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दशरथ कुमार सोलंकी की कविताएँ

दशरथ कुमार सोलंकी
(1) अच्छा बताओ


अच्छा बताओ
सृष्टि को बचाए रखने के लिए
तुम्हें कितना मनुष्य बनना चाहिए.....

शत-प्रतिशत....!?
अरे नहीं
बिल्कुल गलत हो तुम
चलो मैं बताता हूँ तुम्हें

जरूरत नहीं कि तुम बन जाओ शत-प्रतिशत
यानी कि सोलह आने या पूरे मणभर मनुष्य
तुम बस छटाँक भर बन जाओ मनुष्य
या कि तोला, माशा
या रत्तीभर भी बन जाओ
या बन पाओ मनुष्य
खूब है सृष्टि की सुदरता के लिए
तुम्हारा इत्ता -सा मनुष्य बन जाना
सबसे बडा अवदान होगा सृष्टि को

पूछोगे , यह कौनसी भाषा ले आया मैं
आना- तोला- माशा वाली
तो सुनो दोस्त.....
यह मेरे पुरखों की भाषा है
जो सोलह आने मनुष्य हुआ करते थे
अब तुम उन जैसे तो क्या बनोगे
उनकी पूर्णता से कुछ अंश ही कर लो ग्रहण
बन जाओ थोडे से मनुष्य.........काफी होगा इतना

या चलो
तुम्हें समझाता हूँ किसी और तरीके से
ओस की बूँद पर सूरज की किरण से
जो चमक बनती है ना उजली- सी
बन सकते हो इतने मनुष्य तुम
या एक तितली फूल के प्रेम में पडकर

मकरन्द की एक बूँद से हो जाती तृप्त
इतना तो बन ही जाओगे तुम
मनुष्य कोशिश करने पर
कि नन्हे पाँव खेलती बच्ची की पदचाप से
धरती मुस्करा जाती है तनिक
उतना स्मितभर बन जाओ मनुष्य
या फिर कोशिश करो उतने मनुष्य बन पाने मि
तमाम खेत को टिड्डियों द्वारा साफ कर देने के बाद
ज्यों एक कोने में बच जाता है कोई हरियल तिनका
जो किसान के आँसू तो नहीं पोंछ सकता
आश्वस्ति जरूर देता है
फिर से फसल लहलहाने की

तुम्हारा मनुष्य बनना
कोई गणित नहीं है, न ही ग्राफ
जिसका अनुसरण करो
यह तो भाव की भाषा है.....प्रकृति है
या ओस, तितली, बच्ची और विश्वास से सृजित
प्रेम की संस्कृति है






(2) अधीनता का सौन्दर्य

जहाँ पेड कटते हों
छँटते हों
जहाँ वल्लरियों के पल्लवन में
स्वयं उनकी नहीं
मनुष्य की मर्जी चलती हो
वह पेड-लताओं से युक्त कुंज होगा तुम्हारे लिए
मेरे लिए तो वह
मनुष्य की आधिपत्य की आकांक्षा का ही
एक उदाहरण है

मुझे बाग नहीं चाहिए
झाड झंखाड से युक्त जंगल की चाह है
बेपरवाह -बेतरतीब
अल्हड , अपने में मस्त
जिसके पास विस्तार की स्वतंत्रता है
अपनी मर्जी से फैलाव की अनन्त सम्भावना भी

मुझे अधीनता का सौन्दर्य स्वीकार नहीं
असीमित वितान की आजादी का
आनन्द चाहता हूँ मैं
प्रकृति में मनुष्य का हर हस्तक्षेप
बन्द चाहता हूँ मैं




(3) आनन्द का अमृत-कलश


होने पर तो हर कोई दिखता है

न हो , फिर भी दिखाई दें
कुछ ऐसे भी होते हैं
आकाश की तरह

हो , फिर भी दिखते नहीं
बस झर-झर झरते आशीषों में
ईश्वर की तरह

प्रेम , इस अंतिम श्रेणी का हो
भले न दिखें
पर टपकता रहें बून्द-बून्द
भरता रहे
जीवन का अमृत-कलश ।




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पाल जोधपुर (राज.)342014
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