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एक रिश्ता ऐसा भी

कासिम बीकानेरी
जनवरी महीने की भयंकर सर्दी की एक शाम, ऊपर से रिमझिम-रिमझिम बरसात हो रही थी। शहर में हमेशा के मुकाबले आज सर्दी कुछ ज़यादा ही सितम ढहा रही थी। बज़ारों में भी हमेशा के मुकाबले बहुत कम आमदरफ्त थी। अधिकतर दुकानदार मौसम का बदला मिज़ाज देखकर आज शाम को अँधेरा होने से पहले ही अपनी दुकानें बन्द करके अपने-अपन घर जल्दी चले गए थे। खुशबू इस बिगडे मौसम की परवाह किए बगैर तेज कदमों के साथ लगभग भागते हुए ट्रेवल्स ऑफिस की तरफ दौडे जा रही थी।
खुशबू एक परम्परावादी परिवार की सदस्य थी। उसके परिवार में उसकी वृद्ध माताजी निर्मला देवी एवं उसकी दीदी सौम्या रहती थी। लगभग छह महीने पहले माताजी ने कज़र् लेकर सौम्या की शादी इंजीनियर राकेश कुमार के साथ कर दी थी। खुशबू के पिताजी पहले ही चल बसे थे। जो कुछ जमा पूँजी थी वह दीदी की शादी में खर्च हो गई, ऊपर से कज़र् का बोझ और सर पर आ गया। उनके जीवन में भयंकर आर्थिक तंगी की वजह से खाने के भी लाले पडने लगे। खुशबू, जो सरकारी कॉलेज में एम.एससी. फाईनल ईयर में पढती थी, इन परिस्थितियों में उसे अपनी पढाई बीच में ही छोड देनी पडी। वह सैकेण्डरी एवं सीनियर सैकेण्डरी के बच्चों को ट्यूशन पढाकर अपने परिवार का गुज़ारा बमुश्किल ही चला पाती थी। उसने बी.एड. भी कर रक्खी थी और अध्यापिका की नौकरी के लिए उसने कई सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों में आवेदन कर रक्खे थे, परंतु आज तक उसे एक अच्छी नौकरी नहीं मिल पाई थी। आज ही उसके घर पर उदयपुर के एक अच्छे शैक्षिक संस्थान से नौकरी के इंटरव्यू के लिए एक कॉललैटर आया था, जिसमें उसका चयन हो जाने पर उसे संस्थान की तरफ से अच्छी सैलरी एवं दूसरी अच्छी सुविधाएँ देने की बात कही गई थी। कल सुबह 10 बजे उसे इंटरव्यू के लिए उदयपुर पहुँचना बहुत ही ज़रूरी था और इसी वजह से वह जल्दी-जल्दी तैयार होकर कुछ ज़रूरी डॉक्यूमेंट तथा सर्दी से बचाव के लिए बिस्तर-कपडे आदि लेकर पैदल ही ट्रैवल्स ऑफिस की तरफ चल पडी। वह बारिश में भीगी हुई ही ट्रैवल्स ऑफिस में चली गई और उसने बुकिंग क्लर्क से उदयपुर का एक टिकट देने की बात कही। क्लर्क ने ना में सर हिलाया और कहा, बहनजी, आज तो उदयपुर की बस फुल हो चुकी है। सीटिंग एवं स्लीपिंग किसी में एक भी सीट खाली नहीं है। आप कहें तो कल का टिकट बना दूँ?
उसने कहा, पर मुझे तो आज ही उदयपुर जाना बहुत ज़रूरी है।
क्लर्क ने कहा, बहनजी, आज मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता, मुझे क्षमा करें।
क्लर्क का यह जवाब सुनकर उसे यह अच्छी नौकरी भी हाथ से जाती हुई नज़र आई। उसने जब किसी और गाडी के बारे में पूछा, तो क्लर्क ने कहा कि उदयपुर के लिए यही आखरी गाडी है। तब उसने कहा कि अगर आप कहें, तो मैं केबिन में भी सफर कर सकती हूँ। क्लर्क ने हाथ जोडकर माफी माँगते हुए कहा कि हम रात के सफर में किसी महिला यात्री को केबिन में सफर करने की इजाज़त नहीं दे सकते। खुशबू निढाल होकर ऑफिस की एक खाली सीट पर बैठ गई और मन ही मन अपनी किस्मत को कोसने लगी।
वहीं दूसरी तरफ हसन भी उसी बस में उदयपुर जाने वाला था। वह भी आज दो-तीन घंटे पहले ही यहाँ बुकिंग करवाने आया था, तो ऊपर की एक साथ वाली दो स्लीपर सीटें खाली थीं। क्लर्क ने कहा कि वे सीटें हम अलग-अलग व्यक्तियों को नहीं देकर एक ही व्यक्ति को अपने परिवारजन या मित्र के साथ सफर करने के लिए ही देते हैं। हसन उदयपुर इसलिए जाना चाहता था कि वहाँ पर उसकी अम्मी बदरूनिस्सा की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए उसने एक सीट की ज़रूरत होने के बावजूद दोनों सीटें बुक करवा ली थीं। बस रवाना होने में अभी पाँच मिनट का समय बाकी था। उसने अपना सामान अपनी सीटों वाले छोटे-से केबिन में रक्ख दिया एवं पानी की बोतल खरीदने के लिए बस से नीचे उतर गया। जब वह पानी की बोतल खरीद रहा था तो उसे क्लर्क की आवाज़ सुनाई दी कि बहन जी! उदयपुर की यह आखरी बस एक-दो मिनट बाद रवाना होने वाली है, मौसम बहुत खराब है, हम लोग भी बस रवाना होने के बाद आज जल्दी अपने घर जाएँगे, इसलिए आप भी अपने घर चली जाइए।
ऑफिस की तरफ आते वक्त जिस उम्मीद के रथ पर सवार होकर वह तेज़ कदमों से दौडी जा रही थी, उस उम्मीद की आखरी शम्आ के बुझ जाने के बाद वह अनमने मन से अपने सामान को उठाकर ऑफिस से थके हुए कदमों के साथ बाहर निकल आई।
अब बारिश रुक चुकी थी, परन्तु खुशबू के बालों पर कुछ देर पहले गिरी हुई बारिश की बूँदें बिजली की कडकडाहट के साथ चमक रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे नन्हीं-नन्हीं शबनम की बूँदें बालों से गिरते हुए आँखों से मिलकर गिर रही थीं। तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी, बहनजी, क्या मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूँ?
उसने घूमकर देखा कि मुस्लिम वेशभूषा में एक युवक हाथ जोडे हुए उससे कह रहा था। युवक हसन सर पर टोपी एवं चेहरे पर दाढी के साथ पक्का मुसलमान लग रहा था। उसने उस युवक की बात पर गौर नहीं किया और घर जाने के लिए रवाना हो गई तो हसन उसके पास आया और उसने कहा, अगर आप मुझ पर भरोसा कर सकती हो तो मैं आपको उदयपुर पहुँचा सकता हूँ।
खुशबू किसी भी सूरत में यह मौका चूकना नहीं चाहती थी, उसने प्रश्नवाचक नज़रों से पूछा, कैसे, बताओ?
हसन ने उसे सारी बात बता दी मगर उसका दिल एक अनजान व्यक्ति के साथ एक केबिन में एक साथ सफर करने को अब भी तैयार नहीं हो रहा था। इतने में ड्राईवर ने हॉर्न बजाया और कन्डक्टर ने बस के गेट पर खडे होकर आवाज़ लगाई कि जो भी उदयपुर की सवारियाँ हैं, वे जल्दी से जल्दी बस में आकर बैठ जाएँ, बस अब रवाना हो रही है।
हसन ने ड्राईवर साहब से बाथरूम जाने का बहना करके एक-दो मिनट और बस रोकने की प्रार्थना की तो कंडक्टर ने हसन को झिडकते हुए कहा कि आपको बस रवाना होते समय ही सब कुछ याद आता है क्या? जब हसन ड्राईवर से बात करने गया उस समय खुशबू को सोचने का कुछ समय मिल गया और वह सोचने लगी-यदि यह बस रवाना हो गई तो फिर इतनी अच्छी नौकरी हाथ से चली जाएगी। नौकरी नहीं मिली तो फिर कज़ार् कैसे उतरेगा! ट्यूशन के पैसों से तो कुछ भी नहीं हो सकता। तभी हसन ने उसके पास आकर धीरे-से कहा, मैं कोई ऐसा-वैसा इन्सान नहीं हूँ। मैं एक खानदानी मुसलमान हूँ। मैं आपको सुरक्षित उदयपुर तक पहुँचा दूँगा। कह कर हसन बस में चढने लगा तो वह भी चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलकर बस में चढ गई। बस में हसन ने खुशबू का सामान अपने केबिन में रख दिया और खुशबू को केबिन में पहले बिठाकर खुद भी केबिन में आकर बैठ गया। खुशबू बहुत डरी हुई थी और वह केबिन के एक कोने में सिमटकर बैठ गई। हसन सामने दूसरे कोने में बैठ गया। खुशबू ने केबिन के बीच में अपने बैग रखकर लक्ष्मण रेखा खींच दी। बस तेजी के साथ शहर की सीमा से दूर निकलने लगी। खुशबू ने खिडकी के आगे लगे कपडे के पर्दे से झाँककर अपने शहर की जगमगाती रोशनियों को देखा। बस अब शहर से दूर वीरान रास्तों से गुज़रती हुई अपने गंतव्य की तरफ तेज़ी से दौडे जा रही थी। लेकिन उसे अपने दिल की धडकन बस की गति से भी तेज़ गति से कम्पन करती हुई महसूस हो रही थी। जब उसे सर्दी लगने लगी तो उसने अपने बैग में रक्खा कम्बल निकालकर ओढ लिया, मगर कम्बल से सर्दी पूरी तरह से नहीं रुक पाई। सर्दी की वजह से उसके हाथ-पैर बर्फ के जैसे ठण्डे हो गए। उसने हैंड ग्लोव्ज, सर पे टोपी, ऊनी स्वेटर आदि जो भी सर्दी से बचाव का सामान साथ लिया था, सब ओढ एवं पहन लिए। लेकिन सर्दी थी कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। हसन ने जब देखा कि सर्दी की वजह से अब खुशबू के दाँत किटकिटाने लग गए हैं। उसने सोचा कि अगर ये सर्दी की वजह से बीमार हो गई तो फिर उसके लिए एक नई मुसीबत पैदा हो जाएगी। वह उदयपुर पहुँचकर अपनी अम्मी का इलाज कराएगा या फिर इस अजनबी लडकी खुशबू का!
हसन ने बस के केबिन में बस के अन्दर की तरफ लगी हुई केबिन की खिडकियों को पूरी तरह से बंद करके पर्दे लगा दिए ताकि सर्दी से पूरा बचाव हो सके। खुशबू जो भीतर से डरी हुई थी अब तो उसका डर और गहरा हो गया। उसने हसन को बिना कुछ कहे पर्दे हटाकर खिडकी को फिर से खोल दिया। सांय-सांय करके चल रही ठण्डी हवाओं से केबिन पूरी तरह से ठण्डा हो गया। हसन ने भी सर्दी के कपडे एवं एक शॉल ओढ रक्खा था लेकिन जो सर्दी कम्बल ओढने से भी नहीं रुक रही थी वह एक शॉल से कैसे रुक पाती? हसन ने खुशबू से कहा, अगर ये खिडकियाँ अच्छी तरह से बंद नहीं करने दोगी तो सुबह तक हम दोनों की कुल्फी जम जाएगी। क्यूं न कुछ ऐसा करें जिससे हम दोनों को सर्दी लगना बन्द हो जाए।
कुछ ऐसा से आपका क्या मतलब है? क्या तुम अकेली लडकी को देखकर मौके का फायदा उठाना चाहते हो? हमारे धर्म के लोग इसी लिए आफ धर्म के लोगों पर भरोसा नहीं करते? आप लोग ज़रा-सा भी भरोसे के लायक नहीं हो।
हसन को उससे ऐसे जवाब की कतई उम्मीद नहीं थी। उसने सफाई देते हुए कहा, कुछ ऐसा का मतलब ऐसा-वैसा कुछ नहीं था, बल्कि सर्दी से बचाव के लिए खिडकियाँ बंद करना एवं आगे किसी ढाबे पर बस के रुकने पर गरमा-गरम चाय या कॉफी पीने से था। और हम दोनों के बीच यह धर्म कहाँ से आ गया? अगर मैं अपने धर्म के प्रति कट्टर इन्सान होता तो किसी दूसरे धर्म की लडकी की मदद करने के लिए उसे अपने केबिन में एक साथ सफर करवाने का इतना बडा रिश्क क्यों लेता?
लेकिन चेहरे से तो तुम एक कट्टर मुसलमान ही लगते हो। मैं कैसे मान लूँ कि तुम एक कट्टर मुसलमान नहीं हो। सभी मुसलमान कट्टर ही तो होते हैं।
देखिए, मैं आपकी एवं आफ धर्म की पूरी इ*ज़त करता हूँ, इसका मतलब ये नहीं है कि आप मेरे और मेरे धर्म के बारे में अनाप-शनाप बयानबाज़ी करती रहो। रही बात सर पे टोपी और चेहरे पर दाढी रखने की तो सुन लीजिए, हमारे रसूल (सल्ल.) ने बताया है कि दाढी रखना सुन्नत है, और दाढी रखकर मैं हमारे रसूल (सल्ल.) की सुन्नत को अदा कर रहा हूँ।
अचानक ड्राईवर ने ब्रेक लगाए एवं बस एक ढाबे के सामने आकर रुक गई। कन्डक्टर ने बताया कि बस दस-पन्द्रह मिनट यहाँ रुकेगी, किसी को चाय-नाश्ता करना हो या फ्रेश होना हो तो यहीं पर हो लें। इसके बाद बस उदयपुर जाकर ही रुकेगी। बस के रुकने पर हसन और खुशबू के बीच अपने-अपने धर्म पर चल रही बहस अपने आप खत्म हो गई।
हसन को कॉफी पीने की तलब हो रही थी। वैसे वह चाय-कॉफी वगैरह कम ही पीता था, लेकिन कभी-कभार सर्दी के मौसम में इस तरह सफर करते हुए वह चाय-कॉफी ज़रूर पी लेता था। वह बस से नीचे उतरा और उसने एक गरमा-गरम कॉफी का ऑर्डर दे दिया। वह ढाबे पर रखी एक कुर्सी पर बैठकर कॉफी पीने लगा। कॉफी पीने के बाद उसे सर्दी से थोडी राहत महसूस हुई। वह फ्रेश होकर वापिस अपने केबिन में जाने लगा, तो उसने सोचा कि खुशबू को भी चाय-कॉफी के बारे में पूछना चाहिए क्योंकि भयंकर सर्दी के मारे उसका भी तो बुरा हाल हो रहा है। उसने इन्सानियत का धर्म निभाते हुए जब खुशबू से पूछा, तो उसने केबिन में ही उसके लिए एक कप चाय लाने के लिए उसे कह दिया। चाय पीकर खुशबू भी तरोताज़ा महसूस करने लगी। ढाबे पर कुछ लोग आग जलाकर अपने हाथ-पाँव सेंक रहे थे। हसन भी उनके पास जाकर अपने हाथ-पाँव सेंकने लगा। हसन ने देखा कि ड्राईवर और कन्डक्टर अभी खाना खा रहे हैं। बस के रवाना होने में अभी थोडा समय है। उसने खुशबू को भी नीचे आकर आग के पास बैठकर सर्दी भगाने की पेशकश की तो वह मना नहीं कर सकी और उसके पास आकर खडी हो गई। हसन ने ढाबे की कुर्सी उठाकर उसे उस पर बिठा दिया। अब उन पर सर्दी का ज़रा-सा भी असर महसूस नहीं हो पा रहा था। उसने हसन को चाय के पैसे देने चाहे तो हसन ने लेने से इनकार कर दिया तथा चाय और कॉफी के पैसे खुद ही दे दिए। खुशबू को हसन से इस तरह के सहयोग की उम्मीद नहीं थी। अब वह अपने कहे लफ्ज़ों पर शर्मिंदगी महसूस कर रही थी। उसके मन में मुसलमानों के प्रति जो नफरत का भाव था वह मुहब्बत में बदल चुका था।
ड्राईवर और कन्डक्टर खाना खाकर बस में आ गए। सभी सवारियों के साथ हसन और खुशबू भी अपने केबिन में घुसकर बैठ गए। रात के बारह बज चुके थे, बस सुनसान रास्ते पर सरपट दौडे जा रही थी। कभी-कभी खुशबू जब खिडकी से बाहर का नज़ारा देखती तो यूँ लगता जैसे पेड-पौधे, जंगल सभी उलटे कदमों से दौडे जा रहे हैं, जबकि चल तो बस रही थी। वह सोचने लगी कि जीवन में भी अगर हम अपने पूर्वाग्रहों एवं दूसरे धर्म के प्रति हमारी मानसिकताओं को पीछे छोडकर यदि इन्सानियत के रास्ते पर आगे बढने लग जाएँ, तो हम सब इन पूर्वाग्रहों एवं ओछी मानसिकताओं से बहुत आगे निकल जाएँगे, जैसे आज वह इन सब से बाहर निकल आई थी।
अब उसे हसन के वहाँ होने से डर की बजाय सुरक्षा महसूस हो रही थी। वह घर से खाने के लिए माँ के हाथ से बने परांठे और नीबूँ-कैरी का अचार लेकर आई थी। ढाबे की चाय पीने से एकबारगी उसकी भूख थोडी कम हो गई थी। कुछ देर बाद जब उसे भूख लगने लगी तो उसने परांठे और अचार बाहर निकाल लिए और हसन से कहा, ‘‘भैया, आपको भी भूख लग रही होगी। मुझे तो अधिक भूख नहीं है, कृपया आप भी मेरे साथ खाना खा लीजिए। माँ ने अपने हाथों से सफर के लिए स्पेशल परांठे बनाकर दिए हैं।’’
हसन को मज़ाक सूझी। उसने चिढाते हुए कहा, मैं दूसरे धर्म की लडकी की माँ के हाथों से बनाया हुआ खाना क्यों खाऊँ? क्या पता, मुझे जो परांठा दो उसमें ज़हर मिला हुआ हो और उसे खाकर मेरा काम यहीं तमाम हो जाए तो?
भैया, इसका मतलब तुमने अभी तक मुझे माफ नहीं किया है। जाओ, मैं तुमसे बात नहीं करती। अगर तुम भूखे रहोगे तो मैं भी कुछ नहीं खाऊँगी। ऐसा कहते-कहते उसकी आँखों से दो नन्हें आँसू उसके गालों पर लुढक आए।
हसन ने अपना हाथ उसके सर पर फेरते हुए जेब से रुमाल निकाल कर उसके आँसू पौंछते हुए कहा, बहन, इस भाई का वा’दा है कि आज के बाद अपनी इस धर्मबहन की आँख में कभी आँसू का एक कतरा भी नहीं बहने दूँगा, चाहे इसके लिए मुझे अपनी जान भी क्यों न देनी पडे।
खुशबू ने अपने हाथों से हसन भैया को खाना खिलाया और हसन ने उसे। न जाने यह रिश्तों की कैसी डोर थी, जो एक-दूसरे को स्नेह के धागे में बाँध चुकी थी। रात गहराती जा रही थी और बस सरपट दौडे जा रही थी। खाना खाने के बाद खुशबू को नींद आने लगी तो वह पैर फैलाकर कम्बल ओढकर आराम से सो गई। हसन उसके पास शॉल ओढकर बैठा रहा। हिलने-डुलने से जब कम्बल सरक जाता, तो हसन उसे फिर से कम्बल ओढा देता। हसन इस सफर में पूरी रात नहीं सोया, लेकिन उसने खुशबू के आराम का पूरा ध्यान रक्खा। सूरज की हल्की-हल्की किरणों से जब उजाला होने लगा, तो खुशबू की आँख खुल गई। आज की सुबह उसकी ज़न्दगी की एक ऐसी नई सुबह थी जिसमें आशाओं के उजाले से उसका तन-मन चमक रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उसे जीवन भर की खुशियाँ मिल गई हों। वह खयालों में विचरण कर ही रही थी कि बस उदयपुर पहुँच कर रुक गई। हसन ने अपना एवं उसका सामान उतारा एवं उसे अपने मोबाईल नंबर व घर का पता देकर एक ऑटोवाले को ऑटो का किराया देकर खुशबू को इंटरव्यू वाले स्थान पर भेजने की व्यवस्था कर दी एवं इंटरव्यू के बाद खुशबू को अपने घर पर आने की बात कह कर दूसरे ऑटो में खुद भी घर के लिए रवाना हो गया।
खुशबू का इंटरव्यू बहुत अच्छा रहा और उसे टीचर की नौकरी मिल गई। उसकी ज़ंदगी में लंबे समय बाद कोई खुशी की खबर आई थी और यह सब हसन की मदद की वजह से हो पाया था इसलिए वह हसन का शुक्रिया अदा करने के लिए उसके घर पर चली आई। सबसे पहले उसने हसन की अम्मी की तबीअत पूछी और फिर अपनी नौकरी लगने की खुशखबरी सुनाई। वो साथ में मिठाई का डिब्बा भी लेकर आई थी। उसने हसन को मिठाई देते हुए कहा कि अब उसे उदयपुर में किसी किराये के मकान या कमरे की ज़रूरत है। उसने हसन से कोई अच्छा-सा कम किराये का मकान दिलवाने की बात कही। हसन की अम्मी और बहन सलमा से खुशबू काफी देर तक बातचीत करती रही। हसन के घर वाले खुशबू से मिलकर बहुत खुश हुए। हसन की अम्मी ने कहा, खुशबू बेटी, हमारे गरीबखाने में एक कमरा खाली है। अगर तुम चाहो तो वहाँ रह सकती हो, लेकिन हम तुमसे कोई किराया-भाडा नहीं लेंगे। बेटी, तुम तो जानती ही हो कि हसन बीकानेर में जॉब करता है। हम माँ-बेटी यहाँ अकेले रहते हैं। अगर तुम हमारे साथ रहोगी तो हमें बहुत खुशी होगी। किराये के बदले में तुम अपनी इस बूढी एवं बीमार माँ की सेवा कर देना।
अम्मीजान, ये मेरे लिए बहुत खुशी की बात होती लेकिन मेरी मम्मी मुझे इस बात की इजाज़त कभी नहीं देंगी।
क्यूँ बेटी, क्या मैं तेरी माँ नहीं हूँ?
अम्मीजान, ऐसी बात मत कहो, आप मेरे लिए मेरी माँ जैसी ही हो, लेकिन मेरी माँ किसी दूसरे धर्म के मानने वालों के घर में रहने की इजाज़त मुझे हर्गिज़ नहीं देंगी।
ठीक है बेटी, मगर एक बार उनसे बात करके इस बारे में पूछना ज़रूर।
ठीक है माँ।
जीती रहो बेटी। अल्लाह तुम्हें बुरी नज़र से महफूज़ रक्खे और हर बला तूफान से बचाए।
हसन जो चुपचाप पास में बैठा हुआ माँ-बेटी की भावनात्मक बातें सुन रहा था, उसने कहा, अम्मीजान, खुशबू बहन शाम को खाना हमारे यहाँ ही खाएगी, मैं बाज़ार जा रहा हूँ, खुशबू के लिए मुझे कुछ सामान की खरीदारी करनी है।
खुशबू बोली, भैया, मेरी वापसी का टिकट भी बनवाते आना। उसने हसन को रुपए देने चाहे तो हसन ने लेने से साफ इनकार कर दिया और उसके सर पर हाथ फेरकर उसे दुआएँ देते हुए कहा, मुझे भाई माना है तो फिर बहन का फज़र् भी निभाना सीखो। बडा भाई छोटी बहन से कुछ लेकर नहीं बल्कि देकर खुश होता है। कहकर वह चला गया।
हसन के घरवालों ने खुशबू की खूब अच्छी खातिरदारी की। हसन ने उसे तरह-तरह के कीमती तोहफे एवं खाने-पीने की मशहूर चीजें पैक करवा कर दी और उसे उदयपुर से बीकानेर जाने वाली बस में बैठाकर वापिस घर आ गया।
हसन ने डॉक्टर से अम्मी की तबीअत के बारे में बात की, तो डॉक्टर ने कहा कि सभी जाँचें नॉर्मल आई हैं। माताजी को कोई बीमारी नहीं है, लगता है इन्हें कोई चिंता है। हसन ने कहा कि हम सब अम्मी की चिंता को दूर करने की कोशिश करेंगे।
हसन बीकानेर में खुशबू के घर उससे मिलने के लिए पहुँचा, तो उसने देखा कि खुशबू का घर, घर नहीं, बल्कि मन्दिर है। घर के बाहर तुलसी का पौधा एवं पीपल का पेड था। खुशबू की माताजी प्रतिदिन पीपल की पूजा करती। घर के अंदर अनेक देवी-देवताओं की तस्वीरें लगी थीं। निर्मला देवी पूजा में मगन थी। घर में पूजा की वजह से चारों तरफ महक फैल रही थी। निर्मल देवी ने पूजा करने के बाद खुशबू से पूछा, बेटी, यह हमारे घर में कौन घुस आया है?
खुशबू ने कहा, माँ, ये मेरे धर्म भाई हसन जी हैं।
माँ ने खुशबू पर क्रोधित होते हुए कहा, एक मुसलमान तेरा धर्म भाई कैसे हो सकता है। इसे अभी के अभी यहाँ से जाने के लिए और आईंदा फिर यहाँ नहीं आने के लिए कह दो।
माँ, इन्होंने मेरी बहुत मदद की है।
कैसी मदद?
वह मैं नहीं बता सकती। माँ आप मेरे भाई का अपमान मत करो।
तूने मुझसे पूछे बगैर इसे यहाँ क्यूँ बुलाया। क्या तू नहीं जानती, ये लोग कैसे होते हैं? ये किसी के भाई नहीं होते।
माँ, सभी एक जैसे नहीं होते। हसन भैया और इनके परिवार के लोग बहुत अच्छे हैं। आखिर हम सब एक ईश्वर की ही तो संतान हैं।
तू मुझे कुछ मत समझा, तू अभी नादान है, नासमझ है, जब तू धोखा खाएगी तब तुझे समझ आएगा। कहकर माँ अंदर चली गई।
खुशबू ने हाथ जोडकर शर्मिंदा होते हुए माँ के व्यवहार के लिए हसन से मा’फी माँगी। हसन ने कहा, माँ की बातें का बुरा नहीं मानते। आज नहीं तो कल, हमारे धर्म के प्रति उनकी भी विचारधारा बदल जाएगी।
खुशबू ने नौकरी ज्वॉईन कर ली। हसन ने उसे एक कम किराये का मकान दिलवा दिया। खुशबू ने धीरे-धीरे थोडे पैसे बचाकर जमा पूँजी इकट्ठी कर ली। माँ ने खुशबू की शादी एक शिक्षक सत्यव्रत के साथ कर दी। खुशबू चाहकर भी अपने धर्म भाई हसन को अपनी शादी में नहीं बुला पाई। सत्यव्रत और खुशबू हनीमून मनाने नैनीताल गए। सत्यव्रत जयपुर की एक प्राइवेट स्कूल में हिन्दी पढाते थे। खुशबू ने भी अपना स्थानांतरण जयपुर में करवा लिया। हनीमून से वापिस आकर दोनों ने अपनी-अपनी ड्यूटी फिर से ज्वॉइन कर ली। एक साल बाद उनके एक फूल-सी बगाी हुई जिसका नाम महक रखा गया। महक के आने से उनके जीवन में खुशियों की नई भोर आ गई। देखते-देखते छः साल बीत गए। महक अब स्कूल जाने लगी थी। इन बीते छः सालों में खुशबू को जीवन में इतनी अधिक खुशियाँ मिलीं, जितनी उसे पूरे जीवन में भी नहीं मिली थीं। लेकिन किसी के भी जीवन में खुशियाँ कहाँ हमेशा रहती हैं। इन छह सालों में खुशबू और हसन की एक बार भी मुलाकात नहीं हुई।
एक दिन घर लौटते समय खुशबू की स्कूटी को पीछे से तेज गति से आ रही एक कार ने टक्कर मार दी। उसके सिर पर गहरी चोट लगी और वह दूर जाकर गिर पडी। राहगीरों ने उसे नज़दीक के अस्पताल पहुँचाया एवं उसके मोबाईल से नंबर लगाकर उसके घरवालों को सूचना दी। सत्यव्रत तुरंत वहाँ पहुँचे। डाक्टर ने बताया कि खुशबू के सिर पर भारी चोट लगी है और ऑपरेशन का खर्चा दो लाख रुपए होगा, साथ ही तुरन्त खून की व्यवस्था करनी होगी। खुशबू के एक्सीडेंट की खबर हसन ने टी.वी. पर देखी, तो गाडी पकड कर तुरन्त जयपुर के अस्पताल पहुँच गया। दो लाख रुपयों की व्यवस्था तो सत्यव्रत ने पहले ही कर ली थी। वह अपना खून भी देना चाहता था, परन्तु जब डॉक्टरों ने उसकी जाँच की तो शरीर में खून की आंशिक कमी होने की वजह से उसका खून लेने से इनकार कर दिया। निर्मला देवी ने अपना खून देना चाहा तो डॉक्टरों ने उसकी उम्र एवं खराब सेहत को देखते हुए उसका खून लेने से भी साफ इनकार कर दिया। हसन ने जब अपना खून देना चाहा, तो निर्मला देवी ने एक मुसलमान का खून अपनी बेटी को चढाने से साफ इनकार कर दिया। डॉक्टरों ने और सत्यव्रत ने निर्मला देवी को खूब समझाया और कहा कि अगर तुरंत खून की व्यवस्था नहीं हुई तो इसकी जान भी जा सकती है। तब निर्मला देवी ने कहा, चाहे मेरी बेटी बचे या मर जाए, लेकिन मैं एक मुसलमान का खून किसी भी सूरत में अपनी बेटी के नहीं चढने दूँगी।
उनके इस अजीब-से हठ को देखकर सब परेशान हो गए। करें तो क्या करें! समय जैसे-जैसे बीतता जा रहा था सब के मन में खुशबू को खोने का डर गहरा होता जा रहा था। कहते हैं कि व्यक्ति बूढा होता है तो उसके अंदर फिर से बचपना आ जाता है। निर्मला देवी को देखकर भी यही लग रहा था जैसे कोई बालक असली बंदूक के खतरों से अनजान होकर उससे खेलने की ज़द करे। ज़द चाहे बालक करे या वृद्ध, ज़द हमेशा नुकसान ही करवाती है। निर्मला देवी की ज़द की वजह से खुशबू मौत के करीब बढती जा रही थी।
सीनियर डॉक्टर रस्तोगी ने निर्मला देवी को अपने ऑफिस में बुलाया और कहा, माताजी, जिस तरह हम डॉक्टर्स किसी मरीज़ का इलाज करते समय कभी उसका धर्म नहीं पूछते और सभी धर्मों के मरीज़ों का एक जैसा इलाज करते हैं, तभी तो लोग डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप मानते हैं। देखिए, आज अगर आपकी ज़द की वजह से खुशबू की जान चली गई तो बताइए, किसी भी धर्म का कोई ऐसा भगवान है जो आपकी खुशबू को वापिस लाकर दे देगा?
निर्मला देवी चुपचाप सर झुकाए हुए डॉक्टर रस्तोगी की बातें सुनती रही और बिना जवाब दिए बाहर आ गई। हसन निर्मला देवी के पैरों में गिर पडा और कहने लगा, मैंने सगो मन से खुशबू को अपनी बहन माना है और अपनी बहन से यह वा’दा किया है कि कभी उसकी आँख में आँसू नहीं आने दूँगा, चाहे मेरी जान भी चली जाए। आज अगर मेरी बहन को कुछ हो गया तो मैं ज़ंदगी भर खुद को कभी मा’फ नहीं कर पाऊँगा। हिन्दू धर्म में रक्षाबंधन पर भाई अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देता है, कौनसा धर्म कहता है कि वह भाई एक मुसलमान भाई नहीं हो सकता। माँ, मेरी बहन की ज़ंदगी बचाने दो मुझे। कहते-कहते हसन ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। कुछ देर के लिए खामोशी छा गई। अचानक निर्मला देवी ने हसन को अपने हाथों से उठाया और उसके आँसू पौंछते हुए कहा, जा बेटा, अपनी बहन की ज़न्दगी बचा ले।
निर्मला देवी के इतना कहते ही सबके उदास चेहरे खिल उठे। सच में यह मुस्कुराहट ही इस जीवन का सार है और इस मुस्कुराहट की चर्चा पूरे शहर में फैल गई। क्योंकि शहर पहले से ही गंगा-जमुनी संस्कृति को मानकर चलता था और उसमें बडा भारी सर्व धर्म समभाव था जो इस घटना से और ज़यादा मजबूत हो गया।

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