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सम्बन्ध और संवाद की चिंता

सरोज कुमार वर्मा
स्वयं को सभी प्राणियों से श्रेष्ठ कहने वाला मनुष्य अपने विकास के तमाम दावों और अपनी उपलब्धियों के सभी ढिढोरों के बावजूद आज द्वन्द्व, तनाव, अलगाव, विखण्डन और विस्थापन आदि के जिस मुकाम पर पहुँचा है, वह उसकी वैचारिक यात्रा और प्रगति की परियोजना पर गहरे सवाल खडे करता है। आलोक टंडन अपनी पुस्तक अस्मिता और अन्यता में इन्हीं सवालों से जुझते नजर आते हैं। इसीलिए वे इस पुस्तक की भूमिका ही इस चिंता से शुरू करते हैं कि - अकसर यह सवाल हम सभी को सोचने पर विवश करता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के चारों ओर घूमती इस दुनिया में सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के नाम पर इतनी धर्मान्धता, कट्टरता और अलगाववाद क्यों? (पृ.7) और फिर इस पुस्तक के विभिन्न लेखों के माध्यम से इसका जवाब ढूँढने का प्रयास करते हैं। यद्यपि कि इस पुस्तक के लेख अलग-अलग विषयों और व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न मुद्दों को लेकर लिखे गए हैं, और उनके बीच कोई तारतम्यता भी नहीं है, फिर भी इन लेखों से गुजरते हुए यह कहा जा सकता है कि लेखक की मुख्य चिन्ता व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के बीच का वो टकराव ही है, जो अस्मिता और अन्यता, परम्परा और आधुनिकता, विज्ञान और धर्म तथा विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के नाम पर होते रहते हैं और वह भी तब, जब मनुष्य अपने को विवेकशील प्राणी कह कर परिभाषित करता है और वैज्ञानिक सोच से लैस होने की दावेदारी करता है। बेशक कहीं कोई चूक हुई है, हो रही है और लेखक की चिंता उसी चूक को पकडने, परखने और उसे दुरुस्त करने की है।
इसके लिये लेखक अपने सभी लेखों में शिद्दत से प्रयास करता है। इस क्रम में वह समस्याओं को गहरे विश्लेषित करता है, उनके पक्ष-विपक्ष पर तर्क करता है, उसके ऐतिहासिक विकास की पडताल करता है, उनके उत्पन्न होने की तत्कालीन परिस्थितियों का जायजा लेता है और फिर वर्तमान समय में उनके समाधान के लिए क्या-कुछ किया जा सकता है, क्या-कुछ किया जाना चाहिए, इसका प्रस्ताव भी देता है। इससे एक हद तक समस्याओं को समझने में सुविधा भी मिलती है और उन पर सोचने का सिलसिला भी शुरू होता है; लेकिन इतना कुछ किये जाने के बाद भी समस्याओं का कोई संगत समाधान नहीं निकल पाता है तो इसलिए कि इनकी पडताल के क्रम में लेखक अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाता। इसलिए मूल्यांकन में निष्पक्ष और संतुलित नहीं रहता और अपने पूर्वाग्रह का वाट एक पलडे पर रख देता है, जिससे दूसरे पलडे की तौल सही नहीं हो पाती। पूर्वाग्रह का यह वाट विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आधुनिकता, भौतिकता और सामाजिकता आदि का है, जिसके करण धर्म, परम्परा, आध्यात्मिकता, वैयक्तिकता और आंतरिकता आदि का वास्तविक वजन नहीं मिल पाता। फलतः पाठक असहज हो उठता है। इसे इस पुस्तक के लेखों ही गुजरते हुए देखा जा सकता है।
पुस्तक का पहला लेख अस्मिता और अन्यताः सम्बन्ध, समस्या और समाधान है, जिसमें अस्मिता की परिभाषा-व्याख्या करने के बाद अन्यता के साथ उसके सम्बन्ध का विश्लेषण किया गया है। इस क्रम में अस्मिता को उस सामाजिक सन्दर्भ में व्याख्यायित किया गया है, जहाँ एक व्यक्तिगत अस्मिता विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के माध्यम से दूसरी व्यक्तिगत अस्मिताओं से संवाद करती है। यह दूसरी व्यक्तिगत अस्मिता ही वह व्यक्तिगत अन्यता है, जिसका विकास समूह से स्वतंत्र व्यक्ति को मान्यता देने वाले व्यक्तिवाद से होता है। अब चूंकि यह संवाद भाषा और संस्कृतियों के माध्यम से होता है, इसलिए भाषा और संस्कृति की भिन्नता के कारण इनमें टकराव पैदा होता है, जिसका हल मूलतत्त्ववादी या अस्मिताकेंद्रित राजनीति से नहीं होकर परासंस्कृतिवाद (Transculturalism) से इसलिए हो सकता है, क्योंकि इसमें भूमण्डलीय और स्थानीय दोनों तत्त्वों को स्थान देते हुए दोनों से परे जाने की क्षमता है। इसलिए परासंस्कृतिवाद सांस्कृतिक-अन्य के साथ, अपनी सांस्कृतिक अस्मिता खोये बगैर, शांतिपूर्वक जीने की बेहतर संभावना प्रदान करता है (पृ. 26)। यद्यपि कि अपने इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए लेखक अस्मिता की ज्ञानोदयीय, सामाजिक तथा उत्तर-आधुनिक अवधारणाओं एवं सर्वसमावेशीवाद, बहुसंस्कृतिवाद तथा अंतः संस्कृतिवाद आदि के पाठ की लम्बी दूरी तय करता है; परन्तु यह निष्कर्ष इसलिए संगत नहीं हो पाता, क्योंकि लेखक अस्मिता की सारतत्त्ववादी व्याख्या को स्वीकार नहीं करता, जिसमें व्यक्तित्व का केन्द्र मूलरूप से जीवन भर समान बना रहने वाला एक भीतरी सारतत्त्व होता है (पृ.18)। चूँकि इस सारतत्त्व को स्वीकारे बिना कोई संस्कृति भूमण्डलीय और स्थानीयता के पार नहीं जा सकती, इसलिए परासंस्कृतिवाद में भी इसकी कोई संभावना नहीं बनती।
पुस्तक का दूसरा लेख अंतर्साभ्यतिक संघर्ष और संवाद की संभावनाएँ है, जिसमें पहले हटिंगटन की पुस्तक द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशनस एंड रिमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर की विशेषताओं और कमजोरियों की अतिविस्तार से चर्चा करते हुए संस्कृतियों के टकराव विषयक उसके विचारों को अतिसरलीकरण का शिकार बताया गया है और उसके बाद भूमण्डलीकृत आधुनिकीकरण के चलते अपने जन्मस्थान से उखड जाने तथा अपनी संस्कृति से कट जाने के दोहरे विस्थापन को धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक टकरावों का कारण बताया गया है, क्योंकि इस विस्थापन के कारण ही व्यक्ति इनमें अपनी पहचान ढूँढने लगता है, जो टकराव का आधार बनता है। इसका समाधान अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने के अधिकार, दूसरी संस्कृतियों के संदर्भ में अपने को समझने की समझ, सहनशीलता और आपसी सम्मान तथा अपने इतिहास से पार जाने की क्षमता जैसी शर्तों को पूरा करने वाले अंतर्साभ्यतिक संवाद से हो सकता है। यद्यपि कि लेखक यह समाधान देने के पहले संस्कृतियों के सन्दर्भ में और भी कई जरूरी सवाल उठाता है, मगर उसे ठीक से विश्लेषित-विवेचित किऐ बगैर इस समाधान पर पहुँच जाता है। इसलिए वह भूमण्डलीकरण के कारक के रूप में भौतिक विकास की एकांगी अवधारणा की चर्चा भी नहीं करता और न उस अनिवार्य भौगोलिक आधार का जिऋ करता है, जिस पर किसी भी सभ्यता-संस्कृति का विकास होता है। इसलिए यह लेख कुछ और विस्तार की मांग करता है ताकि इन छूटे हुए जरूरी उल्लेखों को समाहित किया जा सके। बेहतर होता हटिंगटन की किताब की अतिविस्तार से चर्चा न करके इन मुद्दों को विवेचित किया जाता ।
पुस्तक का तीसरा लेख लिव-इन-रिलेशनः विवाह की तैयारी या उसका विकल्प है। इसमें परंपरागत विवाह की कमियों, उसके अन्तर्विरोधों तथा उसकी सफलता की कई अस्वाभाविक शर्तों का जिक्र कर लिव-इन-रिलेशन को, उसकी कई खूबियों की तर्कपूर्ण ढंग से चर्चा करके, विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस विकल्प से इस आधार पर सहमति बनती है कि इसमें प्रेम करने के स्वतंत्र अवसर होते हैं और नैतिकता का तल देह से गहरा होता है। विवाह में यह अवसर और गहराई नहीं मिलती। मगर इस सहमति के बावजूद इसमें बच्चों को लेकर यह चिन्ता बनी रहती है कि जब कभी स्त्री-पुरूष इस रिलेशन से अलग होंगे, जो कि इसमें आसानी और झटके से हो जाना सम्भव है, तो फिर उनके बच्चों का क्या होगा? बच्चे किसी भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के भविष्य होते हैं; इसलिए उन्हें दरकिनार कर स्त्री-पुरुष का कोई भी सम्बन्ध स्वीकृत नहीं हो सकता। लेखक इस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देता। इसके अतिरिक्त वह परंपरागत विवाह के स्थायीत्व और सुरक्षा जैसी अच्छाइयों का जिऋ नहीं करता और न लिव-इन-रिलेशन की खामियों को गम्भीरता से लेता है। फिर वह सार्त्र-सिमोन, अमृता-इमरोज तथा अज्ञेय-इला की जिन जोडियों का उदाहरण देता है, उनके साथ रहने के अंतर्विरोधों को भी उजागर नहीं करता और न यह बताता है कि सहजीवन के लिए जिस होशोहवास की जरूरत है (पृ. 47) वह कैसे पैदा होगा ? इस प्रसंग में यदि ओशो के प्रेम और विवाह सम्बन्धी विचारों का उल्लेख किया जाता, तो यह लेख और भी मुकम्मल हो पाता। मगर इन अपूर्णताओं के बावजूद लेखक को इस विकल्प की प्रस्तुति के लिए बधाई।
इस पुस्तक का एक लेख विज्ञान और धर्म : टकराव के मुद्दे है, जिसमें लेखक कई पूर्वाग्रहपूर्ण स्थापनाएँ देता है, जिनसे सहमति नहीं बनती। जैसे लेखक का यह कहना कि भारत में विज्ञान का उदय धर्म के विरोध के कारण नहीं हुआ (पृ. 77) सहमत इसलिए नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि यहाँ धर्म के विरोध के कारण नहीं, बल्कि आत्मबोध से प्राप्त आनंद के चलते भौतिक सुखों की खोज में उत्सुक नहीं होने की वजह से विज्ञान विकसित नहीं हुआ। इसीलिए यहाँ किसी वैज्ञानिक को पश्चिम की तरह मृत्युदण्ड या उस जैसा कोई सख्त दण्ड नहीं दिया गया। और जहाँ तक यहाँ के किसी वैज्ञानिक को नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने की बात है (पृ. 77) तो इसके पीछे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति भी हो सकती है, वरना गाँधी को 5-5 बार नामित होने के बाद भी नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला ? इसी ऋम में सभी धर्मों के वैज्ञानिक अध्ययन के अपने आग्रह के साथ लेखक को यह भी बताना चाहिए कि अन्तर्ज्ञान के द्वारा प्राप्त होने वाले धर्म के इंद्रियेतर अनुभव को वैज्ञानिक अध्ययन से कैसे जाना जा सकेगा? फिर लेखक का वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति के अधिक नैतिक होने की संभावना विषयक विचार (पृ. 78) इसलिए स्वीकार्य नहीं लगता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो फिर वैज्ञानिक दृष्टि से लैस देशों द्वारा एक शताब्दी में दो-दो विश्वयुद्ध क्यों लडे जाते? और इतनी वैज्ञानिक उन्नति होने के बाद भी नैतिकता में आनुपातिक रूप से कितनी वृद्धि हुई है? इसी तरह नैतिकता की स्थापना के लिए धर्म के विकल्प के रूप में संविधान को रखने का प्रस्ताव (पृ. 79) इस तर्क के साथ खारिज किया जा सकता है कि संविधान और कानून के तमाम प्रावधानों के बावजूद अपराध होते हैं और नैतिकता के स्तर में कोई सुधार नहीं होता । कुल मिलाकर इस लेख में लेखक का दृष्टिकोण संतुलित नहीं है। वह धर्म के प्रति दुराग्रह और विज्ञान के प्रति पूर्वाग्रह से भरा हुआ है।
इस पुस्तक में गाँधी पर तीन लेख हैं। एक में उन्हें परम्परा और आधुनिकता के नजरिये से देखते हुए लेखक हर हाल में उन्हें भारतीय परंपरा के पैरोकार न मानकर पाश्चात्य आधुनिकता से प्रभावित मानता है और इसके लिए रस्किन, थोरो और टाल्सटॉय के उन पर पडे हुए प्रभावों को अधिक महत्त्व देकर गीता एंव अन्य भारतीय ग्रन्थों के प्रभाव को कम कर देता है। वह दूसरे लेख में गांधी की प्रासंगिकता भी इसी नजरिये से देखता है। लेकिन ऐसा है नहीं। गाँधी भारतीय परंपरा से गहरे प्रभावित हैं, इसीलिए वे हिन्द स्वराज में उससे बच्चों की तरह चिफ रहने की बात करते हैं। यद्यपि कि वे इसकी बुराइयों से परिचित हैं और उन्हें दूर करने की वकालत और इसके लिए सक्रिय प्रयास भी करते हैं, परन्तु यह सब पाश्चात्य आधुनिकता को केन्द्र में रख कर नहीं करते। इसी कारण वे हिन्द स्वराज में उसकी तल्ख आलोचना भी करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय परम्परा को केन्द्र में रख कर ही गाँधी जीवन का वह वृत्त निर्मित करते हैं, जिसकी परिधि पर पाश्चात्य आधुनिकता की कुछ अच्छाइयाँ भी स्वीकृत हैं। अतः निर्णायक रूप से उन्हें भारतीय पंरपरा का ही संवाहक माना जा सकता है, पाश्चात्य आधुनिकता का पैरोकार नहीं।
इन लेखों के अतिरिक्त इस पुस्तक में विवेकानन्द, दयानन्द, निष्काम कर्म, नेहरू और अम्बेडकर, सांस्कृतिक बहुलता, धर्मनिरपेक्षता तथा उत्तर आधुनिकतावाद पर भी लेख हैं, जिनमें लेखक का वही विज्ञान की पक्षधरता और आधुनिकता की पैरोकारी प्रकट होती है। ताज्जुब होता है कि अपनी भूमिका में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के चारों ओर घूमती दुनिया के अंतर्विरोधों पर सवाल उठाने के बावजूद वह विज्ञान और आधुनिकता को कटघरे में खडा नहीं करके इसके लिए धर्म और परम्परा को दोषी मानता है। यह संतुलित दृष्टिकोण नहीं है, क्योंकि इन अन्तर्विरोधों के लिए धर्म के अन्धविश्वास और परम्परा की रूढियाँ दोषी हैं, तो विज्ञान के गैरजिम्मेवार आविष्कार और प्रौद्योगिकी की शोषक-मारक उपलब्धियाँ भी है। अतः इन सब को समवेत रूप से दोषी ठहराया जाना चाहिए। इस प्रसंग में इस तथ्य का उल्लेख भी जरूरी है कि लेखक अपने सभी लेखों में भारतीयता की बात बहुत करता है, लेकिन उसका मूल्याँकन पाश्चात्य पैमाने पर करता है। इसीलिए पूरी किताब में पाश्चात्य विचारकों, उनकी पुस्तकों और उनके सिद्धांतों का उल्लेख तो बहुत है, परन्तु भारतीय ग्रंथों, सिद्धांतों और विचारकों का नहीं। इसके अतिरिक्त लेखक सामाजिकता के बरअक्स वैयक्तिकता को भी नजरअन्दाज करता है। ये सब असंगत और एकांगी हैं। इसलिए इनसे सहमति नहीं बनती। परंतु इस असहमति के बावजूद इस पुस्तक की जरूरत इस रूप में है कि इसके लेख उन मुद्दों से टकराते हैं जो जीवन को गहरे और दूर तक छूते हैं। यह टकराव इसके समाधान की दिशा में सोचने के लिए बाध्य करता है। ऐसी वैचारिक बाध्यता पैदा करने के लिए लेखक को साधुवाद।

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