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काफ्का और ओशो

शशिकान्त आचार्य
समय बीत जाता है व्यक्तियों का, पर विचार यात्रा करते हैं अनंत की और अनंत की यात्रा में वे विचार व्यक्ति बन कर वापिस आते हैं।
काफ्का का हमेशा से मन था कि वह भी एक लेखक बने। उसका हमेशा, हमेशा से ना हो कर समय का वो बिन्दु होता था जिसको वह भूल चुका था और इसलिए वो उसका हमेशा हो जाता था। लेखक होना और लेखक बन जाना कितना अलग है। लेखक जब होता है, तो उसका लेखन पढने वाले की आँखों से दूर किसी खुले आसमान में चल रही हवा जैसा होता है जो किसी को दिखता नहीं है, पर होता हैं। उसी तरह लेखक बनना तब होता है जब लेखक को वो स्वीकार्यता मिल जाती है पाठक से, जब उसके लेखन को पढने वालों की आँखें मिल जाती है। काफ्का हमेशा लिखना चाहता था, पर इधर-उधर की बातें लिख कर सब मिटा देता था। काफ्का से कभी अपना खुद का लिखना नहीं हुआ और *यादा सुना था नहीं किसी और के जीवन को तो हमेशा जो पढा उसी से प्रभावित हो कर लिखा करता था और ये स्वीकार करना अत्यन्त आवश्यक था काफ्का के लिए कि काफ्का किस तरह का लेखक था। अभी सुबह के पाँच बजे थे और काफ्का पूरी तरह से सोया नहीं था। वह पूरी रात लिखने की कोशिश कर रहा था, पर सुबह जब लिखा हुआ वापिस पढा, तो सब कुछ मिटा दिया। बहुत कुछ लिखने और बहुत कुछ जीने की इच्छा कभी खत्म नहीं होती, लिखा हुआ और जिया हुआ मिटा कर वापिस शुरू से शुरू करना कितना कठिन होता है। यह काफ्का को महसूस हो रहा था उस सुबह। काफ्का के ठीक सामने एक खिडकी थी और उस खिडकी से वह आँखों से ओझल होते चन्द्रमा को देख रहा था। इतने में उसके कमरे में साथ रहने वाले ओशो की नींद खुलने का समय हो गया था और काफ्का के सोने का। ओशो हमेशा सुबह जल्दी उठ जाया करता था और जब तक काफ्का सो रहा होता, तब तक ओशो अपना ध्यान करता था। सुबह के 8 बजे ओशो उठ कर काफ्का और खुद के लिए काली कॉफी बनाता था। एक काली कॉफी ही थी जो ओशो और काफ्का को एक जैसा बनाती थी। काफ्का के लिए ओशो का कॉफी बना कर उसके बिस्तर के पास में रख देना सुबह का होना था।
तुम पूरी रात सोते क्यों नहीं हो? ओशो ने पूछा
जैसे ही पता चलेगा बता दूँगा तुझे, काफ्का ने खिन्नता से जवाब दिया।
ये पूरी रात नहीं सो पाने की खिन्नता मुझ पर क्यों निकल रही है भाई? ओशो ने मजाक में बोला
जब पता है सो नहीं पाता, तो पूछा क्यों कि सोता क्यों नहीं हूँ, काफ्का ने गुस्से में बोला।
तू कॉफी पी ले और नहा ले, मैं तैयार होता, ओशो ने बात को खत्म किया
तू रात को सोता क्यों है? काफ्का ने पूछा
क्योंकि मुझे नींद आती हैं, ओशो ने बात खत्म की और उठ कर बाहर बालकनी में जा कर खडा हो गया।
काफ्का और ओशो एक कमरे में तो थे, पर किसी एक विचार में एक जैसे नहीं। ओशो स्वभाव से शान्त था तो वही काफ्का स्वभाव से बेचैन। ऐसा कोई दिन नहीं होता था कि काफ्का अपनी बेचैनी से बाहर दिखा हो और ऐसा कोई दिन नहीं था जब ओशो अपने शान्त मन को छोड कर काफ्का से परेशान हुआ हो। काफ्का और ओशो एक ही कम्पनी में काम करते थे। ऑफिस जाना और आना दोनो साथ में करते थे। ऑफिस में जहाँ ओशो को सभी पसन्द किया करते थे, वहीं काफ्का को बस एक ही व्यक्ति पसन्द करता था वो था उस कम्पनी का चौकीदार जो कि काफ्का के साथ बैठ कर दोपहर के खाने के बाद सिगरेट पिया करता था। काफ्का और ओशो अक्सर बहस किया करते थे और हमेशा उनकी बहस राजनीतिक और आर्थिक ना हो कर, दार्शनिक एवं सामाजिक होती थी। काफ्का को सामाजिक बहसों में पडना पसन्द नहीं था पर ओशो कोई भी दार्शनिक बहस काफ्का से बिना सामाजिक बहस को बीच में लाए नहीं कर पाता था। शाम का वक्त हो गया था और दोनों ऑफिस से घर आ चुके थे। शाम की चाय बनाने की जिम्मेदारी काफ्का की थी, ओशो कहता था कि काफ्का चाय अच्छी बनाता हैं, अब ये चाय बनाने से बचने का तरीका था या सच में काफ्का चाय अच्छी बनाता था ये ओशो ही जानता था।
आज चाय *यादा बन गयी है, काफ्का ने चाय कप में उडेलते हुए बोला।
तुम हमेशा ही चाय *यादा बनाते हो, ये पहली बार नहीं है, ओशो ने कहा।
हाँ, तो तुम बना लिया करो अगर तुम्हें लगता मैं *यादा बनाता, काफ्का ने फिर खिन्नता से जवाब दिया।
पर मैंने कब कहा कि तुम *यादा बनाते तो गलत बात है, और तुम आज इतना गुस्सा क्यों हो? ओशो ने पूछा
मैं कल रात से कुछ लिखना चाहता हूँ, पर कुछ लिख नहीं पा रहा, काफ्का ने बोला
तुम क्या लिखना चाहते थे? ओशो ने पूछा
मैं कुछ अलग-सा लिखना चाहता हूँ, काफ्का ने जवाब दिया।
पर कैसे अलग? वो उस कीडे वाली कहानी के जैसे? ओशो ने पूछा
तुम्हें उस कीडे वाली कहानी से क्या समस्या है? काफ्का ने ओशो को घूरते हुए पूछा
नहीं, समस्या कुछ नहीं है बस वो कहानी अपने आप में समस्या है, ओशो ने मजाक में कहा
क्या समस्या है बताओ, काफ्का ने फिर पूछा
बस उस कहानी में समस्या ही तो है, उपाय कहा है? ओशो ने जवाब दिया।
तो हर कहानी मतलब उपाय दे तुम्हें तभी वो कहानी है? काफ्का ने पूछा
मैंने कब ऐसा कहा? तुमने कहा समस्या क्या है? मैंने उसका जवाब दिया कि पूरी कहानी ही समस्या है बस, ओशो ने फिर मजाक में कहा
तुम और तुम्हारा दर्शन दोनो मेरे समझ में नहीं आएँगे, काफ्का ने कहा

अगर आ गए तो समझना वह तुम्हारा अन्तिम लिखना होगा, ओशो ने कहा
मतलब? काफ्का ने उत्सुकता से पूछा
मतलब यह कि मेरे दर्शन को समझ लेना, अपनी बेचैनी को खत्म करना है, और अगर तुम्हारी बेचैनी खत्म हो गयी, तो तुम लिखोगे क्या? तुम्हारी बेचैनी ही तो तुम्हारा लेखन है, ओशो ने निर्णायक स्वर में कहा।
एक तो ये जो तुम्हारा घमण्ड है ना मरवाएगा तुम्हें, काफ्का ने कहा
मैंने कब घमण्ड दिखाया? ओशो ने पूछा
नहीं, तुम रहने दो, तुम्हें नहीं दिखेगा, और मैं ध्यान रखूँगा कि मुझे तुम्हारा दर्शन समझ में ना आए, काफ्का ने बोला।
ओशो हमेशा चाय पीने के बाद शाम को एक बगीचे में जाया करता था और शाम को खाने के समय ही घर आया करता था, तब तक वह बगीचे में बैठ कर वह आए लोगों के साथ बातें किया करता था। उसकी बातें सभी को उसकी तरफ आकर्षित करती थी सिर्फ काफ्का को छोड कर। काफ्का को ओशो की बातें झूठा सुकून देने वाली लगती थीं, वहीं दूसरे लोगों को ओशो की बातों में जीवन का अर्थ समझ आता था। काफ्का को घर से बाहर निकलना पसन्द नहीं था। वह घर पर रह कर ही पढता था शाम के समय और जब कुछ पढता तो लिखने की भी कोशिश करता। ओशो घर आ चुका था और काफ्का उसकी तरफ देखे बिना अपने पढने में व्यस्त था।
क्या पढ रहे हो? ओशो ने पूछा
काफ्का ने ऐसे देखा ओशो को जैसे उसने उसके ध्यान को भंग कर दिया है और वापिस किताब में देखने लगा।

ओशो ने बिना कुछ बोले पानी पिया और अपने बिस्तर पर बैठ गया। काफ्का ने जैसे ही अपना पढना खत्म किया, ओशो की तरफ देख कर बोला
तुम्हें पता है जब मैं पढ रहा होता तो मुझे कोई आवाज नहीं चाहिए, तो जरूरी था पूछना कि क्या पढ रहा?
अगर तुम्हारा ध्यान इतना कमजोर है पढने में कि मेरे पूछने मात्र से ध्यान भंग हो जाता, तो तुम्हें पढने पर नहीं ध्यान पर ध्यान देने की जरूरत है, ओशो ने एक मुस्कान चेहरे पर रखते हुए बोला।
काफ्का ने एक हाथ से अपना सर पकडा और सोचने लगा कि इस व्यक्ति के पास कभी ऐसा होगा कि उत्तर नहीं होगे। जब भी कुछ बोलो, तो अपने उत्तर लेकर तैयार रहता है। काफ्का के लिए ओशो को कुछ बोलना शान्त से खडे समन्दर में पत्थर फेंकना तो था, पर ये समन्दर विचलित नहीं होता पत्थर से और उसको अपने अन्दर समा लेता। काफ्का के जीवन में क्या चल रहा था वो सिर्फ काफ्का को पता होता था, लेखन में क्या चल रहा वो ओशो को पता होता था। ओशो ये तो जानता था कि काफ्का बेचैन है, पर उसकी बेचैनी का कारण उसने कभी पता लगाने की कोशिश नहीं की थी। काफ्का और ओशो ने बैठ कर खाना खाया और घर की छत के कोने पर कमर को सटाकर खडे हो गए। ओशो और काफ्का दोनों के घर में और कौन था दोनो ने एक- दूसरे को कभी नहीं पूछा।
तुम यहाँ जब आए थे इस शहर में तो कितने डरे हुए थे ना? ओशो ने पूछा
हाँ, काफी, मेरे लिए शहरों का नाम, देशों के नाम जैसा होता था, एक शहर से दूसरे शहर जाना जैसे एक देश से दूसरे देश, इसलिए डरा हुआ था, काफ्का ने जवाब दिया
और अब? ओशो ने काफ्का के बोलने से पहले ही ये सवाल कर दिया
अब भी डरता हूँ, पर मेरे डर अलग है, मेरे डर अब इस शहर के नहीं है, मेरे खुद के है, काफ्का ने जवाब दिया।
तुम्हारा सबसे बडा डर क्या है? ओशो ने पूछा
मेरे पिता के सामने खडे होना, काफ्का ने आसमान की तरफ देखते हुए बोला
ओशो काफी देर चुप रहा, जैसे वह काफ्का को जानता था, उसने जो अपना डर बताया उसको भी और फिर गहरी साँस लेते हुए पूछा, तुम्हारी बेचैनी का कारण क्या है?
कुछ नहीं, बता दिया, तो तुम दुर करने की कोशिश करोगे और मैं चाहता नहीं कि मैं अपनी बेचैनी तुम्हारे तुच्छ से दर्शन से दूर करूँ, काफ्का ने चुटकी लेते हुए कहा
मैं तुम्हारी बेचैनी दूर नहीं करना चाहता, मैं बस जानना चाहता हुँ, तुम जो कहानियाँ लिखते वह तुम्हारी बेचैनी तो बताती पर उसका कारण नहीं, ओशो ने गम्भीर स्वर में कहा
मुझे सोने दो और तुम भी सो जाओ, ऐसा कह कर काफ्का वापिस कमरे में आ गया और आँखे बन्द कर के लेट गया।
ओशो जानता था कि काफ्का सोने वाला नहीं था पर वह अपनी बेचैनी के कारणों को बेशर्मी से ओशो के सामने रखने वाला भी नहीं था।
रात हो गयी थी और काफ्का फिर से रात की खाईं के सामने खडा था, उसमें कूदना एक ऐसी अनिश्चित यात्रा पर निकलना था जिसका अर्थ उस रात की खाईं के रास्ते सुबह की सडक पर निकलने पर ही समझ आ सकता था। वह उस खाईं का इस्तेमाल हर रोज लिखने के उद्देश्य से करता और बहुत सारी रातें बस वो उस खाईं में पूरी रात घूमते हुए निकाल देता, जो भी परछाई दिखती खाईं के अँधेरे में वह उसको लिखता देता और जब सुबह की सडक पर वह पहुँचता और अपने लिखे को देखता, तो हर बार ही उसको वो परछाइयाँ जिनको उसने शब्द दिए थे सुबह की रोशनी में सब झूठ दिखाई देती और वह परछाइयों का झूठ सहन नहीं कर पाता और मिटा देता। उसके लिए ओशो का सोना, खाईं का उसके लिए अपने दरवाजे खोलना था। उस रात ओशो सोया नहीं और पूरी रात पढे जा रहा था, काफ्का उसके सोने का इंतजार करता रहा और आँखें बन्द कर के लेटा रहा। ओशो ने पूरी रात किताबें पढीं और पूरी रात में उसने तीन किताबों को पढ दिया था। ओशो को पढना पसन्द था और उसके लिए पढना ध्यान में बैठने से कम नहीं था। उस सुबह कुछ अलग हुआ, ओशो सुबह पाँच बजे सोया और काफ्का सुबह पाँच बजे उठा, काफ्का को पता ही नहीं चला कि कब वह ओशो के सोने का इंतजार करते करते खुद सो गया था। काफ्का की नींद ओशो के सोने के बाद खुली और उसने देखा की रात की खाई ने अपने दरवाजे बन्द कर दिए थे और सुबह की सडक की चमक उसकी आँखो पर खिडकी से होते हुए गिर रही थी। उसको ओशो पर गुस्सा नहीं आ रहा था, वह उठा और छत पर जा कर टहलने लगा, सुबह की आवाजें उसके कानों में घुल रही थी और उसको रात को हुई बारिश से जो मिट्टी गीली हुई थी उसकी खुशबू महसूस हो रही थी अपनी साँसों में। वह एक अलग तरह की उत्तेजना अपने शरीर में महसूस कर पा रहा था। पहली बार उसे बेचैनी महसूस नहीं हो रही थी, वह शान्त था और जैसे दूर क्षितिज से निकलते हुए सूरज को पहली बार देख रहा था, उसके लिए ये इतना नया था की उसको ये सब कुछ जीवन में पहली बार महसूस हो रहा था ऐसा लग रहा था।
ओशो और काफ्का तैयार हुए और ऑफिस के लिए निकल गए। ओशो कभी अपने ऑफिस में नहीं बैठता था, वह अपने ऑफिस के पीछे जो पेड था उसके नीचे जा के बैठ जाया करता था और जो भी काम होता वही से कर लिया करता था। काफ्का पूरे दिन ऑफिस में रहता था। काफ्का के ऑफिस के सामने वाली केबिन में एक महिला बैठती थी। काफ्का ने इस महिला से काफी बातें की थीं किसी समय में और इस पर दो-तीन कहानियाँ भी लिख दी थीं पर इस महिला को पता नहीं था, एक तो ओशो को पता था और एक काफ्का को। ओशो ने जब इस औरत पर लिखी कहानियाँ पढीं थी। ओशो ने काफ्का से पूछा- ये सब सच है?
तुझे कहानी कैसी लगी ये बता, सच झूठ कहानी में मत ढूँढ।
अगर यह सच है और तुमने उस औरत के सच जो उसने सिर्फ तुम्हें बताए उनको तुमने अपनी कहानी में डाला है, तो बहुत गलत किया है।
तुझे पता है उसने मुझे क्या कहा हैं? उसका नाम लिखा है मैंने?
पर पढने से पता चल रहा कि ये उसी की कहानी है।
एक तो ये कहानी उसकी नहीं मेरी है और सच और झूँठ मैं ढूँढता नहीं कहानी में, मैं ढूँढता हूँ कहानी।
तुम और तुम्हारी कहानी की महिमा तुम ही जानो, पर मुझे जो लगा मैंने बोल दिया।
ओशो और काफ्का दोनो प्रेम को लेकर बहुत अलग विचार रखते थे। एक दिन काफ्का एक प्रेम पत्र लिख रहा था और जब ओशो ने पढने की कोशिश की, तो काफ्का ने उसको नहीं दिखाया। ओशो समझ गया कि काफ्का कोई कहानी नहीं लिख रहा है। उसने ओशो से पूछा
प्रेम के बारे में तुम्हारे क्या विचार है?
प्रेम किसी ऐसे कत्ल की तरह है जिसमें दर्द तो है पर वह दर्द आप चाहते हैं, आपको पता है आप मर जाएँगे, फिर आप चाहते हैं कि आपका कत्ल हो।
ओशो जवाब सुन कर हँसने लगा जैसे काफ्का ने बहुत ही बचकाना-सा उत्तर दे दिया हो।
प्रेम कब से कत्ल होने लगा? प्रेम तो ऐसी साधना है जिसमें आनन्द के सिवा कुछ हो ही नहीं सकता। अगर प्रेम आपमें आनन्द ना उपजा पाए, जीवन का तो वह प्रेम नहीं।
काफ्का ओशो को काफी देर तक देखता रहा। जैसे वह सुन नहीं, बस ओशो को देख रहा था। ओशो के विचार काफ्का के लिए ऐसे थे जैसे आग में पानी डाल दिया हो किसी ने। बडी मुश्किल से काफ्का ने नजरें हटायी ओशो से और बोला -
तुम जो कह रहे वह साधना हो सकती प्रेम नहीं। प्रेम तो वो अग्नि है जो आपको जलाती भी है और आश्चर्य की बात यह है कि आप उसमें जलना भी चाहते हैं।
ओशो से रहा नहीं गया और उसने बात को खत्म करने के इरादे से बोलना शुरू किया-
प्रेम साधना ही है, अगर प्रेम में साधना नहीं, तो वह प्रेम नहीं। तुम्हारा प्रेम कब्र जैसा प्रतीत होता है जिसमें शान्ति तो है, पर मौत के साथ, वही मेरा प्रेम किसी सन्त की गुफा जैसा जिसमें शान्ति भी है और साधना भी। मैं तुम्हारे प्रेम में वो शान्ति नहीं देख पा रहा।
प्रेम में शान्ति होती ही नहीं है, अगर आपका मन अशान्त ना हो, तो आप प्रेम में नहीं हो, काफ्का ने कहा।
मैं तुम्हें नहीं समझा सकता क्योंकि तुम्हारे लिए प्रेम जहर है जिसे तुम पीना पसन्द करोगे और मेरे लिए प्रेम अमृत जिसे मैं ना भी चाहूँ पीना, तो भी ये मुझे ढूँढ ही लेगा, ओशो ने बात खत्म की।
काफ्का उठा और दूसरे कमरे में जा कर लिखने लगा और इस बार उस से एक शब्द नहीं लिखा गया। उसके दिमाग में ओशो की बातें गूँज रही थीं और वह अपने पत्र में ओशो का दर्शन नहीं चाहता था।
दोनो को ऑफिस में अलग नामों से जाना जाता था। ओशो का असली नाम राजेश था और काफ्का का मानव। दोनो एक-दूसरे से उतना ही विपरीत थे जितना ओशो और काफ्का अगर एक समय के होते तो होते। एक दिन उन दोनो का एक सहकर्मी मित्र करन इनके साथ इनके कमरे पर आया
अरे करन तुम्हारी एक किताब तुम यही भूल गए, काफ्का ने पीछे से आते हुए बोला।
करन ने काफ्का से कामूँ की द आउट्साइडर ली और एक कुटिल मुस्कान के साथ वहाँ से चल दिया।

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