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कामधेनु-चित्रण के सतत और स्वतंत्र सन्दर्भ

शाहिद परवेज
मनुष्य की कामनाएँ अनन्त होती हैं। वे जीवन पर्यन्त एक के बाद एक आती और चली जाती हैं। एक इच्छा की पूर्ति के बाद या दूसरी इच्छा पूरी भी नहीं होती है और तीसरी इच्छा मन में फिर से उठने लगती है। इस प्रकार जीवन भर मनुष्य अपनी कामनाओं की पूर्ति में लगा रहता है। मनुष्य की यह प्रकृति है कि वह कभी भी जो उपलब्ध है उससे सन्तुष्ट नहीं हो पाता है और सांसारिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए सदा प्रयत्नशील रहता है। वह सदैव और ज्यादा और बेहतर की कामना करता रहता है। इसकी प्राप्ति के लिए वह कभी अपनी मेहनत पर भरोसा कर उन कामनाओं की पूर्ति में लग जाता है, तो कभी चमत्कार या ईश्वरीय वरदान के भरोसे रहता है। संसार भर की सभ्यताओं में वरदान और सौगात की अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। भारतीय पौराणिक कथाओं में कामधेनु की कथा मिलती है। कामधेनु एक गाय है जो चमत्कारिक रूप से कामनाओं की पूर्ति करती है। इनका दूसरा नाम सुरभि भी है, जिन्हें सभी गाय प्रजाति की माता होने का दर्जा प्राप्त है। इनके बारे में ऐसा माना जाता है कि इनके दर्शन मात्र से ही सभी तरह की कष्ट और क्लेश दूर हो जाते हैं। दैवीय शक्तियों से सम्पन्न कामधेनु गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था। यह दैवीय गाय स्वर्गलोक में रहती हैं। ऐसा माना जाता है कि कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। इस गाय को दैवीय शक्तियाँ प्राप्त थीं। यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था उसकी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती थी।
परम्परागत रूप से कामधेनु को एक सफेद गाय के रूप में चित्रित किया गया है जिसमें एक स्त्री का सिर और स्तन के साथ ही पक्षी के पंख और एक मोर की पूँछ होती है, परन्तु कई बार कामधेनु को एक सफेद गाय के रूप में भी चित्रित किया गया है, जिसके शरीर के विभिन्न हिस्सों में सभी हिन्दू देवताओं को चित्रित किया गया है। भारत में कामधेनु को न सिर्फ चित्रित किया गया है अपितु कामधेनु की मिटटी, पीतल, पत्थर और लकडी की मूर्तियाँ भी देखी जा सकती है और साथ ही जगह और मान्यता के साथ इसकी बनावट में भी कुछ- कुछ भिन्नताएँ होती हैं।
भारतीय सभ्यता संस्कृति काफी प्राचीन है, यहाँ समय-समय पर कई काव्य, महाकाव्य, ग्रन्थों, किस्सों- कहानियों, लोककथाओं, किवदन्तियों आदि की रचना हुई है जिनका भारतीय जनमानस पर काफी गहरा प्रभाव है। भारतीय समकालीन कलाकारों ने इन्ही सन्दर्भों- प्रतीकों को अपनी अभिव्यक्ति के लिए उपयोग किया है और इन्हीं के सहारे समकालीन सामाजिक -राजनीतिक परिस्थितियों पर कला के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया दी है। कला में बाहरी, स्थूल, इन्द्रियग्राह्य, गोचर तत्त्वों को गूँथा जाता है, परन्तु इनमें अनेक भाव-तत्त्व अथवा आध्यात्मिक तत्त्व भी होते हैं जो भीतरी, सूक्ष्म मनसा ग्राह्य और अगोचर तत्त्व हैं। इन्हीं अगोचर भाव तत्त्वों के प्रकटीकरण के लिए समकालीन कलाकार स्थूल पारम्परिक प्रतीकों का उपयोग अपनी भीतरी, सूक्ष्म अभिव्यक्ति के लिए करता है। भारतीय साहित्य में कामधेनु एक बहुत ही प्रचलित व रोचक प्रतीक है, जिसका भारतीय पारम्परिक चित्रकला में व्यापक चित्रण हुआ है, और समकालीन कलाकारों ने भी कामधेनु को चित्रित किया है, परन्तु उन्होंने कामधेनु को पूरी तरह से नए दृष्टिकोण के साथ चित्रित किया है जिसमे कामधेनु की पौराणिक मान्यता को ध्यान में तो रखा है, परन्तु साथ ही कलाकार के अपने व्यक्तित्व और अपने भावबोध के साथ कामधेनु को देखा समझा और चित्रित किया। अनेक अवसरों पर ऐसा भी देखा गया कि कलाकार ने कामधेनु को कामधेनु की परम्परागत छवि के रूप में चित्रित नहीं किया अपितु अपनी बात कहने के लिए प्रतीक के रूप में कामधेनु को जगह दी है। कामधेनु को चित्रित करते समय चित्रकार ने मुख्यतः कामनाओं को ही केन्द्र में रखा है और प्रमुखतया वे मानव की ही कामनाएँ हैं। रचनात्मक स्वतंत्रता लेते हुए कलाकारों ने ये भी प्रतिपादित किया कि क्या कामधेनु की स्वयं कोई कामनाएँ नहीं हो सकती है,हो सकती हैं और इन कामनाओं को पहचानना चाहिए।
गोगी सरोजपाल का नाम भारतीय समकालीन कला में बहुत आदर के साथ लिया जाता है। अपने जीवन और चित्रों दोनों ही में वे बडी निडरता व बेबाकी से अपने विचार रखती हैं और विशेषकर महिलाओं की समाज में स्थिति का उन्होंने काफी उल्लेखनीय चित्रण किया है। प्रारम्भ से ही अपने चित्रों में उन्होंने भारतीय नारी को केंद्र में रखा है और वेदना के साथ ही उसके अपरिमित सौन्दर्य को अभिव्यक्त किया है। वे सदा से ही समाज में नारी का स्थान, उसकी मनःस्थिति, उसका संघर्ष, शक्ति आदि को ले कर काफी सचेत रही हैं अपनी विभिन्न चित्र श्रृंखलाओं में उन्होंने नारी के प्रति अपने सरोकार को अभिव्यक्त किया है जैसे बीईंग अ वुमन, नायिका, हठ योगिनी, किन्नरी इन्हीं में गोगी की बहुत ही चर्चित चित्र श्रृंखला कामधेनु है। गोगी के चित्रों में हम प्रायः भारतीय प्रतीकों की उपस्थिति देखते है। वस्तुतः पश्चिम - प्रेरित समकालीन भारतीय कला से निराश हो कर ही उन्होंने अन्तरावलोकन करना शुरू किया और ऐसी देशज कला से प्रेरणा ली, जो अवधारणात्मक बिम्बों के मामले में बहुत अधिक समृद्ध है। इसी देशज प्रेरणा के रूप में उन्होंने कामधेनु चित्र श्रृंखला चित्रित की। जिसमें उन्होंने गाय और नारी के आकारों को मिला कर चित्रण किया है। उन्होंने कामधेनु को मात्र एक चमत्कारी और मनोकामना पूरी करने वाली गाय के रूप में चित्रित नहीं किया अपितु उन्होंने नारी को कामधेनु के रूप में चित्रित किया जो सभी की जरूरतों का ख्याल रखती है। नारी और कामधेनु एक दूसरे में समाहित होते जान पडते हैं। परन्तु जैसा कि कामधेनु से ये अपेक्षा है कि वह सबकी मनोकामनाएँ पूरी करे, परन्तु ये किसी ने नहीं सोचा कि कामधेनु की भी कोई मनोकामना होगी उसे पूरा कौन करेगा या उसकी इच्छाओं का कौन ख्याल रखेगा। कामधेनु की तरह ही नारी से समाज यह अपेक्षा रखता है कि वह परिवार की ,समाज की जरूरतों को पूरा करना अपना कर्तव्य समझे , समाज उसका हर तरह से उपयोग करे, परन्तु नारी की इच्छाओं का आकांक्षाओं का कौन ध्यान रखेगा उसके मन को कौन समझेगा भारतीय समाज जिस तरह नारी और पुरुष में भेद करता है अधिकारों का जो अन्यायपूर्ण

विभाजन किया है या नारी को देवी के पद पर बैठाकर भी जिस तरह नारी का शोषण किया जाता है उस सोच को गोगी अपने चित्रों में प्रदर्शित करतीं है।
गोगी की कामधेनु चित्र श्रृंखला पर कला समीक्षक नीति सेन अपने विचार प्रकट करते हुए कहतीं हैं एक महिला के रूप में, आप इच्छा की वस्तु हैं; और फिर भी, आपकी भी इच्छाएँ हैं। इस प्रकार आप पेंटिंग में वस्तु और विषय दोनों हैं। लिंग धारणा के आधार पर यहाँ निश्चित रूप से एक द्विभाजन है। भारतीय समाज में महिला की सदा ही अपने आप को समाज के लिए समर्पित करते रहने की छवि बनायीं गयी है जो सिर्फ देना जानती है, बदले में किसी चीज की उम्मीद नहीं रखती और कामधेनु इसके समक्ष सबसे उपयुक्त प्रतीक है। सरोजपाल, एक कलाकार और एक महिला होने के नाते, इस स्थिति को हास्य के साथ देखती हैं लोग कामधेनु के बारे में कहते हैं, वह बहुत अच्छी है - वह आपकी सभी इच्छाओं को पूरा कर सकती है! यह दिलचस्प है कि किसी ने कभी नहीं पूछा कि कामधेनु खुद क्या चाहती है, उसकी अपनी इच्छा कैसे पूरी हो सकती है उन्होंने पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था में महिलाओं को सामाजिक अन्याय की मूक शिकार के रूप में चित्रित किया है। उनके जकडे हुए अंग, झुके हुए सिर और सवाल करते से असहाय नेत्र हाथ उनकी असहायता का संकेत देते हैं। साथ ही हमें एक शालीन कामुकता भी देखने को मिलती है जो महिला के भीतर न सिर्फ पुरुष इच्छा को संबोधित करती है अपितु प्रतीक रूप में वह इस बात को भी रखती है कि महिलाओं की भी अपनी कामनाएँ हैं, सपने हैं...उनकी पूर्ति कौन करेगा
तमिलनाडु में जन्मे और आर्ट एण्ड क्राफ्ट कॉलेज ,चेन्नई से शिक्षा प्राप्त के. मुरलीधरन के चित्रों में पारम्परिक, पौराणिक और समकालीन तीनों एक साथ नजर आते हैं। उनकी चित्र श्रृंखला कामधेनु की पौराणिक मान्यताओं और चित्रण के तरीके को बिलकुल ही नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। मुरलीधरन कामधेनु की आकृति का उपयोग स्वयं इच्छा की प्रकृति का पता लगाने के लिए करते हैं। मुरलीधरन के चित्रण में चौंका देने वाली कामधेनु किसी मनोकामना की पूर्ति करती प्रतीत नहीं होती है, यह अपने रास्ते में आने वाली इच्छा-पूर्ति प्रार्थनाओं की प्रकृति से चौंकती हुई प्रतीत होती है। उन्होंने हिन्दू देवताओं को एक बच्चे की तरह बहुत सहजता और बालसुलभता के साथ चित्रित किया है। उनकी रचनाएँ पौराणिक अवधारणाओं की जटिलता को सरल रूपों में प्रस्तुत करती हैं, और उनके चित्रों की यही सरलता और सहजता दर्शकों को सहसा ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं।
के. मुरलीधरन
मुरलीधरन अपने चित्रों की पृष्ठभूमि में नाना प्रकार के बिम्बों को चित्रित करते हैं जो कामधेनु के सन्दर्भ में संभवतः कामनाओं के प्रतीक प्रतीत होते हैं जिसमें प्रेम के प्रतीक के रूप में लाल रंग में दिल की आकृति, कामनाओं के इन्द्रधनुष, हाथी, मछलियाँ, शेषनाग, अक्षर और कई रहस्यमयी आकृतियाँ देखते हैं, इन विभिन्न प्रतीकों से मुरलीधरन मानव की नाना प्रकार की कामनाओं को दर्शाते हैं , जिसे वो कामधेनु के जरीये पूरी करना चाहता है। ऐसा लगता है कि मुरलीधरन की कामधेनु मानव की अनंत कामनाओं- वासनाओं को जान कर चकित है।
रिनी धुमाल का नाम भारत की प्रमुख समकालीन महिला कलाकारों में शुमार होता है। उन्होंने पेंटिंग, मूर्तिकला के साथ-साथ लेखन सहित विभिन्न कला माध्यमों में काम किया है, लेकिन उनकी पहचान एक प्रिन्टमेकर और पेंटर के रूप अधिक में है। उनकी परिष्कृत और सघन कल्पना अक्सर नारी से सम्बंधित विषयों के साथ जुडी हुई है और देवी-देवताओं को अपनी कल्पना के विभिन्न रूपों में चित्रित करती हैं, जो अक्सर एकाकी दिखाई देती हैं, लेकिन दुनिया का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से शक्तिशाली भी हैं।

रिनी धुमाल
बडौदा उनकी कर्मभूमि रहा है, उनकी रचनाओं में भी हम आधी स्त्री और आधा पशु देख सकते हैं। विशेषकर उनके कामधेनु चित्रों में वे इस द्वैत को बडी कुशलता से चित्रित करती हैं । उनकी कामधेनु में हमें बहुत ही गहरे में एक तरह की आध्यात्मिकता की झलक मिलती है। रिनी लगातार महिलाओं से सम्बंधित विषयों को चित्रित करती आई हैं और यहाँ भी वे कामधेनु के माध्यम से भारतीय महिला की छवि को ही हमारे सामने रखती हैं। कलाकृति में हमें एक गाय दिखाई देती है जिसमें पंखों वाली मादा का सिर और स्तन होता है। पंख रिनी के ज्यादातर चित्रों में देखे जा सकते हैं विशेष कर जब वे मानव व पशु-पक्षी की आकृतियों को जोड कर चित्रित करती हैं। इन कलाकृतियों में स्त्री कहीं से भी असहाय या बेचारी नहीं लगती अपितु आत्मविश्वास से भरी लगती है, निश्चिततौर पर वह मानव की कामनाओं को पूरा करने का सामर्थ्य रखती है, परन्तु साथ ही उसकी आँखों में हम मानव जाति की कभी न खत्म होने वाली लालसाओं - वासनाओं के प्रति सवाल भी देखते हैं। स्त्री के रूप में पुरुष और समाज की सभी अपेक्षों को पूरी करने के बाद भी स्त्री के प्रति समाज के अन्यायपूर्ण व्यवहार के प्रति जैसे उसकी आँखें हमसे प्रश्न करती हैं। चित्र के केन्द्र में कामधेनु की आकृति के साथ पृष्ठभूमि में चित्रित देवी का बिम्ब नारी के देवतुल्य छवि को प्रतिपादित करता है साथ ही पुष्पों का चित्रण स्त्री की पवित्रता और उसकी कोमल भावनाओं को हमारे समक्ष रखता है।
शैल चोयल उन भारतीय समकालीन कलाकारों में अग्रणी नाम है जिन्होंने पारम्परिक भारतीय कला विशेष कर राजस्थानी लघुचित्र शैली का संश्लेषण कर अपनी चित्रात्मक भाषा को समृद्ध किया है। शैल चोयल ने सदा ही अपनी व्यक्तिगत कल्पना का चित्रण किया है। शमशेर बहादुर सिंह कहते हैं- कला की अभिव्यक्ति व्यक्ति और समाज की आशाओं -आकांक्षाओं और क्षणिक समर्थताओं का एक सजीव और गतिशील दर्पण है। इस दर्पण में हम अपनी शक्लें देखते नहीं, पहचानते और समझते हैं। शैल चोयल की कलाकृतियों में हमें समाज की आशाओं के साथ ही जीवन की क्षणिक समर्थताओं के दर्शन भी होते हैं। उनके द्वारा चित्रित कामधेनु वह कामधेनु नहीं है जिसे प्राचीन भारतीय धार्मिक ग्रन्थों में जादुई गाय के रूप में या मनोकामना पूरी करने वाली गाय के तौर पर दर्शाया गया है। उनकी कामधेनु, एक वह प्रेयसी है जिसकी छवियाँ उनके चित्रों में कल्पना के रूप में गूँजती है। उन्होंने इस विषय पर कुछ पेंटिंग बनाईं और एक गाय की विशाल मूर्ति बनाई जो बाँसुरी बजाती एक महिला के रूप में रूपान्तरित हुई, ये सब कृतियाँ उनकी व्यक्तिगत दुनिया का सन्दर्भ प्रस्तुत करती हैं। जिसमें, वे और उनकी प्रेयसी दोनों रहस्यमय और वास्तविक दोनों ही रूप में एक-दूसरे का साथ व मिलन तलाशतें हैं और प्रेयसी की तलाश व मिलन दोनों भी तो कामनाएँ ही हैं। यहाँ मनुष्य और कामधेनु दोनों की ही कामनाओं को अभिव्यक्त किया गया है।
समकालीन कलाकारों में विशिष्ट पहचान रखनेवाले सिद्धार्थ अपने चित्रों में रूपाकारों , बिम्बों और टेक्सचर के साथ प्रयोग करते रहते हैं। उनके चित्र भारतीय साहित्य, लोकगाथागीत, पौराणिक कथाओं, संगीत और कविता से जुडे होते हैं। इसके अतिरिक्त जेन, सूफीवाद, ओशो, गुरु ग्रंथ साहिब और तिब्बती बौद्ध धर्म का प्रभाव भी उनकी कलाकृतियों पर देखा जा सकता है। यह प्रभाव आध्यात्मिकता के रूप में उनके सभी चित्रों में परिलक्षित होता है। सिद्धार्थ की कला परम्परा से काफी प्रभावित है। परम्परा के साथ ही वे अपनी कला के माध्यम से समकालीन समाज की छवि और मानस को भी अभिव्यक्त करते हैं। सिद्धार्थ ने डेकोरेटेड काऊ नामक प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसमे उन्होंने गाय पर चित्र, मूर्तिशिल्प, छायाचित्र और वीडियो प्रदर्शित किये थे। चित्र श्रृंखला में सिद्धार्थ गायों को उनके कई आयामों से चित्रित किया है; पौराणिक, लौकिक, माता, अवतार और सामान्य गाय के रूप में भी।
सिद्धार्थ
अपनी इस प्रदर्शनी के बारे में सिद्धार्थ बताते हैं कि मैंने गाय की सुन्दरता, उसके भौतिक वैभव के साथ-साथ उसके आध्यात्मिक महत्व को चित्रित किया है... अपने काम में, मैंने गाय की दन्तकथाओं, लोककथाओं, मिथकों और किंवदंतियों, और सामाजिक-आर्थिक जीवन के बीच एक कडी बनाने की कोशिश की है। एक ओर मानसिक वास्तविकता और दूसरी ओर समाज में गाय की समकालीन सोच और स्थिति।
परन्तु सिद्धार्थ यहाँ सिर्फ गाय की समाज में स्थिति को ही नहीं बयान करना चाहते हैं अपितु वे इस प्रतीक के माध्यम से इससे भी आगे कुछ कहना चाहते हैं मैं हमेशा ऐसी छवियों की तलाश में रहता हूँ जो एक रूपक में बदल सकें। एक कलाकार अपनी प्रस्तुतियों में तब सफल होता है जब वह छवि को उसकी छविवादिता से एक रूपक के स्तर तक ले जा सकता है। मेरा मानना है कि अगर आप छवि को ऊपर की ओर धकेलते हैं, तो यह एक रूपक बन जाता है और इसे नीचे की ओर धकेलता है तो यह एक दृष्टान्त बन जाता है। उस अर्थ में, यदि आप एक गाय की छवि को पूरी दुनिया में महिलाओं का रूपक बनते हुए देख सकते हैं, विशेष रूप से भारत में जहाँ महिलाओं की पूजा की जाती है और एक ही समय में डोरमैटेड किया जाता है। यहाँ सिद्धार्थ कामधेनु के माध्यम से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को ही हमारे समक्ष रखते है। जैसा की कहा गया है कि सिद्धार्थ अपने चित्रों में छवि को रूपक तक ले जाने में विश्वास करते हैं और वे यहाँ भी कामधेनु को न सिर्फ गाय की छवि तक सीमित करतें हैं अपितु वे कामधेनु की छवि को भारतीय महिलाओं की समाज में स्थिति को दर्शाने के लिए एक रूपक की तरह उपयोग करतें हैं। जैसा की सिद्धार्थ का निजी अनुभव है और वैसे भी हम भारतीय समाज में देखते है कि किस तरह हम गाय को एक तरफ तो देवी मानते हैं और दूसरी तरफ ये समाज उसकी अच्छी तरह से देखभाल भी नहीं करता है जब तक उसका उपयोग है, उसे घर में रखा जाता है, भोजन की व्यवस्था होती है, अन्यथा उसे सडक पर लावारिस की तरह छोड दिया जाता है। वह दर-दर भटकती है और कुपोषण का शिकार हो जाती है। सिद्धार्थ भारतीय समाज में स्त्री दशा और दिशा की तुलना गाय से करते हैं। जो समाज स्त्री को देवी का दर्जा देता है, पूजनीय कहता है, वही उसे भोग की वस्तु समझता है, भेदभाव करता है, पुरुष के सामान दर्जा नहीं देता, अधिकारों से वंचित रखता है, सम्मान से जीने का अधिकार तक नहीं देता है, शोषण करता है। समाज की इसी दोहरी मानसिकता को सिद्धार्थ अपने चित्रों में दर्शाने का प्रयास करते हैं।
चित्रकार रमेश गोर्जाला ने कामधेनु विषयक कई चित्र बनाए हैं, उनकी शैली काफी अलंकारिक है। इन चित्रों में उन्होंने पारम्परिक कामधेनु के चित्रों की तरह गाय के शरीर पर स्त्री धड को चित्रित नहीं किया अपितु गाय को ही पंखों के साथ करीब-करीब उडते हुए चित्रित किया है। रमेश ने अपने चित्रों में कामधेनु के शरीर में कामधेनु की ही कथा को चित्रित किया है। जमदग्नि ऋषि के आश्रम में राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन को ऋषि से कामधेनु को माँगते दिखाया गया है साथ ही इस कथा के अन्य प्रसंगों को भी चित्रित किया है।
रमेश गोर्जाला
युगल शर्मा एक पारम्परिक चित्रकार परिवार से सम्बन्ध रखते हैं और नाथद्वारा में उन्होंने काफी समय व्यतीत किया है। इसी कारण उनका श्रीनाथ जी के मन्दिर से काफी गहरा सम्बन्ध है, उनका परिवार काफी समय से मन्दिर में चित्रण का कार्य करता आया है और कामधेनु से युगल शर्मा का पहला परिचय भी बचपन में श्रीनाथ के मन्दिर के चित्रों से ही हुआ। परिणामस्वरूप आज भी हम उनके कामधेनु विषयक चित्रों में श्रीनाथ जी की ही उपस्थिति देखते है। भारतीय कला की विविध शैलियों में समय के साथ रूपान्तरण की झलक देखी जा सकती है। नर्मदाप्रसाद उपाध्याय का कथन है - निरन्तर रूपान्तरित होते रहना संवेदना की विवशता होती है और इस रूपांतरण की जीवन शक्ति इतनी समर्थ होती है कि वह विभिन्न अभिव्यक्तियों में परिवर्तित हो जाती है। यह अभिव्यक्ति अभिजात भी होती है और लोक को दर्शित करने वाली भी। समकालीन कलाकारों में कामधेनु का सांस्कृतिक संदर्भ तो मिलता ही है इसके साथ-साथ वह उसकी प्रतीकात्मक और रूपकात्मक उपस्थिति भी देखी जा सकती है। कृष्ण भगवान् ने भी कहा है कि गायों में मैं कामधेनु हूँ, और श्री कृष्ण की इसी उपस्थिति को हम उनकी कामधेनु में देखते हैं । जिस तरह श्रीनाथजी का
श्रीमुख नाथद्वारा के चित्रों में चित्रित होता है उसी चेहरे की प्रतिछाया को हम युगल शर्मा के कामधेनु के चेहरे में भी देखते हैं। वही चेहरे का तेज, नीलवर्ण, तीखे तेजपूर्ण नेत्र। साथ ही अष्टपद कमल को भी कामधेनु के हाथों में चित्रित किया है जो श्री कृष्ण का ही प्रतीक है।
युगल शर्मा
इस तरह उन्होंने प्रायः कामधेनु के प्रारंपरिक रूप को ही अपनी विशिष्ट शैली में चित्रित किया है, परन्तु इच्छापूर्ति करने वाली गाय के रूप में नहीं अपितु भगवान् के रूप में। कामधेनु की पृष्ठ भूमि में चित्रित स्वर्ण पीपल भगवान् श्रीकृष्ण की ही उपस्थिति दर्शाता है। यहाँ युगल शर्मा सृष्टि और सृष्टा के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध की और संकेत करते हैं।
समकालीन भारतीय कला में कामधेनु की उपसिथति के अनेक आयाम हैं। पौराणिक और मिथकीय चेतना से प्रभावित चित्रण सहज है। कला का प्रयोगवादी संदर्भ विषय और शिल्प की गत्यात्मकता के साथ उपस्थित होता है और चित्र-शैली और चित्रकार का आभामण्डल उसे प्रभावित करता ही है। कलाकारों ने कामधेनु को सन्दर्भ के रूप में लिया है और उसे सर्वथा नवीन दृष्टिकोण से चित्रित किया है। कामधेनु पर केन्द्रित चित्रों में चित्रकार के निज व्यक्तित्व, संवेदनाओं और सरोकार को सहज ही चिन्हित किया जा सकता है। प्रकाश वाघमारे का कथन इस संदर्भ में उल्लेखनीय है- चित्र-रचना परंपरा नहीं, दार्शनिक एवं भावनात्मक दृष्टिकोण से तैयार होती है। जैसे हर बात के विविध सन्दर्भ होते हैं , वैसे ही चित्र भी सन्दर्भ-युक्त होते हैं। लेकिन सन्दर्भों को गौण बनाती सृजन प्रक्रिया ही चित्र है। इसी कथन के प्रकाश में यहाँ आलोच्य चित्रों और चित्रकारों की कलाकृतियों में कामधेनु का मात्र सन्दर्भ है, शेष अभिव्यक्ति और अर्थ जितने नवीन हैं उतने सामयिक भी हैं।
संदर्भ
1. https://vigyanam.com
2. शर्मा हरद्वारीलाल. कला दर्शन. साहित्य संगम, इलाहबाद, 2009.
3. मागो प्राण नाथ. भारत की समकालीन कला र्‍ एक परिपेक्ष्य. नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया, नयी दिल्ली, 2012.
4. http://www.gogisarojpal.com/Kamdhenu/B}_PA03.html
5. http://www.gogisarojpal.com/Kamdhenu/B}_PA03.html
6.https://www.sahapedia.org/kamadhenu-the-pleasures-of-giving#:~
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7. सिंह शमशेर बहादुर, अमूर्त कला भोपाल. विश्वरंग, 1श्ाद्य. 3, 2021, श्च. 47.
8. https://www.deccanherald.com
9 https://www.deccanherald.com
10 उपाध्याय नर्मदा प्रसाद. लोक व राज्याश्रय में भारतीय चित्रांकन परम्परा. विश्वरंग, वो.3, 2021, पेज. 17.
11. वाघमारे, प्रकाश. कला-भारती खण्ड-दो. Edited by दइया पीयूष. ललित कला अकादमी,नयी दिल्ली,
2010.

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अम्बालाल स्कीम,
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