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विजय राही की कविताएँ

विजय राही
1. बकरियाँ चराने वाली लडकी
नाम था केवल कि बकरियाँ चरा रही थी
नहीं तो मैं नाच रही थी, गा रही थी
आसमान इतराता था मुझ पर
और धरती को नाज था
वन में तितलियाँ मुझसे शरमा रही थी ।

यह कोई बँधन नहीं था कि
इसे स्वीकार करते हुए शर्म से गड जाऊँ
या उन दिनों पर मलाल करूँ कि
वे मेरे पढने-लिखने के दिन थे
जो वन में बरबाद कर दिए गए
मेरे अपने ही हाथों से बकरियाँ चराते हुए
बल्कि यह मेरा अपना चुनाव था
मेरी अपनी आजादी थी जो कि
सिर्फ मैं ही महसूस कर सकती हूँ
कोई चित्रकार नहीं बना सकता उस पर तस्वीर
कोई कवि नहीं लिख सकता उस पर कविता ।

पेड-पौधों और फूलों से बातें करती थी मैं
नदी के जल से भिगोती थी अपना आँचल
कमेडियों से भिजवाती थी अपना प्रेम-संदेश
कुल्हाडी चलाती थी आँधी-बवण्डरों की छाती पर।

उन बेजुबानों का सुख-दुख था मेरा अपना
वे भी शामिल थे ठीक इसी तरह मेरे जीवन में
मेरा होना काफी था उनके लिए
और उनका होना भी मेरे लिए
मुझे तो हमेशा यही लगता है कि
हम सब सिर्फ इसलिए ही बने हैं
कि रंग भर सके एक-दूसरे के जीवन में

हम इतने घुले-मिले रहते थे कि
फूलों की तरह खिले-खिले रहते थे
मन में हमारे कभी नहीं शिकवे-गिले रहते थे
जब भी सुबह निकलते वन की ओर
आगे-आगे नाचती चलती थी बकरियाँ
उनके नवजात शिशु उछल-उछलकर दौडते थे
नहीं टिकते थे मेरी गोद में भी
चारों तरफ चक्कर लगाते थे
आगे के पैरो को हवा में लहराते हुए
बाडे में उन्हें छोड देने की तो
कल्पना भी नहीं की जा सकती ।

उनकी आँखों में झाँक मन पढ लेती थी मैं
और वे भी पढ लेते थे मेरे मन की बातें
हालाँकि मैं खुद बता ही देती थी देर-सबेर ।
कभी किसी का उलाहना नहीं रहा
उनकी तरफ से मुझे और ना मेरा उन्हें
आ जाते थे वे सब मेरी एक आवाज पर
खेजडी,बबूल के नीचे लूम चरने के लिए
कभी फसल नहीं उजाडी किसी की
कभी किसी को सींग नहीं मारा
किसी कि मजाल कि लगादे कामडी भी
देख भी ले तिरछी नजर से कोई
मुझे या मेरी बकरियों की ओर !

एक बकरी को उठा ले गया था एक बार बघेरा
उसकी याद में रही थी उदास कईं सालों तक
टीस रहती थी हमेशा मेरी आत्मा में कि
क्यों आँख लग गई थी उस दिन
आमों की छाया में बैठे हुए मेरी !

अब न तो वन है, न वे पहाडियाँ
न वह नदी है और न ही अमराइयाँ
अब उग आया है यहाँ कंक्रीट का जंगल
वन काटकर समतलीकरण कर दिया है
कॉलोनियाँ कट गईं हैं शहरी लोगों के लिए
होटल,बार,कैफै खुल गए हैं सूखी नदी में
बन गए हैं आसमान छूते कईं भवन
लगता नहीं है कि होगा कभी यहाँ नदी का घाट
सिर्फ इक्के-दुक्के खाली जमीं के टुकडे बचे हैं
जो भी कटने की जोह रहे हैं बाट
जिनमें चरती हैं अब मेरी बकरियाँ
हाँ, उनकी संख्या भी पचास की जगह
पाँच रह गई है !

कंकड-पत्थरों के बीच कोई बचे-खुचे
कीकर, झाडियों को टूँग लेती है मुँह में
पेट नहीं भरता है, तो ताकती हैं मेरे मुँह की तरफ
पहले की तरह कहाँ रह गई हूँ मैं भी
चराती हुई बकरियों को खुशी-खुशी
उठा देती हूँ कभी-कभी तो उन पर हाथ
मेरे अन्दर जो वनफूल था वो मुरझा गया है
किसी इमारत की छाया में सिर झुकाकर बैठी हूँ
कभी कोई विलायती कुत्ता पीछे पड जाता है
किसी बकरी के दाँत लगा दे या फफेड दे
तो भी कुछ नहीं कहती किसी से
चली आती हूँ चुपचाप
मिमियाती हुई अपनी बकरियों के साथ !

2. आँधी (1)

आँधी जब आती है
बदल जाता है धरती-आसमान का रंग
बदल जाती हैं पेड-पौधों की आवाज
चला जाता है सबके चेहरों का नूर
शरीर के साथ-साथ आत्मा तक
जमा हो जाती हैं ढेर सारी धूल
आँधी जब आती है
कर देती है बहुत कुछ इधर का उधर

आँधी में चला जाता है
अनवर का कोट राधा के आँगन में
फिर वहीं फँस कर रह जाता है
दीवार पर लगे तारों में
आँधी में ही चला जाता है
मोहन का रूमाल शबीना की छत पर
और उलझ जाता है टीवी के एंटीने में ।

आँधी में चला जाता है कवि का मन
कहीं दूर अपने प्रिय के पास
और वहीं ठहर जाता है आँधी के थम जाने तक
जब वह वापस आता है
तब उसके साथ में होती है कविता

कविताएँ कवि-मन में चलने वाली
आँधी की बेटिय हैं !

आँधी (2)

आँधी डटती है आसमान छँटता है
निकलती हैं औरतें पनघट के लिए
कुएँ के पास फैले आँकडों पर मिलता है
एक चुन्नी और एक तौलिया
वहीं पारे के पास मिलती हैं
नयी नकोर दो जोडी बैराठी की चप्पलें ।

3. बारिश

जब बारिश होती है
सब कुछ रुक जाता है
सिर्फ बारिश होती है ।

रुक जाता है बच्चों का रोना
चले जाते हैं वे अपनी जिद भूलकर गलियों में
नहाते हैं बारिश में देर तक ।

रुक जाता है
खेत में काम करता किसान
ठीक करता हुआ मेड
पसीने और बारिश की बूँदें मिलकर
नाचती हैं खेत में ।

लौट आती हैं गाय-भैंसे मैदानों से
भेड- बकरियाँ आ जाती हैं पेडों तले
भर जाते हैं तालाब-खेड
भैंसे तैरती हुई उनमें उतर जाती हैं गहराई तक ।

रुक जाते हैं राहगीर
जहाँ भी मिल जाती है दुबने की ठौर
पृथ्वी ठहर जाती है अपने अक्ष पर
और बारिश का उत्सव देखती है ।

4. जमीन माता

जमीन माता
भले ही मुँह से नहीं बोलती है
लेकिन जमीन का धणी
जब जमीन पर डोलता है
जमीन माता भी खुशी में डोलती है
सम्पर्क सूत्र - मो.नं./व्हाट्सएप नं.- 9929475744
Email- vjbilonazxw@gmail.com