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रेतीले धोरों में शब्दों की खेती...क्रांति के बीज

हनुमानराम गालवा
मरुअंचल के पत्र-पत्रिकाओं का स्वाधीनता संग्राम में योगदान
अभाव और अकाल की विपदा के बीच सामन्ती जुल्म और अंग्रेजी हुकूमत की दोहरी गुलामी झेलने वाली मरुधरा के रेतीले धोरों में साहित्य के साधकों ने शब्दों की खेती में क्रांति के बीजों की बुवाई की और संघर्ष की उपज में प्रताडना-अत्याचार सहे। स्वाधीनता संग्राम में मरुअंचल के साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने लोकचेतना को धार दी। आजादी से पहले भारत मार्तंड, हिन्दी साहित्य ग्रन्थावली, मतवाला तथा राजस्थान भारती ने अपने तरीके से तंत्र के शोषण के खिलाफ आवाज मुखर की तो आजादी से कुछ समय ही पहले शुरू हुए दैनिक रियासती ने मारवाड को पाकिस्तान में मिलाने की साजिश का पर्दाफाश कर खोजी पत्रकारिता की मिसाल कायम की।
- हनुमानराम गालवा
मरुअंचल के रिसायती माहौल में जन्मी पत्रकारिता वैचारिक स्वतंत्रता, आजादी के संघर्ष और रियासती जुल्मों की खिलाफ के मुखरित स्वरों में पल्लवित-पुष्पित हुई है। रियासती शासन में 1866 में प्रकाशित रियासती गजट श्मारवाड गजट्स मरुअंचल से प्रकाशित होने वाला पहला पत्र है। इसे जोधपुर गवर्नमेंट गजट, मरुधर मिन्त या मुहिबे मारवाड के रूप में भी जाना जाता है।1 देश में पत्रकारिता का 29 जनवरी,1780 में जेम्स ऑगस्ट हिक्की के चार पृष्ठीय साप्ताहिक पत्र श्हिक्कीज गजट्स माना जाता है, लेकिन राजस्थान में इसके ठीक सात दशक बाद पत्रकारिता ने गजट पत्रों के रूप में गति पकडी।2 मरुअंचल के पहला समाचार पत्र श्मारवाड गजट्स पूरी तरह रियासती नियंत्रण में निकला, लेकिन इस पत्र के संस्थापक सम्पादक रामस्वरूप शमीन3 ने वैचारिक मतभेदों के चलते त्यागपत्र देने का साहसिक कदम उठाकर पत्रकारिता के इतिहास में वैचाारिक स्वतंत्रता और निर्भीकता का बीजोरोपण कर दिया। उन परिस्थितियों में मरुअंचल दोहरी गुलामी की बेडियों में जकडा हुआ था और त्यागपत्र जैसे कदम को रियासती आज्ञा के प्रति बगावत समझा जाता था। मरुअंचल विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों और आर्थिक पिछडेपन के बावजूद राष्ट्र की मुख्यधारा में रहा है। वर्ष 1857 की क्रांति से लेकर आजादी के हर आंदोलन या बदलाव की मुहिम की मुख्यधारा में रहे मरुअंचल की पत्रकारिता के तेवर भी बेबाक और निर्भीक रहे हैं।
अभाव और अकाल की विपदा से जूझ रहे रेगिस्तानी क्षेत्र मरुअंचल के लोगों की संषर्घ क्षमता और सहनशीलता भी अद्भुत है। इसी जीवटता ने यहाँ के लोगों को तलवार और कलम का धन बना दिया। यहाँ के योद्धा जिस शौर्य और पराक्रम से रणभूमि में परास्त करते हैं, उसी क्षमता से शांतिकाल में साहित्य और लोक साहित्य का सृजन कर कलम का लोहा मनवाते हैं। रियासती शासन में सामन्तों के सहयोग से पनपी पत्रकारिता की आवाज को सामन्ती व्यवस्था से कभी नहीं दबी। पत्रकारिता का स्वर हर स्तर पर न्याय का हिमायती और अत्याचार-शोषण का प्रखर विरोधी रहा। जुल्म चाहे सत्ता को रहा हो अथवा किसी व्यक्ति विशेष का, पत्रकारिता ने जनभावना को अभिव्यक्ति देकर संघर्ष का मोर्चा ही नहीं सँभाला, बल्कि नेतृत्व भी किया। मरुअंचल में कलम के सिपाहियों ने शब्दों की खेती में क्रांति के बीज बोए और संघर्ष-त्याग की तपस्या से उसे पल्लवित-पुष्पित किया। खुद जुल्म सहकर भी भावी पीढी के लिए प्रेरणा बन गए।
मारवाड को पाकिस्तान में
मिलाने की साजिश का भण्डाफोड
देश को आजादी मिलने के बाद रियासतों के विलय की प्रक्रिया के दौरान जनमत निर्माण और राजा-महाराजाओं पर दबाव बनाने में तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं की अहम भूमिका रही है। स्वाधीनता सेनान एवं जाने-माने साहित्यकार सुमनेश जोशी ने जोधपुर से 1945 के आखिर में दैनिक रियासती शुरू किया। 20 अगस्त,1947 के संस्करण में उन्होंने राजपूताने के जागीरदारों और नवाब भोपाल के मंसूबे पूरे नहीं हुए4 शीर्षक से मारवाड को पाकिस्तान म मिलाने की साजिश का भण्डाफोड किया। यह खबर इस अखबार का अंत साबित हुई। हालांकि साजिश का भण्डाफोड होने के बाद जनता सडकों पर आ गई थी। दबाव में तत्कालीन मारवाड नरेश हनुवंत सिंह को भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने पडे। चुनावी राजनीति में उतरने के बाद हनुवंत सिंह को इस प्रकरण तथा पहले स्वाधीनता दिवस पर ध्वजारोहण के समय काला साफा पहनकर आने को लेकर सफाई भी देनी पडी। दैनिक रियासती में उप संपादक रहे गाँधीवादी चिंतक नेमिचन्द्र जैन भावुकय5 के मुताबिक मारवाड को पाकिस्तान में मिलाने की साजिश का भण्डाफोड करने के बाद अखबार के दतर पर सामन्ती कहर टूट पडा। छापाखाना जब्त कर लिया गया। अखबार की प्रतियों को लोगों के घरों से एकत्र करके जलाया गया। अखबार के सम्पादक सुमनेश जोशी सहित पूरे स्टाफ को लम्बे अर्से तक भूमिगत रहना पडा।
स्वतंत्रता पूर्व की प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ
और उनका योगदान
आजादी से पहले मरुअंचल से चार साहित्यक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। इनमें भारत मार्तंण्ड और मतवाला का प्रकाशन व्यक्तिगत प्रयासों से हुआ, जबकि हिन्दी साहित्य ग्रंथावली और राजस्थान भारती का प्रकाशन संस्थागत प्रयासों से हुआ। साहित्यिक पत्रकारिता को गति देने के व्यक्तिगत और संस्थागत प्रयास व्यापक आधार नहीं पा सके। नतीजतन ये पत्र-पत्रिकाएँ दीर्घायु नहीं हो पाईं।
भारत मार्तण्ड : जोधपुर से यह पत्र चैत्र संवत् 1955 (सन् 1898) को आरम्भ हुआ। अब तक के शोध निष्कर्षों के आधार पर इस मासिक पत्र को राजस्थान का पहला साहित्यिक पत्र माना गया है।6 हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर तत्कालीन पत्रकारिता के क्षेत्र में इस पत्र का कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं रहा है। पत्रकारिता की दृष्टि से इस पत्र की भूमिका अनुवाद पत्रकारिता तक सीमित रही। फिर भी इस पत्र ने कुछ रचनाकारों को प्रमुखता से स्थान देकर पत्रकारिता को नई दिशा देने का सार्थक प्रयास किया।
हिन्दी साहित्य ग्रन्थावली : आबू रोड से 1910 में प्रकाशित मासिक हिन्दी साहित्य ग्रन्थावली का उल्लेख कई पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में मिलता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ग्रन्थावली में नवोदित रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाशित होती थी।
मतवाला : हास्य-व्यंग्य विधा को लेकर जोधपुर से 1940 में प्रकाशित हुआ यह पत्र शुद्ध रूप से साहित्यिक था। इस पत्र को राजस्थान का हास्य-व्यंग्य का पहला पत्र माना जाता है। इस पत्र में सामन्ती शोषण एवं अंग्रेजी हुकुमत की कार्यप्रणाली को लेकर व्यंग्य से तीक्ष्ण प्रहार कर तत्कालीन परिस्थितियों को रेखांकित किया है। तीन साल चले इस पत्र राष्ट्रीय पत्रकारिता के इतिहास में भी सम्मानजनक दर्जा है।7
राजस्थान भारती : बीकानेर से 1946 में साहित्यिक शोध पत्रिका के रूप में आरम्भ हुई इस पत्रिका ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। सामग्री चयन और पृष्ठ सज्जा की दृष्टि से वर्तमान साहित्यिक पत्रिकाओं को मात देने वाली यह पत्रिका भी
हथाई की चौपाल पर पहुँचा साहित्य
मरुअंचल में आजादी से पहले रियासतीकाल में प्रकाशित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने साहित्यिक रचनाओं को एक सीमित पाठक वर्ग के दायरे से निकालकर आम पाठक वर्ग तक सार्वजनिक तौर पर सहज और सरल रूप में पहुँचाने का श्रीगणेश किया। पुस्तकों में सिमटा साहित्य सार्वजनिक रूप से पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हथाई की चौपालों तक पहुँचा। इस स्थिति में साहित्यिक रचनाओं एवं साहित्यकारों का मूल्यांकन भी नए सिरे से होने लगा। इन पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाज का मध्मम वर्ग तथा उपेक्षित तबका भी प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से साहित्य से जुड गया। पुस्तक के रूप में उपलब्ध साहित्य समीक्षा से दूर होता है। पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं पर सार्वजनिक तौर पर टीका-टिप्पणियाँ, समीक्षा और छींटाकशी होती है। लिहाजा, दमदार साहित्यिक रचना ही पाठकों की कसौटी पर खरी उतरकर सम्मानित दर्जा हासिल कर पाती है।
कोपभाजन का शिकार
स्वतंत्रता संग्राम के दौर में जन्मी पत्रिकाओं पर संघर्ष की उस लहर की छाया पडना स्वाभाविक था। स्वतंत्रता संग्राम में इन पत्रिकाओं ने युवाओं को प्रोत्साहित करने के साथ वैचारिक स्वतंत्रता के संघर्ष का भी मोर्चा संभाला, जिसका सीधा सरोकार देश की आजादी से रहा। राष्ट्रवादी भावना के चलते सम्पादकों को तत्कालीन रियासती सरकार के कोपभाजन का शिकार बनना पडा। सामन्ती ज्यादतियों का सामना करते हुए स्वतंत्रता संग्राम के स्वर मुखरित करने में इन पत्रिकाओं ने अहम् भूमिका का निर्वाह किया।
अल्पजीवी, पर स्वर्णिम इतिहास
स्वतंत्रता पूर्व मरुअंचल से मात्र चार साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई। इन चारों ही पत्रिकाओं ने पत्रकारिता को नए आयाम दिए। अल्पजीवी रही इन पत्रिकाओं का साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय रहा है, लेकिन सभी पत्रिकाएँ आर्थिक तंगी के चलते विधा विशेष में अपना स्वर्णिम इतिहास रचकर इतिहास के पृष्ठों में समा गई। उस समय आर्थिक मदद जुटाने के लिए आज की तरह कोई विज्ञापन व्यवस्था नहीं थी। वित्तीय संसाधन केवल चन्दे या सम्पादक की जमा पूंजी तक सीमित थे। आर्थिक संकट और वितरण व्यवस्था के अभाव के चलते आजादी से पहले प्रकाशित पत्रिकाएँ लंबे समय तक नहीं टिक पाईं। इन पत्रिकाओं का उद्भव तो एक बडी छलाँग के रूप में हुआ और अन्त शिखर से फिसल जाने के रूप में सामने है। प्रत्येक पत्रिका का इहिास उसी के साथ सिमट गया।



संदर्भ
1.गुप्ता निबन्धावली-बालमुकुन्द गुप्त पृष्ठ 361-365
2. एनल्स इण्डिया मेल-1858 पृष्ठ 944, तासी.त हिस्ट्री भाग-2 पृष्ठ 338
3. डॉ. महेंद्र कुमार लोढा मधुप का शोध राजस्थान में साहित्यिक पत्रकारिता
4. राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण, आधी रात को आजादी
-डोमिनीक लापिएर और लैरी कॉलिन्स, राजस्थान के भूले बिसरे पत्रकार- आर्येन्द्र उपाध्याय
5. राजस्थान के साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के समीक्षात्मक अध्ययन शोध के संदर्भ में लिया गया साक्षात्कार
6. डॉ. महेंद्र कुमार लोढा मधुप का शोध राजस्थान में साहित्यिक पत्रकारिता
7. हिन्दी पत्रकारिता के विविधि आयाम-डॉ. वेदप्रताप वैदिक


सम्पर्क - ग्राम/पोस्ट - भटनोखा तहसील मूँडवा
जिला- नागौर (राजस्थान) 341028
ई मेल - hanumangalwa@gmail.com