्य का अद्भुत विकास हुआ तथा राजस्थान के इस मरु प्रदेश ने एक मौलिक स्थापत्य शैली को जन्म दिया जिसके उदाहरण चित्तौड, जालौर, बांगेहरा, गंगधार, मेनाल, चंद्रावती, बाडोली, हर्ष, अजमेर, आबू, किराडू और विश्वविख्यात ओसियाँ की मन्दिर वास्तु में दिखाई देते हैं। इन्हें चौहानों, परमारों और अन्य राजपूत वंशों के राजाओं ने निर्मित कराया। इस काल में जैन मन्दिर भी निर्मित हुए। हिन्दू और जैन मन्दिरों के निर्माण के सिद्धांत प्रायः समान थे। मन्दिरों का मुख्य संस्थापक उनकी रूपरेखा व निर्माण की योजना बनाता था तथा इस योजना का क्रियान्वयन शिल्पी, विरधाकिन, तक्षक, स्थापक व सूत्रग्राहिणी करते थे। इन सबकी अलग-अलग भूमिकाएँ होती थीं।
ऐतिहासिक रूप से मेवाड को प्राचीनकाल में शिबि जनपद के नाम से जाना जाता था। यहाँ स्थापत्य के विकास का ऋम दूसरी सदी ईसा पूर्व से भी आगे जाता है। इस क्षेत्र में प्रस्तर युग के अवशेष भी मिले हैं तथा सिंधुकालीन सभ्यता व सिंधु युग के समान्तर सरस्वती और बनास की घाटी में अनेक विकसित शहरों की लंबी परम्परा के बाद स्थापत्य के रूप में चित्तौडगढ शहर से लगभग 12 कि.मी. उत्तर में बेडच नदी तट पर ईसा पूर्व पाँचवीं सदी के आसपास बसे एक नगर मझिमिका या मध्यमिका के अवशेष मिले हैं जिनमें ऊभ-दीवल (दीप स्तंभ) तथा हाथीबाडा (नारायण वाटक) मिलता है। इस उत्खनन का श्रेय प्रो. डी.आर. भण्डारकर को जाता है। इन प्राचीनतम अवशेषों के बाद दूसरी सदी ईसा पूर्व में प्रतापगढ के पास अवलेश्वर में पवन के पुत्र सारिकुल के उत्तर दिशा के रक्षक भगवान विष्णु को समर्पित मन्दिर तथा कीर्ति स्तम्भ से सम्बन्धित एक अभिलेख भी मिला है तथा यह सम्पूर्ण श्रृंखला सोलहवीं सदी में उदयपुर में बने जगदीश मन्दिर जो भगवान विष्णु को समर्पित है पर विराम पाती है। स्थापत्य की ऐसी निरंतरता का स्वरूप विजयनगर में मिलता है।
चित्तौडगढ के दीप स्तंभ (ऊभ-दीवल) के सम्बन्ध में ऐतिहासिक अध्ययन सन् 1872 में एक ब्रिटिश अधिकारी ए.एल.सी. कार्लायल ने किया। मेवाड के प्रख्यात इतिहासकार कविराज श्यामलदास ने इन दो प्रमुख निर्माणों की जानकारी दी है। कहा जाता है कि जब अकबर चित्तौड पर चढाई करने के लिए आया, तो उसने नारायण वाटक को हाथी बांधने के काम में लिया तथा इसी कारण इस चतुर्भुजाकार निर्माण को हाथीबाडा के नाम से जाना जाने लगा जिसकी लम्बाई 88.35 मीटर तथा चौडाई 44.20 मीटर है। इसमें प्रवेश करने के लिए दक्षिण दीवार पर विशाल पत्थरों से बनी एक आकृति है। पत्थर पॉलिश किए हुए हैं तथा वे पिरामिड के आकार में संयोजित हैं। ऊभ-दीवल हाथीबाडा से 2 कि.मी. दूर अवस्थित है जिसका आधार भाग 4.44 मीटर लम्बा और 4.36 मीटर चौडा है। इसके निर्माण में भी धूसर रंग के पॉलिश वाले पत्थरों को उपयोग में लाया गया है तथा बीस तहों में पत्थर एक-दूसरे के ऊपर जमाए गए हैं। शिखर का पत्थर जमीन पर पडा है। डॉ. भण्डारकर का मानना है कि कभी यह स्थान भी हाथीबाडा के पास ही था, लेकिन जब हाथियों को बाँधने के लिए ऊभ-दीवल बाधा बना, तो इसे हटाकर वर्तमान स्थान पर स्थापित कर दिया। ऊभ-दीवल वास्तव में नारायण वाटक में स्थापित वासुदेव संकर्षण के मन्दिर से जुडा हुआ था। इसका प्रमाण वह गरुड है जो शीर्ष के पत्थर पर निर्मित है। इस स्थानीय भाषा में अज्ञानतावश ऊभ-दीवल कहा जाता है, जबकि गरुड की मूर्ति का अंकन यह स्पष्ट करता है कि यह मन्दिर की गरुड ध्वजा रही होगी।
घोसुंडी में जो अभिलेख मिला है उसे हाथीबाडा शिलालेख भी कहते हैं जिसका उल्लेख पूर्व में किया गया है, यह ब्राह्मी लिपि में संस्कृत के प्राचीन शिलालेखों में से एक है जो वैष्णव धर्म से सम्बन्धित है। यह चित्तौड के निकट घोसुंडी गाँव से प्राप्त हुआ था। यह कई शिलाखण्डों में टूटा हुआ है जिसके कुछ टुकडे ही उपलब्ध हो सके हैं। इसे सर्वप्रथम डॉ.भण्डारकर ने पढा था। इसमें भागवत की पूजा के निमित्त शिला प्राकार बनाए जाने का तथा संकर्षण और वासुदेव के पूजागृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने व गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का उल्लेख है।
राजस्थान में ही उदयपुर-सिरोही राजमार्ग पर कुण्डा गाँव के निकट कठडावन स्थित कैटभरिपु (विष्णु मन्दिर) से भी एक अभिलेख प्राप्त हुआ है जो 661 ईस्वी का है। यह मन्दिर भी मारु-गुर्जर शैली के आरंभिक मन्दिरों में से एक है। इस अभिलेख के अनुसार अपराजित के सेनापति वैरिसिंह की धर्मपत्नी यशोमति ने संसार रूपी सागर को पार करने के लिए इस मन्दिर का निर्माण कराया था। वह भगवान कृष्ण की भक्त थी इसी कारण इस अभिलेख में विष्णु के कृष्ण स्वरूप का बार-बार वर्णन किया गया है। इस अभिलेख की रचना ब्रम्हचारी के पुत्र दामोदर ने की तथा यशोभट पुत्र वत्स ने इसे उत्कीर्ण किया। यह कुटिल लिपि में लिखा गया है जिसकी भाषा संस्कृत है। यह अभिलेख अभी राजकीय संग्रहालय उदयपुर में संरक्षित है। जहाँ मन्दिर बना हुआ है उसके पीछे एक प्राचीन नगर के बसे होने के भी प्रमाण मिलते हैं।
यह विष्णु मन्दिर पंचायतन, छाजनदार शैली में निर्मित किया गया है जिसमें भूमि से लगभग तेईस सीढियाँ चढने के बाद मुख्य चौक आ जाता है। चौक से मन्दिर के सभा मण्डप में प्रवेश के लिए एक षटकोणीय जगती बनी हुई है जो सीढियों वाली है। यह मन्दिर विशाल है तथा तलछन्द, विस्तार, सभा मण्डप, कोली तथा गर्भगृह में विभक्त है। इनके साथ ही उध्वछन्द विस्तार जगती, वेदिका, कक्षासन पीठ, मण्डोवर, शिखर तथा आमलक भी निर्मित हैं। जगती की ऊँचाई 12.5 फीट, लम्बाई 100 फीट तथा चौडाई 66 फीट है। जगती के दाहिने भाग में अवस्थित एक शिला पर विऋम संवत् 1393 लिखा हुआ है जिससे ज्ञात होता है कि या तो इस वर्ष में यहाँ कोई बडा आयोजन हुआ होगा अथवा मन्दिर का जीर्णोद्धार हुआ होगा। मन्दिर में जो सभा मण्डप निर्मित है उसके सामने गरुड की प्रतिमा के लिए भी एक मण्डप बना हुआ है। मन्दिर की चारों दिशाओं में चार देवकुलिकाएँ बनी हैं जिनमें से दक्षिण पूर्वी कोने की देवकुलिका में भगवान विष्णु, उत्तर-पूर्व की देवकुलिका में गणेश, दक्षिण-पश्चिम की देवकुलिका में भगवान सूर्य तथा उत्तर-पश्चिम की देवकुलिका में माँ दुर्गा विराजित हैं। मन्दिर के पीछे के भाग में एक कुण्ड भी निर्मित है। सभा मण्डप सोलह खम्भों में टिका हुआ है तथा सभा मण्डप की छत पर बारह छोटी-बडी प्रतिमाएँ बनी हुई हैं। इन प्रतिमाओं में आकृतियाँ, बाँसुरी, मृदंग व सितार बजाते हुए उत्कीर्णित हैं। मन्दिर के गर्भगृह की विशाल जगती पर काले पत्थर से बनी स्थानक मुद्रा में भगवान विष्णु की सुन्दर मूर्ति स्थापित है। प्रतिमा के दोनों ओर दो छोटी प्रतिमाएँ हैं तथा चतुर्भुज विष्णु की एक संगमरमर से बनी मूर्ति भी मुख्य प्रतिमा के पास रखी हुई है। विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि द्वार की शाखा पर नाभि पुष्पित अलंकरण से सज्जित यक्ष की प्रतिमा मेवाड के शिल्प पर मथुरा शैली के प्रभाव को प्रदर्शित करती है। गर्भगृह के द्वार के स्तम्भ पर एक लेख उत्कीर्ण है। इस पर इसके सूत्राधार रामाजी सुतार, देवा सुतार तथा रूपनाथ अंकित हैं। मन्दिर का शिखर ईंटों से बनाया हुआ है। इस मन्दिर के वास्तु तथा स्थापत्य के सम्बन्ध में उक्त विशेष वर्णन श्री विवेक भटनागर के द्वारा किया गया है जिससे यह स्पष्ट होता है कि उस काल में राजस्थान का वास्तु शिल्प उन्नत था व अभिलेख पर जो अक्षर उत्कीर्ण हैं उनसे यह स्पष्ट होता है कि उस काल में मेवाड क्षेत्र में उत्कीर्णन की कला अपने शिखर पर थी।
राजस्थान में अनेक मन्दिर बने, किन्तु महाराणा कुंभा ने ईस्वी सन् 1449 में चित्तौडगढ दुर्ग पर एक महान स्मारक बनवाया था। यह वास्तव में भगवान विष्णु को समर्पित एक मन्दिर ही था। कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि यह किसी विजय के स्वरूप निर्मित हुआ जबकि अनेक इतिहासकार कहते हैं कि यह किसी विजय के फलस्वरूप निर्मित नहीं किया गया। इसकी प्रत्येक मंजिल पर हिन्दू देवी-देवताओं का दुर्लभ संग्रहालय है। इसे कीर्ति स्तंभ भी कहा जाता है व जैन स्तंभ के रूप में भी इसकी मान्यता है। बारह फीट ऊँची और बयालीस फीट चौडी वेदी पर यह स्थित है तथा इसका मध्य भाग चौरस है। यह विभिन्न कालखण्डों में निर्मित किया गया है। विऋम संवत् 1510 के शिलालेखों में सूत्रधार पोमा का उल्लेख है। एक और सूत्राधार जईता के साथ-साथ उसके पुत्र नापाभूम, चूथी आदि का उल्लेख है। विक्रम संवत् 1515 के एक शिलालेख के अनुसार महाराणा के द्वारा इस कीर्ति स्तंभ का निर्माण किया जाना ज्ञात होता है व यह भी ज्ञात होता है कि अन्य निर्माण कार्य जैसे मुख्य द्वार, राणा पाली व कुंभश्याम मन्दिर भी इसी जईता परिवार ने बनाया था तथा यह निर्माण विक्रम संवत् 1517 तक होता रहा।
यहाँ इतनी मूर्तियाँ हैं कि यह हिन्दू देवी-देवताओं का संग्रहालय प्रतीत होता है। इसके प्रवेश द्वार पर चतुर्भुजी जनार्दन की मूर्ति है जिनके दो हाथ खण्डित हैं। मूर्ति पद्मासन की मुद्रा में है। प्रथम मंजिल के पार्श्व के ताकों में क्रमशः अनन्त रुद्र तथा ब्रह्मा की मूर्तियाँ हैं। अनन्त विष्णु स्वरूप हैं। यह मूर्ति पद्मासन में स्थित है। इसके भी दो हाथ खण्डित हैं। रुद्र की चार हाथों वाली व ब्रह्मा की चार भुजा वाली मूर्ति भी इस मंजिल पर है।
दूसरी मंजिल के तीनों पार्श्वों के ताकों में हरिहर अर्थात् आधे विष्णु व आधे शिव, अर्द्धनारीश्वर अर्थात् आधे शिव व आधी पार्वती तथा हरिहर पितामह अर्थात् विष्णु, शिव व ब्रह्मा, इन तीनों देवताओं की सम्मिलित मूर्तियाँ हैं। इनके अलावा अग्नि, यम, भैरव, वरुण, इन्द्र, ईशान व धनद दिग्पालों की मूर्तियाँ भी बनाई गई हैं। उस समय त्रिपुरुष देवमत भी प्रचलित था जिसके अन्तर्गत छह हाथों वाली प्रतिमा निर्मित की जाती थी। इस प्रतिमा के एक ओर के तीन हाथों में त्रिशूल, चऋ और वेद तथा दूसरी ओर के हाथों में शंख, कमण्डल और एक खण्डित वस्तु है। इस प्रतिमा के दोनों ओर कर्पूर, मंजरी तथा मालाधारी की प्रतिमा है व एक इन्द्र की भी प्रतिमा है।
तीसरी मंजिल के तीनों ताकों में विरंचि, जयन्त, नारायण और चन्द्रार्क व पितामह की खण्डित मूर्तियाँ हैं। चन्द्रार्क पितामह की प्रतिमा में छह हाथ हैं।
चौथी मंजिल में देवी की मूर्तियाँ हैं। प्रत्येक पार्श्व में पहले पैनल में तीन, दूसरे में पांच तथा तीसरे में तीन मूर्तियाँ हैं। इसी तरह दूसरे व तीसरे पार्श्व में भी अनेक मूर्तियाँ हैं। इन मूर्तियों में गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी नदियों की, बसंत, शिशिर, हेमन्त, शरद, वर्षा व ग्रीष्म ऋतुओं की मूर्तियों सहित गन्धर्व, विश्वकर्मा, कार्तिकेय आदि की मूर्तियों के साथ त्रिखण्डा, तोतला, त्रिपुरा लक्ष्मी, उमा, पार्वती, गौरी, हिंगुलाज, हिमवती, नंदा, ललिता, लीलावर्ती, क्षेमकरी आदि देवों की मूर्तियाँ हैं।
पाँचवीं मंजिल के तीनों ताकों के बीच के ताकों में क्रमशः लक्ष्मीनारायण, उमा महेश्वर व ब्रह्मा-सावित्री की युगल मूर्तियाँ हैं। इनके बीच में रिक्त स्थानों पर हल, चक्र, तूण, परशु व त्रिशूल निर्मित हैं। विभिन्न शस्त्र जैसे मृणाल, भुशण्डी, अंकुश, शंकु, फलक, छुरिका, डण्ड, भिण्डि आदि उत्कीर्णित हैं। इनके नीचे मूर्तियों की एक पंक्ति है जिसमें रुद्रलिंग, शिवलिंग, कर्पूर मंजरी, हनुमान, सीता, राम-लक्ष्मण, सुग्रीव, पाण्डव आदि उत्कीर्णित हैं।
छठवीं मंजिल के तीनों पार्श्वो के मध्य ताकों में क्रमशः महासरस्वती, महालक्ष्मी व महाकाली की मूर्तियाँ हैं तथा बीच के रिक्त स्थानों में तपस्वी, आग्नेय, वेणिक, सेविका, सावित्री, ब्रह्मा, गायत्री, भैरव, गणेश, कार्तिकेय, शिव आदि की प्रतिमाएँ हैं।
सातवीं मंजिल की सीढियों के ऊपर के भाग में किन्नर युग्म बना है। इस मंजिल में नृसिंह, वाराह, वामन, परशुराम, बलदेव, बुद्ध जैसे विष्णु अवतारों की मूर्तियाँ बनी हैं।
आठवीं मंजिल तक आते-आते सीढियाँ समाप्त हो जाती हैं। आठवीं मंजिल पर गर्भ भाग मध्य में होने से कोई मूर्ति नहीं है। यहाँ चारों स्तंभ बने हुए हैं। नवीं मंजिल पर गुम्बद बना था किन्तु अब वह विद्यमान नहीं है।
प्रख्यात इतिहासकार गौरीशंकर हीरानन्द ओझा को एक प्रशस्ति की नकल मिली थी जिसमें महाराणा हमीर से महाराणा मोकल तक का वर्णन था।
मन्दिर निर्माण की मुख्य नागर, द्रविड, बेसर और पंचायतन तथा भूमिज शैलियों सहित स्थानीय स्थापत्य की शैलियों के समन्वय से देश के प्रत्येक भाग में मन्दिर बने। इन शैलियों की अनेक उपशैलियाँ जन्मीं। मन्दिरों में प्रदिक्षणा पथ व प्रवेश द्वारों के आधार पर संधार, निरंधार व सर्वतोभद्र शैलियों का जन्म हुआ। उत्तरभारत में नागर और दक्षिण भारत में द्रविड शैली में प्रमुखता से मन्दिर बने।
छटवीं शताब्दी तक उत्तर और दक्षिण भारत में मन्दिर वास्तुकला शैली लगभग एक समान थी लेकिन छटवीं शताब्दी ईसा के बाद प्रत्येक क्षेत्र का भिन्न-भिन्न दिशाओं में विकास हुआ। आगे के काल में ब्राम्हण हिन्दू धर्म के मन्दिरों के निर्माण में तीन प्रकार की शैलियाँ नागर, द्रविड ओर बेसर का प्रयोग किया गया। इन्हें राजवंशों के अनुसार शैलियों और उपशैलियों के ऋम में निम्नवत रूप से विद्वानों ने वर्गीकृत किया है।


जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है मन्दिर स्थापत्य की प्रमुख शैलियाँ नागर, द्रविड व बेसर हैं। इन शैलियों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत हैं।
नागर शैली
नागर शैली का प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वतमाला तक है। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बीजापुर तक और पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगाल तक था अर्थात इसकी परिधि में पूर्वी भारत, मध्य भारत तथा विशेष रूप से उत्तर भारत के मन्दिर आते हैं। नागर शैली की निम्नांकित विशेषताएँ हैं:
यह एक संरचनात्मक मन्दिर स्थापत्य की शैली है जिसे आठवीं से तेरहवीं सदी के बीच उत्तर भारत में मौजूद शासक वंशों ने पर्याप्त संरक्षण दिया।

इस शैली में समतल छत से उठती हुई शिखर की प्रधानता पाई जाती है। इसे अनुप्रस्थिका एवं उत्थापन समन्वय भी कहा जाता है।
इस शैली के सबसे पुराने उदाहरण देवगढ के दशावतार मन्दिर तथा कानपुर के भीतरगाँव के ईंट निर्मित मन्दिर में मिलते हैं।
नागर शैली की दो बडी विशेषताएँ हैं, एक है इसकी विशिष्ट योजना तथा दूसरा विमान।
इन मन्दिरों की भूमि आयताकार होती है जिसमें बीच के दोनों ओर क्रमिक विमान होते हैं जिसके कारण इसका पूरा आकार तिकोना हो जाता है। यदि दोनों पार्श्वों में एक-एक विमान होता है तो वह त्रिरथ कहलाता है। दो-दो विमानों वाले मध्य भाग को सप्तरथ और चार-चार विमानों वाले भाग को नवरथ कहते हैं। ये विमान मध्य भाग से लेकर मन्दिर की अन्तिम ऊँचाई तक बनाए जाते हैं।
मन्दिर के सबसे ऊपर शिखर होता है। नागर मन्दिर के शिखर को रेखा शिखर भी कहते हैं।
नागर शैली के मन्दिर में दो भवन होते हैं, एक गर्भगृह और दूसरा मण्डप। गर्भगृह ऊँचा होता है और मण्डप छोटा होता है। गर्भगृह सबसे ऊँचे शिखर के एकदम नीचे बनाया जाता है।
गर्भगृह के ऊपर एक घण्टाकार संरचना होती है जिससे मन्दिर की ऊंचाई बढ जाती है।
नागर शैली के मन्दिरों में चार कक्ष होते हैं, गर्भगृह, जगमोहन, नाट्य मन्दिर और भोग मन्दिर।
आरंभिक नागर शैली के मन्दिरों में स्तंभ नहीं होते थे लेकिन आठवीं सदी तक आते-आते अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नए लक्षण भी प्रगट हुए। फिर भी तिकोनी आधार भूमि और नीचे से ऊपर घटता हुआ शिखर का आकार सभी जगह प्रायः एक सा रहा।
भुवनेश्वर में स्थित लिंगराज मन्दिर इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
नागर शैली के मन्दिर आधार से शिखर तक चतुष्कोणीय होते हैं।
ये मन्दिर आठ भागों में बांटे गए हैं, जो इस प्रकार हैं: मूल (आधार), गर्भगृह मसरक (नींव और दीवारों के बीच का भाग), जंघा (दीवार), कपोत (कार्निस), शिखर, गल (गर्दन), वर्तुलाकार आमलक और कुंभ (शूल सहित कलश)।
मन्दिर के चबूतरे पर चढने के लिए चारों ओर सीढियाँ होती हैं।
नागर शैली में दक्षिण भारतीय या द्रविड शैली के विपरीत कोई चार दीवारी या दरवाजे नहीं होते।
नागर शैली के वास्तुरूप में ऐसे भवनों को माना जाता है जो अधिक चौडे और ऊँचाई में कुछ छोटे होते हैं। नागर शैली की एक उपशैली वलभी भी है। इस श्रेणी के वर्गाकार मन्दिरों में मेहराबदार छतों से शिखर का निर्माण होता है।
नागर शैली के अंतर्गत पंचायतन शैली भी आती है। पंचायनत शैली में मुख्य देवालय एक वर्गाकार वेदी पर तथा चार कोनों में चार छोटे सहायक देवालय होते हैं। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण देवगढ का दशावतार मन्दिर है। प्रारंभिक चरण में मन्दिर की छतें सपाट तथा मन्दिर का आधार कम ऊँचा होता था जिसका विकास कालांतर में हुआ। देवगढ का यह मन्दिर छटवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में बनाया गया था अर्थात् यह मन्दिर साँची और उदयगिरि (मध्यप्रदेश) के छोटे मन्दिरों के लगभग सौ साल बाद बना था इसलिए इसे गुप्तकालीन मन्दिर स्थापत्य का एक श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। यह मन्दिर पंचायतन शैली में निर्मित है जिसके अनुसार मुख्य देवालय को एक वर्गाकार वेदी पर बनाया जाता है तथा चार कोनों में चार छोटे सहायक देवालय बनाए जाते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर पाँच छोटे-बडे देवालय बनाए जाते हैं इसीलिए इस शैली को पंचायतन शैली कहा जाता है। इसका शिखर भी ऊँचा और वऋरेखीय है इसलिए यह मन्दिर नागर शैली का आरंभिक उदाहरण है। यह मन्दिर पश्चिमाभिमुख मन्दिर है। इसके बायें कोने पर गंगा और दायें कोने पर यमुना है। यह भी नागर शैली के मन्दिरों की विशिष्टता है जो तिगवा व ग्यारसपुर के मन्दिरों में भी दिखाई देती है। इस मन्दिर में परिऋमा दक्षिण से पश्चिम की ओर की जाती थी जबकि आजकल प्रदक्षिणा दक्षिणावर्त की जाती है। आजकल अधिकांश मन्दिरों का मुख भी पूर्व या उत्तर की ओर बनाया जाता है।
जैसा कि पूर्व में इंगित किया गया है बाद के काल में नागर शैली के मन्दिरों की विशेषताओं में व्यापक परिवर्तन हुए। भगवान विष्णु को समर्पित खजुराहो का दसवीं सदी में बना लक्ष्मण मन्दिर भी नागर शैली का मन्दिर है, किन्तु यह मन्दिर देवगढ के मन्दिर से अलग प्रकार का है।
मध्यकालीन भारतीय मन्दिरों की स्थापत्य की नागर शैली की पराकाष्ठा कंदरिया महादेव के खजुराहो के मन्दिर में है। पश्चिम भारत के राजस्थान व गुजरात तथा पूर्वी भारत के बंगाल, आसाम और ओडिशा में नागर शैली के अपनी देशज विशिष्टताओं को समाहित किए मन्दिर बनाए गए। ओडिशा का भव्य कोणार्क का सूर्य मन्दिर तेरहवीं सदी में बनाया गया था। इसका भारी भरकम शिखर उन्नीसवीं सदी में धराशायी हो गया। मन्दिर का विस्तृत संकुल एक चौकोर परिसर के भीतर अवस्थित था उसमें से अब जगमोहन यानी नृत्य मण्डप ही बचा है अब इस तक भी नहीं पहुँचा जा सकता, लेकिन कहा जाता है कि यह मण्डप हिन्दू वास्तुकला में सबसे घिरा हुआ अहाता है। यह सूर्य मन्दिर एक ऊँची वेदी पर बना हुआ है जिसकी दीवारों पर आलंकारिक उत्कीर्णन है। इनमें बडे-बडे पहियों के बारह जोडे हैं। इस मन्दिर की संकल्पना के अनुसार सूर्य सात घोडों के द्वारा खींचे जा रहे रथ पर सवार होते हैं। इस अवधारणा के आधार पर बनाए गए इस मन्दिर का आकार शोभायात्रा में खींचे जा रहे विशाल रथ जैसा प्रतीत होता है।
बंगाल में बने टैराकोटा मन्दिर इन अर्थों में विशिष्ट हैं कि उनका स्थापत्य उस अंचल की ऐतिहासिक घटनाओं तथा वातावरण पर आधारित है। मूर्ति भंजकों के भय से ग्रामीण अंचलों में फूस की झोपडियों में मूर्तियों को स्थापित कर दिया गया और फिर इन झोपडियों की दीवारों को टेराकोटा के अलंकृत फलकों से सजाया जाने लगा। धीरे धीरे यह एक नई स्थापत्य शैली बन गई जिसे चाला शैली कहा गया। फूस की झोपडी की ढालू छतों को बांग्ला में चाला कहा जाता है। अधिकतर मन्दिरों में चारों दिशाओं में इस प्रकार की ढालू छतें बनाई गईं जिन्हें चारचाला कहा गया, दो मंजिलो वाले मन्दिरों में आठचाला, तीन परतों में बनी छत बाराचाला और दो दिशाओं में बनी छत वाली शैली दोचाला कहलाई तथा जब दो संरचनाओं को आपस में जोड दिया गया तो उसे जोरबांगला कहा गया। इन शैलियों के जो मन्दिर बने उनके शिखर रत्न कहे गए। इन रत्नों की संख्या के आधार पर इनका वर्गीकरण हुआ जैसे एकरत्न, पंचरत्न, नौरत्न। वर्धमान के कलना में पच्चीस रत्नों का भी कृष्ण मन्दिर निर्मित हुआ। ओडिशा की तत्समय प्रचलित शैली के सामंजस्य से रेख देउल स्थापत्य शैली के भी टेराकोटा मन्दिर बनवाए गए। कृष्ण भक्ति की धारा में डूबे मल्ल राजा वीर हरवीर ने पिरामिडनुमा रासमंच का भी निर्माण 17वीं सदी में करवाया जहाँ कृष्ण मूर्तियों की सामूहिक पूजा की जाती थी। कृष्ण भक्ति में डूबे शिल्पियों ने उस समय न केवल बिशनपुर अपितु चंदननगर से लेकर सियुरी तक में इन मन्दिरों का निर्माण किया।
पंचायतन शैली के आरंभिक मन्दिरों में ओसियाँ का हरिहर मन्दिर व बाडौली का शिव मन्दिर है।
इसी प्रकार पहाडी क्षेत्र कुमाउं, गढवाल, हिमाचल और कश्मीर की पहाडियों में वास्तुकला का एक अनोखा रूप विकसित हुआ।
नागर शैली का उदाहरण कोणार्क का कालापगोडा नामक सूर्य मन्दिर है जिसका उल्लेख किया गया है। इसका निर्माण केसरी कुल के राजा नरसिंह ने 1240 ई. से 1280 ई. के मध्य कराया था। खजुराहो के मन्दिर इस शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
नागर शैली के आरंभिक गुप्तकालीन मन्दिरों में गंगाधार (झालावाड) का विष्णु मन्दिर जो 480 ईस्वी में महाराज विश्ववर्मन के मंत्री मयूराक्ष ने बनवाया वह प्रसिद्ध है। इसमें डाकिनी से युक्त मातृका मन्दिर भी प्रसिद्ध है।
भमर माता का मन्दिर भी गुप्तकालीन है जो 547 ईस्वी में बना। छटवीं सदी का ही मनोरथ स्वामी मन्दिर चित्तौड तथा चारचोमा मन्दिर कोटा जो शिव मन्दिर है तथा मुकन्दरा का शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।
छटवीं-सातवीं सदी में मन्दिरों की नागर शैली में अनेक परिवर्तन भी हुए तथा पर्वताकार मन्दिरों का निर्माण किया गया। इनका स्वरूप भी रथों के आकार का रखा गया।
द्रविड शैली
कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड शैली के मन्दिर पाए जाते हैं। यह शैली आठवीं से अठारहवीं सदी तक बनी रही।
पल्लवों के काल में इसका जन्म हुआ, चोल काल में इसने अपने उत्कर्ष को छुआ तथा विजयनगर काल के बाद से इसका ह्रास हो गया।
द्रविड शैली के प्रमुख मन्दिर तंजौर, मदुरई, कांची, हम्पी व विजयनगर के मन्दिर हैं। ईसा की सातवीं सदी में जन्मी इस शैली में मामल्लपुरम के सप्तपगोडा मन्दिर वे आरंभिक मन्दिर हैं जिनका निर्माण पल्लव नरेशों ने कराया था। कैलाशनाथ का मन्दिर, वृहदेश्वर मन्दिर तथा पेरुमल मन्दिर द्रविड शैली के प्रमुख मन्दिर हैं।

चोल काल में द्रविड शैली की वास्तुकला में मूर्तिकला और चित्रकला का संगम हुआ।
तंजौर का वृहदेश्वर मन्दिर जो चोल शासक राजराजा के द्वारा निर्मित कराया गया वह एक हजार वर्षों से इस शैली का प्रतिनिधि उदाहरण है। यह एक भव्य मन्दिर है जो भुवनेश्वर के राजरानी मन्दिर का समकालीन है। इस मन्दिर का पिरामिडी शिखर निरंतर अवरोहात्मक मंजिलों से बना है जो कि ऊपर की ओर बढते हुए संकरा होता जाता है। इनका शीर्ष गुम्बदाकार है। कई मायनों में महाबलीपुरम के तट पर बने मन्दिरों की भांति इसमें एक गर्भगृह, विशाल कक्ष, स्तंभों वाला बडा कक्ष तथा एक नट मण्डप है और ये सभी एक ही धुरी पर बने हुए हैं। यह मन्दिर 500म200 फीट के परिसर में बना है। 190 फीट ऊँचे पिरामिडी विमान में अवरोहात्मक क्रम में 13 मण्डल हैं तथा इसकी परिकल्पना इस प्रकार की गई है कि दिन के किसी भी समय इसके शिखर की परछाईं मन्दिर के आधार के बाहर न पडे।
इस शैली की विशेषता गोपुरम का होना है। गोपुरम एक आयताकार चतुष्कोण है जिसका आकार कभी-कभी चौकोर भी होता है। इसके बीच से एक मार्ग और उत्तर भारत से भिन्न यह प्रवेश द्वार पर स्थित होता है। गोपुरम के प्रवेश द्वार की उत्पत्ति संभवतः साँची और भरहुत के शिल्प से होने का विद्वान अनुमान लगाते हैं। ये गोपुरम विशाल हुआ करते थे जिनमें किसी किसी की नौ से लेकर ग्यारह मंजिलें होती थीं। चिदंबरम के गोपुरम में भरतनाट्यम की नृत्य मुद्राओं को शिल्प श्रृंखला के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। रात के समय गोपुरम के शिखर की प्रत्येक मंजिल को प्रज्वलित किया जाता था जो प्रकाश के संकेत दीप का काम करती थी। सबसे ऊँचे गोपुरम का शिखर नवीनतम था जैसा मदुरई के मीनाक्षी मन्दिर के गोपुरम में है। इसकी मीनारों पर चढकर नक्काशी देखी जा सकती थी।
द्रविड शैली के अंतर्गत नायक शैली का विकास हुआ जिसका उदाहरण है मदुराई का मीनाक्षी मन्दिर, श्रीरंगम का रंगनाथ मन्दिर व रामेश्वरम का रामेश्वर मन्दिर।
द्रविड शैली की प्रमुख विशेषता यह है कि इसका विकास दक्षिण भारत में हुआ। इसमें मन्दिर का आधारभाग वर्गाकार होता है तथा गर्भगृह के ऊपर का भाग पिरामिडनुमा होता है जिसमें अनेक मंजिलें होती हैं।
इस शैली के मन्दिरों की प्रमुख विशेषता यह है कि ये काफी ऊँचे तथा विशाल प्राँगण से जुडे होते हैं। प्राँगण में अनेक मन्दिर तथा कक्ष तथा जलकुण्ड होते हैं। प्राँगण का प्रवेश द्वार गोपुरम कहलाता है। चोल काल के मन्दिर द्रविड शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
नागर शैली के मन्दिर आमतौर पर ऊँची कुर्सी (प्लिंथ) पर बनाए जाते हैं। इसके विपरीत द्रविड मन्दिर चारों ओर एक चारदीवारी से घिरा होता है जिसके बीच में प्रवेश द्वार होते हैं जिन्हें गोपुरम कहते हैं। मन्दिर के गुम्बद का रूप जिसे तमिलनाडु में विमान कहा जाता है मुख्यतः एक सीढीदार पिरामिड की तरह होता है जो ऊपर की ओर ज्यामितीय रूप से उठा होता है न कि उत्तर भारत के मन्दिरों की तरह मोडदार शिखर के रूप में।
दक्षिण भारतीय मन्दिरों में शिखर मुकुट की तरह होता है जिसकी आकृति एक छोटी स्तूपिका या एक अष्टभुजी गुमटी होती है। यह उतने ही क्षेत्र में बनाया जाता है, जितने क्षेत्र में उत्तर भारतीय मन्दिरों में एक आमलक या कलश होता है।
उत्तर भारत के मन्दिरों में प्रायः मिथुनों या गंगा-यमुना की प्रतिमाएँ होती हैं, जबकि दक्षिण भारत के मन्दिरों में भयानक द्वारपाल खडे किए जाते हैं। इन मन्दिरों के परिसर में कोई बडा जलाशय भी होता है।
दक्षिण भारत के मन्दिरों के गुम्बद उत्तर भारत के मन्दिरों के कई छोटे-बडे शिखरों की तरह नहीं होते। मन्दिर के सबसे मुख्य मन्दिर जिसमें गर्भगृह बना होता है, जिसका गुम्बद सबसे छोटा होता है।
जिस तरह नागर मन्दिरों की कई उपशैलियाँ होती हैं उसी प्रकार द्रविड मन्दिरों की भी कई उपशैलियाँ हैं। इनकी मूल आकृतियाँ पांच प्रकार की होती हैं - वर्गाकार, आयताकार, अण्डाकार, वृत्त और अष्टास्त्र।
पल्लव वंश दक्षिण भारत का एक पुराना राजवंश था। वे ईसा की दूसरी सदी से ही आन्ध्रप्रदेश में सक्रिय रहे थे और फिर दक्षिण की ओर आगे बढकर तमिलनाडु में बस गए। ये यद्यपि शैव थे, किन्तु उन्होंने वैष्णव मन्दिर भी बनवाए।
द्रविड शैली के कुछ मन्दिर उत्तर भारत और मध्य भारत में भी पाए गए हैं जैसे लाइखान का पार्वती मन्दिर तथा एहोल के कौन्ठगुडि और मेगुती मन्दिर।
द्रविड मदिरों में विमानों के ऊपर मूर्तियाँ बनाईं जाती हैं जिनकी संख्या बाद में बढती गई। समय के साथ स्तंभ पर खडे बडे-बडे कक्ष, गलियारे तथा विशालकाय गोपुर बनाए गए।
द्रविड शैली के दो प्रमुख लक्षण है, पहला यह कि इस शैली में मुख्य मन्दिर के चार से अधिक पार्श्व होते हैं तथा मन्दिर का शिखर और विमान पिरामिड की आकृति के होते हैं। शिव मन्दिरों में नंदी मण्डप तथा विष्णु मन्दिरों में गरुड मण्डप होता है।
द्रविड शैली के मन्दिर बहुमंजिला होते हैं।
वैसे एलोरा का वह क्षेत्र जो 750 ईस्वी के आसपास राष्ट्रकूटों ने चालुक्यों से हथिया लिया था उनकी सबसे बडी उपलब्धि एलोरा का कैलाश मन्दिर थी। यह मन्दिर द्रविड शैली में निर्मित है और इसके साथ नंदी का देवालय भी बना है। इस मन्दिर का प्रवेश द्वार गोपुरम जैसा है। इसमें चारों ओर उपासना कक्ष और फिर देवालय बना है जिसकी ऊँचाई 30 मीटर है। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह सब एक जीवन्त शैल खण्ड पर उकेर कर बनाया गया है। पहले एक, एकाश्म पहाडी के एक हिस्से को धैर्यपूर्वक काटा गया और सम्पूर्ण बहुमंजिली संरचना को छोड दिया गया।
बेसर शैलीः
इस स्थापत्य शैली का क्षेत्र मध्य भारत और दक्कन का क्षेत्र रहा।
इस स्थापत्य शैली का जन्म पूर्व मध्य काल में हुआ। यह मिश्रित शैली है जिसमें नागर और द्रविड दोनों शैलियों के लक्षण पाए जाते हैं।
बेसर शैली के उदाहरणों में दक्कन के कल्याणी के परवर्ती चालुक्यों द्वारा तथा होयसलों के द्वारा बनाए गए मन्दिर प्रमुख हैं।
बेसर शैली में द्रविड शैली के अनुरूप विमान होते हैं, लेकिन य द्रविड शैली के विमानों की तुलना में कम दूरी पर होते हैं जिसके फलस्वरूप मन्दिर की ऊंचाई कम रहती है। बेसर शैली में बौद्ध चैत्यों के समान अर्द्धचन्द्राकार संरचना भी देखी जाती है जैसे एहोल के दुर्गा मन्दिर में।
मध्य भारत और दक्कन में स्थान-स्थान पर इस शैली में कुछ अंतर भी पाए जाते हैं जैसे पापनाथ मन्दिर व पट्टादकल मन्दिर।
इस शैली को चालुक्य शैली भी कहा जाता है।
इस शैली के मन्दिरों का आकार आधार से शिखर तक गोलाकार या अर्द्धगोलाकार होता है।
बेसर शैली का उदाहरण है वृन्दावन का वैष्णव मन्दिर जिसमें गोपुरम बनाया गया है।
इस शैली में ओडिशा, गुजरात, राजस्थान एवं बुन्देलखण्ड का स्थापत्य अधिक महत्त्वपूर्ण है। यहाँ आठवीं से तेरहवीं सदी तक महत्त्वपूर्ण मन्दिर बने।
दक्षिण भारत में चालुक्य, पल्लव, राष्ट्रकूटकालीन और चोलयुगीन स्थापत्य में इसकी विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
नागर शैली के प्रभाव के कारण इस शैली का आधार आयताकार होता है तथा रेखा शिखर होते हैं।
द्रविड शैली के प्रभाव के कारण महीन नक्काशी, पिरामिडनुमा विमान तथा विशाल प्रांगण दिखाई देते हैं। कर्नाटक के हम्पी मन्दिर, हेलीविद के होयसालेश्वर मन्दिर इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
वेसर शैली की वास्तुकला के सर्वाधिक प्रयोग दक्कन के दक्षिणी भाग या कर्नाटक में दिखाई देते हैं।
पुलकेशिन प्रथम ने यहाँ सर्वप्रथम पश्चिमी चालुक्य राज स्थापित किया जब उसने 543 ईस्वी में बदामी के आसपास के इलाके के अपने कब्जे में ले लिया। आरंभिक चालुक्यों ने पट्टादकल का विरुपाक्ष मन्दिर बनवाया (733-44 - विक्रमादित्य द्वितीय की पटरानी लोका महादेवी द्वारा)। यह मन्दिर द्रविड परम्परा का सर्वोत्तम उदाहरण है तथा पापनाथ का मन्दिर द्रविड शैली के पूर्वकाल का श्रेष्ठतम उदाहरण है।
भूमिज शैलीः
इस शैली का क्षेत्र मध्यप्रदेश और उत्तरी महाराष्ट्र था। राजस्थान में भूमिज शैली का सबसे पुराना मन्दिर पाली स्थित सेवाडी का जैन मन्दिर है जो 11वीं सदी में बना। अन्य मन्दिर महानालेश्वर मन्दिर (मैनाल), भंडदेवरा (बारां), सूर्य मन्दिर (झालरापाटन), अद्भुतनाथ मन्दिर (चित्तौड) व उंडेश्वर मन्दिर (बिजोलिया) प्रमुख हैं।
उक्तानुसार यह स्पष्ट होता है कि मन्दिर निर्माण की परम्परा ईसा पूर्व की आरंभिक सदियों से विद्यमान रही तथा इसका आरंभिक स्थापत्य स्तूप निर्माण पर आधारित रहा व गुप्तकाल में मन्दिर स्थापत्य ने अपना एक विशिष्ट स्वरूप बनाया व परवर्तीकाल में मन्दिर स्थापत्य ने खजुराहो में अपना उत्कर्ष पाया साथ ही दक्षिण भारत की मन्दिर सरिणी के स्थापत्य ने भारतीय कला कौशल के चरम को छुआ।
भारतीय मन्दिर हमारी अनमोल विरासत ही नहीं अपितु हमारे जीवन दर्शन के वे जीवंत प्रतीक हैं जो सच्ची भारतीयता के आख्याता के रूप में विश्व इतिहास के पन्नों में अपनी गरिमामय उपस्थिति के साथ प्रतिष्ठित हैं।
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सम्पर्क - 85, इंदिरा गांधी नगर, पुराने आर.टी.ओ. के पास, केसरबाग रोड,
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