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दलदल

पूर्णिमा मित्रा
संध्या के साढे छह बज चुके थे। देवानन्दजी की नजर दीवार पर रखे कलेण्डर पर गयी तारीख पर नजर पडते ही वे अनमने-से हो गए। चाँद को बादलों के झुण्ड से ढका देख उनके मुँह से एक ठण्डी साँस निकल गयी। उन्हें लगा, उनकी स्थिति भी इस शरद पूर्णिमा की चाँद की तरह ही है। उनकी ख्याति की चाँदनी भी अवहेलना के बारे में ढँकी हुयी है। मेडिकल कॉलेज गाउण्ड में इतना बडा साहित्यिक आयोजन हो रहा है और इसके आयोजक गजेन्द्रजी ने इन्हें सूचना तक नहीं दी। जबकि कभी ये गजेन्द्र और दिवाकर घण्टों उनके घर पर पडे रहते थे। इतने में उनकी बडी पुत्रवधू काव्या उनके पास आयी। उनको मोबाइल पकडाते हुए बोली डैडीजी, आपका फोन झुले में बैठकर आराम से बात कर लीजिएगा। हाँ, आपने दवाई ली? वे कुछ कहे उससे पहले ही वह हिरणी की तरह कुलाँचे भरते हुए सीढियों से नीचे उत्तर गयी। मोबाइल कान के पास लेजाते ही एक जोरदार मरदाना स्वर गूँजा देवानन्दजी आप दिखाई नहीं दे रहे हो। हो कहाँ? कुछ देर बाद मुझे मन्च पर उपस्थित होना है। घर पर ही। उन्होंने मरी-मरी आवाज में उत्तर दिया। उदासी की एक मोटी परत ने उनकी सदाबहार हँसी को ढँक लिया।
कमाल है आप जैसा राष्ट्रीय स्तर का लेखक घर में दुबका है। मैं दिल्ली से यहाँ आ सकता हूँ। और आप....। दिवाकर ने उपहास भरे स्वर में इतना कहकर अपना वाक्य अधूरा छोड दिया। यकायक दिवाकर की खनकती हँसी गूँजी और उनके बोल उनके कानों में पडने लगे अरे संजना जी। इस काली साडी में तो आप बिल्कुल अप्सरा जैसी लग रही हो। देवनाजी, बाई गॉड इस गुलाबी अनारकली सूट में आप तो गजब ही ढा रही हैं। अब तो आपकी हाइकू-संग्रह का विमोचन करना ही पडेगा। अरे-अरे राधेश्यामजी मेरे पाँव मत छुओ। सुना है आप बहुत बडे आयोजक बन गए हो? अरे मैं तो आपकी इन झोटी मोटी भँवरे जैसी काली आँखों का दीवाना हूँ। फिर मेरी चेलियाँ किस खेत की मूली है। आप चिन्ता मत करो, इस बार आठ मार्च को आयोजित महिला साहित्यकार सम्मेलन में मैं आऊँगा ही। अपनी खास चेलियों को भी लाऊँगा। बस, किसी नाम के भूखे से मुझे पाँच हजार की शैली जरुर भेंटे करवा देना। अच्छा, इन लोगों की खुशामदी करने के चक्कर में प्रो. दिवाकर अपना मोबाइल बन्द करना ही भूल गए। तभी यहाँ बैठे ही मुझे वहाँ कही बातें सुनाई दे रही है। मन ही मन कहते हुए देवानन्दजी ने मोबाइल ऑफ किया। झुले की पींग बढाकर अपने आप को बहलाने का जतन करने लगे।
पर स्मृति की रंगबिरंगी परियों ने उनके मन को अपने अदृश्य पंखों में सीधे स्मृति के पुराने बाग में पहुँचाकर ही दम लिया। स्मृति के पुराने उपवन में पहुँचते ही उन्हें पचास साल पहले की घटना उनके सामने खिलने लगी। उन दिनों वे रेलवे की नौकरी करते थे। रेलवे क्वार्टर में ही रहते थे। उन दिनों आज के सुप्रसिद्ध आलोचक और साहित्यकार दिवाकर को कोई जानता ही नहीं था। जानता भी कैसे? उस वक्त के नथिये के नाम जाने जाते थे या फिर दाखा के बेटे के तौर पर। पिता नम्बर वन पियक्कड! सात छोटे भाई बहिनों की फौज। बेचारी माँ दाखा कईं लोगों के घर रोटी बनाने का काम करके घर का खरचा चलाती। नत्थूजी उर्फ नथिया कभी कुल्फी का गाडा लगाते तो कभी घर-घर जाकर पापड बडी बेचते। एक बार तपती लू में कॉलेज से लौटते वक्त नयनताराजी से उसने पापड-बडी खरीदने की गुहार, क्या लगाई? नयनताराजी का ममत्व जाग उठा। खुद तो पापड, बडी खरीदी। आसपास की पडौसिनों से नत्थूजी की पापड बडी खरीदने का अनुरोध किया। एक सहयोगी एवं स्वभाव की महिला प्रोफेसर की बात भला, घरेलू औरतें कैसे टालती है। फटाफट नत्थूजी का सारा सामान बिक गया। नयनताराजी ने नत्थूजी से साजन्यता वश उनकी पढाई का पूछा तो वे फूटफूट कर रोये। फिर बोले, मैडम, दसवीं की परीक्षा आने वाली है। और मुझे अंग्रेजी और गणित समझाने वाला कोई नहीं है।
तुम्हारे पिताजी नयनताराजी ने सकुचाते हुए कहा। नयनताराजी ने नत्थूजी को अपने बडे बेटे विवेक से अंग्रेजी और गणित पढवाने का सुझाव दिया। भावविभोर होकर नत्थूजी ने नयनताराजी के पैर छू लिए। फिर तो एम. ए. तक उनकी पढाई का जिम्मा नयनताराजी संघर्ष उठा लिया। अपने सहकर्मियों से वे नत्थूजी को होम ट्यूटर रखने की सलाह देती तो कभी उन्हें प्रतियोगी परीक्षा हेतु निःशुल्क कोचिंग करवाने के लिए गिडगिडाती। समय अपनी गति से चलता रहा। नत्थू जी कब प्राइवेट कॉलेज में अतिथि व्याख्याता बन गए, उन्हें पता ही नहीं चला। पर वे पहले की तरह उनके रेलवे-क्वाटर्र की छत पर मासिक काव्य गोष्ठियाँ आयोजित करते । शरदपूर्णिमा की रात नयनताराजी बनाई खीर माँग-माँग खाते। लेकिन सरकारी कॉलेज में नौकरी लगते ही वे, उन्हें देखकर कन्नी काटने लगे।
जब राजगढ का राधेश्याम श्री देवानन्द वर्मा का साहित्य सर्जन पर पी.एच.डी. करने लगा, तो उन्हें पता लगा कि उसका रिसर्च गाइड डॉ. दिवाकर है। राधेश्याम ही किराये की कार में डॉ. दिवाकर और उनकी पत्नी छाया को लेकर उनके घर उससे मिलने आया। फिर क्या था? जब भी राधेश्याम अकेले उनकी लिखी किताबों पर चर्चा करने आता, तो प्रो. दिवाकर के लालची स्वभाव के किस्से सुनाता। डॉ. दिवाकर आए दिन छाया के साथ उनके घर आ धमकते दिन हो रात, दोनों पति-पत्नी उनके घर से खाना खाकर ही टलते।
रिटायरमेंट से पूर्व देवानन्दजी ने करणीनगर में एक प्लॉट खरीद रखा था। सेवानिवृत्ति के पश्चात् दोनो बेटों व बिटियों की शादी से पहले नयनताराजी ने अपनी जमापूँजी से एक प्यारा-सा मकान बनवा डाला।
प्रो. दिवाकर आये दिन दिल्ली के चक्कर लगाते-लगाते एक साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक हो गए। कवि तो वे औसत दरजे के थे। पर अपने लटके-झटको से आयोजकों और आम श्रोताओं को मोहित करने में मास्टरी हासिल कर ली थी। वे यादों के फूलों से महके जा रहे थे, कि काव्या खीर का बडा-सा स्टील का भगोना लेकर आयी। उन्होंने काव्या को भगोना रखने में मदद की। फिर दबी आवाज में बोले बेटा, दिवाकर को जरा फोन लगाना। इतने दिनों बाद उसे मेरी याद तो आयी। चलो अच्छा टाइमपास हो जाएगा।
डैडीजी, आपको क्या जरूरत है इस नाशुक्रे इंसान मे फिर से मुँह लगाने की। पता है जब कुँवारी थी और गाँव में अपडाउन करती थी, तो ये भी अपने कॉलेज के लिए जानबूझकर उसी बस में बैठते थे। मुझे कविता व चुटकुले नुमा हास्य कविता सुनाना चालू कर देते थे।
बेटा, तूने कभी ये बात मुझे बतायी क्यों नहीं? देवानन्द जी चौंकते हुए बोले।
क्या बताती ? मम्मीजी विश्वास करती? बेकार मेरा चरित्र पर आप लोग शक करते। इसने ऐसी करतूते कईं मास्टरनियों के साथ करके, उनके घर तुडवाने में कोई कसर नहीं रखी। इनके साथ कई साहित्यकार और प्रोफेसर तो बात करते भी डरते थे। हमारे स्कूल के प्रिन्सीपल सर डॉ. दीनदयाल शर्मा भी जाने माने साहित्यकार थे। पर इन जैसा ओछा स्वभाव किसी का नहीं देखा। घृणा भरे स्वर काव्या ने उत्तर दिया।
पर बेटा दिवाकर था तो विजयी और मेहनती। उन्होंने काव्या का मूड ठीक करने के लिए कहा।
गहरे हरे रंग की रेशमी साडी का पल्लू झटकते हुए काव्या बोली डैडी मेहनती तो आप भी कम नहीं है। पिछले पचास सालों आप की चार सौ से ज्यादा कहानियाँ छप चुकी हैं। चार उपन्यासों में से दो को कईं पुरस्कार मिल चुके है। पाँच विद्यार्थी आप के साहित्य में पी.एच.डी. कर चुके हैं। यह क्या कम है ? नीचे चलिए, सभी खाने की मेज में आपका इंतिजार कर रहे हैं।
ये लीजिए आप की दवाई। पानी की बोतल और दवाई उन्हें पकडा कर नयनताराजी बोली। काव्या नीचे उतर गयी, तो झूले में उनके बगल में बैठ गयी। नयनताराजी की सलीके से प्रेस की हुयी नीली साडी और गुलाबी ब्लाउज को सराहना की दृष्टि से वे देख ही रहे थे कि दिवाकर का नम्बर मोबाइल स्क्रीन पर चमकने लगा। वे बच्चों की तरह कौतूहल से बोले हाँ, भई दिवाकर प्रोग्राम शुरू हो गया क्या ? कौन-कौन साहित्यकार आए है?
दूसरी तरफ से प्रो. दिवाकर झुँझलाते हुए बोले यार देवानन्दजी, आप के शहर के लोग भी अजीब है। लोगों के टाइम की कदर जानते ही नहीं। अब पता चला कि बूफे की जगह सिर्फ चाय-नाश्ता है। सोचता हूँ, आप से मिलता चलू।
देवानन्दजी हैरानी से बोले, गजेन्द्रजी तो आप के पुराने मित्र है। आपको उन्होंने मुख्य अतिथि बनाया है। मुझे तो.....। उनकी बात पूरी होने से पूर्व नयनताराजी ने मोबाइल छीनकर, माइक ऑन किया और बोला प्रो. दिवाकर नहीं, नहीं नत्थूजी, ये हम सभी जानते है कि वर्माजी आपकी तरह उच्च शिक्षित और साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक नहीं है। नहीं, आपको बुलाने वाले गजेन्द्रजी की तरह आयोजक, पर है तो एक स्वाभिमानी लेखक।
जिस लेखक ने अपना पाठक वर्ग कर रखा है। वो किसी से मिलने क्यों जाये? और हाँ। हमारे घर, इतनी रात को आने की जरूरत नहीं है। कहकर नयनताराजी ने फोन काट दिया। देवानन्द जी बच्चे की तरह ठुनकते हुए बोले अगले ने चलाकर फोन किया था। मैं भी दो-चार बातें कर लेता।
जब उसे पता चलता कि गजू ने आपको आमंत्रण कार्ड भेजा ही नहीं। क्योंकि उसे अब आपसे कोई मतलब नहीं है। दिवाकर आप की क्या इज्जत करता? उसके सामने अपना दुखडा रोने से क्या होता ? सामने हमदर्दी दिखाता। बाद में चार जन के सामने आपको बेचारा साबित करता। आज का जमाना ही ऐसे ही लोगों का है, कि जो उनको निस्वार्थ रूप से मदद करता है, उसे ही ये बेवकूफ समझते है। उसकी भावनाओं के साथ खेलते हैं। समझे राइटर साहब। कहकर नयनताराजी उनके बालों में अँगुलियाँ फिराने लगी । उन्हें लगा कि उन्हें करेंट जैसा लग रहा है। ये करेंट नयनतारा जी की बातों का है या उनके सुवासित सुगन्ध का। वे सोचने बैठे।
उन्हें अपने ख्यालों में खोया देख नयनताराजी मुस्कुराते हुए बोली आफ साथ पचास साल गुजार चुकी हूँ। आफ अन्तस की पीडा को बखूबी पहचान रही हूँ। पर आपकी पहचान इतनी छोटी तो नहीं की, शहर में कोई साहित्यिक जल्सा कराने वाला आप को आमंत्रित करना भूल जाए तो आप अपनी काबिलियत पर शक करने लगे। नयनताराजी की बात सुनकर उनकी नजर आसमान की तरफ गयी। शरद पूर्णिमा का चाँद बादलों की ओर से निकल आया था।

उसकी शीतल किरणें खीर में अमृत वर्षा कर रही थी। नयनताराजी बोली, पहले यह खीर दिवाकर और गज्जू को खिलाते थे। अबके बार पास के झुग्गी में बाँट कर आएँगे। आप को ध्यान है, ये डुग्गीवाले आपको कितना सम्मान देते हैं, एक साहित्यकार के तौर पर नहीं। एक इन्सान के तौर पर । किसी गरीब की आस का दीया बनना हरेक के नरतीय कहाँ होता है? ज्यादातर लोग तो महफिल की समां बनने की जुगाड में जिन्दगी गुजार देते हैं। वे चांद को लक्ष्य करके बोले थैंक्यू चाँद। मुझे इस से उबारने के लिए।
उनका इतना कहते ही नयनताराजी खिल-खिलाकर हँस पडी। उन्हें लगा, उनके चारों मोगरों की कलियाँ बिखर गईं र्हं।

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