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भरत प्रसाद की कविताएँ

भरत प्रसाद
किसी भी महामारी के वश में नहीं!

हमारी होशियारी के पैंतरा बदलने के सिवाय
बदला कुछ भी नहीं
महामारी हमें मौत दे सकती है
मगर नहीं मार सकती हमारा कठकरेजीवन
नहीं खत्म कर सकती सौ पर्दों में छिपा शातिर दिमाग
हमारी शतरंजी सोच को मार पाना
किसी भी महामारी के वश में नहीं।
मृत्यु की दहशत से वीरान हुई सडकों ने
हममें कोई बदलाव नहीं लाया
नदियों के जल में लौटता सोनापन
हमारे मन की कालिमा धोने में नाकामयाब रहा
हम फिर छीनेंगे नदियों का भविष्य
हम फिर से सजाएंगे सदाबहार जंगलों की चिताएँ
आकाश में आकाशपन लौट आया तो क्या?
हम फिर से छीन लेंगे उसका दिगंतव्यापी रंग
हम पाट देंगे आसमान अपने रंगभेद से
धरती दौडती है तो दौडें
अब नहीं दीवाना करने वाला होगा उसकी चुनर का रंग
अब नहीं हासिल होगी,सोलहों श्रृंगार करके
नृत्य करने की उसकी अलौकिक अदा
हम पृथ्वी से उसका बसन्त छीन लेने वाले
बुद्धिमान प्राणी हैं।

हम जब भी कोई शिखर छूते हैं
तय मानिए, उसी वक्त
नीचे गिर रहे होते हैं, अदबदाकर
नियतिपूर्वक।


युद्ध और कवि!

कविता सदियों से चीख रही है-युद्ध को रोको!
फिर भी युद्ध जारी है
कविता तानाशाह की धज्जियाँ उडा रही है
तानाशाह धज्जियाँ उडा रहे हैं-मनुष्यता की
युद्ध के विरुद्ध रोज-रोज जन्म ले रही कविता
युद्ध रोकना असम्भव होता जा रहा
कविता पूछती है-युद्ध क्यों होता है?
तानाशाह मुँह फिरा लेता है-हँसकर
मैं पूछता हूँ, कवि से!
या तो तानाशाह को तुम्हारी कविता की समझ नहीं
या तुम्हारी कविता ही नपुंसक हो चुकी है!
जब जंग छिडी हो,तो जरूरी नहीं
कवि सिर्फ कविता-कविता रचे
वह सडक पर उतरकर
युद्ध नहीं, बुद्ध-बुद्ध चिल्ला सकता है
वह कह सकता है-जुबान भी हथियार होती है
युद्ध में मारे गए लोगों पर
जार-जार आँसू बहाना उसके पूरे हक में है
युद्ध के नाम पर
तानाशाहों को याद कर तोपों पर थूकने से
उसे कौन रोक सकता है?
जब बारूदों की मुर्दागन्ध
मासूम बच्चों का गला घोंट चुकी हो
तो कलम-कागज के खिलौनों के साथ
कविता लिखते रहना पर्याप्त नहीं!












अन्धकार के पदचिह्न !

कतई नहीं फैलता अन्धकार सिर्फ बाहर ही
नहीं घिरती रात सिर्फ रातों में
आग लगना सिर्फ बाहरी घटना नहीं
बर्बादी का अर्थ सिर्फ लुट जाना नहीं
खून केवल शत्रुओं का ही नहीं होता!

चालाक चुप्पी की नियति है
अन्धकार से दुगुना अन्धकार
अमन की अहक का मिट जाना
आग लगने की खबर है,कहीं भीतर
तिल-तिलकर उजाले की मृत्यु
हमारे दोषी होने की गवाही भी है!

कौन है मनुष्य के सिवाय?
जो धरती को खा लेना चाहता है
सभ्यता के आरम्भ से ही
जिसके लिए दसों दिशाएं
अवैध इरादों के साथ नाचने का
रंगमंच हैं केवल
जिसके लिए खेतीबारी का अर्थ
मौत के सपने बोना और
मौत के सपने काटना है
जिसके लिए सुबह का आना
उम्मीद की अद्भुत आहट नहीं
दबी हुई मौलिक हिंसा
रोज-रोज फूट पडना है!!!!
हमें क्षमा कर देना अफगानिस्तान!

आकण्ठ जमी हुई घृणा
लबालब भर देती है जहर से खुद को
हिंसा की आन्धी मन में उठी हुई
खुद को तहस-नहस करती है पहले
प्रतिशोध से लबरेज आदमी
निर्जीव तलवार के सिवाय रह क्या जाता है?
क्या बचता है, अन्धकार के अतिरिक्त
ईर्ष्या से नाचते हुए आदमी में?

अफगानिस्तान की धरती इतनी उर्वर क्यों है?
बन्दूक की फसलों के लिए
मिट्टी की सोंधी महक में
बारूदों की बास कैसे भर गयी?
दरख्तों से झरती शांति को
आतंक का लकवा कैसे मार गया?

जान गँवाने की कीमत
सांसें छीनने वालों को कहाँ पता?
जिन्दगी को राख की ढेर करने वाले
सबसे ज्यादा काँपते हैं, अपनी मौत से
जिन्हें नहीं आता ईंटें जोडना
आशियाना मिटाते हैं, वे ही

हमें क्षमा कर देना अफगानिस्तान!
तुम्हारे नक्शे पर बहते खून पर
हमें आँसूं बहाना नहीं आता
तुम्हारी छाती पर मचे हुए ताण्डव को सुनना
हमारे अवसरवादी कान कबका भूल चुके हैं!!






रक्ताकांक्षी आँखें खुश हैं

अँधकार का दौर निकट है
बाहर-भीतर युद्ध भयानक
कौन बचेगा, बचने वाला
खडी मौत का दृश्य प्रकट है।
हथियारों की विजय यात्रा
खूनी मन की तानाशाही
कदम-कदम पर भय की सत्ता
तोपों, गोलों, बन्दूकों का
इंच-इंच मायावी पहरा
तालिबान का अंतिम सच है।
रक्ताकांक्षी आँखें खुश हैं
सूरज प्रतिदिन लाल उग रहा
दिशा-दिशा में लाल-लालिमा
धरती हमसे कहाँ मुक्त है?
मिटना खुद का सिर पर नाचे
प्राण बिछा हो, सबके आगे
जीवित बचना सपने जैसा
मरना तय हो, साँस-साँस पर
खुद का साया साथ छोड दे
लगे नहीं जब, अपनी धरती
भर जाए भीतर गूँगापन
अफगानों की यही नियति है
यही गूँजती निर्मम ध्वनि है।।


सम्पर्क -अध्यक्ष, हिन्दी विभाग
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय
शिलांग-793022, मेघालय
मो.न. 09774125265
मेल deshdhar@gmail.com