fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

आईना-आईना तैरता कोई अक्स और हर ख्वाब में दूसरा ख्वाब है

विमलेश शर्मा
प्रियदर्शन की हत्यारा तथा अन्य कहानियों के विशेष सन्दर्भ में
कविता की तरह कहानी को भी इतिहास की आदि-विधा माना जा सकता है। चाहे वह आज गद्य में लिखी जा रही हो इससे पहले पद्य में या कि दादी-नानी के किस्सों में या कि उससे भी बहुत पहले संकेतों में । यों पद्यमय गीतों के माध्यम से भी यही कहानी कभी ढोला-मरवण का तो कभी आल्हा का लोक-रस ग्रहण करते हुए भी यह मनुष्य को अधिक बाँधती ही रही है, और इस प्रकार कह सकते हैं कि जितनी रोचक हिन्दी कहानी अपने कलेवर में रही है, उतनी ही रोचक रही है उसकी विकास-यात्रा भी। हिन्दी कहानी उसने कहा था की परिपक्वता के साथ विस्तृत उडान भरती है और तदनन्तर अनेक सोपानों, विचारधाराओं, आन्दोलनों का प्रश्रय पाती हुई समय के साथ नयी कहानी के रूप में सामने आती है। बकौल मार्कण्डेय, जिस समय नयी कहानी वजूद में आयी उस समय साहित्य में गतिरोध की स्थिति थी। साहित्य कम तो नहीं लिखा जा रहा था, पर वह अपने समय तथा जीवन संदर्भों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा था।1 राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक और आधुनिकी-करण के दबावों को झेलती हुई हिन्दी कहानी आज न केवल कई विषयों और मनःस्थितियों के अंतर्द्वन्द्व को शब्दबद्ध करने का प्रयास कर रही है वरन् इक्कीसवीं सदीं के भारत के परिदृश्य को समझती-बूझती विभिन्न विमर्शों में आश्रय पाती हुई अपनी विकास यात्रा भी तय कर रही है।
समकालीन हिन्दी कहानी का परिदृश्य विशद है। समकालीन होने का एक अर्थ है समय के वैचारिक और रचनात्मक दबाव को झेलते हुए उनसे उत्पन्न तनाव और टकराहटों के बीच अपनी सृजनशीलता द्वारा अपने होने को प्रभावित करना। अर्थात् समकालीन का एक अर्थ यह भी है कि कलाकार या लेखक समय के दबाव का स्वयं गवाह होता है । इसी बात को रेखांकित करते हुए जब हम समकालीन कहानी की पडताल करते हैं, तो यहाँ एक ओर भारतीय जीवन मूल्यों और आदर्शों में पले-बढे पात्र मिलते हैं, तो दूसरी ओर भूमण्डलीकरण की बयार में बदलते सामाजिक-पारिवारिक समीकरण और सांस्कृतिक-राजनीतिक परिवेश का यथार्थ और प्रामाणिक चित्रण भी उपलब्ध होता है। इस तरह समकालीन कहानी अदृश्य होते, हाशिए पर छिटकते लगभग अदृश्य हो रहे चेहरों की कहानी तो है ही, साथ ही चमकीली उपलब्धियों के पीछे भागते-घिसटते महानगरीय समन्दर में खोए हुए आदमी की भी दारूण गाथा है। प्रेमचंद, रेणु, जैनेन्द्र से प्रारम्भ हुई हिन्दी कहानी, नई कहानी त्रयी के लेखकों कमलेश्वर,मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव की कथा दृष्टि से गुजरती हुई निर्मल वर्मा, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह , शैलेश मटियानी, स्वदेश दीपक, कृष्णा सोबती,मन्नू भण्डारी, मृदुला गर्ग, ममता कालिया, उदय प्रकाश, प्रियंवद, अलगा सरावगी, गीतांजली श्री, अखिलेश, संजय सहाय और अन्यान्य कथाकारों की कलमों से कथानक गढती हुई, आलोक रंजन, दिव्या विजय , अम्बर पाण्डेय सरीखे लेखकों से अपनी किस्सागोई को सतत नए आयाम और भंगिमा प्रदान कर रही है। कहानी के इतिहास व विकास के इस जगमगाते सफर के यों अनेक कथाकार गवाह हैं , उन्हीं कथाकारों में एक नाम है आलोचक-कथाकार-पत्रकार प्रियदर्शन का ; जो कथा साहित्य-कथेतर और समीक्षा- आलोचना के क्षेत्र में अपने लिखे से सतत उपस्थिति दे रहे हैं।
यह कहा गया है कि कहानी या उपन्यास वास्तविक संसार नहीं होते हैं अपितु लेखक सृजित वास्तविकता से प्रेरित संसार होते हैं। परन्तु यही संसार जब परिवेश को परिस्थिति सापेक्ष गढने लगता है तो वह नॉन-फिक्शन या अकाल्पनिक होकर यथार्थ के समानान्तर खडा हो जाता है; और इस तरह अधिक विश्वसनीय हो जाता है। समकालीन कहानी एक साथ बहुत सारे विषयों पर बात करती है। यह कहानी भूमण्डलीकरण के प्रभावों-दुष्प्राभावों के साथ-साथ उसकी आँधी में भारत की सामाजिकता के बिखरने और बदलते सामाजिक समीकरणों की भी बात करती है। इसी क्रम में प्रियदर्शन का कहानी संकलन, हत्यारा तथा अन्य कहानियाँ उस भारत को पहचानने की कहानियाँ हैं जो साम्प्रदायिकता के बडे होते दानव को अपनी आँखों से देख रहा है, जिसमें वैश्विक महामारी के दौर में कुछ धनपिपासु मानवता को लीलने में लगे हैं और जिसमें युवा वर्ग अपनी जडों से छूटने का दर्द महसूस कर रहा है। एक ओर जहाँ इन कहानियों में उत्तरआधुनिक दौर के सभी विमर्श आश्रय पाते हैं, तो दूसरी ओर ये कहानियाँ मौजूदा दौर की समस्याओं पर समाधान प्रस्तुत करती भी नजर आती हैं। संभवतः इसीलिए समकालीन परिदृश्य को रेखांकित करते हुए इन कहानियों पर बात करना और जरूरी हो जाता है। संकलन का शीर्षक उत्तरआधुनिकता के उस अवधाराणात्मक मुहावरे पर चोट करता नजर आता है जहाँ चौंक और कुतूहल मिश्रित शीर्षक हर उत्पाद के लिए एक बाजारी जरूरत है। बहरहाल प्रियदर्शन के यहाँ यह चौंक जितनी सांकेतिक है उतनी ही कहानी की सांवेगिक तीव्रता के लिए एक जरूरी औजार भी।
संकलन की शीर्षक कहानी हत्यारा जो कि पूर्व में पहल के अंक में प्रकाशित हो चुकी है, का स्वर निहत्थी खामोशी के टूटने का स्वर है। यह कहानी उस उन्माद के संक्रमणशील होने की सटीक बयानगी है जिसमें व्यक्ति अन्धा हो जाता है। अन्धी भीड उग्र होकर किस प्रकार एक चुप्पे और अबोध मानव को झूठी संज्ञाओं, विचारधारा और छद्म पहचान का लबादा ओढा देती है, कथानक ऐसी एक घटना को विडम्बना की तरह प्रस्तुत करता है। कहानी उस अर्धसत्य को रेखांकित करती है जिसके वशीभूत हो, एक हिंसक भीड अपनी उग्रता के चरम पर बिना किसी तथ्य-सत्य के किसी चलते-फिरते उत्साही और आशान्वित युवक को पीट-पीट कर मौत के मुहाने तक धकेल देती है। कहानी बहुत बारीकी के साथ यह भी बताती है कि भीड को तर्क नहीं कोरा उन्माद चाहिए; उसे रक्तपात चाहिए। हिंसा-आगजनी और रक्तपात से उसके(भीड) भीतर का यह अपराध भाव कम होता है कि वह कुछ नहीं कर रही है। उसे अपने उपयोगी होने का भान होता है। राष्ट्र और समाज के काम आने का भान होता है। इस उन्मादी भीड की कोई वैचारिकी नहीं होती यह बस कमजर्फ और खूँखार होती है। और जब इसी भीड के बीच में से कोई आर्द* मन अपने कृत्य पर पश्चाताप कर अपने अपराध से मुक्त होना चाहता है, तो फिर एक और भीड उस पर हमला कर देती है। और यों ही खबरों के बीच एक ओर खबर शुमार हो जाती है कि, ये लडका बीती दोपहर उसके घर पहुँचा, उसे कोई पहचानता नहीं था। उसने खुद अपना परिचय दिया कि वह मारने वालों की भीड में शामिल था। माफी माँगने आया है, लेकिन इतना भर सुनते मारे गए लडके के भाई और रिश्तेदार उस पर टूट पडे। उससे बडी मुश्किल से बचाया जा सका। अभी वह अस्पताल में है, खतरे से बाहर है। लेकिन चोट ठीक-ठाक लगी है। पूरी तरह ठीक होने में कुछ दिन लगेंगे। मुझे लगा कि उस लडके का सलीब अब मेरे कन्धों पर है। वो मेरे पास अपने अपराध भावना से मुक्त होने आया था। मैंने उस पर उसका कुछ और बोझ बढा दिया। मैंने उसकी मॉब लिंचिंग का एक छुपा हुआ प्रतिशोध ले लिया। उसे भी एक भीड के हवाले कर दिया और ऐसा करके खुद गायब हो गया।2 दरअसल एक भीड की उग्रता के बीच यह कहानी उस मानवता के शिनाख्त की कहानी है जो कहीं न कहीं भीड में शामिल हर शख्स के भीतर छिपी है, यह कहानी उस कथावाचक की है जो केवल तमाशबीन नहीं है वरन् अपने परिवेश में अन्तर्निहित उस भारतीय बोध को बचाने में प्रयासरत है, जिसे कभी उसने, हिन्दी हैं हम वतन हैं, गाते हुए जाना था।
संकलन की दूसरी कहानी गुलाबी बिन्दु कहानी उदास होते समय की कहानी है, वह समय जो अपने आप को सही पहचाने जाने की जद्दोजहद में हर वक्त अनेक प्रश्नों से गुजरता रहता है। उन प्रश्नों की बौछार और अनवरत घटते बेतुके प्रसंगों-प्रपंचों से एक बुद्धिजीवी किस तरह किंकर्तव्यविमूढ हो जाता है, किस तरह मुक्तिबोध की कविता की तरह ही अपने इर्द-गिर्द एक तात्कालिक फैण्टेसी का जाल बुन लेता है, किस तरह एक पल के लिए अतिशय भावुक हो आपा खो बैठता है और किस तरह एक परितोष जो कि पढा-लिखा युवा है बदहवासी के चलते निरी अप्रांसगिक वस्तु को तूल दे बैठता है। दरअसल यह बदहवासी और पागलपन उस व्यवस्था की उपज है, जिसमें हर व्यक्ति बस एक वोट और औजार है, जिसे उसके रोजनामचे से कोई लेना-देना नहीं और इस व्यवस्था में हर व्यक्ति परितोष की ही तरह सशंकित होने पर मजबूर है।
बुलडोजर, कहानी एक साथ बहुत मुद्दों को उठाती है। यहाँ मुल्क के भीतर फैली सरहदों का जिक्र है, धार्मिक संज्ञाओं पर शक करने वाली मानसिकता है, धर्म-वर्गगत उत्पीडन की बानगी है और किसी को बेवजह अपराधी की तरह देखने से उपजी सिरहन का स्वाद कैसा होता है उसकी बयानगी है। यह बुलडोजर यहाँ व्यवस्था और प्रभुत्वशाली लोगों की मानसिकता का प्रतीक है जो किसी को नहीं बख्शता, उसकी जद में पूरी जनता है हर आम और खास है।
सडक पर औरतें, कहानी स्त्री जीवन के उस संघर्ष की बयानगी है जिसे साहित्य में अस्सी के दशक से पुरजोर अभिव्यक्ति मिलने लगी है। कमलेश्वर की एक थी विमला की ही संवेदना का विकास करती यह कहानी स्त्री के उस यन्त्रवत् जीवन का उल्लेख करती है जिसमें... कभी कोई चाबी भर देता है, कोई दिशा तय कर देता है, कोई रास्ता बता देता है या पहुँचा देता है, कोई घर से ले जाता है और कोई वापस घर छोड जाता है। दरअसल यह कहानी इस तथाकथित प्रगतिशील 21 वीं सदी की हर उस लडकी की है, जिसे अपना जीवन और उसकी दिशा तय करने का हक नहीं है, जिसे अपने फैसले लेने का अधिकार नहीं है, जिसके उत्साह-उर्जा को पितृसत्ता सिफर करने पर आमादा है। यों दिखने में यह कथानक बहुत सादा-सा है,जिसमें मौजूदा दौर के आदर्श और तात्कालिक यथार्थ को उरेहने की कोशिश की गई है पर प्रियदर्शन जिस कथा-प्रविधि का प्रयोग करते हैं उससे यह कहानी समस्या से समाधान की ओर , वैचारिक दिग्भ्रम के स्याह से उजास की ओर बढती नजर आती है।
संकलन की बुखार कहानी एक जानलेवा वायरस से लडते उस रुग्ण समाज की कहानी है जो एक वायरस से लडते-लडते जाने कितने वायरसों से ग्रस्त हो चुका है। यहाँ एक भारत बोध है जो बचपन से एक परवरिश-संस्कार की तरह व्यक्ति में रोपित होता है और साथ ही उसके बरक्स उसके हालातों के आगे टूटते - बेबस होते वे ही तथाकथित आदर्श और जीवन-मूल्य भी हैं। कहानी में कथावाचक एक घण्टी का जिक्र करता है, वह घण्टी जो उसकी दादी पूजा के वक्त बजाया करती थी। वो घण्टी वस्तुतः उसकी उस गैरजरूरी भावुकता की निशानियों में से भी एक थी जो वो इस यंत्रीकृत होते हुए समाज में कहीं उपयोगी नहीं थी। वही घण्टी आज कृतज्ञता और प्रतिरोध दोनों ही की अभिव्यक्ति का जरूरी माध्यम बन गई थी। यहाँ कथावाचक की चिंता में बुखार से पीडित एक समाज है, उसे मालूम है कि उसका स्वयं का बुखार उतर जाएगा। लेकिन पूरे समाज में जो एक अदृश्य बुखार पसरा हुआ है, यह कैसे उतरेगा? कोरोना की तरह इसके लक्षण भी किसी को नजर नहीं आ रहे हैं। तरह-तरह के अंदेशों और शक- सुबहों से भरी एक दूसरे को शिकायत, हिकारत और नफरत से देखती दुनिया कैसे बदलेगी? उसे लगा इस दौर में मैसेज फॉर्वर्ड कितना करना कितना आसान है और लिखना कितना मुश्किल? मोमबत्ती,दीपक के उजास में क्या यहाँ एक अंधेरे को छुपाने की कोशिश की जा रही है? यह जो गरीब बेघर मजदूर हैं क्या वे इस देश के नागरिक नहीं है? किसी जमात के नाम पर एक पूरी कौम को बदनाम करना ठीक है? दरअसल समाज में फैला यह वायरस *यादा बडा वायरस है और लेखक की चिंता यही है कि आखिर इस वायरस से यह भारतीय समाज और अखण्डित कहलाने वाला राष्ट्र कैसे लडेगा?
चाची कहानी बहुपरतीय है और मानवीय संवेदनाओं और मनोविज्ञान की बहुत ही तहों को उघाडती नजर आती है। एक तरफ यह युव मन की अदम्य लालसा, भोगवादी आकर्षण और अतृप्ति पर उपजे प्रतिशोध को अभिव्यक्त करती है तो दूसरी ओर एक माँ की चिन्ता और बेहतर जीवन जीने की चाहना को स्वर देती है। कहानी की खूबसूरती यह है कि इसका अन्त समाधान की ओर बढकर समाज की जड सोच पर प्रहार करता है। कहानी यह सूत्र भी अपनी बुनावट में छोड जाती है कि, आत्मा का उल्लास और खुशी ही देह पर प्रतिबिम्बित होती है। मुझे इस हँसी में फिर से वह दमकती देह दिखाई दे रही थी और कहीं यह खयाल आ रहा था कि देह इस तरह तभी दमकती है जब आत्मा दमक रही होती है।3
मॉल कहानी भारतीय बोध के प्रति आम जन की बदलती धारणाओं की बानगी है। किस तरह वर्गीय अन्तरालों के चलते एक देश के भीतर दूसरा देश उग आता है और एक पराएपन का बोध भीतर घर कर जाता है, कहानी बहुत ही सूक्ष्मता से इस विषय पर बात करती है। पथरीले रास्तों, पगडण्डियों, पहाडों सब पर बिलकुल सहज भाव से तलने वाली सोना को मॉल में चलना दूभर लग रहा था- यह डर कि जैसे पाँव फिसल न जाए। लेकिन चलना तो था ही। वे धीरे-धीरे आगे बढीं- कुछ सहमी-सकुचाती, कुछ विस्मित-सी, कुछ हैरान-परेशान सी- यह कौन-सी दुनिया है? यह उनका ही देस है?4 यहाँ कथ्य से एक बात ओर स्पष्ट होती है कि रचना का कथ्य उसके विषय पर निर्भर न होकर लेखक के उद्देश्य पर निर्भर करता है। प्रियदर्शन रोजर फ्राई की इसी मान्यता को कथा-प्रविधि के रूप में अपनाते नजर आते हैं कि सर्जनात्मक कल्पना केवल भाव की क्रिया नहीं है वरन् वह बौद्धिक क्रिया से भी संपृक्त है।5 मिसाल के तौर पर कमलेश्वर की, दिल्ली में एक मौत कहानी में भी अजनबीपन है और मॉल कहानी में भी एक अजनबीपन है; परन्तु प्रियदर्शन यहाँ एक आम अपढ इंसान के भाव-जगत् की सर्जना कर नितांत नए रूप-विधान का चुनाव करते हैं।
प्लास्टिक का डब्बा एक हल्के-फुल्के कलेवर को लेकर लिखी गई कहानी है जिसमें प्रियदर्शन अपनी किस्सागोई से कथ्य को रोचक बनाते हैं। कहानी का उद्देश्य यह इंगित करना है कि, सुन्दरता को देखने लिए दूरी का एक परिप्रेक्ष्य जरूरी है। अदृश्य लोग कहानी कथ्य और रूप-विधान दोनों ही दृष्टि से एक उम्दा कहानी है। प्रियदर्शन एक अन्य कहानी घर चले गंगाजी में यह लिखते हैं कि गंगाजी बेहद मामूली आदमी हैं- इतने मामूली कि उनकी कहानी नहीं बन सकती। इसके बावजूद मैं उनकी कहानी लिखने बैठा हूँ। क्या यह मेरा दुस्साहस है? एक लेखक के भीतर छुपा यह अभिमान कि वह बेहद सामान्य लोगों के भीतर छुपे विशिष्ट अनुभवों को पकड कर एक अच्छी कहानी लिख सकता है?6 बहरहाल यह कहानी संकलन में शामिल नहीं है, पर यह प्रियदर्शन की उस वैचारिकी की ओर इशारा करती है जिसमें वे हर आम को खास नजर से देख कर कथ्य गढते हैं। अदृश्य लोग कहानी का कथ्य भी अदृश्य उपस्थितियों को लेकर बुना गया है। यह कहानी उन अदृश्य उपस्थितियों की कहानी है जो जरूरी होकर भी गैरजरूरी रूप में हर ओर उपस्थित होती हैं। एक अखबार का सम्पादक इन उपस्थियों को चुपचाप महसूस करता है। जिस वक्त हम स्वच्छता के सवाल पर जोर- जोर से बहस कर रहे होते हैं, जब दलित मुद्दों को लेकर एक दूसरे से उलझ रहे होते हैं, तब ये लोग हमारी कुर्सियों के नीचे से गन्दगी और हमारी मेज के ऊपर से धूल साफ कर रहे होते हैं। हम इन्हें बिलकुल नहीं देखते। यह भी नहीं सोचते कि वे कुछ देख या सुन रहे हैं या नहीं? अचानक मुझे ध्यान आया कि एक ही दफ्तर में काम कर रही दो तरह की आबादी के लिए दो बिल्कुल अलग-अलग विधान चलते हैं या कम से कम हमें एक-दूसरे की दुनिया में आवाजाही गँवारा नहीं। हमारे मजाक पर वे हँस नहीं सकते। उनकी तकलीफ में हम साझा नहीं कर सकते। वे हमारे साथ की लडकियों को देखने की हिम्मत नहीं करते। हम उनके साथ की महिलाओं को देखे जाने लायक नहीं समझते। मैंने पाया कि हम उन से बेखबर भले हों, वे हम से बेखबर नहीं थे। कभी सीढियाँ उतरते वक्त कभी चाय लेते वक्त भी जब वे लंच से पहले मेज साफ कर रहे होते, मैं मुस्कुराता और उनसे हालचाल पूछ लेता। वे कुछ सकुचा सिकुड जाते हैं और सिर हिलाकर बताते हैं कि सब ठीक है।7 दरअसल ये उपस्थितियाँ हर ओर हैं, उनका संघर्ष भी बहुव्यापी है, पर संवेदनशील मनुष्य जीवन की आपाधापी में देखकर भी उन्हें चिह्नित नहीं कर पाता है। कथावाचक प्रसंगवश यह भी बताता चलता है कि चिह्नित होने पर , अदृश्यता के दृश्य होने के भी अनगिनत खतरे हैं। इन अदृश्य उपस्थितियों को इनके उत्पीडन को रेखांकित करने वाले कब नक्सल हमदर्द से लेकर अरबन नक्सलाइट करार कर दिए जाते हैं। दरअसल तात्कालिक बहसों के लिए मुद्दे उठाना मौजूदा बाजारु और पूँजीवादी मानसिकता की अनिवार्यता है जबकि इन मुद्दों को उठाने वाले ही इनके बुनियादी सरोकारों को इनकी समस्याओं को देखना-सुनना-चिह्नित करने तक के भी आदी नहीं हैं। इसीलिए कथानायक इन उपस्थितियों से आतंकित हैं जो आस-पास हैं, जो नितांत उपेक्षित हैं- अलक्षित हैं। जो बिना किसी कारण अपनी अदृश्यता के ही चलते कभी आतंकवादी तो कभी नक्सली कहकर मुठभेड में मार दिए जाते हैं। मुझे लगा, एक दिन अदृश्य लोगों की यह बस्ती अचानक जागेगी और हम सबसे हमारे पापों का - हमारे न देखने- सुनने का, चुपचाप नाइंसाफी करने और उसमें भागीदार होने का बदला ले लेगी। एक दिन वह मेरे घर से अपनी खोई हुई पाण्डुलिपी खोज लेगी।8 (अदृश्य लोग - पृ.99)
समकालीन साहित्य में विधाओं के भीतर रूपबंधों की आवाजाही को स्पष्ट रेखांकित किया जा सकता है। रूपबन्धों की राजनीति का जिक्र न करते हुए यदि कहानी के कहानीपन की दृष्टि से देखें, तो संकलन की सलीम साहब, काश आप हमारे संपादक होते संस्मरणात्मक कहानी है। कहानी एक ओर पत्रकारिता के हालिया परिप्रेक्ष्य पर करारा प्रहार करती है, तो दूसरी ओर एक पत्रकार की भाषिक प्रतिबद्धता को भी जाहिर करती है। कहानी में एक ओर उस यथार्थ का चित्रण है, जहाँ खबरें राजनीतिक वर्चस्व और टीआरपी की अन्धी दौड में गढी-बुनी-दिखाई जाती हैं, तो दूसरी ओर उस पेशे के प्रति समर्पण और सच्ची पत्रकारिता की मिसाल देते अविनाश और उसका मोल जानते सलीम जैसे किरदार का चित्रण जो शब्दों की अर्थवत्ता और गुणवत्ता दोनों से भली-भाँति परिचित हैं। कहानी अपनी सहजता में उस गूढ तथ्य की ओर इशारा कर देती है कि , पत्रकारिता कितनी आसान है? रंग झूठ पर पोतना पडता है। कलई नकली दावों पर चढानी पडती है। सच तो बिना भाषा के प्रकट हो जाता है, वह दिखता रहता है, लेकिन हम देखने को तैयार नहीं होते।9
समकालीन परिवेश को इंगित करती स्मार्टफोन कहानी मानवीय सपनों के कंकरीट के जंगलों में बेसुध सफर करने की कहानी है। कहानी आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता के मुहावरे के महीन फर्क को भी समझाती है कि किस तरह दुनिया लैण्डलाइन फोन से मोबाईल- स्मार्टफोन तक पसर आई, किस तरह सामाजिक सम्बन्धों का दायरा सोशल साइट्स तक चला आया और परिवार और उसमें भी निहित मानवीय सत्ता एकाकी नितान्त एकाकी होती चली गई। कहानी उम्रों के अकेलेपन के थपेडे खाकर खण्डहरों में तब्दील होने की और रिश्तों में दूरी के कारण उग आई मायूसी को भी दारूण रूप में अभिव्यक्त करती है। बुजुर्ग अपने रिश्तों, अपनी सन्तानों और खोए हुए रिश्तों को टटोलने किस कदर लाचार होकर सोशल मीडिया के जटिल दाँव-पेंच भी सिखने से गुरेज नहीं करते, कहानी इस पक्ष की भी मार्मिक अभिव्यक्ति है। दरअसल यह कहानी अत्याधुनिक समय में घरों के मकानों में तब्दील होने की कहानी है।
सारतः संकलन की कहानियाँ कलात्मक दृष्टि से उतनी ही समृद्ध हैं जितनी खूबसूरती से वे भाषिक संसार की सर्जना करती हैं। कहानियों का आम जन जीवन से जुडा होना उन्हें विशिष्ट तो बनाता ही है। साथ ही भाषिक समृद्धता और प्रतीकों-रूपकों का चयन भी उन्हें कलात्मक ऊँचाई प्रदान करता है। यथा बीच के बरस पानी या चट्टान की तरह गुजरते-बीतते रहे। अचानक उग आई एक मायूसी को अपनी आवाज के उत्साह से ढँकने की कोशिश कर रहा था.. (स्मार्टफोन)। ... इस सवाल पर जैसे चुप्पी की एक फल्गू उसके भीतर बहने लगी- यह चुप्पी भी जैसे एक सूखी नदी थी (सलीम साहब, काश आप हमारे सम्पादक होते)। कुछ पिछडे भी थे - और गिनती के एकाध अगडे भी जो शायद बाहर से आए थे (अदृश्य लोग)...शोर के जैसे हाथ उग आए थे और वह उनको धक्का दे रहा था (मॉल), वे उदाहरण हैं जो कहानियों की बुनावट की बारीकियों पर ध्यान खींचती हैं। इन कहानियों में भाषिक समृद्धता और शुचिता के अनगिनत उदाहरण है जो हर नुकते का बेहद सावचेती से खयाल रखती और एक उदाहरण और मिसाल देती नजर आती है। लेखक अपनी प्रतिबद्धता में हर कहानी से उस बीमार पूँजीवादी समाज की ओर भी ध्यान खींचता है जो पैसे के दम पर खरीदे तात्कालिक सुखों-दुःखों पर पलता है और कहीं ओर से मिले सपनों और उम्मीदों को अपना मानता है। दरअसल ये कहानियाँ ताकत के मुरीद हमारे समय के उन कमजोर-लाचार-बेबस लोगों की कहानियाँ हैं जिनके हिस्से सिर्फ अँधेरे आ रहे हैं। सादा शिल्प और संवेदनशील भाषा को लेकर रची गई ये कहानियाँ इंसानी सरोकारों की कहानियाँ हैं। बकौल प्रियदर्शन भरोसा कर सकते हैं कि यह संग्रह अपने पाठकों को अपने साथ भी लेगा और आगे भी ले जाएगा। पाठक यह महसूस करेंगे कि दरअसल यह उनकी कहानियाँ हैं, जो उनके हालात और सोच को चुनौती भी दे रही हैं और बदल भी रही हैं। इन कहानियों के आईने में वे अपने आप को नए सिरे से पहचान पाएँगे। ये कहानियाँ पढने वाले इन्हें भूल नहीं जाएँगे, बल्कि पाएँगे कि कहानियाँ उनकी अपनी कहानियाँ भी बन रही हैं, बना रही हैं।10 वस्तुतः यही साहित्य का समकालीन परिदृश्य है जिसमें ऐसा महत्त्वपूर्ण रचाव अपनी बेबाकी और दमदार अभिव्यक्ति के साथ ,परन्तु उतनी ही सहजता से अपनी सतत उपस्थिति दे रहा है, अपने होने को सार्थक कर रहा है।

संदर्भ सूची-
1. राय गोपाल, हिन्दी कहानी का इतिहास,भाग-2, राजकमल प्रकाशन, सं.2011,पृ. ङ्कद्बद्बद्ब भूमिका से उद्धृत
2. प्रियदर्शन-हत्यारा और अन्य कहानियाँ, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, सं. प्रथम- 2021, पृ. 12
3. वही, चाची कहानी से उद्धृत, पृ.76
4. वही, मॉल कहानी से उद्धृत, पृ. 79
5. The formative imagination is nor merely an emotional but also an intellectual activity.
6. www. hindisamay.com- घर चले गंगाजी, कहानी-प्रियदर्शन, देखा गया- 21-02-2022,
7. प्रियदर्शन-हत्यारा और अन्य कहानियाँ, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, सं. प्रथम- 2021, अदृश्य लोग
कहानी-पृ. 92
8. वही, पृ. 99
9. वही, सलीम साहब, काश आप हमारे सम्पादक होते कहानी- पृ.108
10. वही, आवरण पृष्ठ पर व्यक्त लेखकीय स्वीकारोक्ति से उद्धृत।


सम्पर्क - मकान नम्बर - 32, शिवा कॉलोनी,
हरिभाऊ उपाध्याय विस्तार नगर योजना,
वृद्धाश्रम के सामने, दाहरसेन स्मारक के पास,
अजमेर- 305001
मो. 9414777259