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अनिरुद्ध उमट की कविताएँ

अनिरुद्ध उमट
सिर्फ

बहुत सारे बहुत में बहुत कम भी बसता

यह कहने वाला

यह जताने वाला

यह मानने वाला

बहुत सारे बहुत कम में भी

नहीं बस पाया

सिर्फ दीवार पर गमले की

परछाईं रह गई



बहुत पास

विदा के क्षणों में

मुझ पर पेड की छाया

तुम पर विदा के क्षणों में

आकाश में गुजरते

पक्षी की उडान

कुछ दूर नितान्त अकेला अकेलापन

करता था इंतजार

अकेलेपन का

बहुत पास नितान्त अपना अन्त देख रहा

कुछ भी नहीं

मैं जिस जंगल में आ गया हूँ

जो जंगल मुझ तक आ गया है

हमारे बीच से जो चला गया है

हमारे बीच जो बस गया है

वह

वही तो वह वहाँ नहीं होगा

कुछ भी नहीं

जबकि सब कुछ होगा

न होने में जंगल

न होने में मैं

















चार दिन

चार दिन मिले थे चार जन्म नहीं

चार जन्मों को

जीना था हमें बहुवचन में

दिन कभी अपनी रात से मुक्त न हो सके

रात

दिनों की गुंजल से मुक्त होने में

बीत जाती

चार दिन में सब नहीं बीतता

चार दिन में कुछ नहीं रीतता

इधर का टूटा तारा

उधर नहीं जा पाता

उधर डार से बिछडा पत्ता

इधर नहीं आ पाता



बच नहीं पाओगे

वसीयतों में जो पाया जाता है

वह कुछ नहीं की

भुरभुरी त्वचा पा कर

क्या करोगे

जो छोड गए हैं

वे जा नहीं पा रहे हैं

यही लिखा है भीतर

अब पढे बिन रह न पाओगे

कोई किसी को कुछ वसीयत न करे

कहना चाहोगे

कह न पाओगे

यही कहते वसीयत करने से बच नहीं पाओगे



बचेगा नहीं कोई

तुम्हारे बालों में सफेदी आने की तरह नहीं

जिस तरह सफेद हुए

वस्त्र

जिस तरह लुंचन में

काजल-से केश

लुंचित हुए

आँख का अंजन घुला

आँख के घाट

नाव दम तोडती

नदी मेरी हथेली पर थी

फ सफेद बाल-सी

पृथ्वी काँपी

एक नब्ज

अब गई

अब गई

नदी तुम्हें

अन्तिम प्रवाह को समर्पित होते हमने देखा

हमें देखने

बचेगा नहीं कोई



सम्पर्क - माजीसा की बाडी, गर्वमेन्ट प्रेस के सामने, बीकानेर - 334001