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अच्छी शिक्षा की समझ के लिए जरूरी किताब

महेश चंद्र पुनेठा
सामान्यतः स्कूलों को ज्ञान के हस्तान्तरण के स्थान के रूप में देखा जाता है, जहाँ अभिभावक अपने पाल्यों को ज्ञान प्राप्त कर अच्छी नौकरी पाने की आकांक्षा से भेजते हैं। बेहतर नौकरी पाने की तैयारी के स्थल स्थल के रूप में ही स्कूल देखे जाते हैं, इसलिए उन्हीं स्कूलों को अच्छे स्कूल की श्रेणी में रखा जाता है, जहाँ से पढकर विद्यार्थी व्हाइट कॉलर जॉब प्राप्त करने में सफल रहते हैं। स्कूलों की उपलब्धि बतानी हो, तो यह बताया जाता है कि उनके स्कूलों से कितने बच्चे आईआईटी, नीट जैसी परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने में सफल रहे । देखा जाए तो स्कूलों से बच्चे केवल उतना ही नहीं सीखते हैं जो पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से बच्चों को सिखाया जाता है, बल्कि बहुत कुछ ऐसा भी सीखते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप मंै नहीं सिखाया जाता है, वह क्या है? इस बारे में विस्तार से जाने-माने आलोचक-शिक्षाविद राजाराम भादू ने अपनी पुस्तक स्कूल की संस्कृति में विस्तार से बताया है। यह पुस्तक महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के अवसर पर प्राकृत भारती अकादमी द्वारा स्थापित अहिंसा शांति ग्रंथमाला की एक प्रमुख परियोजना अहिंसा शांति ग्रंथमाला के अंतर्गत प्रकाशित हुई है। इस ग्रंथमाला का उद्देश्य हिंसा और अहिंसा शांति के विविध सूक्ष्म रूपों और उनकी पृष्ठभूमि में सक्रिय मनोवैज्ञानिक सांस्कृतिक आधारों को समझने और हिंसा के इन रूपों से उबरने के उपायों और विकल्पों से संबंधित पुस्तकों का प्रस्तुतीकरण है। वरिष्ठ साहित्यकार व शिक्षाविद नंदकिशोर आचार्य के संपादन में निकली यह ग्रंथमाला इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। स्कूली शिक्षा की संस्कृति के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है तो इस भूमिका की पडताल के लिए स्कूली शिक्षा की अहिंसक संस्कृति और समाज की निर्मिति में कितना और कैसा योगदान है ,इस बात के विश्लेषण का प्रयास समानांतर संस्थान के निदेशक राजाराम भादू द्वारा स्कूल की संस्कृति शीर्षक से प्रकाशित इस पुस्तक में की है। पुस्तक को 7 अध्यायों में बाँटा गया है। इन अध्यायों के उन विविध पहलुओं की चर्चा की गई है,जो स्कूल की संस्कृति का निर्माण करते हैं। पहला अध्याय है- स्कूल र्एुक सांस्कृतिक संस्था। इसके अंतर्गत बचपन, शिक्षा और सामाजीकरण, स्कूल और संस्कृति, स्कूल और पढाई, शिक्षा- एक सांस्कृतिक पूँजी और शिक्षा की भारतीय अवधारणा उपशीर्षकों के माध्यम से इस बात को समझाने की कोशिश की गई है कि स्कूल एक सांस्कृतिक संस्था क्यों और कैसे हैं, इसके संस्कृति से अन्तस्सम्बन्धों की पडताल की गई है। बचपन को लेकर भारतीय और पाश्चात्य अवधारणा को समझाया गया है। इसके लिए ब्रिटिश समाजशास्त्री निक ली की पुस्तक चाइल्डहुड एंड सोसायटी ग्रोइंग अप इन एज ऑफ अनसर्टेंटी के संदर्भ दिए गए हैं। तार्किक दृष्टि से इस बात को समझाया गया है कि कैसे बचपन को अपरिपक्व मानने की अवधारणा का पूँजीवाद के अभ्युदय से सम्बन्ध है। इस लेख में राजाराम भादू सुझाव देते हैं कि भारतीय संदर्भ में बचपन को समझने के लिए शारदा बाल गोपालन का अध्ययन मददगार हो सकता है। शिक्षा और समाजीकरण की बात करते हुए लेखक के बताता है कि स्कूल की इकाई परिवार के बाद की परिवार जैसी ही इकाई है, जहाँ बच्चे सामाजीकरण के अगले चरण में ज्ञान की दुनिया से साक्षात्कार करते हैं और वहाँ पर उनके जीवन मूल्य निर्मित होते हैं। इन मूल्यों के निर्माण में स्कूल की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। स्कूल की यह संस्कृति शिक्षकों के आपसी संबंधों, शिक्षकों और बच्चों के सम्बन्धों तथा शिक्षकों और अभिभावकों के संबंधों से निर्मित होती है । लेखक इस बात पर सही दुख व्यक्त करते हैं कि समाज की विभेदपरक संरचना हमारे स्कूलों में भी प्रतिबिंबित होती है। नतीजतन, गरीब अथवा नीचे माने जाने वाले तबकों से आने वाला बच्चा, यहाँ भी भेदभाव का शिकार होता है। हम बच्चों के बीच भेद को मिटाने अथवा वंचितों के प्रति संवेदनशील होने का कोई उपक्रम नहीं करते, बल्कि भेद को बनाए रखने की कोशिशें ही ज्यादा नजर आती हैं। यह कटु लेकिन यथार्थ है। हम कितना ही कहते रहे हैं कि स्कूल सामाजिक बदलाव में एक प्रेरक की भूमिका निभाते हैं, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि अभी तक स्कूल ऐसा करते हुए कम ही दिखाई देते हैं। अधिकतर स्कूल यथास्थिति को पोषने और कम से कम शारीरिक श्रम करने वाले रोजगार की चाह में खडे साक्षरों की फौज ही तैयार करते दिखाई देते हैं। राजाराम भादू सही मानते हैं कि यदि स्कूल की संस्कृति समाज की सीमाओं और कमजोरियों से मुक्त है, तो बच्चों की बाहरी दुनिया में यह एक ताकत के रूप में प्रतिबिंबित होगी। वह इस बिडम्बना को भी रेखांकित करते हैं कि इन स्कूलों के पाठ्यक्रम में जनतांत्रिक प्रणाली का बहुविध परिचय दिया गया है, किंतु स्कूलों के आंतरिक व्यवहार में विवेकशील मूल्य और दृष्टिकोण शायद ही परिलक्षित होते हैं।
स्कूल की संस्कृति के निर्माण में स्कूल का परिवेश एक महत्त्वपूर्ण घटक है। स्कूल के परिवेश का बच्चे के सीखने और मूल्यों के निर्माण में बहुत गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पडता है। राजाराम भादू पुस्तक के दूसरे अध्याय स्कूल का परिवेश में लिखते हैं कि सार्वजनिक स्थल के रूप में स्कूल में समानता, सामाजिक विविधता और बहुलता के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए, साथ ही बच्चों के प्रति सजगता का भाव होना चाहिए। इन मूल्यों को सचेत रूप से स्कूल के दृष्टिकोण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए और व्यवहार में स्कूल के अन्दर आरम्भ से ही झलकना चाहिए। इस अध्याय में लेखक इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करते हैं कि हम स्कूल एवं कक्षा के वातावरण को कैसे व्यवस्थित करें कि पारस्परिक क्रियाओं से सीखने -सिखाने की प्रत्रि*या को समर्थन मिले और बच्चों का विकास हो? स्कूल को किस प्रकार विकसित किया जाए कि बच्चे स्वयं को सुरक्षित, प्रसन्न एवं सहज महसूस करें ? साथ ही शिक्षक इसकी सार्थकता से संतुष्ट हो पाएँ? वह स्कूल की साफ सफाई के काम में बच्चों की भागीदारी को एक स्वस्थ प्रथा के रूप में देखते हैं, लेकिन इस बात पर निराशा भी व्यक्त करते हैं कि स्कूल में जहाँ यह काम लडकियों से या फिर कथित निम्न जाति के बच्चों से या सजा के तौर पर कराया जाना ,गलत है। उनका यह मानना सही है कि इस तरह का व्यवहार लिंग के आधार पर कार्य का बँटवारा अथवा प्रदूषित एवं अरुचिकर काम को वंचित समुदायों के वंशानुगत काम के साथ जोडना आदि जड सामाजिक नियमों से उत्पन्न होता है तथा उनको बढावा देता है। निश्चित रूप से स्कूल को अपने इस व्यवहार पर सचेत रुप से ध्यान देना चाहिए। इन बातों का ध्यान देते हुए यदि सचेत रूप से विद्यालय में सफाई की जिम्मेदारी बच्चों को दी जाती है तो इससे शारीरिक श्रम के प्रति उनके मन में सम्मान का भाव पैदा किया जा सकता है। हमारे स्कूलों में दोहरे संवाद के लिए बहुत कम अवसर देखे जाते हैं, इसलिए राजाराम भादू कहते हैं कि शिक्षक को कक्षा में ऐसे वातावरण का सृजन करना चाहिए, जिसमें बच्चे खुलकर प्रश्न पूछ सकें। उनका मानना है कि जब तक बच्चे अपने अनुभव नहीं बताते हैं, अपनी शंकाओं को दूर नहीं करते सवाल नहीं करते, तो सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन पाते। यह भी देखा जाता है कि हमारे स्कूलों में अक्सर शिक्षा के उन बच्चों पर ही अधिक ध्यान देते हैं जो सीखने की दृष्टि से तेज होते हैं। स्कूलों में कुछ बच्चों को बार-बार अपने को अभिव्यक्त करने के अवसर मिलते हैं। राजाराम भादू इससे बचने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि निश्चय ही उत्कृष्टता और योग्यता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन साथ ही सबको अवसर मिलना चाहिए। वह सामूहिकता और सहमति पर भी बल देते हैं। कक्षा को एक ऐसा स्थान बनाना चाहते हैं, जहाँ बच्चे परस्पर जनतांत्रिक रूप से व्यवहार कर सकें। साथ ही शिक्षकों को सभी बच्चों के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। ऐसा करके ही हम संविधान के समानता के मूल्य को प्राप्त कर सकते हैं। वह बच्चों के बीच तुलना और प्रतिस्पर्धा पैदा करने से भी बचने की महत्त्वपूर्ण सलाह देते हैं। तुलना के दुष्प्रभाव पर बात करते हुए वह लिखते हैं कि जिसे श्रेष्ठ बताया जाता है, उसमें अहंकार की वृद्धि होती है। इस चक्कर में वह सीखना भी कम कर सकता है। वह स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को निकृष्ट समझने लगता है। बाकी सभी बच्चों के मन में घोषित किए गए श्रेष्ठ बच्चे के प्रति ईर्ष्या की भावना एवं स्वयं के लिए हीन भावना जन्म लेती है। अतः समूह में एक दूसरे से आगे बढने की होड की प्रवृत्ति बढने लगती है। अतः धीरे-धीरे सीखने का मामला कम होता जाता है और एक दूसरे को पीछे छोडने पर बच्चों का ध्यान बढता जाता है । सीखने का आनंद का गायब होना शुरू हो जाता है। सर्वश्रेष्ठ होना ही एकमात्र उद्देश्य रह जाता है जो कई बार हिंसात्मक रूप भी ले लेता है। यह सारी बातें हैं हम अक्सर कक्षा शिक्षण के दौरान देखते हैं आ रहे हैं। बच्चों के बीच तुलना और प्रतियोगिता की भावना सहयोग और सामूहिकता जैसे मानवीय गुणों को खत्म कर देती है। साथ ही उनकी रचनात्मकता पर भी इसका बुरा प्रभाव पडता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे स्कूल इन बातों को नजरअंदाज कर देते हैं। दुखद है कि प्रतियोगिता पर अत्यधिक जोर और व्यक्तिगत सफलताएँ हमारे स्कूलों की पहचान बनती जा रही हैं। राजाराम भादू कि ये चिंताएँ वास्तविक धरातल की सच्चाई पर आधारित हैं। इन बातों में उनका शिक्षा से जुडा उनका गहरा अनुभव दृष्टिगोचर होता है।
बच्चों को शारीरिक व मानसिक दण्ड देना हमारे स्कूलों में एक सामान्य घटना के रूप में स्वीकार्य है। इसे सीखने-सिखाने की प्रत्रि*या के एक अनिवार्य हिस्से के रूप में माना जाता रहा है। हम सभी के पास बचपन में पिटाई के बहुत सारे संस्मरण हैं, जिन्हें हम जीवन गढने के जरूरी औजार के रूप में मानते रहे हैं। बहुत बार तो लोग इन्हें जीवन में सफलता की बीज के रूप में भी प्रस्तुत करते हुए देखे गए हैं। स्कूल में होने वाली प्रत्यक्ष और परोक्ष हिंसा पर प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने विस्तार से दो अध्यायों में बात की है। इनमें लेखक ने स्कूलों में शारीरिक दण्ड के परिदृश्य को आँकडों के माध्यम से सामने रखते हुए शारीरिक दण्ड के व्यवहार की व्यापक स्थिति को समझाने की कोशिश की है। हिंसा के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए राजाराम भादू लिखते हैं कि सामान्यतः जिन रिश्तो के बीच हिंसा हो वहाँ पर लगाव और प्रेम भाव की संभावना नगण्य हो जाती है। शिक्षकों की हिंसा बच्चों में डर भले ही उत्पन्न करें, लेकिन उनमें शिक्षक के प्रति सम्मान भाव उत्पन्न नहीं कर सकती है। यहाँ बच्चे दमित और उत्पीडित हैं किन्तु वह मुखर विरोध तो नहीं कर सकते, फलतः उनका प्रतिरोध किन्हीं भिन्न तरह की प्रतिक्रियाओं में व्यक्त होता है। वह विभिन्न अध्ययनों का हवाला देते हुए आगे लिखते हैं कि इसके चलते कईं बच्चों का व्यवहार आऋामक और विध्वंसक हो गया। बच्चों का उपलब्धि स्तर और ध्यान केन्द्रण की क्षमता घट गई। कई बच्चों ने इस कारण स्कूल छोड दिया। बच्चों में आत्मविश्वास की कमी, चिन्ता, दुर्बलता और हताशा तथा आत्महत्या तक की प्रवृत्तियाँ मिलीं। यह बात भी उल्लेखनीय है कि जहाँ एक ओर हिंसा बच्चों में तमाम विकार पैदा करती है, वहीं दूसरी ओर उनकी नजर में हिंसा को एक सहज प्रवृत्ति के रूप में स्थापित कर देती है। यह अनुभवजनित सत्य है कि घर में माता -पिता और स्कूल में शिक्षकों से पिटने वाले बच्चे, बडे होकर समाज में किसी कमजोर की हो रही पिटाई के प्रति संवेदनहीन हो जाते हैं। उन्हें हिंसा एक सामान्य परिघटना लगने लगती है। वे उसके सहज मूक दर्शक बने रहते हैं। बहुत बार वे हिंसा की जरूरत की वकालत भी करने लगते हैं। बचपन में हिंसा के शिकार बच्चे अपने साथी बच्चों को सताने में भी पीछे नहीं रहते हैं।
आर्थिक विपन्नता, सामाजिक भेदभाव, बच्चे की योग्यता व समझकर का सही आकलन ना होना, फेल होने वाले बच्चों को निकम्मा वह बुद्धिहीन सिद्ध करना, सीखने की असमर्थता, अंग्रेजी भाषा का शिक्षण माध्यम होना आदि बातों को लेखक द्वारा परोक्ष हिंसा के रूप में रेखांकित किया गया है। निश्चित रूप से ये सारी बातें बच्चों के भीतर भय और हीनता पैदा करती हैं। राजाराम भादू का मानना सही है कि भयपूर्ण कक्षा में शिक्षक को काम करने में काफी सुविधा होती है, लेकिन भय की उपस्थिति से अनेक दुष्प्रभावों की संभावना रहती है। भय के कारण बच्चे और शिक्षक के सहज मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित नहीं हो पाते हैं। इसकी वजह से बच्चे की सीखने की गति प्रभावित होती है। बिना समझे बात स्वीकार कर लेने में आमतौर पर बच्चे दबाव हटते ही शिक्षक की बातों की अवहेलना शुरू कर देते हैं। सीखने में आनंद और स्वतंत्र चिंतन के विकास की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। भय का माहौल बच्चों की जिज्ञासाओं स्वाभाविक रुझानों सृजनशीलता, कल्पनाशीलता के विकास की संभावनाओं पर कुठाराघात कर उन्हें सत्ता के प्रति आज्ञाकारी बनाने के लिए प्रेरित करता है। भय के माहौल में बच्चों के स्वतंत्र व्यक्तित्व विकास की संभावनाएं सीमित हो जाती है। राजाराम भादू बहुत जरूरी बात कहते हैं कि कक्षा व स्कूल में ऐसा माहौल हो कि बच्चे दूसरों की स्वतंत्रता का ख्याल रखते हुए स्वयं का कार्य स्वतंत्रता पूर्वक करते रहें। दुनियाभर के शिक्षाविद इस बात को कहते हैं कि सीखने के लिए भयमुक्त वातावरण का होना बहुत जरूरी है। भयपूर्ण माहौल में रटना भले हो जाए, लेकिन ज्ञान सृजन संभव नहीं है। रचनात्मकता वहीं सम्भव होती है जहाँ बच्चे को स्वतंत्रता दी जाय, उस पर विश्वास किया जाय तथा उसके साथ जीवंत संवाद हो।
राजाराम भादू बच्चों की ही नहीं बल्कि शिक्षक की स्वतंत्रता पर भी विशेष बल देते हैं। प्रच्छन्न पाठ्यक्रम : अनुकूलन और मतारोपण नाम के अध्याय की शुरुआत ही इन महत्त्वपूर्ण वाक्यों से करते हैं कि बच्चे में बिना विवेक तथा ज्ञान के किसी आदर्श को भरना उसमें गुलामी पैदा करना और उसकी बुद्धि को कुण्ठित करना है। बच्चे जो भी आदर्श स्वीकार करें और मूल्य अंगीकार करें बुद्धि से सोच समझ कर करें। वह आगे लिखते हैं कि शिक्षक का यह कर्तव्य है कि वह स्वतंत्रता पूर्वक महत्त्वपूर्ण सामाजिक समस्याओं पर विचार करें ताकि बच्चे भी उसी से अवगत हो जाएँ और उनको लोकतांत्रिक ढंग से सुलझाना सीखें। यह तभी संभव है जब शिक्षकों पूर्ण स्वायत्तता दी जाए। लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक को उच्च अधिकारियों द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने वाला कर्मचारी मात्र बना दिया गया है। भादूजी की इस बात से पूर्ण सहमति है कि अनेक ऐसे सामाजिक धार्मिक राजनीतिक और आर्थिक संगठन है, जो शिक्षक की स्वतंत्रता को नियंत्रित करना चाहते हैं। समाज को चाहिए कि उनकी हर प्रकार के दबाव से रक्षा करें और पूर्ण स्वतंत्रता के वातावरण में उन्हें शिक्षा का कार्य करने का अवसर दें।
यह बात विचारणीय है कि यदि शिक्षक ही स्वतंत्रता पूर्वक चिंतन और कार्य नहीं कर पाएंगे तो वह ऐसी पीढी को तैयार नहीं कर पाएंगे, जो स्वतंत्रचेता हो। एक स्वतंत्रचेता ही शासन प्रणाली की समस्त प्रत्रि*याओं को आलोचनात्मक दृष्टि देख सकता है और अपनी भूमिका को लेकर तार्किक निर्णय ले सकता है। इस अध्याय में लेखक मतारोपण और अनुकूलन के संदर्भ में स्कूल में चलने वाले प्रच्छन्न पाठ्यक्रम का जिक्र और वह किस प्रकार काम करता है, उसका बेहतरीन विश्लेषण करता है। बच्चे स्कूल में शिक्षकों की कही हुई बातें का जितना प्रभाव नहीं ग्रहण करते हैं, उससे अधिक वे शिक्षकों के आचरण, चेष्टाओं और उनकी अनकही बातों से ग्रहण करते हैं। स्कूल प्रशासकों,शिक्षकों, वरिष्ठ विद्यर्थियों, सहपाठियों आदि के आग्रहों-पूर्वाग्रहों से बच्चे अनायास ही बहुत कुछ सीखते जाते हैं। यह प्रच्छन्न पाठ्यक्रम ही है, जो सही अर्थों में स्कूल संस्कृति का निर्माण करता है। इसमें शिक्षक की मानसिकता की भी बहुत निर्णायक भूमिका होती है, बिल्कुल सही बात है कि प्रच्छन्न पाठ्यक्रम वस्तुत शिक्षक के भीतर छुपा रहता है। यह स्कूल में सत्ता के शक्ति-क्रम और कथित अनुशासन में दिखता है। इस पर सचेत रूप से ध्यान दिए बिना स्कूल की संस्कृति को लोकतांत्रिक नहीं बनाया जा सकता है। इस बात को लेखक ने विभिन्न उदाहरणों और अपने ठोस तर्कों द्वारा बहुत अच्छी तरह समझाया है। यह अध्याय शिक्षा में काम करने वाले हर व्यक्ति द्वारा गंभीर रूप से पढे जाने की माँग करता है।
इधर शिक्षा से जुडे हुए तमाम लोग इस बात को बार-बार दोहरा रहे हैं कि लॉकडाउन के चलते बच्चों का बहुत अधिक लर्निंग लॉस हुआ है। इस बात से पता चलता है कि हमारा समाज सीखने-सिखाने की प्रत्रि*या को स्कूलों तथा पाठ्यपुस्तक तक ही सीमित मानता आ रहा है, यह शिक्षा की पुरानी अवधारणा है। वास्तविकता यह है कि सीखना स्कूल से बाहर और पाठ्यपुस्तक से इतर पुस्तकों से भी चलता रहता है। इस बात को इस पुस्तक में शिक्षा : सीखने सिखाने की प्रक्रिया शीर्षक अध्याय से बहुत अच्छी तरह समझा जा सकता है। राजाराम भादू बिल्कुल सही लिखते हैं कि अधिकांश ज्ञान प्राप्ति चलते-फिरते ही होती है,यहाँ तक कि अत्यंत सोद्देश्य ज्ञान प्राप्त भी आयोजित शिक्षण का प्रतिफल नहीं है। औसत बच्चे अपनी पहली भाषा चलते-फिरते ही सीखते हैं। उनकी यह बात भी ठीक है कि हम जो कुछ जानते हैं उसका अधिकांश हमने स्कूलों के बाहर ही सीखा है। हम बगैर शिक्षक ही सीखते हैं कि बोला कैसे जाए, सोचा कैसे जाए और काम कैसे किया जाए, अनुभव कैसे किया जाए, खेला कैसे जाए और राजनीति कैसे की जाए? यह अध्याय हमारी बहुत सारी रूढ मान्यताओं और अवधारणाओं पर करारी चोट करता है। अनुकूलन करने वाली सत्ता तो इस अवधारणा को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होगी। राजाराम भादू शिक्षायी खोजों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि बच्चे सहपाठी समूह से, कॉमिक्स से, वस्तु या घटनाओं को संयोगवश देखने से और सबसे अधिक तो महज स्कूल के कर्मकांड में शामिल होने सीखते हैं।
हम बच्चे की सीखने की प्रक्रिया का सूक्ष्म अवलोकन करें तो उनकी यह बातें सही सिद्ध होती हैं। यदि हमें सच्चे अर्थों में बच्चों को उनकी सीखने की प्रत्रि*या में मदद करनी है तो इस मान्यता को हमें स्वीकारना होगा। नया शिक्षण शास्त्र इस मान्यता को प्रमाण के साथ प्रस्तुत करता है कि प्रश्नानुकूलता और कल्पनाशीलता बच्चे के सीखने और ज्ञान अर्जन के लिए आधार भूमि है। उनका सुझाव है कि पाठ्य पुस्तकों को सीखने का शुरुआती माध्यम बनना चाहिए। एन सी एफ 2005 भी इस बात की पुरजोर वकालत करता है। भादूजी की इस बात से पूरी सहमति है कि एक ओर हमारी पाठ्यपुस्तकों का दायरा सीमित और बोझिल है तो दूसरी ओर पूरक पुस्तकों व पाठ्येत्तर साहित्य की दुनिया भी काफी दरिद्र है। उस पर भी विडम्बना यह है कि इन किताबों को पढने के लिए प्रेरित करने वाला कोई नहीं है और यदि किसी बच्चे की ऐसी रूचि बन जाती है तो इन किताबों तक उसकी पहुँच नहीं है। वह इस बात को रेखांकित करते हैं कि नए शिक्षण शास्त्र में भय और प्रलोभन के लिए कोई स्थान क्यों नहीं है? भय अथवा प्रलोभन समझ के विकसित होने में बडे व्यवधान हैं। वह लिखते हैं कि ज्ञान की निर्मित के लिए स्वतंत्र मानस एक पूर्व शर्त है साथ ही समझ के उन्मुक्त विकास के लिए सृजनात्मकता और कल्पनाशीलता जरूरी हैं, जो भय अथवा प्रलोभन की मानसिकता में संभव ही नहीं है। इस अध्याय में वह बच्चे सीखते कैसे हैं, शिक्षण विधियाँ कैसी हों, सहभागी प्रशिक्षण क्या है? आदि प्रश्नों के उत्तर देने की भी कोशिश करते हैं। शिक्षा,बालमन और स्कूल की संस्कृति को समझने के लिए यह अध्याय बहुत उपयोगी कहा जा सकता है।इसमें लेखक के अध्ययन और अनुभव का अच्छा समावेश है।
किताब का अंतिम अध्याय एक अच्छे स्कूल की संकल्पना पर लिखा गया है। इस अध्याय में शैक्षिक गुणवत्ता के प्रश्न पर विस्तार से विचार किया गया है। साथ ही शिक्षक-बच्चों के सम्बन्ध कैसे होने चाहिए? उस पर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। एक अच्छे स्कूल की संकल्पना की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण मूलाधार तय किए गए हैं- जैसे, एक साथ मिलकर सीखना प्रत्येक बच्चे के लिए लाभदायक है, यदि सिखाना चाहते हैं, तो बच्चों से सीखें, बच्चों की कमियों को नहीं, बल्कि शक्तियों को पहचानें, आपस में सौहार्द भाव और अंतर्निर्भरता बढाएँ, मानवीय अधिकारों को महत्त्व दें, मानवीय त्रुटियों से सीखें। आगे एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी कही गई है कि जनतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रसार में शिक्षा तभी प्रभावशाली भूमिका निभा सकती है जब खुद शिक्षा तंत्र का जनतंत्रीकरण हो और शिक्षा की अंतर्वस्तु में जनतांत्रिक मूल्यों का समावेश हो। इस अध्याय के अंत में शांति और सहअस्तित्व के लिए शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है । इसके लिए किसी पाठ्यऋम की नहीं बल्कि स्कूल की संस्कृति को इस तरह की बनाने की बात कही गई है, जिससे स्वयं शांति और अहिंसा जैसे मूल्यों को बढावा मिले।
एक अच्छा स्कूल कैसा होना चाहिए या दूसरे शब्दों में कहें स्कूल की संस्कृति कैसी होनी चाहिए, इस बात का उत्तर लेखक द्वारा पूछे गए इन प्रश्नों में ही निहित है- क्या हमारे स्कूल की संस्कृति लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है? क्या वहाँ शिक्षकों और बच्चों के बीच स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व जैसे मूल्य क्रियाशील हैं? क्या वहाँ की प्रक्रियाओं में उत्तरदायित्व पारदर्शिता और संवेदनशीलता सुनिश्चित है ? क्या स्कूल से हमने डर और भय को पूरी तरह बाहर कर दिया है? क्या बच्चों और शिक्षकों के आपसी सम्बन्धों में व्यक्ति गरिमा भिन्नता और असहमति को लेकर सहिष्णुता तथा संवाद है? क्या वहाँ प्रश्न उठाने और आलोचना करने की आजादी है? एक तरह से इन प्रश्नों का हाँ में उत्तर ही इस पूरी किताब का सार संक्षेप है और यही स्कूल की संस्कृति की आदर्श कल्पना भी। कुल मिलाकर यह किताब हमें बताती है कि शिक्षा को लोकतांत्रिक मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस और शांति व सह-अस्तित्व के लिए तैयार करने के लिए क्या कुछ करने की जरूरत है। इन बातों पर बल देने के चलते कुछ बातों का किताब में दोहराव भी दिखाई देता है लेकिन वह खलता नहीं है।
इस किताब को पढते हुए बहुत पहले खुद की लिखी एक फेसबुक पोस्ट याद आती रही। उस पोस्ट को यहाँ देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ-
तलाश है ऐसे स्कूलों की
- जहाँ बच्चों को प्रश्न करने और खोजबीन करने
की आजादी हो
- जहाँ रचनात्मक गतिविधियों को प्रमुखता हो
- जहाँ कल्पना-शक्ति का खुलकर प्रयोग होता हो
- जहाँ प्रतिस्पर्धा न होकर सहयोग हो
- जहाँ सब एक दूसरे से सीखते भी हों और
सिखाते भी हों
- जहाँ बच्चों के साथ मार-पीट तो दूर डांट-डपट
भी न होती हो
- जहाँ परीक्षा पास-फेल या वर्गीकृत करने के
लिए न होकर सीखने-सिखाने की प्रत्रि*या का
हिस्सा हो
- जहाँ परीक्षा का तनाव न हो
- जहाँ शिक्षक और बच्चों के बीच दोस्ताना सम्बन्ध हों
- जहाँ स्कूल के संचालन में शिक्षकों के साथ-साथ बच्चों की भी भागीदारी हो
- जहाँ बच्चे स्वशासन के साथ अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हों
- जहाँ बच्चों की गरिमा और स्वतंत्रता का पूरा ध्यान रखा जाता हो
- जहाँ बच्चों को खुद करने और समझने के भरपूर अवसर दिए जाते हों
- जहाँ सीखना-सिखाना आनंद की एक गतिविधि हो
- जहाँ पढना-लिखना स्कूल के बंद कमरों तक सीमित न हो
- जहाँ न केवल मनुष्य बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम करना सिखाया जाता हो
- जहाँ साहित्य-संगीत-कला-खेल को भी वही स्थान प्राप्त हो जो विज्ञान-गणित को
- जहाँ हाथ-ह्रदय और मस्तिष्क को सामान महत्त्व दिया जाता हो
- जहाँ सीखने का मतलब रटना न हो
- जहाँ बच्चों पर अपनी रूचि, पसंद ,विचार और मान्यताएं थोपी न जाती हों
- जहाँ बात-बात पर बच्चों को रोका-टोका न जाता हो
- बडी मुश्किल से मिलते हैं ऐसे स्कूल।

पुस्तक का नाम : स्कूल की संस्कृति
लेखक : राजाराम भादू
प्रकाशक : प्राकृत भारती अकादमी जयपुर।
प्रकाशन वर्ष : 2021
मूल्य : 290/- मात्र

संपर्क - जनता पुस्तकालय, पियाना पोस्ट ऑफिस
डिग्री कॉलेज, जिला पिथौरागढ 262502