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नरेन्द्र पुण्डरीक की कविताएँ

नरेन्द्र पुण्डरीक
अलग पाठ
गाँधीजी की जब हत्या की गई थी
मैं पैदा नह हुआ था
मेरी चौथी कक्षा की किताब में
एक पाठ था राष्ट्रिपता महत्मा गाँधी,

स्कूल में चौथी कक्षा अब भी है
और बेसिक रीडर भी
लेकिन किताब से गायब है
गाँधी का पाठ ,

उसस वह चित्र भी गायब है
जिसमें गाँधी उघाडे बदन
दायें हाथ पूनीं पकडे
बायें हाथ से चरखा घूमा रहे थे
उससे वह चबूतरा भी गायब था
जिसमें लिखा था हे राम,

जब मैं पढता था सारे बच्चे
एक ही किताब पढते थे
स्कूल अलग अलग होते थे पर
किताब एक होती थी ,

स्कूल अलग अलग होने से
किताबें अलग नह होती थी


किताबें अलग होने से
बच्चे अलग होने लगे
बच्चों से ,

ंकिताबें अलग होनें से
अलग होनें लगे उनके पास
अलग बच्चे
अलग पाठ पढने लगें ,

अलग पाठ
अकेला पाठ नह होता
वह तैयारी होती है
बच्चों के खिलाफ
बच्चों को खडा करने की ।

बुल्डोजर

उन्नीस सौ नब्बे के आस पास
मुझे केन के बलुहे तट पर
दिखाई दिया था
पहली बार बुल्डोजर ,

खडा था कुछ थका-सा
बेजार
धूल से भरा था
डसका थूथन ,

पहाड से आया था
यानी पहले पहाड गया था
अब जा रही है नदी
पहाड और नदी के जाते ही
आप से आप चला जाएगा
नदी की पीठ पर धरा
मेरा यह गाँव ,

बुल्डोजर अभी
चिन्तन की मुद्रा में
मन की बातों में था
क्योंकि नया आदेश
मकानों और बिल्डिंग के लिए नह
उन दिमागों के लिए था
जो सोंच रहे हैं बुल्डोजर से अलग ।

कुछ अलग

म्ुाझे शायद अब
खुश हो जाना चाहिए कि
निपट गई मेरी लडकियों की शादियाँ
लडका अपना चुग्गा कर लेता है
और क्या चाहिए पिता को
पिता होने के लिए ,

मेरे पास अपना न कोई काम है
जिसे काम कहा जाता है
न कार्य सरकार का बचा है कुछ
न अब उसका मुझसे कोई सरोकार है ,

दिन और रात के घण्टे गिनने के अलावा
कोई काम नह है मेरे पास
न कोई वार इतवार अब
मेरी खुशी का सबब हैं
दिन और तारीख अक्सर मुझे याद नह रहते
काशी का यह पचांग अब
पत्नी के जिम्मे है ,

शहर, मुहल्ले, देश -दुनियाँ और
रिश्तों का भी कोई

वे हमारे भीतर बैठी हमारे लिए स्वेटर बुन रही हैं

यह उनमें नह थी
गाँव के बाकी लडकों की तरह
मेरे पास भी एक खाली मन था
जिसमें अटाय सटाय सब कुछ
डालते रहने पर भी बना रहता था
खाली खुक्क भाँय-भाँय करता
घूमता रहता था गरमी की दुपहरियों में ,

इस खाली खुक्क मन में ऐसा कुछ
डालने का जुगाड नह था किसी के पास
कि मन भरा भरा लगे
यदि किसी के पास था तो भनक नह थी ,

सन साठ के आस पास किताबें नह थी इतनीं
भावों के मुताबिक शब्दों से परिचय नह था
जितना ज्ञान और शब्द थे उससे
इतना ही कुछ हो सकता था जो रहा था ,

ले देकर कितने दिन बोलते उनके डायलाग
गर्मी के लम्बे दिन थे और
नदी थी और कुछ पेड थे सघन छाया वाले
कुछ लडकियाँ थीं जिनके सपने
आना अभी शुरु नह हुए थे
छोटी और कम ठण्डी हवादार रातें थी
जो हमारी नींद के लिए अक्सर कम पडती थी ,

यह वह समय था जब खूब खिले फूल जैसी
औरतों के अच्छे लगने की शुरुआत हो गई थी
उनके सरोकारों के लिए दौड लगाना
अच्छा लगने लगा था
शायद यह लडकियों से प्रेम करने का या
होने का पूर्वाभ्यास था
औरतों के कपडों से आती भींनीं गन्ध से
अजीब-सा कुछ महसूस होने लगा था,

तब इतनी चीजें कहाँ थी
एकाध कभी किसी के घर आती थी
वह भी धरउवल की तरह हो लेती थी
शहर से कभी कभार एक आइसक्रीम वाला
जरुर आ जाता था
जिसके पीछे हम लडकों की लम्बी कतार होती थी
इस कतार में शायद ही किसी के पास
खरीदने के लिए पैसे होते थे
सो आँखों के देखनें के लिए
सपने कहाँ से लाते,

लपलपाती दुपहरियों मे हमारे साथ
नीम और पीपल की घनी छायाएँ होती
ज्वार के डटेर के पुंगू होते
जिनसे कभी मुँह फूँकू बाजा बजाते
कभी पुंगू रगड कर पैदा कर देते आग
इन हाथों में सूखे पुंगूओं से आग
पैदा करनें की ताकत आगई थी
लेकिन यह समझ नह आयी थी कि
आग कहाँ लगानी है सो
आग पैदा करने का दम दिखा कर रह जाते ,

यह हमारे आग और पानी के दिनों की शुरुवात थी
सो हम उसके लिए हर कहंी खडे दिखाई दे जाते
इससे अधिक कुछ करनें का हुनर नह था मालूम
जब तक कुछ देखने से जानते कुछ सुनागुन से समझते
गाडी स्टेशन से आगे बढ जाती
हाथ हिला कर उन्हें विदा भी नह कर पाते
सो एक-एक करके सब चली गई,

इस सम्बन्ध में शहर के पूर्वज कवि
जो देखने सुनने में अच्छे खासे
गौरांग महाप्रभु दिखते और लगते थे
अक्सर कहते थे कि
भला हो हमारे उन पुरखों का
जिन्होंनें शादी के लिए अरेंज मैरिज चला रखी थी
वरना मैं अनब्याहा ही रह जाता मुझको कौन पूछता
मुझसे कौन प्रेम करता और
प्रेम कैसे किया जाता है मुझे मालूम था नह
जीवन का तो उन्होंने नह खोला
लेकिन अपनी कविता में बंशी बजाई थी
बंशी राधा की थी या रुकमनी की
यह मुझे नह मालूम लेकिन
प्रेम में वे अच्छा डोले थे
जिसे कविता में अब भी याद किया जाता है,

यह प्रेम की करामात थी कि
एक दूसरे कवि ने जहाँ कभी
उसकी आँखें फँस कर रह गई थी
वहाँ नाव बाँधने तक से मना कर दिया था
डोलने और मना करने की
वर्जनाओं के बीच फँसा हमारा प्रेम
कुछ न कुछ कर गुजरनें की फिराक की बजाय
वहीं का वहीं ठाव-ठक्क करता रहा ,

अचानक एक रात जिसे कभी नह देखा था
उसे दिखा कर कहा गया हमसे
यह तुम्हारा प्रेम है
किताबों में इस प्रेम के बारे में कहीं नह पढा था
जिन्हें घाट पनघट में देखता चला आ रहा था
यह वह भी नह थी
यह उनमें भी नह थी
जिनकी आँखों की बुलाहट में
हमें नदी नाले आग पानी कुछ भी नह दिखाई देते थे
यह वह भी नह थी
जिनके लिए हमारी लम्बी राते छोटी होकर
आँखों में ही रीत जाती थी
यह उनमें भी नहीं थी
जिनसे कभी इतनी बातें की थी
जितनी होने में अब न जानें कितनें जनम गुजरेंगे
यह निश्चय है कि अब हम जो करेंगे
और यह जो है इसे कभी दिखाई नह देगा कवे
हमारे भीतर बैठी हमारे लिए स्वेटर बुन रही है ।

समय

न किनारों के होनें का
कोई मतलब था
न घाटों के होनें का कोई अर्थ
जो था वह स्मृति में था
नदी स्मृति में थी
स्मृति कभी रहती थी
कभी नह,

समय से पहले
समय के आनें की धमक आ रही थी
समय से पहले
समय के जानें का दुख तारी था
जो अभी जाना नह चाहता था
आनें वाले समय के लिए
छोड जाना चाहता था
अपना ताग पात,

बेदखल होता समय
कोशिश में था
बनाए रखनें की दखल ।

सम्पर्क - डी.एम. कालोनी, सिविल लाइन,
बांदा - 210001 मो. 9450169568 / 8948647444