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स्वैच्छिक दासता : उदासीनता से सजगता की ओर

- ब्रजरतन जोशी
दासता मनुष्य समाज की सबसे भयावह प्रथाओं में अग्रणी है। मनुष्यता के इतिहास में मनुष्य का सर्वाधिक शोषण अगर किसी एक विशिष्ट माध्यम से हुआ है, तो दासता सर्वोपरि है। दासता समस्त प्रकार के संस्थात्मक शोषण की बीज भूमि है। मनुष्य जाति के विकास के इतिहास में दासता का योगदान अविस्मरणीय और अतुलनीय है। दासता के नाम पर मनुष्यता का जितना शोषण हुआ है वह उतनी ही भयावह दासतान है।
पुस्तकों ने अपने होने और अस्तित्व की प्राकृतिक प्रक्रिया में मनुष्य को दासता से बचने-बचाने की सदैव ही सार्थक कोशिश की है। पुस्तकों का जीवन के साथ अनन्य और अद्भुत सम्बन्ध रहा है। हमारे समय के विरल रचनाकार निर्मल वर्मा पुस्तकों के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि पुस्तकें एक और जीवन है, वहीं यशस्वी रचनाकार रमेशचंद्र शाह कहते हैं कि पुस्तकें पढना आत्मा के लुहारखाने में स्वयं को गढना है। अपनी तरह के विरल विद्वान वागीश शुक्ल इसे ऋण स्वीकार कहते हैं। यानी एक बात तय है कि पुस्तकें चाहे किसी भाषा और संस्कृति की हों, संस्कृति में उनका महत्त्व निर्विवाद है।
पुस्तकें अपनी जीवनी शक्ति के माध्यम से जीवन में परिपक्वता का विकास और संस्कारों के हस्तांतरण का कार्य संपन्न कर प्रत्येक युग के पाठक को अपने समय के विचार से उर्जस्वित करती रहती है। अक्सर बडे जीवन अपने व्यक्तित्व के विकास में जिन विचारों से प्रेरणा लेकर अपना विराट व्यक्तित्व रचते हैं, उसमें तत्कालीन समय के साहित्य एवं विचारविश्व का बडा योगदान रहता है। उनके जीवन से गुजरने पर हम पाते हैं कि उन्होंने जिन पुस्तकों का सृजन या पठन-पाठन किया, वे ही उनकी पथप्रदर्शक रहीं हैं। श्रेष्ठ पुस्तकें, कला या साहित्य अस्तित्व के विविध आयामों से न केवल हमारा परिचय ही बढातीं हैं बल्कि वे हमारे चरित्र,आचरण और व्यवहार में रूपान्तरण भी करती हैं। पुस्तकें हमें बुद्ध की तरह करुणावान होने और शेर की तरह दहाडने दोनों ही राह सुझाती हैं। उनकी इसी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के कारण हमारी संस्कृति में हमारे स्व या कहें आत्मअन्वेषण की प्रक्रिया को हम निरन्तर रख पाते हैं। पुस्तकों के बारे में एक अद्भुत तथ्य यह भी है कि वे हमारी तरह जीवित या जीवन्त शरीर नहीं होती, पर उनमें व्याप्त अपार ऊर्जा का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है। वे अपने होने में बल्कि कहा जाए अपनी अभिव्यक्ति में अत्यन्त सुखद, सहज, प्रभावोत्पादक, तेजसंपन्न और हमारे अंतःकरण को आलोकित करने की अपार क्षमता से सम्पन्न होती है। अपने कलेवर में अर्थ की अनन्त छटाओं के ऐश्वर्य को सहेजे वे हमारे संवेदनात्मक विस्तार के साथ-साथ हमें परम्परा से गहरे जोडे रखती है। वे हमारे संवेदनात्मक अन्वेषण में सहायक होतीं हैं। अन्वेषण की यह रचनात्मक भूख हमें अपनी भाषा की सीमाओं से बाहर चहलकदमी करते हुए अन्य भाषाओं में हो रही आस्तित्विक हलचल से हमारे संवेदनात्मक रिश्ते को प्रगाढ करती है और सामाजिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों को नई दिशा और ऊर्जा से सम्पन्न करतीं है।
पुस्तकों का अनुवाद केवल एक अन्य भाषा भर का अनुवाद नहीं है। यह मूलतः अस्तित्व के विविध आयामों की तलाश का रचनात्मक उद्यम भी है।
अक्सर हम यह मानते हैं कि अनुवाद के माध्यम से हम एक और संसार से परिचित होते हैं, पर दरअसल हमें यह जानना चाहिए कि अपनी अनुवाद की प्रक्रिया में पुस्तकें एक और जन्म लेती हैं। अनुवाद कार्य के दौरान उनकी आत्मा, भाषा और संस्कृति स्पन्दित होती है। वे न केवल अपनी भाषा में ही जीवन को नई ऊर्जा से भरतीं हैं बल्कि वह जिस भाषा में रूपान्तरित होती हैं उसे भी अपने पुनर्जीवन से एक और नए अनुभव जगत के विविध आयामों से जोडती है। साहित्य का इतिहास गवाह है कि विश्व साहित्य के समस्त क्लासिक ग्रंथों ने संस्कृति के विविध आयामों को विकसित एवं परिपक्वता के साथ सही दिशा में आगे बढने की प्रेरणा दी है।
अनूदित पुस्तकें केवल अपना ज्ञानतंत्र और सृजनात्मक विश्व ही हमारे सामने नहीं रखती वरन् वे अनुवादक के अध्ययन और उसकी वैचारिक क्षमताओं के विश्लेषण को भी हमारे सामने प्रस्तुत करती है। कुछ रचनाएँ तो ऐसी होतीं हैं कि जिनमें मानवीय भावनाएँ और मौलिक विचार ऐसे अद्भुत रूप से संयोजित रहते हैं कि वे उसे अपने समय की जबरदस्त माँग बना देते हैं।
प्राकृत भारती अकादमी की ओर से अहिंसा शान्ति ग्रंथमाला के तहत नंदकिशोर आचार्य द्वारा अनूदित एतिने द ला बोइसी की कृति दि डिस्कोर्स ऑफ वॉलंटरी सर्विट्यूड का हिंदी अनुवाद स्वैच्छिक दासता एक ऐसी ही अद्भुत एवं अनुपम पुस्तक है जिसकी प्रासंगिकता संस्कृति के हर कालखण्ड में अक्षुण्ण बनी रहेगी।
मेरा निजी अनुभव कहता है कि आप अगर एकबार इस पुस्तक को खोलकर पढने बैठ गए, तो 72 पृष्ठ पर आकर पुस्तक तो समाप्त हो जाएगी, पर विचार का अथाह सागर आपको अपने आगोश में समा लेगा।
पुस्तक की मूल प्रतिज्ञा है मनुष्य की उदासीनता को सजगता में रूपान्तरित करना। बोईसी की मान्यता है कि किसी भी प्रकार का स्वैच्छिक समर्पण ही हमारी सभी समस्याओं का मूल है। वे मनुष्य को प्रकृति से मिली स्वतंत्रता के गहरे समर्थक हैं। वे सुझाते हैं कि स्वतन्त्र होने के लिए कोई कर्म-काण्ड या कोटि जतन करने की आवश्यकता नहीं है। बस हमें स्वयं को स्वतन्त्र होने की इच्छा से सम्पन्न होकर जीवन की राहों पर आगे बढना है।
हमारे समय के महानायक तोलस्तोय, थोरो और राष्ट्रपिता गाँधी के व्यक्तित्व निर्माण में इस अद्भुत पुस्तक का अविस्मरणीय योगदान रहा है। बोइसी का मानना है कि दासता भय के कारण नहीं वरन उदासीनता के कारण स्वीकृत होती रही है। बोईसी तीन प्रकार के तानाशाहों का क्रमश पैतृक राजतन्त्र, सत्ता पर बलात अधिकार और निर्वाचित शासन का तानाशाही में रूपान्तरण वर्णन करते हुए बताते हैं कि इन सभी प्रकार के तानाशाहों द्वारा अपनाए गये उपाय हमें हमारी प्राकृतिक स्वतंत्रता के स्वाभाविक प्रशिक्षण से मुक्त कर दासता के स्वभाव में बदल देते हैं।
अडतीस पन्नों के मूल बोइसी के लेख का अनुवाद और उस पर विश्व इतिहास और राजनीतिक आन्दोलनों के उदाहरणों से सजी बोइसी के चिंतन का रेशा दर रेशा खोलती तीस पृष्ठों में नंदकिशोर आचार्य की भूमिका हमें यह बताती चलती है कि सविनय अवज्ञा या निष्क्रिय प्रतिरोध अथवा असहयोग की अवधारणा ने आधुनिक राजनीतिक विश्व को कितना गहरे प्रभावित किया है। इस विचार के संदर्भ में यह लेख बीजकोषीय है। जिसे उन्होंने अपनी कानून की पढाई के दौरान महज बाइस -तेईस वर्ष की उम्र में लिखा।
वे किसी भी प्रकार की तानाशाही के विरुद्ध हिंसा के बरक्स स्वैच्छिक असहयोग को अस्त्र की तरह इस्तेमाल की सलाह देते हैं। वे साफ-साफ कहते हैं कि उसकी आज्ञा मानना छोड दो, और तुम स्वतंत्र हो।
यह पुस्तक आपको यह भी बताती चलती है कि भारतीय परम्परा में असहयोग के उदाहरण गाँधीजी से पहले भी मिलते हैं। इस सन्दर्भ में धर्मपालजी एक बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक जिसकी तरफ हमारा ध्यान काम गया है भारतीय परंपरा में सविनय अवज्ञा। इस पुस्तक में गाँधीजी से सौ वर्ष पूर्व पटना, भागलपुर, बनारस और मुर्शिदाबाद में हुए आन्दोलनों का उल्लेख हैं। पुस्तक में आए माओरी आंदोलन के बारे में जानना बहुत दिलचस्प अनुभव से गुजरना है। अपने पूरे लेखन में बोइसी विवेक को अपना मार्गदर्शक मानने पर जोर देते हुए कहते हैं कि प्रकृति ईश्वर की सहायिका और मानव की शिक्षिका है। वह अपने हर कर्म से हम में स्वतन्त्र बोध विकसित करती चलती है।
अपने लेख में वे कहते हैं कि वास्तव में लोग अपने दुखों के लिए तानाशाहों को दोष नही देते, बल्कि उसको प्रभावित करने वालों पर सारी जिम्मेदारी डाल देते हैं.... उनकी सारी प्रार्थनाएँ, मन्नतें इन्हीं लोगों के खिलाफ होती हैं। वे सलाह देते हैं कि अपने सम्मान,समझदारी, सद्गुणों की कद्र करो।
पुस्तक की एक अहम उपलब्धि है बोइसी पर लिखी राल्फ वाल्डो एमर्सन की कविता का हिन्दी अनुवाद। जिसे स्वयं नन्दकिशोर आचार्य ने अनूदित किया है। कविता का शीर्षक है -एतिनी द ला बोइसी



कोई बेहतरी नहीं होती तुम्हारी
जब परछाई की तरह
शिखरों घाटियों में
पीछे-पीछे चलता हूँ तुम्हारे
अपने सपनों तक को
तुम्हारे रास्ते तक ले आता हूँ
गो उतनी तेज नही है
मेरी रफ्तार
यात्रा पूरी होती है
पर कर लिया है हमने
पूरा सैरा :
मैं दुखी, सूना और निष्फल
और तुम्हारा मन भी
टेकरहित
निष्प्रयोजन साहसी
तुम चूक गए प्रतिरोधि साहस में
जो संपूरक होता है;
ला सकता यदि मैं तुम्हें
- सख्ती या सौहाद्र से -
अपनी वेदिका तक
जहाँ प्रज्ञामयी कलावेदियाँ
पूजती हैं उस विश्वतापक अग्नि को
रात्रि के अन्धकार में जो
चौधियाँ देती है मुझे,
लघु और विराट को
एकसार करती हुई
आत्मा पर डालती है जिम्मा-
निर्धन धनी हों
और न रहे कोई अकेला।

यात्री और मार्ग
एक हों लक्ष्य के साथ
वही है मानवता और प्रेम
वही है उज्ज्वल स्वतंत्रता।
इस अंक में नामवरसिंह पर प्रकाश मनु का स्मरण लेख सहित मोहनकृष्ण बोहरा, रंजना अरगडे, राजीव रंजन गिरि, राजेन्द्र उपाध्याय के लेखों के साथ राजेन्द्र मोहन भटनागर का उपन्यास अंश, श्यामसुन्दर दुबे और अनिरुद्ध उमट के संस्मरण और संगीता माथुर और दिनेश विजयवर्गीय की कहानियाँ हैं। इस अंक में विजय राही, विनोद पदरज, कैलाश मनहर, नरेन्द्र पुण्डरीक और रश्मि शर्मा की कविताओं के साथ यशस्वी कवि-आलोचक अरुण कमल, स्वप्निल श्रीवास्तव, सतीश राठी, गोपाल माथुर और शुभा श्रीवास्तव की समीक्षाएँ भी हैं।
आशा है अंक आपको प्रीतिकर लगेगा, आफ रचनात्मक सुझावों का स्वागत है। अपना ख्याल रखें। अशेष मंगलकामनाओं के साथ-