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कथेतर : विविध विमर्श

कृष्ण बिहारी पाठक
किसी लक्षित परम्परा के अभाव में और सुनिर्दिष्ट सैद्धांतिकी के नियमों और बन्धनों से मुक्तप्रायः अनायास ही कोई नवागत विधा या विधाएँ जब अल्प अवधि में ही अपने पूरे पराक्रम के साथ सामने आती है, तो सुखद आश्चर्य होता है। हिन्दी साहित्य के आधुनिक कालखण्ड में गद्य का एक साथ अनेक अनेक विधाओं में अवतरित होना ऐसा ही सुखद अचंभा है।
हिन्दी का साहित्येतिहास लिखते समय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आधुनिक काल में गद्य के आविर्भाव को इस काल की सबसे प्रधान साहित्यिक घटना कहा है, यह बात ध्यान देने योग्य है। ध्यान देने योग्य इसलिए कि साहित्य की चली आती हुई काव्य परम्पराओं के बीच से अचानक गद्य का उदय होता है वह भी पराक्रम की सम्पूर्ण अभिनव विभा के साथ। शुक्ल जी ने गद्य के इस पराक्रम को प्रधान घटना क्योंकर कहा, वे स्पष्ट करते हैं -
इस थोडे से काल के बीच हमारे साहित्य के भीतर जितनी अनेकरूपता का विकास हुआ है उतनी अनेकरूपता का विकास कभी नहीं हुआ था।1
यहाँ यह लिखकर बताना आवश्यक नहीं कि यह अनेकरूपता गद्य की अनेक विधाओं के रूप विधान की विशिष्टता को इंगित करती है जिसे हम पहले-पहल भारतेन्दु युग में अपने सामने पाते हैं।
भारतेन्दु युग के लेखकों और विशेषतः भारतेन्दु ने गद्य लेखन की विभिन्न पद्धतियों को विधागत स्वरूप और सौंदर्य देना प्रारंभ कर दिया था। अकेले भारतेन्दु में ही इस विधागत अनेकरूपता का दिग्दर्शन पूरे आत्मविश्वास के साथ होता है। -
भारतेन्दु के गद्य के विविध रंग हैं- नाटक का जीवंत संवादपरक गद्य, उपन्यास का अंकनपरक, पत्रकारिता - निबन्ध, जीवनी - वृतान्त - यात्रावृत्त का वर्णनात्मक-वैचारिक और आलोचना का चिंतनपरक गद्य।... नाटक आख्यान के सर्जनात्मक गद्य से लेकर जीवनी-आत्मकथा-यात्रावृत्त का अकाल्पनिक गद्य, निबन्ध- आलोचना का विचार- गद्य, इतिहास-समाज परिचय का वर्णनात्मक गद्य, पत्र और पत्रकारिता तक का अनौपचारिक सूचनात्मक गद्य उनके यहाँ द्रष्टव्य है।2
एक साथ इतने विविधतापूर्ण रंगों को लेकर गद्य का यह आगमन किसी कलावन्त की पेशकारी से मिलाकर देखना चाहिए जो रंगमंच पर आते ही अपनी कलात्मक छवियों की सम्भावनाओं का थोडा थोडा परिचय छोटे ही कलेवर में प्रस्तुत कर देता है। भारतेन्दु-द्विवेदी युग में इन विधाओं की पारस्परिक स्थिति भेदाभेदमूलक ही रही।
धीरे-धीरे इन गद्य- रूपों का विभाजन - वर्गीकरण स्पष्टतर - कठोरतर होता है, और फिर सर्जनात्मक आधुनिकता के दूसरे दौर में ये सभी रूप क्रमशः एक दूसरे में विसर्जित होने लगते हैं।3
एक दूसरे में विसर्जित होने के बाद भी गद्य ये सभी रूप रंग विधागत स्वायत्तता अर्जित कर अपनी स्वतन्त्र पहचान कायम करते हैं, यह बात हमारे काम की है। स्वातन्र्त्र्य चेतना गद्य का मूल स्वभाव है जो उसे कविता से विशिष्ट बनाता है। कविता जहाँ अभिव्यंजना के लिए प्रतीक, उपमान और अलंकारों के आवरण का सहारा लेकर चलती है, वहीं गद्य बेबाकी से पारदर्शी अभिव्यक्ति को आतुर रहता है।
लेखन की किसी पद्धति विशेष को स्वायत्त साहित्यिक विधा बनने के लिए तीन बातें आवश्यक होती हैं। मात्रात्मक प्रचुरता, गुणात्मक उत्कर्ष और वस्तु एवं शिल्प की मौलिकता।
मौलिकता ऐसी जिसे वैशिष्ट्य के रूप में रेखांकित किया जा सके और जो अन्य निकटवर्ती विधागत अनुशासनों से उस विधा विशेष को अलगा कर दिखा सके। प्रचुरता इतनी कि उस विधा विशेष में अन्तर्निहित समस्त सम्भावनाओं का अभिनिवेशन किया जा सके। उत्कर्ष इतना समुन्नत कि समकालीन प्रचलित अन्यान्य विधाओं के बीच वह अविचल रहती हुई वह कालचक्र को भेदकर पार जा सके।
सर्जनात्मक आधुनिकता के प्रारंभिक दौर में प्रायः वे गद्य विधाएँ प्रचुरता के साथ सामने आईं जिनमें कथा तत्व और कल्पना तत्त्व की प्रधानता थी। निबन्धों की बात अभी छोड दें, तो गद्य की कथा प्रधान विधाओं नाटक, कहानी और उपन्यासों का लेखन भारतेन्दु - द्विवेदी युग में प्रचुरता, मौलिकता और गुणात्मकता के साथ हुआ। इस प्रचुरता का पहला लाभ तो यह हुआ कि कथा विधाओं की एक सैद्धांतिकी अथवा शास्त्र का निर्माण आसानी से हो गया तथा दूसरा लाभ यह हुआ कि इन्होंने गद्य की अन्य शेष विधाओं से पृथक स्वायत्त पहचान स्थापित कर ली। इस प्रकार कथा गद्य और कथेतर गद्य के दो बडे वर्गों के निर्माण की नींव तैयार हुई, यद्यपि उस समय तक अन्य विधाओं के लिए कथेतर संज्ञा प्रचलित नहीं हुई थी। इन अकाल्पनिक गद्य रूपों के लिए कथेतर संज्ञा का प्रचलन इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में होने लगा।
हिन्दी साहित्य के इतिहास में छायावाद युग का अपना विशेष महत्त्व है। इस युग की सृजनात्मकता के मूल में बन्धन मुक्ति और स्वाधीन चेतना का प्रबल आग्रह विद्यमान है। छन्द के बन्धनों से मुक्ति की चाह में निराला द्वारा मुक्त छन्द का प्रवर्तन हो अथवा रामचन्द्र शुक्ल द्वारा विदेशी साहित्य पद्धतियों से मुक्त होने की चेतावनी। इसीलिए यह अप्रत्याशित नहीं कि तत्समय साहित्य के सभी प्रचलित रूपों में भारतीयता का प्रबल आग्रह वर्तमान है।
और इस आग्रह का परिणाम यह हुआ कि विदेशी प्रभाव से प्रेरित सभी साहित्यिक विधाओं का भारतीयकरण होना प्रारम्भ हो गया।इस मौलिक चेतनता और सजगता का शुभ प्रभाव यह रहा है कि सभी विधाओं ने अपनी मूल प्रवृत्ति को चिह्नित कर गहरा करना शुरू कर दिया। यह चिह्नीकरण एक ओर इन विधाओं की स्वतन्त्र पहचान के रूप में देखा गया, तो दूसरी ओर निकटवर्ती विधाओं के बीच वैशिष्ट्य के रूप में।
साहित्य ही नहीं किसी भी ज्ञानात्मक अनुशासन के लिए यह आवश्यक शर्त है कि उसका विकास देशकाल परिस्थिति की सजीवता के बीच हो, तभी वह मौलिक रह सकता है, स्थायी रह सकता है।
कथेतर विधाओं की जो धाराएँ भारतेन्दु - द्विवेदी युग में मन्द-अमन्द गति से चली आ रही थी, सृजनात्मकता के छायावादी युग में वे अभिव्यंजना के विस्तृत मैदान में सम्पूर्ण वेग से प्रवहमान हो उठीं।यद्यपि इनके सामने एक ओर कथा-प्रधान गद्य विधाओं से स्वायत्त पहचान बनाने की चुनौती की चट्टानें मार्ग में थीं तो दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की मौलिक सर्जना की चेतावनी कि विदेशी प्रभाव से आगत गद्य विधाओं में केवल ढाँचे तक ही सीमित रहना चाहिए। कथेतर विधाएँ दोनों चुनौतियों को स्वीकार किया और इस स्वीकृति के साथ ही वे आज तक अविरत गतिमान हैं, इतना ही नहीं बहुत शीघ्रता से और पूरी प्रभाविता से ये मनस्विता के बीच अपना स्थान बना चुकीं हैं । यद्यपि चुनौतियाँ और आक्षेप अभी भी इनके मार्ग में है।
कथेतर विधाओं पर एक प्रचलित आक्षेप यह है कि वे साहित्य के अन्य प्रचलित अनुशासनों में अतिक्रम करती हैं, एक ही रचना के किसी अंश में कथात्मकता का सुरुचिपूर्ण सौंदर्य है, तो किसी अंश में निबंध का गंभीर चिंतन। एक ही रचना कहीं से रेखाचित्र, कहीं से संस्मरण तो किसी कोण से कहानी वा आत्मकथा का आभास देती है। विधाओं की यह निर्बाध पारस्परिक आवाजाही किस रूप में देखी जानी चाहिए यह एक महत्त्वपूर्ण विमर्श है। कथेतर की यह चाल उसकी सीमा है अथवा सम्भावना, उसकी दुर्बलता है अथवा पराक्रम, उसका संकुचन है अथवा सामर्थ्य, उसकी स्वरूप है अथवा सौंदर्य, यह पडताल का विषय है।
साहित्यिक अनुशासनों को शास्त्रीय नियमों - विनियमों के औपचारिक बन्धनों में बाँधकर देखने की मानसिकता इन विधाओं की मौलिकता पर पहला हस्तक्षेप है, जिसे ये विधाएँ निरन्तर हतोत्साहित कर रहीं हैं -
विभिन्न विधाओं के साहित्यिक स्वरूप को स्थायी रूप से तय कर देने वाली मानसिकता को इन कथेतर विधाओं ने आपसी आवाजाही से पर्याप्त हतोत्साहित किया है। सुधीजनों ने इसे विधाओं में तोडफोड के रूप में लक्षित करते हुए अक्सर यह स्वीकार किया है कि संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ट, डायरी, जैसी विधाएँ एक- दूसरे से जितनी अलग हैं उससे कहीं ज्यादा लगी हुई हैं। यही नहीं कथा से इतर कही जाने वाली ये विधाएँ बहुधा कथा के भीतर भी अपनी और अपने भीतर भी कथा की पैठ बनातीं हैं।4
कला जगत में यह अतिक्रमण पहली बार नहीं है। अतिक्रमण की यह प्रक्रिया अन्य ललित कलाओं में भी वर्तमान है शास्त्रीय संगीत की राग पद्धति को देखते हैं, जिससे हम प्रत्येक राग में कुछ विशिष्ट स्वर एक विशेष ऋम के साथ उस राग की स्थायी पहचान बनाते हैं। यह स्थायी पहचान राग की पकड कहलाती है। यह पकड ही एक राग को दूसरे राग से पृथक रखती है। राग के सौंदर्य को बढाने के लिए उस राग के प्रचलित स्वरों का अतिक्रमण करते हुए कभी कभी अन्य स्वरों का भी प्रयोग करने की परम्परा है यहाँ तक कि किसी राग विशेष के वर्जित या निषिद्ध स्वर को भी मनाक स्पर्श के नाते गाया बजाया जाता है। राग के मूल स्वरों से इतर स्वरों पर जाने की यह क्रिया संगीत की शब्दावली में तिरोभाव कहलाती है और रागेतर स्वरों से पुनः मूल स्वरों पर लौटने की क्रिया आविर्भाव कहलाती है। आविर्भाव की प्रक्रिया में राग के मूल स्वरूप को पुनः साकार करने का उत्तरदायित्व उसी स्वर समूह पर रहता है, जिसे हम ऊपर पकड कह आए हैं।
भारतीय रस विमर्श में भी यह बात वर्तमान है। स्थायी भाव के उपस्थित रहते हुए विभिन्न संचारी भावों के आविर्भाव तिरोभाव में अतिक्रम-अतिव्यापन का यही सौंदर्यबोध वर्तमान है।
रागांग पद्धति और रस विमर्श में जिस प्रकार यह अतिऋमण या आवाजाही सौंदर्य को बढाने वाली तथा मूल राग और रस के पराक्रम को सिद्ध करने वाली साबित होती है, वही बात कथेतर विधाओं के संदर्भ में समझनी चाहिए, इस रूप में कि ये विधाएँ भी एक-दूसरे के क्षेत्र - परिक्षेत्र में पर्याप्त आवाजाही के बाद भी अपनी स्वायत्तता को बनाए रखतीं हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कबड्डी का कोई निपुण खिलाडी दूसरी पारी में जाकर अपने एक-एक सहधर्मी को छूकर सत्वरता से अपनी सीमा रेखा में प्रवेश कर जाता है। ऐसे खिलाडी की निपुणता, हस्त लाघव मुग्ध कर जाता है। इसी तरह अपनी स्वायत्तता को बनाए रखते हुए सत्वरता से निकटवर्ती विधाओं को स्पर्श करती हुई कथेतर विधाएँ भी आकर्षित करती हैं और गद्य की शक्ति का संपूर्ण प्रसार दिखातीं हैं। कथेतर की इस अदा का मुक्त कण्ठ स्वागत करते हुए रामचन्द्र तिवारी ने लिखा है -
गद्य विधाओं के परम्परागत रूप - बँध टूट रहे हैं। कहानी और उपन्यास में रिपोर्ताज, डायरी, पत्र, संस्मरण आदि विधाओं का रूप-बँध समाविष्ट हो रहा है। समीक्षा में भी नाट्य शैली का प्रयोग होने लगा है। कथा, मुक्त - चिन्तन, नाटक, एकालाप, संस्मरण सब एक दूसरे के निकट आ रहे हैं। यह संश्लेष जीवन की जटिलता की व्यंजना के लिए आवश्यक है। हम इस प्रकृति का स्वागत करते हैं।5
यूरोप से आगत इन विधाओं को भारतीय मनीषा ने अपनी जातीय- सांस्कृतिक मनोसंरचनाओं के अनुरूप अभिनव कौशल के साथ गढ लिया है। विधाओं के बीच का यह अंतर्विधागत संवाद हमारी जातीय चेतना का ही प्रसंस्करण है। एक तरह से यह साहित्यिक सामन्तवाद और औपनिवेशिकीकरण से मुक्ति का जयघोष भी है।
अब हम उस यक्ष प्रश्न पर आते हैं जिसे लेकर हम चले थे, यह कि विधाओं की यह निकटता, पारस्परिक आवाजाही, अथवा अतिऋमण किस रूप में लिया जाए?
पहला वर्ग उन आक्षेपकर्ताओं का है जो कथेतर की इस गतानुगतिकता को विधाओं में तोडफोड , सीमाओं का अतिक्रमण, उल्लंघन की प्रवृत्ति और अनुशासन के अभाव के रूप में देखते हैं। दूसरे वर्ग में इस अतिक्रमण के पक्षधर हैं जो इस विधागत पारस्परिक अतिव्यापन को सौन्दर्यबोध और शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखते हैं।
इस रस्साकशी के बीच कथेतर का गद्य है। कहने की आवश्यकता नहीं इन दो विरोधी वर्गों की खींचतान से उत्पन्न तनाव ने इन विधाओं के शिल्प को और अधिक सजग तथा सावचेत बनाया है। उसका उत्तरदायित्व कुछ और गहरा गया है, उसकी चेतना कुछ और प्रखर हुई है।
आविर्भाव तिरोभाव और अतिव्यापन की प्रवृत्ति उसका नियमित स्वभाव बन गयी है परंतु उसका महत्त्व इस बात को लेकर है कि वह जिस विधा को केन्द्रीय प्रवृत्ति के रूप में लेकर चलता है पूरी रचनात्मकता में आद्यंत उसकी चमक को बनाए रखता है। जिस प्रकार संगीत में राग के पकड के स्वर और रस विमर्श में स्थायी भाव क्रमशः वर्जित - विवादी स्वरों के बीच और संचारी भावों के बीच मजबूती से टिके रहते हैं उसी तरह कथेतर की विधा विशेष अपनी केन्द्रीय प्रवृत्ति को, जीवनरेखा के समान मजबूती से पकडकर चलती है। जिस रचना में यह पकड जितनी अधिक स्थायी, मजबूत और स्पष्ट होगी वह उतनी ही अधिक सफल और स्थायी होगी।
यात्रावृत्त में अनुभव सजग आत्मसाक्षात्कार, गति और परिवर्तनशीलता का सौन्दर्य, आत्मकथा में स्मृति की एकाग्रता, साफगोई, निरपेक्ष - तटस्थ दृष्टि और वर्णन की ईमानदारी, डायरी में अनुभवों की तात्कालिकता और सजीवता, जीवनी में प्रेरणाशीलता और प्रामाणिकता, रेखाचित्र में विषय का रूपांकन, संस्मरण में विषय और विषयी दोनों का रूपांकन, पत्र साहित्य में वैयक्तिकता का आग्रह, रिपोर्ताज में बिम्बात्मकता, सजीवता, विश्वसनीयता और रोमांच आदि इनकी निजी तथा केन्द्रीय प्रवृत्तियाँ है जो इन विधाओं को संज्ञा प्रदान करती हैं।
कथेतर पर दूसरा बडा आक्षेप यह है कि यह कथा से मुक्त है अथवा कथात्मकता की प्रधानता से?
कथेतर में कथात्मकता के सन्दर्भ को निराला के मुक्त छंद की अवधारणा से मिलाकर देखना चाहिए। जिस प्रकार मुक्त छन्द, छन्द से मुक्ति नहीं अपितु छंद के बंधनों से मुक्ति है, उसी तरह कथेतर, कथा से मुक्ति नहीं कथा की प्रधानता से मुक्ति है।
हिन्दी का साहित्य अपने अंतर्वर्ती विकास क्रम में क्रमशः कविता से कथा और कथा से कथेतर की ओर बढता है, यह बात ध्यान देने योग्य है।
हिन्दी का साहित्येतिहास लिखते समय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कृतियों की क्रमिकता और साहित्यिकता दोनों का परीक्षण किया था, और कई कृतियों को पूर्ववर्ती तथा काव्यात्मक होते हुए भी, धार्मिक उपदेश प्रधान या नोटिस(सूचनात्मक ) मात्र होने से साहित्यिक मानने से इन्कार कर दिया था। शुक्लजी के अनुसार वे रचनाएँ साहित्य की कोटि में नहीं आती। कोरी उपदेशात्मकता साहित्य नहीं, उसे धर्मग्रन्थ भले कह लीजिए , केवल तथ्य-सत्य को लिख देना साहित्य नहीं, उसे इतिहास भले कह लीजिए । महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भी इस श्रेणी के लेखन को ज्ञान का साहित्य कहा भाव का नहीं।
साहित्य की कोटि में वे रचनाएँ गिनी जाने लगीं जो कल्पना को विस्तार देतीं हों, संवेदनाओं को जाग्रत करतीं हों, जो संवेगों को उभारने में समर्थ हों और इन सबके साथ उनमें शिल्प का वैभव और कलात्मकता भी हो, और ये सब बातें कविता अपने साथ लेकर आयी इसलिए साहित्येतिहास की एक बडी कालावधि में कविता और साहित्य एक-दूसरे के पर्याय माने गए।
आधुनिक काल में जब गद्य का आविर्भाव हुआ तो समर्थ रचनाकारों ने गद्य को साहित्यिक प्राणवत्ता देकर सत्य, तथ्य और सूचना से ऊपर उठाकर साहित्य बनाने का उपक्रम किया, यद्यपि सर्जनात्मक के प्रारंभिक दो युगों भारतेन्दु - द्विवेदी युग में कल्पना तथा कथा तत्व की प्रचुरता के आग्रह से कथा प्रधान गद्य विधाओं नाटक, उपन्यास, कहानी आदि की ही प्रचुरता रही। इन दोनों युगों की युगपत साहित्यिक पत्रकारिता और निबंध लेखन के महत्व को मैं भूल नहीं रहा हूँ, फिर भी विधाओं की संख्या और विधाओं में अंतर्निहित रचनाओं की प्रचुरता को देखें, तो कथेतर विधाओं को पैर जमाने के लिए भूमि की तलाश अभी बनी हुई थी। जिसे छायावाद युग में आकर महादेवी वर्मा ने अपने समर्थ गद्य से गंतव्य तक पहुँचाया।
कथा तत्त्व की प्रधानता से गद्य विधाओं को मुक्त करते हुए सर्वप्रथम महादेवी वर्मा ने कथेतर गद्य को गौरव प्रदान किया। कथा तत्त्व की क्षीण रेखा के साथ ही सत्य और तथ्य के चित्रण का ऐसा समर्थ गद्य महादेवी ने अवतरित किया जिसमें सहृदय की संवेदनाओं को जगाने की शक्ति थी और जो साहित्य की मूल शर्त है। अर्थात् यदि कोई रचना कथा तत्व की न्यूनता के बाद भी संवेदनाओं को उभारने में सक्षम है, तो उसे साहित्य कहा जा सकता है, कथेतर साहित्य इसी कोटि का साहित्य है । आगे चलकर अज्ञेय, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, रेणु और मुक्तिबोध जैसे साहित्यकारों ने कथेतर को व्यापक स्वीकार्यता प्रदान की।
अब यह बात बहुत पारदर्शी है कि कथेतर होना कथाविहीन होना नहीं है, यह बात और है कि अन्य कथा विधाओं की तुलना में कथेतर में कथा तत्त्व और कल्पना तत्व केंद्रवर्ती प्रवृत्ति के रूप में उपस्थित नहीं रहता। कथेतर की यह संरचनात्मकता ही उसे कथा साहित्य से विशिष्ट बनाती है। असीम अग्रवाल की यह उद्धरणीं यहाँ द्रष्टव्य है -
कथेतर विधाओं की यह विशेषता भी है कि उनमें समाज-दर्शन-अर्थ-संस्कृति - विश्व आदि के सम्बन्ध में जितनी सीधी चर्चा कथा तत्व के साथ जिस तरह हो सकती है, वह कथा साहित्य की विधाओं में सम्भव नहीं। यह कथा साहित्य का कोई अवगुण व कथेतर का कोई विशिष्ट गुण नहीं, बल्कि उनका संरचनात्मक विधान है।6
कथेतर के इस संरचनात्मक विधान में ही इसकी बढती हुई स्वीकृति का रहस्य छुपा हुआ है। रचनाकार कविता और कथागद्य में निहित साहित्यिक समिधाओं को शुचिता के साथ लाकर उन्हें कथेतर की रचना वेदी में आहूत करता है यह उसका पक्ष है। सहृदय पाठक अब जीवन के यथार्थ को और अधिक निकटता से देखना समझना और परखना चाहता है, शैक्षिक - संचार क्रांतियों ने उसे अभिनव दृष्टि प्रदान की है, उसमें तर्क और युक्ति का आग्रह बढा है, कल्पना के अतिरेक से उसे आपत्ति है। कल्पना पर लगे इसी प्रश्नवाचक को देखकर युगीन रचनात्मकता केवल आवश्यकतानुसार कल्पना का पलोथन लगाकर कथेतर को परोसती है। व्यंजनों की क्षणिक लोलुपता रोटी की सादगी पर आकर स्थायी तृप्ति पाती है।
कथेतर के पास अब स्वीकृति है, व्यापक स्वीकृति है, प्रचुरता और गुणवत्ता के साथ यह अनवरत गतिशील है। किसी रचना को साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित होने के जो तीन बातें चाहिए वे इसे प्राप्त हैं - मात्रात्मक प्रचुरता, गुणात्मक उत्कर्ष और वस्तु एवं शिल्प की मौलिकता। प्रतिष्ठा के इन उपकरणों के बाद भी एक बडा परंतुक कथेतर के साथ लगा हुआ है, वह है कथेतर स्वरूप और सिद्धांतों को सुपरिभाषित करने वाले किसी निश्चित शास्त्र अथवा सैद्धान्तिकी का अभाव ।
यद्यपि साहित्य या कला की मौलिकता किसी शास्त्र की अनुगामिनी नहीं और यह भी एक बडा यथार्थ है कि समर्थ रचनाकार प्रत्येक युग में शास्त्रबद्ध रूढियों से ऊपर उठकर रचनात्मकता के अभिनव प्रतिमान गढतें हैं और कालान्तर में ये प्रतिमान शास्त्रबद्ध होकर रूढि बन जाते हैं। ये प्रक्रिया चक्रवत चलती रहती है, परन्तु कथेतर पर आकर यह चक्रीकरण कुछ मन्द पड गया है।
संरचनात्मक विधान की दृष्टि से जैसी विविधता और जैसी तत्परता कथेतर में लक्ष्य की जा रही है वह दुर्लभ है, अचंभित करने वाली है। प्रत्येक नयी रचना पूर्ववर्ती रचनाओं के रास्ते को छेंककर कुछ नवीन और आकर्षक पगडण्डियाँ तैयार कर देती है। विविधता और तत्परता का यह समीकरण शास्त्र निर्माण की प्रक्रिया को स्थायित्व के अवसर नहीं देता।
कविता और कथा विधाओं को ही मुख्य धारा का साहित्य मानने समझने वाले वर्ग का इस सम्बन्ध में यह तर्क है कि कवितेतर, कथेतर विधाएँ साहित्य को समझने में सहायक हो सकती हैं, किन्तु वे स्वमेव साहित्य नहीं है, इसलिए उनके शास्त्र या सिद्धान्त निर्माण का प्रश्न शेष नहीं रह जाता।
कथेतर के शास्त्र और सैद्धांतिकी के अभाव के परंतुक पर एक पूर्ण विराम यह भी हो सकता है कि साहित्य जैसी कलात्मक मौलिकता और प्रवहमान ताजगी को नियमों की बनावट और सिद्धांतों की चौहद्दी में बाँधकर रखना उसकी साहित्यिकता और मौलिकता में व्यवधान है। अतः छोडकर भी निरंतरता बनायी रखी जा सकती है।
वर्तमान रचनात्मकता कथेतर ही क्या किसी भी साहित्यिक अनुशासन के स्वच्छन्द और स्वायत्त अस्तित्व की पक्षधर है। ये पंक्तियाँ देखें -
जबरन किसी विधा में रचना को बाँधना रचना - प्रक्रिया व रचना, दोनों की ही सहजता को बाधित भी करता है। आखिरकार रचना के लिए विधा है, विधा के लिए रचना नहीं। विधाओं की सीमाओं से बाहर जाती रचनाएँ यदि वस्तु के स्तर पर मूल्यवान हों, तब वह अपने प्रयोग के कारण रूप को भी नयी दिशाएँ देती हैं। साथ ही, आज जब कथेतर विधाएँ साहित्य में फल-फूल रहीं हैं, तब यह नयापन उन्हें दीर्घजीवी बनाएगा।7
यह बात ठीक भी है कि रचनात्मकता स्वायत्त होती है, परन्तु शास्त्र या सिद्धांतों का निर्माण वर्तमान पर चलता है, भविष्य की रचनात्मक स्वायत्तता में हस्तक्षेप की अनुमति उसे नहीं दी जानी चाहिए और इस शर्त पर यदि कथेतर के शास्त्र या सिद्धान्तों का निर्माण होता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कविता तथा कथाप्रधान गद्य के समृद्ध शास्त्रों के बीच कथेतर की सैद्धान्तिकी का अभाव अखरने वाली बात है। यद्यपि कथेतर के सिद्धान्त निर्माण के अभी तक कोई बडे प्रयास नहीं हुए हैं फिर भी इस धरती पर सतर्क, सचेत होकर कदम रखे जा सकते हैं।
कथेतर के विविध विमर्शों में से एक विमर्श यह भी है कि रचना और रचनाकार के बीच पारस्परिकता का निर्वहन किस प्रकार होता है। कविता - कथा और कथेतर अनुशासनों के बीच एक रचनाकार की क्या स्थिति है? अथवा किसी रचनाकार की रचना- सृष्टि और रचना - दृष्टि के बीच कथेतर की क्या स्थिति है?
हिन्दी के साहित्यिक विकास क्रम को देखें, तो एक त्रिस्तरीय विस्थापन की गतानुगतिकता लक्ष्य की जा सकती है। वह इस प्रकार है कि प्रथम स्तर पर साहित्य की दृष्टि से कविता से कथा और कथा से कथेतर की प्रचुरता बढी है। दूसरे स्तर पर रचनाकार क्रमशः कविता से कथा और कथा से कथेतर के निर्माण की ओर बढा है और तीसरी ओर पाठक जगत में भी इसी क्रम में स्वीकृति का आरोही क्रम वर्तमान है।
साहित्य में कविता से कथा और कथा से कथेतर की ओर वर्धमान प्रचुरता के कारण क्या हैं? इस दिशा में पहला बडा कारण है गद्य का बढता प्रसार, यहाँ तक कि कविता भी गद्य में लिखी जाने लगी है। दूसरी बात यह है कि जैसे कथेतर अल्पत्व के साथ ही सही कविता की कल्पनाशीलता और कथा गद्य के कहानीपन को अपनाता है वैसे ही कविता तथा कथा विधाएँ कथेतर के तत्त्वों को अपनाते आ रहे हैं, यहाँ तक कि यदि अन्य विधाओं में से कथेतर को पूरी तरह निकाल लिया जाए तो उनकी नींव हिल सकती है, अस्तित्व पर भी संकट बन पडे, तो अतिशय नहीं।
तीसरी बात यह है कि कथा तत्त्व को साथ लेकर जगत जहान की भिन्न-भिन्न बातों को जिस अदा के साथ कथेतर कह सकता है वह अदा कथा विधाओं के लिए दूर की कौडी है। कविता की व्यंजना और गद्य की अभिधा के बीच स्थित सम्प्रेषण कठिनता और सरलता भी एक अन्य कारक है।
विस्थापन के दूसरे स्तर पर रचनाकार है। कथेतर के इतिहास के बरक्स किसी रचनाकार के रचनाकर्म का इतिहास देखें, तो प्रायः यह प्रवृत्ति मिलती है कि रचनाकार कविता से कथा और कथा से कथेतर की ओर विस्थापन करता है। यह विस्थापन सायास है या स्वतःस्फूर्त इस प्रश्न का उत्तर अज्ञेय और कुँवरनारायण के इस संवाद से शायद तय हो सके जो लखनऊ दूरदर्शन केन्द्र द्वारा मार्च 1980 ई. में आयोजित - प्रसारित कार्यक्रम से उद्धृत है-
कुँवरनारायण ( अज्ञेय से) - रचनात्मक साहित्य की अपेक्षा आपने विचार साहित्य अधिक लिखा है, इसका क्या कारण हो सकता है? क्या आपको ऐसा लगता है कि विचारों के माध्यम से जो बातें आपने कही हैं, रचनात्मक साहित्य के द्वारा बेहतर नहीं कह सकते थे। या ये ही विधा आपको अधिक रुचिकर लगी किन्हीं विशेष कारणों से?
अज्ञेय - मैं तो सोचता हूँ कि इस तरह के सवाल का जवाब कोई लेखक देता है, तो ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जो बात हो गई है उसकी किसी न किसी तरह की सफाई दे रहा है।
मैं तो लिखता हूँ। लिखते समय यह नहीं सोचता कि रचनात्मक लेखन करूँ या कि विचार.. जो मन में आता है, जैसा लिखने का मन होता है, वैसा लिख देता हूँ। फिर बाद में, वो भी दूसरे लोग तय करते हैं कि ये रचनात्मक हुआ और ये विचारमूलक हुआ।
.. ये भी नहीं चाहता हूँ कि कोई ये मान ले कि इससे पहले सोचता नहीं था इसलिए विचारमूलक गद्य लिखना अनावश्यक था या कि पहले सिर्फ भावुक था इसलिए काव्य लिखता था, और अब सोचने भी लगा हूँ, संभव है कि ये सच भी हो, ये तो दूसरे ही तय करेंगे..
मुख्य बात ये है कि लिखता हूँ, कुछ बातें जिस रूप में कहनी ठीक जान पडतीं है उस रूप में अपने आप कही जाती हैं, महत्त्व की बात तो मैं समझता हूँ यही है।8
अज्ञेय के मत में रचना अपना रूप विधान स्वयं तय करती है और बहुत हद तक यह बात ठीक भी है क्योंकि पूर्व नियोजित लेखन साहित्यिक संदर्भों में सृजन तो नहीं कहा जा सकता।
यह किसी एक रचनाकार का अपनी ही रचना प्रक्रिया और प्रक्रम पर अपना पक्ष है इससे इतर या बिल्कुल विपरीत एक रचनाकार की रचना प्रक्रिया और प्रऋम पर दूसरे रचनाकार या आलोचक का मत हो सकता है। संभव है एक रचनाकार के इस विधागत विस्थापन को अन्य सृजनधर्मी उसकी उस विधा विशेष में रचनात्मकता के चुक जाने से जोडते हों कि जब साहित्यिक की रचनात्मकता कविता और कथा माध्यमों में चुक जाती है तो हाशियाकरण से बचने के लिए वह कथेतर माध्यमों को अपनाता है।
इसी वार्ता में एक लेखन की स्वयं की रचनात्मकता के विकास क्रम के इतिहास को बढती हुई आयु से जोडकर देखने की बात कही गई है जिसमें व्यक्ति आयु बढने के साथ-साथ वैचारिकता की ओर बढता है यद्यपि अज्ञेय इस धारणा से सहमत नहीं हुए फिर भी एक रचनाकार का कविता से कथा और कथेतर या विचार गद्य की ओर क्रमशः बढने का एक कारण यह भी हो सकता है।
वर्तमान विश्व में कल्पना पर अनुभव को तरजीह देने की प्रवृत्ति प्रबल है इसलिए आश्चर्य नहीं कि क्यों रचनाकार की रचना प्रक्रिया में कल्पना के केन्द्रीय स्थान पर अनुभव विराजमान है। इसके साथ यह भी मानना होगा कि कल्पना की एक सीमा होती है जिससे आगे वह नहीं जा सकती है।
एक और बात यह भी है कि निरंतर सामाजिक समस्याओं का बढता दबाव और उस दबाव के प्रतिफल में लेखक के अंतर्मन में उठने वाला दबाव लेखक को वैचारिक लेखन की ओर विस्थापित करता जा रहा है, और सम्भवतः आगे भी करता रहेगा।
विस्थापन के तीसरे स्तर पर पाठक है या ज्यादा स्पष्ट करें तो केवल पाठक या केवल स्रोता नहीं प्रत्येक सामाजिक है जो कविता और कथा विधाओं के साथ कथेतर का भी मुक्त हृदय से स्वागत कर रहा है। सामाजिक अब सत्य तथा अनुभवों को और अधिक निकट से तथा खुली आँखों से देखना चाहता है, कल्पना की तन्द्रालस सत्ता में ठहरने का उसे अधिक अवकाश नहीं। भावुकता का उसके लिए महत्त्व अवश्य है परन्तु उसकी भावुकता पर अंततः तार्किकता हावी होती जा रही है। सहृदय के लिए किसी रचना या विधा की स्वीकार्यता को लेकर अज्ञेय की यह सम्मति द्रष्टव्य है -
कुछ बातें जिस रूप में कहनी ठीक जान पडतीं है उस रूप में अपने आप कही जाती हैं... और पाठक भी उनको उस रूप में देखें कि जो चीज सामने आई, वो क्या इसी ढँग से कहने पर सबसे अधिक ग्राह्य है, या कि किसी दूसरे ढंग से कहनी चाहिए?9
स्वीकार्यता के प्रश्न को अज्ञेय सीधे-सीधे पाठक के विवेक पर छोडते हैं और यह विवेक संप्रेषण से पडने वाले प्रभाव की मात्रा और गुण से तय होता है। कथेतर में सामाजिक अपने जीवन और जगत के यथार्थ को अधिक निकटतर पाता है और यह निकटता ही इस स्वीकृति का मूल है।
यह नयी सदी कथेतर की सदी है। बढती चढती आधुनिकता और यथार्थ बोध के बीच जैसे जैसे साहित्य में जीवन और जगत के यथार्थ अनुभवों को सहेजने का आग्रह और आवश्यकता प्रबल होती जा रही है वैसे वैसे ही कथेतर विधाओं स्वीकार्यता बढती जा रही है। चूँकि वर्तमान जीवन और जगत बहुत तेजी से परिवर्तन के मार्ग पर है इसलिए साहित्यिक विधाएँ भी तेजी से अपना रूप बदल रहीं हैं। बदलाव की यह गति इतनी तीव्र है कि जब तक एक बदलाव को परिभाषित करने लगते हैं तब तक नया रूप विधान सामने आ जाता है। विपुलता, बहुलता, त्वरा और विविधता का यह सम्मिलन साहित्य को समृद्ध और समर्थ भविष्य का रास्ता दिखा रहा है।
संदर्भ -
1. शुक्ल, आचार्य रामचंद्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा काशी, संस्करण-1942 ई, प.6
(प्रथम संस्करण का वक्तव्य )
2. चतुर्वेदी, रामस्वरूप, हिन्दी गद्य विन्यास और विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2008 ई.,
पृ. 73, 74
3. पूर्वोक्त, पृष्ठ 227
4. संपादक - मिश्रा, दयानिधि, मिश्रा उदयन, उदय प्रकाश हिन्दी का कथेतर गद्य परंपरा और प्रयोग,
वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली, 2020 ई. पृष्ठ - भूमिका से
5. तिवारी, डॉ. रामचंद्र, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण-2009 ई.
पृ. 55
6 अग्रवाल, असीम, क्योंकि कथा से आगे जहाँ और भी है, मधुमती (वर्ष 60 अंक 1) जनवरी 2020
ई.,राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर, पृ. 30,31
7. पूर्वोक्त, पृ. 26
8. लखनऊ दूरदर्शन केन्द्र द्वारा मार्च 1980 ई. में आयोजित - प्रसारित कार्यक्रम का लिंक- https://
m.facebook.com/story.php?story_fbid=15975718 60447956×id=7110273 62435748
9. पूर्वोक्त

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