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कैलाश मनहर की कविताएँ

कैलाश मनहर
एक- भटकाव

रास्ते अनजान होते हैं और यात्राएँ जरूरी
मंजिलें निश्चित नह होती
और चलते जाते हैं पाँवों पर यकीन करते
हम बंजारे मन के साथ में
कि भटकाव हमारी प्रतीक्षा में बने रहते हैं

जहाँ तक जा सकती है हमारी सोच इस
सघनतम कामनारण्य में
वहाँ तक चलते जाना है हमारे पाँवों को

अन्ततः किसी एक दिन के एक क्षण में
हृदय पर रखे हुए अपूर्ण
इच्छाओं का पहाड पथ में रुक जाना है

उस पल किसी से कहना चाहते हैं हम कि
यदि कोई भटकता आदमी दिखाई दे तुम्हें
उसे मेरे नाम से पुकारना
वह जरूर तुम्हारी ओर दखेगा जैसे कि मैं


दो- प्रतीक्षा
दिन भर पुत्र के बारे में सोच रहा था पिता
कि पता नह कैसा होगा
समय पर भोजन भी करता होगा या नह
सहकर्मियों के साथ सहज तो रहता होगा
या घर की तरह ऋोध में
उलझता होगा क्या छोटी छोटी चीजों पर
हर किसी पर हावी होने
की पुत्र की आदत के बारे अच्छी तरह से
परिचित पिता था लौटने
की प्रतीक्षा में शनिवार के दिन सप्ताहाँत
अवकाश पर कि न जाने
कैसे बीता होगा बेटे का यह पहला हफ्ता
और कैसा होगी तबीअत
आया तो सही पुत्र लेकिन
कुछ भी बात नह की उसने पिता से और
खाना खा कर सो गया अपने कमरे में कि
रात भर जागता रहा पिता
रविवार को चला गया मित्रों से मिलने वह
देर रात लौटा और सो गया खाना खा कर
सोमवार को चला गया नौकरी पर वापस
बिना कोई बात किये और
प्रतीक्षा करते रहा पिता फिर शनिवार की
(तीन)--तितली,फूल और रंग

पफले छींटो वाली वह भूरी तितली
हमेशा सदाबहार के फूलों पर मँडराती है

और सफेद धारियों वाली वह गुलाबी तितली
अक्सर कनेर के फूलों के पास आती है

जबकि काले रंग पर लाल बिन्दुओं वाली तितली
हर शाम गुलाब के फूल पर आ बैठती है

मैं बहुत दिनों से देखता रहा हूँ उनका
अपने निश्चित फूलों की ओर उड कर आना

मुझे अपने लिए पक्के तौर से नह पता
लेकिन तुम शायद इन सभी रंगों वाली तितली हो

क्या मुझ में भी तुम्हें अहसास होता है
इन सभी फूलों की खुश्बू और रंगों का

क्या इसीलिए हम भरपूर प्रेम करते हैं हमेशा
कि छूट न जाए कोई रंग या खुश्बू

तीन- यह समय

कुछ घुट रहा है भीतर ही भीतर
पता नह क्या है
जिसे कह सकना मुमकिन नह

जिनसे अबोला है उनसे
बात करने के लिए तरस रहा हूँ
और वे दम्भ में है जिद्दी

बोलना-बतियाना सिर्फ
मेरी ही जरूरत बनी हो जैसे
अन्यों की स्वेच्छा मात्र

आखरि यह कौनसी जगह है कि
जहाँ आवाजें नह हैं किन्तु
सन्नाटा बहुत कोलाहल करता है

जो सुन सकते हैं वे सुनना नह चाहते
और जो बोलते हैं मुझसे
वे इतना कठोर बोलते हैं
कि दिल जैसे हलक में आने लगता है

सीने में सुलगती आग का धुआँ
मेरी आँखों से निकल रहा है
लगता है कि जैसे काला रक्त है

रोना चाहता हूँ कि घुटते रहना
मुझे पक्का पता नह
लेकिन निश्चित है कि
यह समय हँसने का तो नह है



चार-कविता की धरती

बहुत पथरीली चुभनभरी कंटकाकीर्ण
और दाहक थी कविता की धरती
जिस पर मुझे नंगे पाँव चलना था किन्तु
मेरे पाँव भी थे बहुत कठोर इस यात्रा के लिए
हृदय में साहस भी था पीडा को सहने का
अथाह ज्वलनशील अँधेरों में रहने की
अभ्यस्त परम्परा थी पूर्वजों की थाती और
दुःख को कलेजे से लगाए रखने की
अन्तर में उर्वर थी ममता की मनोभूमि

पूरे आत्मविश्वास के साथ किसी
सुख-सुविधा की तलाश में नह निकला था मैं
मुझे कतई कामना नह थी सम्मान की
दुःख और अपमान का पकडा था मार्ग मैनें
पूरे होश ओ हवास में चला था इस राह
पाँवों को तो छिलना ही था और
भूख-प्यास भी सहनी ही थी यदा-कदा
पिटना भी था ही शत्रुओं के हाथों

बेचैन भी रहना था सच की तलाश में
कोई बहुत बडा काम नह कर रहा था मैं अपने तईं
सब कुछ मेरी सहजता का ही भाग था
अब फायदा क्या यह कहने से कि
मैंने यह किया कि मैनें वह किया
जो भी किया सो जरूरी समझ कर
किया और क्या
चलता रहा अपनी मनचाही यात्रा पर



पाँच- कविता का सूना कोना

नींद और उनींद के बीच
किसी उबासी में से निकल कर
नाम और ईनाम की
गुत्थियों के जाल में फँसती रही
और बिगडे हुए रूप पर अपने ही
अवसाद और उन्माद के
अँधेरों और चकाचौंध में कभी
रोती रही कभी हँसती रही

विभ्रमित अपनी कंटकाकीर्ण राहों में
पराजितों की उम्मीद बनना चाहती थी वह
किन्तु आतताई विजेताओं ने अपने
अहंकार के मुकुट में जड लिया हीरे की तरह
लूट कर तमाम जन-संवेदनाएँ और प्रतिरोध
शासक और शोषक वर्ग का पिट्ठू अभिजात्य
करने लगा साकार अमानवीय सपने

देखते हुए कविता का सूना कौना
रात भर रोता रहा एक कवि


सम्पर्क -स्वामी मुहल्ला,मनोहरपुर
(जयपुर-राज.) पिनकोड-303104
मोबा.9460757408