fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

गाँधी को समझने के लिए एक जरूरी किताब

आलोक टंडन
राष्ट्रभक्ति की मेरी धारणा निरर्थक है यदि सम्पूर्ण मानवता की अधिकतम भलाई के साथ इसकी निरपवाद रूप से पूरी-पूरी संगति न हो।

मो.क.गाँधी (इसी पुस्तक से, पृ0 - 85)

जब गाँधी द्वारा स्वयं लिखा गया और उन पर औरों द्वारा लिखा गया विपुल साहित्य मौजूद है, तो फिर गाँधी पर एक और किताब लिखने का क्या औचित्य है और यदि लिखने वाला लिख भी दे, तो भी उसे पढने का क्या औचित्य है? जाने-माने कवि-विचारक श्री नन्दकिशोर आचार्य की पुस्तक विद्रोही महात्मा को पढने से पूर्व ही यह सवाल मन में उठता रहा। अच्छी बात यह है कि पढने के बाद इस सवाल का एक संतोषजनक उत्तर भी मिल गया। कई कारणों से यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण है और इसे पढा जाना चाहिए। पहला कारण तो यह है कि पिछले कुछ वर्षों से न्यस्त स्वार्थों द्वारा गाँधी की सनातनी परम्परा के रक्षक और पोषक की छवि बनाने की कोशिश की जा रही है, जो सरासर गलत है और जिसमें हस्तक्षेप जरूरी है। यह पुस्तक इस कार्य को बखूबी करती दिखाई देती है। इस बात का प्रयास भी जारी है कि गाँधी-विचार के स्रोतों में से विदेशी प्रभावों (टालस्टाय, रस्किन, थोरो आदि) की अनदेखी करके उन्हें मुख्य रूप से भारतीय विचार परम्परा उद्घोषक करार दिया जाए। प्रस्तुत समीक्ष्य कृति को पढने के बाद कोई ऐसा वैचारिक भ्रम पालने की गलती नहीं कर सकता। किन्तु, फिर भी यह सवाल तो रहता ही है कि गाँधी को कैसे समझें? यह पुस्तक, संक्षेप में, इसी प्रश्न का एक संतोषजनक उत्तर देने का प्रयास, एक सीधी-सरल भाषा में, करती है जिसे एक सामान्य पाठक भी आसानी से समझ सकता है। इसके लिए लेखक साधुवाद के पात्र हैं।

उपरोक्त भ्रमों को चुनौती देने के लिए पुस्तक का शीर्षक विद्रोही महात्मा काफी उपयुक्त जान पडता है। आगे के अध्यायों में इसकी सत्यता आसानी से परखी जा सकती है। शायद यही सोच कर लेखक ने पुस्तक की कोई भूमिका नहीं लिखी है। पुस्तक में नौ अध्याय और गाँधी के प्रासंगिक उद्धरणों का एक परिशिष्ट है। गाँधी विचार के लगभग सभी आयामों को अलग अध्यायों में बडे ही तर्कपूर्ण ढंग से समेटने का प्रयास किया गया है। पहले ही अध्याय आध्यात्मिक विद्रोही में लेखक ने अपने मन्तव्य को स्पष्ट कर दिया है। परम्परागत रूप से हमारे यहाँ आध्यात्मिकता का अर्थ एक ऐसी व्यक्तिनिष्ठ जीवन प्रणाली से रहा है जो साधना द्वारा मोक्ष, निर्वाण या कैवल्य प्राप्ति को अपना लक्ष्य स्वीकारती है। इसका समाज से ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं रहा है। इसके विपरीत गाँधी के लिए नैतिक में आध्यात्मिक समाविष्ट है। (पृ.14)। उनके लिए ईश्वर वह नैतिक अन्तरात्मा है, जो सत्य और प्रेम के रूप में प्रकट होता है। (पृ.14)। वे मानते हैं कि ईश्वर न स्वर्ग में है, न पाताल में है और न हिमालय की किसी गुफा में रहता है, वह तो हम सबमें है, इसीलिए वे दैनिन्दिन जीवन से अलग आध्यात्मिकता का कोई क्षेत्र नहीं स्वीकारते और मानवता की सेवा के जरिये ही ईश्वर को पाने का प्रयास करते हैं। गाँधी-चिन्तन में सत्, सत्य, ईश्वर और प्रेम के आपसी सम्बन्धों की व्याख्या करते हुए लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि - ईश्वर सत्य है के बजाय सत्य ईश्वर है का आग्रह प्रकारान्तर में ईश्वर की जगह सत्य को प्रतिस्थापित करना तथा सत्य की अनुभूति किसी उपासना पद्धति के बजाय बुराई या हिंसा से संघर्ष में सम्भव मानना ईश्वर की रूढ अवधारणा तथा उसकी प्राप्ति के धर्मशास्त्रीय अनुष्ठानों के प्रति एक प्रकार का वैयक्तिक विद्रोह ही है जो हमारे तत्सम्बन्धी विश्वास-समूह को चुनौती देता है। यही चुनौती तो अपने तरीके से कबीर ऐसे सन्त भी देते हैं और इसीलिए ऐसे व्यक्ति विद्रोही सन्त कहे जाते हैं। (पृ.16-17)। अतः गाँधी की आध्यात्मिकता एक विद्रोही की आध्यात्मिकता कही जा सकती है जो न केवल संरचनात्मक हिंसा के विरुद्ध संघर्ष करता है अपितु रूढिगत विश्वास प्रणाली को भी बदलने का प्रयास करता है। इसलिए उन्हें विद्रोही महात्मा कहना उचित ही है। गाँधी-चिन्तन में सत्य और ईश्वर की अवधारणाओं के अर्थ निर्धारण में विद्वानों में मतभेद रहा है। लेखक ने दर्शाने का प्रयास किया है कि किस तरह दोनों अवधारणाएँ गाँधी के चिन्तन में एकमेव हो जाती हैं। किन्तु यदि ईश्वर और ईश्वरीय नियम अलग-अलग नहीं है और उनके तोडे जाने की कल्पना ईश्वर के लिए भी सम्भव नहीं है, तो फिर गाँधी की आत्मकथा के शीर्षक सत्य के मेरे प्रयोग का क्या अर्थ हो सकता है?



गाँधी की विद्रोही छवि को बरकरार रखते हुए लेखक ने पुस्तक के दूसरे अध्याय में सत्याग्रह की व्याख्या अहिंसक विद्रोह के रूप में की है और गाँधी द्वारा स्वयं को एक अहिंसक क्रान्तिकारी कहना सर्वथा संगत और प्रामाणिक माना है। इस अध्याय में लेखक ने जहाँ बडी कुशलता से अहिंसक विद्रोह और हिंसक क्रान्ति के बीच अन्तर करते हुए फ्रेंज फेनन, कार्ल माक्र्स, हर्बर्ट मारक्यूज, तिलक आदि के विचारों की आलोचना की है वहीं सत्याग्रह की अवधारणा पर टालस्टाय और थोरो के विचारों के प्रभाव को स्वीकार करते हुए उनकी अप्रतिरोध और सविनय अवज्ञा से उसकी भिन्नता भी रेखांकित की है। सत्याग्रह जहाँ एक ओर साध्य-साधन की नैतिक एकता और प्रेम के नियम पर आधारित है, वहीं दूसरी ओर वह निष्त्रि*य प्रतिरोध के स्थान पर सक्रिय अहिंसक प्रतिरोध को मान्यता देता है और बडे सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों का कारक बनता है। यहीं पर नन्द किशोर आचार्य अहिंसक प्रतिरोध को मात्र एक रणनीति से विलग करके एक जीवन मूल्य के रूप में एक गहरा अर्थ प्रदान करते हैं। उनका मानना है कि दरअसल सत्याग्रह में कोई प्रतिपक्ष होता ही नहीं क्योंकि वहाँ कोई अन्य नहीं होता। सत्याग्रह प्रतिपक्ष के लिए भी एक नैतिक दायित्व अनुभव करता है क्योंकि वह अपना ही एक रूप है। (पृ. - 22)। अतः सत्याग्रह अन्यत्व को भेद कर आत्म का अन्वेषण और बोध है - कहें कि अन्य में आत्मानुभूति की प्रक्रिया। (पृ. - 23)। इसीलिए जब गाँधी कहते हैं कि वस्तुतः अहिंसा की कसौटी ही यह है कि अहिंसक संघर्ष में उसके उपरान्त कोई विद्वेष बाकी न रहे और शत्रु मित्र बन जाए। (पृ.28) तो वे सत्याग्रह द्वारा विद्रोह की प्रचलित अवधारणा और प्रक्रिया के प्रति भी विद्रोह कर रहे होते हैं। जो लोग सत्याग्रह को गाँधी का सर्वोश्रम अवदान मानते हैं, उन्हें यह अध्याय एक गहरी अन्तर्दृष्टि प्रदान करने में सक्षम है।

तीसरे अध्याय में लेखक ने गाँधी की सभ्यता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उनके द्वारा हिन्द स्वराज में आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता की आलोचना को समझने/समझाने का प्रयास किया है। अच्छी बात यह है कि ऐसा करते हुए वे उस गलती को नहीं दोहराते जो कईं लोग गाँधी की सभ्यता की अवधारणा को प्राचीन भारतीय सभ्यता के ऐतिहासिक विवरण से एकात्म करके, कर बैठते हैं। गाँधी के पूर्व और बाद में भी, अनेक विचारकों ने आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता को अपनी आलोचना का केन्द्र बनाया है किन्तु गाँधी की आलोचना उन सबसे भिन्न है क्योंकि उनकी कसौटी सत्य और अहिंसा के वही नैतिक मूल्य हैं जिनके आधार पर वे जीवन के सभी कार्य-व्यापारों की समीक्षा करते हैं। लेखक ने इसे संक्षेप में इस तरह कहा है- सभ्यता वह आचरण है जो अपने अन्दर बैठे ईश्वरत्व (शुभत्व और प्रेम) से साक्षात्कार का माध्यम हो और यह आचरण केवल वैयक्तिक नहीं सभी सामाजिक संस्थाओं और व्यवहार में प्रतिफलित होना चाहिए। (पृ.32)। इसी आधार पर गाँधी आधुनिक सभ्यता को एक हिंसक, बर्बर सभ्यता करार देते हैं और उसे सर्वथा त्याज्य समझते हैं। साथ ही वे यह घोषणा भी करते हैं कि मुझे अपने देशवासियों की पीडाओं के निवारण से भी अधिक चिन्ता मानव प्रकृति के बर्बरीकरण को रोकने की है। (पृ. 33)। शरीर सुख को प्राथमिकता, ब्रिटिश पार्लयामेन्ट, वकीलों, रेलवे और आधुनिक चिकित्सा प्रणाली आदि की हिन्द स्वराज में गाँधी द्वारा की आलोचना का सार प्रस्तुत करते हुए लेखक ने ठीक ही कहा है- उनकी दृष्टि में सभ्यता का अर्थ सुविधाओं और विलासता में वृद्धि या कथित स्टैन्डर्ड आफ लाइफ सभ्यता के लक्षण नहीं हैं। सभ्यता का सम्बन्ध गाँधी-दृष्टि में, नैतिक गुणों का विकास है। (पृ. 42)। तात्पर्य यह है कि आधुनिक सभ्यता के तकनीकी विकास को सभ्यता के विकास का लक्षण नहीं माना जा सकता। (पृ.43)। अतः गाँधी की सभ्यता की अवधारणा हिंसक सभ्यता के प्रति अवधारणात्मक विद्रोह का रूप लेती है, और उसकी प्रक्रिया विकसित करना ही उनकी जीवन गाथा है। (पृ.43)। पुस्तक में आगे के लेख गाँधी की इसी विचारयात्रा के परिणाम है जो एक वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण की परियोजना प्रस्तुत करते हैं। यह किसी स्वर्णिम अतीत में लौट जाने की ओर इशारा नहीं है बल्कि नवनिर्माण का स्वप्न है।

यह स्वाभाविक ही था कि सभ्यता की अपनी नैतिक अवधारणा के आधार पर गाँधी जीवन के विविध पहलुओं की समीक्षा करते। हिंसक आर्थिकी का प्रतिरोध उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण और पहले आता है और यही अगले अध्याय का विषय भी है। गाँधी की दृष्टि में मनुष्य मूलतः उपभोक्ता नहीं बल्कि एक नैतिक अस्तित्व है। यह सही है कि जीवन यापन के लिए मनुष्य को कुछ साधनों की आवश्यकता होती है और इस कारण वह उपभोक्ता भी हैं। किन्तु उपभोग वृद्धि को एक जीवन मूल्य मानने वाले आधुनिक अर्थशास्त्र और उसपर आधारित आर्थिक प्रणाली का गाँधी पुरजोर विरोध करते हैं। लेखक का मानना है कि आर्थिक समानता को अहिंसक स्वाधीनता की सर्व कुँजी (मास्टर की) मानने के कारण महात्मा गाँधी का अर्थशास्त्रीय चिन्तन पूँजीवादी सभ्यता के खिलाफ एक वैचारिक विद्रोह का ही एक रूप है। इसलिए वे केवल वैयक्तिक स्तर पर सम्पत्ति निर्माण का विरोध ही नहीं करते, बल्कि साथ ही पूरी आर्थिक प्रक्रिया में ऐसे मूलगामी संरचनात्मक परिवर्तन का प्रस्ताव करते हैं, जिससे परिग्रह या सत्पत्ति के केन्द्रीकरण की सभ्यता ही न रहे और सभी का भौतिक ही नहीं, नैतिक कल्याण भी हो सके। (पृ.50)। माक्र्स की इस अन्तर्दृष्टि, कि सामाजिक अधिरचना का आधार उत्पादन सम्बन्ध होते हैं जो उत्पादन के साधनों अर्थात तकनीकी में परिवर्तन के साथ बदलते हुए नयी अधिरचना का आधार बनते हैं, की तारीफ करते हुए वे उनके अनुयायियों की इस भ्रान्ति के लिए आलोचना करते है कि उन्होंने उत्पादन के साधनों अर्थात् तकनीकी में बुनियादी परिवर्तन लाए बिना ही बुनियादी सामाजिक आर्थिक परिवर्तन लाने के अवैज्ञानिक प्रयास किए। माक्र्स भी यह अनुमान नहीं कर पाये कि बडे उद्योगों का बीज एक खास तरह की तकनीकी है। अतः असली द्वन्द्व तकनीकी का है जिसे गाँधी ने सशक्त ढंग से उठाया है। मशीन को उसके उचित स्थान पर बिठाना- यह है आधुनिक तकनीकी और मशीनीकरण के प्रति, गाँधी जी की नीति। (पृ.60)। इसलिए गाँधी ऐसे यन्त्रों को स्वीकार कर लेते हैं जो मनुष्य को हाडतोड श्रम से बचाते और मनुष्य और प्रकृति के प्रति हिंसक नहीं होते। इसके लिए वे स्वदेशी तकनीक का रास्ता सुझाते हैं। स्वदेशी का तात्पर्य है स्थानीय जरूरतों के लिए स्थानीय संसाधनों और स्थानीय तकनीकी से किया गया उत्पादन। (पृ.61)। यह एक तरह की विकेन्द्रित उत्पादन व्यवस्था का प्रस्ताव है जिसमें प्राकृतिक संसाधन और तकनीकी एक-दूसरे से ऐसे सम्बन्धित हो कि तकनीकी को वही बनाया और सुधारा जा सके। चरखा भी इसी स्वदेशी तकनीकी का प्रतीक है। इस योजना में कुछ बहुत ही आवश्यक बडे उद्योगों की स्वीकृति भी है जिन पर राज्य का स्वामित्व होना चाहिए जिससे उनका प्रयोग लोगों के हित में किया जा सके। किन्तु बडे उद्योगों की भूमिका सहायक ही होगी, अर्थव्यवस्था का मूल आधार स्वदेशी तकनीकी और संसाधनों पर आधारित ग्रामोद्योग ही हो सकते हैं। (पृ. - 62)। लेखक की मान्यता है कि दरअसल स्वदेशी, स्वावलम्बी व्यक्ति और गाँव तथा आर्थिक विकेन्द्रीकरण कोई अलग-अलग अवधारणायें नहीं हैं। ......... स्वदेशी से प्रेरित उत्पादन-शक्तियों के आधार पर ही ऐसे उत्पादन सम्बन्ध विकसित होंगे जो हमें एक न्यायपूर्ण अधिरचना -सुपर स्ट्रक्चर- की ओर ले जा सकेंगे। (पृ.65)।

उत्पादन के साथ-साथ लाभ के वितरण की समस्या के समाधान के लिए गाँधी कुछ बडे उद्योगों पर राज्य के सीधे नियंत्रण का तथा अन्य पर न्यासिता का प्रस्ताव रखते हैं। गाँधी चिन्तन का यह एक विवादास्पद मुद्दा रहा है और आलोचकों ने इसे अव्यावहारिक कहकर खारिज भी किया है। आलोचकों को उत्तर में लेखक ने गाँधी की त्रिआयामी योजना तथा प्रो. एम. एच. दाँतवाला द्वारा तैयार किए सरल और व्यावहारिक न्यासिता सूत्र का हवाला देते हुए न्यासिता के पक्ष में दलील प्रस्तुत की है। साथ ही गाँधी के शब्दों को भी उद्धृत किया है कि यदि पूँजीपति स्वेच्छा से न्यासिता के लिए तैयार न हो तो राज्य के जरिये न्यूनतम हिंसा का प्रयोग करते हुए उन्हें उनकी सम्पत्ति से वंचित करना होगा। (पृ.69)। यही पर वे सोवियोत्तर माक्र्सवादी चिन्तकों -लेबो बिट्ज और मेजारोस द्वारा सुझाई सहकारी उत्पादक वर्ग की प्रणाली पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं जो कहीं न कहीं समस्या के अन्तिम हल की खोज को दर्शाता है।

राज्य को एक हिंसक संस्था मानने वाले गाँधी के राज्य सम्बन्धी विचारों का विवेचन लेखक ने पृथक अध्याय में किया है और गाँधी को एक प्रबुद्ध अराज्यवादी की संज्ञा से अभिहित किया है। चूँकि राज्य हिंसा पर टिकी सम्प्रभुता की अवधारणा है जो अपने को हिंसा का वैध अधिकारी मानता है जिसे सेवा और पुलिस की मदद से संरक्षित और पोषित किया जाता है, इसलिए स्वाभाविक ही है कि गाँधी की अहिंसा की अवधारणा के अन्तर्गत राज्य एक नैतिक संस्था नहीं माना जा सकता। वे लोकतंत्र और सन्य भावना को एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं। इसीलिए राज्य को अनिवार्यतः सकेन्द्रित और संगठित हिंसा मानने के कारण ही गाँधी जिस राजनैतिक व्यवस्था की परिकल्पना प्रस्तुत करते हैं उसे दार्शनिक अराज्यवाद कहा जा सकता है। संसदीय लोकतंत्र को स्वीकारते हुए भी गाँधी उसकी जकडन से निकलना चाहते हैं क्योंकि उसमें भी सत्ता का संसद में केन्द्रीकरण होने से वह हिंसा पर ही आधारित हो जाता है। अतः गाँधी की दृष्टि से-आदर्श राज्य में कोई राजनीतिक शक्ति नहीं होती, क्योंकि उसमें कोई राज्य नहीं होता। (पृ. 74-75)। इसी को लेखक क्रॉपोटकिन की भाषा में प्रबुद्ध अराज्यत्व कहते हैं जो गाँधी के स्वराज से मिलती जुलती अवधारणा है। गाँधी के लिए भी स्वराज का तात्पर्य है - सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने का सतत प्रयास - वह सरकार विदेशी हो या राष्ट्रीय।(पृ.75)। यह बात थोरो की उक्ति से मेल खाती है जिसमें वह कहता है कि वही शासन सर्वोत्तम है जो सब से कम शासन करता है। लेकिन यहीं लेखक ने सवाल उठाया है कि गाँधी के आदर्श स्वराज में भी तो किसी न किसी प्रकार की व्यवस्था तो आवश्यक होगी ही - गाँधी के पास इसका क्या समाधान है? गाँधी इसका उत्तर महासागरीय वलय - ओसिएनिक सर्किल - के रूपक के माध्यम से स्पष्ट करते हैं जिसके केन्द्र में व्यक्ति होगा, जो सदैव अपने गाँव के लिए मर-मिटने को तैयार होगा, गाँव-गाँवों के समूह के वास्ते नष्ट हो जाने के लिए तैयार रहेगा और यह प्रक्रिया वहाँ तक चलती रहेगी, जहाँ सम्पूर्ण एक जीवन का रूप धारण कर लेगा। (पृ.80)। महासागरीय वलय की इस परिकल्पना में सम्प्रभुता के किसी एक स्थान पर केन्द्रीकृत होने की सम्भावना नहीं रहती। यह पिरामिडीय संरचना से भिन्न है जिसमें सत्ता धीरे-धीरे ऊपर की ओर जाती है। पिरामिड की संरचना उर्ध्वाधर है, जबकि महासागरीय वलय की संरचना क्षैतिज और समस्तरीय है। इसी संरचना के आधार पर गाँधी अपनी ग्राम-स्वराज्य की रूपरेखा विकसित करते हैं।

लेखक ने गाँधी पर लगाये जाने वाले संकीर्ण राष्ट्रवाद के आरोप का उचित ही खण्डन किया है। जो आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से ही सहमत नहीं, उसे उन राष्ट्रवादियों के साथ कैसे रखा जा सकता है जो अन्य राष्ट्रों की कीमत पर अपने राष्ट्र के लाभ को स्वीकारने से तनिक भी नहीं सकुचाते। दरअसल, गाँधी का मानना है कि अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का विकास राष्ट्रीयता से गुजर कर ही हो सकता है। इसीलिए राष्ट्रभक्ति की और भारतीय राष्ट्रवाद की उनकी अवधारणा राष्ट्रीयता से अन्तर्राष्ट्रीयता की ओर विकास यात्रा है। इसीलिए वे एक विश्व के लक्ष्य को हमेशा ध्यान में रखते हैं। गाँधी चिन्तन के ऊपर यूटोपियन होने के आरोप के मद्देनजर लेखक ने स्वयं यह प्रश्न उठाया है कि क्या यह विकल्प, यह अहिंसा, सैनिक आक्रमण से भी रक्षा कर सकती है? इतिहास में इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता। गाँधी के पक्ष में कहा जा सकता है कि वे स्वीकार करते हैं कि ऐसे में अहिंसक प्रतिरोध अत्यन्त कठिन है और अत्यन्त धैर्य और बलिदान की अपेक्षा करता है। लेकिन वे ये भी मानते हैं कि यदि हम बलिदान के लिए पूरी तरह तैयार नहीं तो ‘आत्मरक्षा’ या अरक्षितों की रक्षा के लिए की गई हिंसा कायरतापूर्ण आत्म समर्पण की तुलना में कहीं बेहतर वीरतापूर्ण कार्य है। (पृ. 86)।

अक्सर गाँधी पर वर्ण-धर्म और उस कारण जाति व्यवस्था के समर्थन का आरोप लगाया जाता रहा है। लेखक ने एक पूरे अध्याय में इस विषय पर गाँधी चिन्तन को स्पष्ट करने का प्रयास कर उचित ही किया है। उनके अनुसार जब कभी वह वर्ण की अवधारणा की बात करते हैं तो सभी प्रकार के ऊँच नीच, भेदभाव से रहित एक ऐसी आर्थिक-सामाजिक अवधारणा के रूप में करते हैं, जिसमें लोगों को अपने जन्मजात नैसर्गिक गुणों के विकास का पूरा अवसर मिले तथा समाज में व्यर्थ प्रतिद्वन्द्विता का आवेश न पैदा हो। (पृ.90)। लेकिन इसे जाति व्यवस्था का समर्थन नहीं माना जा सकता क्योंकि गाँधी वर्तमान जाति प्रथा के तीनों आधारों - विवाह, खानपान तथा उच्चावचक्रम में से किसी को भी स्वीकार नहीं करते और उन्हें समाज के लिए हानिकर मानते हैं। अस्पृश्यता के खिलाफ उनका आन्दोलन वास्तव में इसी ऊँच-नीच वाद पर आक्रमण है। उनका मानना था कि अस्पृश्यता के समाप्त होते ही जाति प्रथा का शुद्धीकरण हो जाएगा और एक समान स्तरीय संरचना की तरह वर्ण-धर्म स्थापित हो जाएगा। इसके लिए उन्होंने सवर्ण समाज को प्रायश्चित करने को कहा। किन्तु क्या ऐसा हो सका? यदि हम हाल ही में आई निशीकान्त कोलगे (2017) की पुस्तक Gandhi Against Csate का अध्ययन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि जाति को लेकर गाँधी के विचारों में जो उत्तरोत्तर विकास दिखाई देता है जिसमें प्रारम्भ में जहाँ वे उसके शुद्ध रूप का समर्थन करते जान पडते हैं वहीं अन्त तक आते-आते उसके घोर विरोधी हो जाते हैं, यहाँ तक कि बाद में वे उन्हीं विवाहों को अपना आशीर्वाद देते हैं जिसमें दोनों में से एक पक्ष दलित हो यह गाँधी की रणनीति थी जिससे वे राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल उच्च जाति के रूढिवादी तत्वों को नाराज नहीं करना चाहते थे, असलियत में गाँधी प्रारम्भ से ही जाति प्रथा के विरोधी थे, लेकिन राष्ट्रीय आन्दोलन उनकी पहली प्राथमिकता थी। डॉ. अम्बेडकर का मार्ग दूसरा था। वे दलितों में शिक्षा प्रसार और राज्य द्वारा संविधान में प्रदत्त कानूनी अधिकरों में उनका सशक्तिकरण देखते थे जबकि गाँधी सवर्ण समाज को उन अधिकारों को स्वीकार करने के लिए नैतिक-भावात्मक स्तर पर तैयार कर रहे थे। इस तरह देखने पर दोनों के विचार एक दूसरे के पूरक दिखाई पडते हैं। आज भी सवर्ण समाज में हृदय परिवर्तन के अभाव में केवल कानूनी अधिकारों को पाकर भी दलित बराबरी का सम्मान नहीं पा सके हैं। लेखक ने इस ओर इशारा करके सटीक टिप्पणी की है और गाँधी को सामाजिक विद्रोही की संज्ञा प्रदान की है। किन्तु के यह बताने से चूक गए कि गाँधी की इस असफलता / सीमित सफलता के पीछे क्या कारण है?

गाँधी चिन्तन में नारी का स्थान एक विवादास्पद विषय रहा है। लेखक ने एक पूरे अध्याय में उसके विविध पहलुओं का विवेचन कर उन्हें आध्यात्मिक नारीवादी की संज्ञा से विभूषित किया है और उन्हें एक मुकम्मल नारीवादी कह कर सम्मानित किया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि सामान्यतः आध्यात्मिकता का आग्रह करने वाले विचारकों में स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वीकृति कम ही दिखाई देती है। इसके लिए बुद्ध और कबीर के उदाहरण दिए जा सकते हैं। लेकिन गाँधी का स्त्री-विमर्श उनसे भिन्न है। उनके नारीवाद को भी उनकी नैतिक-आध्यात्मिक दृष्टि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। राष्ट्रीय आन्दोलन में बडे पैमाने पर स्त्रियों की भागीदारी ने उनके लिए सार्वजनिक जीवन में प्रवेश का मार्ग सुनिश्चित कर दिया, जिसका श्रेय मुख्य रूप से गाँधी को ही जाता है। गाँधी स्त्री-पुरुषों के समान अधिकारों के पक्षधर हैं। वे स्त्री को कबीर की तरह नरक का द्वार नहीं मानते और यह भी कहते हैं कि शास्त्रों की उन बातों को सम्पादित करके निकाल देना चाहिए जो स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा में बाधक हो। वे स्त्रियों को सभी अवांछनीय और निकम्मी बन्दिशों के खिलाफ सविनय विद्रोह करने की सलाह देते हैं। स्त्री को चाहिए कि वह स्वयं को पुरुष के भोग की वस्तु मानने से इनकार कर दे। गाँधी स्त्री का अपनी देह पर अधिकार इस सीमा तक स्वीकार करते हैं कि यदि पति भी पत्नी के पास केवल काम-वासना की पूर्ति के प्रयोजन से जाए, तो स्त्री को उसे मना कर देने का पूरा अधिकार है। यह भी उल्लेखनीय है कि बलात्कार की परिस्थिति में वे स्त्रियों के हिंसा-अहिंसा का विचार छोडकर अपनी रक्षा करने का समर्थन करते हैं। दरअसल, गाँधी के अनुसार स्त्री को वासना पूर्ति का उपकरण मानना ही उसके साथ हो रहे अन्याय के मूल में है, अतः जब तक उसके अस्तित्व को वासना-भाव से अलग करके नहीं देखा जाता, तब तक एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में उसका अस्तित्व प्रतिष्ठित नहीं हो सकता। स्त्री को काम-वासना की पूर्ति का माध्यम बना देने के कारण संसार उसके वास्तविक अवदान से वंचित हो गया है क्योंकि इस कारण स्त्री अपनी अन्तर्निहित शक्ति का उपभोग संसार के कल्याण के लिए नहीं कर पाई है। वर्तमान में नारीवादियों का गाँधी पर मुख्य आरोप यह है कि वे गृहस्थी के कर्तव्यों को ही नारी का प्राथमिक कर्तव्य मानते हैं और घर से बाहर आकर अपनी स्वतंत्र आजीविका कमाने का समर्थन नहीं करते। लेखक ने गाँधी का पक्ष लेते हुए यह तर्क दिया है कि जिस ग्रामोद्योग आधारित विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का गाँधी प्रस्ताव करते हैं उसमें काम धन्धे में स्त्री-पुरुष के बीच सहभागिता स्वमेव ही स्थापित हो जाएगी (पृ. 103)। मेरे विचार से यह तर्क कमजोर है क्योंकि एक ओर तो निकट भविष्य में ऐसी कोई आर्थिक व्यवस्था के आसार नजर नहीं आ रहे और दूसरी ओर शिक्षा और समान अधिकारों के चलते स्त्रियों को रोजगार के समान अवसरों से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी तरह नारीवादियों द्वारा गाँधी पर लगाए जाने वाले अन्य आरोपों जैसे पितृसत्ता के संरचनात्मक पहुलओं की अवहेलना, ब्रह्मचर्य पर अत्यन्त बल, काम को केवल संतति जनने के लिए ही उपयोगी मानना, संतति निग्रह के कृत्रिम उपायों का विरोध, अधेड उम्र की विधवाओं के पुनर्विवाह का विरोध आदि की चर्चा लेखक ने करना शायद अप्रासंगिक समझ कर छोड दिया है किन्तु नारी के प्रति गाँधी की सम्पूर्ण दृष्टि को समझने के लिए वह सब जानना भी आवश्यक है।

एक अलग अध्याय में गाँधी के शिक्षा दर्शन पर विचार करते हुए लेखक ने उसकी कतिपय विशेषताओं की चर्चा की है। उन्हीं के शब्दों में, स्वदेशी और सत्याग्रह गाँधी के शिक्षा कार्यक्रम के प्रमुख लक्ष्य हैं, जिनका मूल उद्देश्य है मनुष्य को स्वराज की सिद्धि के लिए समर्थ बनाना। (पृ. 107)। इसे ही नई तालीम या बुनियादी शिक्षा कहा जाता है। इस शिक्षा कार्यक्रम में ग्रामोद्योगों, दस्तकारी आदि का प्रशिक्षण वस्तुतः स्वदेशी का ही प्रशिक्षण है जिससे प्रत्येक व्यक्ति और ग्राम-समाज आत्मनिर्भर हो सकता है और अपने स्वराज में रह सकता है। यहाँ ब्रेड लेबर भी स्वदेशी के प्रशिक्षण का हिस्सा हो जाता है। श्रम के माध्यम से न केवल आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है अपितु शिक्षार्थी के बौद्धिक-नैतिक विकास में उसकी उल्लेखनीय भूमिका है। गाँधी के शिक्षा-चिन्तन में शिक्षा के माध्यम के रूप में स्वभाषा का तीव्र आग्रह है क्योंकि स्वभाषा के बिना स्वराज अर्थात अपने वास्तविक स्वत्व की सिद्धि सम्भव नहीं है। गाँधी दृष्टि में यदि शिक्षा राज्य या बाजार पर निर्भर करेगी, तो वह स्वराज का साधन होने के बजाय राज्य या बाजार के एजेन्ट या उनके द्वारा नियंत्रित होगी। परानिर्भर साधन के माध्यम से हम आत्म-निर्भर समाज कैसे बना सकते हैं? इसीलिए गाँधी शिक्षा संस्थाओं को स्वावलम्बी बनाने के पक्षधर हैं। यहीं पर लेखक एक बडा सवाल उठाकर सारी परियोजनाओं को यह कह कर प्रश्नांकित कर देते हैं कि क्या हमारा लक्ष्य गाँधी द्वारा प्रस्तावित स्वराज और प्रबुद्ध अराज्यत्व है जिसके अनुरूप हम व्यक्ति और समाज का निर्माण करना चाहें, नहीं तो यह शिक्षा व्यवस्था व्यापक समाज के लिए अनुपयोगी मानकर महज कर्मकाण्ड भर रह जाएगी और ऐसा ही हुआ है क्योंकि समाज में प्रचलित और स्वीकृत शिक्षण संस्थायें बुनियादी तालीम से एक दूरी बनाये हुए हैं। उनका निष्कर्ष है कि दरअसल हम एक तत्वमीमांसीय रोग के शिकार हैं और उसका उपचार भी तत्वमीमांसीय ही हो सकता है।



पुस्तक के अन्तिम अध्याय में लेखक ने गाँधी की न्याय की अवधारणा को समझने का प्रयास किया है और इसे सत्याग्रही न्याय शास्त्र की संज्ञा दी है। उनके अनुसार गाँधी दृष्टि में न्याय का तात्पर्य है समाज में सत्य के शासन की स्थापना। (पृ.113)। दरअसल, न्याय मानवीय सम्बन्धों में सत्य की स्थापना की प्रक्रिया है और कानून उसका माध्यम। इसीलिए गाँधी रूल आफ ला की स्थान पर रूल आफ जस्टिस की बात करते हैं, क्योंकि कानून का औचित्य अन्ततः न्याय स्थापित करने में उसकी सक्रिय भूमिका से निर्धारित होता है। न्याय केवल कानूनी मसला नहीं है, वह सामाजिक पुनर्निमाण का मसला है जिसका सपना गाँधी सहित सभी ऋान्तिकारी देखते आये हैं। इसीलिए गाँधी का वक्तव्य है, मैंने पाया है कि कानून का स्वैच्छिक आज्ञा पालन करना हमारा प्रथम कर्तव्य है, लेकिन उस कर्तव्य को निभाते हुए मैंने समझा है कि जब कानून असत्य का पोषण करने लगे तो उसकी आज्ञा का उल्लंघन भी मेरा कर्तव्य हो जाता है। (पृ.120)। जाहिर है यहाँ सत्य का अर्थ गाँधी के लिए प्रेम, अहिंसा, करुणा, सहकार आदि है और असत्य का अर्थ घृणा, हिंसा, शत्रुता, निर्दयता, दमन, उत्पीडन आदि है। अपने वर्तमान अनुभव से हमने जाना है कि किस तरह राज्य द्वारा कानून का प्रयोग असत्य की स्थापना के लिए किया जाता रहा है। ऐसे में गाँधी का उक्त वक्तव्य हमें अन्याय के विरुद्ध सत्याग्रह द्वारा नैतिक विद्रोह की प्रेरणा देता है। यही गाँधी की आज सबसे बडी प्रासंगिकता है।

क्या समीक्ष्य पुस्तक के लेखक श्री नन्द किशोर आचार्य गाँधी की नयी छवि विद्रोही महात्मा गढने में सफल हैं? मेरी दृष्टि में इसका उत्तर हाँ है। उन्होंने गाँधी-चिन्तन के विविध पक्षों, विशेष रूप से परम्परागत आध्यात्मिकता, में गाँधी द्वारा स्थापित मान्यताओं के प्रति विरोध/विद्रोह की एक तर्क और तथ्य पूर्ण जानकारी हमें दी है। गाँधी वहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अपने ढँग का विकल्प भी प्रस्तुत किया, हाँ, यह प्रश्न जरूर किया जा सकता है कि हम उसे क्यों अपना न सके? क्या जिस नैतिक मनुष्य को केन्द्र में रखकर गाँधी चिन्तन कर रहे थे, वह हम सबमें बहुत कमजोर है? इसके लिए क्या हम एक नये गाँधी की प्रतीक्षा करें या उनके विचारों को अव्यावहारिक कहकर त्याग दें? खैर, लेखक से इन प्रश्नों पर विचार न करने के लिए शिकायत नहीं की जा सकती क्योंकि वे उसकी पुस्तक के केन्द्रीय विषय नहीं हैं, किन्तु कई महत्त्वपूर्ण मुद्दों - जैसे हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या जिसके चलते गाँधी शहीद हुए, की चर्चा न होना, आज के सन्दर्भ में, कुछ छूट गया-सा लगता है। दूसरा महत्त्वपूर्ण मुद्दा गाँधी की पद्धति का है जिसके जरिये वे विभिन्न परम्पराओं से विचार-रत्न लेकर उन्हें अपनी विचारधारा की संश्लेषित माला में पिरो सकें? मेरे विचार से गाँधी के कईं विचार समय के साथ यदि छोडने लायक भी हों तो भी उनकी विचार पद्धति हमें नयी समस्याओं के हल के लिए रोशनी की खोज की दिशा दे सकती है। अन्त में, मैं आचार्यजी को हिन्दी में गाँधी-विचार की एक गम्भीर अद्यतन प्रवेशिका प्रदान करने के लिए बधाई देना चाहूँगा। यह कार्य काफी समय से उनसे अपेक्षित था। अब पाठक, पुस्तक पढने के बाद मेरी तरह, गाँधी को केवल महात्मा नहीं, विद्रोही महात्मा के रूप में ही जानेंगे।



पुस्तक का नाम - विद्रोही महात्मा

लेखक - नन्दकिशोर आचार्य

प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

वर्ष - 2021

मूल्य - 395/-

सम्पर्क - 53, अशराफ टोला

हरदोई (उ.प्र.)- 241 001

मो. 9450856180





*अप्रैल अंक में विद्वान अध्येता आलोक टंडन की पुस्तक अस्मिता और अन्यता की समीक्षा में उनकी पुस्तक का विवरण मानवीय भूलवश छूट गया था। उक्त पुस्तक की समीक्षा सरोज कुमार वर्मा ने की थी।