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महात्मा गाँधी और उत्तर-आधुनिकता

कमलनयन
महात्मा गाँधी के समग्र जीवन अथवा उनके जीवन के विभिन्न पक्षों और उनकी दृष्टि पर भारत में ही नहीं बाहर विदेशों में भी असंख्य पुस्तकें और लेख, कथा-कहानियाँ और काव्य लिखे गए हैं और लिखे जा रहे हैं। साथ ही आजकल इंटरनेट पर सोशयल मीडिया की बढती लोकप्रियता के कारण उसके प्लैटफॉम्स पर भी गाँधी पर चर्चाएँ और गोष्ठियाँ आयोजित होती रहती हैं। ये सब उन्हें समझने के, उनके विचारों, उनकी दृष्टि, उनके पुरुषार्थ की व्याख्या के विभिन्न दृष्टिकोणों से किए गए प्रयास कहे जा सकते हैं। कुछ गहरे और कुछ छिछले। महात्मा गाँधी की आलोचना भी बहुत हुई है, उनके जीवन काल में भी और उसके बाद से भी उनकी आलोचना का सिलसिला चलता रहा है और आज भी जारी है। बहुत-सी आलोचना उनको समझने और उनकी सीमाओं को समझने में मददगार है तो बहुत-सी अनर्थकारी और नितांत घटिया और दुष्ट आलोचना है।
पीछे 2006 में सूजैन होबर रुडोल्फ और लॉयड आई रुडोल्फ की पुस्तक पोस्टमॉडर्न गाँधी ऐण्ड अदर ऐस्सेज आई थी। इसमें गाँधीजी द्वारा हिन्दस्वराज में प्रतिपादित दृष्टि और उस दृष्टि की व्याख्या और चरितार्थन, जिसे गाँधीजी समय समय पर अपने लेखन और वार्ताओं के माध्यम से और अपने व्यक्तिगत और सामाजिक-राजनितिक कर्म व कार्यों के माध्यम से करते रहे थे, के आधार पर गाँधीजी को एक उत्तर-आधुनिक विचारक और एक्टिविस्ट के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया है। हिन्दस्वराज को गाँधीजी द्वारा विश्वव्यापी होती जा रही पश्चिमी सभ्यता के बरअक्स एक साभ्यतिक विकल्प का दस्तावेज कहा जाता है। रुडोल्फ दम्पत्ति ने भी इसे इसी रूप में देखा है। इसे पढते हुए मन में प्रश्न उठा कि क्या गाँधीजी को पोस्टमॉडर्न कहा जा सकता है? अथवा कहें कि क्या उन्हें पोस्टमॉडर्न परम्परा में रखा जा सकता है?
पोस्टमॉडर्निटी का प्रादुर्भाव 1970 के दशक में हुआ माना जाता है। हालाँकि इसका उदय पश्चिम हुआ था और यह योरोपीय फिनॉमिना था, इसकी प्रेरणा, इसका सन्दर्भ योरोपीय सभ्यता थी, फिर भी रुडोल्फ दम्पत्ति सरीखे विद्वान गाँधीजी को पोस्टमॉडर्निटी के अग्रदूतों में गिनते हैं। प्रश्न यह भी है कि गाँधीजी को, जिनकी भावभूमि और विचार मूलतः ही भारतीय थे, पश्चिमी सांस्कृतिक विचार परम्परा में रखा जा सकता है? कुछ लोग कह सकते हैं कि गाँधीजी की दृष्टि एक सार्वभौम दृष्टि थी, वे भारतीय नहीं अपितु विश्व-मानव थे, ऐसे में गाँधीजी के विचार को भारतीय विचार-परम्परा तक सीमित कर देना कहाँ तक ठीक है? वैसे विचार स्वरूपतः होता ही सार्वभौम है, किन्तु वह उत्पन्न होता और पलता बढता किसी विशिष्ट परम्परा ही है। फिलहाल इस चर्चा को छोडते हैं।
हमारे सामने प्रश्न यह है कि वह क्या है जिसके आधार पर गाँधीजी को उत्तर-आधुनिक कहा गया है? जब हम उत्तर-आधुनिकता (पोस्टमोडर्निटी) की बात करते हैं, तो यह स्वाभाविक ही है कि यह देखें कि वह आधुनिक (मॉडर्न) क्या है जिसके बाद, जिसके प्रत्युत्तर में एक नये युगबोध के रूप में उत्तर-आधुनिकता आई। यही नहीं, इसके माध्यम से हमें गाँधी द्वारा किए गए इसके प्रत्याख्यान और उनको उत्तर-आधुनिकता का अग्रदूत कहे जाने के कारणों को समझने में मदद मिलेगी।
आधुनिक और उत्तर-आधुनिक की प्रकृति पर आगे चर्चा करेंगे। पहले गाँधीजी की दृष्टि और विचार विषयक उल्लेख करते हुए आगे बढेंगे। क्योंकि आधुनिक योरोपीय सभ्यता भी गाँधीजी के बीजक - हिन्द स्वराज - की पृष्ठभूमि और सन्दर्भ का अंग है।
इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि गाँधीजी की दृष्टि और विचार गहरे में भारतीय हैं, विचार और मनीषा की भारतीय परम्परा में प्रतिष्ठित हैं। ऐसे में उसका पश्चिम के इस युगबोध (पोस्टमॉडर्निटी) के साथ क्या और सम्बन्ध हो सकता है? किन्तु यह भी तो सच है कि जिस आधुनिकता और तत्प्रसूत सभ्यता जिसका प्रत्याख्यान गाँधीजी ने हिन्दस्वराज में किया है, वह भी तो पश्चिमी है, पश्चिम में ही उत्पन्न हुई, उसके प्रत्याख्यान के लिए हिन्दस्वराज भी तो लिखा था। इस तरह, भले ही विरोध का ही सही यदि गाँधीजी का आधुनिकता के साथ सम्बन्ध हो सकता है, तो उत्तर-आधुनिकता के साथ क्यों नहीं हो सकता? गाँधीजी को हिन्दस्वराज लिखने की प्रेरणा क्यों हुई? जिस आधुनिकता का गाँधीजी ने प्रत्याख्यान किया, वह भारतीय आधुनिकता नहीं थी, योरोपीय आधुनिकता थी जिसे अँग्रेज भारत में लाए। इस आधुनिकता से अनुप्राणित सभ्यता जिसे गाँधीजी आसुरी सभ्यता कहते हैं, उनकी दृष्टि में यह सभ्यता मानव मात्र के लिए मानवता के लिए घातक थी। गाँधीजी इस सभ्यता के हिंसक रूप से दक्षिण अफ्रीका में ही परिचित हो चुके थे, किन्तु इसका विकराल स्वरूप 1909 में उन्होंने अपनी इंग्लैण्ड यात्रा के दौरान अपनी आँखों से देखा। हिन्दस्वराज उनके इसी अनुभव का परिणाम है। यद्यपि इसमें अभिव्यक्त अधिकांश विचार पहले ही बन गए थे। यहाँ यह कह देना भी अभीष्ट है कि हिन्द स्वराज मात्र एक खण्डनात्मक ग्रन्थ नहीं है। इसमें आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के प्रत्याख्यान के साथ उसका साभ्यतिक विकल्प भी प्रतिपादित हुआ है।
18वीं शताब्दी को योरप के इतिहास में ज्ञानोद्दीप्ति का, एनलाईटनमेंट का युग कहा जाता है। यह योरप में तर्क-बुद्धि अथवा रीजन की उद्दीप्ति का युग कहलाता है। यह एनलाईटनमेंट, यह रीजन का उद्दीपन, यह युगबोध ही आधुनिकता कहलाता है। यही समय भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के आरम्भ का भी है। 1757 में प्लासी की लडाई के बाद बंगाल में अंग्रेजी प्रभुत्त्व की स्थापना के साथ जो भारत के अंग्रेजी उपनिवेश बनने का सिलसिला आरम्भ हुआ वह अगले 60 सालों में लगभग पूरा हो गया। अंग्रेजी राज की स्थापना के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक प्रज्ञा में भी उन्मेष के युग का आरम्भ हुआ था, जिसे भारतीय पुनर्जागरण कहा जाता है। पुनर्जागरण इसलिए कि 19वीं-20वीं शताब्दी में भारतीय चेतना में भारतीय सांस्कृतिक शाश्वत मूल्यों का ही पुन्रोंमीलन हुआ था। गाँधीजी में भी उन्हीं मूल्यों का नवोन्मेष हुआ था। गाँधीजी जिसे सनातन परम्परा कहते थे उनके माध्यम से वही नावोन्मिषित हुई थी।
किन्तु विडम्बना देखिए, जहाँ एक ओर भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नवोन्मेष घटित हो रहा था वहीं दूसरी और अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नवोदित भारतीय मध्यम वर्ग में, जो कालान्तर में स्वतंत्रता आन्दोलन में अगुआ भी बना, योरोपीय आधुनिकता जड पकड रही थी। इसका प्रमाण इसी बात से मिल जाता है कि स्वतन्त्र भारत का जो सपना इन सब ने देखा था उस भारत के लिए निदर्श योरोपियन ही था। यद्यपि हमारे संविधान के आधारभूत मूल्य भारतीय ही हैं, किन्तु इन मूल्यों की सिद्धि के लिए, चरितार्थन के लिए गठित सांस्थानिक-संरचना अंग्रेजी है, आधुनिक है। हमारा राजनीतिक-आर्थिक तंत्र, प्रशासनतंत्र व न्याय व्यवस्था पश्चिमी है, आधुनिक है। यही नहीं हमारी शिक्षा-व्यवस्था का स्वरूप और ढाँचा पश्चिमी है। यह हमारे औपनिवेशिक अतीत में आधुनिकता से रूपायित हुई मानसिकता का परिणाम है। यह स्पष्ट ही है कि 18वीं शताब्दी में पश्चिम में आविर्भूत हुए युगबोध, आधुनिकता से हमारा इलीट ऐसा प्रभावित हुआ कि पश्चिम-परस्त होकर रह गया। विडम्बना देखिए कि वे दक्षिणपंथी भी जो स्वयं को हिंदुत्ववादी कहते हैं, हिन्दू धर्म और संस्कृति के पैरोकार होने का दावा करते हैं, उनकी सांगठनिक प्रेरणा भी पाश्चात्य है। यही नहीं उनकी राष्ट्र, राष्ट्रवाद, रेस आदि अवधारणाओं की प्रेरणा पाश्चात्य है। यह सावरकर और गोलवलकर की कृतियों में स्पष्ट दिखाई देता है। गाँधीजी इन सबमें इकलौते अपवाद थे जो इस आधुनिक सभ्यता के न केवल विरोध में खडे थे बल्कि उसका एक भारतीय विकल्प भी प्रस्तुत कर रहे थे। उनका हिंद्स्वराज उनके द्वारा प्रस्तुत साभ्यतिक विकल्प का दस्तावेज है। हिन्दस्वराज में प्रतिपादित उनकी दृष्टि उनके द्वारा जीवन के सभी क्षेत्रों में किए गए प्रयोगों और गतिविधियों का आधार कही जा सकती है। गाँधीजी भारत में ऐसा स्वराज लाना चाहते थे जो योरोपीय आधुनिकता से मुक्त भारतीय सांस्कृतिक बोध में प्रतिष्ठित स्वराज था।
जैसा सुप्रतिष्ठित विचारक मुकुंद लाठ ने कहा है, आज जो भी कुछ भारतीय है, पश्चिम से नहीं आया है, ट्रेडिशनल कहलाता है, पारम्परिक कहलाता है। इसलिए सामान्यतः, जैसा कि रुडॉल्फ्स् भी कहते हैं, गाँधी को परम्पराबद्ध ही समझा जाता है। किन्तु गाँधी के विचार को भारतीय विचार परम्परा में निष्ठ आधुनिक भारतीय विचार क्यों न कहा जाए? उक्त पृष्ठभूमि में अब हम संक्षेप में आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता की प्रकृति पर चर्चा करेंगे।
आधुनिकता के स्वभाव को रेखांकित करते हुए गाँधीजी द्वारा प्रतिपादित उनकी दृष्टि और वैचारिक परिप्रेक्ष्य को समझा जा सके। साथ ही समझने का प्रयास करेंगे कि गाँधीजी को उत्तर-आधुनिकता का अग्रदूत कहना कहाँ तक उचित है?
आधुनिक का सामान्य अर्थ है नया, अर्वाचीन; पुराने का, प्राचीन का विलोमार्थक। किन्तु जिस आधुनिक का प्रसंग यहाँ है वह एक पारिभाषिक शब्द है, जिसका एक खास, एक विशिष्ट अर्थ है, विशिष्ट ऐतिहासिक सन्दर्भ है, जिसमें इसका आविर्भाव हुआ। आधुनिक शब्द का प्रयोग यदि नये के अर्थ में होता, तो इसके बाद आनेवाले अथवा होने वाले युग के लिए उत्तर-आधुनिक शब्द गढने की आवश्यकता ही क्यों होती? जिस आधुनिक का, जिस आधुनिकता का यहाँ प्रसंग है वह एक युगबोध को, युगचेतना को अभिहित करता है। उसका आविर्भाव 18वीं शताब्दी में योरप में हुआ। इसके नियामक दृष्टि का उदय 17वीं शताब्दी में हुआ था।
योरप में 16वीं शताब्दी तक विश्व एक प्राणवान, आंतरिक संगति में आबद्ध एक आध्यात्मिक अवयवी (इकाई) के रूप में कल्पित था। 16वीं-17वीं शताब्दी में एक वैचारिक क्रान्ति घटित हुई। जिसे वैज्ञानिक क्रान्ति कहा जाता है। इसका एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि अब प्रकृति को, इस विश्व की एक दैवीय तत्त्व से संपन्न कल्पना को, विश्व की एक मशीन के रूप में कल्पना ने अपदस्थ कर दिया। मध्यकालीन वैज्ञानिकों का उद्देश्य प्राकृतिक जगत् में अन्तर्निहित प्रयोजनों की खोज था और ईश्वर, आत्मा और नैतिकता विषयक प्रश्न उनके लिए महत्त्वपूर्ण थे, इस वैज्ञानिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप अब अर्थहीन हो गए। वैज्ञानिक क्रान्ति के विस्तार में न जाकर इतना कहना पर्याप्त होगा कि अब प्रकृति के प्रति मनुष्य की दृष्टि पूर्णतया रूपांतरित हो गई। ज्ञान की इन्द्रिय प्रत्यक्ष पर आधारित अनुभववादी पद्धति और प्रकृति का गणितीय भाषा में निरूपण, ये दोनों 17वीं शताब्दी में विज्ञान का आधार बन गए। परिणामस्वरूप प्रकृति एक प्राणवान और चेतन समष्टि के स्थान पर आकृतियों, संख्याओं और गतियों के निर्जीव पसारे में रूपान्तरित हो गई। इसी प्रकार इंग्लैण्ड में बेकन वैज्ञानिक अनुभववाद का सूत्रपात कर रहे थे। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान को, अन्वेषण की प्रकृति को पूर्णतया बदल दिया। प्रकृति के प्रति इस दृष्टिकोण को पूरी तरह से स्थापित कर देने वाली दो विभूतियाँ हैं- डेकार्ट और न्यूटन। डेकार्ट ने 17वीं शताब्दी में विज्ञान के लिए सैद्धांतिक ढाँचा प्रतिपादित किया, किन्तु उनका यह विचार अथवा मत कि प्रकृति गणितीय नियमों से परिचालित एक सम्पूर्ण मशीन है, उनके जीवन काल में एक विचार मात्र ही रहा। वे बस अपनी प्राकृतिक-जगत विषयक सिद्धान्त की रूपरेखा ही बना पाये थे। इस देकार्तीय अथवा कार्टीसियन कल्पना को चरितार्थ करने और वैज्ञानिक क्रान्ति को पूर्ण करने का श्रेय न्यूटन को जाता है। प्रकृतिक रहस्यों की खोज और उनके गणितीय प्रतिपादन में न्यूटन की सफलता ने गणित पर आधारित भौतिकशास्त्र (फिजिक्स) को ज्ञान के सभी प्रस्थानों के ज्ञानादर्श (पैराडाईम ऑफ नॉलेज) के रूप में स्थापित कर दिया। यहाँ तक कि 18वीं शताब्दी के विचारकों द्वारा न्यूटनीय याँत्रिकी (न्यूटोनियन मैकेनिक्स) के सिद्धान्तों को मानव विज्ञानों में भी अपना लिया गया। न्यूटन के जगत् विषयक सिद्धांतों और तर्कबुद्धिवाद (रैश्नेलिज्म) की लोकप्रियता और सर्वमान्यता के कारण 18वीं शताब्दी ज्ञानोद्दीप्ति का युग (ऐज ऑफ एन्लाईटनमेंट) कहलाती है। यह योरोपीय प्रज्ञा में एक नया उन्मेष लेकर आई। न्यूटन की प्रिन्सिपिया मैथेमैटीका से जिस वैज्ञानिक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ उसने ज्ञानादर्श (पैराडाइम ऑफ नॉलेज) को पूर्णतः रूपान्तरित कर दिया, उस परिप्रेक्ष्य (परस्पैक्टिव) को रूपान्तरित कर दिया जो जगत् को देखने का, समझने का माध्यम था। वैज्ञानिक दृष्टि ने मनुष्य के पारमार्थिक/आध्यात्मिक पक्ष की उपेक्षा ही नहीं की, उसे पूर्णतया खारिज ही कर दिया। इसे हम सम्पूर्ण संज्ञानात्मक विस्थापन (कॉग्निटिव शिफ्ट) कह सकते हैं। यह एक नवीन सांस्कृतिक दृष्टि का आविर्भाव था। 17वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी के मध्य तक का कालखण्ड इसी सांस्कृतिक दृष्टि से परिभाषित कालखण्ड है। इस दौरान योरोपियन सभ्यता टेक्नोलॉजिकल औद्योगिक सभ्यता में रूपांतरित होती चली गई।
सब मिलाकर वैज्ञानिक क्रान्ति का दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रकृति एक ओर जड वस्तु के रूप में तो दूसरी ओर मनुष्य के उपभोग की वस्तु में रूपान्तरित हो गयी। पृथ्वी मनुष्य के उपभोग के लिए है, यह धारणा बुक ऑफ जैनेसिस (हीब्रू बाईबिल और ओल्ड टैस्टामैंट) में भी मिलती है। किन्तु इसके निर्बाध भोग की असीम लालसा के परितोषण को आधुनिक टैकनॉलॉजी ने संभव कर दिया। 18वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रान्ति, जिसका सूत्रपात इंगलैण्ड में हुआ, वैज्ञानिक क्रान्ति का स्वाभाविक परिणाम है। जहाँ टैक्नोलॉजी एक ओर निर्जीव प्रकृति के अनुसंधान, में सहायक है, तो वहीं दूसरी ओर इसने मनुष्य के हाथ में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की असीम क्षमता दे दी है। यहाँ यह भी अवधेय है कि सभ्यताएँ मनुष्य के स्वरूप विषयक अवधारणा पर आधारित होती हैं। इस सभ्यता के केन्द्र में जो मनुष्य था वह भी आध्यात्मिकता से रहित मनो-दैहिक संरचना मात्र था और आधुनिक टैक्नोलॉजी पर आधारित सभ्यता उसके समस्त ऐहिक सुखों से परिपूर्ण स्वर्ग की स्थापना का माध्यम। यह कोई महज संयोग नहीं था कि इसी कालखण्ड में योरप की विचार परम्परा में एक ओर मनुष्य और जगत् को ऐन्द्रिय-प्रत्यक्ष पर्यन्त मानने वाले प्रत्यक्षवादी-अनुभववादी दर्शनों तो दूसरी और असीम, निर्बाध भौतिक समृद्धि के लक्ष्य को नैतिक-दार्शनिक आधार देने वाले उपयोगितावादी-सुखवादी दर्शनों का बोलबाला रहा। (इनके साथ-साथ मनुष्य को विषयोंमुख अथवा विषयतंत्र बुद्धि से परिभाषित करने वाली अस्तित्त्ववादी, फिनॉमिनॉलॉजिकीय दर्शन धाराएँ भी थीं।)
यह सुविदित है कि आधुनिकता का प्रवेश इतिहास में एक विकासोन्मुख शक्ति के बोध के रूप में हुआ जिसमें मानवता को अज्ञान, अन्धविश्वास और विवेकहीनता से मुक्त कराने का आश्वासन था। साथ ही इस विकास का लक्ष्य था असीम, निर्बाध भौतिक समृद्धि। आधुनिक योरोपीय समाजों का, फिर चाहे वे प्रजातांत्रिक-पूँजीवादी हों या साम्यवादी, लक्ष्य यही रहा है।
किन्तु प्रश्न यह है कि क्या वो प्रत्याशाएँ, जिनके साथ आधुनिकता आई थी, पूरी हो पाईं? आधुनिकता के रिपोर्ट कार्ड पर जब हम दृष्टि डालते हैं, तो - विश्वयुद्ध, नाजीवाद, फासीवाद, हिटलर द्वारा यहूदी-नरसंहार, वैश्विक मन्दी, हिरोशिमा, कम्बोडिया, फारस की खाडी तदन्तर युगोस्लाविया में नरसंहार, विश्वव्यापी आतंकवाद, अमीर और गरीब के बीच निरन्तर बढता अंतर - विकास की अवधारणा अथवा भविष्य के प्रति आशावाद खोखला नजर आता है।
सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री पिट्रिम सोरोकिन ने इसे ऐन्द्रिक संस्कृति (सैन्सेट कल्चर) कहा है। ऐन्द्रिक संस्कृति का अर्थ है कि इन्द्रियों पर आश्रित ज्ञान को ही ज्ञान मानने वाली और इन्द्रियों से प्राप्त सुखों को की एकमात्र सुख मानने वाली संस्कृति या मूल्य-व्यवस्था। आधुनिक विज्ञान और तकनीकी इस मूल्य-व्यवस्था की ही उपज या उसके अर्थ की सिद्धि के माध्यम हैं।
यही वह ऐन्द्रिकता से परिभाषित आधुनिक सभ्यता है, जिसका प्रत्याख्यान गाँधीजी ने अपने हिन्दस्वराज किया था। फिलहाल थोडा उत्तर-आधुनिकता पर चर्चा करते हुए गाँधीजी और उनके उत्तर-आधुनिकवाद के साथ सम्बन्ध पर आएँगे।
उत्तर-आधुनिकतावाद योरप और अमेरिका में आधुनिकतावाद के एक प्रतिवादी स्वर के रूप में उभरा। यह ऐसा युगबोध है जिसे आधुनिकतावाद के भयावह परिणामों से उद्वेलित मानस की अभिव्यक्ति कहा जा सकता है।
उत्तर-आधुनिकतावादी समस्त आधुनिकता और उसके परिणामों- औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, अभूतपूर्व तकनीकि प्रगति, राष्ट्रीय-राज्य, जीवन की तेज रफ्तार आदि- को रिजेक्ट करते हैं। वे (उत्तर-आधुनिकतावादी) समस्त आधुनिक प्राथमिकताओं को चुनौती देते हैं- कॅरिअर, आफिस, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व, नौकरशाही, उदारवादी प्रजातन्त्र, सहिष्णुता, मानवतावाद, समानता, मूल्याँकन के मानदण्ड, तटस्थ प्रक्रियाएँ, व्यक्तिनिरपेक्ष नियम (इम्पर्सनल रूल्स) और तर्कबुद्धि (रैश्नैलिटी) - को अमानवीय ठहराते हुए अस्वीकार करते हैं। उत्तर-आधुनिकतावादी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आधुनिकता के समस्त दावों, संस्थाओं और व्याख्याओं को अविश्वसनीय मानने के लिए पर्याप्त कारण हैं। उनके अनुसार आधुनिकता स्वतंत्रता का नहीं, अपितु परतंत्रता का, दमन का स्रोत है।
इस कारण उत्तर-आधुनिक विचारक सभी आधुनिक समग्रात्मक (आल एन्कॉम्पासिंग) विश्व दृष्टियों - राजनीतिक, धार्मिक अथवा सामाजिक - को अस्वीकार करते हैं। वे माक्र्सवाद, इसाई, फासीवाद, स्टालिनवाद, पूँजीवाद, उदार प्रजातंत्र, सैक्यूलर मानववाद, फैमिनि*म, इस्लाम तथा आधुनिक विज्ञान को लोगोसेंट्रिक, ट्रांसेन्डेन्टल, टोटेलाइजिग मैटानैरेटिव और उनकी निरपेक्ष सत्य पर एकाधिकार की दावेदारी को खारिज करते हैं। द्रष्टव्य है कि उत्तर-आधुनिकतावाद सत्य को लेकर श्रेष्ठता और गौणता के भेद को अस्वीकार करता है। सत्य के किसी भी और किसी के भी दावे को अन्तिम नहीं मानता।
आधुनिक सभ्यता के उपर्युक्त सभी लक्षण 20वीं शताब्दी में प्रकट होने आरम्भ हो गए थे। बहुत-से तत्कालीन विचारकों और साहित्यकारों ने वैज्ञानिक-ज्ञान और टैक्नोलॉजी के अनियंत्रित अनुसरण से दिशाभ्रष्ट और आत्मघाती होती जा रही आधुनिक सभ्यता के संकट और पतनशीलता को पहचान कर इसके दुष्परिणामों के प्रति आगाह भी किया था। किन्तु 20वीं शताब्दी के पहले दशक में अभी औद्योगिक सभ्यता की विभीषिकाएँ अपने विकट और विकराल रूप में योरप में प्रकट नहीं हुई थीं। 19वीं शताब्दी इस आश्वासन और विश्वास के साथ समाप्त हुई थी कि इसके अन्तराल के दौरान जो विकास हुआ, उसके सकारात्मक और रचनात्मक परिणाम निकले। मानवता के सदियों से चले आ रहे कष्ट और आपदाएँ या तो समाप्त हो चुकीं थीं अथवा समाप्त होने की प्रक्रिया में थीं-... खाद्य पदार्थों की प्रचुरता, बेहतर यातायात के साधनों, उत्तम और चमत्कारी औषधियों और चिकित्सा सुविधाओं के कारण अकाल, प्लेग और अन्य महामारियाँ तेजी से मिट रही थी... शिक्षा के बढते प्रसार के कारण अज्ञान और निरक्षरता समाप्त हो रही थी... जनसामान्य के जीवन स्तर में तेजी से सुधार हो रहा था... व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों स्तरों पर प्रगति सुस्पष्ट दिखाई पड रही थी। किन्तु गाँधीजी इस सभ्यता की प्रकृति और चरित्र को पहचान चुके थे।
उनका हिन्दस्वराज पाश्चात्य सभ्यता का मूलतः आलोचना-ग्रन्थ ही नहीं है। यह उसका एक मानवीय विकल्प भी प्रस्तुत करता है। गाँधीजी ने आधुनिकता के इन्द्रिय-प्रत्यक्ष पर आधारित निरपेक्ष ज्ञान व उसके सार्वभौमता और निरपेक्ष सत्य के दावे और उसके भौतिक सुखवाद, उद्योगवाद, बाजारवाद आदि सबकुछ को आत्याँतिक रूप से खारिज कर दिया। उन्होंने आधुनिकतावाद के सत्तामीमांसीय (ओंटोलॉजिकल), ज्ञानमीमांसीय (एपिस्टेमोलोजिकल) और नीतिपरक (एथिकल) एब्सोल्यूट्स को खारिज करते हुए इसे मानवता की मुक्ति के माध्यम के रूप में अस्वीकार कर दिया। और इसे मानवता के उत्पीडन, दमन और पराधीन बना देने वाले उपकरण के रूप में देखा। आधुनिक सभ्यता के गाँधीजी के इस रिजेक्शन को उत्तर-आधुनिकता के पूर्वाभास के रूप में देखा जाता है।
गाँधी यह कैसे देख पाए? इसके सत्य का साक्षात्कार कब और कैसे हुआ? सन् 1893 में डरबन से प्रिटोरिया जाते हुए पीटरमारिट्जबर्ग के स्टेशन पर गार्ड ने टिकट होने के बावजूद ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डब्बे से गाँधी को जबरन उतार फेंका था। यह घटना उनके आमूल रूपांतरण का कारक बनी। इस अपमान को गाँधी जी एक व्यक्तिगत अपमान के रूप में भी ले सकते थे और अपना ध्येय श्वेतों को भारत में, या सर्वत्र, नीचा दिखाना बना सकते थे। वही स्वाभाविक भी होता। किन्तु उन्होंने इस घटना को एक मूलगामी नैतिक सन्दर्भ में ही देखा, जिस दृष्टि के साथ वे अहंकार-भाव से सदा के लिए उत्तीर्ण हो गए। इस घटना में उन्हें मनुष्य की व्यापक भ्रान्त दृष्टि का और आधुनिक यान्त्रिक-औद्योगिक संस्कृति की दिशा-भ्रष्टता का एक उदाहरण ही दिखायी दिया। यह एक ऐसी प्रतिक्रिया थी जो एक पूर्णतः निरहंकार, अक्लिष्ट और निष्कलुष चेतना में ही घटित हो सकती थी। किन्तु यह प्रतिक्रिया द्विमुखी थी। यह जहाँ एक ओर निरहंकार चित्त में घटित हुई दूसरी ओर इसने गाँधीजी को सदा के लिए निरहंकार, अक्लिष्ट चित्त-भूमि पर प्रतिष्ठित कर दिया। इसके साथ गाँधीजी का आमूल रूपान्तरण हो गया। किन्तु इसके साथ एक और आधारभूत रूप से विलक्षण दृष्टि का भी सूत्रपात हुआ। वह दृष्टि थी इस नैतिक-आध्यात्मिक बोध का सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भ से जुड जाना। यह घटना महात्मा गाँधी के लिए ऐसे आत्मशोधन की प्रेरक बनी जिसका मार्ग राजनीतिक कर्म के क्षेत्र से होकर था। यद्यपि मूलतः उनकी दृष्टि धार्मिक-आध्यात्मिक ही थी, किन्तु इस दृष्टि के चरितार्थन का क्षेत्र न तो एकान्त साधनापरक था और न धार्मिक विचार और अनुष्ठान तक सीमित। इसका क्षेत्र (राजनीति) था जिसे धर्म और अध्यात्म दोनों से असम्बद्ध माना जाता है। यहाँ गाँधीजी की मौलिकता द्रष्टव्य है।
प्रो. अम्बिकादत्त ने इस घटना के कारण गाँधी के चित्त में घटित हुए रूपान्तरण को गाँधी का व्यक्तित्त्वांतरण कहा है । अम्बिकादत्त कहते हैं कि महात्मा गाँधी को समझने और परखने का प्रचलित तरीका महात्मा इन द मेकिंग का है। यह तरीका इस मान्यता पर आधारित है कि मोहनदास गाँधी के महात्मा गाँधी के रूप में रूपांतरण एक क्रमिक विकास की प्रक्रिया का परिणाम है। जिसे वे भ्रान्ति मानते हैं। उनके जीवन की इस युगान्तरकारी घटना का उल्लेख गाँधीजी ने सेवाग्राम में उनसे मिलने आये जॉन मोट नामक एक डाक्टर द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में स्वयं किया था।
पीटरमारिट्सबर्ग के स्टेशन की यह घटना एक ऐसा ऐतिहासिक क्षण है जब गाँधीजी की प्रज्ञा में एक नवीन दृष्टि उन्मीलित हुई। तदुपरान्त गाँधीजी का समस्त जीवन इसी दृष्टि के चरितार्थन की यात्रा कही जा सकती है। मूलतः उनकी दृष्टि धार्मिक-आध्यात्मिक ही थी, किन्तु किसी धार्मिक सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं किया। ... अन्य धर्म-प्रवर्तकों के समान वे धर्म-प्रवर्त्तक थे ही नहीं, वे तो केवल धार्मिक थे - शुद्ध और सनातन धर्म के अनुयायी, इसीलिए वे किसी धार्मिक सिद्धान्त के प्रतिपादक नहीं थे, बल्कि धर्म-तत्त्व के ध्यायी थे, और इसी से जीवन का कोई पक्ष उनकी धर्म-साधना से अछूता नहीं रह सकता था। इसी से उनकी राजनीतिक सभा प्रार्थना-सभा भी थी और प्रार्थना-सभा राजनीतिक सभा भी, उनका शस्त्र सत्याग्रह और प्रेम था, और उनकी युद्ध-स्थली राजनीति।
इस दृष्टि के आलोक में गाँधीजी के समक्ष आधुनिक यूरोप की ऐन्द्रिक संस्कृति और यान्त्रिक-औद्योगिक सभ्यता का वह स्वरूप उद्घाटित हुआ जिसके भयावह परिणाम अभी भविष्य के गर्भ में थे। ... और इसका केवल आकर्षक रूप ही प्रकट था। हिन्द-स्वराज्य का पहला संस्करण 1909 में प्रकाशित हुआ था... यह वह समय था जब इंग्लैंड में बर्ट्रेड रसल और जी. ई. मूर ने इस संस्कृति के दर्शन की विजय-पताका फहराई थी और आईंस्टाइन ने सापेक्षता-सिद्धान्त के रूप में विज्ञान में नये युग का प्रवर्तन किया था। आज इस संस्कृति और सभ्यता का भयावह रूप सब पर प्रकट है।... हिन्द-स्वराज्य में महात्मा गाँधी ने पहली बार, और उतने ही मूलगामी रूप से जितने मूलगामी रूप से पाश्चात्य सभ्यता ने यंत्र के रूप में ऐन्द्रिकता का उत्कर्ष सिद्ध किया था, इस उत्कर्ष की मनुष्य के लिए वांछनीयता को अस्वीकार किया और इसके विरुद्ध उद्घोषित किया कि मनुष्य की उत्कृष्टता आध्यात्मिकता की सिद्धि में है, ऐन्द्रिक शक्ति की सिद्धि में नहीं, और यह जितना व्यक्ति के लिए सही है उतना ही समाज के लिए भी, उसके राजनीतिक पक्ष के सहित, सही है।
हमने पीछे उल्लेख किया गाँधीजी की दृष्टि धार्मिक-आध्यात्मिक थी और जीवन का कोई पक्ष इससे अछूता नहीं था। सबसे विलक्ष्ण बात यह थी कि इसके चरितार्थन का क्षेत्र एकान्त साधनापरक और धार्मिक विचार और अनुष्ठान तक सीमित नहीं था; उन्होंने अपने दृष्टि के क्रियान्वयन का क्षेत्र राजनीति को चुना। वे एकमात्र ऐसे नेता कहे जा सकते हैं जिन्होंने सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संशय, द्वैधीभाव की आचार-नीति से परिभाषित राजनीति के सार्वजनिक जीवन को भी धर्म-दृष्टि के अनुसार ढालने का प्रयत्न किया। ऐसा करने वाला उनके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं मिलेगा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गाँधीजी को मूर्ततः सत्य कहा है और उनकी तुलना महात्मा बुद्ध से की है, किन्तु सत्य-जीवन को राजनीतिक व्यवहार का भी मेरुदण्ड बनाने के कारण गाँधी जी से बुद्ध की तुलना भी नहीं की जा सकती। गाँधी-दृष्टि का अर्थ व्यक्तिगत ही नहीं सम्पूर्ण सामाजिक व्यवहार को भी पूर्ण रूप से सत्य के अधीन कर देना है, जो अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता।... राजनीति तो व्यवहार-जगत् में भी निम्नतम स्तर पर आती है। किन्तु गाँधीजी ने व्यवहार (मात्र) को भी परमार्थ का विषय बना दिया।
व्यवहार में सत्य के संधान का मार्ग गाँधीजी ने अहिंसा का मार्ग चुना। सत्य और अहिंसा उनके तत्त्वबोध और मूल्यबोध के आधार हैं। उनके तत्त्वबोध और मूल्यबोध के चरितार्थन का सन्दर्भ भारत का स्वतंत्रता आन्दोलन था।
गाँधीजी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उस समय अंग्रेजी राज से मुक्ति के लिए चल रहे आन्दोलनों में कांग्रेस के नेतृत्त्व में चल रहा आन्दोलन मुख्य धारा थी। किन्तु जब गाँधीजी ने इसका नेतृत्त्व सम्भाला तो इस आन्दोलन की प्रकृति और स्वरूप बदल गया। उन्होंने इस आन्दोलन को सत्य और अहिंसा पर आधारित आन्दोलन में रूपांतरित कर दिया। उनके लिए स्वतंत्रता की सिद्धि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ अपने सांस्कृतिक स्व में प्रतिष्ठा था, राजनीतिक स्वतंत्रता उसका एक आयाम था। यह सुविदित ही है कि भारत सदियों से सांस्कृतिक रूप से एक होकर भी राजनीतिक रूप से छोटे बडे राज्यों,और सामाजिक रूप से क्षेत्रीय पहचानों, भाषाओं, धर्मों और धर्मों के भीतर धार्मिक-सम्प्रदायों और जातियों में विभाजित था। यही नहीं, जाति-भेद और लिंग-भेद आदि पर आधारित ऊँच-नीच का भाव भी सर्वव्याप्त था। सामाजिक समरसता के मार्ग में एक बडी बाधा थी। ऐसे समाज की एक राष्ट्रीय इकाई के रूप में राजनीतिक स्वतंत्रता का क्या अर्थ होता? इस कारण गाँधीजी राजनीतिक स्वतंत्रता से भी ऊपर सांस्कृतिक परतंत्रता और समाज में व्याप्त संकीर्णता और विभाजनकारी मनोवृत्ति से मुक्ति को रखते थे। यही नहीं, उनके लिए स्वतंत्रता अपने आप में उचित साध्य तभी हो सकती थी यदि उसके लिए प्रयुक्त साधन भी उचित हो। इसलिए गाँधीजी के लिए भारत की स्वतंत्रता का मार्ग अहिंसा का मार्ग ही हो सकता था। वही उन्होंने अपनाया। अपने सांस्कृतिक-स्व में प्रतिष्ठित भारत के लिए उन्होंने ग्राम-स्वराज पर आधारित विकेन्द्रीकृत राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था के विकल्प की कल्पना की थी।
इस प्रकार हम देखते हैं कि गाँधीजी के याँत्रिक-वैज्ञानिक-औद्योगिक आधुनिक सभ्यता के प्रत्याख्यान में और उन्होंने जो साभ्यतिक विकल्प प्रस्तुत किया उसमें रुडॉल्फ्स् जैसे विद्वानों को उत्तर-आधुनिकता दिखाई दी। किन्तु क्या गाँधी को नीत्शे और हाईडैगर की तरह योरप में आधुनिकता के प्रतिवाद में उभरे युगबोध, उत्तर-आधुनिकता का अग्रदूत कहा जा सकता है। हमने पीछे देखा कि उत्तर-आधुनिकता और गाँधी, दोनों, आधुनिकता को उसकी समग्रता में अस्वीकारते हैं। किन्तु जिन अभ्युपगमों पर उत्तर-आधुनिकता की तत्त्वमीमांसा आधारित है वह गाँधीजी के तत्त्वमीमांसीय आधारों से नितांत भिन्न है। इसे मनुष्य के स्वरूप विषयक अवधारणा से समझा जा सकता है। गाँधीजी का मनुष्य परमार्थ से परिभाषित सत्त्व है वहीं आधुनिकों की तरह उत्तर-आधुनिको का मनुष्य मूलतः मनोदैहिकता से परिभाषित अस्तित्त्व है। इस प्रकार मनुष्य की अवधारणा गाँधीजी और उत्तर-आधुनिकों को तात्विक रूप से पृथक कर देती है।
महात्मा गाँधी की उत्तर-आधुनिकता उदाहरण के लिए सत्य की अवधारणा को लें। सत्य और अहिंसा गाँधी-दर्शन के आधार स्तम्भ हैं। सत्य की उत्तर-आधुनिक अवधारणा के अनुसार यह बुद्धि-विकल्प अथवा इंटेलेक्चुअल-कॉन्सट्रक्ट है। इसका स्वरूप और अभिव्यक्ति और आधार भाषात्मक अथवा पाठात्मक है। इस कारण यह सदैव यादृच्छिक (आरबिटरेरी) ही होता है। यह स्थानीय, व्यक्तिगत और समुदाय सापेक्ष होने के कारण यह सन्दर्भ व परिस्थिति सापेक्ष होता है। लगभग सभी उत्तर-आधुनिक सत्य को एक आदर्श अथवा साध्य के रूप में ही खारिज करते हैं। उनके अनुसार सत्य एक एनलाईटनमेंट विषय अथवा मूल्य है, इसलिए खारिज किए जाने योग्य है। संदेहवादी उत्तर-आधुनिक तो सत्य की संभावना मात्र को ही खारिज करते हैं अथवा सत्यान्वेशी प्रकल्पों के प्रति कोई रुचि नहीं रखते। इस प्रकार देखने से सत्य उनके लिए अर्थहीन और यादृच्छिक ही ठहरता है। तब संदेहवादियों के लिए सत्य और वाक्चातुर्य अथवा प्रोपेगेंडा के बीच कोई अंतर नहीं रहता। जैसा देरिदा ने कहा है कि सत्य जैसी कोई वस्तु नहीं होती। बस इसका अतिरेक होता है। फिर भले मेरे लिए हो, अथवा मेरे विषय में हो, सत्य अनेक अथवा एकाधिक होते हैं। फूको इसे सत्ता (पॉवर) से सम्बद्ध और उसके एक हथियार के रूप में देखता है। सत्ता इसका उपयोग अपनी शक्ति निष्पादन के लिए करती है। इस कारण वह सत्य और आइडिओलॉजी के बीच कोई भेद नहीं मानता। फूको सत्य को सत्ता और प्रभुत्त्व से जोडते हैं। रोर्टी के अनुसार यह अधिक से अधिक एक परम्परा विशेष के भीतर एक सामाजिक अनुबंध (एग्रीमेंट) होता है। इस कारण वह सत्य को सामाजिक निर्देश के रूप में देखता है। इस कारण सत्य न केवल एक कंस्ट्रक्ट, एक रचना है, यह एक नहीं अनेक अनेक भी है।
इसके विपरीत गाँधीजी के लिए सत्य परम् तत्त्व है, जो अन्यान्य सापेक्षताओं को, तत्त्वों को समाहित करता है। ... यह सत्य, वाणी के, मन के, विचार के, कर्म के माध्यम से सापेक्ष रूपों में अभिव्यक्त सत्य को समोय हुए परम् तत्त्व, नित्य सत्ता ईश्वर है। सत्य शब्द सत् शब्द से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है सत्ता। सत्य के अतिरिक्त और किसी का भी अस्तित्त्व नहीं है। इसलिए सत् अथवा सत्य ही ईश्वर का सर्वोपरि नाम है। ईश्वर सत्य है के स्थान पर सत्य ही ईश्वर है, यह कहना अधिक उपयुक्त है। एक अन्य स्थान पर गाँधी कहते हैं, ... तब सत्य क्या है? हमारे लिए यह एक सापेक्ष पद है। परम् सत्य ईश्वर है। ईश्वर का अर्थ हम जो भी समझें वह सब सत्य में निहित है... वही हमारा धारक है। अन्यत्र गाँधीजी कहते हैं, पिछले पचास वर्षों में सत्य की सतत खोज करते हुए मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि सत्य ईश्वर है। तब मैंने पाया कि सत्य को पाने का सीधा रास्ता प्रेम का रास्ता है। ... प्रेम से मेरा आशय अहिंसा है। ईश्वर कोई हमसे बाहर इस जगत् से परे कोई व्यक्ति नहीं है। वह तो सर्वव्याप्त है, अन्तर्यामी है, सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान है।... उसका हमारे ह्रदय में निवास है और वह हमारे नाखूनों से भी ज्यादा हमारे करीब है। वह विश्व का महानतम लोकतंत्रवादी है, वह हमें अपना विकल्प - अच्छा, बुरा - अपना मार्ग चुनने की स्वतंत्रता देता है।... हिन्दू धर्म में इस जगत् को उसका लीलाभाव अथवा माया कहा गया है। हम नहीं, बस केवल वही है। वही विधान है और वही विधाता है। विधि और विधाता दोनों एक ही हैं।
इन उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि गाँधी का सत्य, जिसे वे ईश्वर कहते थे, वह उत्तर-आधुनिक सत्य की अवधारणा से नितांत भिन्न अवधारणा है। यद्यपि उनकी भाषा और अभिव्यक्ति का ढँग दार्शनिक नहीं है, किन्तु उनका विचार अद्वैत दृष्टि में मूलित है। वे स्वयं को अद्वैती कहते हैं; इस परिवर्तनशील जगत् को, जिसका कोई स्थाई अस्तित्व नहीं है, असत् अथवा अवास्तविक कहते हैं। किन्तु इस की परिवर्तनशीलता के पीछे कुछ है जो स्थाई है, इसलिए उस हद तक यह सत्य है। अतः मुझे इसे सत् और असत् दोनों कहने में और अनेकान्तवादी अथवा स्यादवादी कहलाने में कोई आपत्ति नहीं। किन्तु मेरा स्यादवाद मेरा स्वकल्पित स्यादवाद है। यह मेरा अनुभव है कि मैं अपने दृष्टिकोण से हमेशा सही हूँ और अपने आलोचक के दृष्टिकोण से गलत। मै जानता हूँ कि हम दोनों अपने अपने नजरिये से सही हैं। उन सात दृष्टिहीन व्यक्तियों की तरह जो हाथी को छूकर उसे अपने अपने अनुभव के अनुसार उसका निरूपण करते हैं, सभी अपने आप में सही हैं, किन्तु दूसरे के दृष्टिकोण से गलत और आँखवाले की दृष्टि से सही और गलत दोनों। मैं इस सिद्धान्त को सही मानता हूँ। इस सिद्धान्त ने मुझे मुसलमान को उसके दृष्टिकोण से और ईसाई को उसके दृष्टिकोण से देखना-समझना सिखाया है। पहले मैं अपने विरोधियों पर नाराज होता था, अब नहीं होता। अब मेरे मन में उनके प्रति स्नेह है, क्योंकि अब मैं स्वयं को उनकी नजर से और उनको अपनी नजर से देख-समझ सकता हूँ।... मेरा अनेकान्तवाद सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों का परिणाम है। यहाँ लग सकता है कि गाँधी सत्य को दृष्टि-सापेक्ष और अनुभव-सापेक्ष मानते हैं, किन्तु यह सही नहीं है। यह सापेक्षता अस्तित्त्वात्मक है, पारमार्थिक नहीं। सत्य तो पूर्ण एवं पारमार्थिक और मूल्यात्मक है और मनुष्य इसी पूर्ण सत्य का साधक है।
गाँधी सत्य के चरितार्थन को मानव जीवन का लक्ष्य मानते थे। उनके अनुसार मनुष्य के सभी कर्मों - सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक - का लक्ष्य परम् सत् का चरितार्थन ही है। जिसे वे ईश्वर को पाना कहते हैं।
उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि गाँधीजी का सत्य उत्तर-आधुनिकों से सत्य की तरह निगमित अथवा निर्मित अथवा सन्दर्भ सापेक्ष अथवा अस्थाई विकल्प (ऑल्टर्नेटिव) नहीं, अपितु साक्षात्कृत परम् अर्थ था, जिसका चरितार्थन वे मानव जीवन का लक्ष्य मानते थे।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि महात्मा गाँधी और उत्तर-आधुनिकों में जो भी समानताएँ दिखाई पडती हैं वे सभी प्रसंगवश एवं संयोगवश हैं, आगन्तुक हैं। औद्योगिक आधुनिक सभ्यता का अस्वीकार, राजनीतिक व आर्थिक विकेंद्रीकरण सम्बन्धी विचार, अभिव्यक्ति में सत्य की सापेक्षता, विज्ञान के सत्य पर एकाधिकार और इंद्रिय-प्रत्यक्ष पर आधारित वैज्ञानिक ज्ञान की एकमात्र प्रामाणिक ज्ञान के रूप में मान्यता को चुनौती आदि गाँधी और उत्तर-आधुनिकों के बीच समानताएँ हैं। किन्तु उत्तर-आधुनिकता और गाँधी की आधारभूमियों की नियामक जीवन-दृष्टियाँ मूलतः भिन्न हैं, इस कारण ये समानताएँ आभासीय ही हैं, वास्तविक नहीं।
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सम्पर्क- पी-51, मधुबन पश्चिम, किसान मार्ग,
टोंक रोड, जयपुर-302018