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विनोद पदरज की कविताएँ

विनोद पदरज
चाबी

एक चाबी मुस्कुरा रही है

सुरक्षित जगह पर रखी हुई

तीन दिन पहले भाई साहब ने

ताला लगाकर उसे सुरक्षित जगह रख दिया था

अब वह सुरक्षित जगह मिल नह रही है

और उसकी कोई जुडवाँ भी नह घर में

तीन दिन से सारा घर ढूँढ रहा है उसे

आलमारी के भीतर ,ऊपर

बिस्तर पर तकिये के नीचे

फ्रीज पर डाइनिंग टेबल पर सोफे पर

हर पेन्ट शर्ट की जेब में

यहाँ तक कि जूते भी उलटे पलटे जा चुके हैं कईं बार

कई बार बाई से पूछा जा चुका है

बाथरूम में भी कई बार देखा जा चुका है

और तो और किसी किसी ने तो ओवन और फ्रीजर भी देख लिया है

मिक्सी के जार भी

ताला लगाकर जहाँ-जहाँ गए थे

वह रस्ता नापा जा चुका है कई बार

हर तरफ निगाहें दौडाते हुए

जिन-जिन के गए थे उनसे पूछा जा चुका है

इस तरह कि -अरे एक बार

और देख लीजिए अच्छी तरह

खँगाला-खँगाली की इस कवायद में

ऐसी ऐसी चाबियाँ मिल गईं हैं

जिनके तालों का पता नह

और वह है कि इस हैरानी परेशानी का

मजा लेती हुई मुस्कुरा रही है

अब सब उन पर झुँझला रहे हैं बेतरह -

कुछ भी याद नह रहता तुम्हें तो,

बडे आए सुरक्षित जगह रखने वाले

पहले भी कई बार कहा कि खुद से न सम्भले तो

दूसरे को दे दिया करो

पर नह

और की हेंगर है किसलिए

अब जाओ भी ताला तोडने वाले को ले आओ

जो लेगा सो ले लेगा

ताला खराब होगा तो हो जाएगा

और चाबी है कि मुस्कुरा रही है सोचती हुई

कि बच्चूजी रुको तो -मैं मिलूँगी खुशी की तरह अकस्मात

और वह मिलती है चौथे दिन सुबह

जब वे दूध का हिसाब करने के लिए

रसोई में टँगा केलेंडर उतारते हैं

पीछे झलकती है वह

सुरक्षित जगह रखी हुई

मुस्कुराती हुई एक बच्चा हँस रहा है



एक बच्चा हँस रहा है



परीक्षा की तैयारी छोडकर बहन हँस रही है

किताबें एक तरफ सरकाकर



पिता भी उसे डाँट नह रहे हैं

खुद ही अखबार रखकर

कान देकर सुन रहे हैं

मुस्कुरा रहे हैं



रसोई में काम करती माँ

खिलखिला रही है



और मैं भी हँस रहा हूँ

हँसते हुए कह रहा हूँ -

अरे बदमाश, गीला कर दिया मुझे



भीतर से भाभी की दबी दबी

मगर सम्पूर्ण हँसी सुनाई दे रही है



और दादी के हाथों की सुमिरनी

थम गईं है

वह ईश्वर को भूल गई है

कि एक बच्चा हँस रहा है





चना



चने ने कहा

मुझे उगने दो



मेरे पत्तों में नमक भी है, नमी भी और ताकत भी

चबाना

अकाल दुकाल में भी

तुम्हें भूखा नह मरने दूँगा



चने ने कहा बूटे आने दो

तोडकर कच्चे खाना

सेककर खाना

होले करके

बहुत स्वाद लगूँगा

पई-पावणे, बहन-बेटी सबको बुलाना



चने ने कहा मुझे पकने दो

भिगो के खाना

छौंक कर खाना, भूंगडें सिकवाना

दाल बनवाना, बेसन पिसवाना

कढी बनाना

मेहमान आएँ तो पकौडियाँ, गट्टे, चूरमा,

सत्तू, चक्की, लड्डू

जो भी चाहो

मरजाद रखूँगा



और पानी ज्यादा नह चाहिए मुझे

छाँटा छिडकाव होगा परती धरती पर

तब भी उग आऊँगा



मुझे अच्छे गाढे सब वक्तों में आजमाना

पुत्र दगा दे सकता है मैं नह

चने ने कहा किसान से

पक्षी



मैं एक पक्षी से मिला

बहुत सुन्दर था वह पठोरा

रंग-बिरंगे पंखों वाला

उसका पिन्जरा भी बहुत सुन्दर था

मेरे सम्मुख ही मालिक ने उसका पिन्जरा खोल दिया

वह बाहर आ गया

बैठा रहा

डगमग चलता रहा

फिर फुदक फुदक कर यहाँ, यहाँ से वहाँ,

वहाँ से ताख में कुसफल पर पलंग पर

मालिक के कन्धे पर

मालकिन की रसोई की स्लैब पर

सामने आँगन में ही

नीम का पेड था जिस पर और पक्षी चहचहाते थे

फिर उडान भरते थे

विस्तृत सुनील आसमान में

जो आँगन के ऊपर तना था

मैंने देखा - उसे नीम से कोई मतलब नह था शाखों से पत्तों से हवा से

न उसे आसमान से मतलब था

मैं उसकी बोली सुनना चाहता था

पर वह मालिक के बोलों को दोहराता था

मालकिन के बोलों को हूबहू

बच्चों की बोली की भी नकल करता था

फिर वह पिन्जरे में चला गया

जहाँ एक कटोरी में दाना था

एक में पानी

वह इतनी-सी कवायद से थक गया था





नन्हीं गुरगुल गौरैया टुइयाँ तोता



वृक्ष विहीन हुई जाती थी धरती

लालच की आँत फैलती जाती थी



ऐसे में देखा मैने

मेरे घर के गमले में

नन्हा-सा पीपल एक उगा है

दस ग्यारह पत्ते फूटे हैं उसपर

लहराते हैं



शायद कोई पाखी

खाकर गोल

उडते उडते बीज यहाँ पर डाल गया था

पडा हुआ था जो मिट्टी में दबा हुआ था



पाकर परस हवा पानी का

उग आया है



मैने सोचा

मैं इसको रोपूँगा घर के सम्मुख

सींचूँगा बाड करूँगा

जिस पर पाखी आएँगे



वृक्ष काटने वाले निश दिन जुटे हुए हैं

तो क्या

नन्हीं गुरगुल गौरैया टुइयाँ तोता

भी तो भरसक जुटे हुए हैं



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