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विजय शंकर : एक मित्र का बहुत-सा उजाला

गगन गिल
सन् 1985-86 में कभी उनसे पहली बार मिलना हुआ होगा, ऐसा लगता है। घटना कोई असाधारण नहीं रही होगी, यह भी तय है क्योंकि अलग-सी कोई स्मृति उस पहली भेंट की नहीं बनी। उनके व्यक्ति में एक निश्छलता, बालसुलभ हास्य और जिज्ञासा, अत्यन्त आकर्षक शर्मीलापन हमेशा से थे, लगभग जन्मजात, उन्हें जानने वाला कोई भी व्यक्ति शायद ही इससे असहमत हो।
हम तब युवा थे, विजय शंकर और मैं। लगभग समवयसी, 2-4 साल इधर-उधर। जीवन हमें कहाँ ले जाएगा, किसी को पता न था। मैंने उन्हें उनका जीवन जीते हुए देखा, उन्होंने मुझे मेरा हिस्सा जीते हुए।
हम एक-दूसरे को कवि की तरह जानते थे, वह शायद मुझे साहित्य सम्पादक की तरह भी, जो उन वर्षों मैं संडे अब्जर्वर में थी। उन दिनों अब्जर्वर के साहित्यिक पन्नों की बडी प्रतिष्ठा थी, लोग बडी उत्सुकता से नए अंक का इंतजार करते। मैं ढूँढ कर लोगों से लिखवाती। विजय शंकर की कविताएँ उसमें एक से अधिक बार छपीं और व्यापक सराही गईं, इसने जितना संतोष और प्रसन्नता मुझे दी, उन्हें भी जरूर दी होगी।
कब विजय शंकर निर्मल व मेरे अलग-अलग मित्र होने की जगह हम दोनों के साझे मित्र बन गए, पता नहीं चला। कभी हम घर से बाहर होते और लौटने पर करोल बाग के घर का हमारा पडोसी संतरों से भरी एक टोकरी लाकर देता, तो हम समझ जाते, वही आए होंगे। उन दिनों घर में फोन नहीं था कि पूर्वसूचना दी जा सके। लिहाजा अगले दिन हम उनके आने की राह देखते, और पहली सूचना उन्हें यही देते, कि हम तो संतरे देख कर ही समझ गए थे!
वह युवा थे, और अत्यन्त संकोची। उनके देखते-देखते हम लोग अपनी गृहस्थी जमा चुके थे और उनके विवाह की उम्र निकल रही थी। अब तक हम लोगों की मित्रता इतनी अंतरंग हो चुकी थी कि मैं उनका फिक्र करने लगी थी, बल्कि एक आध बार उन से पूछ चुकी थी कि हम उनके लिए मैट्रिमोनीयल क्यों न दे दें। करोल बाग के पते पर। मगर विजय शंकर सहजता से जीवन को घटने देना चाहते थे। वह घटा भी, बीता भी। फिर बीत ही गया सबका।
हमने एक-दूसरे के जीवन में काफी कुछ होते हुए देखा। कभी पास, कभी दूर से। कितनी किताबें हमने एक-दूसरे को सुझाईं, फिल्मों पर बहस की, साहित्यिक जगत की निराशाएँ साझी की, आज उनकी कोई गिनती नहीं। हमने जीवन के उत्सव साझे किए और गहन दुःख और पीडा के क्षण भी। सन 2000 में करीब एक साल हमने एक ही बाई राधाजी के हाथ का बना खाना भी खाया, उन्होंने अपने घर में, हमने अपने घर में, जब हम पटपडगंज की सोसायटी में थे और वह नागपुर से नए-नए आकर मधु विहार में बसे थे।
विजय शंकर ने क पत्रिका निकाली तो निर्मल ने पहला चन्दा दिया आजीवन सदस्यता का। उस दिन हम लोग इस घटना को सेलिब्रेट करने मधु विहार के एक कैफे में गए। मसाला दोसा की पार्टी से उत्सव सम्पन्न हुआ। अगले दिन उनका संकोच भरा फोन आया, मैं तो आपको सलाहकार मण्डल में रखने की अनुमति लेने आया था, निर्मलजी ने चन्दा दे दिया!
हम लोग खूब हँसे। उन्होंने अपना आग्रह पूरा किया, कई अंकों तक कुछ मित्र उनके तथाकथित सलाहकार रहे। करीब एक साल बाद जब उनका सम्पादक कहला लेने का संकोच चला गया, उन्होंने उसी झेंप में पूछा, क्या अब मेरा नाम हटा सकते हैं! मैंने कहा, यह तो बडी *यादती है। चाहे हम उनकी खिंचाई ही कर रहे हों, वह सकुचा जाते।
वह उत्कट जिज्ञासु थे। साहित्य के अलावा कला, नाटक, संगीत, नृत्य - लगभग सब कलाओं की बारीकियाँ वह समझते थे। दिल्ली प्रवास के वर्षों में जैसा परिष्कार उन्होंने स्वयं का किया, कोई बिरला ही कर पाता है। कोई अबुझ प्यास थी जो उन्हें राजधानी के हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में ले जाती। उन्हें देख कर मुझे हॉर्वर्ड में बिताए एक साल की याद आती, जब मैं इसी तरह प्यासी मछली बनी एक लेक्चर से दूसरे में भागती रहती थी। आज भी कभी आप दूरदर्शन के किसी कंसर्ट की उन वर्षों की रेकॉर्डिंग देख रहे हों, तो विजय शंकर दर्शकों में बैठे दिख जाएँगे।
निर्मलजी के जाने के बाद मैंने निर्मल स्मृति व्याख्यानमाला शुरू की। यूँ तो इसमें कई मित्रों ने समय-समय पर अपना सहयोग दिया, मगर विजय शंकर जी की भूमिका इसमें केन्द्रीय रही। हम लोग निमंत्रण पत्र के लिए हैण्डमेड पेपर चुनने के लिए शकरपुर की दुकानों में घूमते, अपने सामने कार्ड का साइज कटवाते। घर आ कर मैं उसे कम्प्यूटर से प्रिन्ट करती और अगले दिन मैं और विजय शंकर लिफाफे तैयार करते, फर्श पर बैठ कर पते व टिकटें चिपकाते। फिर उन्हें पोस्ट करने लोदी रोड के बडे पोस्ट ऑफिस जाते।
निर्मल की मेज पर वर्जीनिया वुल्फ की तस्वीर वाला एक सुन्दर मग रखा रहता था। उसी के जैसा मग निर्मल की तस्वीर के साथ बनवाने का मेरा मन हुआ। इतने लोग निर्मल को याद करते बेचैन होते। बन जाए, तो सुन्दर सादा उपहार रहेगा। विजय शंकर से कहा तो उन्होंने पूरे उत्साह से इसका बीडा उठाया। दिल्ली से बस में बैठ खुर्जा गए, सैम्पल दिखा कर समझाया, 200 मग का खर्च मेरे बजट में था, काम सब उन्होंने सम्पन्न कराया। अभी तक वह मग भेंट में दे देती हूँ, कोई बहुत समर्पित पाठक हो, तब।
पूरे दस वर्ष हमने निर्मल स्मृति श्रृंखला चलायी। साहित्य जगत की उठा-पटक को निकट से देखा। खिन्न हुए। फिर लगा, कुछ विश्राम देना चाहिए। कुछ नया सोचना चाहिए।
इस बीच विजय शंकर क के मंच से लगातार सांस्कृतिक हस्तक्षेप कर रहे थे। कभी- कभी मैं उनकी इस व्यस्तता से विरक्त भी हो जाती। जैसे वह भटक रहे हैं, स्वयं का सामना नहीं कर रहे। मगर उनकी कविताएँ सामने आतीं, तो वह अक्षुण नजर आते। अपने खरे एकान्त में। संवाद उनका क्षरण नहीं करता था, उनकी चेतना को धार देता था, शायद उनके निजी अकेलेपन को सहनीय भी बनाता था।
हमें दूसरे लोग चाहिएँ ही क्यों, यदि वे हमें हमारे मनुष्यत्व का उत्कृष्ट संस्करण न बनाते हों?
वे सौभाग्यशाली हैं जो किताबों से सीखते हैं, फिल्मों और संगीत से। मगर जिनके हिस्से में विजय शंकर जैसे मित्र आए हों, कभी किताब बनते, कभी फिल्म, कभी पहेली, उनके भाग्य की क्या तुलना।
दिल्ली के पडोस में रहते हुए भी उनसे 7,8 महीने से पहले भेंट न हो पाती। एक भरा-पूरा घटना प्रधान उनका व्यस्त जीवन। शायद जब थक जाते, एकान्त सुनना चाहते तो फोन करते। फिर मिलने आते। कोई अच्छी-सी फिल्म उन्हें दिखाने को चुन रखूँ, आग्रह करते। उस दिन खूब लम्बा, आत्मीय संवाद उनसे होता। इतना थका देने वाला कि 7,8 महीने उससे उबरने में लग जाते।
जिस प्रतिभा को एक-दूसरे में देख हमें सबसे अधिक रोमांच होता, वह था साधारण जीवन में अनजान लोगों से हमारे संवाद। जो हमारे आसपास घटता था, उसमें कुछ था जो अलौकिक था, कालातीत, कौतुक और विस्मय के उजाले से भरा। हमेशा नहीं, मगर कभी-कभी हम उसे पकड लेते थे। घटना में नहीं, भाषा में। कोई साधारण-सा मनुष्य कुछ ऐसा अनूठा कह जाता, कि सब जगत नए सिरे से खुलने लगता। दैनन्दिन का अध्यात्म। महीनों बाद भी हमारे पास वह एक-दूसरे को बताने लायक रहता।
आज बडे विश्वास और गर्व से कह सकती हूँ, हमारी मित्रता ने एक-दूसरे को संघर्ष में उजला बने रहने के लिए भरसक प्रेरणा दी, सहयोग और संबल दिया, बिना दूसरे के एकान्त की सीमा का उल्लंघन किए।
कई बार याद नहीं रहता, वह अब नहीं हैं। कोई बात उद्वेलित करती है, तो हमेशा यही, कि इस बार उन्हें यह बताऊँगी।

सुनते तो होंगे। जरूर।
-सम्पर्क : email-gagangil179@hotmail.com