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अवाक का वागवैभव

रमेशचन्द्र शाह
गाडी है कि साँस है? लहर की तरह ऊपर आती, नीचे जाती दिखाई देती है...
एक अन्तिम लहर, काफी ऊँची।
गाडी रोक दी है सुन्ना ने। धूल के बवण्डर में अभी कुछ नहीं दिखाई पडा।
-क्या?
- कंग रिनपोछे!
मैं कुछ नहीं समझ पाती। मूर्खों-सी उसे देख रही हूँ।
-आ गए हम?
पहले कैलाश दिखते हैं, फिर मानसरोवर।
आस-पास भूरे पहाड, बीच में बर्फ से ढँके कैलाश। प्रकृति अभिषेक कर गयी है जैसे। कैलाश की बर्फ में सीढियाँ बनी हैं। दक्षिण मुख है यह पर्वत का।
यही हैं स्वर्ग की सीढियाँ?
*
सामने मानसरोवर फैला है समुद्र की तरह। दोनों कान छूती हूँ बार-बार। बहुत भूलें की होंगी प्रभु! क्षमा करना। अपनी ओट देना।
प्रार्थना-ध्वज बाँध दूँ? कितने लोगों की प्रार्थनाएँ मुझसे पहले हवा में फडफडा रही हैं। ध्वज बाँधता हुआ यह शरीर, ये कण्ठ जैसे खुद एक प्रार्थना बन गया है।
मानवरोवर का पवित्र जल।
इस जल में पैर रखेंगे हम। इस जल को सिर पर लेंगे आशीर्वाद की तरह। इस जल से आँखे भीगेंगी, सिर भीगेगा। सबसे पवित्र जल हमारी सभ्यता का।
जल, तुम्हारा आशीर्वाद लेती हूँ, अपने पुरखों के लिए, आने वालों के लिए। मेरे भीतर की गाँठ को, दुख को, क्लेश को बहा दो। मुझे मुक्त करो, स्वच्छ करो।
केवल जल ही स्वच्छ नहीं करता, प्रार्थना भी करती है।
धीरे-धीरे निकलती हूँ जल से। प्रार्थना से बाहर आने में देर लगती है।
- अवाक - कैलाश मानसरोवर एक अंतर्यात्रा (गगन गिल) से एक अंश
नाम तो पुस्तक का है अवाक लेकिन यह एक पेराडॉक्स ही सही, क्योंकि कभी-कभी कोई बात पेराडॉक्स में ही व्यक्त की जा सकती है। अवाक का वाक-वैभव। यह शीर्षक मैंने अपने वक्तव्य का रखा। क्यों न लेखिका की ही आवाज से शुरू किया जाए?
मुझे कब से कैलाश जाना है। चोट को स्वस्थ होने का रास्ता खुद तय करना है।
ये सामान्योक्ति है, लेकिन सुभाषित की तरह सुनाई देती है। इस यात्रा-वृत्तांत में, मित्रो, कब कोई सामान्य से सामान्य उक्ति सुभाषित में बदल जाएगी, बन जाएगी, कोई ठिकाना नहीं। अपनी अनूठी लय, अनूठे सुर में यह यात्रा वृत्तांत कब किस क्षण आत्मा के वृत्तांत में तबदील हो जाएगा, इसका भी कोई ठिकाना नहीं। स्वयं लेखिका के सुर में बात करें, तो कैलाश जाना... यानी एक देव कथा में जाना। कैलाश जाना यानी अपनी आदिम स्मृति में जाना। इस यात्रा-वृत्तान्त को पढने और पढवाने का यही एक तरीका मेरी समझ में आया। यथासम्भव अपनी ओर से कुछ मत बोलो, लेखिका को ही बोलने दो।
यात्रा को आरंभ करने से ठीक पहले गगन असली दलाईलामा, रिनपोछेजी को फोन करती है, जिन्हें 20 वर्ष की उम्र में ही अपना देश छोडना पडा था। उनके नाखून का एक टुकडा साथ ले जाने के लिए, पाथेय की तरह नहीं, गहने की तरह सँभाल कर रखा है गगन ने। संयोगवश पिछले वर्षों के दौरान पढी हुई, जाने कितनी किताबें अपने आप इस वृत्तान्त से गुजरते हुए मेरी स्मृति के जाने किस अतलांत से उछल कर कह रही हैं कि धर्म के इतिहास में शिव आद्य प्राकृतिक देवता हैं, दुनिया के पहले देवता। अवाक को वाक करती गगन गिल भी यही कहती हैं, वही एक देवता हैं जो सृष्टि के आरम्भ से यहाँ इस उपमहाद्वीप में विद्यमान हैं। वेदों के रूद्र, पुराणों के शिव, आदिवासियों के भैरव, साधारणजनों के भोलेशंकर। सारे देवता आते-जाते रहते हैं, केवल शिव है जो कहीं नहीं जाते, कभी नहीं मरते। सदाजीवित हैं, इसीलिए सदाशिव। क्या इसीलिए वह कैलाश पर रहते हैं या फिर श्मशान में?
देश तिब्बत का है और राज चीन का, यह तो पहुँचते ही आफ सामने स्पष्ट हो जाता है। झांगमू में गगन की भेंट एक ऐसे आदमी से होती है जो डेढ साल पहले भारत से यहाँ पहुँचा था, जो तभी से इस इलाके में तीर्थयात्रियों के बाल काटकर अपना गुजारा चला रहा है। वह लेखिका से कहता है तीर्थयात्रा पर जा रही हैं, आपको कुछ पता भी है, यहाँ धर्म कितना खतरे में है?
इस यात्रा-वृत्तान्त को पढने का एक बहुत बडा सुख निरन्तर इसी आत्मा की सभी उन एक से एक कविताओं का भी लगातार साथ पाना है जो रास्ते भर इस कवि-यात्री का साथ देती हैं और आपका भी। किनकी-किनकी कविताएँ हैं? अक्का महादेवी की, मिलारेपा की, लामा गोविन्दा की।
संयोग की बात है, मित्रो, कि लामा गोविन्दा से कभी दूर लडकपन में मेरी भेंट हुई थी, वहीं अल्मोडा में कासार देवी में उनके निवास स्थान पर। अविस्मरणीय भेंट थी। उनके नाम के उल्लेख के साथ ही वह अवसर मेरी आँखों के सामने झूल गया। साठ और सत्तर के दशक में माओ की अगुवाई में चीनियों ने पहले सारे मठ तोडे, लूटे, जलाए। अब पर्यटकों के लिए टूटे-फूटे गोंपाओं का पुनरुद्धार किया जा रहा है। यहाँ बचे रह गए तिब्बतियों को भारत चले गए शरणार्थी तिब्बतियों से बडी ईर्ष्या होती है क्योंकि वे बुरे फँस गए यहाँ। पहले नेपाल सरकार उनसे हमदर्दी रखती थी। अब बार्डर पार करो, तो नेपाल सरकार ही उनको पकड कर चीनियों को सौंप देती है।
लगे हाथ आप तिब्बत के सत्याग्रह पर रिनपोछे जी का वह मर्म-कथन भी सुन लीजिए, जो यहाँ पर उद्धृत किया है लेखिका ने, कि हम तिब्बत का समाधान चाहते हैं, लेकिन असत्य स्वीकार करके नहीं, उनकी वार्ता-पूर्व की शर्तें मान कर नहीं। यही हमारा सत्याग्रह है।
इसी बीच मानसरोवर आ पहुँचे हैं हम, जो कि समुद्र की तरह फैला है। नीला पारदर्शी जल, जिस की तह में पडे पत्थर तक साफ दिखाई देते हैं। यात्री दल परिक्रमा कर रहा है गाडी से। इस पर लेखिका की क्या टिप्पणी है? कहती हैं, वह जो माओ की तस्वीर वाली चीनी मुद्रा बुद्ध के चरणों में पडी है, माओ ने जो कुछ गोंपाओं के साथ किया, उसके बाद ये एकदम सही लगता है कि जहाँ भी हो, उसे बुद्ध के चरणों में रोज डाला जाए।
हमारे जैसे पाठकों को यह पढकर धक्का लग सकता है कि यहाँ जहाँ भी जल भरते हैं, वहीं गँदला। क्या विडम्बना है हमारी सभ्यता की। लेखिका कहती हैं कि जो पीने योग्य नहीं वह पूजा के योग्य है।
मानसरोवर पहुँचने के साथ ही यह महाप्रश्न सिर पर मण्डराने लगता है कि बस आज की रात बची है यह जाँचने के लिए कि हम परिक्रमा कर सकते हैं कि नहीं। और लेखिका का बडा मर्मद्रावक उद्गार है यहाँ पर, निर्मल, देखो, मैं सचमुच मानसरोवर पहुँच गई हूँ, तुम मेरे साथ ही हो ना?
इस सर्वथा लौकिक और फिर भी अलौकिक स्थल पर, जो कि लेखिका के शब्दों में दुनिया से इतना दूर और स्वर्ग के इतना पास है कि इस प्रचलित विश्वास पर शंका भी अपने आप स्थगित हो जाती है।
कौन-सा विश्वास, कौन-सी शंका? किस पर शंका? इसी पर। वहाँ एक विश्वास है कि मानसरोवर में रात दो से चार बजे के बीच बह्म मुर्हूत में देवता और नक्षत्र स्नान करने आते हैं। अब इसे विडम्बना कहें कि वरदान, कि ठीक इसी बीच दैहिक स्तर पर लेखिका के लिए असीम पीडा का मुहूर्त- बडी पीडा से रात भर गुजरी है। उस पीडा के क्षण में वह प्रार्थना में चली गई, ठीक वैसे ही, जैसे दिल्ली में डॉक्टर की मेज पर फिजियोथेरेपी करवाते समय चली जाती थी।
बीसियों एक से एक यात्रा वृत्तान्त पढे होंगे आपने, लेकिन घटनाप्रवाह और चेतनाप्रवाह की ऐसी वर्णनातीत जुगलबन्दी, मेरे लिए तो कल्पनातीत ही है, मैं समझता हूँ, आप के लिए भी कल्पनातीत ही होगी। पीडा के बीचों-बीच यह उद्गार सुनाई पडता है, लेखिका का, महादेव, आपकी बच्ची हूँ, बडी दूर से आई हूँ, मेरी यात्रा सफल करो। और तभी अकस्मात् वह अदृश्य चिमटा, जो रात भर मेरी अंतडियाँ खींचता रहा था, लेखिका कह रही है, वह चिमटा बीच हवा में रूक गया, मैं स्वस्थ होकर एकदम बिस्तर पर उठ बैठी। क्या सचमुच कुछ देर पहले वह मेरी ही देह थी जो पीडा में लोट रही थी? अब न पीडा थी, न पीडा की स्मृति।
लेखिका खुद अवाक है अचरज से कि मैं कोई सपना तो नहीं देख रही थी। नहीं। तत्काल लेखक से तदात्म हो चुका उसका पाठक बोल पडता है कि यह मात्र घटना नहीं है, यह स्वयं इस यात्री का चेतनाप्रवाह है। घटनाप्रवाह नहीं, चेतनाप्रवाह।
चेतनाप्रवाह सपना कैसे हो सकता है? इसी बीच गगन के सहयात्री फिल्म वाले भी जो कि साथ चल रहे हैं, उनका उत्साह भी धराशायी हो चुका है, थक चुके हैं वे। आगे बढने की हिम्मत नहीं है उनकी। वे यहीं से वापस लौटने का फैसला भी कर चुके है। मानसरोवर तक आ ही गए है, तो बस हो गया, कैलाश नहीं जाएँगे। अभी आगे इससे भी ज्यादा खडी चढाई है, चुक गई है हिम्मत फिल्म वाले साथियों की।
अब इससे आगे जो अध्याय शुरू होने वाला है, उसका शीर्षक ही एक प्रश्नचिह्न है। क्या यही हैं स्वर्ग की सीढियाँ? और उपशीर्षक की तरह ध्वनित होता, लेकिन अपने आर-पार सब शीर्षकों का शीर्षक जो है, उसे भी सुन लीजिए - वह है- बिछडे सभी बारी-बारी। कुछ याद आया आपको?
उनतीस लोगों के समूह में बचे-खुचे सिर्फ 7 जन दारचेन आ गए हैं, जो कि मानसरोवर से 11 किलोमीटर आगे है, कैलाश पर्वत के चरणों में बसा हुआ एक गाँव। कल सुबह यही से परिक्रमा शुरू होगी जिसमें सबसे भरोसेमन्द साथी होगा एक याक। घोडे से कहीं ज्यादा विश्वासपात्र।
तभी, मित्रो! एक अटपटा मगर बडा मनोरंजक सवाल इनके साथ चलने वाले रोशन का हमको सुनाई देता है। क्या सवाल है रोशन का गगन से? पूछता है, आप क्या लिखती हैं? उत्तर मगर अप्रत्याशित रूप से बडा अर्थगर्भ, बडा रोमांचक है। गगन का उत्तर है, जो समझ में नहीं आता, उसके बारे में लिखती हूँ। तो रोशन का प्रतिप्रश्न है, समझ में आए बगैर लिखती हैं, कैसे?
अब इस प्रश्न का प्रतिउत्तर हमें सचमुच गहरे में कहीं सहमा देता है, सिहरा देता है। लेखिका ने ये खुद मेरे पाठक मन की बात कैसे पकड ली? मैं सोच रहा हूँ।
अब अगला पडाव आता है। डेरापुक नाम है जिसका। कैलाश के चरणों में लगा हमारा तम्बू। यूँ हाथ बढाओ और छू लो।
रोमान्च और किसे कहेंगे? और फिर यह अपने अन्तरतम की बात, जो मैं शायद किसी से साझा नहीं कर सकता, मगर जो पहली बार इस यात्रा वृत्तान्त की लेखिका ने मानो हमारे अन्तर्मन के भी अर्न्तमन की थाह लेते हुए विस्फोट की तरह हमारे सामने प्रत्यक्ष रख दी है। क्या कहती हैं?
पहाडों की माया है यह, वे कभी दूर नहीं लगते। हमेशा पास, बहुत पास लगते हैं! साथ ही इससे लगा-लिपटा एक और वाक्य सुन लीजिए, लेखिका कहती हैं, कैसा संयोग है यह, मेरे सारे देव आज शाम इस पर्वतमाला पर एकत्र हो गए हैं। पीछे हिम आच्छादित कैलाश और आगे भूरे पर्वत।
नाम सुनिए पर्वतों के - मंजुश्री, वज्रपाणि, अवलोकितेश्वर। यहीं पर एक दूसरी मर्म की बात लेखिका के विचारने में आती है जिसने मुझे पढते समय एकदम विस्मय आविष्ट कर दिया था, एकदम स्तब्ध कर दिया था। क्या था वह वाक्य? वह वाक्य सुनिए - संदेह के अपने कवच हैं। अविश्वास करो, तो कुछ भी नहीं।
और विश्वास या कि आस्था का क्या? यह पाठक पूछेगा। मन ही मन या जोर से। जिसका भी जवाब लेखिका के पास है। कहती हैं - आस्था की अपनी चुनौतियाँ है। अनास्था की तरह आस्था की भी अपनी चुनौतियाँ हैं, जो कम भीषण नहीं होती। जानने वाले ही जान सकते हैं। कहती हैं -कौन कहता है कि आस्थावान होना निर्द्वन्द्व होना है?
अब इस पाठक को क्या हो गया है उसी क्षण में। कभी किसी के मुख से निकली है क्या ठीक ऐसी बात जो कि इस वक्त उसके भी सुनने में आ गई हो? जब कोई आने दे उसे अपने सामने सचमुच अक्षरशः, ऐसे मर्मांतक उजाले में, तभी न होगा? जैसे अभी इसी क्षण।
कहाँ पहुँच गए हैं हम? कहीं पहुँचे भी हैं कि नहीं? पहुँचे तो हैं निस्संदेह।
हम डेरापुक की ऊपर वाली पगडण्डी पर पहुँचे हैं। नीचे उसी के समानान्तर ल्हा छू की धारा बह रही है। यही ल्हा छू की धारा आगे चल कर सिंधु नदी कहलाती है। रोमांच हो आता है सुन करके। यहीं इसी जगह स्वामी प्रणवानंद की कैलाश मानसरोवर किताब याद आती है गगन को, जो कभी मैंने भी पढी थी, लडकपन के पूरे उछाह और उमंग में, अलमोडा में। और अगर मेरी स्मृति छलती नहीं है मुझे, तो रचयिता स्वामी प्रणवानंद को भी मैंने इन्हीं आँखों से देखा था बचपन के अलमोडा में। कहाँ गयी वह किताब? इतने बरसों बाद, पिछले जन्म जितनी पुरानी, और फिर भी धीरे से उभर आई है वह याद।
लो, हम डोलमा ला पहुँच गए। लेखिका की टिप्पणी है एकदम सच्ची और और मार्मिक टिप्पणी। हम सब अपने अनुभव से इसकी पुष्टि कर सकते हैं। आप में से प्रत्येक, जो भी पढेगा इस यात्रा वृतान्त को। क्या कहती है वह टिप्पणी? यही कि - तिब्बती यात्री कितने एकान्तिक लगते हैं। चार-पाँच लोगों के छोटे-छोटे समूह। साथ में माला और प्रार्थना-चक्र। देखा ही होगा आपने लामाओं को। खुद से बुदबुदाते चले जा रहे हैं मानो सारी सृष्टि में उनके और उनके ईश्वर के सिवा और कोई है ही नहीं। तुलना में भारतीय तीर्थयात्रियों की छवि अपने आप उभरेगी। कितना बोलते हैं, शोरगुल मचाते।
बहरहाल, अब हम सिन्धु नदी के उद्गम स्थल के आस-पास पहुँच गए हैं। काश, स्वामी प्रणवानन्द की वह किताब जो कि पहला प्रामाणिक शोधग्रंथ जैसा था, उसको मैं इस तीर्थस्थल में साथ ला सकती, दुबारा पढ सकती। गगन से जो प्रेरणा मिली है, उसके सच्चे गुणगान के साथ, जो जिस जमाने में पढी थी, उस समय बच्चे रहे होंगे हम, क्या समझ रही होगी हमारी। ऐसी चीजें पढने की सामर्थ्य भी रही होगी? यह ठीक है कि हर बच्चे का अपना मात्राज्ञान, अपना कुतूहल होता है जो अन्य क्षतियों की भरपाई कर सकता है, लेकिन फिर भी।
यात्रा का कठिनतम पडाव है ये। और यहाँ पर लेखिका का सेंस ऑफ ह्यूमर उसकी विनोदवृत्ति, वह भी गजब ढा रही है। जिस तरह से खडी चढाई की मुश्किलें बढ रही हैं भयंकर, उसी अनुपात में लेखिका का सेंस ऑफ ह्यूमर भी काम कर रहा है। डोल माला की चोटी पर सुनी बस एक ही ध्वनि याद है गगन को। क्या ध्वनि है वह? अपने ही दिल की धकधक। एक लम्बी अशांति के बाद।
जमी हुई नदी है, नीचे पानी के चलने की आवाज है। अगले यानी आखिरी चैप्टर की शुरूआत है रोबर्तो हुआरोज, जो प्रसंगवश मेरे परम आत्मीय, पंसदीदा कवियों में से एक हैं, उनकी पंक्तियों से। सुनिए-
देखता है मुझे
मेरा मुख
मिट्टी के नीचे से
परिक्रमा अब खत्म हो रही है धीरे-धीरे। कैलाश अब दिखाई भी नहीं दे रहे। कितने सुन्दर मणि-पत्थर रखे हैं। उठा लूँ एक? लेखिका का मन कहता है। इतना तय है, हम सुनते हैं लेखिका की आवाज में, परन्तु अपनी आवाज है कहाँ? लेखिका ही कह रही है- इतना तय है कि ऐसी अनुभूति मुझे इससे पहले कभी नहीं हुई। कुछ ही दिनों में किसी ने एक-एक कर सारे कवच उतरवा लिए।
किस के कवच? सुनिए- ज्ञान के, आस्था के और शंका के कवच।
सुना कभी आप ने? हम पाठक चौंक पडते हैं आगे का वाक्य पढ के। क्या है आगे का वाक्य?
अवाक। क्या यह सही शब्द है उसे कहने को, जो इस समय हो रहा है हमारे साथ?
पर इस समय ही क्यों? आगे की पंक्तियाँ हैं - यात्रा समाप्त हो रही है, पंक्तियाँ हैं लेखिका की-
कुछ है जो बदल गया है। घर-घर जैसा नहीं, आँगन- आँगन जैसा नहीं। पता नहीं, जब से लौटे हैं, हर चीज परायी-परायी लगती है। जैसे वो हमारी नहीं, हम उसके नहीं। फिर वह कौन है? कहते हैं हिमालय टोना कर देता है। आदमी कहीं का नहीं रहता। कहीं टोना तो नहीं उठाकर ले आयी मैं?
समानशील बन्धुओं, आपने सैकडों किताबें पढी होंगी, उनमें यात्रा वृत्तान्त भी होंगे, किन्तु अवाक के इस वाकवैभव से गुजरने का अनुभव आपको उनमें से किसी के साथ भी तुलनीय शायद ही लगे। इससे गुजरते हुए और उबर चुकने के बाद भी कई घण्टों तक, बल्कि कई दिनों तक आप खुद को इस से घिरा हुआ ही पाएँगे। अपने बावजूद तोड नहीं सकेंगे। तोडना भी नहीं चाहेंगे। अन्य सारी व्यस्तताओं के घिराव से वह घिराव कितना उत्कट, कितना भिन्न है। आप चाहते ही नहीं इस घिराव से मुक्त होना। ऐसा अध्ययन अनुभव अत्यन्त विरल क्या, अकल्पनीय ही होता है, जो आपको अपने साथ होने का वैसा ही अवसर जुटा दे, जैसा कि सबके साथ होने का।
लेखिका की ही तरह आपको हर तरह के चाहे अनचाहे साथियों से साबका पडेगा इस यात्रा के दौरान। सभी आपको रोचक और जीवंत, आमुलआम ही नहीं, खासुलखास लगेंगे। सभी लोग अनिवार्य और विशिष्ट चरित्र की तरह अपनी छाप आप पर छोड जाएँगे, आपकी चेतना पर, उस चेतना पर जो इस समय आफ सबसे ऊँचे और गहरे जीवनानुभव से गुजर रही है। एक-एक मामूली से मामूली, स्थूल से स्थूल ब्यौरा तक अपनी अमिट छाप छोड जाता है आपकी चेतना पर। किताब पढ चुकने के कई दिनों बाद भी एक-एक प्रसंग और एक-एक चरित्र की छाप कैसे इतनी ताजा और अमिट रही आती है? उनकी भी जो आपको आकर्षित करते हैं, मजेदार लगते हैं, और उनकी भी जो आपको विरक्त करते हैं, जैसे महाराज गुरु जी। आप उनको भी नहीं भूल सकते।
जिंदा ब्यौरों को, यथार्थ बिम्बों को, कैसे सहज ही निभाते चले, ये कोई इस लेखिका से सीखे। बिना लेखिका की ओर से किसी भी अतिरिक्त ध्यानाकर्षण के ये बातें आफ भीतर पैठ जायेंगी। इसी तरह कैलाश मानसरोवर से सम्बंधित कितने सारे प्रकरण हैं इस वृत्तांत में। किस कदर आसानी से गुँथ गए है वो वृंत्तात के सहज प्रवाह से! एक जान हो गए हैं। कविता और कवि स्वभाव का निपट दैनिक यथार्थ के ब्यौरों के साथ ऐसा सहज रिश्ता कितना विरल होता है, मित्रो, कितना तुरन्त फलदायी भी होता है, इस बात को आप शायद पहली बार इतनी दोटूक स्वीकार करेंगे।
इसी तरह एक और भी स्पृहणीय विशेषता है इस किताब अवाक की। क्या है वह? एकदम साधारण बातों में निहित असाधारणता को पहचान लेना और इस पहचान को बडे अस्मरणीय ढँग से टाँक भी देना। अनेकानेक उदाहरण बिखरे पडे हैं इस पुस्तक में, लेखिका की इस परकाया प्रवेश वाली खूबी से। परकाया प्रवेश कह लो, परात्म प्रवेश कह लो, एक ही बात है। जैसे उनकी सहेली है रूपा, जब पूजा करती है, उस वक्त जो कैफियत तारी होती है लेखिका पर। क्या कह रही है?-
हो सकता है इस वक्त गायत्री माँ इस पर सवारी कर रही हो, और इसे पता न हो? पहचानना तो आपको पडेगा - रिनपोछे ने कहा था। मानसरोवर की उस सुबह जब रूपा ने वह अलौकिक पूजा समाप्त की, तो मैं बरबस उसके चरणों में झुक गयी। कम से कम उस क्षण वह मेरे लिए देवी गायत्री ही थी।
सबसे कठिन परीक्षा ऐसे वृतान्त की, मित्रो, वहाँ होती है जहाँ सबसे ज्यादा खतरा होता है। और ठीक ऐसे ही अवसरों पर लेखिका का लाघव या उसका हल्का-फुल्कापन पाठक को विस्मित कर देता है। परिक्रमा पूरी होते-होते -
क्या सचमुच ऐसा होता है? ईश्वर की गोद में हम उस पार पहुँच जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता?
ऐसे अवसरों पर लेखिका की भाषा में भी गजब का उछाल आ जाता है, अप्रत्याशित उछाल, जो अपनी नितान्त दोटूक अभिधा में भी कैसी-कैसी व्यंजना को मात कर देता है। लेखिका कहती है- अब तक हमें बिना भाषा के बात करना आ गया है।
सुन्ना, जो साथी परिचारक है, अपने दोनों हाथों से लेखिका के माथे को छू रहा है और ध्यान से उसे ताकता है गूँगा-सा और लेखिका का मर्मोद्गार है, अब शायद इसे कभी नजर नहीं आऊँगी इसके बाद।
एक और बात। मानसरोवर से आखिरी विदा लेते समय।
अपनी दिव्यता के साथ क्या करता होगा पडा-पडा यह मानसरोवर? ऊब नहीं जाता होगा मानसरोवर, हजारों वर्षों से वहीं एक जगह पडा-पडा?
और यह आखिरी सोच इस यात्रा वृतान्त की लेखिका की।
कभी-कभी हमें क्यों पता नहीं चलता, हम कौन हैं? जहाँ है, वहाँ क्यों हैं? जहाँ नहीं है, वहाँ क्यों नहीं हैं? कहते हैं, हिमालय टोना कर देता है।
सहयात्री मित्रो,हिमालय ही क्यों, हिमालय का यह यात्रा वृतान्त भी आफ साथ कहीं कुछ वैसा टोना न कर दे, जो इन पंक्तियों के लेखक के साथ उसने सहज अनायास कर दिया है। तथास्तु।

*यह उद्बोधन प्रो. रमेशचंद्र शाह ने वाणी प्रकाशन द्वारा 29 मार्च, 2022 को आयोजित ऑन लाइन श्रृंखला गगन गिल का रचना-संसार-2 के अंतर्गत दिया था। इसका लिप्यंतरण शोधार्थी ज्योत्स्ना आर्य ने किया है।

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