fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

कविता है विश्वास का विन्यास

ब्रजरतन जोशी
शब्द या पुस्तक केवल भौतिक अस्तित्व भर नहीं है। उनमें व्याप्त संवेदनाओं के भीतर हजार सालों का हरा-भरा मैदान भी है। उनमें प्रतीक, बिम्ब आदि के सहचर्य, के साथ-साथ भाषा की सराय में उनके ठहराव का इतिहास भी है। उनकी अपनी एक संस्कृति भी है, जो हमें यानी रचनाकार को निरन्तर अन्वेषण के लिए आकृष्ट करती है। जो जीवन के उठकर जीवन को अपना विषय बनाकर जीवन की अलोचना करने का साहस भी हममें भरती है। ये सभी निर्जीव या निष्क्रिय नहीं हैं, वरन् जीवन्त हैं। उनका यह स्थूल अस्तित्व हमारे आत्म से गहरे जुडा है।
इसलिए जब हम किसी कृति को पढते हैं, तो हम कृतिकार की दृष्टि को अपने आत्म के साथ जोडकर उसके विचार, अनुभवों और कल्पनाशीलता, जीवन और उसके साथ सहज रिश्ते को देखने की पूर्ण प्रक्रिया से भी गुजरते हैं। क्योंकि जैसे ही हम रचनाकार के पाठ के माध्यम से रचना के अर्न्तलोक में प्रविष्ट होते हैं वैसे ही वह हमारे साथ सम्बद्ध होकर हमारे आत्म में स्वयं को प्रकट करता है। यहीं से हम कृति के *ारिये जीवन के सबकुछ या समग्र को समझने की अपनी जिज्ञासा का मार्ग भी पाते हैं। अब यहाँ प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब हम किसी कृति के साथ होते हैं या कृति हमारे भीतर स्वयं को व्याप्त कर लेती है तब क्या हमारी चेतना तिरोहित हो जाती है? यानी तब क्या हमारा आत्म हमारा नहीं रह पाता? मेरी निजी समझ से ऐसा नहीं है, क्योंकि हमारी अपनी परम्परा में ऐसी स्थिति के लिए साक्षी भाव की युक्ति का विधान है। अतः जब भी हमें ऐसा लगे कि हम कृति के भीतर गहरे धँस रहे हैं, तो यह जरूर ध्यान रखें कि ऐसा बिना हमारी साझेदारी के सम्भव ही नहीं है। यानी अनुभव की प्रक्रिया में हमारी अपनी चेतना की भी पूरी-पूरी हिस्सेदारी है। लेकिन इससे यह भी नहीं समझा जाना चाहिए कि हम कृति में व्याप्त मार्मिकता, तेजस्विता या दर्शन की पदावली में कहें तो अन्तर्निहित चेतना का पर्याप्त प्रभाव हम पर नहीं है।
वस्तुतः ऐसा तभी होता है जब हम अपने अस्तित्व के एक और सजग, संवेदनशील चेतना रूप को अनुभव करते हैं। यहाँ जो हमारा अपना अनुभव है वही साक्षीभाव है। एक अच्छा आलोचक इसी की जमीन पर खडा होकर कृति के मूल्य, मर्म और विचार पर सधी हुई दृष्टि से दृष्टिपात कर पाता है। लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं है कि उस आलोचक की चेतना पूरी तरह आलोच्य में ही लीन है। बल्कि हमारी परम्परा में तो उस स्थिति को अधिक श्रेयष्कर और शुभ माना गया है कि जिसमें हम अपनी आत्म साक्षात्कार की प्रक्रिया के दौरान अपनी ही चेतना के विविध रंग, छवियों और रूपों की सघन, पारदर्शी और साफ-साफ पहचान कर सकते हैं। अगर हम अपनी रचना प्रक्रिया या रचना के मूल्यांकन की प्रक्रिया में इस भावभूमि पर आ सकते हैं, तो यह समझना चाहिए कि हम चेतना के उच्चतम शिखर की ओर हैं। ऐसी स्थिति में स्वतः ही हमारी व्यंजनाएँ कालजयी व्यंजनाएँ बन जाएँगी और वे हमें वास्तविकता के भी और अधिक निकट पहुँचाएगी। निश्चय ही इसमें हमारे ऐन्द्रिक बोध की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसी के कारण अपनी इस यात्रा में हम दृष्टि के माध्यम से भाव, विचार और भाषा की अन्तरतम तहों में स्थित संवेदन तत्त्व को रचना में झिलमिलाते देख पाते हैं।
***
सामान्यतः हम किसी वस्तु, घटना और तथ्य को समझने के लिए दो विधियों का इस्तेमाल करते हैं। एक क्या है? दूसरी क्या नहीं है? हमारी अपनी ज्ञान परम्परा में मनीषियों ने जब-जब भी किसी विषय, वस्तु, घटना आदि का प्रतिपादन किया, तो उन्होंने क्या है के स्थान पर क्या नहीं है को अधिक महत्त्व दिया है। कारण स्पष्ट है कि जैसे ही हम क्या है पर जाते हैं, तो अनावश्यक विवरण, तथ्य और ढेर सारा असबद्ध ज्ञान स्वतः ही हमारी प्रक्रिया में शामिल हो जाता है या उसकी सम्भावना अधिक रहती है, लेकिन इसके विपरीत जैसे ही हम अपनी दृष्टि को क्या नहीं है के ठोस धरातल पर ले जाते हैं, तो वे सब अनावश्यक विवरण, तथ्य और असबद्ध ज्ञान स्वतः ही तिरोहित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप हमारी दृष्टि अधिक साफ, उज्ज्वल और सतेज हो उठती है। हमारा लक्ष्य, मार्ग और गति भी अधिक अनुशासित हो जाते हैं। कविता क्या है? विषय पर हिन्दी के तीन बडे आलोचक क्रमशः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. नगेन्द्र ने पर्याप्त चिन्तन-मनन किया है, पर कविता क्या नहीं है? इस विषय पर अभी उतने गम्भीर और दृष्टिसम्पन्न विश्लेषण की आवश्यकता है। हालाँकि कुछ छुटपुट लेख और टिप्पणियाँ देखने-पढने को मिल जाती हैं।
काव्य के बारे में एक सामान्य समझ हमें यह बोध देता है कि कविता तुकबन्दीपूर्ण, पंक्तिविधान, गेय और लयपूर्ण वाक्य रचना है। सतही स्तर पर देखेंगे, तो यह बात काफी ठीक लगती है और हम यह पाते हैं कि इस तरह की रचना लगभग हर व्यक्ति जीवन में कम से कम एक बार तो अवश्य करता है। पर क्या वे सब कविताएँ होती है, नहीं, शास्त्रीय भाषा में कहें, तो वे सब काव्याभास या भावोच्छवास है, काव्य नहीं।
एक अन्य मत यह भी कहता है कि कविता या कला का काम मनोरंजन है। इस तरह से विचारने पर जो संकट सामने आता है कि क्या सहस्रो वर्षों से चला आ रहा वाणी का यह विधान केवल इतने तुच्छ उद्देश्य की पूर्ति के लिए है? तो फिर दुनिया की पहली कविता ऋग्वेद का क्या करें? हमारी ज्ञान परम्परा में शोक और श्लोक हमारे आदि अभिभावक रहे हैं। हमारे अद्भुत शास्त्रीय ज्ञान के कोश तो मनोरंजन तो बिल्कुल नहीं करते। फिर उनका क्या करें? यानी क्योंकि वे मनोरंजन नहीं करते इसलिए वे कविता नहीं हैं। एक अन्य मत के विद्वजन यह मानते हैं कि कविता का काम उपदेश देना, समाज में परिवर्तन लाना, सामाजिक समस्याओं के निवारण में एक प्रभावी उपकरण या औजार की तरह उपयोग में आना है, लेकिन थोडा-सा गौर करेंगे, तो यह सब काम तो अन्य ज्ञान अनुशासन पहले से ही कर रहे हैं, मसलन धर्म, राजनीति, समाजसेवा आदि-आदि, तो क्या वे सभी माध्यम काव्य है। अगर हमारा उत्तर है नहीं तो हमें विचार की और गहराई में उतरना होगा। हमें देखना होगा कि हम कविता से क्या प्रत्याशा रखते हैं? क्या काव्य में हम अपने मत या विचार का समर्थन ढूँढ रहे होते हैं? जाहिर-सी बात है कि कविता केवल वाणी का महिमा मण्डन भर नहीं है। अगर ऐसा होता, तो हम काव्य या साहित्य की बजाय दर्शन के पास जाते और कवि की बजाय दार्शनिक के पास। यहाँ मुझे अपने गौत्र के अनन्य कवि सुमित्रानन्दन पन्त का सहज ही स्मरण हो उठता है। जब वे अपने एक चर्चित निबन्ध मेरी साहित्यिक मान्यताएँ में लिखते हैं - कुछ लोग कवि दर्शन को तर्क की कसौटी में कसकर उसमें एक बाहरी संगति खोजते है और अपनी व्यावसायिक दृष्टि की परख से उसमें तरह-तरह के खोट निकालते है। कवि दर्शन तर्क सम्मत नहीं, भावनाओं और प्रेरणा सम्मत होता है। तर्क, बुद्धि के खडे किए अवरोधो को तो वह हँसते-हँसते लाँघ जाता है...... मुझे यह कहने में हिचक मालूम नहीं देती कि जीवन मूल्यों में दार्शनिक से भी गहरी दृष्टि कवि के पास होती है।
सुमित्रानन्दन पन्त रचनावली, भाग संख्या 6, पृ.246
हमें यह ध्यान देना चाहिए कि एक श्रेष्ठ कविता वेदना से उपजे विन्यास की रचनात्मक यात्रा है। इसी यात्रा में एक नवीन विश्व का अभ्युदय होता है, एक अद्वितीयता जन्म लेती है, एक नवता स्वयं को प्रकट करती है। यह तो विदित ही है कि भाषा और कविता मनुष्य की स्वभाविक जरूरत है। यहाँ पुनः प्रश्न उठ सकता है कि क्यों ? इसका उत्तर है कि भावनाओं का उन्मेष और अभिव्यक्ति कवि कर्म का प्राथमिक प्रयोजन है। हम सब जानते ही हैं कि भावानुभूति से आत्मानुभूति की प्रक्रिया के चलते ही काव्यानुभूति का उदय होता है। यह जो काव्यानुभूति है वह मूलतः भाषा की ही अनुभूति है। क्योंकि यह सब भाषा में ही घट रहा होता है। इसलिए एक श्रेष्ठ काव्य रचना की पहचान करते समय हमें यह देखना होता है कि वह कवि अपने अनुभव को किस रूप से माध्यम से हमारे आत्म से जोडता है। होता यह है कि हमारे आस-पास बहुत कुछ घट रहा होता है जो एक साथ भाषा में भी है और भाषा की सीमा से परे भी। यह जो बहुत कुछ घट रहा है, कवि अपनी संवेदना और भाषिक चेतना की अनुभूति के माध्यम से इसमें से कुछ के सत्त्व को अपनी ग्रहणशीलता के चलते ग्रहण करता है। कईं बार इस अनन्त प्रवाह में बहते अदृश्य को पकडने में एक ही जैसी चीजोंबार-बार आती है, तो कईं बार बिल्कुल ताजा, अद्वितीय और अलग भी हासिल होता है। कवि अपनी गहन संवेदनात्मक पर्यवेक्षण क्षमता के कारण उनकी पहचान कर उन्हें भाषा के काव्य रूप में हमारे साथ साझा करता है। प्रारम्भ की झिलमिलाहट को वह अपने भाषिक संस्कार से आलोकमय बना देता है। यानी अब तक जो हमसे छूटा या रह गया, उसे वह भाषा के माध्यम से हमारे अनुभव जगत में प्रविष्ट कर देता है। सम्भवतः इसीलिए अज्ञेय ने लिखा था कि -
है अभी कुछ और है,
जो अभी कहा नहीं गया
इसी क्रम में बहुत बार अपनी परम्परा की श्रेष्ठ रचनाओं को स्थूल रूप से देखने पर यह भी घटित होता है कि हमें उसमें कुछ भी नया नजर नहीं आता और कईं बार वे हमें एक अजाने अनुभव के अहसास से भर देती है। यानी हम अपने भीतर के ही अनन्त अंतरिक्ष में एक नई आकाशगंगा को खोजते हैं और उसके तारादिगण को देखकर आश्चर्य से भर उठते हैं। इस तरह हमारे काव्य विवेक का संस्कार भी सम्पन्न होता है।
हमें सदैव ही ध्यान रखना चाहिए कि जीवन का कोई निश्चित आकार-प्रकार या व्याकरण नहीं है, वह तो अनन्त अनुभवों को परिक्षेत्र है। अपनी मति की गति के प्रचण्ड आवेग तले अक्सर हम अपनी रूचियों से वशीभूत होकर बहुत ही मुखर ढँग से जीवन की सम्पूर्णता को खण्ड-खण्ड में बाँटकर देखते हैं। हम अपनी मति के पाश में चंचल काव्य भाव को बाँधने का व्यर्थ प्रयत्न भी करते हैं, भूल जाते है कि हमारा मन अनन्त धाराओं का विराट महासागर है। क्योंकि सभी खण्डित अनुभव भी अपनी प्रक्रिया में पूर्ण होना चाहते हैं, वे अपनी सीमाओं से मुक्ति चाहते हैं। अतः हमें अपनी दृष्टि को बदलना होगा। अगर हमें जीवन के विराट से साक्षात होना है या अनुभूतियों के अनन्त महासागर से रू-ब-रू होना है, तो हमें अपनी सीमाओं के पास जाकर इधर-उधर बिखरे सत्यों को जाया नहीं होने देना वरन् उन्हीं के माध्यम से विराट की कामना के आकार को साकार करना है या उसके लिए निरन्तर प्रयत्नरत रहना है। शायद तभी हम अपने समाज के सांस्कृतिक स्वरूप और स्थापत्य को सही-सही पहचान और उसकी रक्षा कर पाएँगे।
अस्तु, कविता मनुष्य द्वारा जीवन में सृजनात्मक हस्तक्षेप है। हमारी आनन्द प्राप्ति की खोज का सर्वश्रेष्ठ रचनात्मक माध्यम है। मनोरंजन, उपदेश, सामाजिक भूमिका आदि के कार्य भी कविता करती है, पर वह उसके सह-कार्य हैं, मुख्य नहीं। कविता का मूल कार्य आनन्द की खोज है। इसीलिए हमारी अपनी परम्परा में कहा भी गया है कि काव्य कभी मलिन नहीं होता, वह हमारे आनन्द प्राप्ति का राजमार्ग है।
***
मधुमती के हर अंक को हम आफ लिए पूर्व से कुछ अधिक सरस, उज्ज्वल और संवादभरा बनाने की कोशिश करते हैं। हम विशेष आभारी हैं हिन्दी की सुख्यात शब्दशिल्पी गगन गिल के, जिन्होंने हमारे आग्रह का मान रखते हुए कलानुरागी, संस्कृतिकर्मी और कवि स्व. विजय शंकर के व्यक्तित्व और कर्तृत्व पर अपना दृष्टि सम्पन्न आलेख उपलब्ध कराया।
हमेशा की तरह इस बार भी हम आफ लिए विशेष स्मरण सहित विभिन्न विषयों एवं रचनाकारों पर केन्द्रित 12 लेख, 4 कहानियाँ, 5 कवियों की कविताएँ और कवयित्री विपिन चौधरी के रचनात्मक उद्यम से एफ्रो-अमेरिकन कविताओं के संसार की एक झाँकी आफ लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। पत्रिका के शेष स्तम्भ यथावत हैं।
इस अंक के आखिर में अकादमी परिवार की ओर से जारी विज्ञप्ति भी है जिसमें इस वित्तवर्षीय योजना के अन्तर्गत साहित्यकारों के साहित्य प्रकाशन हेतु आर्थिक सहयोग एवं उनके कल्याण के लिए चल रही विभिन्न योजनाओं के विस्तृत विवरण को प्रपत्रों के साथ आफ लिए साझा किया गया है।
आपसे कोविड अनुरूप व्यवहार अपेक्षित है। समय-समय पर राज्य एवं केन्द्र द्वारा इस संदर्भ में जारी निर्देशों की पालना कर जीवन की गति को सन्तुलित बनाए रखने में अपना सहयोग प्रदान करें। इन्हीं शुभ भावनाओं के साथ-
- ब्रजरतन जोशी