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विश्वास का श्वास ही है साहित्य कर्म

कैलाश कौशल
जीवन रस में डूबकर आत्मशोधन की प्रक्रिया में जब लेखक स्वयं को खँगालता है, तो जीवन की आँकी बाँकी भंगिमाएँ बहुविध उभरती हैं। विश्वास का घर पद्मजाजी की अपनी सृष्टि की एक-एक ध्वनि और प्रति ध्वनि को सँजोते हुए लिखी गई डायरी है जिसमें अंतस के आलोडन- विलोडन अभिव्यक्त हुए हैं। अपनी मौन साधना में बाहर से शान्त दिखने वाला लेखक भीतर ऐसे कई तूफानों और आँधियों से गुजरता है जिसका साक्षी वह स्वयं होता है। धीरे-धीरे ये प्रभंजन उसे परिपक्व करते जाते हैं।
विश्वास का घर में 5 जनवरी 2011 से 28 जुलाई 2020 के बीच की कालावधि की जीवन अनुभूतियाँ दर्ज हैं। इस डायरी के प्रथम शीर्षक लिखना एक तरह का आँसू पौंछना ही है में अन्तःकरण की सीढियों से उतरते हुए, स्वयं में सिमटते हुए लेखन के माध्यम से विस्तार पाने का सफल प्रयास है -हर रात बहुत सारे सपनों के साथ सोती हूँ और सपनों के साथ ही उठती हूँ कि जाने कब ये सपने मेरी नींदों से गायब हो जाएँगे। ..... यह तो मेरा भीतरी जगत है, जिसने मुझे बचा रखा है। हर लेखक अपने ही आँसू नहीं पौंछता पाठक के आँसू भी पौंछता चलता है ,संभवतः इसीलिए गाँधीजी ने पुस्तकों को सबसे अच्छी व सच्ची मित्र कहा है ।

आत्मचिंतन
डायरी के अधिकांश अंश आज के समय के डर, संत्रास, कुण्ठा, निराशा के बावजूद आगे बढते जाने की आशा, उजास व रोशनी को समेटे हुए हैं। इसीलिए लेखिका गिव अप नहीं करती, मैं जो कर सकती हूँ कर रही हूँ, हार नहीं मानी है। मैं उठ रही हूँ । मैं चल रही हूँ। (पृष्ठ 20, विश्वास का घर) मैं अपने भीतर निरन्तर टूटती -जुडती रहती हूँ और बढती रहती हूँ । मैं बढती ही जाऊँगी, बदलती ही जाऊँगी। (पृ.35) आत्म-साक्षात्कार की यह प्रक्रिया इस ऊबड-खाबड समय में एक विश्वास भरती है लेखिका में कि हर दिन पुनर्नवा होते जाना है । पुनर्नवा की यह प्रक्रिया साहित्यकार को माँजती है ।
मैं लिखती थोडे ही हूँ । मैं तो कीलें बाहर निकालती हूँ। ये कीलें सदियों पुरानी हैं । जंग खा चुकी हैं । मेरे शरीर में इनका जहर फैल रहा है .....ये कीलें अपमान की हैं, बेइज्जती की हैं ,स्त्री को दोयम दर्जे की समझने की सोच की हैं ,उसे भोग्या मानने की हैं,उसे सिर्फ शरीर मानने की हैं ,उसे जन्मते ही मारने की हैं । जब तक एक भी कील मेरे मन पर ठुकी हुई है तब तक मेरा लेखन जारी रहेगा। (20/08/13 पृ 81) समय और समाज की इन कीलों की चुभन लेखिका को सोने नहीं देती ,एक अनवरत युद्ध चलता रहता है भीतर। डायरी के ये पन्ने कमोबेश हर संजीदा लेखक की अपनी अनुभूति में हैं । स्त्री मन की विविध तहों के भीतर होने वाली हलचल यहाँ बहुविध अभिव्यक्त है। पीडा कईं बार हद से अधिक गुजर जाती है और उद्विग्न मन निराशा के भँवर में गोते लगता हुआ डूब -सा जाता है -मैं बहुत समय तक एक भाव में स्थिर नहीं रह पाती हूँ ।......उदासी की बाँहों के हवाले खुद को कर देती हूँ । अब तक जो मेरी सोच थी कि यह करना है ,वह करना है, वहाँ तक जाना है । यह पढना है, वह लिखना है ......वह सोच बदल जाती है और मैं कुछ भी कर पाने में स्वयं को असमर्थ समझने लग जाती हूँ । .....मैं जिन्दा लाश बन कर रह जाती हूँ । ......मैं मर - सी जाती हूँ । मैं मर जाती हूँ । हाँ, बहुत बार , बहुत- बहुत बार ऐसा होता है मेरे साथ ..... रात -रात भर सो नहीं पाती हूँ ,करवटें बदलती हूँ और मौत के बारे में सोचा करती हूँ । ...... तब लगता है रात कितनी घनी है। कितनी लम्बी है , कितनी डरावनी है, कितनी पराई है। .....लगता है जिन्दा रहकर क्या कर लिया ,क्या पा लिया । कहीं भी कुछ अपना -सा दिखाई नहीं देता । न कोई मेरा , न मैं किसी की । मुझे कोई समझ नहीं सका ,मैं किसी को समझा न सकी। (पृ. 103) विचारों की इस लडी को झटककर रचनात्मक मन पुनः स्फूर्ति का , ऊर्जा का संचार कर देता है और लेखिका इस मनः स्थिति से बाहर निकल आती है और मैं सारे अँधेरों को चीरकर ,सारी उदासियों को काटकर, सारी मायूसियों को पीछे धकेलते हुए आगे बढ जाती हूँ। एक जीवन्त आदमी की तरह , एक ऊर्जावान उत्साही इन्सान की तरह, एक बालक की तरह निर्मल मन से। निर्मल उत्साह से लबालब मैं ऐसे काम में जुट जाती हूँ जैसे मैं उदासियों को जानती ही नहीं। जैसे निराशाएँ क्या होती हैं ? .....मैं कितनी घाटियाँ ,कितने पहाड, कितने नदी-नाले, कितने समन्दर, कितने कील -काँटे पार कर आती हूँ , कोई जान ही नहीं पाता है। (पृ104)
पद्मजा एक अन्य स्थान पर लिखती हैं .......उसे क्या बताऊँ कि जब कुछ पढती हूँ , कुछ अच्छा लिख लेती हूँ, तो मन उडने लग जाता है , वरना बुझी -बुझी रहती हूँ । .....मेरी तो यह जिन्दगी है । मैं पढूँगी- लिखूँगी, गोष्ठियों में जाऊँगी , सुनाऊँगी -सुनूँगी । जब मैं उदास होती हूँ तो ये किताबें अपना कंधा देती हैं ..... मेरी हिम्मत हैं ये ,मेरी ताकत हैं ये । रचना ही मेरा सहारा है और इस सहारे से मैं किनारा नहीं कर सकती।
बस लेखन की इसी ऊर्जा से दिपदिपाती हैं पद्मजा। बहुत संजीदगी से अपने रचनाकर्म में चुपचाप रत रहना, अप्प दीपो भव का अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढते रहना । झंझावातों को ठेल कर उठ खडे होना। मन कभी मिट्टी का ढेला हो जाता है, तो कभी पर्वत के शिखरों को स्पर्श करने की ललक जगा देता है। उनकी डायरी पढते हुए लगता है कि उनका एक भी क्षण खाली नहीं जाता, रिक्त नहीं रहता, दिल न दिमाग। एक प्रक्रिया, एक व्याकुलता मथती रहती है भीतर जो न चैन लेने देती है न साँस। और फिर हाथ में कलम आजाती है और वे अन्तस के मंथन को शब्दबद्ध कर देती हैं।
स्त्री मन की गहरी पकड
पद्मजा को स्त्री मन की गहरी पकड है। प्रत्येक स्त्री के भीतर एक सोता बहता रहता है। ऐसा लगता है उनके सामने एक आईना है जिसमें वे हर स्त्री के अंतस में पैठी स्त्रीत्व की सत्ता के विविध रूप देखती रहती हैं। स्त्रियाँ चाहती हैं कि बरसों बरस से चली आती हुई यह संरचना बदले। एक ही बल पर बैठे-बैठे, झुकते-झुकते उनकी रीढ अकड गई है। वे अपनी पीठ सीधी करना चाहती हैं। पद्मजा स्वयं कहती हैं कि मैं स्त्रियों के लिए लिखती हूँ। मैं अपनी रचनाशीलता को स्त्री के हक, उसके अस्तित्व, उसके दर्द, उसके प्रताडित जीवन और विरल उसकी खुशियों के सन्दर्भ के साथ जोडती हूँ। .....प्रतिरोध करना ही पडेगा जब तक कि स्थितियाँ मानवीय नहीं हो जातीं स्त्रियों के लिए । .....स्त्री की मुक्ति से ही मानव मुक्ति जुडी है । जब तक स्त्री मुक्त नहीं है,आजाद नहीं है, तब तक आप भी आजाद नहीं हैं। (09/03/16 पृ. 109)
नई सदी के इन प्रारम्भिक बीस वर्षों में अपेक्षाकृत अधिक स्त्रियाँ साहित्य के संसार में शामिल हुई हैं। 21वीं सदी में स्त्री साहित्य बहुत लोकतान्त्रिक हुआ है और स्त्री अस्मिता का विस्तार हुआ है । पद्मजा के साहित्य में भी स्त्री की आत्मवत्ता अनेक स्तरों पर अभिव्यक्त हुई है। स्त्री साहित्य कई विधाओं में भाषा, विचार व सौन्दर्य बोध को नई दृष्टि से देख रहा है। सीमाएँ छिन्न भिन्न हो रही हैं। नए शेड्स दिख रहे हैं। जीवन की निश्छलता और उच्छलता के बीच निःशब्द सिसकियाँ भी हैं और दमन के विरुद्ध सशक्त आवाज भी है।
यह हमारी लडाई है, लडेंगी डायरी अंश में लेखिका चुनौतियों से रू-ब-रू लडने को तैयार है, हम अपने हक के लिए मरना हुआ मरेंगी,जीना हुआ जिएंगी पर हार नहीं मानेंगी । लडना हमारी नियति है । यह लडाई भ्रूण से ही शुरू हो जाती है ,और बुढापे तक जारी रहती है , किसी न किसी रूप में मृत्यु तक । (24/06/20 पृ. 130)
लेखिका पति पत्नी के सम्बन्धों में समभाव देखने की पक्षपाती हैं। कोई बडा छोटा नहीं। पत्नियों के दिलों से सात जन्मों वाला भाव अब तिरोहित हो गया है ..... पहले जहाँ तलाक के बारे में सोचना गुनाह था उनके लिए, आज उससे परहेज नहीं है । न लडके को न लडकी को । शायद इसलिए कि लडकी भी अपने पाँवों पर खडी है ,लडके की ही तरह । पहले वाले डर अब रहे ही नहीं । ..... दोनों पक्षों में मेल जोल होगा, तभी घर की गाडी चलेगी। (23/05/11, पृ. 30)
स्त्रियों का स्वभाव है कि हर कार्य में अपना दोष स्वीकार कर लेती हैं, प्रतिरोध नहीं करतीं। पद्मजा का कहना है कि जरा -सी गलती होने पर हम औरतें ही सोचती हैं कि हम बुरी हैं । हममें बुद्धि नहीं है । हम बावली हैं । बल्कि सोचें कि हम इंसान हैं और इंसान हैं तो कमियाँ भी होंगी। (09/04/12 ,पृ 50) पति और बेटे को गर्मागर्म फुल्के नहीं खिलाए, तो अपराध बोध पाल लेती हैं ये औरतें। नहीं पता कि औरत को ही क्यों होता है अपराध बोध, हमेशा । (पृ. 52)
इस दुनिया में सब चीजों के लिए जगह है बस एक लडकी के लिए ही जगह कम हो जाती है तब, जब वह अपने जीवन से जुडे निर्णय लेना चाहती है , खुद। (23/03/15, पृ 98)स्त्री की झुकने की प्रवृत्ति पर उनकी यह कविता इसी डायरी में है -
झुकने की आदत ने मुझको
इतना झुका दिया
उसने कहा गर्दन
मैंने सिर कटा लिया । (04/08/15 ,पृ. 99)
विश्वास ही धोखा है में दिल्ली में निर्भया के गैंगरेप की घटना से स्वयं पद्मजाजी भी स्तंभित हैं। पूरे देश के आक्रोश को हमने देखा था उस समय। निर्भया के साथ हुए नृशंस व्यवहार से प्रत्येक सहृदय हिल गया था,जैसे स्त्री को लेकर घृणित सोच सामने आ चुकी थी। स्वयं लेखिका अपनी बेटियों को लेकर चिंतित और सशंकित हो गई। कैसे एक माँ अपनी बेटी को दूसरे शहर अकेले जाने दे। निर्भया की बलि के बाद ही सरकारें जागीं और महिला सुरक्षा कानून का कडाई से पालन करने हेतु सचेत हुईं। फिर भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है। जिसके मूल में अज्ञान, अशिक्षा व स्त्रियों के प्रति भोग्या वाली मानसिकता ही प्रधान है। वस्तुतः पुरुष अभी भी 18 वीं सदी में ही जी रहा है। स्त्रियाँ संकुचित व संकीर्ण घेरों से बाहर निकल आई हैं पर पुरुष समाज स्त्रियों की स्वतन्त्रता का पक्षधर नहीं। ऐसी स्थितियों में मन कसैला हो जाता है, मैंने अपने चारों ओर एक अभेध्य दीवार चिन ली है । दुनिया रहे मुझसे दूर और दूर । हाँ, यही चाहती हूँ मैं । पास रहकर देख लिया ,बहुत घिनौना है सब कुछ । (02/06/11,पृ. 31)
ऐसे तमाम अन्तर्विरोधों के बीच संतुलन बनाए रखना, खुद को खडे रखना दृढता से,बस थोडी-सी जमीन हो अपनी और पाँव जमाए रखें उस पर। बस और कुछ नहीं चाहिए ,तुम्हें तुम्हारी दुनिया मुबारक ,नहीं चाहिए तुम्हारी जैसी दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।
प्रेम ही है मूल
पद्मजा के पूरे लेखन का मूल स्वर है प्रेम। मनुष्यता के प्रति, आसपास के परिवेश के प्रति ,सारी सृष्टि के प्रति प्रेम। यह प्रेम दृष्टि ही उनके लेखन को बडा बनाती है। सबसे बडा प्रेम है। मैं प्रेम के साथ हूँ । मैं विश्वास के साथ हूँ। (25/05/13, पृ. 73) प्रेम का हर रूप मेरे लिए पूजनीय है। प्रेम का हर रूप मुझे स्वीकार है। इसलिए कि मैं प्रेम को ही जानती हूँ । प्रेम को ही मानती हूँ। प्रेम से ही चलती हूँ । .....जिस दिन मेरी पीडा, मेरा प्रेम सुन लेगा मुझे, उस दिन मैं, मैं नहीं, प्रेम हो जाऊँगी। (15/03/13 पृ. 67)
समस्त उदासियों, निराशाओं, असफलताओं के बीच यह प्रेम ही है जो मनुष्य को जिलाए रखता है और स्वयं लेखिका भी इसी प्रेम से जीवन को सम्पूर्णता में जिए जाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसीलिए उनका उद्घोष है मेरी कविता प्रेम की कविता है। मैं दुनिया के हर मनुष्य के जीवन में इन्द्रधनुष के सातों रंग भरना चाहती हूँ। (10/10/12 पृ 56 ) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता उनके इस विश्वास को पुख्ता करती है -
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं ,
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड गुजर सकता है। (11/09/17 पृ 113)
पद्मजा को प्रेम का यह मार्ग ही सरल लगता है । मुझे घनानन्द की पँक्तियाँ याद आ रही हैं -अति सूधो सनेह को मारग है, जहै नैकू सयानप बांक नहीं। वे भी कहती हैं -प्यार में हम सुन्दर दिखना चाहते हैं। सुन्दर होना चाहते हैं ..... मुझे लगता है कि स्त्रियाँ प्यार अधिक करती हैं, इसी से वे सुन्दर होती हैं। कोमल होती हैं। इसी से दुनिया जीने लायक है शायद । (21/08/13 पृ. 82)
सम्बन्धों का ताना -बाना
एक साहित्यकार होने के नाते संवेदनशील हृदय की धनी पद्मजा अन्तर प्रान्तीय कुमार साहित्य परिषद की महामन्त्री हैं और अपने सामाजिक सरोकारों के चलते इस डायरी में जेल की महिला बंदियों को पुस्तकें इत्यादि दे कर उन्हें भी पढने -लिखने के लिए प्रेरित करती हैं। जेल-पाँवों तले जमीन खिसकती -सी लगी में जेल के घुटन भरे वातावरण ने लेखिका को व्यथित कर दिया, बंदियों से मिलने आने वाले परिवार के सदस्य भी जाली की दीवार के पार से, दूर से ही बात कर सकते थे।- दूरी के कारण, जाली के कारण उन्हें जोर जोर से बोलना पडता है .....मैं वो दृश्य देखकर असहज हो गई। क्या वे अपने मन की बात कह पाएँगे, क्या वे सुन पाएँगे? क्या वे उन आँखों से देख पाएँगे जिस तरह से जिसे देखना चाहते हैं। वे छू भी नहीं सकते एक दूसरे को। क्या इस तरह मिलकर भी मिटा पाएँगे अपनी प्यास, भूख, इच्छा। इस तरह तो कम से कम नहीं।..... चिडियाघर के बंदरों की तरह हमें देखने आए हैं तो आपका यहाँ कोई काम नहीं है। (03/04/13 पृं. 72 )
लेखिका ने इस डायरी में सम्बन्धों की प्रगाढता और परिवार की आत्मीयता की, स्नेहिल सम्बन्धों के सूक्ष्म तंतुओं की अदृश्य डोर के दो बहुत सुन्दर उदाहरण दिए हैं। वे स्वयं बीमार हैं। कमजोरी अधिक हैं। घर में दूध नहीं है। अभी मन में सोचा ही है कि चार माले नीचे उतर नहीं सकती, भाई खेलने गया है ,वो आ जाए तो दूध लाने के लिए कहूँ कि तभी घण्टी बजती है और दरवाजा खोलने पर भाई सामने खडा था -क्या आपने मुझे आवाज दी ? मैंने कहा -नहीं तो । वह बोला - मैंने आपकी आवाज सुनी । तभी तो दौडकर आया हूँ। (07/02/12 पृ 49 )
सम्बन्धों की यह सघन बुनावट ही है कि ससुराल में रह रही लेखिका से फोन पर बात करते हुए दूर से ही माता पिता को लगा कि पद्मजा की तबीयत ठीक नहीं है। वे स्वयं को रोक नहीं पाए और दूसरे दिन ही हाल चाल जानने पहुँच गए। आकर देखा तो पद्मजा के हाथ पर प्लास्टर बँधा हुआ था । उन्होंने माता पिता को इसलिए नहीं बताया कि व्यर्थ ही चिन्ता करेंगे। (09/09/16 पृ. 111-12 )
बाल मन के साथ
लेखिका अपने बचपन को बार- बार जीना चाहती है । बाल निकेतन विध्यालय में गाँधीवादी मूल्यों पर आधारित शिक्षा व संस्कारशील बच्चों को देखकर वे अत्यंत प्रभावित होती हैं । सच में यहाँ व्यक्तित्व विकास के समस्त बिन्दुओं को इस प्रकार से विकसित किया जाता है कि पुस्तकीय ज्ञान के साथ -साथ बालक आत्मनिर्भर बनकर व्यवहारिक जीवन के समस्त पक्षों में पारंगत हो। मैं स्वयं बाल निकेतन की विद्यार्थी रही हूँ। अतः मैं लेखिका की इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि मेरा मन स्कूल में ही अटक गया ....क्यों न हम बाल निकेतन के बच्चे हुए। यहीं कहीं ठहर जाते। (पृ. 79) यहाँ पद्मजा जापानी लेखिका तेत्सुको कुरोयानागी की पुस्तक तोत्तो चान (हिन्दी अनुवाद)का स्मरण करती हैं जिसमें इंसान को बेहतर इंसान बनाने पर बल दिया गया है । वे यह बताने से नहीं चूकतीं कि यह किताब जापान में किसी महिला द्वारा लिखी पहली बेस्ट सेलर है। (16/08/13 पृ 79-80 )
आत्मदर्शन
डायरी के कई अंश बहुत गहराई लिए हुए हैं। जीवन के विविध पक्षों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते -समझते हुए इन अंशों में दार्शनिकता से विचार किया गया है -
मैं मुक्त होना चाहती हूँ , इसी जन्म में , इस संसार से । जैसे मुक्त हो गई थी मीरां , संसार में रहते हुए संसार से। (पृ 75)
आत्मा का मर जाना क्या है?
शब्द से उसके अर्थ का और उसके सौन्दर्य का खो जाना ही आत्मा का मरना है ।
मस्तिष्क से विवेक का जाना ही आत्मा का मरना है । हृदय में करुणा और प्रेम का न रहना ही आत्मा का मरना है । ..... (पृ. 75)
इसी प्रकार मौत, रचना, देह, दुख इत्यादि पर सूत्र रूप में विचार किया गया है। कौन सुई है और कौन धागा में दार्शनिकता मुखर है -जीवन की चादर में छेद ही छेद हैं ,जितना रफू करो बढते जाते हैं । ....मेरे भीतर एक आग है उजालों के लिए ,बुरे विचारों को जलाने के लिए । अँधेरों के पार जाने के लिए । मेरे भीतर की आग यूंही धधकती रहे कि जिससे जलते रहें बुरे विचार सदा ही । .....पर आग जलती रहे। (14/06/11 पृ 33)
वह है में अज्ञात सत्ता को चीन्हने की जिज्ञासा प्रबल है- कहीं न कहीं, कुछ न कुछ, है जरूर। जिसके सामने हम नतमस्तक हैं। चारों ओर से थक हारकर उसी की शरण में जाते हैं। वही हमें स्वीकारता है। वही हमें अपनी गोद देता है, अपना कंधा देता है, सुरक्षा देता है, सांत्वना देता है..... सत्त देता है । वह है ..... वह हर पल में हर जगह है । वह दसों दिशाओं में है। वह हंसी में है, रुदन में है। वह मौन में है। वह खामोशी में है। ...वही निरास है वही आस है। वही दूर है वही पास है। .... सब जगह वही है । सब कुछ में वही है । मैं भी वही हूँ ,तू भी वही है। (11/11/13 पृ 87-88)
अपनी आत्मा में उतरते हुए विचार सरणि से उपजी ये कुछ सूक्तियाँ हैं जो इस डायरी की अर्थवत्ता को गहरा करती हैं।
रचना तीनों कालों में संचरण करती है । (पृ 47)
खुशबू-सी समाई रहती हूँ मैं अपने लेखन में। (पृ 46)

बह रही हूँ समय की नदी में, जैसे बह रही है समय की नदी, अनंत काल से अनंत काल तक। (पृ 55)
हमें अपनी दृष्टि का आयतन बढाने की जरूरत है। (पृ 83)
मैं मीरां, महादेवी ,सिमोन, प्रभा खेतान की तरह अपनी बात कहना चाहती हूँ सृजन के साथ। यह रोना ऐसा रोना होगा जिसकी आवाज सृष्टि में सदा गूँजती रहेगी। (पृ 25)
हमारे बिना नदी बहुत रोती है और हम नदी के बिना। (पृ 22)
मनुष्य अकेलेपन के लिए अभिशप्त है। (पृ. 101)
....एकान्त मुझे ताजा हवा देता है। खुला आकाश देता है।मुझे उडान भरने के लिए पंख देता है एकान्त। (पृ.131)
ये सूक्तियाँ गहन प्रेक्षण और जीवनानुभवों के माध्यम से पाठक के अंतस्तल को स्पर्श करती हैं।
वस्तुतः इस डायरी में अलग -अलग मनः स्थितियों के कई चित्र हैं जो आपको अपने साथ जोडे रखते हैं और हर बात पर आपकी सहमति भी साथ- साथ चलती रहती है । प्रत्येक सहृदय के मन में ऐसे कई प्रसंग उठते- तिरोहित होते रहते हैं ।
पद्मजा ने अपने गाँव बिरमी के सीधे, सरल, सहज जीवन को भी याद किया है। जीवन का वैसा आनन्द दुर्लभ है। किसान, साफ सुथरी राजनीति का युग, दलितों की स्थिति, जडों की ओर लौटना, अच्छे व्यक्ति से मिलना आदि प्रसंगों में एक पावन मन सर्वे भवन्तु सुखिनः की परिकल्पना साकार करने के लिए प्रयत्नशील दिखाई देता है। उनका पूरा साहित्य भी इसी की ईमानदार कोशिश है। इसीलिए मनुष्यता पर उन्हें अगाध विश्वास है। और विश्वास का श्वास ही उनके रचना कर्म का प्राण है। देखिए ये पँक्तियाँ -
मैं विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि ये पल जिनकी मैंने आकांक्षा की थी, जिनके लिए मैं जीयी मरी वे आपकी चाहत के पल भी हैं, थे और रहेंगे। (21/11/13 पृ. 90)
मैं प्रेम जीना चाहती हूँ। विश्वास जीना चाहती हूँ। स्वतन्त्रता जीना चाहती हूँ। खिलखिलाना चाहती हूँ। मैं इन्द्रधनुष के सातों रंग अपने जीवन में उतारना चाहती हूँ। (21/11/13 पृ 89)
एक खूबसूरत और अर्थवान जीवन के लिए मैं विश्वास और स्वतन्त्रता को भी जरूरी मानती हूँ। (पृ. 89)
सबसे बडा प्रेम है ,मैं प्रेम के साथ हूँ । मैं विश्वास के साथ हूँ। (पृ 73)
वह अन्तिम क्षण तक खोजती रहेगी विश्वास का एक घर जिसमें उसकी आँखों में भले आँसू न हों पर पानी जरूर होगा । औरत की आँख का पानी कभी मरा नहीं । (पृ.133)
इस डायरी में बिज्जी(विजयदान देथाजी), बशीर बद्र, चित्रा मुद्गल, नन्दकिशोर आचार्य, मोहनकृष्ण बोहरा, डॉ.आईदानसिंह भाटी,डॉ. रमाकांत शर्मा, डॉ. सत्यनारायण, डॉ.कौशलनाथ उपाध्याय, डॉ.रंजना उपाध्याय, मायामृग, डॉ.भावेन्द्र शरद जैन, डॉ.ओमप्रकाश टाक आदि साहित्यिक मित्रों के साथ जेल अधीक्षक राकेश मोहन आदि का उल्लेख है। इनसे भेंट के दौरान या कविता पाठ के समय के अनुभवों की हिस्सेदारी में पद्मजा अपने लेखन के प्रति अधिक आशवस्त होती चलती हैं।
इस डायरी की भाषा शैली प्रभावोत्पादक है। विचार बिन्दुओं का सहज प्रवाह है, बिना लाग लपेट। चमत्कार प्रियता से दूर रहकर स्वच्छ, सहज, निर्मल शैली भीतर की सोच को यथातथ्य रूप में सामने रखती है। छोटे -छोटे वाक्यों में क्षिप्रता है। इनमें प्रस्तुत आत्ममंथन हमारे ही अन्तस का चिन्तन लगने लगता है ।
आत्मावलोकन और आत्मशोधन की प्रक्रिया में पद्मजा कईं बार बहुत दूर निकल जाती हैं। सोचती हैं कि अब कितना जीवन शेष बचा है । वे योजनाएँ बनाती हैं, सपने देखती हैं, कुछ नया रचना चाहती हैं, नदी, नाले, घाटियाँ ,पहाड सब पार करना चाहती हैं, चलना चाहती हैं क्योंकि यह चलना मंजिल ही तो है। उनकी जीवन यात्रा की रवानगी, यह प्रवाह सदैव बना रहे।
प्रतीत होता है कि तेरे हिय ने कह दी मेरे हिय की बात। एक पारदर्शी मन पूरी डायरी में से झाँकता रहता है। और यही इस डायरी की सार्थकता भी है ।
***
पुस्तक का नाम : विश्वास का घर (डायरी )
लेखक : पद्मजा शर्मा
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन , जयपुर
प्रथम संस्करण : 2020
मूल्य : 150 /-


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