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प्रिंस चार्मिंग

शहादत
यह एक अजीब दास्तान है, जिसे मेरे सबसे विश्वस्त और करीबी व्यक्ति ने सुनाया है।
वह ढलती मई का एक उमस भरा दिन था। उत्तरी छोर पर बादल कई दिनों से अडे-खडे गरज रहे थे। सूरज हर रोज निकलता और किसी चतुर और चालाक भेडिये की तरह बादलों से अपना दामन बचाता पूरी तेजी से सारा दिन चमकता।
काले बादलों के उस जमाव से हवा ठहर गई थी। पूरा वातावरण किसी दमघोंटू कमरे का-सा एहसास करा रहा था। गर्मी ऐसी थी कि पसीना आने से पहले ही सूख जाता। दोपहर के वक्त तो आँखों के आगे सितारे टूटने लगते। धुँधलापन छा जाता और कुछ भी साफ नजर न आता।
अमान जब अपने दोस्त के घर से निकला था, तो ग्यारह से कुछ ऊपर ही का समय हुआ होगा, पर गर्मी इतनी कि जैसे दोपहर अपने उफान पर हो। गली में दूर-दूर तक उसे कोई नजर नहीं आया। सुबह नौ बजे जब वह आया था, तो गली में कितनी चहल-पहल थी। इतवार का दिन होने के कारण बच्चे गलियों में खेल रहे थे। गली के नुक्कड और अन्दर वाले हिस्से में सब्जी की ठेलियों पर खडी आपस में बातें करतीं औरते सब्जियाँ खरीद रही थीं। कपडे और औरतों के सामान बेचने वाले सौदागर आवाज लगाकर अपने सामान की नुमाइश कर रहे थे।
गली में घुसते ही उसने इस पूरे नजारे को देखा था। पहली घण्टी पर ही उसके दोस्त की अम्मी ने दरवाजा खोल दिया और वह अन्दर चला गया। अब जब महज दो घण्टे बाद वह घर से निकला था, तो गली इस तरह सूनी थी जैसे किसी वीरान खण्डहर महल का कोई गलियारा।
गर्मी इंसान को सबसे ज्यादा परेशान करती है, उसके दोस्त ने कहा।
उसकी आवाज सुनकर उसने अपने दोस्त की तरफ कुछ यूं देखा जैसे सोच रहा हो कि वह उसके पास क्यों आया था?
फिर उसने उसके हाथों को देखा, जो किताबों और नोट्स का बण्डल उसकी रेंजर साइकिल के कैरियर में फिट कर रहे थे, उसे याद आया कि वह उसके पास दिल्ली पुलिस एग्जाम की तैयारी के लिए मैटीरियल लेने आया था।
पिछले कुछ दिन उसके ऐसे ही बीते थे, बेचैनी और बदहवासी में। उसने अपने सामने देखा और गर्मी की तपन को महसूस करने की कोशिश करते हुए बुदबुदाया,
गर्मी से ज्यादा इन्सान को उसके ख्यालात परेशान करते हैं।
उसने अपने दोस्त से हाथ मिलाया और साइकिल पर सवार होकर घर की ओर चल दिया।
वह वाकई पिछले कुछ दिनों में गर्मी से ज्यादा अपनी ख्यालात से परेशान रहा था। गर्मी को तो छोडो उसे अपने आस-पास की चीज का भी एहसास नहीं था। ख्यालात भी ऐसे कि उन्हें किसी के सामने बयान भी नहीं किया जा सकता। यह एक किस्म की उधेडबुन थी, जो उसके दिमाग में हर वक्त चलती रहती। उस चीज को तलाशने की कोशिश करती, जो अब उसके पास नहीं थी। पर जब वह उसके पास थी तो उसे कभी उसके बारे में इस तरह के ख्यालात नहीं आए। वह चीज अब उसके सामने से गुम हो गई थी, या फिर उसने ही उसे गुम हो जाने दिया था। किसी रहस्य की तरह... और रहस्यमय चीजे इन्सान को हमेशा उत्तेजित करती हैं।
कभी अपने शान्त और प्रसन्नचित स्वभाव से सबको आकर्षित करने वाला वह घुंघराले बालों और गठीले बदन वाला नौजवान उत्तेजित था। शान्त नदी में आए किसी उबाल की तरह। अन्दर ही अन्दर दहकता यह उबाल उसके वजूद को किसी लावा में तब्दील कर रहा था। उसके चेहरे के बरअक्स उसकी आँखें इस उत्तेजना को कहीं ज्यादा नुमाया करतीं। उसकी आँखें, जो किसी नरम और नाजुक गुलाब के पौधे की हरी पत्तियों के आकार-की-सी थी। गोल नाक और लाल होंठ। उसके ऊपरी होंठ पर, दाएँ तरफ एक काला तिल था। चौडा चेहरा और उस पर भरी हुई सुनहरी दाढी, उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगती। जब वह स्कूल में था और उसके दाढी भी नहीं आई थी, वह लगातार तीन साल स्कूल के सबसे स्मार्ट लडके का खिताब जीतता रहा था। कॉलेज जाने तक उसका चेहरा दाढी के सुनहरी रोओं से, जो उसे किसी जर्मन नौजवान की सी आभा देती थी, भर गया था। फर्स्ट ईयर के आखिर में जब कॉलेज में जिले के बीस साल तक के नौजवानों का एक मॉडलिंग इवेंट आयोजित किया गया तो उसमें भी उसने फर्स्ट प्राइज जीता था।
कॉलेज में उसके ज्यादातर दोस्त उसके स्कूली सहपाठी ही थे। फिर उनमें कुछ नए लोग भी शामिल हो गए। वह हर वक्त अपने इन नए और पुराने दोस्तों से घिरा रहता। लाइब्रेरी, कैन्टीन, बिल्डिंग ब्लॉक के बाहर पार्क में या फिर नाटक के प्ले ग्राउण्ड की सीढियों हर जगह उसके दोस्त उसके साथ रहते।
उसकी मित्र मण्डली कॉलेज में दूर से ही नजर आ जाती। हँसते-खिलखिलाते चेहरे और हर वक्त बात करते होंठ। हर तरह के दुख और गम से परे, उसी किस्म के कामों और ख्यालों में गुम, जिस तरह के इस उम्र के नौजवान करते और देखते हैं।
उसके कुछ दोस्त कॉलेज में होने वाले नाटकों में बडे जोश-ओ-खरोश से भाग लिया करते थे। हर नाटक में वे बहुत से छोटे-बडे किरदार निभाया करते। उनमें से कई का मानना था कि अमान को भी उनके साथ नाटक में पार्टिसिपेट करना चाहिए। वे उसकी कद-काठी और खूबसूरती पर मोहित थे। उनका मानना था कि अगर वह एक्टिंग सीख लेता है तो वह यकीनन एक अच्छा एक्टर बन सकता है।
एक दोस्त, जो मीर की दीवानी थी और गालिब की शायरी गुनगुनाया करती थी, वह उसे अपने लिखे हर नए अशआर सुनाया करती। उसका मानना था कि अगर वह शायरी सीख लेता, तो वह एक बहुत शानदार शायर हो सकता है।
इसी तरह एक दोस्त बहुत अच्छी पेन्टिंग किया करती थी। उसने उसका एक स्केच भी बनाया था। उसी ने उसे उस स्केच पर प्रिंस चार्मिंग नाम दिया था।
उस स्केच को देखकर उसके दोस्तों ने उस पेन्टर से कहा था, वाकई, अमान किसी राजकुमार की तरह खूबसूरत है। तुमने इसका एकदम सही नामकरण किया है।
अपनी तारीफ सुनकर उसने शरमाकर अपनी नजरें झुका ली थीं और उसका चेहरा लाल हो गया था। उसके दोस्तों ने जब उसकी वह हालत देखी, तो उन्होंने अपनी बात का विषय बदल दिया और फिर वे अगले लेक्चर में पढाए जाने वाले टॉपिक पर बात करने लगे।
वह लेडी पेन्टर शायद उसे पसन्द करती थी। इस बात का उसे एक बार ख्याल भी आया था। वह उससे अकसर अकेले में बात किया करती, और जब तक वह उससे बात कर रहा होता, तो हमेशा मुस्कुराता। इस पर भी उसके दिमाग में कभी इस तरह के ख्यालात नहीं आए थे। जैसे ख्यालात से वह इन दिनों परेशान था।
उसके ये सभी दोस्त उसे इतना चाहते थे कि जब कभी वह कॉलेज नहीं जा पाता या कॉलेज की छुट्टी होती तो ये उसके घर, उससे मिल पहुँच जाया करते। घर के बाहरी हिस्से में बना वह आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित बैठकखाना, उस दिन तरह-तरह की बातों, ठहाकों, गप-शप और खाने की आवाजों से गूँजता रहता।
मौहल्ले के लोग इन स्वच्छन्द पक्षियों सरीखे नवयुवक और युवतियों की उन्मुक्त हँसी, अनकही बातों और चहचहाते चेहरों को बेवकूफों की तरह खडे देखते रहते। वे समझ नहीं पाते कि ये लोग क्या बाते करते हैं और किस बात पर इतना हँसते हैं। वह क्या चीज है जिसने उन्हें इतना खुश और बेपरवाह बना दिया है?
लोग इसी किस्म की और भी बहुत से बातें सोचते और कहते। पर वे कभी उस तह तक नहीं पहुँच पाते थे जहाँ वे पहुँचना चाहते थे।
ऐसा नहीं था कि अमान मौहल्ले का इकौलता लडका था, जो पढने जाता था, या जिसके दोस्त उससे मिलने उसके घर तक आते थे। उसके अलावा और भी बहुत से लडके-लडकियाँ स्कूल और कॉलेज में पढने जाते थे। लडकियाँ तो स्कूल से आगे कम ही पढ पाती थीं, पर कई लडके कॉलेज और दिल्ली तक पढने जाते थे। इन सभी के भी दोस्त थे और उनमें से कई उनसे मिलने उनके घर भी आया करते थे। पर जैसा अमान के साथ था, वैसा किसी के साथ नहीं था।
शायद इसलिए कि अमान बहुत खूबसूरत था और वह उस घर का बाशिन्दा था, जो मौहल्ले में होने के बाद भी वहाँ नहीं था। उस घर के होने के बावजूद उसके न होने के इस एहसास ने लोगों के बीच उस घर और उसके बाशिन्दों के लिए एक आकर्षण पैदा कर दिया था।
बहुत कम लोग उस घर की तरफ जा पाते थे। मौहल्ले की वे औरतें जिन्हें उस घर या उसमें रहने वाले लोगों से कभी कोई काम आ पडता तो वे भी शायद ही कभी उसका दरवाजा लाँघ पातीं। वे दरवाजे के बाहर खडी रहतीं। उत्सुक निगाहों से अन्दर का जायजा लेतीं और काम होते ही चली आतीं।
दूसरे लोगों के बरअक्स, वे लोग जो तब्लीगी जमात में थे और मौहल्ले के हर घर में दीन की दावत देने जाया करते थे, उन लोगों को भी उस घर के अन्दर जाने या उसमें झाँकने का मौका नहीं मिला था। उनकी आवाज पर शायद ही उस घर में से कोई जवाब आता हो। दरवाजे पर खडे होकर वे लोग तीन बार आवाज लगाते और जवाब न मिलने पर आगे बढ जाते।
तब्लीग में शामिल लोगों का यह काम भी नहीं था, लोगों के घरों में झाँकना। उन्हें तो बस हर बालिग मुसलमान को दीन की बात समझाना और उसे मस्जिद तक लाना था। उसे नमाज और कुरान सीखाना और इस लायक बनाना था कि वह शरीयत के मुताबिक सही-गलत की पहचान करने वाला मुसलमान बन जाए।
अपने इस काम को वे पूरी ईमानदारी और मेहनत से अंजाम देते। धीरे-धीरे ही सही उनकी इस मेहनत का असर हो रहा था और मौहल्ले के बहुत से नौजवान और पढे-लिखे लोग तब्लीग में शामिल होकर जमातों में हो आए थे। जमात से आने पर उन्होंने मौहल्ले के लोगों के साथ अपने पुराने ताल्लुकात को और मजबूत बनाया और उन लोगों को भी अपने साथ जोडने में कामयाब रहे। लोगों के इस कारवाँ को बढता देख जमात के साथी खुश थे, पर कुछ दिक्कते भी थीं। तब्लीग में शामिल होने वाले ज्यादातर अधेड उम्र और बूढे लोग थे। नौजवान बहुत कम थे, और जो थे भी, वे नियमित तौर पर मस्जिद नहीं आ पाते थे।
हमें नौजवानों पर ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है, जमात के नौजवान अमीर साहब ने कहा था।
अमीर साहब खुद भी खासा पढे लिखे थे और टेलर की दुकान चलाते थे। उन्होंने हाल ही में जमात की बागडोर सँभाली थी। यह उन्हीं की सलाह और मशवरों का नतीजा था, जो मौहल्ले की उस मस्जिद में, जिसमें कभी चंद बूढे लोग ही नमाज पढते थे, अब वहाँ अधेड उम्र और नौजवानों की भीड थी।
हमारे नौजवान और बच्चे, जो स्कूल-कॉलेज में पढने जाते हैं, वे इस कौम का कीमत अशाशा (वस्तु) है। यही लोग हैं जो आगे बढेंगे और इस कौम की रहबरी करेंगे। पर अगर उन्हें इस तरह खुला छोड दिया गया तो वे लोग गुमराह हो जाएँगे, भटक जाएँगे और अपने दीन और मजहब से दूर हो जाएँगे। उनकी तालीम या कामयाबी से तब दीन और कौम को कोई फायदा नहीं होगा। हमें उन्हें तब्लीग में शामिल करने की, मस्जिद में लाने की और अपने साथ जोडने की कोशिश करनी चाहिए। ताकि इस नौजवान नस्ल को बेदीनी, गुमराही और दुनिया की मौहब्बत से बचाया जा सके। अगर हमने कुछ नहीं किया तो उन लोगों के गुनाहों के जिम्मेदार हम भी होंगे। अल्लाह ने हमे अक्ल दी है और सही-गलत का इल्म भी। हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसे अपने लोगों तक पहुँचाए। उन्हें सही और गलत की तालीम दे। फिर हमारा तो काम ही यही है लोगों को बुरा काम से रोकना और सही काम का हुक्म देना।
अमीर साहब रुके और उन्होंने अपने सामने बैठे लोगों पर एक नजर डाली। जमात में शामिल हर शख्स की निगाहें उन्हीं के चेहरे पर जमी थी।
अमीर साहब ने आगे बोलना शुरू किया,
इन लोगों को जमात से जोडने के लिए हमें उनके स्कूल-कॉलेज जाने-आने के टाइम, खेलने और ट्यूशन जाने के टाइम का पता करना होगा। पता करना होगा कि वे कब क्या करते हैं और कब उनके पास वक्त होता है। इससे हमें उनकी जिन्दगी में दखल दिए बिना उनसे बात करने में आसानी होगी। वे आराम से हमारी बात सुन सकेंगे और अल्लाह ने चाहा तो मानेंगे भी।
उनकी इन सलाहों पर सही तरह से अमल किया जा सके, इसके लिए उन्होंने अपने नौजवानों साथियों की दो-दो और तीन-तीन की संख्या में जोडी बनाई और उन्हें अलग-अलग लडकों से मुलाकात करने की जिम्मेदारी सौंपी।
अमान से बात करने की जिम्मेदारी उन्होंने खुद ली। इस काम में अपनी सहायता के लिए उन्होंने अपने दो करीबी और चहेते साथियों को साथ जोड लिया।
अमीर साहब का मानना था कि अमान उनके लिए एक ऐसा मोहरा होगा जिससे वह इस दुनिया, दुनिया से मौहब्बत करने और इसी में गर्क रहने वाले, दुनिया के लिए अपने मजहब और कौम को भूल जाने वाले सभी बादशाहों को मात दे सकते हैं।
वह एक हसीन और खुबसूरत नौजवान है। उसके बात करने का अपना एक अन्दाज है। पढा-लिखा है और फिर जिस घर और खानदान से वह आता है, लोग जब उसे जमात में जाते देखेंगे, तो उनके दिल में भी खुदा का खौफ पैदा होगा और वे भी अपने रब की तरफ खींचे चले आएँगे।
उसके साथ एक बार हुई अपनी बातचीत को याद करते हुए उन्होंने कहा था कि उसका बोलने का अन्दाज शायराना है। अपने इस अन्दाज में जब वह मिंबर पर बैठकर तकरीर करेगा, तो लोग अपने होश गँवा बैठेंगे। सिर पर टोपी, टखनों से ऊपर सलवार और घुटनों से नीचे कुर्ता पहनकर जब वह जमात में जाएगा, तो हर कोई उसका मुरीद हो जाएगा। लोग उसकी बातों को न केवल सुनेंगे, उन पर अमल भी करेंगे।
अमीर साहब के ये ख्वाब जब हकीकत में तब्दील हुए, तो उनका असर उससे कहीं ज्यादा था, जितना कि उन्होंने सोचा था।
दो-चार बार की मुलाकात से ही वह नमाज पढने आने लगा था और फिर जल्दी ही उसने जमात में जाने का फैसला कर लिया।
वह इस अनजान दुनिया से, जो हमेशा से उसके सामने खुला पडी थी, एकाएक जुडकर अचंभित हुआ था। और खुश भी। उसे इन पहचाने हुए अनजाने लोगों से मिलकर खुशी हुई थी, जो एक ऐसी अनजानी दुनिया से सम्बन्धित बाते करते थे, जिसका दूर-दूर तक कोई निशान नजर नहीं आता था। इन अनजान लोगों की इन अनोखी और अद्भुत बातों का सबसे खास पुट यह था कि ये लोग उस अनजानी दुनिया की सभी बातें, इस देखी-भाली दुनिया, जिसमें वे रहते हैं, से जोडते हुए करते थे। कहते थे कि इसी दुनिया से होते हुए उस दुनिया का रास्ता जाता है। वह दुनिया, जो हमेशा रहेगी और वहाँ कोई गम न होगा।
इन लोगों से अपने उस शुरुआती अपनत्व और दीन यानी धर्म के प्रति अपने उस नए-नए लगाव के चलते वह तीन दिन की जमात में जाने के लिए तैयार हो गया था। इस बात से अनजान कि धर्म एक ऐसी अच्छाई है जो अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए हजारों बुराइयों को जन्म देती है। पर लोग इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है।
जैसे कि वह खुद भी नहीं था।
एक बार तीन दिन की जमात में जाने के बाद वह कई बार जमात में गया। लगभग हर महीने। कॉलेज में पाँचवे सेमेस्टर के बाद पडने वाली छुट्टियों में वह चालीस दिन की जमात में भी हो आया था।
इन जमातों में बीतते उसके हर दिन के साथ उसके दोस्त भी उससे जुदा होते चले गए। इस सबका असर सबसे ज्यादा उसकी कॉलेज की जिन्दगी पर पडा। कॉलेज से उसका एक तरह से मोहभंग हो गया। उसके दोस्त, जो उसकी चाहत में उसके घर तक खींचे चले आते थे, उनसे भी वह बडी बेरुखी से पेश आने लगा। क्योंकि, बकौल अमीर साहब, ऐसे ही लोग होते हैं जो एक मुसलमान को सही रास्ते से हटाकर गलत रास्तों पर लगा देते हैं। दुनिया के साथ-साथ उनकी आखरित भी खराब कर देते हैं। कोई साथ नहीं देता। खुदा के सामने हर किसी को अकेले ही अपने किए-धरे का हिसाब देना होता है। यार-दोस्त सब बारी-बारी छूटते चले जाते हैं।
और वाकई, वे सब बारी-बारी छूटते चले गए थे। फिर भी जब कभी वह कॉलेज जाता या बाजार और किताबों वाली गली में इत्तेफाक से उसे कोई दोस्त देख लेता तो वह उससे बात किए बिना न रह पाता। सबसे ज्यादा तो उसकी लडकियाँ दोस्त। वह शायरा और पेन्टर। और वे दूसरी लडकियाँ, जो उसे चाहती थीं, बिना उसकी जानकारी के।
इन्हीं घटनाओं को देखते हुए अमीर साहब ने उसे सबसे पहले पैगंबर की एक हदीस सुनाई थी। इस हदीस के मुताबिक, अगर एक जवान मर्द किसी औरत से दोस्ती करता है या उसके साथ कोई गलत काम करता है, तो याद रखे कि इसका बदला उसके घर की चार औरते चुकाएँगी। उसकी माँ, बहन, बीवी और बेटी। अगर वह नहीं चाहता कि कोई उससे सम्बन्धित इन चार औरतों के साथ वही सब करे, जो वह दूसरे की बहन-बेटियों के साथ कर रहा है, तो उसे इस सबसे खुद को बचाना होगा।
अमान की बहुत-सी लडकियों से दोस्ती थी, पर उसने कभी कोई ऐसा काम नहीं किया, जिससे कोई उसके चरित्र पर उंगली उठा सके।
मुझे नहीं लगता कि किसी लडकी से दोस्ती करना बुरा बात है, उसने सोचा था, अगर उसकी बहन भी किसी लडके से ऐसी ही नॉर्मल दोस्ती करती है, जैसी कि उसकी दूसरी लडकियों से है, तो वह कभी बुरा नही मानेगा। जिंदगी जीने के लिए हमें बहुत-सी चीजों की जरूरत होती है। जैसे हवा, पानी, खाना, घर और दोस्त। दोस्तों के बिना आप जिन्दगी का तसव्वुर नहीं कर सकते। फिर महज किसी गलत सोच या बुरे इरादे के चलते खुद को लडकी और लडकों के दबडों में बन्द कर लेना, सही नहीं है।
उसने अपनी इस सोच का इजहार अपने एक साथी से भी किया था। वह एक मौलाना था। उसने दारुल उलूम देवबन्द से पढाई की थी। अपनी इसी पढाई के चलते वह अमीर साहब के खास बन्दों में शामिल था।
उसने जब अमान के ख्यालात सुने, तो जवाब देते हुए कहा,
तुम्हें क्या लगता है कि कोई भी चीज ऐसे ही, आनन-फानन में हो जाती है। किसी भी चीज को होने के लिए एक प्रक्रिया, तरतीब से गुजरना होता है। ये यारी-दोस्ती, साथ उठना-बैठना, घूमना-फिरना और खाना-पीना, ये सब वही तरतीब यानी प्रक्रिया है, जो इंसान को उसी जगह ले जाती है, जहाँ वह जाना नहीं चाहता। और अगर जाना चाहता है, तो ये सब उसके काम को आसान बना देती हैं।
तुम अभी शुरुआती दौर में हो और तुम्हारा कोई गलत इरादा भी नहीं है, उसने अपनी बात आगे बढाते हुए कहा, पर तुम्हें क्या लगता है कि सब ऐसा चलने वाला है। नहीं मेरे दोस्त, तुम्हारे न चाहते हुए भी चीजें उसी तरफ जाएगी। यह मत भूलो कि तुम एक लडके हो और सामने वाली लडकी। दोनों के बीच खिंचाव होना आम-सी बात है। इसीलिए पैगम्बर ने लडकों को लडकियों से दोस्ती करने से मना किया है। अल्लाह ने जिन्हा (बलात्कार) की बहुत दर्दनाक सजा रखी है। इस दुनिया में भी और आखरित में भी। किसी लडकी को देखना, उसके बारे में सोचना या अपनी सोच में ही उसके साथ कोई गलत काम करना भी गुनाह। अगर किसी लडकी को देखकर तुम्हारें दिमाग में गलत ख्यालात आते हैं, तो मानो तुम उस काम को हकीकत में कर गुजरे हो। इसका गुनाह भी तुम्हें उतना ही मिलेगा जितना कि इसके करने पर। मेरी मानो तो अपने दिमाग से लडकी का ख्याल निकाल दो। हाँ, शादी के बाद पूरी मौज करना।
उसने हँसते हुए अपनी बात खत्म की थी।
मौलाना की बात तो खत्म हो गई थी, पर ये बातें अमान के दिमाग में हलचल मचा गई थीं।
क्या मतलब इसका, उसने अपने आपसे कहा, जो काम आपने किया ही नहीं उसके जिम्मेदार आप कैसे हो सकते हैं? महज सोच लेने से ही क्या कोई काम हो जाता है? फिर सोचों पर किसका नियंत्रण है? सोच तो हवा की तरह होती है। कब, कहाँ और कैसी सोच इन्सान के दिमाग में आ जाए इसका तो खुद सोचने वाले को भी नहीं पता होता। अगर किसी गलत बात के सोचने भर से ही इनसान उसका गुनाहगार हो जाता है, तो अल्लाह को उसे दिमाग ही नहीं देना चाहिए था। न दिमाग होता और न वह गलत सोच पाता। अब अगर उसके पास दिमाग है तो वे तो सोचेगा। इसमें अल्लाह की गलती है।’
लेकिन अल्लाह ने अगर इन्सान को दिमाग दे ही दिया है, तो क्या इंसान उससे गलत ही सोचेगा? उसने अपनी सोच के सिक्के को पलटते हुए दूसरी तरफ देखा, इंसान को अपनी सोच अच्छी रखनी चाहिए। पर गलत सोचों को भी तो नहीं रोका जा सकता। लेकिन अगर वह अच्छा सोचता है, तो उसे गलत सोचने का मौका ही नहीं मिलेगा।
उसने अच्छा सोचने का इरादा किया। पर वह इस इरादे पर कायम नहीं रह सका। जितना वह अच्छा सोचने की कोशिश करता, उतना ही उसकी सोच दूसरी दिशा में भागने लगती। एक ओर वह अपनी सोच को गुनाह, अजाब और जहन्नुम से डराता हुआ खुदा की तरफ लाने की कोशिश करता, दूसरी ओर उसकी सोच उसकी इच्छा के खिलाफ उन चीजों को बेपर्दा करती जिन्हें अब तक वह पर्दे में रखता रहा था। मानो उसका दिमाग उसके खिलाफ बगावत पर उतर आया था और वह हर वो चीज करने पर आमादा था जिसे वह नहीं करना चाहता था।
वह पूरी रात परेशान रहा और करवटें बदलता रहा। अगली दिन वह एक टाइम की नमाज भी सही से नहीं पढ सका। और उसके बाद किसी दिन भी नहीं।
वह जितना अपने मन को शान्त करने और उसे खुदा की इबादत में लगाने की कोशिश करता, उतना वह उन चीजों की ओर भागता, जिनसे वह उसे बचाना चाहता। वह अपने दिमाग को किसी ऑक्टोपस के पंजों में जकडा महसूस करता, जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। नमाज के दौरान वह खुद को कहीं ज्यादा बेबस महसूस करता। गन्दी सोचों से छुटकारा पाने के लिए वह कईं-कईं बार अपने सिर को झटका देता। इसके बावजूद, वे गन्दी सोचें उसके दिमाग पर इस तरह उड-उडकर चिमटी जैसे मधुमक्खी अपने छत्ती पर उड-उडकर बैठती है।
वह नमाज के खडा होता है और ये मधुमक्खियाँ खूबसूरत चेहरों, सुर्ख होंठों, चिकनी गर्दनों, गोला और चमकदार छातियों, मुलायम देह, गदराई जाँघों, उनकी बीच की योनियों और हिरनी जैसी नाजुक टाँगों की शक्ल में घूमने लगती।
नमाज में वह खुदा की तारीफ बयान करता और कहीं एक जोडी सुर्ख होंठ आकर उसके होंठों को सी देते। वह कुरान की सूरत पढता और कहीं से गोल, मुलायम और चिकनी छातियाँ आकर कुरान की उस सूरत पर छा जातीं। जमात की नमाज के दौरान वह मौलाना के पीछे खडा होता। मौलाना कुरान की सूरते पढता। वह सुनता और तभी उसका दिमाग उसकी किन्हीं गदराई हुई जाँघों के बीच ले पहुँचता। मौलाना पूरा नमाज पढा देते और वह वैसे ही ज्यों का त्यों खडा रहता।
घर आता। बिस्तर पर लेट जाता। सोचें ज्यादा परेशान करतीं, तो पढने वाले कमरे में चला जाता। किताब खोलता और उनमें लिखे शब्दों को पढने की कोशिश करता। लम्हे भर बाद ही जाने वे शब्द कैसे उसके सामने होंठों, छातियों, जाँघों, योनियों और खूबसूरत गर्दनों की शक्ल में घूमने लगते। वह किताब बन्द करता और बाहर निकल जाता।
वह सडकों और बाजारों में घूमता। पर सडकों और बाजार में जहाँ कहीं भी उसे कोई हसीन और खूबसूरत लडकी नजर आती उसका दिमाग सक्रिय हो जाता और वह उसे अपने ख्यालों में निर्वस्त्र करके बिस्तर पर पहुँच जाता। इन ख्यालों की वजह से कईं बार वह गाडियों, मोटरसाइकिलों और दीवारों से टकराते हुए बचा था।
सबसे ज्यादा बुरा हाल उसका कॉलेज में होता। तब्लीग में शामिल होने के बाद उसके बुरे व्यवहार के चलते उसके बहुत से दोस्त उससे दूर हो गए थे और जो कुछ थे भी उनसे वह बात नहीं करता था। लाइब्रेरी, कैन्टीन और पार्क में वह अकेला बैठा रहता और अपनी उस शायरा, पेंटर और दूसरी लडकियों के साथ बिताए उन खास लम्हों को याद करता, जब वह उनके साथ अकेला होता था। वह सोचता कि अगर वे लम्हें दोबारा लौट आए तो वे उनके साथ क्या कुछ कर सकता है? यह सोच उसके पाँव से लेकर सिर तक पूरे शरीर में एक करंट-सा दौडा देती। वह झुरझुरी-सी महसूस करता और उन लम्हों को हकीकत में बदलने के लिए उतावला हो उठता। पर किसके साथ? अब तो कोई था नहीं।
उसके एग्जाम हुए। वह कई सब्जेक्ट में फेल हो गया। लेकिन उसने बुरा नहीं माना। उसने सोचा कि वह मजबूत कद-काठी का है और पुलिस में उसे आसानी से नौकरी मिल जाएगी। उसने पुलिस के एग्जाम की तैयारी शुरू कर दी। इसके लिए उसने कोचिंग क्लासेस जॉइन की और कुछ किताबें खरीद ली।
वह कोचिंग पढने के लिए गया लेकिन पढ नहीं पाया। वहाँ उसकी क्लासमेट कई लडकियाँ भी थीं। जब वह उन लडकियों को देखता तो उसके दिमाग में वही मौलाना की कही हुई बातें और उनसे उपजे ख्यालात उसके दिमाग में घुमने लगते। सामने ब्लैकबोर्ड पर मास्टर रिजनिंग, मैथ्स और साइन्स के फॉर्मूले समझा रहा होता और वह अपने ख्यालों में अपने साथ बैठी लडकियों को निर्वस्त्र कर रहा होता।
क्लास खत्म होती और वह बाहर निकल आता। बाजार से होता हुआ घर जाता। रास्ते में उसे जब भी कोई लडकी या जवान औरत नजर आती उसके दिमाग में फिर वही सब ख्यालात उमडने लगते। एक बार तो उसने बेख्याली में एक औरत को लगभग छू ही दिया था। उस औरत ने उसका हाथ झटका दिया। एक बार उसने एक लडकी का हाथ पकड लिया और पिटते-पिटते बचा। इसी तरह एक लडकी के पीछे जाते हुए वह एक गटर में गिरने ही वाला था कि सामने से दौडता आता एक बैल उसमें आ गिरा और वह किसी तरह बच गया।
यह सब बाजार या घर से बाहर ही तक सीमित नहीं था। घर में भी उसका यही हाल था। रसोई में खडा एक बार वह अपने लिए दूध गरम रहा था। गरम होते-होते दूध उबलने लगा और जलने लगा। जलन की बू से उसकी छोटी बहन रसोई में आई, तो उसे देखकर भी उसके मन में वही सब ख्यालात घूमने लगे। उसने किसी तरह खुद पर काबू पाया और बहन को रसोई से बाहर कर दिया। ऐसे ही एक दिन घर का कोई प्लक खराब हो गया। वह उसे ठीक करने लगा। प्लक का तार अन्दर से जल गया था। उसने उसे बाहर निकाला और प्लास से उसके ताबे के रेशें बाहर निकालने लगा। ताबे के रेशे निकालते-निकालते अचानक पता नहीं उसे क्या हुआ उसने उस तार को अपने होंठों से छुआ लिया और करंट लगने से उछल पडा। उसने तार को छोड दिया।
हर बीतते दिन के साथ उसकी हालत इतनी खराब होती जा रही थी कि वह अपना ज्यादातर समय मस्जिद, बाजार, कोचिंग या फिर दोस्तों के यहाँ बिताने लगा। उसे घर और घर में मौजूद अपनी माँ-बहनों से डर लगने लगा। वह घर से अपनी साइकिल लेकर निकलता और बेमकसद इधर-उधर घूमता, सडक और गलियों की खाक छानता, यहाँ-वहाँ भटकता रहता।
अभी भी जब वह अपने दोस्त के घर से निकला था, तो तब ग्यारह से कुछ ऊपर ही वक्त हुआ था। अब जब वह अपने घर पहुँच रहा है, तो लगभग दो बजे चुके हैं। उसके दोस्त के घर से उसके घर की दूरी साइकिल से बमुश्किल पाँच-सात मिनट की होगी और वह लगभग तीन घण्टे बाद पहुँचा था।
धूप और गर्मी की वजह से मस्जिद के सामने का चौक एकदम खाली है। सडके सुनसान है और गलियों में धूल भरे गरम हवा के झोंके कटी पतंग की तरह डोल रहे हैं। उसने घर के सामने साइकिल रोकी और पलटकर मस्जिद की ओर देखा। जमात डेढ बजे हो चुकी थी और अब मस्जिद के दरवाजे बन्द थे। उसने सोचा कि वह मस्जिद जाए और नमाज पढकर वहीं कुछ देर आराम करे। फिर पता नहीं क्या सोचकर उसने घर का दरवाजा खोला और अन्दर चला गया। साइकिल को उसकी जगह पर रखा और बरामदे की ओर मुड गया।
बरामदा तीन ओर से कमरों से घिरा था। उसके दाएँ और बाएँ एक-एक बडे कमरे थे और सामने की ओर दो कमरे थे। बरामदे के आगे लोहे के गाटर का चैनल वाला दरवाजा लगा था और उस पर अन्दर से पर्दे पडे थे। गाटर के ऊपर एक बडा रोशनदान था। पिछली बार जब उसके अब्बू और बडा भाई दुबई से आए थे उन्होंने पूरे घर के लिए इस रोशनदान में एक एसी लगवा दी थी, जो बरामदे के साथ-साथ चारों कमरों को भी ठण्डा रखती थी। बरामदे के आगे, बाहर की तरफ एक ओर बरामदानुमा आहात बना था, यहाँ एक तख्त और कुछ कुर्सियाँ रखी थीं। इस आहाते में धूप आती थी, इसलिए यह रोशन रहता। जबकि बरामदे में गाटर वाला दरवाजा और पर्दे पडे होने के कारण धूप नहीं आती थी। इससे उसमें दिन में भी एक आरामदायक, ठण्डा और खुशनुमा अँधेरा छाया रहता। एसी चलने की वजह से भी उसमें गर्मी महसूस नहीं होती थी। दोपहर का खाना खाने के बाद वह अक्सर बरामदे में ही आराम किया करता। कभी-कभी अम्मी और बहन भी वहीं लेट जाती। अब्बूजी और बडा भाई जब दुबई से आते, तो वे भी दोपहर में बरामदे में ही आराम किया करते। बरामदा एक तरह से गर्मियों की दोपहर में पूरे परिवार की संयुक्त आरामगाह थी। जहाँ वे आराम के साथ झपकियाँ भी लिया करते।
बरामदे में घुसते ही उसे बाहर की गर्मी का शिद्दत से एहसास हुआ। उसका पूरा बदन पसीने से भीगा हुआ था और कपडे जिस्म से चिफ हुए थे। उसे पानी की तलब हुई। वह रसोई की ओर जाना चाहता था पर बाहर की रोशनी से एकदम अन्दर के अँधेरे में दाखिल होने से पहले कुछ दिखाई ही नहीं दिया, फिर थकान होने के कारण भी उसका मन भी रसोई तक जाने का नहीं हुआ। वह उस खुशनुमा अँधेरे में आगे बढा और ठीक एसी के सामने, जहाँ वह सीधे ठण्डी हवा फेंक रहा था, जाकर दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। उसने पास ही रखे सोफे से एक गोल, चाँद के आकार का मखमली तकिया उठाया और उस पर सिर रखकर लेट गया।
लेटते ही उसे नींद आ गई और नींद में उसने एक सपना देखा। उसने देखा कि वह गर्मी की एक दोपहर एक घर में जाता है। घर की राहदारी और बरामदों को पार कर वह एक कमरे में पहुँचता है। उस कमरे में हल्का अँधेरा है। कमरे की पूर्वी दीवार में एक खिडकी है। खिडकी पर पर्दा पडा है। हवा के झोंके से पर्दा बार-बार हिलता है और इससे रोशनी अँधेरे को कमरे में पूरी तरह हावी होने से रोक देती है। कमरे की उत्तरी दीवार से लगा एक पलंग पडा है और उस पर एक लडकी लेटी है। वह कमउम्र की एक खूबसूरत लडकी है। उस लडकी को देखती ही उसकी नसें चटखने लगती है और रगों में खून का बहाव तेज हो जाता है। वह धीरे-धीरे कदम बढाता लडकी के पास जाता है और उसके एक हाथ को अपने दोनों हाथों में लेकर चूमने लगता है। उसके साँसों की गरमाहट से लडकी की आँखें खुल जाती है। वह उससे अपना हाथ छुटाने की कोशिश करती है, पर जितनी वह कोशिश करती है उतना ही उसकी पकड लडकी के हाथ पर मजबूत होती जाती है। लडकी अपने दूसरे हाथ से उसे खुद से दूर करने की कोशिश करती है, तो वह उसका दूसरा हाथ भी कसकर पकड लेता है। लडकी उससे खुद को छुडाने के लिए छटपटाती है, पर कामयाब नहीं हो पाती। वह चीखना चाहती है। उसके चीखने से पहले ही वह उसके मुँह में अपनी जेब से रूमाल निकालकर ठूँस देता है। लडकी की आँखों से आँसू बरसने लगते हैं और वह अपनी आँखों को बन्द कर लेती है।
बाहर बारिश की झडी लगी है। बादल, जो कई दिनों से उत्तरी छोर पर डटे खडे थे और गरज रहे थे, उन्होंने किसी चतुर और चालाक भेडिये की तरह चमकते उस सूरज को फतह कर लिया था, जो कईं दिनों से उनसे बच रहा था और अब अपनी पूरी क्षमता के साथ बरस रहे थे। उस बारिश में मौहल्ले की सडक और गलियों में बाईक पर सवार दो पुलिस वाले लोगों से अमान के घर का पता पूछ रहे हैं। पुलिस वाले अमान के घर के दरवाजे पर पहुँचे, तो मस्जिद का मुअज्जिन असर की अजान (तीसरे पहर में पाँच बजे होने वाली अजान) के आखिरी बोल पढ रहा था।
अजान के पूरा होते लोग बारिश में ही नमाज की ओर मस्जिद के लिए चल पडे। मौहल्ले के आम नमाजी और तब्लीगी जमात से जुडे लोग मस्जिद में जा रहे थे और अमान के घर के दरवाजे पर खडे पुलिस वाले उसकी अम्मी को बता रहे थे कि अमान ने चार बजे सहारनपुर से दिल्ली की ओर जाने वाली ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली है। पुलिस ने उसकी लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। अब उन्हें लाश कल ही मिल सकेगी।
पुलिस वाले वापस चले गए और उनके जाने के तुरंत बाद लोगों आपस में इस बात की चर्चा कर रहे थे कि वह जो अमान ने सपना देखा था, वह सपना नहीं हकीकत था। और वह लडकी कोई ओर नहीं उसकी छोटी बहन थी।
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