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गौरांग नदी के किनारे कविता की कलकल

पद्मजा शर्मा
कोकराझार अन्तर्राष्ट्रीय कविता महोत्सव में भाग लेने के लिए गुवाहाटी एयरपोर्ट से जाने-माने कवि मीठेश निर्मोहीजी और मैं पद्मजा शर्मा बाहर निकले* तो 12 नवम्बर की वह शाम बडी सुहानी लग रही थी, लंबे और थकाने वाले सफर के बाद भी । कविता महोत्सव में मीठेश निर्मोहीजी मुख्य अतिथि तथा कविता पाठ के लिए आमंत्रित थे और मैं कविता पाठ तथा विमर्श के लिए । 14 से 16 नवम्बर 2021 तक आयोजित होने वाले इस महोत्सव की थीम थी- प्रेम और शांति के लिए कविता ।
एयरपोर्ट से बाहर आते ही मीठेश निर्मोही जी के मित्र असमी कवि मुनींद्र महंतो ने आरोनाई यानी शॉल उढाकर हमारा स्वागत किया । हम अपनेपन से भर गए। उस समय लगभग पाँच बज रहे थे । इमली और सिश्यू के घने दरख्तों पर चिडियाएँ भी चूं- चूं ,चीं -चीं के साथ हमारा स्वागत कर रही थीं । असंख्य वाहन ,लोग बाग ,चिल्ल पों हो रही थी । मगर चिडियों के कलरव में अपने बच्चों से मिलने की उतावली ,उन्हें चुग्गा देने की जल्दबाजी, सुबह से लेकर अब तक के उनके हाल चाल जानने की इच्छा जाहिर हो रही थी । कितने सारे पेड ,कितनी सारी चिडियाएँ। उनका गीतों जैसा शोर सुनकर लगा जैसे दिन भर की थकान थोडी कम हुई मगर चाय की इच्छा बलवती हुई।
हम डॉ बिहुंग ब्रह्मा द्वारा भेजी गई कार का इन्तजार कर रहे थे। भूख भी लग रही थी। चाय की तलब भी हो रही थी। मगर महंतोजी ने बताया कि यहाँ आसपास चाय नहीं मिलेगी, जैसे ही कार आएगी आप लोगों को चाय पिलाने ले जाएँगे।
कार का इन्तजार करते हुए मैं सोच रही थी, सुनते आ रहे थे बोडोलेंड अशांत एरिया है। मगर यहाँ अशांति जैसी कोई बात नजर नहीं आई। जहाँ चिडियाँ चहकती हों, वहाँ अशांति और तनाव के बारे में कोई कैसे सोच सकता है। सब लोग अपने अपने काम में लगे हुए हैं । सामान्य गति से जीवन चल रहा है ।
हम कार द्वारा कोकराझार के लिए निकले। बीच में एक रेस्त्रां में हमने इडली खाई, चाय पी। महंतोजी साथ थे, उन्होंने भी इडली ली। मगर जो दो बन्दे साहित्य महोत्सव के प्रतिनिधि थे-संजय राय गाडी चला रहा था, और मिथलेश साथ में था-, हमें कार से लेने आए थे, उन्होंने कुछ नहीं लिया। बोले हम ले चुके। इडली बडी -बडी थी। साथ में साँभर और मूँगफली की चटनी थी। पेट एकदम से भर गया। उस समय लगा जैसे रात के खाने की छुट्टी।
रास्ते में मीठेश निर्मोहीजी संजय और मिथलेश से बातें करते हुए आए। दो तीन किलोमीटर के बाद महंतोजी उतर गए थे अपने ऑफिस के लिए।
हमें प्यास लगी तो मिथलेश पानी लाया। भूख लगी, तो वह हमें रेस्त्रां ले गया। पेमेंट उसी ने किया। जब मीठेशजी के मोबाइल की बैटरी में प्रोब्लम आ गई, तो उसे ठीक करवाने के लिए कोई दुकान देखी, मगर बात नहीं बनी। तभी मैंने एक छोटे ताले की फरमाइश कर डाली। मिथलेश ने इसके पैसे भी दिए। मैंने पैसे के लिए कहा, तो बोला आप मेहमान हैं आपसे पैसे नहीं लेंगे। मगर मीठेशजी ने मुझसे पहले ही उसे जबरदस्ती रुपए थमा दिए।
हम हाइवे से नहीं बल्कि दूसरे रास्ते से लगभग नौ बजे ब्रह्मपुत्र नदी का पुल,जंगल, बस्तियाँ, गाँव पार करते हुए सीआईटी गेस्ट हाऊस पहुँचे। खुला-खुला, हरा -भरा, शान्त। चिडियाएँ जैसे सब सो गई थीं। दरख्त भी। मगर रिसेप्शन पर हमारा इंतजार हो रहा था। हमें थोडी-सी देर सोफे पर बैठने को कहा। पानी के गिलास आए।
गेस्ट हाउस के रूम बोरोखो ए की चाबी मुझे सौंपी और मौर्या की मीठेशजी को। हमारी अटैचियाँ हमारे साथ ही प्रथम तल्ले के दोनों कमरों में पहुँचा दी गईं।
गेस्ट हाउस के रूम बडे साफ-सुथरे, हर सुविधा से लेस। स्क्रीन, कम्प्यूटर, सोफा, अलमारी, टेबल-कुर्सी। साफ-सुथरा, बडा-सा वाश रूम। खिडकियाँ, पर्दे। कोई दिक्कत नहीं।
डायनिंग हाल में खाना खाया। चावल-दाल, पनीर की सब्जी और खट्टी मीठी कोई मिठाई रसगुल्ला जैसी। डॉ. बिहुंग ब्रह्माजी ने हमारे साथ खाना खाया। मैं अब तक सोचती रही कोई उम्रदराज व्यक्ति हैं। डेलीगेट्स से वे ही फोन पर बातें कर रहे थे। मगर ये तो बहुत छोटे हैं उम्र में। इतनी कम उम्र में इतनी बडी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे थे आप। कविता महोत्सव में आपकी बडी भूमिका रही। इनकी पत्नी और बेटी से यहीं मुलाकात हुई। गेस्ट हाऊस में टिके मेहमानों की जिम्मेदारी थी प्रफुल्ल बासुमतारीजी के कंधों पर।
रात के ग्यारह बजे मैं अपने बिस्तर पर निढाल हो रही हूँ। थकान से बेदम हो रही हूँ।
13 की सुबह मीठेशजी के फोन से आँख खुली। यूँ एक बार तो सुबह चार बजे आँख खुल गई, फिर सात बजे। मगर लगा उठकर क्या ही कर लेंगे। थके हुए हैं, सो ही जाते हैं। तेरह का दिन वैसे भी खाली है हमारा। कार्यक्रम तो 14-15-16 को है। मीठेशजी तो जल्दी उठ गए, नहा लिए। वे जब तक उनका वक्तव्य हो नहीं गया, तब तक चिन्तित रहे।
सुबह सवा आठ बजे हम डायनिंग हाल में थे। नाश्ते में दाल, पूडियाँ, केले, अण्डे थे।
मीठेशजी लोसार दवा लाना भूल गए। वो लेने हम सवा नौ बजे निकले। ली और लौट आए।
अपनी कविताएँ और समकालीन कविता पर आलेख टटोल रही हूँ। एक बार फिर देख लूँ। जब तक कार्यक्रम हो न जाता, तब तक यह कार्यक्रम चलता रहेगा। लिखे हुए को पढना-देखना फिर पढना।
डायनिंग हाल में ध्वनीश पारीक गाँधी नगर से थे, और मीता दासजी से बैंगलोर से थीं, सब से मुलाकात हुई। मीताजी के पति भी साथ थे। वे बता रही थीं कैसे उनका सुबह प्लेन छूटा, किस तरह एयरपोर्ट अथौरीटी से वे और उनका बेटा भिड गए। उन लोगों ने पाँच मिनिट पहले ही बेल्ट बन्द कर दिया। गलती उनकी थी। इसीलिए उसी पैसे में शाम की फ्लाइट से आए। वे बता रही थीं कि कैसे बिहुंग ने उन्हें रुपए भेजे, तब जबकि वे हमें पहले से जानते तक नहीं थे।
दोपहर के बारह बज रहे हैं। चारों तरफ धूप निकली हुई है। मैंने रूम के परदे हटा दिए हैं। खिडकियाँ खोल दी हैं। धूप भीतर झपटकर आई है। बाहर पेड-पौधे खडे हैं। कुछ पेड पत्तियों से विहीन मगर बहुत से पेड हरे भरे। धरती पर पत्तों के ढेर लगे हैं। सूखे-हरे पत्तों के। पक्षियों का कलरव सुन रही हूँ। सुबह, दोपहर, शाम कोई भी समय हो जहाँ जाओ चिडियों की चीं-चीं सुनाई देती है। आनन्द विभोर कर देती है। कभी मिथलेश, कभी संजय, कभी बिहुंगजी, तो कभी प्रफुल्ल जी के मुँह से यह के शहीदों के किस्से, तो कभी यूनिवर्सिटी के बारे में तो कभी इस फेस्टिवल की तैयारियों के बारे में बातचीत होती है। ये सब लोग बडे सरल, सहज, अनुशासित और ऊर्जावान हैं।
धूप है, गर्मी है, चिडियाँ हैं। मैं खिडकियाँ बन्द करती हूँ। धूप की वजह से कमरा काफी गर्म हो गया है। कमरे में एक पंखा है जो तीव्र गति से हवा फेंक रहा है। चारों तरफ इमारतें, हरियाली ,बस मिनख कम दिख रहे हैं। क्या मेरी तरह वे भी अपने कमरों में दुबके बैठे हैं। इसी बीच बिहुंगजी सुबह के कार्यक्रम के फोटो भेज रहे हैं टेलीग्राम पर। बहुत सुन्दर नृत्य, आवाज, गीत-सजावट, रंगा-बिरंगा माहौल, कितने सारे लोग।
प्रफुल्लजी आ गए हैं। कह रहे हैं खाना खाने चलें। आती हूँ।
बोडो के सामाजिक कार्यकर्ता और ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष थे उपेंद्रनाथ ब्रह्मा(बोडो)। उनकी याद में सम्मान दिया गया अभय बंगजी को। यह बोडोफा उपेंद्रनाथ ब्रह्मा सोलजियर ऑफ हयूमनिटी अवार्ड उपेंद्र नाथ ब्रह्मा ट्रस्ट द्वारा दिया गया था। उसका बडा आयोजन था कोकराझार में। हमारा खाना भी इसी कार्यक्रम में था। हम प्रोग्राम में नहीं जा पाए थे।
हम खाना खाकर आगए। मीताजी और उनके पति तो कार्यक्रम में भी गए थे। मैं और ध्वनिल कार्यक्रम स्थल पर गए, तो मेले की-सी रौनक थी। स्कूल-कॉलेज के बच्चे काफी संख्या में घूम रहे थे। लग रहा था जैसे कितने सारे फूल खिल गए हैं या कि सितारे जमीन पर उतर आए हैं।
खाने में चावल,चावल की खीर, सलाद, पनीर की सब्जी और गुलाब जामुन जैसी खट्टी-मीठी मिठाई जिसे वे लालमोहन कह रहे थे, खाई। केला भी था। वहाँ हमारी मुलाकात गणेशदेवी सर से हुई। थोडी देर में मीताजी और उनके पतिदेव आ गए। मीताजी बोली, आप लोग नहीं गए अच्छा रहा, गर्मी बहुत है।
कार्यक्रम स्थल से सीआईटी गेस्ट हाऊस आते समय देखा सडक के दोनों तरफ हरियाली खूब है। ताम्बूल के पतले लम्बे वृक्षों की भरमार है। कार में ध्वनिल को मैंने अपनी शब्दचित्रों की किताब हँसो ना तारा भेंट की। उसने कहा कुछ लिखकर दो। लिखा स्नेहिल ध्वनिल को सप्रेम। यह कार में नहीं लिख पाई तो गेस्ट हाउस में आकर लिखा।
थोडी देर वहाँ प्रफुल्लजी और एक फैकल्टी मेम्बर से मुलाकात हुई। बोडो, असमिया और हिंदी के शब्दों की समानता और नए-नए शब्दों पर बात चल गई। आसारी मेहमान को कहते हैं बोडो में। दूसरा को दोसरा कहते हैं। स्त्रियों की ड्रेस दोखना और पुरुषों की गमसा है।
बोडो भाषा देवनागरी लिपि में और असमिया बांग्ला लिपि में लिखी जाती है। बोडो समर्थकों ने कहा हमें बांग्ला लिपि नहीं चाहिए। रोमन स्वीकृत कर दो मगर सरकार ने कहा देवनागरी लिपि में लिखें। इन लोगों ने यह प्रस्ताव मान लिया। बोडो भाषा असम की आधिकारिक भाषाओं में से एक है। भारत में यह विशेष संवैधानिक दर्जा प्राप्त 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक है।
बोडो भाषा की लिपि निर्धारण के समय बोडो इलाके में इसाई संगठनों का बोलबाला था। वे चाहते थे कि बोडो भाषा की लिपि रोमन हो मगर बोडो साहित्य सभा में बोडो भाषा की लिपी के मताधिकार के समय रोमन लिपि चाहने वाले समूह की हार हो गयी। और देवनागरी बोडो भाषा की लिपी बन गई। उस आक्रोश में बोडो साहित्य सभा के अध्यक्ष श्री बिनेश्वर ब्रह्म की 2000 में हत्या कर दी गई।

देवनागरी लिपि होने के कारण लगता ही नहीं बोडोलेंड में है, लगता है जोधपुर में हैं। सभी दुकानों, संस्थानों, होर्डिंग आदि पर इसी लिपि को देखा जा सकता है ।
13 की रात गेस्ट हाउस में ही सभी आए कवियों का स्वागत था । केबिनेट मिनिस्टर यू जी ब्रह्मा आए। उससे पहले बी.टी.आर चीफ प्रमोद बोडो आए। यू जी ब्रह्माजी और मीठेशजी की मित्रता देखते ही बनती थी। प्रगाढ मित्रता। वे पूरे आयोजन में उपस्थित थे और मीठेशजी के साथ-साथ थे। मीठेशजी एक सत्र में कविता पाठ कर चुके थे मगर बी.टी.आर चीफ प्रमोदजी ने उनसे और कविताएँ सुनने की इच्छा जाहिर की, तो मीठेशजी ने और कविताएँ सुनाई। मीठेशजी ने राजस्थानी में भी अपनी कविताएँ सुनाई। हिन्दी में भी। उद्घाटन सत्र में मंच पर मुख्य अतिथि की हैसियत से थे तो समापन समारोह में भी यू जी ब्रह्माजी मंच पर मीठेशजी को अपने साथ ले गए।
बहरहाल, इस समय तक धारवाड कर्नाटक से गणेश एन देवी, जोधपुर से मीठेश निर्मोही, जयपुर से हीरा मीना, गाँधी नगर गुजरात से ध्वनिल, आन्ध्र से शिवराम आ गए थे। चण्डीगढ और पंजाब से भी इसी समय कुछ कवि पहुँचे। बैंगलोर से मीतादास और उनके पति यहीं थे। दिल्ली से जितेंद्र श्रीवास्तवजी आदि दूसरी जगह ठहरे थे। भोपाल से सुधीर सक्सेना जी। आप बोंगाई गाँव में होटल में ठहरे थे । बोधिसत्व मुम्बई से आए। पंजाब से डॉ पाल कौर, दिल्ली से नितिन सोनी, मालेगाँव गोवाहाटी से मुनीन्द्र महन्तो, आंध्रा से शिवाजी राव। और भी अनेक जगहों से कवि इकट्ठे हुए जैसे सिक्किम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, महाराष्ट्र, राजस्थान, अहमदाबाद, आसाम, गोआ, अलीगढ, हैदराबाद, अम्बाला चण्डीगढ, मधुबनी बिहार, आदि आदि। जयपुर से हरीश कर्मचंदानी और उनकी कवि पुत्री अपूर्वा, आबू रोड से दिनेश चारण ये लोग बाद में आए। इंग्लैण्ड, श्रीलंका, थाइलेंड, इन्डोनेशिया, नैरोबी, कंबोडिया, नीदरलेंड्स, कोपेनहेगन आदि देशों से बहुत से कवि ऑनलाइन जुडे।
सब कवियों का स्वागत किया गया। आरोनाई पहनाकर। कहा गया सब कुछ कुछ बोलें। यहाँ के बारे में, अपने बारे में । श्री गणेश एन देवीजी भाषा विज्ञानी हैं। आपने बोलियों पर बडा काम किया है । इन्होंने कहा बोडो लोगों को ब्रह्मपुत्र के इतिहास को खोजने की जरूरत है। शोध, पर्यावरण की बात की। कइयों का कहना था आने के पहले जो डर था वो निकल गया। लोग अच्छे। माहौल अच्छा। प्रकृति के निकट। कवियों के स्वागत में शाम का भोजन यू जी ब्रह्माजी की तरफ से था।
हाल में बैठे थे तब गणेशजी से मैंने कहा आप तो पद्मश्री से सम्मानित हो चुके हैं सर। पलटकर बोले आप सपने देखती हैं, नाइट मेयर? मैंने कहा -हाँ। और सुबह भूल जाती हैं? हाँ। बस वही पद्मश्री और मेरे साथ हुआ। फिर सर ने पद्मश्री के लिए पत्र, इन्क्वायरी आने तक की ही नहीं, दिल्ली में हुई रिहर्सल आदि के बारे में भी बताया। सर ने कहा मैं भूल गया, मगर मैंने कहा-कहाँ भूले? आपको आज तक याद है। सब लोग हँसे। गणेशजी की हाइट के कारण कहा गया कि आप राष्ट्रपति महोदय के सामने झुक कर रहिएगा। उनसे ऊँचे नहीं दिखिएगा। फोटो में हँसना है, फोटोग्राफर को देखना है। उन्हें सिवाय पद्मश्री के मिला क्या? आज भी किराए के घर में रह रहे हैं। न बस पास, न ट्रेन पास, किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं।
113 भाषा बोलियों के कविता -उत्सव का 14 तारीख को सुबह नौ बजे कोकराझार में शुभारम्भ ध्वजारोहण से था। बोडोफा कल्चरल कॉम्पलेक्स में उस समय भी सैंकडों लोग उपस्थित थे। बाहर से आए कवियों में मीठेश निर्मोही जी और शिवाजी राव उपस्थित थे, जब सेरीमोनियल ध्वजारोहण हुआ तब । और यह काम कोकराझार लिटरेरी फेस्टिवल के चेयरमैन प्रो सूरथ नारजारी के हाथों हुआ। एक और दूसरा झण्डा भी फहराया गया। फहराने वाले थे श्री तारेन बोरो, बोडो साहित्य सभा के अध्यक्ष। दो झण्डे एक साथ फहराते हुए देखे। इस समय देश भक्ति के तराने माहौल में गूँज उठे। मीडिया वालों की भरमार थी। वे सुरथ नारजारिजी के साथ ही श्री तारेन बोरो का भी इंटरव्यू ले रहे थे। मीठेशजी के भी कई इंटरव्यू हुए। मीठेशजी को असल में वहाँ बडा आदर सत्कार मिलता है। मीठेश निर्मोहीजी ने सृजन के साथ ही असम में ही नहीं पंजाब, गुजरात, केरल आदि जगहों पर अनुवाद का काफी काम किया है। सब जगह साहित्यकारों के बीच आपकी बडी पूछ और इज्जत है ।
लौटते समय उस होर्डिंग के पास जिस पर लिखा था कोकराझार लिटरेचर फेस्टिवल हमने फोटो भी खिंचवाई।
एक घण्टे में यह कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। हम गेस्ट हाउस लौट आए। फिर गए एक बजे, उद्घाटन समारोह में। बडा सारा भव्य मंच। मुख्य अतिथि मीठेश निर्मोहीजी, अध्यक्ष प्रो सूरथ नारजारी थे। स्वागत भाषण दिया श्री शांतनु पी.गोतमारे बी.टी.आर के प्रिंसिपल सक्रेटरी ने। उदघाटन कर्ता थे प्रमोद बोडो, बी.टी.आर के मुखिया, मुख्य वक्ता प्रो.अनिल बोरो, कनवीनर बोडो एडवाइजरी बोर्ड साहित्य अकादमी, विशिष्ट मेहमान थे अश्विनी चौबे सम्माननीय रूह्रस् फूड एँड सिविल सपलाइज, फॉरेस्ट श्वहृङ्क, गेस्ट ऑफ ओनर श्री उर्खाओ ग्वारा ब्रह्मा, ऑनरेबल केबिनेट मिनिस्टर आसाम, गणेश एन देवी, अभय बंग, श्रीतोरेन बोडो, प्रेसिडेंट बोडो साहित्य सभा, श्री दीपेन बोडो आदि।
इस महोत्सव को विश्व भर के लोग जिस तरह गाँधी, मीरा, कबीर को याद किया जाता है वैसे लम्बे समय तक शान्ति और प्रेम के लिए याद करेंगे। राजस्थानी और हिंदी के नामचीन कवि, अनुवादक मीठेश निर्मोही जी ने गौरांग नदी के किनारे, बोडोफा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में कोकराझार लिटरेरी फेस्टिवल के भव्य उदघाटन के समय ये कहा। बाद में भी आपने मंच से कहा कि इस महोत्सव को बच्चों से भी जोडिए।
इस सत्र के बाद कविता के सत्र शुरू हो गए। दो सत्र साथ-साथ चल रहे थे। एक सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे, गणेश.एन.देवी, इसमें राजस्थान से हिंदी के दिनेश चारण थे। बोडो, असमी, खासी, बंगाली, पंजाबी, नीशी, लिम्बु, टोटो, शेरदुकपेन, कोच राजबंगशी, मलयालम, टीवा, मगही, रींग भाषा बोलियों के कवि थे। दूसरे सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे प्रो.अनिल बोडो। इस सत्र में भोजपुरी, मैथिली, बोडो, गालों, गारो, उर्दू, कोदावा, तमिल, कोकबोरोक, मेंगर, डोगरी, सिंधी, गोलपरिया, हकून तंगसा भाषाओं के कवि थे। एक सत्र में लगभग 15 कवि थे। सबको तीन चार कविताएँ पढने को मिल रही थी। कोई मूल भाषा के साथ ही अनुवाद भी पढ रहा था। तीन बजे से साढे चार बजे तक दोनों सत्र चले। दूसरा सत्र दूसरे बडे हाल में था।
एक बार इस हाल में मैं तो गिर गई। सीढियों का पता ही नहीं चला। बाद में उन्हीं सीढियों पर मीठेशजी भी लडखडाए ।
एक परिसर में सारा इंतजाम था। कुछ स्टॉल्स भी लगी थीं पर वहां जाने का समय मिला ही नहीं।
कविता के तीसरे सत्र में मलयालम, कोकबोरॉक, रभा, बोडो, लद्दाखी, गुरुंग, सीइंग, दिमसा, हाजोंग, तुलु असमी, थाडो, जयंतियाँ, इंग्लिश, करबी भाषाओं की कविता हुई। इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे डॉ. गोपाल बर्मन।
सत्र थोडे समय से पीछे चल रहे थे। समय भाग रहा था। छह बजे का समय रखा था शान्ति सद्भाव के लिए प्रार्थना। मोम बत्तियाँ जलाई गई। फिर सांस्कृतिक कार्यक्रम था। इस समय मैं गेस्ट हाउस लौट आई। इन कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लिया। बल्कि वहीं खाना था वह भी नहीं लिया। गेस्ट हाउस के डायनिग हॉल से कमरे पर दूध ब्रेड मँगवा ली। मैंने दो दिन ऐसा ही किया।
रात को नींद में कोई दिक्कत नहीं आई। मगर पन्द्रह की रात नींद भाग गई। नींद की गोली थी पर्स में, पर पर्स था अलमारी में। उठकर गोली निकालने की जहमत मुझसे हुई नहीं।
पन्द्रह तारीख को सुबह साढे नौ बजे सत्र शुरू होना था। हम चाय नाश्ता कर के पौने नौ बजे ही प्रफुल्लजी के साथ निकल गए। मीठेशजी को उस दिन के अखबार देखने थे। गाडी में हमारे साथ शिवाजी राव भी थे। चार पाँच दुकानों पर ढूँढा शायद सिटी में जाकर, तब मिले। वहाँ से हम कल्चरल कॉम्पलेक्स पहुँचे। उस दिन मेरे दोनों सत्र थे। कविता पाठ और समकालीन कविता पर चर्चा। मैं तनाव में थी पहले तो, मगर चौदह की रात को मैंने चर्चा सत्र की मॉडरेटर अन्जली दैमारी का नम्बर प्रफुल्लजी से लिया और उनसे बात की। उनके कहे अनुसार कुछ कविताएँ भी ली पढने के लिए। थोडा तनाव कम हुआ। ग्यारह पैंतालीस पर सुधीर सक्सेनाजी के साथ सत्र की शुरुआत हुई।सत्र से पहले आपसे पण्डाल में भेंट हो गई थी। पहले हम पहले पण्डाल में थे फिर दूसरे में फिर पहले में आए। इसका पता नहीं चल रहा था की किसका सैशन किस पण्डाल में है। सक्सेनाजी ने मिलते ही मुझे अपनी पत्रिका दुनिया इन दिनों का पुराना अंक दिया। बहुत ही प्रेम से मिले ।ऐसे मिले जैसे कब से जानते हैं। मॉडरेटर को हमारा परिचय चाहिए था। मेरे कहने पर आपने मेरा परिचय भी लिख दिया। मेरे यह कहने पर कि मुझे लिखने में दिक्कत होती है। बोले कबसे? मंच पर मैने सर के साथ सोफा शेयर किया। मैं थोडी घबराई हुई थी। समकालीन कविता पर चर्चा थी। मैंने कहा सर अपने साथ मंच पर कोई और नहीं है। दो तीन प्रतिभागी आए ही नहीं। बोले चिंता मत करो खींच लेंगे।
अंजलीजी को जो कोकराझार में यूनिवर्सिटी में पढाती हैं सत्र का संचालन करना था। उन्होंने बात शुरू की। उनके आदेशानुसार सुधीर सक्सेना जी माइक पर चले गए और समकालीन कविता पर बोले। आपने कहा कविता हिंसा, घृणा, वैमनस्य विखण्डन को नहीं पोसती। विश्व की सारी कविताएँ अंततः प्रेम कविताएँ ही हैं। फिर तय यह रहा कि हम पहले अपने विचार खडे होकर माइक पर बोलेंगे बाद में बैठे- बैठे ही जवाब देंगे ।मैंने भी समकालीन कविता पर अपनी बात की। मैं पृष्ठभूमि पर बोली। अंजली जी के कहे अनुसार मैंने स्त्री कविता का पाठ भी किया। जाने उन्होंने कहाँ देखी-पढी यह कविता। हमारे साथ एक जने और थे लद्दाख के कोई बौद्ध गुरु। वे तो अपनी बात करने आए। साहित्य, कविता पर वे कुछ न बोले। अंजलीजी ने हमें कई विषय दिए जिन पर हम अपनी कविता पढ सकते थे। पर्यावरण, स्त्री, हॉप आदि-आदि। मैंने तीन कविताएँ पढीं एक स्त्री, शब्द और आ रही हैं लडकियाँ। मेरी कविताएँ सुनकर सक्सेनाजी ने कहा-मुझे आपकी कविताएँ अच्छी लगीं। पत्रिका के लिए दे दो या मेल करना। मुझे शब्द कविता पढने से पहले मलारमे याद आए। उन्होंने अपने दोस्त से कहा था कविता आइडिया से नहीं शब्द से लिखी जाती है।
कोई ज्यादा बातचीत समकालीन कविता को लेकर नहीं हो पाई इस सत्र में। जैसे कि बोडो परम्परा है कार्यक्रम के बीच में एक नृत्य प्रस्तुति जरूर होती है। यह भी हुई। नृत्य बडे सुन्दर होते हैं। समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। गीत बडे प्यारे होते हैं। बोल भले समझ न आएँ पर मन तक जाते हैं। दूसरी प्रस्तुति नहीं हुई। कुछ किताबों के विमोचन सत्र के बीच-बीच में होते रहे हैं। हुए।
मैं खाना खाकर, अखबार के लिए बात कर, पण्डाल में बाद में आई तब पता चला कविता पाठ वाला मंच सज चुका था। मेरी सीट खाली थी। कवि और आलोचक जितेंद्र कुमार श्रीवास्त्वजी अध्यक्षता कर रहे थे सत्र की। हिन्दी के साथ इस सत्र में कोकबोरोक, संस्कृत, बोडो, सोनोवाल, कछारी, बंजारा, अपतानी, तमंग, ड्योरी, कन्नड, चकमा आदि भाषाओं में कविता पाठ हुआ। मैने चार छोटी-छोटी कविताएँ पढीं। इंसान, औरत, उठना और लडकी। मेरे पास बैठे कवि ने कहा-आपकी कविताएँ बहुत पसंद आईं। अच्छी लगीं।
कईं कवियों ने बडी लम्बी कविताएँ पढीं। मूल भाषा में भी, अनुवाद भी। और अपने समय से ज्यादा समय भी ले रहे थे। इसीसे सत्र लम्बे हो रहे थे। लेट हो रहे थे। मैंने समय बल्कि कम लिया। शर्तिया जितेंद्रजी मुझसे खुश थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा ऐसे महोत्सवों में छोटी कविताएँ पढनी चाहिए। कई बार बडी कविताएँ अच्छी होते हुए भी समुचित प्रभाव नहीं डाल पातीं। और हर कवि को समय का ख्याल रखना चाहिए। वह ज्यादा समय लेता है तो दूसरे कवि का समय खाता है। और यह भी कहा कि कविता आदमी को मानवीय बनाती है।
कविता पाठ चल रहा था तभी मंच पर डॉग स्क्वाड आई। कुत्ता हर चीज, हर जगह सूँघ रहा था। एक आदमी शेर जैसे कुत्ते के साथ दूसरा एक लकडी लिए हुए था जो सब जगहों की चेकिंग कर रहा था। इससे पहले एक साहित्यकार ने हँसकर कहा था कि अब तक तो सब ठीक-ठाक हो गया मगर आगे क्या होगा पता नहीं। इस कुत्ते को तथा चारों तरफ घूमती पुलिस को देखकर मुझे एकबारगी लगा कोई खास बात है जरूर। मगर हम कवि शान्ति, प्रेम की बात करते रहे। अपनी कविताओं में। निडर-निर्भय होकर। दूसरे दिन आसाम के मुख्यमंत्री आने वाले थे। शायद इसलिए चेकिंग हो रही हो इतनी। पर दूसरे दिन वे न आए।
छह बजे के बाद मैं गेस्ट हाउस अपने रूम में आ जाती थी। तब तक आफ पास आरोनाई, किताबें इकट्ठा हो जाती हैं। जिन्हें जल्द से जल्द कमरे पर लाना होता था। अपने मेहमानों का आरोनाई से स्वागत कर के यहाँ के लोग उतने ही खुश होते हैं जितना आरोनाई पहनने वाला।
गेस्ट हाउस में दूध ब्रेड लेना, मोबाइल जो दिन भर फोटो लेकर वीडियो बनाकर भर गया होता, उसे खाली करना, इधर-उधर फोटो भेजना, मोबाइल चार्ज करना, घर बात करना और कपडे बदलकर कमर को आराम देना। फिर सुबह के कपडे निकालकर रख देना और नींद आए न आए गोली -दवा लेकर सो जाना।
जोधपुर से निकली, तब नगेंद्र कह रहे थे तू आसाम जा रही है। कमर दर्द में इतनी दूर कैसे जाएगी। तबियत खराब हो गई तो। डर तो मुझे भी लग रहा था। मगर दो साल से कोई हलचल जीवन में नहीं थी। हाँ कोरोना के ही कारण। बच्चे सब घर में। मुझे लग रहा था पढना-लिखना बन्द हो गया है। चलकर आती हूँ कि थोडा जीवन में रवानी आए। यह ना हो कि मैं किताबों से दूर चली जाऊँ। या वे मुझसे दूर चली जाएँ। जैसे ही मीठेश निर्मोहीजी का फोन आया कि कोकराझार पोएट्री फेस्टिवल में चल रही हैं क्या पद्मजाजी? मैंने हामी भर ली। उन्होंने आगे प्रस्ताव भेजा और टीकेट आ गए। कोकराझार की इस अविस्मरणीय साहित्यिक यात्रा का सारा श्रेय मीठेश निर्मोहीजी को ही जाता है।
जनाब एक राज की बात बताऊँ। घर छोडने से लेकर घर वापसी तक मुझे एक पल के लिए भी कमर दर्द नहीं हुआ। शायद आदमी मन के वातावरण में होता है, तो खुश रहता है ,स्वस्थ रहता है। मैं तो वहाँ से फोन पर अपनी ननद से कह रही थी यहीं रहने का जी करता है। मौसम अच्छा, लोग अच्छे, वातावरण अच्छा। और फिर कविता की दुनिया।
यह के नेताओं की सोच अच्छी। कल कैबिनेट मिनिस्टर यू.जी.ब्रह्मा ने मुझसे आधे घण्टे इस विषय पर चर्चा की कि इस कविता महोत्सव को अगले सालों में किस तरह आगे ले जाना है। क्या-क्या सुधार करने हैं। यह तो शुरुआत है जो कमियाँ रहीं उन्हें दोहराना नहीं है। इस तरह का कार्यक्रम गाँवों से भी जुडना चाहिए। इस महोत्सव को राजनीति, समाज, साहित्य, पर्यावरण आदि की चर्चा का माध्यम भी बनाया जाए। कैसे और अच्छा हो यह कार्यक्रम। किस तरह नयापन लाएँ। पूरे समय चिन्ता करते रहते हैं कि कैसे बोडो भाषा, साहित्य, लोगों को आगे बढाया जाए। मैंने कहा ज्यादा से ज्यादा विधाओं को जोडा जाए और बच्चों को जोडा जाए। उनके लिए भी क्रिएटिंग राइटिंग के सत्र होने चाहिए। ज्यादा से ज्यादा लोगों तक देश विदेश में यह प्रेम और शान्ति का सन्देश बोडोलेंड से पहुँचे।
एक बात जो मैंने नोट की वह यह कि हर तीसरा लेखक साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत है । चाहे कविता के लिए, चाहे अनुवाद के लिए, चाहे किसी और विधा के लिए। केबीनेट मंत्री यूजी.ब्रह्माजी भी साहित्य अकादमी से सम्मानित हैं। यहाँ के लोगों में साहित्य के प्रति ललक है और साहित्यकारों, कवियों का बडा सम्मान करते हैं। उनको ध्यान से सुनते हैं हजारों की संख्या में और मौका हाथ आते ही युवा, बच्चे उनके साथ फोटो भी खूब खिंचवाते हैं।
यहाँ चाहे यू.जी.ब्रह्मा हैं, चाहे प्रमोद बोडो वे साहित्यिक उत्सव में सक्रिय भागीदारी निभा रहे थे। ये लोग रुचि लेकर काम करते हैं। हर आदमी से चलाकर बात करते हैं। हाल-चाल पूछते हैं। सिक्योरिटी पूरी है पर ऐसा नहीं कि लोगों से दूर हैं। यू.जी.ब्रह्माजी कह भी रहे थे अनुशासन उतना ही हो जिससे आदमी की स्वतन्त्रता बाधित न हो वरना उसका विकास रुक जाता है । जमीन से जुडे ये लोग अपने लोगों के लिए, अपनी धरती के लिए दिन रात काम कर रहे हैं। चिंता कर रहे हैं। ब्रह्मा जी बता रहे थे भाषा की लिपि को लेकर भारत सरकार के साथ हुए समझौते के बारे में।
15 को ध्वजारोहण, शहीदों और बोडो के शहीदों को बोडो साहित्य सभा द्वारा श्रद्धांजलि देने के कार्यक्रम थे। हम थोडा देरी से पहुँचे। हम अखबार खोजने निकल गए थे। बोडो शहीदों को श्रद्धांजलि के समय हम पहुँचे। अच्छी संख्या में लोग उपस्थित थे। बी.टी.आर चीफ प्रमोद बोडो भी थे। फिर किताब विमोचन, सेमिनार और बोडो कविता पाठ सत्र था। पुस्तक विमोचन के अवसर पर हम थे मगर बाद में हम अपने लौटने की तैयारी में लग गए ।
मोमेंटों, सर्टिफिकेट, ट्रवेल अलाउंस। कोकराझार से कार द्वारा गोवाहाटी आना है तो कार की व्यवस्था के लिए व्यवस्थापकों को कहना है। गोवाहाटी में एक रात रुकना है, तो होटल का इंतजाम करना है। मीठेशजी साथ थे तो कोई चिन्ता न थी । यह बात मेरे साथ ही हरीश कर्मचन्दानीजी भी कह रहे थे। उस समय मैंने मीठेशजी से कहा आज से आप बडे भाई हो गए । बोले पहले से ही था भाई। मैंने कहा पहले भाई थे अब बडे भाई हो गए।
कार का इन्तजाम हो गया, तो हम गेस्ट हाऊस आए, सामान लिया और चार बजे गोवाहाटी के लिए रवाना हो गए।
देखा, मीठेशजी का यहाँ सिक्का चलता है। आपसे सब लोग बडे आदर-इज्जत से मिलते हैं। आपको यहाँ काफी लोग जानते पहचानते हैं। काम चाहे सर्टिफिकेट लेने का हो चाहे मोमेंटों का और सम्मानजनक राशि दिलाने का हर काम मीठेशजी करवा रहे थे। तब हरीश कर्मचन्दानीजी ने तो कहा था -यहाँ तो मीठेशजी हमारा छाता हैं । कोई समस्या आई तो ये सुलझा देंगे । मीठेश जी ने मेरे मान-सम्मान का ही नहीं बल्कि हम सब का ध्यान रखा।
प्रफुल्ल जी ने कविताओं वाली किताब खंथाई की मेरी प्रति रिसेप्शन पर रखवाई थी मगर पता चला वह किसी और को दे दी गई है । इस किताब में महोत्सव में जो कवि भाग ले रहे थे उनकी कविताएँ संकलित थीं। पर मेरी कविताएँ खंथाई में प्रकाशित नहीं हो पाईं।
रास्ते भर हम महोत्सव, यू.जी.ब्रह्माजी, बोडोलेण्ड के लोगों की बातें करते आ रहे थे। किस तरह कवियों के फोटो पोस्टर लगा रखे हैं रास्ते भर। कवियों लेखकों का बडा सम्मान करते हैं। डॉ.बिहुंग ब्रह्मा जी ने महोत्सव प्रबन्धन में कोई कसर नहीं छोड रखी थी। वे जिस तरह से हमारी शंकाओं का समाधान और प्रश्नों के जवाब तसल्ली से दे रहे थे हम भुला नहीं पाएँगे। इस तरह बातें करते-करते जब हम चुप होते कार ड्राइवर बताता हम ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर से गुजर रहे हैं, यह मन्दिर है देवी का, वह उस तरफ कामाख्या मन्दिर है ,यह भूपेन हजारीका जी की समाधि है। दिन होता तो सब पास ले जाकर, दिखाता। मगर अब अँधेरा हो चुका है।
गोवाहाटी में होटल में सुधीर सक्सेना जी, हरीश कर्मचन्दानीजी, अपूर्वा से फिर मुलाकात हो गई । सुबह सुधीर सक्सेनाजी हमारे साथ एयरपोर्ट आए। सुधीरजी को दिल्ली जाना था हमें जोधपुर। एक दूसरे से विदा ली।
प्लेन में, जाते समय जिस तरह उपमा और कॉफी पी उसी तरह अब भी हमने उपमा और कॉफी ली। मगर उतना स्वाद अब नहीं था। बेटा पीयूष लेने आया एयरपोर्ट पर। मीठेशजी भी साथ ही घर आए। यहाँ कुछ देर रुककर, अपने घर गए।
इस तरह कोकराझार की एक साहित्यिक यात्रा की शुरुआत और समाप्ति हुई उस बिन्दु पर जहाँ से हम प्रेम और शान्ति की ओर अग्रसर हो रहे हैं । रचनात्मकता की ओर बढ रहे हैं। मगर हाँ कविता की यात्रा खत्म कहाँ हुई वह तो चल रही है। मेरे भीतर। हमारे भीतर। बहुत सारा पढना है, बहुत सारा लिखना है, बहुत सारे काम करने हैं और बहुत सारी जगह प्रेम और शान्ति के बीज बोने हैं। बहुत सारे लोगों से मिलना है। मानवता और भाईचारे का सन्देश देना है। इन कविताओं का अनुवाद होकर देश-विदेश में प्यार और शान्ति के फूलों का खिलना है। साम्प्रदायिक सौहार्द* का सन्देश इन कविताओं के जरिए हर भाषा में जाना है। विश्व के हर देश में जाना है। ऑफलाइन जाना है, ऑन लाइन जाना है। यह सन्देश बोडोलेण्ड से जा रहा है समूचे विश्व में। यहाँ के बाशिन्दे प्रेम का सन्देश दे रहे हैं, शान्ति का सन्देश दे रहे हैं। हम उनके साथ हैं। वे हमारे साथ हैं।
आप अपनी अच्छाई, संवेदनशीलता और नूतन विचारों को यूँही सहेज-सम्भालकर रखिएगा जिससे निरन्तर आगे बढते रहें । यह महोत्सव हर वर्ष नई ऊँचाइयाँ छूए। चारों तरफ खुशहाली हो ।
डॉ.बिहुंग ब्रह्माजी, यू.जी.ब्रह्माजी, प्रमोदजी फिर आते हैं अपने समूचे अपनापे के साथ, बोडोलेण्ड की धरती पर। फिर मिलते हैं। (उनों लोगों मुनगन)

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