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युवाल नोआ हरारी : कोविड काल की सीख

अखिलेश पाठक
वृहद ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कोविड से मिली सीख को हम कैसे संक्षिप्त व्यक्त कर सकते हैं? कईं लोगों को लगता है कि कोरोना वाइरस से जिन लोगों की मृत्यु हुई है वे प्रकृति की महानता के आगे मनुष्य की लाचारी को दर्शाते हैं। बल्कि 2020 में मनुष्य कहीं से भी लाचार नहीं दिखाई दिया। महामारी अब प्रकृति की असीमित शक्ति नहीं रही। विज्ञान ने उन्हें अब एक सँभालने योग्य चुनौति बना दिया है।
तो फिर इतनी मौतें और पीडा क्यों हुई? गलत राजनीतिक निर्णयों की वजह से।
प्राचीन काल में जब मनुष्यों को ब्लैक डेथ (13वीं शताब्दी के दौरान आई महामारी) जैसे प्लेग का सामना करना पडा, तो उन्हें इसका बिल्कुल भी अनुमान नहीं था कि यह किस वजह से हुआ और इसे कैसे रोका जा सकता था। 1918 में जब इंफ्लुएँजा की महामारी आई तो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भी इस घातक विषाणु को पहचान नहीं सके। बचाव के कई उपाय अनुपयोगी सिद्ध हुए। और प्रभावी वैक्सीन बनाने के प्रयास भी सफल नहीं हो पाए।
कोविड-19 के मामले में यह बेहद अलग था। सम्भावित नई महामारी के सर्वप्रथम संकेत दिसम्बर 2019 में मिलने लग गए थे। और 10 जनवरी 2020 तक वैज्ञानिकों ने न केवल उत्तरदायी विषाणु को अलग कर लिया था अपितु उसके जीनोम सीक्वेंस की जानकारी भी ऑनलाइन प्रकाशित कर दी थी। और कुछ ही महीनों में यह स्पष्ट हो गया था कि किन उपायों से संक्रमण की दर को धीमा किया जा सकता है अथवा तोडा जा सकता है। एक साल से भी कम समय के भीतर कई प्रभावी वैक्सीनों का बडे पैमाने पर उत्पादन शुरू हो गया। इंसानों और रोगोणुओं के बीच की लडाई में इंसानों ने इससे पहले कभी अपने आपको इतना शक्तिशाली अनुभव नहीं किया था।
ऑनलाइन दिशा में बढता जीवन
जैवतकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियों के अतिरिक्त, कोविड ने सूचना प्रोद्योगिकी के महत्त्व को भी रेखांकित किया। पुरातन युग में आप कदाचित् ही महामारी को रोक पाए क्योंकि इंसान तब वास्तविक समय में संक्रमण की श्ाृँ*खला को नहीं देख सकता था और लॉकडाउन के कारण होने वाला आर्थिक बोझ उठाना सम्भव नहीं था। 1918 में आप तीव्र ज्वर वाले व्यक्ति को संगरोध (क्वारंटीन) कर सकते थे, लेकिन आप गैर-लाक्षणिक अथवा अलाक्षणिक वाहकों की गति का अनुमान नहीं लगा सकते थे। और यदि आपने समूची जनसंख्या को घर पर रुकने के आदेश दिए होते, तो इसके परिणामस्वरूप आर्थिक दरिद्रता, सामाजिक विकार एवं भूखमरी उत्पन्न हो जाती।
इसके विपरीत, 2020 में डिजीटल निरीक्षण ने रोग संचालकों की पहचान करना आसान बना दिया। जिसका अर्थ है कि संगरोध अधिक चयनात्मक एवं प्रभावी तरीके से किया जा सका। उससे भी महत्त्वपूर्ण स्वचालन तथा इंटरनेट के कारण कम से कम विकसित देशों में तो लॉकडाउन लगा पाना और अधिक सम्भव हो पाया। हालाँकि विकासशील जगत के कुछ भागों में मानवीय अनुभव पुराने प्लेग के समय जैसा रहा पर विकसित देशों में डिजीटल क्रांति ने सबकुछ बदल कर रख दिया।
मसलन खेती का ही उदाहरण लें, हजारों वर्षों तक खाद्य उत्पादन मानवीय श्रम पर निर्भर था, और लगभग 90 प्रतिशत आबादी खेतों में काम करती थी। लेकिन आज के विकसित जगत में ऐसे हालात नहीं है। आज अमेरिका में केवल डेढ प्रतिशत आबादी खेतों में काम करती है, और वो न केवल हर घर बैठे व्यक्ति को भोजन देने के लिए पर्याप्त है बल्कि अमेरिका को एक अग्रणी खाद्य निर्यातक भी बनाती है। खेती का लगभग सारा काम मशीनों से किया जा सकता है, और उन्हें कोई रोग नहीं हो सकता। इस वजह से लॉकडाउन का खेती पर बहुत ही कम प्रभाव पडा।
ब्लैक डेथ के चरम पर एक गेहूँ के खेत की कल्पना कीजिए। यदि आप फसल कटाई के दौरान किसानों को घर पर रुकने के लिए कहते, तो उससे भूखमरी फैल जाती। यदि आप किसानों को कटाई के लिए बुलाते, तो शायद वे एक दूसरे को संक्रमित कर देते। तो ऐसे में क्या किया जाए? अब 2020 में उसी गेहूँ के खेत की कल्पना कीजिए। एक जीपीएस निर्देशित कंबाइन मशीन से कहीं अधिक कौशल के साथ फसल काटी जा सकती है, और संक्रमण का भी कोई खतरा नहीं। वर्ष 1349 में एक किसान प्रतिदिन 5 ढेरी एकत्र कर पाता था, जबकि 2014 में कंबाइन मशीन ने 30000 ढेरी एकत्र करने का रिकॉर्ड स्थापित किया। फलस्वरूप कोविड-19 के कारण गेहूँ, मक्का और चावल जैसी मुख्य फसलों के वैश्विक उत्पादन पर कोई विशेष असर नहीं हुआ। लेकिन लोगों को भोजन करवाने क लिए केवल फसल उगाना जरूरी नहीं होता, आपको कई बार हजारों किलोमीटर तक उसका परिवहन भी सुनिश्चित करना होता है। इतिहास में हमने अक्सर पाया है कि महामारियों की गाथाओं में व्यापार मुख्य खलनायक रहा है।
घातक जीवाणुओं ने अपना सफर व्यापारिक जहाजों और लम्बी-दूरी तक चलने वाले जत्थों के जरिये किया है। उदाहरण के लिए ब्लैक डेथ पूर्वी एशिया से मध्य पूर्व तक सिल्क रोड के माध्यम से पहुँचा, और उससे आगे यूरोप तक का सफर उसने गेनोस के व्यापारी बेडे के माध्यम से किया। व्यापार से उस जमाने में बहुत ज्यादा खतरा हुआ करता था क्योंकि हर जहाज का चलाने के लिए जहाजियों की जरूरत हुआ करती थी। समुद्री बेडों में सैंकडों नाविकों की आवश्यकता हुआ करती थी, लेकिन फिर उन्हीं से बीमारी फैलने का खतरा सबसे ज्यादा हुआ करता था। वर्ष 2020 में स्वचालन और इंटरनेट ने विकसित देशों में लॉकडाउन को इसलिए भी अधिक व्यवहार्य बना दिया क्योंकि बहुत ही कम मनुष्यों की मदद से भी वैश्विक व्यापार को जारी रखा जा सकता था। आज के जमाने का स्वचालित मालवाहक जहाज शुरुआती राज्यों के सम्पूर्ण व्यापारी बेडे से अधिक माल ढोने की क्षमता रखता था। वर्ष 1582 में 16000 नाविकों की आवश्यकता वाला इंग्लिश व्यापारिक बेडा 68000 टन का माल ढोने की क्षमता रखता था। वहीं केवल 22 सदस्यों की आवश्यकता वाला 2017 से कार्यरत ओओसीएल हॉन्ग-कॉन्ग दो लाख टन तक का वजन ढोने की क्षमता रखता है।
यह बात सही है कि सैंकडों पर्यटकों से भरे क्रूज जहाजों और यात्रियों से भरे हवाई जहाजों ने पूरी दुनिया में कोविड-19 को फैलाया, लेकिन पर्यटन और यात्रा व्यापार का जरूरी हिस्सा नहीं है। पर्यटक अपने घर पर ठहर सकता है और व्यापार से जुडे लोग जूम पर ऑनलाइन बैठक कर सकते हैं और उस दौरान मानव विहीन जहाजों व मालगाडियों क जरिये वैश्विक अर्थव्यवस्था को चलायमान रखा जा सकता था। 2020 में जब अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन बिल्कुल तबाह हो गया था, तब भी समुद्री व्यापार में केवल 4 प्रतिशत की गिरावट आई। स्वचालन और डिजीटलाइजेशन का सेवाओं पर और भी अधिक गहरा असर हुआ। 1918 में यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि कार्यालय, विद्यालय, न्यायालय या धार्मिक स्थान लॉकडाउन में भी चालू रह सकते हैं। यदि छात्रों और शिक्षकों को आप उनके घरों में कैद कर देंगे, तो आप कक्षाएँ कैसे आयोजित करेंगे? लेकिन आज हम इसका उत्तर जानते हैं। ऑनलाइन मोड में जाने की अपनी ही कईं समस्याएँ हैं, और इस दौरान कई ऐसी मजाकिया घटनाएँ घटी हैं जिनकी पहले कल्पना नहीं की जा सकती थी। लेकिन फिर भी इसके जरिये काम किया जा सकता है ये भी अपने आप में एक सुखद आश्चर्य है। 1918 में मानवता केवल भौतिक जगत में निवास करती थी और जब वो विषाणु पूरी दुनिया में फैला, तो इन्सान के पास भागने के लिए और कोई जगह शेष नहीं बची थी। लेकिन आज हममें से कई लोग भौतिक और आभासी दोनों प्रकार की दुनियाओं में निवास करते हैं। इसलिए जब भौतिक दुनिया में कोरोनावाइरस फैला, तो कईं लोगों ने अपने जीवन को आभासी दुनिया में ढाल लिया, जहाँ उनके पीछे कोरोनावाइरस नहीं आ सकता था।
निःसन्देह मनुष्य आज भी भौतिक जगत में निवास करता हैं और हर चीज को डिजीटल रूप में नहीं ढाला जा सकता। कोविड ने नर्स, सफाईकर्मी, ट्रक ड्राइवर, कैशियर और आपूर्तिकर्ताओं जैसे कम पैसों पर काम करने वाले लोगों के महत्त्व को रेखांकित किया है। ऐसा अक्सर कहा जाता है कि हर सभ्यता और बर्बरता के बीच केवल तीन वक्त के खाने की दूरी होती है। 2020 में आपूर्तिकर्ताओं ने सभ्यता की उस रेखा को थामे रखा था। वे भौतिक जगत में हमारी सबसे महत्त्वपूर्ण जीवनरेखा बन गए। कोविड के वर्षों के दौरान जब मनुष्य अपनी गतिविधियाँ ऑनलाइन संचालित कर रहा था, तब एक अच्छी बात ये रही कि इंटरनेट में कोई व्यवधान नहीं आया। यदि किसी भौतिक पूल पर एकदम से यातायात बढा दिया जाए, तो हमें ट्रैफिक जाम का सामना करना पडेगा या पूल के टूट जाने का भी खतरा है। 2020 में रातोरात स्कूल, ऑफिस और चर्च ऑनलाइन रूप में तब्दील हो गए, लेकिन इंटरनेट यथावत बना रहा। हम इस बात पर ध्यान नहीं देते, लेकिन हमें इस बारे में सोचना चाहिए।
2020 के बाद हमें पता चला कि जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हो तब भी जीवन बना रह सकता है। अब कल्पना करके देखिए कि अगर हमारा डिजीटल ढाँचा अगर लडखडा जाए, तो क्या होगा। जैविक विषाणुओं के समक्ष सूचना प्रोद्योगिकी ने हमें अधिक लचीला बनाया है, पर मैलवेयर और सायबर खतरों के प्रति हमें और अधिक संक्रामक बना दिया है। लोग अक्सर पूछते हैं कि अब अगला कोविड कौनसा होगा? अगली सम्भावना हमारे डिजीटल ढाँचें पर किसी आक्रमण से होगी। कोरोनावाइरस को दुनिया में फैलने में और लाखों लोगों को संक्रमित करने में कईं महीने लगे, लेकिन हो सकता है हमारी डिजीटल व्यवस्था एक दिन में ही चरमरा जाए। और स्कूल और कार्यालय बहुत तेजी से ऑनलाइन रूप ले रहे हैं, आपको क्या लगता है कि हमें वापस पुरानी पद्धति पर लौटने में कितना समय लगेगा?
क्या चीज मायने रखती है?
कोविड ने तकनीकी और वैज्ञानिक शक्ति की सीमा के बारे में बताया है। विज्ञान कभी भी राजनीति को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता। जब हमें अपनी नीतियों का निर्माण करना होता है, तो हमें कई हितों और मूल्यों को ध्यान में रखना पडता है। पर चूंकि कौनसे हित अथवा मूल्य अधिक महत्त्वपूर्ण हैं यह निर्धारित करने का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं है, इसलिए इसलिए हमें क्या करना चाहिए यह निर्धारित करने का भी कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं है। उदाहरण के लिए जब लॉकडाउन लगाने का निर्णय लेना हो, तो केवल ये पूछना जरूरी नहीं है कि कितने लोग कोविड-19 से बीमार पडेंगे, अगर लॉकडाउन नहीं लगाया तो? हमें यह भी पूछना चाहिए कि कितने लोग अवसाद से ग्रस्त हो जाएँगे अगर लॉकडाउन लगाया तो? कितने लोग कुपोषण से ग्रस्त हो जाएँगे? कितने लोगों की नौकरी या पढाई छूट जाएगी? कितने लोंगों को उनके जीवनसाथी द्वारा प्रताडित किया जाएगा? अगर सभी डेटा सटीक और विश्वसनीय हो तब भी हमें हमेशा पूछना चाहिए कि हमारे लिए कौनसी चीज मायने रखती है? क्या मायने रखती है इसका निर्णय कौन लेगा? हम एक दूसरे के विरूद्ध संख्याओं का मूल्याँकन कैसे करते हैं? यह वैज्ञानिक की अपेक्षा एक राजनीतिक कार्य है। राजनेताओं को स्वास्थ्य, आर्थिक, और सामाजिक चीजों पर ध्यान देते हुए एक समग्र नीति बनानी होगी।
उसी प्रकार इंजीनियर कार्य करने में हमारी मदद के लिए डिजीटल प्लेटफॉर्म और संक्रमण की श्ाृँ*खला को तोडने के निगरानी उपकरण बना रहे हैं। लेकिन डिजीटलाइजेशन और निगरानी से हमारी गोपनीयता खतरे में पड रही है और तानाशही का नया रास्ता खुल रहा है। 2020 में व्यापक निगरानी अधिक विधिसम्मत और सामान्य बन गया। महामारी से लडना महत्त्वपूर्ण है पर क्या इस प्रक्रिया में अपनी स्वतंत्रता को खो बैठना उचित है? उपयोगी निगरानी और दुर्स्व प्न के बीच में संतुलन स्थापित करना इंजिनीयरों की बजाय राजनेताओं का काम है। प्लेग के समय में भी इस तरह की डिजीटल तानाशाही से हमारी रक्षा करने के लिए तीन नियम बेहद कामगर हो सकते हैं। पहला - आप जो भी डेटा लोगों के शरीर के बारे में एकत्र कर रहे हैं, उसका उपयोग मदद के लिए होना चाहिए बजाय कि उनको नियंत्रित करने या नुकसान पहुँचाने के लिए। मेरा फिजिशियन मेरे बारे में कई गोपनीय बातें जानता है। और मैं निश्चित हूँ क्योंकि मुझे विश्वास है कि उस सूचना का उपयोग वो मेरे फायदे के लिए करेगा। मेरे फिजिशियन को यह जानकारी किसी भी कॉर्पोरेशन या राजनीतिक पार्टी को नहीं बेचनी चाहिए। और ऐसा ही हमारे द्वारा स्थापित किसी भी महामारी निगरानी प्राधिकरण के साथ हाना चाहिए।
दूसरा, निगरानी हमेशा दोनों तरफ से होनी चाहिए। अगर निगरानी हमेशा ऊपर से नीचे की ओर होगी तो हम तानाशाही की तरफ बढते चले जाएँगे। इसलिए आप जब भी व्यक्तियों पर निगरानी बढाएँ, तो साथ में सरकार और बडे कॉर्पोरेशन पर भी निगरानी बढाएँ। उदाहरण के लिए आज के हालातों में सरकार बहुत ज्यादा पैसा बाँट रही है। लेकिन राशि के आवंटन की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाए जाने की आवश्यकता है। एक नागरिक के रूप में मैं यह जानना चाहता हूँ कि किसे क्या प्राप्त होता है और पैसा कहाँ जा रहा है। मैं चाहता हूँ कि पैसा उन लोगों को दिया जाए, जिन्हें इसकी सच में जरूरत है बजाय उन लोगों को देने कि मंत्रियों के रिश्तेदार या दोस्त हैं। यदि सरकार कहती है कि महामारी के बीच में ऐसा कोई तन्त्र बनाना जटिल है, तो इस बात पर भरोसा मत कीजिए। अगर आम लोगों पर निगरानी रखी जा सकती है, तो सरकार क्या कर रही है, उस पर भी निगरानी रखी जा सकती है।
तीसरा, कभी भी बहुत अधिक डेटा एक जगह पर केन्द्रित न होने दें। न तो महामारी के दौरान और न ही उसके बाद। डेटा पर एकाधिकार ही तानाशाही का रास्ता है। इसलिए अगर हम महामारी को रोकने के लिए बायोमीट्रिक डेटा एकत्र कर रहे हैं तो यह स्वतन्त्र स्वास्थ्य प्राधिकरणों द्वारा किया जाना चाहिए न कि पुलिस द्वारा। और एकत्र किए जाने वाले डेटा को सरकारी मंत्रालयों और बडे कॉर्पोरेशन के डेटा से अलग रखा जाना चाहिए। बेशक इससे दोहराव और अक्षमता उत्पन्न होगी। लेकिन अगर डिजीटल तानाशाही को रोकना है तो चीजों को थोडा अक्षम रखना ही होगा। 2020 की अभूतपूर्व वैज्ञानिक और तकनीकी सफलताओं ने कोविड-19 आपदा को नहीं सुलझाया। उन्होंने केवल इसे प्राकृतिक आपदा से एक राजनीतिक दुविधा में बदल दिया। जब ब्लैक डेथ के कारण लाखों लोग मारे गए, तो लोगों ने राजाओं और शासकों से ज्यादा अपेक्षा नहीं रखी। ब्लैक डेथ की पहली लहर के दौरान लगभग एक तिहाई इंग्लिश आबादी मारी गई, लेकिन इंग्लैण्ड के राजा एडवर्ड तृतीय को इसके कारण अपना सिंहासन नहीं गंवाना पडा। उस वक्त यह स्पष्ट था कि महामारी को रोकना शासक के बस की बात नहीं थी, इसलिए किसी ने उन्हें इसका जिम्मेदार नहीं ठहराया। लेकिन आज मानवता के पास कोविड-19 को रोकने के वैज्ञानिक उपकरण है। वियतनाम से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक कई देशों में यह बात साबित हुई है कि वैक्सीन के बिना मौजूदा उपकरणों से भी महामारी को रोका जा सकता है। हालाँकि इनकी अधिक आर्थिक और सामाजिक कीमत चुकानी पडेगी। हम विषाणु को तो हरा सकते हैं पर क्या हम जीत की कीमत चुकाने को तैयार है? इस वजह से वैज्ञानिक उपलब्धियों ने राजनेताओं के कंधों पर बहुत अधिक बोझ डाल दिया है।
दुर्भाग्य से अनेक राजनेता ये जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे। उदाहरण के लिए ब्राजील और अमेरिका के लोकवादी राष्ट्रपतियों ने खतरे को कम करके आँका। विशेषज्ञों की बात नहीं मानी बल्कि उल्टा इस सबमें किसी षडयन्त्र का अन्देशा जताया। वे कोई सशक्त संघीय योजना नहीं बना सके और उन्होंने राज्यों या स्थानीय स्तर पर महामारी रोकने के प्रयासों को भी चोट पहुँचाई। ट्रम्प और बोलसोनारो प्रशासन की लापरवाही व गैर-जिम्मेदारी के कारण लाखों की संख्या में मौतें हुई। इंग्लैण्ड भी शुरुआत में कोविड-19 की बजाय ब्रेक्सिट में अधिक व्यस्त दिखाई दिया। मेरे गृह देश इस्राइल को भी राजनीतिक कुप्रबंधन का सामना करना पडा। ऐसा ही कुछ ताइवान, न्यूजीलैंड और साइप्रस के साथ हुआ। बल्कि इस्राइल तो एक द्वीपीय देश है जहाँ से आने जाने का केवल एक रास्ता बेन गुरियन एयरपोर्ट है। लेकिन महामारी के चरम पर भी नेतन्याहू सरकार ने बिना किसी संगरोध अथवा जाँच के यात्रियों को आने जाने दिया। और न ही लॉकडाउन के सम्बन्ध में कोई नीति बनाई।

इस्राइल और इंग्लैण्ड दोनों वैक्सीन इजाद करने में अग्रणी रहे, पर उनकी शुरुआती गलतियाँ उन पर भारी पडी। ब्रिटेन में महामारी के कारण 120000 लोगों की मौत हुई। जो कि औसत मृत्युदर के हिसाब से दुनिया में छठा स्थान है। उसी दौरान इस्राइल में सातवें सबसे अधिक केस सामने आए। और इस आपदा से निपटने के लिए अमेरिकन कार्पोरेशन फाइजर के साथ वैक्सीन के बदले डेटा का समझौता किया गया। फाइजर ने समूची जनसंख्या हेतु वैक्सीन उपलब्ध करवाने को सहमति प्रदान की और बदले में राज्य की सबसे महत्त्वपूर्ण सम्पत्ति, लोगों के गोपनीय डेटा की माँग की। हालाँकि कईं देशों ने अच्छा प्रदर्शन किया, पर वायरस को हराने में समग्र रूप में मानवता विफल रही। 2020 के शुरुआती महीने दुर्घटना को धीमी गति से देखने के समान थे। आधुनिक संचार के कारण दुनिया ने पहले वुहान की और बाद इटली की तस्वीरें देखीं। लेकिन आपदा से ग्रस्त होती दुनिया के समक्ष कोई वैश्विक नेतृत्व नहीं उभर पाया। उपाय सामने थे लेकिन राजनीतिक बुद्धिमत्ता की भारी कमी थी।
विदेशों से बचाव
वैज्ञानिक सफलताओं और राजनीतिक विफलताओं के बीच अन्तर का एक कारण यह भी था कि जहाँ वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया में एक दूसरे का सहयोग किया वहीं राजनेताओं ने सामन्तवादी व्यवहार दर्शाया। कहीं अधिक अनिश्चितताओं और तनाव में काम करते हुए भी वैज्ञानिकों ने एक दूसरे से जानकारी साझा की और दूसरों के परीक्षणों पर विश्वास किया। कई महत्त्वपूर्ण शोध परियोजनाओं अन्तर्राष्ट्रीय समूहों द्वारा आयोजित किए गए। उदाहरण के लिए लॉकडाउन उपायों की क्षमता बताने वाले एक अध्ययन को 9 संस्थानों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। उन 9 में से एक इंग्लैण्ड में, 3 चीन में और 5 अमेरिका में थे। इसके विपरीत राजनेता विषाणु से लडने के लिए कोई वैश्विक योजना बनाने में विफल रहें। दुनिया की दो महत्त्वपूर्ण ताकतों यूएस और चीन ने एक-दूसरे से महत्त्वपूर्ण जानकारी छिपाई और बल्कि जानबूझकर वायरस फैलाने के आरोप तक एक-दूसरे पर लगाए। ऐसे ही कईं अन्य देशों ने महामारी के फैलाव को लेकर जानकारियाँ छिपाईं।
वैश्विक सहयोग की कमी ने न केवल इन सूचना युद्धों में बल्कि मेडिकल उपकरणों को उपलब्ध करवाने में भी दिखाई दी। हालाँकि उदारता और सहयोग के कईं उदाहरण दिखाई दिए पर उपलब्ध संसाधनों को एक साथ लाने, वैश्विक उत्पादन को कारगर बनाने, और आपूर्ति का न्यायोचित वितरण सुनिश्चित करने के कोई गम्भीर प्रयास नहीं किए गए। विशेष रूप से हाल ही में पनपे वैक्सीन राष्ट्रवाद ने एक नई प्रकार की असमानता को जन्म दिया। यह देख कर बेहद दुख होता है कि कईं लोग यह समझने में असफल रहे कि जब तक यह वायरस फैलता रहेगा, तब तक दुनिया में कोई भी देश इससे सुरक्षित नहीं अनुभव कर सकता। मान लीजिए अगर इंग्लैण्ड और इस्राइल अपनी समूची जनसंख्या को वायरस से मुक्त करवा लेते हैं, तो भी यह वायरस भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की आबादी में फैलता रहेगा। ब्राजील के किसी दूरस्थ गाँव हुआ कोई उत्परिवर्तन हो सकता है कि वैक्सीन को निष्प्रभावी बना दें और उसके वजह से संक्रमण की नई लहर पनप सकती है। मौजूदा आपातकाल में केवल परोपकार के अनुरोधों से राष्ट्रीय हितों को हल्का नहीं किया जा सकता।
लेकिन मौजूदा हालातों में सहयोग केवल परोपकार नहीं है बल्कि राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने के लिए बहुत आवश्यक है। पूरी दुनिया के लिए एन्टी-वायरस का तर्क न केवल 2020 में प्रासंगिक था बल्कि यह आने वाले कई वर्षों तक गुंजायमान रहेगा। लेकिन सभी राजनीतिक खेमों को कम से कम इन तीन सबकों से तो अवश्य सहमत होना होगा। पहला, हमें अपना डिजिटल ढाँचा सुरक्षित करने की आवश्यकता है। महामारी के दौरान यह हमारा रक्षक बन कर उभरा है, पर यह जल्द ही किसी भयानक आपदा का कारण बन सकता है। दूसरा, हर देश को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर और अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। तीसरा, हमें महामारी से बचाव के लिए शक्तिशाली वैश्विक निगरानी तन्त्र बनाने की आवश्यकता है। इंसानों और रोगाणुओं के इस सदियों पुराने युद्ध में पहली पंक्ति हम सभी इंसानों के शरीर से होकर गुजरती है। यदि यह पंक्ति पूरे ग्रह पर कहीं भी चोटिल होती है, तो हम सब खतरें में पड जाते हैं। विकसित देशों के सबसे अमीर लोगों के भी यह व्यक्तिगत हित में है कि वे अविकसित देशों के गरीब लोगों की रक्षा करें। यदि किसी सुदूर जंगल में मौजूद किसी गाँव कोई विषाणु चमगादड से मनुष्य में प्रवेश करता है, तो जल्द ही वह विषाणु हमें वालस्ट्रीट पर भी दिखाई देगा।
ऐसे वैश्विक ्महामारी निरोध तन्त्र का ढाँचा विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य संगठनों के रूप में पहले से मौजूद है। लेकिन इस व्यवस्था को मिलने वाली धनराशि बेहद कम है और इसके अन्दर कोई राजनीतिक ताकत भी नहीं है। इस व्यवस्था को राजनीतिक संरक्षण और पैसा मुहैया करवाने की आवश्यकता है, ताकि ये राजनेताओं पर आश्रित न रहे। मैं यह विश्वास करता हूँ कि अनिर्वाचित विशेषज्ञों को महत्त्वपूर्ण नीति निर्माण का कार्य नहीं करना चाहिए। यह राजनीतिज्ञों का काम है। लेकिन स्वास्थ्य सूचनाओं को एकत्र करने, सम्भावित खतरों की निगरानी करने, खतरों से अवगत करवाने, शोध और विकास को बढावा देने के लिए एक स्वतंत्र वैश्विक स्वास्थ्य संस्था उपयुक्त रहेगी। कई लोगों को यह भी लगता है कि कोविड-19 तो बस नई महामारियों की शुरुआत भर है।
लेकिन अगर उपरोक्त सबकों को लागू किया जाता है, तो कोविड-19 जैसा झटका संभवतः कम सामान्य हो सकता है। मनुष्य रोगाणुओं की उत्पत्ति को रोक नहीं सकता। यह एक सामान्य उद्विकासी प्रक्रिया है जो पिछले कई अरबों वर्षों से अनवरत जारी है और भविष्य में भी जारी रहेगी। लेकिन आज मनुष्य के पास नए रोगाणुओं के फैल कर महामारी बनने से रोकने के लिए आवश्यक ज्ञान और उपाय मौजूद है। अगर 2021 में भी कोविड-19 ने फैल कर लाखों लोगों को मारा या 2030 में कोई और महामारी मनुष्यता पर हमला करती है, तो इसे अनियंत्रित प्राकृतिक आपदा या ईश्वर का दण्ड नहीं कहा जाएगा। यह हम मनुष्यों की विफलता मानी जाएगी या और सटीक रूप से कहे तो एक राजनीतिक विफलता।

सम्पर्क - सेट नम्बर 2, क्लेरविला,
समरहिल शिमला - १७१००५
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