fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

समय के बदलाव की व्यग्रता के निबन्ध

भालचन्द्र जोशी
इस नए समय में परम्परा, इतिहास, धर्म और संस्कृति को लेकर निपट एकांगी और रूढ दृष्टि को सप्रयास विकसित कर सच की तरह स्थापित किया जा रहा है। लेकिन यह भी सुखद अचरज और तसल्ली की बात है कि इतिहास, धर्म और संस्कृति को लेकर गम्भीर, तार्किक विश्लेषण और वैज्ञानिक अर्थ भी सामने आ रहे हैं। इसी समय रूढ आस्थाएँ और विज्ञान सम्मत विचार भी अपनी जगह बना रहे हैं। यह पीछे धकेलने का षड्यंत्र और आगे खींचने के साहस का एक ही समय है। इस पुस्तक के साफ आईने में इसी द्वन्द्व की धुँधली परछाइयाँ हैं। आस्था और तर्क के सनातन संबंधों की संदर्भित व्याख्याएँ हैं। इन व्याख्याओं में विचार की समझ और ज्ञान की तृष्णा देखी जा सकती है।
यही कारण है कि शोभा जैन आधुनिकता के ज्ञान के लिए परम्पराओं का बोध होना जरूरी है (आधुनिकता बनाम परम्परा- पृष्ठ- 48) के आग्रह पर जोर देती हैं। चीजों और स्थितियों के बदलने के संक्रमण काल के संदर्भ में उन्हें यह भी याद आता है कि जहाँ न सिर्फ 5000 वर्ष पुरानी सभ्यताएँ हैं बल्कि सांस्कृतिक और कलात्मकता का बौद्धिक उत्कर्ष भी (वही-पृष्ठ-वही) इसके लिए वे पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण को जिम्मेदार ठहराती हैं। यहाँ आकर निराकरण की हडबडी में उतर जाती हैं। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के सन्दर्भ में याद आता है और वे बताती हैं , जहाँ तीज- त्यौहार पर मोहल्ले गली और आसपास के पूरे वातावरण में उल्लास चारों और झलक पढता था, जहाँ सांस्कृतिक या पौराणिक रूप से बल्कि कलात्मक और सर्जनात्मक रूप से भी मन की अनुभूतियों को अभिव्यक्त होने का अवसर मिलता था ( वही- पृष्ठ- वही)इन उपलब्धियों और वैभव को नष्ट करने वाले अपराधी को वह तत्काल पकड भी लेती हैं, आधुनिकता के नाम पर यह उत्सवधर्मिता अब से सिमटती जा रही है। (वही-पृष्ठ-वही) इस भाव प्रवण विश्लेषण में निराकरण के बेहद करीब पहुँच जाने के उपरांत किंचित अदेखी यह हो जाती है कि इस भूमण्डलीकरणोत्तर समय में बाजार ही पूँजी की ललक में यह सारी लीला रच रहा है वरना हम दो सौ साल अंग्रेजों के गुलाम रहे और पाश्चात्य संस्कृति तो तब भी थी लेकिन पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता के ऐसे डरावने दृश्य सामने नहीं आए थे। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वे बदलते समय की गति में संस्कृति और परंपरा को को बहुत उत्सुकता और तल्लीनता से देख रही हैं। इसलिए यह बात उनके लिए स्पष्ट है कि, हम अपनी परम्पराओं को जानने समझने का कार्य करते हैं, हमारा युगबोध सुदृढ होता चला जाता है। (वही-पृष्ठ-50)
इस पुस्तक में विविध विषयों पर लेख हैं। इतने विविध विषयों पर लिखने का साहस जुटाना कोई सामान्य बात नहीं है। इन निबन्धों को पढकर यह तो काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है कि शोभा जीवन और समाज के सच को जानने समझने की गम्भीर कोशिश में संलग्न है। निजी और अनुभूतिगत स्तर पर समझने की प्रक्रिया में अपने विश्लेषणों को इस तरह से अभिव्यक्त करती हैं कि वह किसी पूर्व सिद्ध धारणा की प्रतिलिपि न लगे। साथ ही निबन्ध में विषय के फैलाव में अन्तर्निहित यथार्थ की अनुभूति को भाषा के कौशल में जाकर अर्थ निरपेक्ष होने से भी बचाती हैं। इसलिए कागज पर शब्द महज भाषा का खेल या लिपि की चित्रकारी नहीं बल्कि अर्थ छवि की चित्रात्मकता होते हैं। वरना तो ज्ञान का कुबेर खजाना व्हाट्सएप और फेसबुक पर कोई कम नहीं फैला हुआ है। इस तरह के साहित्य या ज्ञान की निरर्थकता और खतरे की ओर भी शोभा संकेत करती हैं, सोशल मीडिया पर ज्ञान का महिमामण्डन सबसे सरल संचार साधन है कापरा ने अपनी पुस्तक टर्निंग पॉइंट में एक बात कही थी, हम एक ऐसी सदी में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ ज्ञानबोध का संकट एक प्रकार से यूटोपिया और डायस्पोरिया के बीच टकराहट के रूप नजर आएगा। (हिंदी साहित्य समाज के हाशिए पर क्यों ?-पृष्ठ-55) यह सारा संकट बाजार ने सूचना और संचार तकनीक के फैलाव के रूप में खडा किया है। यह एक नया एडिक्शन है। नया रोग है। जिसमें सिर्फ यूरोपियन समाज और अंग्रेजी भाषा ही नहीं हिंदी भी फँसी है। लेखिका इसे एक नई चिंता दृष्टि के साथ देखती है, हिंदी के साथ भी शायद यही संकट है क्योंकि हिन्दी पाठक एक प्रकार की ऐसी साहित्यिक सरलता के यूटोपिया में जी रहा है कि वह विचार दर्शन, ज्ञान और साहित्य की गहन चुनौतियों से टकराना नहीं चाहता। (वही-पृष्ठ-वही) यह समस्या और संकट तो उन कच्चे- अध कच्चे लेखक नुमा लोगों पर लागू होती है जो व्हाट्सएप और फेसबुक पर लिखकर अपने ज्ञान के संप्रेषण की इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन इस परिधि से बाहर भी लेखकों की ऐसी जमात है जो बदलती हुई परिस्थितियों को चिन्ता के साथ देख रही है। इन लेखकों की चिंताएँ और द्वंद्व विचार के टूटने और पुनर्निर्माण के हैं। यह लेख और बेहतर हो जाता, यदि इसमें इस द्वंद्व को लेकर भी विमर्श होता। पुस्तक में ऐसे कुछ निबन्ध हैं जो जल्दी समेट लेने के मोह में विचार की आन्तरिक संरचना के द्वंद्व की अपेक्षा शीघ्रता के सरलीकरण की ओर चले गए। जबकि लेखिका के पास विषयानुकूल दृष्टि और विस्तार की गुंजाइश थी।
इस पुस्तक में एक महत्त्वपूर्ण लेख है, साहित्यिक संदर्भ में समकालीनताः उत्तर पाठ एवं पुनरावलोकन । साहित्य के सन्दर्भ में भी समकालीनता को देखा जाए तो भी उसके केन्द्र में मनुष्य ही रहेगा और यह भली बात है कि इस लेख के सारे सन्दर्भ मनुष्यता के केन्द्र में है। निस्संदेह साहित्य जड की तरह स्थिर रह भी नहीं सकता क्योंकि उसका सीधा सम्बन्ध मनुष्य से है और मनुष्य की परिस्थितियाँ परिवेश, विचार भाव स्थिति अनुरूप बदलते रहते हैं। (पृष्ठ-34) एक लेखक के लिए समकालीनता का पद मनुष्यता को लेकर सम और विषम के संघर्ष को समय के सन्दर्भ में देखना समझना है। इसीलिए जब शोभा कहती हैं, साहित्य के इतिहास में समकालीनता एक मूल्य वाचक अवधारणा है लेकिन मूलतः है यह मूल्यबोधक ही। (पृष्ठ-34-35) तो यह अंततः द्वंद्व के आन्तरिक पद को तोडते हुए उसे परिचयात्मक आकार देने की ऐसी कोशिश है जो उसके अनुकूलन में सम्भव है। क्योंकि इस तरह इतिहास से विच्छेद हुए बगैर वर्तमान के बोध के साथ भविष्य की आकांक्षा को पोसना है। इस तरह काल की चेतना को इस तरह समयबद्ध करना कि अतीत, वर्तमान और भविष्य की छायाओं को स्पष्ट आकार मिले। इसलिए शोभा की इस बात से सहमति प्रकट की जा सकती है कि समकालीनता साहित्य के मूल्यांकन की कसौटी मानी गई है जिसका सीधा सम्बन्ध उसकी काल चेतना से है। (पृष्ठ-35) लेकिन अंत तक जाते-जाते इस लेख में लेखिका ने समकालीनता के सन्दर्भ को एक अबोध आवेशित आरोप के सामान्यीकरण में क्यों डाल दिया?, आज का साहित्य खासकर आधुनिक साहित्य भी समकालीन हो सकता है, किंतु उसमें शाश्वतता का गुण अनुपस्थित पाया जाता है, इसलिए कि यह साहित्य मौलिक और यथार्थ न होकर आयातित सामग्रियों पर आधारित हुआ करता है। सत्य और यथार्थ से दूर बिम्बों, शब्दों के आडम्बरों से युक्त रचनाएँ और कृतियाँ आज की सदी में मानव- समुदाय को आह्लादित, आनन्दित और रसमय नहीं कर पा रही हैं। (पृष्ठ-37) आयातित सामग्री की अबोध और असावधान आपत्ति पर फिलहाल चर्चा न भी की जाए तो शाश्वत होने का पद किसी को एक लंबे कालखण्ड के बाद ही दिया जा सकता है। इसके पहले उसके शाश्वत होने की घोषणा जल्दबाजी है और उसे खारिज करना भी मुनासिब नहीं है। रचना या कृति शाश्वत होने के लिए एक लंबे कालखण्ड की माँग रखती है। साथ ही अब साहित्य का काम महज आनंद देने का नहीं रह गया है। प्राथमिकताएँ बदल गई हैं। बहरहाल यह पुस्तक बहस तलब है। इसलिए पठनीय भी है। अलबत्ता निबन्धों के वैचारिक विस्तार की गुंजाइश थी। विषय और विचारों के स्तर पर शोभा की जरूरी चिन्ता और लगाव इस पुस्तक में हर कहीं मौजूद है। साथ ही विचारों के सम्मोहक संप्रेषण के लिए जरूरी भाषा और तार्किक सूक्ष्मता के लिए निरन्तर अभ्यास की इच्छा शक्ति भी इसी में प्रकट होती है। पहली पुस्तक उनकी विचारों के प्रति स्पष्ट आस्था और श्रम को बताती है। यह प्रतिभा के भविष्य के दरवाजे खुलने के संकेत हैं।

पुस्तक - समकाल के नेपथ्य में
लेखक - डॉ. शोभा जैन
प्रकाशक - भावना प्रकाशन, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष - 2021
मूल्य - 275

सम्पर्क -13 एच.आई.जी. ओल्ड हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी,
जैतापुर, खरगोन 451 001 (म.प्र.)
मोबाइल--89894 32087