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रश्मि शर्मा की कविताए

रश्मि शर्मा
दिसम्बर

कुछ और लम्बी हो जाएगी
यादों की फेहरिस्त
देखते ही देखते गुजर जाएगा यह साल भी
धूप सेंकने के बहाने
छत के किसी कोने में
याद आएगी कुछ सफली बातें,
अनकहे फसाने

आखिर दिसम्बर तक
यह लगेगा कि
फूल आएँगे, या आएगा कोई पैगाम

एक बार को
जी मचल उठेगा कि
भूल कर हर शिकवा धीमे से फिर आवाज दूँ

मगर, सर्द मौसम में
सर्द लहजे की याद
कटार बन चुभेगी, आग बन जलाएगी

हर बरस की तरह
होंगी ठिठुरी हुई रातें
यह दिसम्बर भी पहले की तरह गुजर जाएगा ।

2. इंतजार का सिरा
डाल जाती है हर रोज
उद्वेलित-सी साँझ
मेरी छत पर
सिन्दूरी आसमान का
एक टुकडा
और
एक इन्तजार का सिरा !

मैं रख लेती हूँ
पकड उसी सिरे को
जो तुम्हारे पदचिन्हों के पीछे
चलकर जाता है
एक पराये से अनदेखे शहर में

मगर मैं
जाना नह चाहती
अपने आलिन्द से दूर
पुरसुकून हवाओं से परे
कि आग-सी झुलसाती है
पराए शहर की खुश्बू...

जानते हो ना तुम
कि ढलते और उगते सूरज की
एक-सी होती है छवि
मगर डूबने और उगने में
कितना अन्तर होता है!
छितर जाते हैं भावनाओं के रेशे - रेशे
जब हम किसी बात को लेकर
अडे होते हैं
युद्धरत से आमने-सामने
यह भी है कि कोई बात
जो भोर के उजाले के साथ
हमारे दरमियाँ
कोबरे की तरह
फन काढे खडी होती है
वह शाम की किरणों से रंगकर
और भी चमक जाती है
कुछ चलता है, हमें छलता है
विषाद की धूम्र रेखाओं से
आँखों में पानी भरता है

अन्ततः रात के
अगले मोड पर
वक्त को रोककर
हम करते हैं समझौता
अपने-अपने केंचुल उतार
समझौते के वस्त्र पहन
हिल-हिल कर हँसते हैं और
श्वेत बिस्तर के पैताने
अपनी कडवाहट को
कल भोर तक के लिए
मुल्तवी करते हैं...

विभोरित पाखियों-सा
नीड बुनते हैं
बैचैन नींद की राहों से
सपन चुनते हैं ....
फिर एक नए सवेरे के लिए !

3. अनदेखी लिपियाँ

कही तुमने मुझसे
बार-बार वो बातें
जिनका मेरे लिए
न कोई अर्थ है
ना ही अस्तित्त्व

जो मैं पढना चाहूं
तुम्हारे आँखों की
अनदेखी लिपियाँ
कहो कौन-सी कूट का
इस्तेमाल करूं

मैं ढूँढती रहती हूँ
कोई ऐसा स्रोत
ऐसी किताब
जो आँखों की भाषा को
शब्दों में बदलती हो

है यह ईसा पूर्व की या
सोलहवीं सदी
की-सी बात
कि हमारे बीच से
शब्द अदृश्य ही रहे हैं

अब तुम पढना
मेरा मौन, सहना
मेरी अनवरत प्रतीक्षा
और मैं कूट-लिपिक बन
पढूँगी, आँखों की अनदेखी लिपियाँ

4. हँसिए-सा चाँद

यह हँसिए-सा चाँद
जब भी मेरी छत पर आता है
जी चाहता है
हँसिए से
मेरे इर्द-गिर्द उग आए
बेमतलब के खर-पतवार
काट डालूँ,
और कह दूँ इस चाँद से
फकत महबूब का चेहरा ही
नह दिखता तुझमें
तू मेरा औजार भी बन सकता है
मत समझ खुद को केवल
प्यार के काबिल,
कुछ सरफिरों का
तू हथियार भी बन सकता है।
5. चिरैया

ढलती रात तक तारी रहे
सुकून भरी सहर
ऐसा खुशगवार दिन
हर दिन के
नसीब में नह होता

सुबह का खिला फूल
शाम ढलते मुरझा जाता है
चमकता सूरज
अपनी लालिमा के साथ
दूर पहाडों के पीछे बुझ जाता है

यूँ भी होता है कि मोहब्बत
इम्तहानों से रोज गुजरकर
थक कर एक दिन
अपनी ही बाँहों में
चेहरा छुपा कर सो जाता है

सुकून भरे दिन-रात
देने का वादा करने वाला
प्यारे से घोसले में सो रही
नन्हीं-सी चिरैया को
प्यार जताते हुए खुद ही उडा देता है......
6. कौन सा वक्त है ..
यह वक्त है
सूखने, चटकने, टूटने और मरने का
धरती सूखी है
सूरज के प्रचण्ड ताप से पड गईं है दरारें
त्राहि मची है चारों ओर
कई रिश्ते भी टूटे इन्हीं दिनों
टूटती पत्तियों की तरह नह
हरी-भरी डाली गिर गई
जरा-सी हवा ने सबकी औकात
उजागर कर दी
कई आइने चटके पडे हैं
आदमी बँटा नजर आ रहा
बडा शोर उठ रहा कुछ-कुछ दूरी पर
आदमियों का मेला भी है
रेला भी
पूछते हैं लोग इन दिनों अपने शहर में
चल रहा ये क्या नया खेला है
गाँवों में फिर मीनाबाजार लगने लगा
रिक्शे के पीछे कुत्ते दौड लगा रहे
तडप-तडप कर अपने आप मर रही हैं
गेतलसूद डैम की मछलियाँ
घाटी में अमन के पैरोकार और सिपाही
मारे जा रहे हैं
हरवे-हथियार से लैस हैं लोग
मुस्तैद खडी है पुलिस
सरकार दे रही रुपये किलो चावल
मगर भूख से मरने की खबर रोज आ रही है
दरअसल ये दौर है
सूखने, चटकने, टूटने और मरने का
पतंग उडाने से *यादा

काट गिराने की ताक में हैं लोग
बाबा के आँगन का अमरूद पेड
बान मारने से सूख गया
गुलाबी कमल से भरा तालाब
अबकी बरसात में मर गया
और
जीवन के सबसे सघन-सुन्दर सम्बन्धों में
लोहे की तरह जंग लग गया।

7. मृत्युगंध

नह, बिल्कुल नह भीगी थी
बारिश की फुहारों में
मगर
पसलियों में अकडन है
ऐंठ रही पिण्डलियाँ

ताप बढता ही जाता है
फूलदान में सजे रजनीगन्धा से
कोई खुशबू नह आती
बे स्वाद है सब
बडबडाहट तेज हुई जा रही
हाँ, नह जी सकती तुम्हारे बिना
भूलना असम्भव है
पास आओ, रख दो माथे पर हाथ
कहीं धुनिया धुनक रहा रुई
आसमान से बर्फ के फाहे गिर रहे
देखो
तुम हो ना, तुम जानते हो न
कितना कुछ बदल जाएगा
तुम्हारे न होने से
आदत, जरूरत, सपने और
गहरी नींद सोने के लिए चाहिए
तुम्हारे बदन से उठती पहचानी खुशबू
सुला दो अब, मान भी जाओ
कसम से, जब से मना किया
नह भीगी हूँ बौछारों में
बस जरा सी हरारत है, परेशान ना हो
सो जाऊँ, रख दूँ सीने पर सर
ओह, यह वो गन्ध नह
तुम्हारी देहगन्ध नह
जाने दो अब, कोई बुलाता है
आँखें झपकी जा रही
पहचान पा रही हूँ अच्छे से
चिर-प्रतीक्षित, यह तो मृत्युगन्ध है।


सम्पर्क - ष्ट/श्ा आदर्श फार्मा, मुख्य मार्ग,
रमा नर्सिंग होम, राँची, झारखण्ड - ८८३४००१
फोन- 9204055686
मेल- rashmiarashmi@gmail.com