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नरेश सक्सेना की कविताएँ : विज्ञान और प्रकृति

अरुण देव
नरेश सक्सेना समकालीन हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि हैं। महत्त्वपूर्ण इस अर्थ में कि हिन्दी कविता को उन्होंने पहली बार विज्ञान की अवधारणाओं से जोडा, अब यह जो जोड है उसमें ऐसा नहीं कि कोई किसी को ढो रहा है। वो कविताएँ खराब होती हैं जो किसी सिद्धान्त या तकनीक की गुत्थी सुलझाने के लिए लिखीं जाती हैं। लिखी तो कविता ही जा रही है, हवा, पानी, प्रकाश, मिट्टी, फूल, चट्टान इन्हें कवि आरम्भ से ही देखते आ रहें हैं, नरेश इसकी वैज्ञानिक संरचना तक चले जाते हैं। उनके बनने, टूटने और उनके गुणों को जो अब तक कविता में नहीं थीं, उन्हें कविता में सृजित करते हैं।
वे अपना कविसमय रचने वाले विरल रचनाकार हैं। उनका कविसमय अब तक अर्जित नवीनतम ज्ञान पर आधारित है। वह तार्किक और वैज्ञानिक है। कल्पना और संभावना से आगे बढकर वह वास्तविकता तक जाने वाले कवि हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने एक जगह विज्ञान और कविता के अन्तर को इस तरह अलगाया है- विज्ञान भौतिक जगत के कारण, कार्य और सामान्य धर्म के अध्ययन के द्वारा इस जगत की एक युक्तिसंगत और बुद्धिगम्य व्याख्या उपस्थित करता है। काव्य ऐसा नहीं करता। वह कार्य कारण-परम्परा की खोज में सिर नहीं खपाता, और फिर भी इस जगत के अन्तर्निहित सत्य को उससे समझा जा सकता है। विज्ञान काव्य नहीं है।
विज्ञान कविता नहीं है ठीक उसी तरह जिस तरह कविता विज्ञान नहीं है। दोनों अलग-अलग रहें एक बात है और दोनों कहीं जुडे और कविता बची रहे यह अलग बात है। नरेश अपनी कविता में विज्ञान को ले आते हैं और कविता बची रहती है। अपनी भूमिका में वह लिखते हैं- कविता निश्चित ही विज्ञान से कुछ ऊपर की चीज है, नीचे की नहीं।
नरेश सक्सेना ने कविता और विज्ञान के आपसी सम्बन्धों पर विचार किया है। उन्होंने हिन्दी कविता को विज्ञान से काट दिए जाने को दुर्घटना माना है। जो भाषा अपने समय के विज्ञान से कटी हो, वह कितने दिनों तक ज्ञान की भाषा बनी रह सकती है! सिर्फ हिन्दी ही नहीं, हमारे देश की सारी भाषाएँ विज्ञान की सहज अवधारणाओं, मुहावरों और शब्दावली से कट गयी हैं।
यद्यपि विज्ञान शब्द का कविता के साथ उपयोग पुराना है, कवि केशवदास ने 1610 ईस्वी में विज्ञानगीता लिखी थी। 1653 में कवि अक्षर अनन्य के विज्ञानयोग का पता चलता है। आचार्य शुक्ल ने झाँसी के कवि नवलदास कायस्थ की चर्चा अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में की है जिन्होंने 1821 ईस्वी में विज्ञानभास्कर गन्थ की रचना की थी। यह विज्ञान आज के साइन्स का पर्यायवाची नहीं है। योग, अध्यात्म, खण्डन-मण्डन आदि विषयों को उस समय विज्ञान कह दिया जाता था, काव्य-तत्व इनमें कम होता था।
कविता में वैज्ञानिक मुहावरों या शब्दावली के प्रयोग के समक्ष दो तरह की चुनौतियाँ हैं, एक तो इसकी परम्परा हिन्दी कविता में नहीं है, दूसरी कविता के जटिल हो जाने का खतरा बराबर बना रहता है। ऐसी दशा में नरेश सक्सेना सावधानी और धैर्य से काम लेते हैं, वह कविता में वह जगह तलाशते हैं, जहाँ विज्ञान को इस तरह रखा जाए कि सहजता और संप्रेषणीयता बनी रहे। वरिष्ठ कवि-लेखक विष्णु खरे समुद्र में हो रही है बारिश के फ्लैप पर बहुत अच्छी बात कहते हैं- वे शायद हिन्दी के पहले कवि हैं जिन्होंने न तो विज्ञान को सरलीकृत किया है और न कविता को गरिष्ठ बनाया है।
नरेश सक्सेना की कविताएँ आस-पास घटित को जिज्ञासा के साथ देखती हैं, विज्ञान वहाँ मदद करता है और अन्त तक पहुँचते-पहुँचते कविता किसी बडे सत्य की ओर इशारा करने लगती है। यह अपने समय के सत्य को समझने और उसे इंगित करने में कविता और विज्ञान की जुगलबन्दी है जिससे एक नया स्वर फूटता है जिसमें विवेक और लालित्य दोनों का साथ अन्त-अन्त तक बना रहता है।
पहले संग्रह समुद्र पर हो रही है बारिश की पहली कविता हिस्सा पानी, नमक, लोहे की बात करते-करते अन्याय के प्रतिरोध में बहते खून और समाज की बेहतरी में बह रहे पसीने में अपनी भागीदारी तक चली जाती है। नरेश सक्सेना की कविता का लक्ष्य पूरा ब्रह्माण्ड है। वह पूरी धरती के लिए लिख रहें हैं। इसी तरह से रोशनी कविता भी प्रकाश की वैज्ञानिक विशेषताओं से होती हुई मन और तन के काले पन से उलझती है।
नरेश सक्सेना शिल्प को उसकी अन्तिम सुगढता तक पहुँचाने वाले कवि हैं, हर शब्द पर उनकी छाप है आप उसकी जगह दूसरे शब्द के विकल्प के विषय में सोच भी नहीं सकते। यही कारण है कि छह दशकों की रचनाशीलता के बाद उनके पास दो ही कविता संग्रह हैं। उनकी कविताएँ अक्सर रचनात्मक तनाव को तीव्र करती हुई अन्तिम पंक्ति पर पहुँचकर अर्थ विस्फोट करती हैं, उसकी धमक देर तक बची रहती है। जैसे उनकी कविता- धातुएँ, तत्व के रुप में धातु की पूरी यात्रा यहाँ है और अन्त में वह हिम्मत में बदल जाती है।
दूसरे संग्रह सुनो चारुशीला की कविता मछलियाँ भी इसी तरह की कविता है। संवाद की स्वाभाविक नाटकीयता से शुरू होकर यह कविता पर्यावरण और पालतू जीवों पर हमारी हिंसा तक पहुँचती है। जब इस कविता में बच्ची कहती है कि पापा मछली के पास साफ पानी लिखना तब ऐसा लगता है कि एक्वेरियम में गंदे पानी में मरी मछलियों की लाशें बाहर आ गयीं हैं।
मिट्टी से ईंटों का बनाना सबने देखा है, पर जिस तरह से नरेश सक्सेना देखते हैं वह पहली बार देखना है और हिन्दी कविता की उपलब्धि है। ईंटें भट्टे की समाधि से निकल कर वास्तुविद् के सपने में विलीन हो जाती हैं। इसी कविता में ये पंक्तियाँ आती हैं-
ईंटें भला क्या चाह सकती हैं
ईंटें शायद चाहें कि वे बनाएँ जो घर
उसे जाना जाए थोडे-से प्रेम थोडे-से त्याग और
थोडे-से साहस के लिए
ईंटें अगर सचमुच यह चाहें।
सीमेंट कविता घर बनाने के लिए टूट रहें हैं पहाड के निष्कर्ष तक जाती तो है, पर इस बीच चट्टानों के सीमेंट में बदलने की प्रक्रिया कुछ इस तरह से सामने आती है कि लगता है वह कोई मेहनतकश है जो पिसते, तपते, तडकते हुए खम्भों को थाम रहा है, दरारों को भर रहा है। अपने पर्यावरण को देखने का यह मानवीय नजरिया नरेश सक्सेना की अधिकतर कविताओं में आप देखेंगे।
कविता और विज्ञान के सन्दर्भ में नरेश सक्सेना की बहुचर्चित कविता गिरना देखनी चाहिए, जो उनके दूसरे संग्रह सुनो चारुशीला में संकलित है और अपेक्षाकृत आकार में बडी भी है। इसमें ईस्वी 1564 में जन्में इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो का जिक्र आता है। गैलीलियो पृथ्वी की जगह सूर्य के केंद्र में होने के तथ्य को उजागर करने के लिए जाने जाते हैं जिसके लिए उन्हें चर्च का कोपभाजन भी बनना पडा था। भारी चीजें हल्की चीजों की तुलना में जल्दी गिरती हैं। इस मान्यता के खण्डन के लिए भी वे जाने जाते हैं। कहते हैं पीसा की झुकी हुई मीनार से उन्होंने हल्की और भारी चीजों को फेंक कर इसका खण्डन किया था। कवि इस घटना को समकालीन पतन से जोड देता है और कहता है कि
चार सौ बरस बाद
किसी को कुतुबमीनार से
चिल्ला कर कहने की जरूरत नहीं है
कि कैसी है आज की हवा
और कैसा इसका हस्तक्षेप
कि चीजों के गिरने के नियम
मनुष्यों के गिरने पर लागू हो गए हैं।
कवि गिरने की प्रक्रिया को विराट मानवीयता से जोडने हुए अन्त में अन्याय और अनाचार पर वज्रपात की तरह गिरने का आह्वान करता है। इस बीच गिरने के अन्य मनुष्योचित जगहों की भी वह तलाश करता है जैसे बर्फ की तरह गिरना जहाँ से मीठी नदियाँ फूटती हैं, प्यासे हलक में एक घूँट जल की तरह गिरना, दुःख में आँसू की एक बूँद की तरह, खेलते बच्चों के बीच गेंद की तरह, कोंपल की जगह खाली करते हुए पतझर की पहली पत्ती की तरह गिरना, नींव में ईंट की तरह।
विज्ञान अगर सत्य की अनवरत खोज है, तो ये कविताएँ उसके साथ मिलकर उसे मानवीय बनाती हैं, उसे अस्तित्व विरोधी तत्त्वों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं।
तापक्रम के कम होने का पानी पर जो असर होता है उसकी तथ्यता को मछलियों के सन्दर्भ में देखते हुए नरेश सक्सेना सुन्दर कविता सम्भव करते हैं- पानी क्या कर रहा है। चार डिग्री के तापक्रम तक पहुँचकर वह ऊपर आने लगता है और गिरते हुए तापक्रम के साथ बर्फ बनकर सतह पर जम जाता है जिससे मछलियाँ जिन्दा रह सकें। जाहिर है कविता का लक्ष्य इस तथ्य का निरूपण भर नहीं है वह इस प्रश्न पर जाकर टिकती है कि पानी के प्राण मछलियों में बसते हैं, तो आदमी के प्राण कहाँ बसते हैं ?
नरेश सक्सेना के यहाँ प्रकृति चित्रण के लिहाज से नहीं आती है, वह अपने वैभव और उसकी रक्षा की मानवीय नैतिकता में खिलती है। इस सन्दर्भ में विष्णु खरे लिखते हैं- और यहाँ प्रकृति से अभिप्राय किसी रूमानी, ऐन्द्रिक शरण्य नहीं बल्कि पृथ्वी सहित सारे ब्रह्मांड का है, वे सारी वस्तुएँ हैं जिनसे मानव निर्मित होता है और वे भी जिन्हें वह निर्मित करता है।
वृक्ष के बचे रहने की कामना में अपनी एक कविता में कवि यह इच्छा व्यक्त करता है कि उसका संस्कार विद्युत शवदाह में हो जिससे कि बेटे बेटी के साथ वह वृक्ष भी बचा रहे जिस पर गौरेये का बास है और जिसपर गिलहरियों का आना जाना है जो उसके शव के साथ जला दिया जाएगा।
कई बार प्रकृति अपनी अनश्वरता की घोषणा के साथ आती है, जैसे वह चेतावनी दे रही हो। घास जैसी बार-बार कुचली जाने वाली चीज भी महल के मीनारों और किले की दीवारों पर उग आती है, उन्हें ध्वस्त करने का जैसे उसने कोई रास्ता निकाल लिया हो।
पृथ्वी को उसकी सहनशीलता के कारण माता कहा गया है पर जब नरेश सक्सेना उसे स्त्री कहते हैं, तो इसलिए कि प्रकृति अपने ताप, दबाव और आर्द*ता के कारण कोयले को हीरे में बदलने की क्षमता रखती है ठीक स्त्री की तरह जिसके पास मनुष्यता गढने का हुनर है। दोनों के पास रहस्य की अनगिनत परतें हैं।
प्रकृति हमेशा शस्य-श्यामला नहीं रहती उसमें सूखा और ठूँठ भी आते हैं। उसके इस पक्ष का बखान हिन्दी कविता में नहीं हुआ है अगर हुआ भी तो रूपक या प्रतीक के रूप में या अधिक से अधिक मुख्य सत्य को उद्भासित करने के लिए नेपथ्य में। नरेश सक्सेना उसे केंद्र में लाते हैं-
हाँ, पीली पडती घास है पैरों के पास
मुरझाते हुए फूल हैं और
पत्तियाँ सूखी हुई मेरे चारों तरफ उडतीं।
प्रकृति के मोहक, उदात्त चित्रों के बनिस्बत जगह-जगह उसका यथार्थवादी रंग देखने को मिलता है। सुबह के अप्रतिम चित्र कविताओं में भरे पडे हैं, पर सूरज की हर शाम हत्या होती है और रोशनियों के कटे हुए सिर खम्भों पर टाँग दिए जाते हैं यह नरेश सक्सेना ही लिख सकते हैं। फूलों का रोना और मछलियों की चीख भी वह सुन सकते हैं। कौवे कविता में वह रंग भेद को उजागर करते हुए कहते हैं कि उनका काला होना ही उनके दुखों का कारण है और शायद उनके काँव-काँव को हम इसीलिए पसंद नहीं करते भले ही वह उनका रुदन हो। इसी तरह नीम और चीड की साधारण पत्तियां कविता में अपने असाधारणता के साथ सामने आती हैं। फूल कुछ नहीं बताएँगे कविता में फूल से इत्र बनने की प्रक्रिया में मनुष्य को शर्मशार करती हुई प्रक्रिया का चित्रण है जिसमें वे अपनी सूखी हुई काया, निचुडी हुई आत्मा और उबली हुई आँखों से सबको देखते हैं।
सन्दर्भ :
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, साहित्य सहचर, लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद, संस्करण-2002, पृ. 41
सुनो चारुशीला, नरेश सक्सेना, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, संस्करण 2012, पृ. 9
सुनो चारुशीला, नरेश सक्सेना, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, संस्करण 2012, पृ. 9
समुद्र पर हो रही है बारिश, नरेश सक्सेना, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2001, पृष्ठ र्‍ 20
सुनो चारुशीला, नरेश सक्सेना, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, संस्करण 2012, पृ. 22
समुद्र पर हो रही है बारिश, नरेश सक्सेना, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2001, फ्लैप
समुद्र पर हो रही है बारिश, नरेश सक्सेना, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2001, पृ. 52

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