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प्रेमचन्द की सर्वश्रेष्ठ कहानी : कसौटी और खोज

कमलकिशोर गोयनका
प्रेमचन्द के साहित्य को लेकर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि उनके उपन्यासों तथा कहानियों में कौन सी रचना ऐसी है जो काल के प्रवाह में मानव जाति को सबसे अधिक प्रिय और प्रभावित करने वाली होगी, कौन-सी रचना हर काल के पाठक की चेतना और विवेक एवं उसकी संवेदना को प्रभावित कर सकेगी। यह बडा जटिल प्रश्न है तथा न सुलझने वाली जिज्ञासा है, लेकिन जब साहित्य का सम्बन्ध मनुष्य से तथा मनुष्य समाज से जुडता है, तो यह प्रश्न निश्चय ही विचार और बहस का बन जाता है। साहित्य की परिभाषा ही यह है कि वह शब्दार्थ जो सबका हित करने वाला हो, जो सबको साथ लेकर चले तथा जो समष्टिगत भावनाओं को लेकर मंगलकारी हो। आचार्य मम्मट ने शब्द और अर्थ में सानिध्य तथा सह्भाव को काव्य कहा है और तुलसीदास ने गिरा अरथ जल बीच सम, कहियत भिन्न न भिन्न कहकर जल और तरंग की सम्पृक्ति कहा है और तुलसीदास यह भी कहते हैं कि काव्य की रचना स्वान्तः सुखाय तथा स्वान्तस्मतः शांतवे होकर व्यक्तिगत परिष्कार तथा रसबोध के तत्वों से पूर्ण होता है तथा वह गंगा की तरह सब का हितकारी होता है- कीर्ति भनिति भूति बलि सोई, सुरसरि सम सब कर हित होई। इस प्रकार भारतीय साहित्य चिन्तन में साहित्य की जो परिभाषा स्वीकृत हुई और जो वाल्मीकि से लेकर प्रेमचन्द, आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक और उसके बाद भी साहित्य में मान्य होती आ रही है, वह यही है कि साहित्य रसात्मक अनुभूति के साथ सबको साथ लेकर चलता है, सबका हित करता है और हृदय की मुक्तावस्था में रचा गया साहित्य लोकमंगलकारी होता है। अतः साहित्य रसमय होकर व्यक्ति-व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिष्कार करता है और यह उसकी समष्टिगत उपयोगिता है। प्रेमचन्द का मत है कि साहित्य जीवन की आलोचना है, जिसमें जीवन का यथार्थ है और आदर्श भी, वह आदर्शोंमुख यथार्थवादी है, और यही तुलसीदास का मंगल भवन अमंगल हारी है। प्रेमचन्द की कसौटी भारत की प्राचीन कसौटी ही है। तुलसीदास ने कहा है कि विधाता ने जड-चेतन दोनों को गुणावगुणों के साथ बनाया है, और साहित्यकार का धर्म है कि वह मनुष्य के विवेक को जाग्रत कर समाज से अवगुणों का उच्छेदन और गुणों का उन्नयन करें, बस इसमें हर साहित्यकार की विधि भिन्न-भिन्न होती है। कुछ साहित्यकार जीवन के यथार्थ में-अमंगल और अशिव के चित्रण में ही उसकी सार्थकता समझते हैं, लेकिन ऐसे एकांगी यथार्थवाद को प्रेमचन्द ने नग्न यथार्थ कहकर उसे पूर्णतः अस्वीकार कर दिया। भारतीय चिन्तन परम्परा में मनुष्य के जीवन की दुष्प्रवृत्तियों तथा दुर्भावनाओं का शमन तथा सद्प्रवृतियों की ओर गमन को ही साहित्य की सार्थकता मानी गई है और प्रेमचन्द और उनका युगीन साहित्य-दर्शन इसी को लेकर चला है।

प्रेमचन्द के इस मंगल भवन अमंगल हारी के दर्शन को जिसे वे आदर्शोंमुख यथार्थवाद कहते हैं, उसके केन्द्रीय भाव को जानता जरूरी है। प्रेमचन्द ने अपने साहित्य-कर्म का उद्देश्य बताते हुए लिखा था कि अपने साहित्य से भारतीय आत्मा की रक्षा तथा स्वराज्य प्राप्त करना उनका लक्ष्य है। ये दोनों लक्ष्य केवल प्रेमचन्द के ही नहीं थे बल्कि उस समय का सभी प्रबुद्ध शिक्षित वर्ग इन्हीं लक्ष्यों के लिए ब्रिटिश दासता से मुक्ति का अपने-अपने तरीके से संघर्ष कर रहा था। इनमें अधिकांश अंग्रेजी शिक्षालयों से पढकर निकले थे और कुछ गुरुकुल आश्रमों से शिक्षित थे और स्वामी विवेकानन्द, अरविन्द घोष, गाँधी, सुभाषचन्द्र बोस, मोतीलाल नेहरू, पटेल, जवाहरलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द आदि इन्ही लक्ष्यों से स्वराज्य की प्राप्ति और भारतीयता की रक्षा करना चाहते थे। गाँधी स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे और वे पाँच लाख लोगों का सामूहिक बलिदान चाहते थे, पर प्रेमचन्द का रास्ता व्यक्ति-व्यक्ति को इसके लिए तैयार करना था। साहित्य राजनीति की तरह कोई सामूहिक आन्दोलन नहीं करता, वह तो हर व्यक्ति को, जो उसका पाठक है, स्वतन्त्र रूप से संस्कारित करता है, उनके मन में नई चेतना उत्पन्न करता है और उसमें भारत- बोध जाग्रत करके स्वराज्य के लिए कुछ करने के लिए उद्यत करता है। इसलिए साहित्य और राजनीति की भूमिकाएँ भिन्न-भिन्न हैं, इसीलिए प्रेमचन्द ने प्रगतिशील लेखक संघ के भाषण में कहा था कि साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है, परन्तु गाँधी अपनी धर्माश्रित राजनीति से भी भारतीय आत्मा की रक्षा और स्वराज्य के लिए ही अहिंसक संग्राम कर रहे थे और प्रेमचन्द उसे अपने साहित्य से गतिशील बना रहे थे। गाँधी राजनीति में और प्रेमचन्द साहित्य में ऐसे स्वराज्य के लिए समर्पित थे जो भारतीय चित्त और चेतना से भारतीय आत्मा की रक्षा कर सके। गाँधी इसीलिए रामराज्य के रूप में स्वराज्य को पाना चाहते थे और प्रेमचन्द का लक्ष्य भी इससे भिन्न नहीं था। वे स्वाधीनता संग्राम के साहित्यिक नायक थे।
प्रेमचन्द के सम्मुख पाठक था, मुख्यतः सामान्य जनता थी, शिक्षित, कुछ अर्धशिक्षित तथा साहित्य-प्रेमी, शहरी और ग्रामीण। यही जनता राष्ट्रीय आन्दोलन की आधारशिला थी, यही गाँधी के आन्दोलन की केन्द्र थी और इसे ही साहित्य के माध्यम से भारतीय जीवनादर्शों के साथ देश की स्वतंत्रता के लिए सुसंस्कारी मनुष्य के रूप में तैयार करना था। गाँधी इसके लिए अपने स्वयंसेवकों को अहिंसक सत्याग्रही बनने की शपथ दिलाकर उन्हें अपने आन्दोलन का हिस्सा बना रहे थे और प्रेमचन्द अपने उपन्यासों तथा कहानियों से व्यक्ति-व्यक्ति के मन में देश और उसकी आत्मा की रक्षा का संस्कार दे रहे थे। प्रेमचन्द के सम्मुख अपने समय का व्यापक परिदृश्य था, गाँधी का अहिसक आन्दोलन तथा कांतिकारी दल भी था, शहरी शिक्षित वर्ग थे की राजभक्ति तथा पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण एवं मानसिक पराधीनता थी, पारिवारिक आदर्श और विघटन एवं धर्म-जाति-श्रेणी के भेद-विभेद तथा साम्प्रदायिक संकट था और उनके सम्मुख ही पाकिस्तान की माँग शुरू हो गई थी। उस समय भारत अपनी अनेक विभिन्नताओं तथा विरोधों एवं भेदों के साथ- साथ स्वराज्य के महासमर में विजयी होने का प्रयास कर रहे थे। यद्यपि यह महासमर भारतीय जनता का महासमर था, लेकिन इसमें व्यक्ति-व्यक्ति जुडकर ही जनता का रूप बनता है और इसके लिए उसे एक मनुष्य के रूप में , एक देशभक्त, एक बलिदानी-त्यागी, एक निःस्वार्थी तथा संस्कारी मनुष्य के रूप में व्यक्तित्ववान ही इस सामूहिक आन्दोलन को गतिशील एवं सफलता के मार्ग पर ले जा सकता है। स्वामी विवेकानन्द ऐसे मनुष्य को पूर्ण मनुष्य के रूप में देखते हैं जिसमें देवत्व तक पहुँचने की संभावना होती है। वे लिखते हैं, प्रत्येक व्यक्ति में पूर्णता पहले से निहित है, पर उसकी अभिव्यक्ति में बाधा होती है। हमें यह ज्ञात नहीं होता कि इसका दरवाजा कैसे खोला जाये, लेकिन यह पूर्ण स्वभाव हमें क्रमशः उन्नति की ओर अग्रसर करता है। पशु के भीतर मनुष्य गूढ भाव में निहित है, ज्यों ही किवाड खोल दिया जाता, अर्थात् ज्यों ही बाधा हट जाती है, त्यों ही वह मनुष्य प्रकाशित हो जाता है। इसी प्रकार, मनुष्य के भीतर भी देवता अव्यक्त रूप में विद्यमान है, केवल अज्ञान का आवरण उसे प्रकाशित नहीं होने देता। जब ज्ञान इस आवरण को चीर डालता है, तब भीतर का वह देवता प्रकाशित हो जाता है। (विवेकानन्द साहित्य, खण्ड-1, पृष्ठ 207)।
प्रेमचन्द का साहित्य-आदर्श और उसके सन्दर्भ में उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी की खोज का एक मुख्य आधार माना जाना चाहिए, यद्यपि रचनाकार तथा पाठकों का एक मत होना आवश्यक नहीं है। प्रेमचन्द मानते हैं कि लेखक के द्दष्टिकोण से पाठक की सहमति हो जाना उसकी रचना की सफलता की कसौटी है। अतः यहाँ यह देखना जरूरी है कि प्रेमचन्द की साहित्य और रचना-दृष्टि क्या थी और उससे उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी का चयन किस रूप में हो सकता है। प्रेमचन्द का 1928-1936 के बीच जो साहित्य-चिन्तन उनके लेखों तथा भूमिकाओं आदि में मिलता है, उसके आधार पर उनका साहित्य-शास्त्र के मूल तत्त्व समझे जा सकते हैं। प्रेमचन्द के अनुसार साहित्य जीवन की आलोचना है,सच्चाइयों का दर्पण है, सत्य-असत्य के संघर्ष की शाश्वत यात्रा है, सभ्य जीवन का लक्षण है, मनुष्य के जीवन में सत्य, सुन्दर, आनन्द, बन्धुत्व, मैत्री, प्रेम, त्याग, उत्सर्ग, समता, साहस, सन्तोष, सामन्जस्य, विशालता और आदरणीय है, साहित्य उसी की मूर्ति है। कलाकार अपने साहित्य में आध्यात्मिक सामंजस्य तथा सामन्जस्य सौन्दर्य की सृष्टि करता है और वफादारी, बचाई, सहानुभूति, न्यायप्रियता, बन्धुत्व, समता आदि भावों की पुष्टि करता है और समाज के सभी वर्गों- राजनीतिज्ञ आदि सभी की आत्मा जाग्रत करके उनके मनोभावों का परिष्कार करता है।अपने प्रगतिशील लेखक संघ के भाषण में, 10 अप्रैल, 1936 को, इसे ही स्पष्ट करते हुए कहा था, साहित्य की बदौलत मन का संस्कार होता है, यही उसका मुख्य उद्देश्य है। प्रेमचन्द अपने साहित्य प्रयोजन का अनेक रूपों में उल्लेख करते हैं-(1)साहित्य के तीन लक्ष्य हैं-परिष्कृति, मनोरंजन और उद्घाटन, लेकिन अन्तिम दो परिष्कृति में आ जाते हैं, 10-09-1929 के पत्र से; (2) सबसे बडा उद्देश्य उन्नयन है, ऊपर उठाया, 22-02- 1930 के पत्र से; (3) आत्म-परिष्कार-मनुष्य को जगाना और सद्भावों का संचार, समालोचक जनवरी, 1925 के उपन्यास लेख से ; (4) मनोरंजन तथा मानसिक एवं आध्यात्मिक तृप्ति, हंस, फरवरी, 1935 से; (5) जीवन के आदर्श को उपस्थित करना-ऊँचे और पवित्र भावों की अभिव्यक्ति, हंस, फरवरी,1935 से; (6) मनुष्य के दबे-ढँके देवत्व को स्पंदित करना, हंस, अप्रैल, 1932; (7) मन को संस्कारित एवं जीवन को स्वाभाविक तथा स्वाधीन बनाना,10 अप्रैल, 1936; (8) उच्च चिन्तन, स्वाधीनता, सौंदर्य, सर्जन तथा सत्यता के साथ गति, संघर्ष एवं बेचैनी उत्पन्न करना, 10 अप्रैल, 1936; (9) जनमत को शिक्षित करना एवं पथ-प्रदर्शन करना, 26 दिसंबर, 1934 के पत्र से; (10) दमित, शोषित एवं पीडित व्यक्ति और समाज की वकालत करना, 10 अप्रैल, 1936; (11) मनुष्य की मौलिक प्रवृतियाँ--ईर्ष्या-प्रेम, क्रोध-लोभ, अनुराग-विराग, दुःख-लज्जा इत्यादि की छटा दिखाना; समालोचक, जनवरी,1925। प्रेमचन्द के इन प्रयोजनों में पराधीन भारत के स्वाधीनताकामी कथाकार की आत्मा का जीवन-दर्शन बोलता है। इसीलिए प्रेमचन्द बार-बार यही कहते हैं कि साहित्य पाठक,अर्थात् मनुष्य के भावों का उत्कर्ष करता है, उसका परिष्कार करता है, उसे कुविचारों तथा असत्य मनोभावों एवं मनुष्य का सर्वनाश करने वाले मनोभावों- ईर्ष्या, द्वेष, फूट, क्रोध, विरोध, स्वार्थपरता, फरेब, शत्रुता, मृत्यु आदि का शमन करता है और उसकी आत्मा को जगाकर आन्तरिक आदेशों से पूरा करने का प्रयत्न करता है। प्रेमचन्द इसी कारण कहते हैं कि भावों की संस्कृति होने में ही साहित्य का गौरव हैं। (परितोष लेख, हंस, मार्च,1932)। इस भावों की संस्कृति में ही साहित्य का गौरव है और इसमें मानवीय-अमानवीय, सद्वृत्तियों-असद्वृत्तियों, सत्य-असत्य तथा अच्छाई- बुराई का द्वन्द्व है, संघर्ष है और इसी से पात्र/चरित्र के मनोभावों का उत्कर्ष होता है और उसकी आत्मा जाग्रत होती है। प्रेमचन्द लिखते हैं कि अहंकार, क्रोध, द्वेष आदि असुन्दर, अभद्र तथा मनुष्यताहीन प्रवृत्तियाँ हैं जो मन की बाधक प्रवृत्तियाँ हैं और इन पर संयम से ही जीवन मंगलमय हो सकता है। (हंस, अप्रैल, 1932)। प्रेमचन्द मनुष्य की देवतुल्यता तथा मंगलता पर विश्वास करते हैं और लिखते हैं, मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है। जमाने के छल-कपट और परिस्थितियों से वशीभूत होकर वह अपना देवत्व को बैठता है। साहित्य इस देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है-उपादेशों, नसीहतों से नहीं भावों को स्पंदित करके, मन के कोमल तारों को चोट लगाकर, प्रकृति के साथ सामंजस्य करके। हमारी सभ्यता साहित्य पर ही आधारित है। हम जो कुछ हैं, साहित्य के ही बनाते हुए हैं। विश्व की आत्मा के अन्तर्गत भी राष्ट्र या देश की एक आत्मा होती है। इसी आत्मा की प्रतिध्वनि है साहित्य। (हंस, अप्रैल,1932)। प्रेमचन्द के लिए भारत-आत्मा एक साकार एवं जीवन्त रूप है, तभी वे हंस, फरवरी,1932 को लिखते हैं, भारत की आत्मा अभिव्यक्ति के लिए अपने साहित्यकारों की ओर देख रही है। उसका मर्म, उसकी वेदना, उसका आनन्द, उसकी अभिलाषा, उसकी महत्त्वाकांक्षा तो साहित्य की ही वस्तु है। दार्शनिक विचार का तथा वैज्ञानिक ज्ञान की वृद्धि कर सकता है, पर इनकी तो साहित्यकार ही कर सकता है। प्रेमचन्द अपने समय की भारतीय आत्मा की खोज में अपने भारतीय आदर्शों को भी खोजते हैं और उनका मूल उद्गम वाल्मीकि और व्यास के साहित्य में पाते हैं। प्रेमचन्द हंस, अप्रैल, 1932 में लिखते हैं, किसी राष्ट्र की सबसे मूल्यवान संपत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हैं। व्यास और वाल्मीकि ने जिन आदर्शों की सृष्टि की, वह आज भी भारत का सिर ऊँचा किये हुए हैं। राम अगर वाल्मीकि के ढाँचे में न ढलते तो राम न रहते। सीता भी उसी ढाँचे में ढलकर सीता हुईं। यह सच है कि हम सब ऐसे चरित्रों का निर्माण नहीं कर सकते, पर एक धन्वन्तरि के होने पर भी संसार में वैद्यों की आवश्यकता रही है और रहेगी। प्रेमचन्द अपने युग में इस आवश्यकता को समझते हैं कि धन्वन्तरि नहीं वैद्य बनकर भी वे अपने समय के मनुष्य और समाज तथा देश का उपचार करके उन्हें संस्कारित कर सकेंगे। प्रेमचन्द के अनुसार साहित्यकार मानसिक पूँजीपति है, जो अपना नहीं, सबका है, पाठक की मानसिक परिधि का विस्तार करता है, मनुष्यत्व को जगाता है और समाज की सेवा करता है। प्रेमचन्द सेवा को सर्वोपरि स्थान देते हैं और लिखते हैं, सेवा में जो आध्यात्मिक आनन्द है, वही हमारा पुरस्कार है। (प्रगतिशील लेखक संघ के भाषण से)। इसके लिए साहित्यकार को आदर्शवादी और भारतीय आदर्शों का ज्ञानी एवं संवाहक होना होगा। वे हंस के इसी अंक में लिखते हैं, साहित्यकार को आदर्शवादी होना चाहिए। भावों का परिमार्जन भी उतना ही वांछनीय है। जब तक हमारे साहित्यसेवी इस आदर्श तक नहीं पहुँचेंगे, तब तक हमारे साहित्य से मंगल की आशा नहीं की जा सकती, इसलिए वे चाहते हैं कि वे तपस्वी और आत्मज्ञानी हों। प्रेमचन्द की यह मंगल- आकांक्षा तुलसीदास के मंगल भवन अमंगल हारी का उन्हें सहयात्री बना देती है और तुलसीदास के समय की विदेशी मुगलों की दासता एवं भारतीय आत्मा पर हुए क्रूरतम आघातों तथा जख्मों के समान अंग्रेजों के दमन-अत्याचार एवं भारतीय आत्मा को कुचलने के विरुद्ध वे अपने साहित्य से उसे जाग्रत करने, उसकी रक्षा करने और स्वराज्य की प्राप्ति के लिए तुलसी के रामचरितमानस के समान ही अपने साहित्य की रचना कर रहे थे। तुलसीदास और प्रेमचन्द दोनों ही भारत के अमंगल के नाश तथा मंगल की स्थापना का कार्य कर रहे थे।
प्रेमचन्द की यह सृजन-दृष्टि और सृष्टि माक्र्सवादी प्रगतिशील लेखक संघ के लेखक-समूह की पार्टी लाइन के विपरीत होने के कारण उन्होंने इसे भावुकतापूर्ण, कपोल-कल्पना, मोहभंग तथा यथार्थ-विरोधी घोषित करते हुए उनके लगभग 95 प्रतिशत साहित्य का बहिष्कार कर दिया और उनके अनुसार जो शुद्ध यथार्थवादी रचनाएँ हैं, वे ही प्रेमचन्द की असली रचनाएँ हैं और वे ही सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ हैं। इन प्रगतिशील लेखकों ने यथार्थवाद को माक्र्सवाद से जोड दिया और उनकी इस परिभाषा में आने वाली रचनाएँ सरलता से माक्र्सवादी प्रेमचन्द की रचनाएँ स्थापित कर दी गईं और शेष 95 प्रतिशत रचनाएँ हृदय-परिवर्तन की अयथार्थ रचनाएँ घोषित कर उन पर विचार करना भी अपराध बना दिया गया। इन प्रगतिशील लेखकों का कमाल है कि इन्होंने प्रेमचन्द की यथार्थवाद की परिभाषा तथा आदर्श में यथार्थवादी जीवन प्रसंगों के उनके विचार तक की उपेक्षा की और उनके दृष्टिकोण को समझने का कभी प्रयास नहीं किया। प्रेमचन्द लिखते हैं कि यथार्थवाद जीवन की दुर्बलताओं,विद्रूपताओं एवं वैषम्यों से हमारी आँखें खोलता है, पर वे नग्न यथार्थवाद का विरोध करते हैं एवं कला(कहानी) को जीवन का हूबहू चित्र नहीं मानते और उसमें कृत्रिमता तथा भ्रान्ति का आवरण रहता है। प्रेमचन्द एक बडा प्रश्न भी यथार्थवादियों से करते हैं कि अधम, पतित जीवन ही क्या यथार्थ है और सुन्दर, प्रकाशमान तथा पवित्र जीवन क्यों नहीं यथार्थवाद में आ सकता? वे मानते हैं कि लेखक जीवन के वांछित रूप को दिखाता है, इसलिए साहित्य जीवन का दर्पण(यथार्थ) है और दीपक (वांछित, आदर्श) भी है, और यही आदर्शोंमुख यथार्थवाद है।
इन प्रगतिशील लेखकों ने इसके लिए प्रेमचन्द का लेख नया जमाना : पुराना जमाना, प्रगतिशील लेखक संघ में दिया भाषण, महाजनी सभ्यता लेख एवं मंगलसूत्र उपन्यास में व्यक्त विचारों का सहारा लिया है, अतः यह देखना जरूरी है कि ये वैज्ञानिक बुद्धि के लेखक उनमें व्यक्त विचारों को सर्वश्रेष्ठता का आधार कैसे बनाते हैं। प्रेमचन्द का लेख नया जमाना : पुराना जमाना फरवरी, 1919 में प्रकाशित हुआ था और वे इसमें बनियों और व्यापारियों की पूँजीवादी सभ्यता की बुराई के साथ रूस में बेजवानों को आवाज देने का समर्थन करते हुए भी इससे आश्वस्त नहीं है कि खूनी क्रांति से स्थापित जनतंत्र अपनी भौगौलिक परिधि से बाहर निकल कर निर्बलों और अनाथों की हिमायत करेगा और पूँजीपति राष्ट्र की बनिस्पत ज्यादा इंसानियत और हमदर्दी का बर्ताव करेगा। बहुत सम्भव है कि इस जनतंत्र का अत्याचार पूँजीपतियों से कहीं अधिक घातक सिद्ध हो, क्योंकि इसमें भी राजकीय अधिकार भावना और राज्य-संचालन की वासना विद्यमान है। प्रेमचन्द का तर्क था कि जब थोडे से पूँजीपतियों की स्वार्थपरता दुनिया को उलट-पलट कर सकती है तो एक पूरे राष्ट्र की सम्मिलित स्वार्थपरता, जो जत्थेबन्दी की ज्यादा ठोस सूरत है, क्या कुछ न कर दिखाएगी। यह ठीक है कि वह अपने देश में व्यक्तिगत प्रभुत्व को मिटाकर उसके बदले जनता के प्रभुत्व का झण्डा लहराएगी, मगर उसका आधार भी स्वार्थपरता है और जब तक यह रहेगी इंसानी भाईचारे की संस्कृति एक जौ-भर भी करीब न होगी।
प्रेमचन्द के प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में दिये भाषण का हम उल्लेख कर चुके हैं कि प्रेमचन्द प्रगतिशील शब्द को ही निरर्थक मानते हैं और इसके संयोजक कम्युनिस्ट सज्जाद जहीर को बता देते हैं कि उन्हें इसका माक्र्सवादी अर्थ स्वीकार नहीं और यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि साहित्य क्रांति का नहीं मन का संस्कार करता है और आध्यात्मिक आनन्द प्रदान करता है। हमारे प्रगतिशील लेखक जानते हैं कि प्रगतिशील लेखक संघ कम्युनिस्टों की संतान है, और इसलिए इसमें दिया भाषण स्वतः ही कम्युनिस्ट दर्शन की ही स्थापना करता है। इस छल-कपट को वे आज तक करते आ रहे हैं और इस भाषण को पढे बिना कर रहे हैं और स्वयं को वैज्ञानिक बुद्धि का कहते हैं। प्रेमचन्द के अन्तिम लेख महाजनी सभ्यता (हंस, सितम्बर, 1936) की भी खूब चर्चा की गई और वामपन्थी लेखकों ने इसे उनकी वसीयत घोषित करते हुए स्थापित किया कि प्रेमचन्द अपने अंतिम वर्षों में रूसी क्रांति और माक्र्सवाद के समर्थक हो गये थे और यह गुणात्मक परिवर्तन 1930 से ही शुरू हो गया था जिसकी परिणति इस लेख में मिलती है। यहाँ भी इन वामपन्थियों ने इस लेख को भी नहीं पढा और प्रेमचन्द को अपनी पार्टी का लेखक घोषित कर दिया और हिन्दी साहित्य के साथ छल-कपट किया। इस महाजनी सभ्यता लेख में प्रेमचन्द ने आरम्भ में जागीरदारी-साम्राज्यवाद में बुराइयों के बावजूद उनमें प्रजापालन और न्यायप्रियता के गुण देखें और इनकी तुलना में पश्चिमी महाजनी सभ्यता अर्थात पूँजीवाद की दो भयंकर बुराइयाँ बताते हैं- समय ही धन है (Time is money) तथा व्यवसाय व्यवसाय है (Business is business) ऐसी हैं जो मनुष्य दया, ममता, स्नेह, सचाई तथा सौजन्य का पुतला था, वह दया-ममता शून्य जडवत् बनकर रह गया है, धनलिप्सा ने मनुष्यता, मित्रता, स्नेह, सहानुभूति, शील-संकोच सबको नष्ट कर दिया है और दूसरा सिद्धान्त तो सबसे अधिक घातक और रक्तपिपासु है जिसने सारे मानवीय,आध्यात्मिक एवं सामाजिक नेह-नाते ही समाप्त कर दिए हैं। इस पूँजीवाद की आत्मा है व्यक्तिवाद, पूर्णतः स्वार्थी, सब कुछ अपने लिए। प्रेमचन्द अपने निष्कर्ष में लिखते हैं, जिसमें मनुष्यता, आध्यात्मिकता, उच्चता और सौंदर्य-बोध है, वह कभी ऐसी समाज व्यवस्था की सराहना नहीं कर सकता, जिसकी नींव लोभ, स्वार्थपरता और दुर्बल मनोवृत्ति पर खडी है। ईश्वर ने तुम्हें विद्या और कला की सम्पत्ति दी है, तो उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही है कि उसे जनसभाएँ की सेवा में लगाओ, यह नहीं कि उससे जनसभाएँ पर हुकूमत चलाओ,उनका खून चूसो और उसे उल्लू बनाओ। प्रेमचन्द रूस की नई सभ्यता का स्वागत करते हुए अन्धकार में ज्योति का उजाला अवश्य देखते हैं,पर सर्वहारा की क्रांति और माक्र्स के सिद्धान्तों से प्रभावित होकर नहीं बल्कि वे उसमें भी अपने भारतीय जीवन-मूल्यों तथा उच्च मानवीय भावों के ही दर्शन करते हैं। वे महाजनी सभ्यता लेख में लिखते हैं, धर्म-स्वातंर्त्र्य का अर्थ यदि लोक-सेवा, सहिष्णुता, समाज के लिए व्यक्ति का बलिदान, नेकनीयती, शरीर और मन की पवित्रता है, तो इस सभ्यता में धर्माचरण की जो स्वाधीनता है, और किसी देश को उसके दर्शन भी नहीं हो सकते। इसी प्रकार प्रेमचन्द अपने अधूरे उपन्यास मंगल-सूत्र में भी माक्र्सवादी मंगल-सूत्र की नहीं भारतीय मंगल-सूत्र की कहानी कहना चाहते हैं। माक्र्सवाद में तो मंगलकामना तथा लोक-मंगल की अवधारणा ही नहीं है। प्रेमचन्द का वैशिष्ट्य है कि वे रक्तिम क्रान्ति में भी अपने भारतीय मांगलिक आदर्शों तथा श्रेष्ठ मानवीय भावों का ही उत्कर्ष देख रहे थे और जीवन के हर द्दश्य तथा प्रसंग में उन्हें उसी की छवि दिखाई देती थी। प्रेमचन्द का यह विश्वास यद्यपि इतिहास ने गलत सिद्ध कर दिया और रूसी कम्युनिस्ट क्रान्ति अपने जन्मस्थल में ही समाप्त हो गई, लेकिन उनकी अपने जीवनादर्शों में आस्था जीवन के अन्त तक और अन्तिम कहानी तक बनी रही और मंगल भवन अमंगल हारी के रूप में मानव जीवन की कथाओं की रचना करते रहे और उनका लोक-मंगल का साहित्य-आदर्श व्यक्ति और समाज के लिए संजीवनी बनकर संस्कारित करता रहा है।
प्रेमचन्द का कहानी-संसार बडा व्यापक है, एक हजार के लगभग पात्र हैं जिनमें वर्ण, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, भाषा, आयु आदि का भेद है। इन कहानियों में जीवन के, इतिहास के, शहरी-गाँवों के, स्त्री-पुरुषों-बालकों के, राजा-साधु के, अंग्रेज- हिन्दुस्तानियों के और पशु-पक्षियों तक की कहानियाँ मिलेंगी और लेखक कहानी के कथ्यानुरूप जीवन की कठोर यथार्थ स्थितियों से टकराते हुए पात्रों में भावनाओं तथा व्यक्तित्व का उत्कर्ष तथा परिष्कार-संस्कार देता है और वे मनुष्य में छिपे देवत्व को जागृत कर देते हैं। प्रेमचन्द ने साहित्य की जो अपनी कसौटी निश्चित की थी वह हमें उनकी पहली कहानी से ही दिखाई देती है। इसका अर्थ है कि उनकी रचनात्मकता का आरम्भ और अन्त एक ही धारा में प्रवाहित होता जाता है, यद्यपि कथा, पात्र, परिवेश आदि सभी बदलते हैं, पर सरोकार नहीं बदलता और वह उनके ही शब्दों में आदर्शोंमुख यथार्थवाद, अर्थात् जीवन में अमंगल में मंगल का दीपक प्रज्ज्वलित होता है। यह प्रेमचन्द का हृदय परिवर्तन नहीं, मन के भावों का उत्कर्ष है जो हर मनुष्य में सद्वतियों के रूप में अचेतन मन में रहता है। उनकी कहानियाँ जीवन का दर्पण ही नहीं दीपक भी बनती हैं और यही उनके साहित्य का मूलाधार है। प्रेमचन्द की 299 कहानियाँ उपलब्ध हैं और ये प्रेमचन्द : कहानी रचनावली, 6 खण्ड (2010, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली) तथा नया मानसरोवर (2018, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली) में कालक्रमानुसार दी गई हैं जो पहली बार किया गया है। उनकी पहली कहानी सांसारिक प्रेम और देशप्रेम वर्ष 1908 में छपी थी और आखिरी कहानी क्रिकेद मैच उनके देहान्त के बाद प्रकाशित हुई, इस कारण से यह उनकी अन्तिम कहानी थी। प्रेमचन्द साहित्य-आलोचकों ने कफन (हिन्दी में अप्रैल 1936) को उनकी अन्तिम कहानी माना है, लेकिन उसके बाद उनकी 9 कहानियाँ छपी हैं। इस कारण इन आलोचकों ने उसे अन्तिम कहानी मानकर जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे भ्रामक और तर्क-तथ्यहीन हैं। प्रेमचन्द का कहानी-काल लगभग 28 वर्ष का है और उसमें 299 कहानियों की रचना हुई, इस प्रकार प्रत्येक वर्ष की औसत संख्या लगभग 14 कहानियों की होती है। उनका कुल रचना-काल 33 वर्ष का है, लेकिन उनकी कहानी-रचना में अन्त तक एक निरन्तरता है और उनकी संवेदना के संसार तथा उसे कहानी के रूप में अभिव्यक्त करने के सरोकार को समझने में हमारा सबसे उपयोगी साधन है। उनकी 2-3 प्रतिशत कहानियों में यदि लेखक अदृश्य है और उसका कोई हस्तक्षेप नहीं है, तो वह अपवाद ही माना जाएगा।
प्रेमचन्द की सर्वश्रेष्ठ कहानी की खोज के लिए उनके इस कहानी-संसार से गुजरना होगा और उनकी कहानियों के पात्रों में जो मनुष्य का रूप है, वह उनकी कसौटी पर कितना सही उतरता है, यह देखना होगा। प्रेमचन्द के पात्र सामान्य मनुष्य हैं, उनमें सभी प्रकार के मानवीय गुण- अवगुण हैं, शहरी-ग्रामीण दोनों हैं, स्त्री-पुरुष-बालक-पशु -पक्षी हैं, उनके सुख-दःख, ईर्ष्या-द्वेष, मान-अपमान, स्वार्थ-त्याग, पाप-पुण्य, जय-पराजय, अहंकार- दयनीयता, पुरुषार्थ- कर्महीनता, देशप्रेम-राजभक्ति, धनी-निर्धन, प्रेम-घृणा,हिंसा-अहिंसा, सेवा-स्वार्थ, ऊँच-नीच, न्याय-अन्याय, अधिकारी-प्रजा,रूप-अरूपता, ज्ञानी-अज्ञानी आदि की परिस्थितियों के बीच वे अपने मनोभावों के द्वन्द्व में जीते हैं और कई बार वे अपने आदर्शों में जीते हुए विपरीत दिशाओं में भी अपने मानुष भाव की रक्षा करते हैं। प्रेमचन्द जीवन की हर परिस्थिति में अपने पात्रों को अपने भाव-विचार से क्रिया-प्रतिक्रिया करने का अवसर देते हैं तथा उन्हें विकट एवं संकटपूर्ण दशाओं को भी झेलने का अवसर देते हैं और वे उन सबके बीच विजयी होकर निकलते हैं। प्रेमचन्द अपनी कहानियों में एक ऐसे भारतीय मनुष्य की खोज करते हैं जो स्वराज्य के लिए संघर्षरत हो और जो भारतीय आत्मा की रक्षा के साथ इस संकल्प की सिद्धि के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने को उद्यत हो। स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविंद, गाँधी और प्रेमचन्द सभी का यही लक्ष्य था। उस समय और अब भी ऐसे भारतीय व्यक्ति का होना सम्भव नहीं जिसमें लेखक के सभी अपेक्षित गुण मिल जाए, इसलिए प्रेमचन्द अपनी कहानियों में अनेक पात्रों की सृष्टि करते हैं और हर पात्र में कोई न कोई अपेक्षित गुण का उद्भाव करके उनके संश्लिष्ट रूप से ऐसे भारतीय की संरचना करते हैं। एक व्यक्ति में जीवन सभीसंभाव्य आदर्श नहीं मिलते। एक व्यक्ति में एक अंश होता है, दूसरे में दूसरा और इस प्रकार सभी के सामूहिक रूप से एक सर्वमान्य मानवता का चित्र बनता है। ऐसा कहा गया है कि राम 12 कलाओं के और कृष्ण 16 कलाओं के अवतार थे और इस रूप में कृष्ण ही संपूर्ण मनुष्य थे। प्रेमचन्द इस सत्य को भी समझते हैं कि मनुष्य अपने गुणों से जितना महान और पूर्ण होता है उतना ही अपनी कमजोरियों और दोषों से, क्योंकि दोष-दुर्बलतारहित मनुष्य तो देवता बन जाएगा और ऐसा पात्र साहित्य का विषय नहीं हो सकता। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि मनुष्य तो देवताओं से भी श्रेष्ठ है और वही श्रेष्ठ जीव है, क्योंकि देवता मनुष्य नहीं बन सकता, जबकि मनुष्य देवता बन सकता है। प्रेमचन्द का भी यही विश्वास है कि मनुष्य में एक देवत्व है जिससे जाग्रत करना होता है। प्रेमचन्द के पात्र कैसे जीवन की दशाओं में व्यक्तिशः अपने संकटों से जूझते हैं, कैसे अपने जीवन में श्रेष्ठ भाव तथा उपलब्धि तक पहुँचते हैं और उनमें क्या सर्वश्रेष्ठ हो सकता है, इससे देखना- समझना, एक प्रकार से प्रेमचन्द के सरोकारों को ही समझना होगा। प्रेमचन्द के कहानी-रचना के 28 वर्ष (1909 में सोजेवतन पर सरकारी अंकुश के कारण एक भी कहानी नहीं मिलती) में हर वर्ष से एक ऐसी कहानी तलाश करनी होगी, जिससे स्वराज्य प्राप्ति तथा भारतीय आत्मा की रक्षा में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य की कहानी को खोजा जा सके। यहाँ कहानियों के रचनाऋम से इसकी परीक्षा की गई है-
1.1908-1910- इस कालखण्ड में 11 कहानियाँ प्रकाशित हुईं और वे सब उर्दू में छपीं। प्रेमचन्द का पहला कहानी संग्रह उर्दू में सोजेवतन 1908 में छपा था। इसमें 5 कहानियाँ हैं। ये देशप्रेम से सम्बन्धित हैं, पर दुनिया का सबसे अनमोल रत्न देश के लिए प्राणोत्सर्ग करने की कहानी है। स्वराज्य के लिए यह बलिदानी भावना आवश्यक थी। इसकी कहानी यही मेरी मातृभूमि है में भारत माता के प्रति अटूट प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह भी प्रेमचन्द ही नहीं युग की माँग थी। वर्ष 1909 में कोई कहानी प्रकाशित नहीं हुई। वर्ष 1910 में 6 कहानियाँ हैं। इसमें रानी सारंधा कहानी मुगल बादशाह शाहजहाँ के समय की है। रानी सारंधा मुगलों के हाथ पडने से पहले, अपने जातीय स्वाभाविक तथा आत्मगौरव की रक्षा के लिए अपने पति चंपतराय का प्राण लेती है और बाद में खुद भी प्राण त्याग देती है। यह भारतीय स्त्री का अद्भुत साहस, आत्माभिमान तथा शौर्य का प्रतीक है, जिसकी उस समय हर भारतीय को जरूरत थी। इसी वर्ष बडे घर की बेटी कहानी भी छपी और इसमें प्रेमचन्द घर को जोडने वाली स्त्री को बडे घर की बेटी मानते हैं।
2. 1911-1920- इस दशक में 80 कहानियाँ प्रकाशित हुईं, 67 उर्दू में तथा 13 हिन्दी में। वर्ष 1911 में 8 कहानियाँ प्रकाशित हुईं और सभी में भिन्न-भिन्न कथानक हैं, लेकिन कहानी दोनों तरफ से कहानी में पण्डित श्यामस्वरूप जमींदार है और उसकी पत्नी और बाद में वह स्वयं गाँव के अस्पृश्यों का घर में स्वागत- सेवा करते हैं और पण्डित उनके लिए बिना ब्याज के रुपये देने का इंतजाम करता है। प्रेमचन्द गाँधी से पहले ही, स्वामी विवेकानन्द के प्रभाव से, अछूतोद्धार का कार्य शुरू करते हैं और एक जमींदार ऐसी मनुष्यता उत्पन्न करते हैं। वर्ष 1912 में 7 कहानियाँ हैं। इनमें ममता कहानी में स्त्री की ममता व्यक्ति के क्रोध और प्रतिशोध को क्षमा में बदल देती है और मनावन में पति-पत्नी के सम्बन्धों का चित्रण है। वर्ष 1913 में 13 कहानियाँ हैं और इनमें विषयवस्तु तथा चरित्रों का वैविध्य है। अमावस्या की रात्रि कहानी में मनुष्य के धर्म और कर्तव्य से आत्मा बलवान होती है। शंखनाद में पुरुषार्थ का शंखनाद है और नमक का दारोगा में ईमानदारी अन्ततः फलीभूत होती है और बांका जमींद में जमींदार में किसान जमीन के मालिक हो जाते हैं और प्रेमचन्द एक नये भारतीय की रचना करते हैं। वर्ष 1914 में 7 कहानियाँ हैं। अनाथ लडकी में रोहिणी भारतीय स्त्री का आधुनिक रूप है, खून सफेद में ईसाई धर्मांतरण का विरोध और हिन्दू समाज की मूर्खता है और परीक्षा कहानी में वे संवेदनशीलता, उदारता, परहितता, साहस आदि भारतीय आत्मा के गुणों की रक्षा करते हैं। वर्ष 1915 में 5 कहानियाँ हैं। इसमें कर्मों का फल कहानी में परम्परागत विश्वास की कथा है कि कर्मों का दण्ड भोगना पडता है। लाला साईंदास स्वेच्छा से अपने कर्मों का दण्ड भोगता है। वर्ष 1916 में भी 7 कहानियाँ हैं। दो भाई कहानी में वे कृष्ण और बलराम जैसा प्रेम चाहते हैं और पंच परमेश्वर में ग्रामीण लोकतंत्र में पंचायत के महत्त्व को स्थापित करते हैं और हिन्दू तथा मुस्लिम पंच दोनों ही न्याय का साथ देते हैं। वर्ष 1917 में 9 कहानियाँ हैं। ईश्वरीय न्याय कहानी में मुंशी सत्यनारायण का अपने पाप-कर्म के भय से बचाई का रास्ता अपनाता है। महातीर्थ में प्रेमचन्द एक बुढिया दाई में निःस्वार्थ सेवा उत्पन्न करके उसके संस्कारों को महातीर्थ बना देते हैं और सेवाव्रती दाई तीर्थों से बडी हो जाती है। वर्ष 1918 में भी 9 कहानियाँ हैं। सेवा-मार्ग कहानी भी सेवा को सर्वोपरि स्थापित करती है और इसकी नायिका तारा कुँवरि को प्रेम से ही सेवा का पारस मिलता है। बोध कहानी में ईमानदारी का सुफल है और सचाई का उपहार में सच्चाई का। वर्ष 1919 में केवल 5 कहानियाँ हैं। इसकी कहानी बैंक का दीवाला में धन की दुश्मनी और परिश्रम एवं संतोषमय जीवन का समर्थन है। कुँवर साहब अपने को राम, भीष्म तथा राणा प्रताप से जोडकर धन-सम्पत्ति तथा सुखभोग का त्याग कर देते हैं और लेखक उनके भावों का उत्कर्ष कर सद्भाव उत्पन्न करता है। वर्ष 1920 में 10 कहानियाँ हैं। कहानी पशु से मनुष्य में दुर्गा माली पशु अर्थात् वह चोर से सहकारिता से मनुष्य बन जाता है और उसे अमेरिका में शिक्षित प्रेमशंकर उसे अपनी सहकारी कृषि थे, जोडकर बनाया है। यह प्रेमचन्द का नया मनुष्य है। बूढी काकी में हिन्दू विधवा की परवशता, उपेक्षा, अपमान और भूख की त्रासदी में लाडली और रूपा में मनुष्यता का भाव जन्म लेता है और कहानी का रंग बदल जाता है। मृत्यु के पीछे में पत्रकार ईश्वरचन्द्र की सेवा, त्याग, सन्तोष एवं सत्यता उसकी पत्नी के विचारों को बदल देता है और इन्हीं में जीवन का आनन्द मानने लगती है। इस प्रकार प्रेमचन्द 1911-20 के दशक में अपनी कहानियों में मनुष्यता के लिए अपने पात्रों में भावना-विचारों को संस्कारित, परिष्कृत तथा ऊर्ध्वगामी बनाते हैं और अपने इच्छित भारतीय मनुष्य की रूपरचना करते हैं।
3. 1921-1930 : इस कालखण्ड में 136 कहानियाँ प्रकाशित हुईं, हिन्दी में 116 तथा उर्दू में 20। यह दशक गाँधी के असहयोग आन्दोलन से शुरू होता है। अतः प्रेमचन्द 1921 में जो 10 कहानियाँ लिखते हैं, उनमेंवे गाँधी के असहयोगी, देशभक्त, पश्चिम शासन-सत्ता विरोधी तथा स्वाधीनता, न्याय, सन्तोष तथा कर्मशील-सेवाव्रती, साहसी तथा परोपकारी चरित्रों की उद्भावना करते हैं और उनके भावों का परिष्कार करते हैं। रूहेहयात में तो एक अनाथ, निर्धन लडकी अद्भुत शक्ति, कर्म तथा समाजहित का प्रतीक बनती है। वर्ष 1922 में 11कहानियाँ हैं और उनमें संवेदनाओं का वैविध्य है। सुहाग की साडी में पत्नी के अन्धविश्वास को तोडकर उसे मंगलकारी बनाते हैं और पूर्व संस्कार में पुनर्जन्म के विश्वास से पात्र में दया और विवेक उत्पन्न करते हैं तथा हार की जीत में भारतीय स्त्री का प्रेम मनुष्य को देवत्व तक पहुँचा देता है और स्वत्व-रक्षा में घोडा भारतीयों में अपने स्वत्व की रक्षा का भारत-भाव उत्पन्न करता है। 1923 में 11कहानियाँ हैं। इनमें हिन्दू परिवारों की कहानियाँ अधिक हैं। नैराश्य लीला में हिन्दू विधवा की त्रासदी है, पर वह अपनी सत्ता और स्वतंत्रता की जीवन जीकर भारतीय स्त्री का उत्कर्ष करती है। बैर का अन्त में संयुक्त परिवार की टूटने है, लेकिन आपसी रिश्तों की रक्षा भी है। वर्ष 1924 में 17 कहानियाँ हैं और नबी,भूत तथा बन्दर तक पर कहानी है। इस्लाम और मुस्लिम जीवन पर चार कहानियाँ हैं, एक नबी पर जिसमें नीति और न्याय की विजय है, लेकिन शतरंज के खिलाडी में मुस्लिम जागीरदारियों की पतन गाथा है। मुक्तिधन में गाय के प्रसंग से रहमान तथा दाऊदयाल दोनों में श्रेष्ठ मनुष्यता की कहानी है। दीक्षा में शराब को त्याग कर सन्मार्ग पर आने के भावोत्सर्ग की कथा है। सवा सेर गेहूँ में हिन्दू धर्म के पूर्वजन्म के संस्कार के विश्वास पर चोट करके उससे मुक्त होने की चेतना उत्पन्न करते हैं। वर्ष 2015 में 13 कहानियाँ हैं। इनमें सभ्यता का रहस्य कहानी शिक्षित-सभ्य तथा अशिक्षित-असभ्य के अन्तर को स्पष्ट करती है। सभ्य वे होते हैं जो अपने अपराध छिपाते हैं और असभ्य इस चालाकी को नहीं जानते। माता का हृदय कहानी में माधवी का हिंसक प्रतिशोध उसके महत्त्व से पराजित होता है और मनुष्य में देवत्व प्रकट होता है। शूद्रा कहानी मॉरिशस ले जाते ग्रे गिरमिटिया मजदूरों की क्षमा नहीं है, लेकिन इसमें भारतीय स्त्री-पुरुष की सतीत्व एवं अस्तित्व की रक्षा तथा आत्मोत्सर्ग में भारतीय मूल्यों के साथ जीते-मरते हैं। वर्ष 1926 में 14 कहानियाँ हैं। इनमें कई कहानियाँ स्त्री विमर्श पर हैं तथा दो बार जीवन हैं। इसकी कहानी मंत्र में लेखक पण्डित लीलाधर का भावोन्नयन दलित बूढे की सेवा से होता है और उनका शुद्धि आन्दोलन सेवाश्रम में बदल जाता है। देश में दलितों का धर्मांतरणशुद्धि है से नहीं सेवा से ही रोका जा सकता है और भारतीय आत्मा की रक्षा के लिए यह आवश्यक है। वर्ष 1927 में 9 कहानियाँ हैं। प्रेमचन्द सुजान भगत कहानी में सुजान भगत किसान के रूप में एक ऐसे भारतीय की रचना करते हैं जो अपने पुत्र से अपमानित होकर अदम्य जिजीविषा, पुरुषार्थ, श्रमशीलता, दानशीलता, परोपकारिता,प्रतिष्ठा प्रियता तथा दृढ-निश्चय से अपने स्वाभिमान की रक्षा करता है। प्रेमचन्द को अपने उद्देश्य के लिए ऐसे ही भारतीयों की आवश्यकता थी। एक्ट्रेस कहानी में भी अभिनेत्री शकुन्तला का आत्म-परिष्कार होता है, उसकी सद्वृत्तियाँ जाग्रत होती है और वह स्वयं को छल-कपट से बचा लेती है। वर्ष 1928 में 21 कहानियाँ हैं जो किसी एक वर्ष में सर्वाधिक हैं। इसमें कहानी दो सखियाँ फिर मानवीय भाव-विचारोत्सर्ग की कहानी है। इसका निष्कर्ष है कि स्त्री के रूप से बडी उसकी सेवा होती है। पद्मा स्वाधीन बनती है तो, घर टूटता है और चन्दा सेवाव्रती रहती है, तो घर बना रहता है। अन्त में पद्मा के भावों का परिष्खार होता है। इस वर्ष एक दूसरी मंत्र कहानी प्रकाशित होती है और वह मनुष्यता की दृष्टि से अनुपम कहानी है। यह कहानी भारतीय तथा पश्चिमी सभ्यताओं में पले-बढे-संस्कारित हुए दो भिन्न वर्गीय चरित्रों-निर्धन-अशिक्षित-याचक बूढे भगत तथा अंग्रेजी शिक्षित-धनी-चिकित्सक- पश्चिमी जीवन-शैली-परहितविहीन डॉक्टर चड्डा के बीच मनुष्यता और अमनुष्यता की कहानी है। बूढा भगत अपने एकमात्र बचे सातवें पुत्र के डॉक्टर की उपेक्षा से मरने के बावजूद उसके सर्पदंश से मरते हुए एकमात्र बेटे को जीवनदान देता है और मनुष्यता का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है। वर्ष 1929 में 13 कहानियाँ हैं और कई कहानियों में पात्रों के सोच तथा व्यवहार में परिवर्तन आता है। प्रायश्चित कहानी का मदारीलाल सेवा से अपराधी से अच्छा मनुष्य बनता है। प्रेम का उदय में कंजरी बन्टी अन्ततः विलास त्याग कर सेवाव्रती, पुरुषार्थी तथा अच्छी पत्नी बनती है। घासवाली में दलित मुलिया ठाकुर चैनसिंह की आशिकी को अपने सतीत्व बल से उसे एक अच्छा मनुष्य बना देती है और भारतीय पत्नी का एक अनुपम प्रतीक बनती है। विवेकानन्द कहते हैं कि स्त्री की पवित्रता और सतीत्व हर पाशविक भाव को पराजित कर सकता है। (विवेकानन्द साहित्य, खण्ड-3, पृष्ठ 42)। वर्ष 1930 में 16 कहानियाँ हैं। इनमें कुछ स्वराज्य पर, कुछ किसानों त्रासदी पर और कुछ मानवीय रिश्तों पर हैं। आहुति कहानी शिक्षितों की कहानी है, प्रेम और स्वराज्य के द्वंद्व की कहानी है। बिश्म्भर तथा आनन्द सहपाठी हैं और आनन्द रूपमणि से प्रेम करता है, परन्तु रूपमणि बिश्म्भर के स्वराज्य प्रेम एवं गाँवों में जाग्रति लाने के कारण उसके प्रति समर्पित हो जाती है। कहानी में रूपमणि का उदात्तीकरण होता है।
इस प्रकार 1921-1930 में 136 सर्वाधिक कहानियाँ हैं। इनमें कोई एक संवेदना, एक भाव, एक विचार, एक धारा नहीं है और यदि है, तो वह देशप्रेम एवं आत्मबोध का है। यह बीज-तत्व है जो जीवन के विविध रंगों में व्यक्त हुआ होता है और लेखक व्यक्ति, परिवार, पति- पत्नी तथा अन्य मानवीय सम्बन्धों से द्वारा उन्हें जीवंत कहानी बनाता है। आलोचकों का यह कहना कि इस कालखण्ड में प्रेमचन्द यथार्थवादी हो गये थे तथा आदर्श से मोहभंग हो गया था और उनका परिष्कार-उन्नयन- संस्कारित करने के भावोत्कर्ष के आदर्श का दशक के अन्त तक परित्याग कर दिया था, पूर्णतः तर्क-तथ्यहीन है। इस दशक में 136 कहानियों में केवल तीन कहानियाँ यथार्थ जीवन पर आधारित हैं-पूस की रात, सवा सेर गेहूँ तथा सद्गति, अतः दो प्रतिशत कहानियाँ लेखक की मूल संवेदना को निर्धारित नहीं कर सकतीं और आलोचकों को विवेक से काम लेना चाहिए। प्रेमचन्द इन कहानियों में देश, स्वराज्य, नगर, ग्राम, बालक, पशु, स्त्री, प्रेम तथा मानव मन की अन्य प्रवृत्तियों पर कहानियों की रचना करते हैं और अपने पात्रों के जीवन में ऊर्जा, गति, सद्भाव, सामंजस्य,समता, प्रेम, ममत्व, वात्सल्य, उत्सर्ग आदि भावों को जाग्रत करके एक अच्छा मनुष्य बनाते हैं जो स्वयं पात्र के लिए ही नहीं समाज और देश की मुक्ति एवं उसकी आत्मा की रक्षा के लिए सर्वोपरि हैं।
प्रेमचन्द के जीवन का चौथा दशक आखिरी था। उन्होंने अपने इस जीवन-काल में 75 कहानियाँ लिखीं, 57 हिन्दी में तथा 18 उर्दू में तथा कफन के बाद 9 कहानियाँ तथा उनके देहान्त के बाद 3 कहानियाँ प्रकाशित हुईं। वर्ष 1931 में 16 कहानियाँ छपीं और उनमें उन्माद कहानी उनके आदरशोंमुख यथार्थवाद का ही प्रतिफल है। यह मनहर तथा उसकी भारतीय पत्नी तथा इंग्लैण्ड की अंग्रेज पत्नी जेनी की कहानी है। मनहर पश्चिमी जीवन और अंग्रेज पत्नी के अनुभवों से पीडित होकर अपनी भारतीय पत्नी के पास लौट आता है और उसके प्रेम, सेवा, त्याग आदि के जीवन मूल्यों के महत्त्व को समझ जाता है। स्वामिनी में भी भारतीय स्त्री अपनी सेवा, प्रेम, ममता, मर्यादा तथा उत्तरदायित्व से ही घर की स्वामिनी बनती है। वर्ष 1932 में 15 कहानियाँ हैं। इनमें रोशनी कहानी अंग्रेज बने एक भारतीय अफसर को एक देहाती विधवा स्त्री अपनी सेवा और स्वाभिमान से उसकी मनोरचना एवं भाव-विचार में आमूलचूल परिवर्तन कर देती है और उसका अफसरी स्वभाव सेवाव्रती बन जाता है। इस वर्ष ठाकुर का कुँआ जैसी यथार्थवादी कहानी भी प्रकाशित हुई, पर अधिकांश कहानियों में सद्भावों का प्रकाश एवं उन्नयन ही मिलता है और प्रेमचन्द अपने साहित्य-दर्शन के साथ ही आगे बढते हैं। प्रेमचन्द ने हंस, अप्रैल 1935 में लिखा भी था कि साहित्य में असुन्दर(यथार्थ) का प्रवेश इसलिए होना चाहिए कि सुन्दर को और भी सुन्दर बनाया जा सके। अन्धकार की अपेक्षा प्रकाश ही संसार के लिए ज्यादा कल्याणकारी सिद्ध हुआ है। वर्ष 1933 में 12 कहानियाँ हैं। इसमें दो कहानियाँ उल्लेखनीय हैं-रंगीले बाबू तथा गुल्ली डण्डा। रंगीले बाबू में एक नये प्रकार का चरित्र है। वह ईश्वरीय सत्ता को नहीं मानता और न उससे भयभीत हैं। वह दामाद और दुल्हा बने बेटे की मृत्यु पर भी ईश्वर से दया की भीख नहीं माँगता, भयंकरतम दुःख को झेलने का साहस रखता है और मृत्यु को भी जीवन की तरह जीते उसे ही सत्य मानता है। गुल्ली डण्डा में प्रेमचन्द भारतीय तथा विदेशी खेलों की तुलना करते हैं और भारतीय खेलों को श्रेष्ठ मानते हैं और गुल्ली-डण्डा को नया अर्थ देते हैं। इसमें इंजीनियर अफसर तथा दलित (चमार) गया में गुल्ली डण्डा का खेल होता है और गया हारकर भी मनुष्यता, सद्व्यवहार तथा बडों को सम्मान देने में विजयी होता है और कथावाचक अफसर उसके इस व्यवहार से उसे अपने से बडा आदमी मानता है। इसमें भी मनुष्यता सबसे बडी कसौटी है और दलित गया उसका प्रतीक है। प्रेमचन्द ने 4 जनवरी, 1934 को जागरण में लिखा था, हमारा आदर्श सदैव से यह रहा है कि जहाँ थूर्तता तथा पाखण्ड और सबलों द्वारा निर्बलों पर अत्याचार देखो,उसको समाज के सामने रखो, चाहे हिन्दू हो, पण्डित हो, बाबू हो, मुसलमान हो या कोई और। इसलिए हमारी कहानियों में आपको पदाधिकारी, महाजन, वकील और पुजारी गरीबों का खून चूसते हुए मिलेंगे और गरीब, किसान, मजदूर, अछूत और दरिद्र उनके आघात सहकर भी अपने धर्म और मनुष्यता को हाथ से न जाने देंगे, क्योंकि हमने उन्हीं में सबसे ज्यादा सचाई और सेवा-भाव पाया है। इस कहानी में इसी कारण गया मनुष्यता की उच्चता तक पहुँचता है और अफसर के विचार बदल देता है। इस वर्ष की कहानी बालक एक नई नैतिकता को जन्म देती है, पर उससे भी मनुष्यता का ही उन्नयन होता है। वर्ष 1934 में 13 कहानियाँ हैं। इस काल की कहानी नशा धन-प्रभुता के नशे से मुक्त होकर मनुष्य बनाती है। रियासत का दीवान कहानी में मिस्टर मेहता राजा के दीवान हैं और उनके सभी उचित- अनुचित काम करते हैं, पर अन्त में उनमें नीति और धर्म का भाव जाग्रत होता है और जमींदार की बेटी का अपहरण करना अस्वीकार करके स्वेच्छा से दण्ड भोगता है। उसकी आत्मा जाग्रत होती है और नैतिकता एवं आदर्श की जीत होती है। वर्ष 1935 में 10 कहानियाँ हैं। इसमें कातिल की माँ नाम की कहानी है जो हिंसा पर अहिंसा की विजय की विजय है और माँ अपने बेटे से ज्यादा धर्म, नीति तथा अहिंसा को प्रेम करती है। देवी कहानी की देहाती दलित मुलिया अपनी सेवा से देवी कहलाती है। प्रेमचन्द उसमें सेवा तथा पातिव्रत से देवत्व जाग्रत करते हैं। जीवन का शाप कहानी में धन और विलास को शाप कहा है और स्वयं प्रेमचन्द इस कहानी पर लिखते हैं, धन और विलास जुडवाँ हैं और जीवन का शाप है। जीवन का सुख धन में नहीं, संतोष और निग्रह में है। उसका मैंने एक नये रूप में उपयोग किया है और यही मेरा उद्देश्य है। इस वर्ष की विख्यात कहानी कफन में भी संवेदना खत्म नहीं हुई और घीसू माधव भरपेट खाकर बची हुई पूरियाँ सामने खडे भिखारी को दे देते हैं और प्रेमचन्द लिखते हैं, और देने के गौरव, आनन्द और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया। प्रेमचन्द कफन के पैसों से शराब और खाना पीने-खाने वाले चरित्रों में भी मनुष्यता की एक किरण दिखा ही देते हैं। वर्ष 1936 में, जो उनके जीवन का आखिरी वर्ष था, कुल 9 कहानियाँ मिलती हैं। इनमें 6 कहानियाँ उनके जीवन काल में तथा 3 उनके देहान्त के बाद प्रकाशित हुईं। इन कहानियों का भी मुख्य स्वर प्रेमचन्द का आदर्शोंमुख यथार्थवाद ही है, पात्रों के मन का संस्कार होता है और वे मानसिक दुर्बलताओं तथा जीवन के कष्टों से मुक्त होकर बेहतर जीवन की ओर अग्रसर होते हैं। इस वर्ष की पहली मिस पद्मा लिव-इन-रिलेशनशिप पर है और इसकी नायिका पद्मा माँ बनने पर पछताती है। उसका प्रेमी धोखा देकर उसके बैंक से रुपये निकालकर इंग्लैण्ड अपनी छात्रा के साथ भाग गया और वह दया-प्रेम-घृणा से भर जाती है, परन्तु प्रेमचन्द कहानी का अन्त अपने लक्ष्य के अनुरूप ही करते हैं। वे अन्त में दिखाते हैं कि पद्मा बच्चे को गोद में लेकर खडी है और सडक पर एक योरोपियन लेडी और उसका पति एक बग्गी में अपने नवजात बच्चे को लेकर जा रहे हैं और वह सचल आँखों से इस खुशनसीब जोडे को देख रही है। यह द्दश्य उसका उदात्तीकरण कर देता है और परिवार के भारतीय आदर्श को स्थापित कर देता है। होली की छुट्टी कहानी में कथावाचक अंग्रेज बिल जैक्सन को उसके परोपकार के कारण इंसान नहीं फरिश्ता मानता है। दो बहनें कहानी में धन-विलास का बाग निशाचरों से घिरा है। प्रेमचन्द के जीवन- काल में छपी अन्तिम कहानी रहस्य भी आदर्शोंमुख यथार्थवाद की ही कहानी है और यह तथ्य ध्यान में रहना चाहिए कि यह कहानी हंस, सितंबर, 1936 के अंक में उनके लेख महाजनी सभ्यता के साथ ही छपी थी। इस कहानी का नायक विमलप्रकाश सेवाश्रम का संचालक है और मंजुला उसके आश्रम से जुडती है, लेकिन कुछ समय बाद चली जाती है। विमल को तीन साल बाद मंजुला मंसूरी में मिलती है और विमल को सेवाव्रती बने रहकर देवत्व तक पहुँचने की प्रेरणा देती है। मंजुला के ये शब्द प्रेमचन्द के पुराने साहित्य-दर्शन को ही सिद्ध करते हैं और महाजनी सभ्यता की प्रगतिशील व्याख्या के प्रतिकूल सेवा को देवत्व का मार्ग बताते हैं, आपको ईश्वर ने सेवा और त्याग के लिए ही रचा है। यही आपका क्षेत्र है।...मैं सब कुछ सह लूँगी, पर आपको देवत्व के ऊँचे आसन से नीचे न गिराएँगी। आप ज्ञानी हैं, संसार के सुख कितने अनित्य हैं,आप खूब जानते हैं। इनके प्रलोभन में न आइए। आप मनुष्य हैं। आप में भी इच्छाएँ हैं, वासनाएँ हैं, लेकिन इच्छाओं पर विजय पाकर ही आप में यह ऊँचा पद पाया है। उसकी रक्षा कीजिए, अध्यात्म ही आपकी मदद कर सकता है। उसी साधना से आपका जीवन सात्विक होगा और मन पवित्र होगा। यहाँ यह बताना जरूरी है कि प्रेमचन्द ने प्रगतिशील लेखक संघ के भाषण में कहा था कि सेवा में जो आध्यात्मिक आनन्द है वही हमारा पुरस्कार है। प्रेमचन्द इस सेवा-दर्शन को भारतीय अध्यात्मिकता से जोडते हैं, जैसे स्वामी विवेकानन्द देखते हैं। प्रेमचन्द का आध्यात्मिक आनन्द ईश्वर या मोक्ष की प्राप्ति में नहीं, मनुष्य की सेवा में ही है।
प्रेमचन्द की इस कहानी-यात्रा के विवेचन से कई निष्कर्ष निकलते हैं जिन पर हमारे आलोचक अपनी पार्टी प्रतिबद्धता तथा अज्ञानता एवं तीन-तेरह कहानियों तक सीमित रहने के कारण नहीं पहुँच पाये। इन आलोचकों ने प्रेमचन्द को अपनी संकुचित नजर से देखा, लेकिन प्रेमचन्द को उनकी निगाह से देखकर ही उनके साहित्य की आत्मा को देखना-समझना जा सकता है। प्रेमचन्द जीवन में आद्योपांत अपने साहित्य-दर्शन से अटूट रूप में जुडे रहे और उनका अपने आदर्शोंमुख यथार्थवाद से कोई मोहभंग नहीं हुआ था और न वे खूनी क्रांति के समर्थन हो गए थे। उनकी कहानी-यात्रा में निरन्तर भारतीय आदर्शों की, उन आदर्शों की जिनकी जरूरत एक ऐसे मनुष्य के निर्माण तथा उसकी मनोरचना में आवश्यकता होती है जो देश के स्वराज्य के लिए संघर्षशील रहकर भारतीय आत्मा की रक्षा कर सके। इसके लिए वे अपने पात्रों की रचना करते हैं और किसी में देशप्रेम, स्वराज्य, जागरण, किसी में आत्म-बलिदान, किसी में परिवार-समाज, किसी में दलितोत्थान, किसी में दुर्बल की सहायता, पुरुषार्थ, ईमानदारी, सेवा-त्याग-क्षमा -दया- प्रेम-न्याय-नीति-ममत्व-उदारता-मर्यादा, परोपकार -संतोषमय जीवन आदि का उद्भव करके मनुष्यता की स्थापना करते हैं। इनमें हर पात्र का अपना वैशिष्ट्य है, हर पात्र का अपना आदर्श है और हर पात्र अपनी समस्या एवं परिस्थिति से शुभ संस्कारों तक पहुँचता है वह अपने अशुभ संस्कारों, विचारों तथा भावों को नियंत्रित करके शुभ तथा मनुष्यता से परिष्कृत होता है। किसी एक मनुष्य में सभी गुणों तथा सभी सद्भावों का होना सम्भव नहीं, इस कारण प्रेमचन्द भिन्न-भिन्न भावों के लिए भिन्न-भिन्न चरित्रों की सृष्टि करते हैं और व्यक्ति व्यक्ति से एक भारतीय समाज के रचना करते हैं, लेकिन यह ध्यातव्य है कि मानव के भाव-विचार सभी देशों में एक समान रूप से मान्य नहीं होते। उनकी कहानी दुनिया का सबसे अनमोल रत्न में हिन्दू सैनिक भारत माता की जय कहकर प्राण त्यागता है और यही मेरी मातृभूमि है में कथावाचक गंगा में ही अपनी मातृभूमि देखता है, तो यह देशप्रेम का भाव सभी समाजों के लिए मान्य नहीं हो सकता। अतः मनुष्य के अनेक भावों का सम्बन्ध देश-काल-समाज सापेक्ष ही है, इसलिए कहानी की सर्वश्रेष्ठता का आधार मनुष्य का ऐसा ही भाव-विचार हो सकता है जो सार्वभौमिक हो, जो सर्वमनुष्यता के लिए कल्याणकारी हो और सभी मानव जाति को सहज रूप में विद्यमान हो। भारतीय जीवन-दर्शन में ऐसे मानवीय भाव-विचार का अभिज्ञान प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में मिलता है। वेद व्यास कहते हैं, परोपकार-पुण्याय पापाय परपीडनम् , अर्थात् परोपकार-दूसरों का उपकार पुण्यकारक है और दूसरों को पीडा देना पापकारक है। यह कथन बार-बार दुहराया गया है। तुलसीदास भी रामचरितमानस में कहते हैं, परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीडा सम नहिं अधमाई। यह परोपकार मानव सभ्यता का सारभौम सत्य है, यह सभी धर्म तथा नीति का आधार है और मनुष्य मनुष्य में एकता, बन्धुत्व तथा कर्त्तव्य की संस्कृति का मूल है। यह स्व का पर में विसर्जन है और व्यष्टि एवं समष्टि का सम्मिलन है। यह धार्मिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक,भौतिक तथा नैतिकता की द्दष्टि से मनुष्य का एक-दूसरे का हित करना व्यक्ति और समाज की पूरकता का प्रमाण है। प्रकृति का सत्य भी यही है कि वह अपने लिए नहीं सब दूसरों के लिए ही करती है- वृच्छ कबहुँ न फल भखै, नदी न सचै नीर/ परमारथ के कारनै, साधु ने धरा सरीरा। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि परोपकार प्रेम से उत्पन्न होता है और वह सेवा के भाव को तीव्र करता है और व्यक्ति शत्रु, विरोधी तथा निकृष्टतम प्राणी की सेवा को भी तत्पर हो जाता है और जब मनुष्य की आत्मचेतना सेवा में केन्द्रीभूत हो जाती है तो वह ईश्वर रूप बन जाता है। वे कहते हैं कि अनासक्त सेवा-परोपकार एक शुभ-कर्म है और वह हमारे क्षुद्र अहंभाव को प्रतिक्षण घटाता है, व्यक्ति स्वयं को भूलकर आत्म-विस्मृति एवं आत्म-शुद्धि से गुजरता है और जब उसकी आत्म-चेतना केन्द्रीभूत होकर अनन्त गुनी हो जाती है तो मैं नहीं तू ही तू रह जाता है। (विवेकानन्द साहित्य, खण्ड-3, पृष्ठ 59,119, 369)। स्वामी विवेकानन्द इस पर बल देते हैं कि धन-यश से मुक्त परोपकार-सेवा पूर्णतःनिःस्वार्थ होने पर ही व्यक्ति एक बुद्ध बन सकता है और वह अपनी शक्ति से संसार को संपूर्ण रूप में बदल सकता है। वे अपनी चर्चा में एक परिवार के अतिथि को भोजन कराने में भूखे मरने की महाभारत से नेवले के आधे शरीर को सुनहरे हो जाने की कहानी कहते हैं। यह परोपकार का सर्वोच्च उदाहरण है जब अतिथि को भोजन कराने में पूरा परिवार भूखा मर जाता है और उनके अन्न के कुछ कणों में लोटकर नेवले का आधा शरीर स्वर्ण का हो जाता है।
प्रेमचन्द की 299 कहानियों में इस कसौटी पर सबसे उत्तम कहानी मंत्र है, जो मार्च,1928 में प्रकाशित हुई थी। भारतीय संस्कृति तथा प्रेमचन्द की दृष्टि में मनुष्य की जो सबसे बडी कसौटी है धन-यश से निर्लिप्त पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से, अपने विरोधी के प्रति भी, उपकार एवं सेवा के लिए तत्पर होना। मंत्र कहानी इस कसौटी का ज्वलंत प्रमाण है। कहानी में बूढा भगत है जिसके छह बेटे मर चुके हैं और सातवाँ बीमार है और वह उसे दिखाने के लिए डा. चड्डा के औषधालय में लेकर आता है, पर डॉक्टर चड्डा का गोल्फ खेलने का समय हो गया है और कल सवेरे आने की कहते हुए गोल्फ-स्टिक लेकर मोटर में बैठकर चल देते हैं। बूढा भगत अपनी पगडी उनकी चौखट पर रखकर दया-धर्म की दुहाई देता है, पर चड्डा अनसुनी करके चले जाते हैं। प्रेमचन्द इसके बाद के द्दश्य का तथा बूढे भगत की प्रतिक्रिया का वर्णन करते हुए लिखते हैं, बूढा कई मिनट तक मूर्ति की भांति खडा रहा। संसार में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जो अपने आमोद- प्रमोद के आगे किसी की जान की भी परवा नहीं करते, शायद इसका उसे अब भी विश्वास न आता था। सभ्य संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ था। वह उन पुराने जमाने के जीवों में था, जो लगी हुई आग को बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को शांत करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। प्रेमचन्द यहाँ डॉक्टर चड्डा तथा बूढे भगत के सभ्यतागत अन्तर को स्पष्ट कर देते हैं, एक ओर पश्चिम शिक्षा- सभ्यता में आत्मकेंद्रित, स्वार्थी मनोवृत्ति है और उसे किसी दूसरे के दुखदर्द से कोई सम्बन्ध नहीं है और दूसरी ओर एक अशिक्षित, निर्धन तथा याचक बना बूढा उस भारतीय सभ्यता का जीव है जो हर किसी के दुखदर्द में सदैव सेवा के लिए तत्पर रहता है। कहानी आगे बढती है। बूढे भगत का बुढापे का एकमात्र सहारा बेटा उसी रात को संसार से सिधार गया। अब कहानी का दूसरा पक्ष आता है। उसके कुछ साल बाद चड्डा का बेटा साँप के जहर से मरणासन्न अवस्था में है और रात को चौकीदार इसकी सूचना बूढे भगत को देता है। बूढे भगत की चेतना तथा उपचेतना का प्रेमचन्द अन्तर्द्वन्द्व दिखाते हैं, उसके मन का प्रतिकार तथा हिंसा भाव जाग्रत होता है, वह खुश होता और वह दस लाख मिलने पर भी न जाने की कहता है, परन्तु उसका हृदय उस अभागे युवक की ओर था जो मर रहा था। ऐसा कभी न हुआ कि भगत ने सर्पदंश की सुनी हो और वह दौडा न गया हो। उसकी चेतना रोकती थी, पर उपचेतना खेलती थी। मन में प्रतिकार, दम्भ और हिंसा थी,पर कर्म मन के अधीन न था। वह इसी उहापोह में नशे की सी हालत में भागता-भागता चड्डा के घर पहुँचता है और अपने मंत्रों से जहर उतार कर कैलाश को जीवित कर देता है और फिर वहाँ से गायब हो जाता है और वह एक चिलम तम्बाकू का भी रवादार नहीं होता। डॉक्टर उसे पहचान लेता हैं और कहता है कि उससे क्षमा माँगूँगा और उसकी सज्जनता ने जो आदर्श दिखाया है वह जीवन पर्यन्त याद रखूँगा।
यह कहानी बस इतनी है, पर मनुष्यता की जो श्रेष्ठतम कसौटी है, उस पर यह खरी उतरती है। प्रेमचन्द ने संस्कृत साहित्य का आरंभिक काल में उर्दू में अध्धयन कर लिया था और वे जानते थे कि मनुष्य का एक व्यक्ति, समाज, युग तथा आपद्धर्म होता है और एक त्रिकालाबाधित धर्म होता है जो काल-देश में एक रूप रहता है और यह धर्म है परोपकार का, सेवा का, अपने स्व से मुक्त होकर पर का उपकार करने का और यह मानव- संस्कृति का सर्वोच्च उपहार और उपलब्धि है। कहानी का बूढा भगत अपने इसी सद्कर्म से जीवन का यही मंत्र देता है कि मनुष्य को कैसे जीना चाहिए। वह सबसे बडा अपकार एवं अहित करने वाले डॉक्टर के वैसे ही संकट में अपनी महाव्यथा से अपने स्व को मुक्त करके सहृदयता, संवेदनशीलता और चरम मनुष्यता से उसके पुत्र कैलाश के प्राणों की सर्पदंश से रक्षा करता है और उसे जीवित कर देता है। बूढे भगत ने इससे पहले सैकडों लोगों को अपने मंत्रों द्वारा उनके प्राणों की रक्षा की है। यह सेवा-संकल्प उसका धर्म बन गया है और यह भाव इतना घनीभूत हो गया है कि उसका मन, उसकी आत्मा स्वतः ही दौड-भाग कर मरणासन्न व्यक्ति तक पहुँचा देती है। डॉक्टर चड्डा भद्र, शिक्षित,धनी समाज के हैं और रोगियों का उपचार ही उनका कर्म है, परंतु परहित-सेवा शून्य है और वे भगत के बेटे की मौत के कारण भी हैं, लेकिन बूढा भगत तो अभद्र, अशिक्षित, निर्धन, देहाती निम्न वर्ग का है और वह इसी डॉक्टर के बेटे को, उसकी क्रूर अमानवीयता के बावजूद, अपने प्रतिकारी भावों को नियंत्रित करके, उसके बेटे को जीवनदान देता है। किसी जीव की, किसी मनुष्य की प्राण-रक्षा मानवी-संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ उपक्रम है। प्रेमचन्द बूढे भगत को एकदम देवता नहीं बनाते। वे मानते हैं कि किसी देवता की कामना करना मुश्किल नहीं है, पर उस देवता में प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है, लेकिन वे बूढे भगत में ऐसी स्थिति में उत्पन्न होने वाली दुर्भावनाओं- प्रतिशोध,अहिताकांक्षा, हिंसा, दम्भ आदि की उत्तेजना दिखाते हैं और फिर उसके अचेतन में विद्यमान शुभ- भावनाओं का आवेग, उसे इस अन्तर्द्वन्द्व से निकाल कर बाधाओं को जीतते हुए, उसे रंगमंच पर खींचे लिए जाता है और वह परहित के अपने शुभ संस्कार से मनुष्य के रूप में देवत्व तक पहुँचता है। प्रेमचन्द महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं और यह मानसरोवर, खण्ड-एक, मार्च1936 की भूमिका में,जो मृत्यु के छह महीने पहले लिखी थी, कहते हैं कि बुरे आदमी में भी देवत्व छिपा रहता है-यह मनोवैज्ञानिक सत्य है।। उस देवता को खोलकर दिखा देना सफल आख्यायिका-लेखक का काम है। इस प्रकार प्रेमचन्द बूढे भगत में छिपे निःस्वार्थ जीवनदान के देवत्व भाव को उजागर करते हैं, यद्यपि वह बुरा आदमी नहीं है, लेकिन वह मनुष्य है और मनुष्य में सद्-असद् भावनाएँ होती ही हैं। प्रेमचन्द मंत्र कहानी लिखकर अपने कहानी-धर्म का पालन करते हैं और सार्थक बनाते हैं। प्रेमचन्द स्वयं अपनी कसौटी में करें उतरते हैं और वे जिस मनुष्यता के उन्नयन तथा परिष्कार के लिए कहानी लिख रहे हैं, उसका पात्र भी मनुष्यता की सर्वश्रेष्ठ कसौटी परोपकार-सेवा का प्रमाण बनता है। प्रेमचन्द ऐसे ही भारतीय मनुष्य को खोजते हैं, जो सम्पूर्ण मनुष्य है, और जो जितनी संपूर्णता में स्वार्थहीन एवं निजत्वहीन होता है, उसकी सफलता और उपलब्धि भी उतनी ही महान होती है। अपनी निजी महाव्यथा की बुनियाद पर अपने ही शत्रु के मंगल-भवन के निर्माण से बडी मनुष्यता और क्या हो सकती है? कहानी में कैलाश को जीवनदान देकर बूढे भगत का रंगमंच से गायब हो जाना उसकी मनुष्यता को और भी महान बना देता है।
प्रेमचन्द ऐसे ही भारतीय मनुष्य की स्वराज तथा स्वधर्म की रक्षा के महासमर के लिए रूपरचना करते हैं, क्योंकि यही भारतीय मनुष्य देश की स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए प्राणोत्सर्ग कर सकता है, परिवार को जोडकर रख सकता है, दलितों का उन्नयन कर सकता है, संकट में मदद कर सकता है, पश्चिमी सभ्यता से भारतीय मूल्यों को बचा सकता है, पंच बनकर न्याय कर सकता है, अन्धविश्वासों, धन-विलास के मोह का खंडन करके नैतिकपूर्ण जीवन जी सकता है, पत्नी-माता-बहन-सहेली आदि के सम्बन्धों में मधुरता एवं सेवा-भाव ला सकता है, साम्प्रदायिक सद्भाव उत्पन्न कर सकता है, गाँवों में जाग्रति ला सकता है, समता-बंधुत्व की चेतना पैदा कर सकता है, अन्याय-शोषण-दमन का विरोध कर सकता है, अपने पुरुषार्थ और बलिदान की ज्योति जला सकता है और समाज-सेवा के लिए अपनी निजता को विस्मृत कर सकता है। प्रेमचन्द की कहानियों के ऐसे सारे पात्र मन में छिपे-ढँके-दबे सेवा-संस्कार से अपने अपने प्रसंग में मनुष्यता की रोशनी (कहानी) से प्रकाश फैला सकते हैं, लेकिन इन सभी में मंत्र का बूढा भगत अद्वितीय है। प्रेमचन्द अपने प्रगतिशील लेखक संघ के भाषण में भी कहते हैं, सेवा में जो आध्यात्मिक आनन्द है, वही हमारा पुरस्कार है। इसी भाषण में वे इस आनन्द को आध्यात्मिक सुख, संतोष, तृप्ति भोजन आदि अनेक शब्दों से व्यक्त करते हैं और इस भारतीय आदर्श को जो सनातन है, मंगल भवन अमंगल हारी को सर्वोच्च तथा सर्वश्रेष्ठ कसौटी के रूप में स्थापित करते हैं और उसे मंत्र कहानी अपने सम्पूर्ण रूप में सिद्ध करती है। मनुष्य के मंगल में परोपकार-सेवा ही सबसे बडी संजीवनी है।


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