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भारतीय नवजागरण का पहला राष्ट्रकवि

कनक तिवारी
(1) कार्लाइल और गिबन ने इतिहास पर कईं कडी टिप्पणियाँ की हैं। यहाँ तक कहा कि दुनिया का इतिहास कुछ महापुरुषों की जीवनियों के अलावा और क्या है भला! इतिहास मरे हुए फॉसिल्स नहीं ढूँढता। उसकी खोह या सुरंग में केवल अन्धकार या बदबू की हुकूमत नहीं है। वह अतीत का अरण्यरोदन भी नहीं है। इतिहास केवल चुनिन्दा घटनाओं की जब तब होने वाली पुनरावृत्ति भी नहीं है। वह केवल अधभुलक्कडी का यतीमखाना भी नहीं है। अपनी तमाम बुराइयों और आलोचनाओं को अपने सिर और काँधे गठरी की तरह लादे इतिहास समय के आयाम में कदम दर कदम चलता है और पीढियों को अपने यश की थाती के साथ साथ बेहतर जीवन के उत्साह के साथ लबरेज भी करता है। इस ऑर्गेनिक प्रक्रिया में इतिहास कई बार संस्मरण, कभी स्मरण और कभी विस्मरण की गफलत में फँस जाता है। तब अभ्रक की परतों की तरह बीत गए इतिहास की जिल्दों को उघाडकर देखने से सच झरता हुआ दिखाई भी देता है। वह वर्तमान के काम आता है।
(2) भारत की उन्नीसवीं सदी के इतिहास में नवयुग का जलजला आया था। खासतौर पर बंगाल और महाराष्ट्र सहित कुछ प्रदेशों के कई इलाकों में अंगरेजियत की हुकूमती ठसक और पुराने भारतीय आदर्शो और विचारकों के बीच मुठभेड होने से अपनी तमाम तेजस्विता के बावजूद नवजागरण का आंदंोलन वर्णसंकर होने का अभिशाप भी अब तक ढो रहा है। बंगाल नवजागरण का गर्भगृह है। इतने नाम हैं कि जिनकी फेहरिस्त बनाना सरल काम नहीं है। मोटेतौर पर राजा राममोहन राय (1772-1833) को नवजागरण के पहले सिद्धान्तकार, संस्थापक और प्रवर्तक के रूप में इतिहास ने श्रेय दिया है। उसके बाद लगातार तेजस्वी हस्ताक्षरों का योगदान नवजागरण के स्फूर्त आन्दोलन को मिलता रहा है जिसका चरमोत्कर्ष बीसवीं सदी की गोद में ले जाते विवेकानन्द (1863-1902) को दिया जाना माना जाता है। कभी कभार आकाश में कोई चमकदार तारा आँखों से यक ब यक दिखाई नहीं पडता, लेकिन वह देख लिया जाने पर चकाचौंध उत्पन्न करता है। जिरह, जिज्ञासा, जिद और शोध की खुर्दबीन से भारत के नवजागरण काल में बंगाल का इतिहास देखें। तो बमुश्किल 22 वर्ष की उम्र में कालकवलित हो जाने वाले एक यूरेशियन युवक हेनरी लुई विवियन डेरोजिओ का नाम उभरता है। उसका आनुपातिक यशगान किए बिना इतिहास पर सच की उपेक्षा करने का दोष लगाया जा सकता है। कितने लोग जानते हैं कि डेरोजिओ आधुनिक भारत का पहला राष्ट्रकवि है! उसने अंगरेजी और बांग्ला में अभिव्यक्ति की महारत की आधारशिला रखी। पुर्तगाली पिता फ्रांसिस डेरोजिओ और अंगरेज माँ सोफिया जॉनसन का लाडला बेटा अकाल मौत मरने, लेकिन कालजयी होने भारत की धरती पर जन्मा था। डेरोजिओे का जीवन चरित्र अदभुत और संघर्षशील है। 18 अप्रेल 1809 को पैदा हुआ यह भारतीय लाल 26 दिसम्बर 1831 को चला गया। उसकी शुरुआती तालीम डेविड एडमण्ड द्वारा स्थापित कलकत्ता के धरमतल्ला एकेडमी में हुई। यह जानना लाजिमी है कि आज से लगभग दो सौ वर्ष पहले धरमतल्ला एकेडमी की शिक्षा में आधुनिक भावबोध और उदार मूल्यों के समर्थन का कोलाज सुगन्ध की तरह बिखरा था। उसकी खुद डेरोजिओ ने तारीफ की है कि उसे एक फ्री थिंकर बनाने में उसके स्कूल का हाथ है। उस काल की मशहूर पत्रिकाओं इण्डिया गजट और कलकत्ता जर्नल ने इसकी ताईद की है।
(3) 14 वर्ष की उम्र में स्कूली पढाई छोडकर डेरोजिओ ने पिता के दफ्तर में काम करना शुरू किया लेकिन उनके भाई के नील के कारखाने में काम करने भतीजे को भागलपुर भेजा गया। वहाँ गंगा के किनारे डिरोजिओ में कविता की सलिला फूट पडी और रातों रात वह कवि होने में तब्दील होता चला गया। अंगरेजी के महान समकालीन कवियों लॉर्ड बायरन, पी.बी. शेले और जॉन कीट्स ने उसे रोमांटिकता से अभिभूत कर स्वप्लिन संवेदनाओं से सराबोर कर दिया। बंगाल की ऐसी कोई प्रतिष्ठित पत्रिका नहीं थी जिसने खुद होकर डेरोजिओ को प्रकाशित करने की पहल नहीं की। 18 वर्ष का होते होते सम्पादक जॉन ग्रांट ने डेरोजिओ की कविता का संज्ञान लिया और उसे भरोसा दिया कि वह उसका काव्य संग्रह छापेगा। अचरज है इस उम्र में इसके साथ साथ डेरोजिओ ने अपना अखबार दि कलकत्ता गजट प्रकाशित करना शुरू कर दिया। उसके पहले ही उसे अंगरेजी साहित्य और इतिहास पढाने हिन्दू कॉलेज की नौकरी में रख लिया गया। अगले तीन वर्ष से भी कम समय में डेरोजिओ ने अपने उद्दाम व्यक्तित्व के कारण हिन्दू कॉलेज और कलकत्ता के जीवन में बौद्धिक भूकम्प ला दिया। लोग फख्र से कहते थे अमुक विद्यार्थी झूठ नहीं बोल सकता क्योंकि उसका गुरु डेरोजिओ है। उसने छात्रों को बताया कि शिक्षा का मेरुदण्ड मनुष्य की नैतिक सुदृढता में ह। बाकी शिक्षा तो ऊपरी आवरण है। उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक में ऐसी स्थापनाएँ करना एक खतरनाक खेल भी था। यह जानना चाहिए कि बंगाल का सामाजिक जीवन दकियानूसी, रूढ धार्मिकता, किवदंतियों, अफवाहों और अनावश्यक परम्पराओं से भी लदा फदा ही रहा है। नवजागरण के कई विज्ञानोन्मुख हस्ताक्षरों के बावजूद हिन्दू समाज से जडता निकालने का काम आज तक भी सफल नहीं हो पाया है। तब भला उन्नीसवीं सदी में क्या कुछ हो पाया होगा? डेरोजिओ के समवयस्क छात्रों ने एक आन्दोलन खडा किया जिसने उसे नाम दिया था यंग बंगाल मूवमेन्ट यह नौजवान समूह विधवा विवाह के समर्थन तथा बाल विवाह और सती प्रथा के खिलाफ और आजादी, बराबरी और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता वगैरह को लेकर हर तरह की सामाजिक बुराई के खिलाफ प्रहरी बनकर खडा होता रहता था।
यह भी सही है कि डेरोजिओ ने एक तरह से नास्तिकता का ही प्रचार किया। भले ही आध्यात्मिकता से उसका गहरा लगाव रहा है।
(4) डेरेाजिओ की एक अमर कविता है जिसका अंगरेजी में शीर्षक है टू इण्डियाः माई नेटिव लैण्ड अर्थात माई कन्ट्री।......एक लगभग अधूरा महाकाव्य द फकीर ऑफ जंघीरा सबसे मशहूर काव्यकृति है। उन्नीसवीं सदी के बंगाल में तीन चार वर्षों में जितना कहर डेरोजिओ की वैचारिकता के समूह ने दकियानूस जड समाज की सडांध पर बरसाया है, वैसा उसके पहले किसी भी नामचीन भारतीय ने नहीं किया है। डेरोजिओ की मृत्यु के पाँच वर्ष बाद रामकृष्ण परमहंस का जन्म हुआ। सोचा जा सकता है कि वह कितना कूपमंडूक युग रहा होगा जिसमें रात के घने अंधेरे में आसमान से बिजली चमकने जैसा बोध इतिहास को हुआ हो। डेरोजिओ पर हिन्दुओं को ईसाई बनाने और बरगलाने का आरोप भी लगा और यह भी कि वह छात्रों को नास्तिक बनाकर सनातन धर्म की पुख्ता मान्यताओं के खिलाफ विद्रोह करता है। उसे कई आरोप लगाकर स्कूल की नौकरी से निकाल दिया गया और कुछ दिनों बाद हैजा से पीडित होकर डेरोजिओ के प्रकाशपुंज जैसे जीवन का अस्त हो गया। भारत में रेशनल वैचारिकता का वह प्रस्थानबिन्दु और प्रवाह पुरुष रहा है। यह बात भी साहित्य और सामाजिकी सहित सांस्कृतिक इतिहास के पुरोधाओं को यदि मालूम भी है, तो उसका समुचित प्रस्थापन नहीं हो पाया है। उसके नहीं रहने पर भी उसके छात्रों ने यंग बंगाल मूवमेंट को चलाते हुए अपने समवयस्क गुरु की मशाल को थामे रक्खा। डेरोजिओ द्वारा स्थापित बौद्धिक पटल में तत्कालीन कलकत्ता के बड से बड विद्वान शिरकत करने आते थे।
(5) प्राच्य विद्या के विद्वान मैक्समूलर ने भी अपने लेखन में डेरोजिओ का जिक्र किया है। सत्य के प्रति उसके अनुराग, समर्पण और प्रतिबद्धता को लेकर यहाँ तक कहा गया है कि वह सुकरात की तरह रहा और उसी की तरह मौत पाई। आज जब रेशनलि*म, फ्री थिंकिंग, तार्किकता और जनपक्षधरता के साथ कठमुल्लापन से लडने वालों को भी देशद्रोही कह दिया जाता है, तब आज से दो सौ वर्ष पूर्व के कूपमण्डूक भारत में वैज्ञानिक अवचेतना लेकर ब्राह्मणवाद के भी खिलाफ संघर्ष करते इतिहास की धारा को मोडने का काम जिस तरुण ने किया वह 22 वर्ष तक भी नहीं जी पाया। रसिक कृष्ण मलिक, दक्षिण रंजन मुखोपाध्याय, कृष्ण मोहन बंदोपाध्याय, रामगोपाल घोष, हरचन्द घोष, शिवचन्द्र देव, रामतनु लहरी और राधारास सिकवार जैसे और कई छात्र रहे हैं जिन्होंने यंग बंगाल में रहकर जो रोशनी बिखेरी उसका राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज और महाराष्ट्र में स्थापित प्रार्थना समाज जैसे संगठनों से तुलना करने का अब भी तात्विक प्रयोजन हो सकता है। यह अचरज है और सच से बडा कोई अचरज नहीं होता कि डेरोजिओ को पढने से ऐसा लगता है कि वह हमारा समकालीन है। उसमें कुछ भी पुरानापन, बासी या अतीतोन्मुख ज्ञानेन्द्रियों के जरिए स्वीकृत नहीं होता। एक असाधारण बौद्धिक, जीवंत कवि, विचारक, गद्य लेखक और भविष्यमूलक गवेषणाओें के गोमुख की तरह डेरोजिओ की समीक्षा होने से इतिहास का एक परिच्छेद अपनी गुमनामी के ढेर से उठ कर रोशन होने को हर वक्त आतुर रहता है।
(6) नवजागरण के प्रवर्तक राजा राममोहन रॉय के बाद 1809 में जन्मे कवि डेरोजिओ की ज्यादातर रचनाएँ नष्ट हो गई हैं। उसके शोध निबन्धों, छिटपुट गद्य, पत्रों और भाषणों का कोलाज है। अचरज है समकालीन होने पर भी राजा राममोहन रॉय के लेखन तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर रचित जीवनियों के जीवन चरित्र में डे रोजिओ का उल्लेख नहीं मिलता। थॉमस एडवड्र्स द्वारा लिखी डे रोजिओ की जीवन गाथा 1884 में कलकत्ता में ही प्रकाशित हो गई थी। कईं धार्मिक और दार्शनिक तथा शैक्षणिक विषयों पर विचारोत्तेजक उपस्थिति दर्ज कराने के बावजूद युवा विवेकानन्द ने कहीं भी डेरोजिओ का उल्लेख नहीं किया। दुर्भाग्यपूर्ण है डेरोजिओ के समकालीनों ने उसके कार्यों और लेखन का पूरा ब्यौरा भविष्य की पीढियों के लिए सुरक्षित नहीं किया। उसने मशहूर यूरोपीय दार्शनिक कान्ट की गवेषणाओं पर एक लम्बा निबन्ध लिखकर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया। उसका उत्तर कोई समकालीन नहीं दे पाया। यह मानते हुए भी कि वह एक अद्भुत प्रतिभाशाली शिक्षक था, उसे स्कूल की नौकरी से निकाल दिया। वह मूर्तिपूजा के खिलाफ था। कुछ अंशों में उसे नास्तिक भी कहा जा सकता है। हिन्दू कॉलेज के लिपिक हरमोहन चटर्जी का संस्मरण कितना मार्मिक है कि डेरोजिओ ने अपने विद्यार्थियों के मस्तिष्क पर इतना अधिकार कर लिया था कि वे अपने निजी मामलों में भी उसकी सलाह के बिना अपनी राय नहीं बनाते थे। हिन्दू कॉलेज के जीवन से ही डेरोजिओ ने पार्थेनॉन नाम की पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया था। उसने शीघ्र ही ईस्ट इण्डिया नामक पत्र निकालना शुरू किया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का यह महत्त्वपूर्ण पत्र अपने समय में सर्वाधिक लोकप्रिय था। डेरोजिओ ने कलकत्ता का पहला वादविवाद क्लब एकेडेमिक एसोसिएशन अपने संयोजन में स्थापित किया। मानिकतल्ला मकान के बागीचे में होने वाली बैठकों में बंगाल के डिप्टी गवर्नर डबल्यू. डबल्यू. बर्ड, मुख्य न्यायाधीश सर एडवर्ड रायन, वाइसरॉय लॉर्ड बैंटिंक के निजी सचिव कर्नल बेन्सन तथा डेविड हेयर जैसे बुद्धिजीवी भी आते थे।
(7) डेरोजिओ बचपन से ही भावुक, कल्पनाशील और संवेदनशील था। भागलपुर में प्रकृति के प्रत्यक्ष अभिप्राय ने उसकी काव्यानुभूतियों को पहली बार लेखनी दी। पन्द्रह वर्षीय कवि की लेखनी से प्रसूत कविताएँ कैशोरीय अपरिपक्वता से लकदक थीं। उनमें कुछ ऐसा आकर्षण भी है कि बार-बार पढने का मन करता है। कलकत्ता आने पर उसके जीवन को स्थायित्व और नई दिशा मिली। उसे अपने विद्यार्थियों से बेसाख्ता मोहब्बत थी। अपनी इन भावनाओं को उसने अपनी कविताओं में मार्मिक अभिव्यक्ति दी है-
ओह! जब मैं देखता हूँ
हालात की हवाओं को,
और अप्रैल महीने की ताजगीदेह बयारों जैसी
प्रारम्भिक ज्ञान की बौछारों को,
और अनगिनत नये उपदेशों को,
तुम पर अपना प्रभाव डालते,
और तुम्हें सत्य के सर्वशक्तिमान
की पूजा करते तो मेरे ऊपर
कैसा आनन्द बरसने लगता
जब मैं देखता हूँ
भविष्य के आईने में
कीर्ति को भी हार गूँथते
जिन्हें तुम्हें पहनना है
तब मुझे लगता है मैं व्यर्थता
में नहीं जिया।
(8) भारत से डेरोजिओ को असीम प्यार था। यूरोपीय कुलशीलता के कथित उद्गम के बावजूद उसने ऐलान किया हिन्दुस्तान ही मेरी मातृभूमि है और मैं इसका बेटा हूँऔर मैं इसकी सेवा करने के लिए अपना सब कुछ होम दूँगा। उसकी प्रसिद्ध कविता टू इण्डियाः माई नेटिवलैण्ड अर्थात् माय कन्ट्री भारतीय नवजागरण का पहला देशभक्तिपूर्ण कालजयी आह्वान है। उसमें ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गुलाम बनाए जाने से जन्मी दुर्दशा की संकेतित, लेकिन तेज तर्रार भाषा है। यह कविता आधुनिक भारत की उल्लेखनीय राष्ट्रीय कविताओं का प्रस्थान बिन्दु है। इस तरुण कवि में अंग्रेजी के विश्वविख्यात कवि जॉन डन की तरह पौरुष की छटाएँ हैं। विनम्र बयान के बावजूद डेरोजिओ का आत्मसम्मान और स्वाभिमान कविता की बानगी में एक सोई हुई कौम को उठ खडे होने के लिए झिंझोडता है। यह डेरोजिओ था जिसके उद्दाम हौसले ने यंग बंगाल नामक आंदोलन खडा किया। यंग बंगाल वह आंदोलन था जिसने सामाजिक जीवन की वर्जनाओं और रूढियों से दो दो हाथ करने का फैसला किया। पश्चिमी ज्ञान के लिए भारत में खिडकी खोली। जिससे पछुआ हवा आ सके और भारत की तरुणाई को शिक्षित करते हुए एक दिन इंग्लैण्ड भारत से बिदा भी हो जाए। डेरोजिओ ने यह कविता लिखी, तब तक बंगाल या भारत में देशभक्ति की ऐसी समानान्तर रचना उपलब्ध नहीं थी।
(9) डेरोजिओ उदात्त अर्थों में प्रखर राष्ट्रवादी था। भारत के सांस्कृतिक इतिहास के प्रति उसे सहज स्वाभाविक गर्व था। गुलामी, पस्तहिम्मती और निराशा के वातावरण में जीवित रहना भी वह अपमानजनक समझता था। वह अतीत की गहराइयों में उतरकर आत्मविश्वास की भावना से लैस होकर लौट आना चाहता है, ताकि वर्तमान की गिरावट के विरुद्ध नये सिरे से संघर्ष कर सके। पराधीन भारत के कवि की आत्मा की छटपटाहट का सजीव चित्रण उसने किया है। उसे पढकर कौन भारतीय कर्त्तव्य बोध से तिलमिला न उठता? ऐसी भावनाओं को उसने कविता में कुशल शिल्पशक्ति के साथ गूँथा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक राष्ट्रीय एकता के जोर से अँगडाई लेकर उठ खडे होने वाले भारत के साहसिक अनुष्ठान की क्या यह पूर्व घोषणा नहीं है?
ओ मेरे देश।
अपने अतीत के स्वर्ण युग में
तेरे ललाट के चारों ओर
एक तेजोमय प्रभामण्डल था
देवों की तरह तू पूजित था
कहाँ है अतीत की
वह वैभव महिमा?
धूल-धूसरित है वह भव्य गरिमा।
मैं ही उतरूँ गहरे अतीत
और ढूँढ चट्टानी भव्यता के
वे अदृष्ट भग्नावशेष
तुझे मिले मात्र सहानुभूति के शब्द
मेरे श्रम का हो यह पुरस्कार विशेष
ओ मेरे तरसे हुए देश।
(अनुवादः कनक तिवारी)
(10) डेरोजिओ का असल में राष्ट्रीय कवियों में भी शुमार किया जाना चाहिए। देश के प्रति अपने दायित्व से सजग होकर उसने अत्यन्त आत्मविश्वास सहित विनम्र घोषणा की। राजनीतिक अराजकता, सामाजिक जकडन और नैतिक गिरावट के दिनों में ऐसी कविताएँ लिखकर डेरोजिओ ने राष्ट्रप्रेम बुलंद किया। उसने अखण्ड आत्मविश्वास सहित घोषणा की-
हुए हैं मुझसे समर्थतर कलाकार
जिनने छेडे तेरी मधुरिम वीणा के तार
मेरे कर हैं अशक्त
किंतु यदि वह संगीत शाश्वत
संभव है उनमें हो प्राणों का फिर संचार
अमर रागिनी पुनः बज उठे
इससे छेडूँगा ही तेरी वीणा के तार।
(अनुवादः कनक तिवारी)
(11) ऐसा संघर्ष डेरोजिओ के जीवन का महत्वाकांक्षी संकल्प था। उसके लेखे उसने विचारों और कायर् का ताना-बाना बुना तथा उस पर अपना जीवन होम दिया। राजनीतिक अराजकता, सामाजिक जकडन और नैतिक गिरावट के दिनों ऐसी कविताएँ लिखकर देशप्रेम का नारा बुलन्द किया। उससे प्रभावित समीक्षकों और पाठकों ने एक स्वर से उसे आधुनिक भारत का राष्ट्रकवि घोषित किया। सही अर्थों में रवीन्द्र का पूर्ववर्ती था। डेरोजिओ पर अलबत्ता आरोप लगाया गया कि उसके नैतिक उपदेशों के कारण हिन्दू समाज के मूल्य बदले जा रहे हैं। भारत में ईसाई मिशनरियों को धर्म प्रचार करने में बहुत सुविधा हुई है। डेरोजिओ निराश मृत्युवादी नहीं था। उसके काव्य में प्रचण्ड आत्मविश्वास और आस्था के झंझावात के दर्शन होते हैं। निराशा, कुण्ठा और हीनता की बात को वह उखाड फेंकता है। उसने स्वेच्छा से पीडा को चुना था। उसका स्वर एक सतत् संघर्षशील सैनिक का था। मनुष्य की अपरिमित शक्तियों में उसे विश्वास था। पौरुष के विख्यात कवि जॉन डन की तरह भी वह भी मृत्यु को चुनौती देता है-
मनुष्य की अपरिमित शक्तियाँ,
बना सकती हैं
उसके इर्द-गिर्द वातावरण
और ले सकती हैं
बुराई से अच्छाई मधुमक्खी की तरह
ज्यों सुन्दर पृथ्वी से मधुर पराग ले लेती हैं
ओ! निर्दयी नियति
मैं भी तुझे वैसे ही
पराजित करूँगा
क्योंकि पीडा में भी मैं
आनन्दानुभूति कर सकता हूँ
(अनुवादः कनक तिवारी)

(12) आज भारत वैश्वीकरण की विकृतियाँ भोग रहा है। कोई कल्पना कर सकता है लगभग दो सौ वर्ष पहले एक नवयुवक वैश्वीकरण को लेकर कह रहा हो कुछ लोगों का विचार है कि औपनिवेशीकरण से हमारे देश की कई बुराइयों को प्रभावी तरीके से खत्म करने में सहायता मिलेगी। लेकिन यह देखना है कि ऐसा प्रयास कब होता है। मुझे इस पर विश्वास नहीं है, और इस धारणा में कि सभी सत्प्रयासों की अपेक्षा औपनिवेशीकरण में ही भारत का फायदा है। सत्य की अपेक्षा लफाजी अधिक है। यद्यपि कुछ आशावादी चिंतकों का ऐसा विचार है। पर यदि सचमुच ऐसा होने की संभावना हो तो भी मेरे विचार में इसमें सबसे बडी बाधा औपनिवेशीकरण के अमल को लेकर है। यूरोपियों द्वारा भारत के औपनिवेशीकरण का विरोध करते डेरोजिओ ने यह भी कहा था कि गोरे अंग्रेज बदहाली हिन्दुओं और मुसलमानों की कर रहे हैं। वही हाल भारत में रह रहे एँग्लोइण्डिया या अन्य यूरोपीय परिवारों का होगा। डेरोजिओ का पूर्वाभास इसलिए सच हुआ। वह इतिहास को जाँचने के लिए भूगोल जैसे सामाजिक विज्ञान के स्फुलिंग को अपनी दुर्लभ मेधा के द्वारा पहचानता था।
(13) महात्मा गाँधी ने चम्पारण में नील की खेती को लेकर आंदोलन खडा किया। उससे अंग्रेजों के छक्के छूट गये। गाँधीजी न केवल राष्ट्रनेता बल्कि परिव्राजक भी थे। उनसे एक 23 वर्ष के नवयुवक की कोई तुलना नहीं हो सकती। लेकिन डेरोजिओ ने ही नील की खेती को लेकर भारतीय किसानों पर हो रहे जुल्म का आगाज किया था। गाँधी की चेतना एक ईस्ट इण्डिया किशोर में गाँधी से कोई सौ बरस पहले समाहित हुई। इस बात का लेखा जोखा न तो इतिहास में दर्ज है और न ही गाँधी साहित्य में।
डेरोजिओ को अंग्रेजों से कोई हमदर्दी नहीं थी, हालाँकि वह कोई राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं था। उसने साहित्य, संस्कृति, सामाजिक विज्ञान और जातीय समीकरणों की ब्रिटिश अवधारणाओं को झिंझोडते अपने देश की बेहतरी को लेकर वैचारिक अरुणोदय की तरह गुमनाम, लेकिन उज्ज्वल जीवन जिया और असमय चला गया। वह यूरोपीय नवोदय को भारत में लाए जाने का विरोधी नहीं था। डेरोजिओ की दृष्टि विज्ञानसम्मत थी। इसलिए उसने इस बात की भी बेबाक वकालत की थी कि अंग्रेज शासक भारत में व्याप्त रूढियों, वर्जनाओं, अफवाहों और अन्धविश्वासों के बरक्स यूरोपीय नवोदय से लैस शिक्षा, संस्कृति और कला के उच्चतर और व्यापक शिक्षण का इंतजाम करें। यह सरकार का पहला कर्तव्य होना चाहिए। इससे नई शिक्षा कस्बों के स्तर तक फैले। उसने यह भी माँग की कि भारत के भाग्य को ईस्ट इण्डिया कम्पनी जैसी तिजारती संस्था के भरोसे छोडने के बदले ब्रिटिश संसद को हस्तक्षेप करना चाहिए। उससे भारतीयों और इण्डो-ब्रिटन प्रकृति के देशवासियों को यथासंभव यूरोपियों के बराबर अधिकार मिलें। उसकी यह भविष्यवाणी सच हुई कि यदि ऐसा नहीं होगा, तो जनविद्रोह को रोकना मुश्किल होगा। उसने कहा था शासक और शासित के रिश्तों को जोडने का काम कलाओं और विज्ञान को भी सौंपना चाहिए। जेरेमी बेन्थम को उद्धृत करते हुए डेरोजिओ ने कहा था कि आदर्श शासन वही होता है जो ज्यादा से ज्यादा लोगों की ज्यादा से ज्यादा भलाई कर सके।

सम्पर्क - एचआइजी, पदमनाभपुर,
दुर्ग (छत्तीसगढ-४९१००१)
मो. ९१३१२५५८६४