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हिंसा-अहिंसा पर असमाप्त बहस

राजीव रंजन गिरि
अहिंसा का उत्तर आधुनिक परिपे*क्ष पुस्तक पर एकाग्र
मानव सभ्यता की विकास - यात्रा में हिंसा - अहिंसा के सम्बन्ध में पर्याप्त बहसोमुबाहिसा होते रहे हैं। भूगोल और काल के हर हिस्से में। दुनिया के किसी समाज पर गौर करें, तो उसकी सामाजिक - सांस्कृतिक बुनावट में हिंसा - अहिंसा के बाबत पक्ष - प्रतिपक्ष की मौजूदगी दिखेगी और उसमें वाद-विवाद-संवाद भी। हर समाज ने गठन और विकास के दौरान जिन मूल्यों का निर्माण एवं विकास किया है, समाज के संचालन हेतु जिन नीतियों, सिद्धांतों को जन्म दिया है, उनमें हिंसा - अहिंसा की दार्शनिक अभिव्यक्ति है। संसार के सभी धर्मों की रचना में भी इस बाबत चिन्ता दिखती है। धार्मिक ग्रन्थ हों या क्लासिकल साहित्य, उनमें गहरे रूप में हिंसा - अहिंसा की मीमांसा दर्ज हैं। धर्मों की चेतना, चिन्ता और चिंतन के दायरे में इन विचार-युग्मों की उपस्थिति इसकी महत्ता रेखांकित करती है। इससे मनुष्य - मनुष्य, मनुष्य से प्रकृति , पारस्थितिकी और पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों पर भी प्रकाश पडता है।
मनुष्य को केन्द्र में रखकर, इस पर हुए विचारों का, दो मोटा भेद करें, तो कहना होगा कि एक विचार के अनुसार मनुष्य की प्रकृति अहिंसा है, जबकि हिंसा विभिन्न परिस्थितियों की पैदाइश।

इसके विपरीत दूसरा विचार यह मानता है कि मनुष्य स्वभावगत हिंसक होता है, अहिंसा का विचार समाज के सुचारु संचालन के लिए विकसित किया गया है। बहरहाल, प्राचीन काल में महावीर हों, बुद्ध हों या ईसा- इन सबने अहिंसा की अपरिहार्यता स्थापित की है; इसका एक अर्थ है कि इनके दौर में भी हिंसा एक बडी चुनौती के तौर पर उपस्थित रही है । नतीजतन इन्होंने इससे उत्पन्न संकटों की शिनाख्त कर अहिंसा पर बल दिया है। कहना होगा कि इन लोगों ने हिंसा को मनुष्यता के विकास में बाधा माना और मानवीय सिद्धि के समक्ष दीवार। बावजूद इसके हिंसा की अनिवार्यता स्थापित करने वाली विचारधाराएँ भी मिलती हैं। गौरतलब यह भी है कि विकास का जो मॉडल दुनिया ने स्वीकार किया है, उसकी संरचना में हिंसा, गैरबराबरी अनुस्यूत है।
इस हिंसा और गैरबराबरी को खारिज करने की कामना है लैश लोगों ने भी इस संरचना का विकल्प रचने के बजाय इसमें फेर - बदल करने में ही बौद्धिकता का निवेश किया है ।
परिणामतः हिंसा और असमानता बदले रंग- रूप और ढब में कायम रहती है ।
स्वतंत्रता, समता एवं मनुष्यता की दीर्घकालीन स्थापना के लिए अहिंसा के आधार पर निर्मित भैतिक एवं वैचारिक संरचना के निर्माण के मकसद से, प्रकृति भारती अकादमी, जयपुर ने बौद्धिक माहौल बनाने हेतु अहिंसा शांति प्रकोष्ठ के अन्तर्गत पुस्तकों का प्रकाशन आरम्भ किया है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की एक सौ पचासवीं जयंती के अवसर पर शुरु इस परियोजना का स्पष्टतः मानना है कि हिंसा के विविध रूपों से त्रस्त मानवता के उपचार के लिए महावीर, बुद्ध और महात्मा गाँधी के जीवन और विचारों सहित पूर्वी - पश्चिमी सभी चिन्तकों का अहिंसा - विमर्श आज पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो गया है अर्थात् अहिंसा दृष्टि और उस पर आधारित सामाजिक विकास ही हिंसा का एकमात्र उपचार हो सकता है। 1
अहिंसा - दृष्टि पर आधारित सामाजिक विकास की चिन्ता करने वाले के लिए आवश्यक है कि वे इसे धार्मिक - आध्यात्मिक सन्दर्भों तक सीमित न रखें, बल्कि मौजूदा परिप्रेक्ष्य में भी अहिंसा की अर्थवत्ता और आवश्यकता रेखांकित करें।
प्रत्यक्ष हिंसा के साथ - साथ अप्रत्यक्ष हिंसा की भी शिनाख्त करें। प्रकृति भारती अकादमी, जयपुर के संस्थापक एवं मुख्य संरक्षक डी.आर. मेहता और निदेशक प्रो. कुसुम जैन ने इस बाबत लिखा है, हिंसा केवल प्रत्यक्ष ही नह होती । युद्ध, सैनिकवाद ,आतंकवाद आदि हिंसा के प्रत्यक्ष रूपों के साथ उसके अप्रत्यक्ष रूप भी काम खतरनाक नह है । ये अप्रत्यक्ष रूप हमारी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक-पारिवारिक संरचनाओं में तो व्याप्त है ही, साथ ही हमारी विश्वास-प्रणाली अर्थात् सांस्कृतिक संरचना में भी न केवल हिंसा अन्तर्व्यापत रहती बल्कि हिंसा के अन्य रूपों को औचित्य प्रदान करने लगती है - ये विश्वास केवल साम्प्रदायिक ही नह, विचारधारात्मक भी होते हैं।2
इस प्रकाशन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए, इन्होंने बताया है कि अहिंसा-शांति ग्रन्थमाला का प्रयोजन हिंसा और अहिंसा-शांति के विविध सूक्ष्म रूपों और उनकी पृष्ठभूमि में सक्रिय मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक आधारों को समझने और हिंसा के इन रूपों से उबारने के उपायों और विकल्पों से सम्बंधित पुस्तकों का प्रस्तुतीकरण है क्योंकि इन रूपों - आधारों की सम्यक समझ के बिना अहिंसा - विमर्श के वातावरण और अहिंसक समाज का विकास सम्भव नह है। इसी आलोक में अहिंसा-शांति ग्रन्थमाला की ग्यारहवीं पुस्तक श्री प्रकाश मिश्र लिखित अहिंसा का उत्तर आधुनिक परिप्रेक्ष्य प्रकाशित हुई है। ग्यारह अध्यायों- उत्तरआधुनिकता और अहिंसा का तात्पर्य, सत्य का स्वरूप और अहिंसा, प्रकृति, मनुष्य, परिवार, समाज, राज्य, अर्थव्यवस्था, मूल्य और संस्कृति, मानवाधिकार, गाँधी और अहिंसा - में विभक्त इस पुस्तक में अहिंसा की संभावनाओं, सीमाओं और आवश्यकताओं पर विचारोतेजक एवं सारगर्भित विचार विश्लेषण किया गया है।
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ज्ञान- की दुनिया में जिस बौद्धिक कीमियागिरी को उत्तर-आधुनिकता कहकर संबोधित किया गया, उसके बारे में विद्वानों का एक तबका कहता है कि यह आधुनिकता की अगली कडी है, उसका अगला चरण है; जबकि, दूसरा तबका इसमें आधुनिकता की परियोजना का नकार देखता है, आगे का नया विचार मानता है। श्रीप्रकाश मिश्र ने उत्तर आधुनिकता को स्पष्ट करते है हुए लिखा है कि आधुनिकता का दार्शनिक पहलू यह था कि मध्यकालीनता और प्राचीनकालीनता ने आत्म पर जोर दिया था। उसने आध्यात्मिकता और पराभौतिकता पर बल दिया था। ईश्वर को जगत के केन्द्र में रखा था। आधुनिकता ने आत्म (ह्यद्गद्यद्घ) पर जोर दिया, भौतिकता पर जोर दिया और जगत के केंद्र में मनुष्य को रखा । इस मनुष्य के तीन रूप देखे - एक शरीर का, दूसरा मन का और तीसरा सामाजिक सम्बन्धों का।
सामाजिक सम्बन्धों के तहत पारिवारिक, नागरिक, आर्थिक राजनीतिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों को देखा, विवेचित किया, उनका सामान्यीकृत सिद्धांत खोजा। उसके लिए एक त्रिदेव रचा - विवेकवाद का, देशकालातीत का, व्यक्तिवाद का। उत्तर आधुनिकता ने अपने केंद्र में आत्म की जगह निज (Personal) को रखा; जगत के केन्द्र में सामान्यीकृत मनुष्य को नह, स्वयं अपने-आप को रखा और जोर उत्कट भौतिकता और अकूत भोग पर दिया। जो लोग उत्तर-आधुनिकता को आधुनिकता का ही विस्तार मानते हैं, वे उसके त्रिदेवों को भी स्वीकार करते हैं। लेकिन विवेक को स्वीकार करते हुए भी वे कहते हैं कि वही ज्ञान का एकमात्र साधन नह है। उसका साधन प्रपन्न-मति, इल्हाम, मूल प्रवृत्ति, अनुभूति आदि भी है। कारण यह है कि वनस्पतियों में सिर्फ चेतना होती है, पशुओं में चेतना और मूल प्रवृत्ति दोनों होती है। देवता में चेतना और मूल प्रवृत्ति के साथ विवेक भी होता है। पर, मनुष्य में इन तीनों के साथ संवेदना और भावना भी होती है। इसीलिए, वह सबसे बडा हो जाता है।4
आधुनिकता एवं उत्तर-आधुनिकता के दौर में समाज, राष्ट्र, कला एवं संस्कृति को समझने के लिए विभिन्न सिद्धांत सामने आए। इन सभी विचारधाराओं- सिद्धांतों की पैदाइश खास सन्दर्भ एवं परिवेश हुई है। स्त्रीवादी राजनीतिशास्त्री निवेदिता मेनन ने बिल्कुल ठीक लिखा है कि बीसवीं शताब्दी का अन्त होते-होते हम यह बात स्वीकार कर चुके हैं कि कोई भी विचारधारा देश-काल से परे जाकर सार्वभौम नह होती। माक्र्सवाद हो या उदारवाद-हर विचारधारा अपने खास सन्दर्भ में अवस्थित होती है। उसका अपना एक विशिष्ट इतिहास और भूगोल होता है। इस तरह देखें तो विचार एक तरह की विशिष्ट स्थानिकता , इतिहास और भूगोल की अन्तः क्रियाओं से जन्म लेते हैं। अब तक हम जिस परिघटना को ज्ञानोदय (एनलाइटमेंट) कहते थे, उसे अब हम जान - बूझकर यूरोपीय ज्ञानोदय कहने लगे हैं।5 मेनन ने विचारधाराओं की सार्वभौमिकता के दावे को प्रश्नांकित किया है और उसकी उत्पत्ति के कारकों को पहचान पर बल दिया है। प्रो. सुधीश पचौरी ने अपनी हालिया प्रकाशित पुस्तक में नयी सिद्धांतिकियों का अध्ययन-विश्लेषण किया है। इस अध्ययन के दौरान उन्होंने बार-बार यह महसूस किया है कि इन सिद्धान्तिकियों के मूल कारक और विषय विकसित देशों की नयी पूँजीवादी और गोरी नस्लवादी वर्चस्वकारी चिन्ताएँ हैं, जो अपने वर्चस्व को कम नह होने देना चाहती इसीलिए वे ज्ञानानुशासनों में अग्रणी बने रहना चाहती है।6 जिन विचारधाराओं, सैद्धान्तिकियों के जरिए हम अपनी जटिल परिस्थितियों को समझने की कोशिश करते हैं,उनके बारे में प्रो. मेनन और प्रो. पचौरी की समझ के आधार पर भी सोचने की दरकार है ।इन दोनों बौद्धिकों के उद्धरणों को सहमति पूर्वक उद्धृत करने का मतलब यह नह है कि अपनी मिट्टी, अपने परिवेश, अपनी परिस्थिति से दूर देश-काल से आए विचार-दर्शन या सैद्धांतिकी से परहेज करें, बल्कि, इसका अर्थ है कि उन विचारधाराओं के सन्दर्भों और सीमाओं के प्रति सचेत रहना आवश्यक है। उसके भीतर की सत्ता मूलकता को नजरंदाज करना श्रेयस्कर नह ।
यह निबन्ध श्रीप्रकाश मिश्र की पुस्तक अहिंसा का उत्तर-आधुनिक परिप्रेक्ष्य पढने के पश्चात लिखा गया है। लिहाजा, इसकी चर्चा अपेक्षाकृत अधिक है। इन्होंने आधुनिकतावाद द्वारा मनुष्य को केंद्र में रखने, कर्तव्य-भावना पर जोर न देने, धरती और अन्य प्राणियों पर स्वामित्व के विचार से उत्पन्न परिणामों को हिंसा के कारक के तौर पर माना है। जब यह विचार- दर्शन सामने आया, इसके दुष्परिणाम पर कम ध्यान गया था। कारण यह था कि उस दौर में विज्ञान और तकनीक का विकास इतना नह हुआ था कि इसके जरिए धरती पर और उसके गर्भ में मौजूद सभी संसाधनों एवं प्राणियों का इस कदर उपयोग किया जाए उनका भविष्य ही खत्म हो जाए। विचार की नयी परिघटना- जो उत्तर-आधुनिकतावाद के नाम से चर्चित हुई- ने इस प्रकृति को गति और आकार प्रदान किया। इससे हिंसा तत्व में बढोत्तरी हुई। इसकी व्याख्या करते हुए श्रीप्रकाश मिश्र ने लिखा है, उदारवाद, अनुदारवाद और माक्र्सवाद तीनों ही अपने- अपने तरह के मूल्यबोध का जंजाल लेकर चलते थे, किंतु यह नया चिंतन उसे धता बताकर चलता है। परिणामस्वरूप, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के माध्यम से अकूत लाभ कमाने के इरादे से राज्य की सम्प्रभुता को सीमित करते हुए - हो सके तो समाप्त करते हुए- बलशालियों द्वारा निर्बलों के शोषण का नया दर्शन रच रहा है। यह शोषण दो स्तरों पर है : एक तो उत्पादन के लिए प्रकृति का अकूत दोहन, दूसरा बाजार के लिए सुरक्षित, संरक्षित क्षेत्र, जिसमें दूसरों का प्रतियोगी के रूप में आना वर्जित है। परिणामस्वरूप हिंसा उसका प्रमुख घटक बनकर उभर रही है।7 इसे ही लेखक ने अहिंसा पर सोचने के लिए प्रेरित करने वाला माना है। इन चिन्ताओं से लैश लेखक को लगता है कि अहिंसा नकारवाची शब्द है- हिंसा का नकार।8 अहिंसा के बारे में यह धारणा आमफहम है। अहिंसा के मूल्य- दर्शन के समर्थक हों या विरोधी, अमूमन, इस मामले में एक राय रखते हैं कि अहिंसा एक निषेधात्मक विचार - प्रत्यय है। अहिंसा को निषेधात्मक मानने वाले हिंसा शब्द को मूल मानते हैं और अ उपसर्ग पर जोर देते हैं। यह ठीक तथ्य है कि हिंसा का निषेध अहिंसा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या इस आधार पर अहिंसा विचार- प्रत्यय को नकारवाची माना जाना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए, यह पूछना आवश्यक है कि हिंसा क्या है? नकारवाची उपसर्ग अ से निर्मित शब्द अहिंसा में निषेधात्मकता देखने वाली दृष्टि में हिंसा को सकारात्मक मानने का परोक्ष- अपरोक्ष विचार निहित है। हिंसा का औचित्य प्रतिपादित करने वाले विचार-दर्शन ऐसा सोचें तो ठीक भी है परन्तु अहिंसा को मूल्य के तौर पर स्थापित करने वाले बौद्धिक - कर्म में भी ऐसा दिखं,े तो चिन्ताजनक है। नंदकिशोर आचार्य ने अहिंसा की संस्कृति में इस प्रश्न पर सुचिंतित बातें लिखी है।9 इन्होंने जॉहन गालतुग की पुस्तक वायलेंस एँड इट्स कॉजेज के जरिए बताया है कि मानवीय आत्मसिद्धि में कोई भी निवारणीय अवरोध हिंसा है। कहना होगा कि गालतुग ने हिंसा को अवरोध कहकर इसे नकारात्मक विचार- प्रत्यय माना है। यह ऐसा अवरोध है जो निवारणीय है। श्रीप्रकाश मिश्र ने हिंसा को व्याख्यायित करने के लिए ब्लैक बर्न , रेमण्ड विलियमस , जार्ज सोरेल सरीखे दार्शनिकों को उद्धृत किया है।
साइमन ब्लैक बर्न का मानना है कि वह कारगुजारी, जो व्यक्ति या प्राणी को चोट पहुँचाती या विनष्ट कर देती है, जिस पर आयत की गई है, वह हिंसा है।10 बर्न इसकी जटिलता स्वीकार करते हुए इसकी अनेकरूपता की व्याख्या करते हैं। वे संरचनात्मक हिंसा की व्याख्या करते हुए बताते है कि संरचनात्मक हिंसा वह है, जो उस स्थिति में अन्तर्भुक्त होती है (जिसकी परिणति चोट या विनाश में हो) पर, जिस स्थिति के बारे में ये हिंसा करनेवाले लोग उदासीन हो ।11 माक्र्सवादी आलोचक रेमण्ड विलियम्स ने हिंसा के पाँच रूपों की चर्चा की है। एक, शारीरिक हिंसा जो प्रत्यक्ष दिखती है। दो, जिसमें एक देश के सैनिकों पर ही नह बल्कि नागरिक इलाकों, अस्पतालों पर बमबारी होती है, आतंकियों के द्वारा निर्दोष नागरिकों की हत्या की जाती है। तीन, जब संचार माध्यमों पर हिंसा दिखाई जाती है, मनोरंजन के कार्यक्रमों में। दिलचस्प है कि इसमें मारधाड , हिंसा असलियत में न होकर नाटक भर है। बावजूद इसके यह चिन्ताजनक है। इसकी वजह यह है कि इसका असर ऐसा है कि लोगों के मन में हिंसा भर जाती है। दर्शक न सिर्फ हिंसा को मनोरंजन के तौर पर ग्रहण करते हैं अपितु हिंसा को स्वीकार भी करने लगते हैं। उनके मन में हिंसक प्रकृति के लिए जगह बनने लगती है। कई बार इसके निर्माताओं की इच्छा हिंसा के विरुद्ध नफरत पैदा करना होता है तो कई बार हिंसा की औचित्य - स्थापना भी । यह इतनी सूक्ष्म एवं जटिल कार्रवाई है कि इसमें हिंसा के प्रतिकार की घोषणा के बावजूद हिंसा के प्रति आकर्षण की गुंजाइश कायम रहती है। चार, हिंसा का उपयोग दूसरों को धमकाने के लिए होता है। पाँच, यह भी नियम- विरुद्ध आचरण रूप में दिखाई देती है, जो समूह विशेष की संवृत्ति बन जाने पर एक व्यवस्था, एक संस्कृति को तहस-नहस कर देती है। इसके संचालन में संवेग की शक्ति कार्य करती है।12 बर्न और विलियम्स की हिंसा सम्बन्धी व्याख्याओं में भी इसका निषेधात्मक पक्ष ही उजागर हुआ है।
किसी शब्द को नकारवाची, मानना उस शब्द में निहित अर्थ पर निर्भर करता है या उसकी व्युत्पत्ति पर? कोई भी शब्द, जो अर्थ धारण करता है, उस अर्थ में अन्तर्निहित विचार , गुण और उसके अनुरूप होने वाले कर्म से व्याख्यायित होता है। शब्द की धनात्मकता अथवा निषेधात्मकता अर्थ में निहित विचार - दर्शन के प्रति हमारी धारणा पर है निर्भर करती है। नंदकिशोर आचार्य के विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि व्युत्पत्ति के लिहाज से निषेधात्मक प्रतीत होने वाले शब्द भी सकारात्मक भाव द्योतित करते हैं; उदाहरणस्वरूप, अमरता या अमृतत्व को ले सकते हैं। अ उपसर्ग के बावजूद हम अमरता या अमृतत्व को कभी नकारवाची नह मानते तो इसका कारण यही है कि यह सकारत्मकता का भाव प्रकट करता है। आचार्य जी ने लिखा है, हिंसा पद की व्याख्या करने पर भी अहिंसा पद भावात्मक और नैतिक स्तर पर एक सकारात्मक भाव ही प्रकट करता है.... अहिंसा अपनी सकारात्मकता के कारण केवल भाव नह, बल्कि क्रिया अथवा आचरण भी है और इस भाव की सिद्धि भी भावात्मक के साथ-साथ आचरण गत ही हो सकती है।13
हिंसा को परिवर्तन का सशक्त साधन मानने वाले दार्शनिकों में जार्ज सोरेल प्रमुख हैं। क्या यह कहने की जरूरत है कि परिवर्तन के जरिया को नकारात्मक मानना सरल नह; लिहाजा हिंसा नकारवाची नह मानी जाएगी। सोरेल के मुताबिक चूँकि परिवर्तन अपरिहार्य है, इसलिए हिंसा को स्वीकार करना ही पडता है- और स्वीकार किया भी जाना चाहिए।14 इनके अनुसार, ऐसी कई स्थितियाँ हैं, जिनमें हिंसा स्वीकार्य है। अगर किसी राज्य पर कोई अन्य राज्य हिंसा या आतंक करता है तो हमें उस पर शोकाकुल नह होना चाहिए क्योंकि यह हिंसा या तो अपने राज्य के विस्तार के लिए हो रही होगी, या उसे रोकने के लिए, या फिर उसे सजा देने के लिए । यही धारणा एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय पर हो रही हिंसा के सन्दर्भ में लागू होती है। कितना दिलचस्प है न सोरेल का यह तर्क ! अपने राज्य के विस्तार की इच्छा से प्रेरित हुई हिंसा भी जायज और रक्षा की कामना से प्रतिरोध स्वरूप की गई हिंसा भी! प्रतिरोध करने वाले के साथ दूसरे पर आधिपत्य की स्थापना वाले की हिंसा भी उचित! दूसरे देश अथवा समूह पर वर्चस्व स्थापित करने की कामना से लैश हिंसा को स्वीकार्य मानने वाला यह विचार - दर्शन कितना खतरनाक है, स्मरणीय है। सोरेल के अनुसार, राज्य के अंदर परिवर्तन प्रेरित हिंसा भी उचित है क्योंकि राज्य स्वभावानुसार अपने नागरिकों के प्रति हिंसक होता है और उस हिंसा से निजात पाने के लिए प्रतिहिंसा होती है। जार्ज सौरेल युद्ध, क्रांति और कानून की व्यवस्था के भीतर होने वाली हिंसा को सर्वथा उचित मानते हैं। ऐसे विचारानुसार हिंसा की स्थितियों और उद्देश्यों पर गौर करना चाहिए, न कि हिंसा पर। स्पष्ट है कि अपने मनोवांछित उद्देश्य से की गई हिंसा जायज है। दूसरे शब्दों में कहें, तो हिंसा अपने आप में गलत नह, बल्कि उसके पीछे के कारक, और इसके जरिए हासिल होने वाली निजी या सामूहिक कल्पना महत्त्वपूर्ण है। जाहिर है, यहाँ हिंसा इसे अंजाम देने वाले की समझ और कल्पना के लिहाज से देखी जाएगी। हिंसा का मूल्यांकन खालिस हिंसा पर निर्भर नह, बल्कि विषयनिष्ठ ढंग से होगा। इस तर्क से, अगर उद्देश्य और कारक को उचित मानने वाले उत्पीडक समूह, कौम और राष्ट्र की हिंसा भी उचित ठहरती है।
श्रीप्रकाश मिश्र ने यह ठीक नोट किया है कि यद्यपि, सौरैल वामपंथी दार्शनिक था पर, उसकी स्थापनाओं का उपयोग दक्षिणपंथी फासीवादियों और नाजियों ने किया। यही वह बिन्दु है जहाँ वामपंथ और दक्षिणपंथ का मिलान होता है। दो विपरीत धुरी पर होने के बावजूद दोनों की परिणति एक होती है। दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं परन्तु अपनी तार्किकता और समझ में संगति करते हैं, हिंसा को जायज ठहराने के मुद्दे पर। ये दोनों अपनी हिंसा को उचित मानते हैं और दूसरे की हिंसा को गलत। वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।
इसका विस्तार और विकास उत्तर - आधुनिकता की इस समझ में दिखता है, जहाँ हिंसा को अच्छे और बुरे, की कोटि में विभक्त किया जाता है। अच्छी हिंसा क्या है? दूसरों के द्वारा की जा रही हिंसा के प्रतिकार में की जानेवाली; मसलन, आत्मरक्षा में की गई हिंसा, अपने ही राज्य, समाज या परिवार के भीतर आततायी को नष्ट करने हेतु की गई हिंसा, या सजा देने के लिए की गई हिंसा, अपनी सीमा की सुरक्षा के लिए की गई हिंसा आदि। इनके अलावा माक्र्सवादी विचारानुसार, आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए, क्रांति के मकसद से की जाने वाली हिंसा, और क्रांति के पश्चात् वर्ग शत्रुओं के ऊपर होने वाली हिंसा, अपनी व्यवस्था कायम रखने के लिए- नई व्यवस्था को बदलने की कोशिश करने वाले बाहर या भीतर के शत्रुओं को नष्ट करने के लिए- प्रयुक्त हिंसा, अच्छी हिंसा की श्रेणी में आती है। किसी राष्ट्र-राज्य से कोई इलाका हिंसक कार्रवाई के जरिए पृथक होने की कोशिश करने वाला, उनके हिसाब से, मुक्ति-संग्राम कर रहे हैं; लिहाजा, इनकी हिंसा जायज है। इसके प्रतितर्क में राजसत्ता इसे विद्रोह बताते हुए इस हिंसा को कुचलने में भी हिंसा का सहारा लेती है और उसे जायज ठहराती है। वैचारिक धरातल पर मार्कसवाद के धुर विरोधी फासीवादी मानते हैं कि बहुसंख्यक की संस्कृति एवं वर्चस्व नह मानने वाले समूहों को- नस्ल, भाषा, संस्कृति, धर्म के आधार पर-नष्ट करने के मकसद से प्रयुक्त हिंसा अच्छी हिंसा होती है।15
स्लावोज जिजेक ने पूँजीवादी समाज में हिंसा की उपस्थिति के विभिन्न आयामों का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए इसके खतरों की शिनाख्त की है।16 महात्मा गाँधी के अनन्य शिष्य आचार्य विनोबा भावे कहते थे कि दुनिया में संघर्ष, तनाव और हिंसा का एक बडा कारण ही वाद है; इससे निजात के लिए भी वाद को बढाने की आवश्यकता है। अपने सत्य, अपनी विचारधारा, अपनी जीवन-दृष्टि, अपने युग-बोध को ही जो लोग एकमात्र सच और जायज मानते हैं, उसकी स्वाभाविक परिणिति अपने से इतर को नह समझने में होती है। इसके विपरीत जो लोग अपने सत्य के साथ दूसरे का भी स्वीकार करते हैं, उसके प्रति संवेदनात्मक रवैया रखते हैं, वे अहिंसा - दर्शन की तरफ बढते हैं।
सत्य के साथ अहिंसा का सम्बन्ध क्या है? सत्य और अहिंसा शब्द-युग्म पर ध्यान देते ही महात्मा गाँधी की छवि जेहन में उभरती है। वे इन दोनों शब्दों को, एक - दूसरे पर, परस्पर निर्भर प्रत्यय के तौर पर प्रयुक्त करते थे। सत्य की प्राप्ति के लिए अहिंसा माध्यम था। सत्य साध्य था तो अहिंसा साधन। कतिपय उन्होंने अहिंसा को भी साध्य के तौर पर बताया है और सत्य को न्याय के पर्याय के रूप में ।
गाँधीजी ने इन दोनों- सत्य और अहिंसा- को धर्म से ग्रहण किया था। वे मानते थे सभी धर्मो की बुनियाद में यही भावना है। उन्होंने बार- बार कहा है कि सत्य और अहिंसा उतने ही पुराने हैं जितने पर्वत और नदियाँ । इन पुराने विचारों पर नए सन्दर्भों में, रोशनी डालने में, अपनी भूमिका देखते थे। पर्वत और नदियों की तरह काल की सीमाओं के दायरे में नह आने के बावजूद इनकी महिमा व्यावहारिक जीवन में कम मानी जाने लगी थी। गाँधीजी अपने शब्द और कर्म के जरिये इसकी पुनस्र्थापना कर रहे थे। इसके लिए उन्हें विद्या-विशारदों की तलाश थी ताकि जीवन के हर क्षेत्र के लिए अहिंसा का शास्त्र गढें और जीवन में उसका परीक्षण भी करें। उन्होंने कहा है कि हिंसा के आधार पर बना हुआ समाज थी विशारदों द्वारा ही चलता है।हम एक नए समाज का निर्माण सत्य और अहिंसा के आधार पर करना चाहते हैं।उनका शास्त्र बनाने के लिए हमें विशारदों की जरूरत है। जिस तरह आज जगत चल रहा है, वह हिंसा और अहिंसा का मिश्रण है। जगत का बाह्य रूप उसकी भीतरी हालत का प्रतीक है।17 तमाम धर्मों के बुनियाद में अहिंसा की अवधारणा के होने के बावजूद उन्ही धर्मों के अवलंबियों ने जीवन और जगत को लेकर जो बोध विकसित किया, उनमें इसका स्थान गौण होता गया। दुनिया ने विकास का जो मार्ग अपनाया, जो संस्कृति निर्मित और विकसित की , उसने इसके मूल्यों को नेपथ्य में धकेलने का कार्य किया। लिहाजा मानव सभ्यता को अनीति के मार्ग से हटाने और सच्चे मायने में मनुष्यता के मार्ग पर चलने को प्रेरित करने के लिए इन्हें जरूरी लगा कि अहिंसा को केन्द्र में रखा जाए।
महात्मा गाँधी की दृष्टि में सत्य और अहिंसा अलहदा नह हैं। इनमें कोई द्वैत नह। महादेव भाई देसाई ने बताया है कि गाँधी जी बहुधा कहते थे कि सत्य और अहिंसा ही शाश्वत सिद्धांत हैं। अगर इनमें भी गहराई से देखना हो और किसी एक का ही चयन करना हो तो कहना होगा कि केवल सत्य ही शाश्वत सिद्धांत है। क्योंकि अहिंसा और सत्य एक ही है, और इनमें कोई अन्तर नह, यदि कभी किसी परिस्थिति में मुझे सत्य और अहिंसा दोनों में से किसी एक को चुनना पडे, तो मैं अहिंसा को छोडकर सत्य का ही चुनाव करूँगा, क्योंकि मेरे नजरिए से सत्य ही सर्वोच्च है। 22 फरवरी 1942 के हरिजन में गाँधीजी ने लिखा, सत्य सर्वव्यापक है। यह अहिंसा में समाहित नह वरन् अहिंसा इसमें समाहित है। जो भी शुद्ध अन्तर्केरण और बुद्धि द्वारा अनुभव किया जाता है या जाना जाता है, उस क्षण में वही सत्य है। इससे जुडे रहो, यही व्यक्ति को शुद्ध सत्य की प्राप्ति के योग्य बनाता है।हमें हिंसा से युक्त वातावरण में अहिंसा से अपने जीवन का पालन करना है और यह तभी हो सकता है जब हम सत्य के साथ जुडे रहेंगे। गौरतलब है कि गाँधीजी सत्य की बहुलता के समर्थक थे। अपना सत्य मानते थे परन्तु साथ ही दूसरों के सत्य के प्रति उदार रवैया रखते थे। उन्होंने अनेक अवसरों पर कहा कि मैं अनेक पुराने सत्यों पर नयी रोशनी डालता हूँ। गाँधी जी की दृष्टि में पुराना, चिरंतन, शाश्वत सत्य भी एक नह अनेक हैं। वे पुराने सत्यों पर नयी रोशनी डालते हैं। नए परिप्रेक्ष्य में पुराने सत्यों की व्याख्या करते हैं, उसे पुनर्नवा करते है। जिन्हें विचार- दर्शन की व्यापक परम्परा का अभिज्ञान नह, उन्हें यह मौलिक लगता है। गाँधीजी इससे भली-भाँति अवगत थे। लिहाजा वे स्वयं को किसी नए सत्य का प्रस्तावकर्ता नहीं कह सकते थे। ऐसे लोगों की कमी नह है जो इस रोशनी को ही नया मानने और कहने की जिद करते हैं। ऐसे लोग इस रोशनी के पार अनेक सत्यों की बहुल परम्पराओं को देखने में अक्षम साबित होते हैं।18
गाँधीजी के मुताबिक इस सत्य को अन्तःकरण की आवाज से सुना जा सकता है। व्यक्ति का अन्तःकरण उसके परिवेश, परिस्थिति एवं विचारधारा से निर्मित होता है। लिहाजा, सत्य की पहचान अत्यंत कठिन कर्म होगा।इस जटिलता का अहसास गाँधीजी को था। उन्होंने, सत्य क्या है, प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, यह एक कठिन प्रश्न है लेकिन मैंने अपने लिए इसे यह कहकर सुलझा लिया है कि जो तुम्हारे अन्तःकरण की आवाज कहे, वह सत्य है। आप पूछते हैं कि यदि ऐसा है तो भिन्न- भिन्न लोगों के सत्य परस्पर भिन्न और विरोधी क्यों होते है? चूँकि मानव मन असंख्य माध्यमों के जरिये काम करता है और सभी लोगों के मन का विकास एक-सा नह होता, इसलिए जो एक व्यक्ति के लिए सत्य होगा, वह दूसरे लिए असत्य हो सकता है।19 इतिहास में ऐसे कई अवसर आए थे जब गाँधीजी के सत्य के बिल्कुल विपरीत दूसरे लोगों ने अपने सत्य का दावा किया। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में ऐसे उदाहरण भरे पडे हैं। अपने-अपने सत्य की दावेदारियों के दौर में गाँधीजी ने अन्तःकरण की आवाज सुनने के लिए पात्रता प्रस्तावित की। अन्तःकरण की शुद्धि के लिए निश्चित शर्तों के पालन के पश्चात ही पात्रता अर्जित की जा सकती थी, तत्पश्चात इसका दावा किया जा सकता था। गाँधीजी ने लिखा, जिन्होंने ये प्रयोग किए हैं, वे इस परिणाम पर पहुंचे है कि इन प्रयोगों को करते समय कुछ शर्तों का पालन जरूरी है।. ऐसा इसलिए है कि आजकल हर आदमी किसी तरह की कोई साधना किये बगैर अन्तःकरण के अधिकार का दावा कर रहा है, और हैरान दुनियाँ को जाने कितना असत्य थमा रहा है।20 दुनिया की भिन्न-भिन्न संस्कृति और विचार दर्शन में प्रशिक्षित और परवरिश प्राप्त लोग अगर गाँधीजी की शर्तों के हिसाब से साधना कर अन्तःकरण की शुद्धि कर भी ले, तब भी सभी लोगों का अन्तःकरण एक सत्य ही सुने, यह आवश्यक नह। न सिर्फ ऐसे लोगों के लिए, अपितु, जिन्होंने साधना की शर्तों का पालन किए बगैर भी अपने अन्तःकरण की आवाज का दावा पेश किया हो और असत्य सत्य प्रस्तुत कर रहे हों, उनके सत्य को भी सुना जाना चाहिए; ऐसा करने वाले के साथ भी हिंसा नह होनी चाहिए। यह गाँधी-पक्ष है। असत्य की प्रस्तावना करने वाले के साथ संवाद-सम्पर्क के जरिये उसे सत्य तक लाने की अहिंसक कोशिश गाँधी-मार्ग है। अपने सत्य पर दृढ होकर दूसरे के सत्य (भले ही आपकी निगाह में वह असत्य है) को हिंसा - पूर्वक दबाना गाँधीजी को अस्वीकार्य है। उनका जीवन यही दुष्कर कार्य संपादित करने का प्रमाण है और परिणाम भी।
दुनिया में धर्मों के द्वारा अर्जित अपने-अपने सत्य को लागू कराने और दूसरों के धर्म-सत्य को समाप्त करने की प्रक्रिया में कितनी हिंसा हुई, मानव-सभ्यता इसकी साक्षी है। जिन लोगों ने धर्म सत्य को भाववाद से जोडा और इसे तमाम गडबडियों का कारक माना, उन लोगों ने वैज्ञानिक सत्य के नाम पर अपनी विचारधारा की सत्य - सत्ता स्थापित करने हेतु, कितनी हिंसक कार्रवाइयों को अंजाम दिया, हम लोग इसे भी जानते हैं। इस हिंसा का औचित्य साबित करने के लिए परिवर्तनकारी मूल्य-बोध विकसित किए गए।21
आधुनिक युग में हिंसा का औचित्य सिद्ध करने वाली विचारधाराओं के आकर्षण में दुनिया के अनेक श्रेष्ठ रचनाकारों ने बेहतरीन कृतियाँ रची हैं। क्रांति के जरिए नया समाज बनाने की कामना से होने वाली हिंसा का औचित्य निरुपण विश्व की अनेक श्रेष्ठ कृत्तियों में हुआ है। ज्यॉ पाल सार्त्र का नाटक गंदे हाथ और अल्बेयर कामू का नाटक न्ययी हत्यारे क्रांति, विद्रोह, सीमित और असीमित हिंसा पर गहरे विमर्श करते हैं। कवि गिरधर राठी ने कामू के नाटक न्यायी हत्यारे की समीक्षा करते हुए सार्त्र के विचारों के साथ इसकी तुलना की है।22
न्यायी हत्यारे राजनीतिक हिंसा के भावनात्मक एवं दार्शनिक ऊहापोह का विचारोत्तेजक वर्णन करने वाला नाटक है। इस नाटक का नायक कालियायेव रूस की सोशलिस्ट पार्टी की सैन्य शाखा का ऐतिहासिक सदस्य है। इसी दल में लेनिन के अग्रज भी थे, जिन्हें जार की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में फाँसी मिली थी। इस नाटक में, 1905 में ग्रैंड ड्यूक की हत्या के लिए भेजा गया कालियायेव पहली दफे बम नह फेंकता, क्योंकि जिस बग्गी में ड्यूक बैठा है, उसमें दो बच्चे भी हैं। उसे बच्चों की जाने लेना उचित नह लगा। दूसरी बार में उसने बग्गी पर बम फेंका। भागा नह। गिरफ्तार होकर जेल गया। उसे फाँसी की सजा मिली। कामू का यह नाटक 1950 में छपा था। इससे साल भर पूर्व सार्त्र का नाटक गंदे हाथ शाया हुआ था। ऐसा प्रतीत होता है कि सार्त्र के द्वारा हिंसा के औचित्य निरुपण पर कामू ने न्यायी हत्यारे लिखकर रचनात्मक हस्तक्षेप किया था। सार्त्र के नाटक में दो नजरिये वाले दो किरदार थे, कामू में भी । कामू रचित पात्र कलियायेव अपने राजनीतिक मकसद की प्राप्ति के लिए निर्दोष लोगों की जान लेना वाजिब नह मानता। जबकि इसके ठीक उलट सार्त्र का नायक राजनीतिक हिंसा में किसी मर्यादा को स्वीकार करने के पक्ष में नह है। कामू के नाटक के किरदार स्तेपान में गिरधर राठी ने स्तालिन की छवि देखी है। यह किरदार कलियायेव को बुजदिल और अपर्याप्त क्रांतिकारी मानता है क्योंकि उसके मन में निर्दोष की हत्या को लेकर दुविधा थी । सार्त्र के नाटक का प्रतिनायक कलियायेव की तरह सत्य का पैरोकार लेकिन सीमाहीन हिंसा का विरोधी है। सार्त्र के साथ कामू की तुलना करते हुए गिरधर राठी ने लिखा है कि क्रांति के अभियान में निर्दोष व्यक्तियों की भी हत्या को सार्त्र सही ठहराते थे। उन्होंने मेर्लो- पोती और सीमोन द बोउवा आदि के साथ, रूस में स्तालिन के राजकीय आतंक को जायज ठहराया था। कामू विद्रोह के समर्थक थे - लेकिन क्रांति के, रूस वगैरह में क्रांति के बाद स्थापित नये आततायी शासन तंत्र के विरुद्ध थे । उनकी प्रसिद्ध पुस्तक द रेबेल (विद्रोही), उनकी अन्य की कृतियों की तरह ही राजनीतिक हिंसा में निर्दोषों की हत्या का निषेध करती है। दो तरह के परंपरागत हिंसावाद से अलग, एक तीसरी हिंसा - नीति कामू ने पेश की थी।23 जॉन फोली के हवाले से राठीजी ने बताया है कि बुर्जुआ राजनीतिक हिंसा समाज में व्याप्त कई तरह की हिंसाओं की अनदेखी करती है, और क्रांतिकारी हिंसा का निषेध करती है। दूसरी ओर क्रांतिकारी हिंसा किसी भी हद तक जाने को तैयार है और नये समाज की रक्षा के लिए आतंकवादी राज शासन को भी जायज मानती है।
इससे इतर, अल्बेयर कामू ने जो तीसरी हिंसा - नीति प्रस्तावित की थी, वह क्या है? जॉन फोली ने बताया है कि हत्या सिर्फ आतंकवादी की हो; हत्या तभी हो जब अन्याय के विरोध का कोई दूसरा उपाय नह बचा हो, हत्यारा एक विद्रोही की तरह, अपने शिकार के नजदीक जाकर उसकी हत्या करे और इस तरह पूरी निजी जिम्मेवारी कबूल करे; और खुद अपना उत्सर्ग करने को तैयार रहे।24
गिरधर राठी ने न्यायी हत्यारे सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा ताल्सतोय के अंतिम दिनों के दर्शन-प्रेम से संसार के उद्धार और गाँधीजी के अहिंसक आन्दोलन के विचारों का इस संदर्भ में उल्लेख महत्त्वपूर्ण माना है। साथ ही यह जिक्र भी किया है कि कामू हों, सार्त्र हों या जॉन फोली, इनकी चिन्ताओ के दायरे में गाँधी का अहिंसा- दर्शन नह है । इन्होंने लिखा है, कामू से मान्यता प्राप्त राजनीतिक हत्यारे की तुलना गाँधीजी के सत्याग्रही अहिंसक आंदोलनकारी से करना दिलचस्प है - वस्तुतः महत्त्वपूर्ण होगा। अपनी कुर्बानी देने को दोनों तैयार है, लेकिन कितने भिन्न मनोभावों, संकल्पो मर्यादाओं के साथ। यह भी दिलचस्प है कि पश्चिमी चिन्तन में एक दार्शनिक धारा (सत्य) के संधान में लगी रही है, जबकि दूसरी धारा दार्शनिक - राजनीतिक - सामाजिक धारा - न्याय के संधान में। गाँधीजी का आग्रह सत्य है - और न्याय उसी में से निकलता है । सार्त्र का न्याय सत्य की परवाह नह करता - गंदे हाथ में उसके कुछ संवाद देखने लायक हैं। क्रांति के लिए अ-सत्य का, झूठ का सहारा लेना जायज है।25 कामू, सार्त्र या जॉन पोली के यहाँ गाँधी के अहिंसा - दर्शन की अनुपस्थिति की वजह क्या होगी? क्या ये सभी इससे अनभिज्ञ थे? ऐसा नह कहा जा सकता। जिस दौर में ये तीनों अपने बौद्धिक- कर्म में संलग्न थे गाँधी द्वारा प्रस्तावित अहिंसा - दर्शन दुनियाभर के बौद्धिकों का ध्यान आकर्षित कर रहा था, चौंकाया भी था। अहिंसा की उनकी समझ ने एक किस्म की बौद्धिक चुनौती प्रस्तुत की थी। फिर क्या वजह रही होगी? क्या यह कारण है कि इन तीनों के सोचने की संरचना- हिंसा के जरिए होने वाले परिवर्तन- से बिलकुल बाहर की बात थी। क्या जिस ढाँचे में ये तीनों सोच रहे थे- थोडी मतभिन्नता के बावजूद- गाँधीजी का चिन्तन उससे बिल्कुल परे जाकर सोचता था। दूसरा कारण क्या यह था कि गाँधीजी साधन पर भी उतना ही जोर देते थे, जितना साध्य पर। परिवर्तन, मनोवांछित परिणाम या क्रांति के लिए अ-सत्य, झूठ या फरेब को गाँधीजी खारिज करते थे। इससे यह भी ज्ञात होता है कि क्रांति के लिए हिंसा की स्वीकृति किस कदर थी कि इसे खारिज करने वाले गाँधी के विचार से बहस भी नह। न्यायी हत्यारे का महत्त्व बताते हुए गिरधर राठी ने लिखा है कि यह नाटक बीसवी सदी के भीषण शास्त्रार्थ की ओर ध्यान दिलाने के साथ-साथ इक्कीसवी सदी में हिंसा असीमित प्रसार पर भी सोचने का रास्ता खोलता है। मेरा रास्ता ही एकमात्र सही रास्ता है- ऐसा सोचने वालो के मन में गहरा नैतिक दार्शनिक संशय यह नाटक पैदा करता है।26 क्या यह कहने की जरूरत है कि गाँधी की सत्य विषयक धारणा यही कार्य करती है। बहरहाल, न्यायी हत्यारे पर विचारोतेजक विश्लेषण के आखरि में गिरधर राठी ने लिखा है कि हिंसा पर गहरी बहस भी अहिंसा को कुछ अधिक स्वीकार्य और कारगर औजार उपलब्ध करा सकती है। फिलहाल अहिंसा एक खोखला और पाखण्ड भरा नारा मात्रा ही तो है।27 यह ठीक है कि अहिंसा की महत्ता हिंसा पर हुई बहस उपलब्ध करा सकती है। बिल्कुल विपरीत विचार - प्रत्यय के जरिए ऐसा होना लाजिमी भी है, परन्तु 2008 में लिखे इस समीक्षात्मक निबन्ध में अहिंसा को खोखला और पाखण्ड भरा नारा मात्र कहना अनुचित है और दुनिया भर में अपने हक, नागरिक अधिकार, मानव अधिकार, जीवन, प्रकृति, पर्यावरण के मुद्दों पर अहिंसक संघर्ष करनेवाले तमाम समूहों के प्रति अन्याय भी। भारत में भी जनांदोलनों ने विकास के मौजूदा मॉडल को प्रश्नांकित कर अहिंसा की संरचना पर निर्मित वैकल्पिक मॉडल प्रस्तावित किया है। न्यायी हत्यारे के हिंदी अनुवादक उसी समूह के चिंतक के तौर पर ख्यात हैं। स्वयं राठी जी का बौद्धिक - कर्म इन जन आंदोलनों के प्रति संवेदना युक्त रहा है । क्या राज्य-सत्ता द्वारा, अपने बचाव के लिए प्रयुक्त , अहिंसा के खोखले और नारे के तौर पर प्रचारित विचार के आधार पर राय बनाना उचित है?
भारत की आजादी की रजत जयंती से पूर्व ही हिंसा के जरिए क्रांति की कामना करने वाले समूहों की सत्रि*यता बढ गई थी। नक्सलवादी संज्ञा से अभिहित इनके कई समूह थे- एक-दूसरे से असहमत। हिंसा की आभा को भारत के आदिवासी इलाके में प्रसारित करनेवाले इन समूहों की वैचारिकता को विश्लेषित करते हुए सच्चिदानंद सिन्हा ने एक किताब लिखी है- नक्सली आन्दोलन का वैचारिक संकट।27 इस पुस्तक के दूसरे संस्करण में वर्तमान परिदृश्य और हिंसा और समाज परिवर्तन शीर्षक से दो अध्याय जोडे गए हैं। वैसे यह पूरी किताब हिंसा के जरिए क्रांति के यूटोपिया को साकार करने की कोशिश करनेवाले, बाहर से प्रखर दिखनेवाले नक्सली या माओवादी हिंसात्मक आंदोलन की परिणिति हमेशा अनगिनत गुटों में बँटने, वक्ती आतंक और जबरन वसूली में होती रही है। इसका मुख्य कारण उसका वैचारिक संकट है जो प्रकारांतर से कम्युनिस्ट आंदोलन का भी है। आधुनिक इतिहास में हिंसा के द्वारा परिवर्तन का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते एवं इसका विश्लेषण करते हुए सच्चिदानंद सिन्हा ने अनेक आयामों पर विचार किया है। इन्होंने फायरवाख पर लिखे कार्ल मार्कस की थीसिस- सामाजिक जीवन मूलतः व्यवहार आधारित है। सभी गुत्थियाँ जो सिद्धांत को रहस्यवादिता की ओर ले जाती है अपना बुद्धिसंगत समाधान व्यवहार में और इस व्यवहार की समझ में पाई जाती है को उद्धरित कर कहा है कि यह दृष्टि बिल्कुल वैज्ञानिक है और किसी अवधारणा की सत्यता को प्रयोग की कसौटी पर परखने का सुझाव देती है। इन्होंने उसे राजनीति के लिए, जो सिर्फ सत्ता का खेल होने के बजाय अपना लक्ष्य कुछ उदात्त मूल्य बतलाती है, परिवर्तन का साधन (हिंसक हो या अहिंसक) को एक अनिर्णीत गुत्थी कहा है।
सच्चिदानंद सिन्हा ने इस गुत्थी को सुलझाने हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण पौराणिक या ऐतिहासिक घटनाओं के नतीजों के आधार पर हिंसा या अहिंसा की उपयोगिता की परीक्षा आवश्यक बताई है। इसके लिए इन्होंने सबसे प्राथमिक माना है - श्रीमद भागवदगीता को।भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं को इस ग्रन्थ ने बहुत प्रभावित किया था। खास बात यह है कि इस ग्रन्थ से हिंसा और अहिंसा, दोनों में, यकीन करनेवाले नेताओं ने, प्रेरणा ग्रहण की। हिंसक और अहिंसक, दोनों क्रांतिकारियों ने, इसकी महत्ता स्वीकार की। नरमदल और गरमदल की कोटि में विभक्त कांग्रेस के नेताओं ने भी अपने - अपने विचार के अनुकूल इसे समझा। लोकमान्य - तिलक, महात्मा गाँधी से लेकर सशस्त्र क्रांति का प्रयास करने वाले क्रांतिकारियों28 ने भी गीता को गले से लगाया। सच्चिदानंद सिन्हा ने लिखा है कि कृष्ण-अर्जुन संवाद के रूप में प्रस्तुत इस ग्रन्थ की शुरुआत ही इस प्रश्न से होती है कि क्या राज्य और सम्पत्ति के लिए हिंसा उचित है? अर्जुन, यह देखकर राज्य का अधिकार हासिल करने के लिए उसे बन्धु-बान्धवों, गुरु पितामह आदि की हत्या करनी होगी, हथियार डालकर कहता है कि उसे संपत्ति के लिए ऐसे संघर्षों में शामिल होने की इच्छा नह, न उसे इसका औचित्य दिखाई देता है।29 लेखक को विस्मय है कि अर्जुन के द्वारा उठाए इस मूल प्रश्न का कोई उत्तर नह दिया गया है।30 हालाँकि इस ग्रन्थ के अठारह अध्यायों में प्रकृति, पुरुष, संसार की उत्पत्ति, कर्मयोग, भक्ति, संत्रास आदि सभी विषयों का गहन विवेचन है। लोकायत को छोड सम्पूर्ण भारतीय दर्शन का निचोड है। धन-सम्पत्ति और अधिकार हिंसा करना, वह भी तब जब जिनकी हत्या करनी है, वे अपने ही प्रियजन अथवा पूज्यजनक हैर्‍ उचित है। सच्चिदानन्द बाबू बताते हैं कि कृष्ण का एकमात्र जवाब अपना विराट दर्शन कराकर यह देते हैं कि अर्जुन का यह सोचना भ्रम है कि सामने खडे बंधु-बांधवों की हत्या करनेवाला है।दरअसल वे सब तो स्वतः ही काल के विकराल काल ने समाते चले जाते रहे हैं। जो कुछ स्वतः अपरिहार्य रूप से घटित होता है, उसके लिए विषाद के वश होना अर्थहीन है।31 लेखक ने यह याद दिलाया है कि गाँधीजी युद्ध भूमि में सम्पन्न कृष्ण अर्जुन संवाद को ऐतिहासिक घटना नह, अपितु इसे मनुष्य हृदय में उठने वाले विचार की अभिव्यक्ति मानते थे। बहरहाल, सच्चिदा बाबू का कहना है कि इस संवाद में कृष्ण का उत्तर सुनने के पश्चात् अर्जुन फिर भी यह पूछ सकता था कि अगर सबकुछ पूर्व निर्धारित है तो इसका निमित्त क्यों बने ? यहाँ श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि अर्जुन क्षत्रिय है इससे वह ऐसा करेगा, अपने धर्म के कारण। सच्चिदा बाबू इसके जरिए निष्कर्ष निकालते हैं कि इसका मतलब यह होगा अपने कर्तव्यों के सम्बन्ध में मनुष्य का निर्णय उसके अपने हाथों में नह होता बल्कि उसकी सामाजिक स्थिति और विश्व की पूर्व निर्धारित नियति से निर्धारित होता है।32 इन्होंने श्रीकृष्ण के सुझाव से एक प्राप्त निष्कर्ष और हीगेल के द्वंद्वात्मक इतिहास दर्शन तथा माक्र्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के दर्शन में संगति देखी है।इन्होंने वाजिब ही यह सवाल किया है कि श्रीकृष्ण की उपस्थिति के बावजूद इस युद्ध का अंतिम नतीजा क्या निकला? युद्ध के दौरान कौरव पक्ष ने अनीति अपनाई तो क्या पांडव पक्ष ने नह अपनाई? मात्रा का फर्क भले ही हो लेकिन अनीति का सहारा दोनों तरफ से लिया गया।
सच्चिदानन्द सिन्हा का विश्लेषण बताता है कि चाहे जितने उदात्त और महान उद्देश्य के नाम पर हिंसक क्रांति की गई हो, इसकी परिणति तानाशाही, अधिनायकवाद, सर्वसत्तावाद में ही होती है। हिंसक प्रक्रियाओं में अन्तर- निर्हित दबावों के कारण ऐसा ही सम्भव होता है। इसमें भाग लेने वाले अपने हितों, आदर्शों, नीतियों के प्रति इतने दृढ होते हैं कि वे दूसरों पर उसे अपनी शक्ति और हिंसा के बल से लादने की कोशिश करते हैं। इसमें आपसी संवाद की संभावना, जो लोकतंत्र की बुनियाद है, खत्म हो जाती है। चूँकि कोई भी मानवीय समाज ज्यादा से ज्यादा लोगों के हितों के ऐच्छिक समायोजन से ही बन सकता है, मगर शक्तिपर निर्भरता के भीतर ही ऐसा तत्व होता है जो ऐसे समाज को संभव न होने दे। शक्ति पर भरोसे से अन्तिम विजय उनकी होती है जो हिंसक शक्ति का सबसे कुशलता से इस्तेमाल कर सकते है। जीत आदर्शों के बदले सबसे शक्तिशाली की होती है। जो सद्बुद्धि वाले है, वही सबल भी होंगे, स्वयं सिद्ध नह है 33 मानव सभ्यता का इतिहास इसे प्रमाणित करता है। प्राचीन काल में मकदुनिया और स्पार्टा से लेकर दुनिया के किसी भी युद्ध के बारे में ऐसा कहा जा सकता है। बर्बर लोगों ने हिंसा के बल पर सभ्य समाजों को हराया है। विश्व के आधुनिक इतिहास की घटनाएँ बताती हैं कि हिंसा के बल पर समाज परिवर्तन के सभी महान प्रयास अपने उदात्त लक्ष्यों से भटकते गए। अत्यन्त ही उदात्त भावनाओं से प्रेरित क्रांतिकारी सत्ता पाकर अपरिमेय दमन और क्रूर - कृत्यों में प्रवृत्त हुए।34 क्या मनुष्य के भीतर ही ऐसी भावनाएँ होती है? इसे समझने के लिए सच्चिदा बाबू ने जीवों और मनुष्यों की आक्रामकता का गहन अध्ययन करने वाले कोनराड लौरेंत्स का सहारा लिया है। लौरेंत्स का अध्ययन बताता है कि अपनी ही प्रजाति के दूसरे सदस्यों के प्रति सभी जीवों में एक प्रच्छन्न आक्रामकता होती है। यह आक्रामकता विशेष स्थितियों की उत्तेजना पर सक्रिय हो जाती है तथा प्रजाति के किसी दूसरे सदस्य पर आक्रमण के रूप में अभिव्यक्त होती है। यह दूसरी प्रजातियों के सदस्यों पर किए गए हमले से बिल्कुल भिन्न होती है।35 लौरेंत्स ने प्रच्छन्न आक्रामकता का जिक्र किया है और इसकी सक्रियता के लिए विशेष स्थितियों की उद्दीपक भूमिका रेखांकित की है। ये विशेष स्थितियाँ अपने सत्य को ही एक मात्र सत्य मानने का विचार - दर्शन, अपने से भिन्न को हेय मानने की समझ, धर्म, रंग, रहन-सहन के तरीके, भोजन- लिबास के फर्क के आधार पर अन्य को अपने जैसा बनाने की मानसिकता, अपने उद्दात्त लक्ष्य को प्रश्नांकित करने वालों के पक्ष को अनावश्यक मानना, और अपनी हिंसक शक्ति के सहारे भिन्न का उच्छेदन करने को जायज ठहराने वाला दर्शन निर्मित करते हैं। जबकि, लोकतान्त्रिक मूल्य, मनुष्यता को आधार मानकर विकसित विचार- दर्शन, सभ्यता संस्कृतियाँ मनुष्य के भीतर मौजूद प्रछन्न आक्रामकता को उभरने से रोकते हैं। सच्चिदानंद सिन्हा कोनराड लौरेंत्स की स्थापनाओं की सहायता से बताते हैं कि जीवों में आक्रामकता बाघ द्वारा हिरण पर किए हमले के रूप में नह होती क्योंकि हिरण बाघ का स्वाभाविक आहार है जिससे उसका शिकार बनता है, किसी आक्रामकता के कारण नह। दरअसल अपनी प्रजाति के किसी जीव पर आक्रमण का उद्देश्य भी उसे मार डालना नह होता। ज्यादातर जीवों में यह प्रजनन प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा से जुडा एक कर्मकाण्ड होता है, जिसमें आक्रमण से ज्यादा आक्रामक तेवर का महत्त्व होता है जिसके दबाव में कमजोर प्रतिद्वन्द्वी खिसक जाता है। असल हमला विरल होता है, जानलेवा तो बिल्कुल नह। इससे प्रजाति में सबल संतान सुनिश्चित होती है। ऐसी आक्रामकता का दूसरा महत्त्व, लौरेंट्स के अनुसार, जीवों की सघनता को कम करना होता है क्योंकि ज्यादा सघनता से आजीविका के लिए उपलब्ध सीमित संसाधन की उपलब्धता के अभाव में अस्तित्व पर खतरा पैदा होता है। उन जीवों में जिनके शरीर में दाँत, नख आदि जानलेवा हथियार होते हैं, एक आंतरिक अवरोध होता है जो अपनी प्रजाति के कमजोर प्रतिद्वंद्वियों के हाव-भाव से, व्यक्त हीनता से या आक्रमण के जानलेवा होने की संभावना का बोध होते ही सत्रि*य हो जाते हैं, और जीव आक्रमण बन्द कर देता है। मनुष्य इस अर्थ में दूसरे जीवों से अलग है। इसमें ऐसी आक्रामकता के खिलाफ ऐसा स्वतः स्फूर्त आन्तरिक अवरोध नह होता। उल्लेखनीय है कि मनुष्यों की चेतना में मौजूद सभ्यता संस्कृति और विचार अवरोध की भूमिका निभाते हैं। मनुष्य के भीतर आन्तरिक अवरोध की गैर मौजूदगी का कारण शायद मनुष्यों के शरीर में ऐसे प्राकृतिक हथियारों का अभाव है जिससे वह दूसरे मनुष्यों की हत्या सहजता से करता। सच्चिदा बाबू बताते हैं कि प्रकृति ने दुनिया में मानव को अस्त्रहीन बनाकर भेजा था; मनुष्यों ने संस्कृति के विकास के क्रम में हथियार की ऐसी संस्कृति विकसित कर ली है जिससे न सिर्फ वह दुनिया के दूसरे जीवों के लिए सबसे खतरनाक जीव है बल्कि अपनी पूरी प्रजाति का विनाश भी आसानी से कर सकता है।36 मनुष्य द्वारा पोषित संस्कृति ने मनुष्य को अपनी प्रजाति के दूसरे सदस्यों और पूरी प्रकृति के लिए खतरनाक बनाया है। घातक हथियारों को अपनी संस्कृति के विकास में शामिल मनुष्यों ने पूरी पृथ्वी के लिए विकट संकट पैदा किया है। जीव वैज्ञानिक नीको टिंबर्जन ने भी कहा है कि दूसरी सांस्कृतिक अति हमारी जानलेवा हथियार बनाने की क्षमता है; विशेषकर दूर से मारने वाले हथियार बनाने की क्षमता। इससे संहार करना अति आसान हो जाता है, न सिर्फ इसलिए कि एक गदा था एक भाला समान ताकत लगा घूसे के मुकाबले कहीं अधिक घातक घाव करता है बल्कि इसलिए भी कि दूर से चलाए गए हथियार से आहत व्यक्ति हथियार चलाने वाले को अपनी व्यथा या गिडगिडाहट से अवगत नह करा सकता। बहुत थोडे-से हवाई सैनिक जो अपने लक्ष्य पर बम गिराने को आतुर होते हैं, इसके लिए तैयार होंगे कि वे बच्चों का गला दबा दें या उन्हें जला दें। वे अधीनता कबूल करते या गिडगिडाते लोगों की जान लेने की सीमा तक नह जाएँगे।37 टिम्बर्जन की इस राय से इत्तेफाक रखते हुए सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि हथियारों के जरिये होने वाले हमलों के कारण हमलावर में पश्चाताप या करुणा का संचार नह हो पाता है। हमलावर बख्तर बंद गाडियों, युद्धक वायुयानों या मिसाइलों के प्रक्षेपण केंद्रों से इंस्ट्रूमेंट पैनल पर अंकित संकेतों के आधार पर बटन दर बटन दबाता है। सैकडों, हजारों किलोमीटर दूर अपनी-अपनी दुनिया में रह रहे लोगों की आबादी उसके लिए महज लक्ष्य भर होती है। बटन दबाने के बाद उस दुनिया पर होने वाले भयावह परिणाम वह देखता भी नह। उदयन वाजपेयी के निबन्ध अहिंसा के विचार से भी इन बातों की पुष्टि होती है।38 इन्होंने समाज मनोविश्लेषक आशीस नन्दी के हिंसा विषयक अध्ययन का उल्लेख किया है। नंदी ने हिंसा का अध्ययन करते हुए बताया है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान करीब छह करोड लोग मारे गए थे। यह बहुत बडी संख्या है मगर यह ज्ञात हो कि इनमें अधिकांश को मौत के घाट उतारा गया था। बहुत गोलीबारी हुई थी। नंदी का कहना है कि युद्ध के दौरान असंख्य गोलियाँ चलाईं गईं थीं। पर यह भी सच है कि इन गोलियों में सत्तर प्रतिशत गोलियाँ सैनिकों ने या तो शत्रु सैनिकों के ऊपर की ओर चलाई या जमीन की ओर। गोलियाँ इस तरह तब चलाई गई थी जब शत्रू सैनिक ठीक सामने थे और उनके सीने पर गोलियों से वार किया जा सकता था। दूसरे शब्दों में दोनों ही ओर से सैनिकों ने सत्तर प्रतिशत गोलियाँ इस तरह चलायी कि कहीं वे शत्रु सैनिकों को लग न जाए। उन्होंने ऐसा यह जानते हुए किया था कि वे युद्ध में है।39 इस तथ्य से उदयन वाजपेयी ने निष्कर्ष निकाला है कि सैनिक हत्याएँ करना नह चाहते थे। वे गोलियाँ भले ही चला रहे हों, शत्रु सैनिकों की हत्या करना नह चाहते थे। इस तथ्य से भी हम यह प्रतिपादित कर सकते है कि अहिंसा मनुष्य का सहज स्वभाव है, हिंसा उस सहज स्वभाव पर आरोपण है।40
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जिन देशों पर हमले हुए, सैनिकों ने नागरिकों - विशेषकर महिलाओं के साथ - जिस तरह के घृणित, नृशंस और हिंसक अत्याचार किए, उनके साक्ष्यों को पढने पर उपरोक्त बातों से सहमत होना उचित नह लगता।41 नीको टिंबर्जन और आशीष नन्दी की धारणाओं को उन देशों के नागरिकों पर नजदीक से की गई क्रूरताएँ चुनौती देती हैं। यह धारणा ठीक प्रतीत होती है कि विशाल परिमाण में ऊँचे आदर्शों के नाम पर अति हिंसक और अमानवीय कामों के लिए लोगों को गतिशील करने में मनुष्य के स्वभाव का एक और भी गुण है जिसे कोनराड लौरेंटस मिलिटेंट इंथ्युजिआज्म कहता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कुछ मनुष्य को कुछ अमूर्त अस्तित्वों के लिए, जो दरअसल मनुष्य की अपनी निर्मितियाँ होती है, कुछ भी करने के लिए तैयार कर देता है - जघन्य से जघन्य हिंसा के लिए भी और बडे से बडे आत्म बलिदान के लिए भी ।... इन निष्ठाओं से प्रेरित व्यक्ति की प्रतिक्रियाएँ अमूर्त अस्तित्व जैसे धर्म, संप्रदाय, राष्ट्र, मूल, भाषाई समूह या वैचारिक संगठन आदि के प्रति वैसी ही होती है जैसी किसी आवेश के क्षण में उपस्थित शत्रु या मित्र के लिए होती है। अपने आत्यंतिक रूप से यह भावना किसी व्यक्ति को किसी भी अति के लिए तैयार कर देती है।42 यही वजह है कि मनुष्य में अन्तर्निहित आक्रामक संभावनाओं के मद्देनजर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि ऊँचे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भी जब हिंसा का रास्ता अपनाया जाता है तो हिंसा सर्वोपरि मूल्य बन जाती है और बाकी उद्देश्य वैसा ही विकृत रूप ग्रहण करते हैं जो अपने को हिंसा से उपजे माहौल के अनुरूप बना सके।43
जिन दर्शनों या विचारधाराओं ने अपने कथित उदात्त लक्ष्यों के लिए, क्रांति के लिए हिंसा की वैधता की सैद्धांतिकी निर्मित की है, उसने धरती पर क्रूरताई कराई है। मनुष्यों को हम और वे में बाँटने वाले इन नजरियों के खतरों को अमीन मालूफ ने पहचान के नाम पर हत्याएँ 44 और अमर्त्य सेन ने हिंसा और अस्मिता का संकट 45 पुस्तक में विचारोत्तेजक विश्लेषण किया है। कतिपय आधुनिक चिन्तक मानवीय परिस्थितियों को सामान्य करने के लिए हिंसा का उपयोग उचित मानते हैं। इनमें से कइयों को ऐसा भी लगता है कि इससे मनुष्य अपना सहज अहिंसक स्वभाव प्राप्त कर सकेगा। महात्मा गाँधी ऐसे विचारों से उचित ही दृढतापूर्वक असहमति प्रकट करते थे। उदयन वाजपेयी ने गाँधी की इस असहमति को बीसवीं सदी के चिंतन में इनका मौलिक हस्तक्षेप माना है।(46)
हिंसा की वैधता स्थापित करने वाले बौद्धिक, मानव-समाज में मौजूद संरचनागत हिंसा की शिनाख्त करने और इससे उत्पन्न चिन्ताओं के प्रति भले सचेत रहते हो, परन्तु उनका यकीन प्रकृति में सहअस्तित्व के सिद्धांत में है,ऐसा नह लगता।असीमित उत्पादन और अनियंत्रित उपभोग के लिए संसाधनों की तलाश की कामना दुःख के शमन तक सीमित नह रहती। यह भूल जाती है कि अहिंसा के नियम के पालन के अभाव में धरती पर जीवन संकट में पड सकता है। यह भी कि प्रकृति की पूरी संरचना सहअस्तित्व के सिद्धांत का प्रतिपादन करती है। अगर पृथ्वी पर ही खतरा पैदा हो गया तो जीवन के बचने की गुंजाइश कैसे होगी। श्रीप्रकाश मिश्र ने जलवायु वैज्ञानिक लवलाक के जरिए बताया प्रौद्योगिकी शक्तिशाली राष्ट्रों के आंतरिक जीवन और बाह्य नीतियों को इस तरह से संचालित कर रही है कि मनुष्य जाति ही नह, इसके साथ रहनेवाले पशु-प्राणी और घास-फूस ही नह, स्वयं पृथ्वी खतरे में पड गई है। धरती को खोदकर जल को सुखाकर और पर्यावरण को प्रदूषित कर हम कुछ इस तरह से जीने लगे है कि मनुष्य का जीवन बहुत तेजी से विनाश की ओर बढने लगा है। धरती स्वयं किसी ग्रह से टकरा कर नष्ट नह होगी, होगी भी तो बहुत बाद में। उससे बहुत पहले ओजोन की फटती हुई परत, समुद्र का बढता हुआ पानी और धरती के पेट से निकलती हुई गैस, फटते हुए ज्वालामुखी उसे यूँही विनष्ट कर देंगे।47 यह कितनी दिलचस्प बात है कि कुदरत ने जिन जीवों के शरीर में हिंसा को सम्पन्न करने वाले अंग प्रदान किए हैं, धरती की सभ्यता को उनसे खतरा नह बल्कि, कुदरत की श्रेष्ठ रचना मनुष्यों द्वारा पैदा किए गए हैं। लवलाक को मनुष्य की समझ और चेतना से अधिक धरती की प्रकृति पर भरोसा है। उनका मानना है कि धरती साकल्यवादी (।।श्ाद्यद्बह्यह्लद्बष्) है, एक आत्मचालित अस्मिता है, जिसका हर हिस्सा चाहे वह सजीव जीवन हो या निर्जीव पदार्थ, आपस में सहसम्बन्धित हैं। यह सार्वभौमिक पर्यावरणीय व्यवस्था एक गाया (त्रड्डद्बड्ड) है, जो अपना संतुलन बनाकर रखना जानती है, उसे पुनः प्राप्त करने की क्षमता रखती है और उसके लिए प्राणियों की एक जाति विनष्ट हो जाती है, तो ऐसा करने में वह चूकती नह। हो सकता है कि इस बार वह प्राणी मनुष्य ही हो।48 लवलाक ने धरती पर भरोसे के साथ जो आशंका व्यक्त की है, उससे जान ग्रे की भी सहमति है। ग्रे भी बिल्कुल ठीक तर्क दे रहे हैं कि धरती पर मौजूद अनेक प्राणियों में से मनुष्य भी एक प्राणी मात्र ही तो है। इस एकमात्र प्राणी को बचाने के लिए पृथ्वी के पास क्या कारण हो सकता है? क्या मनुष्यों के नह रहने से धरती पर संकट पैदा होगा? क्या मनुष्य धरती की जरूरत हैं ? धरती के अन्य प्राणियों के जीवन के लिए मनुष्य अनिवार्य हैं? इनके सवालों का जवाब नकारात्मक है। जॉन ग्रे की भविष्यवाणी इतनी भयावह है कि एक समय आएगा कि धरती मनुष्य को भूल जाएगी। मनुष्यों के बगैर भी प्राणियों का जीवन बचा रहेगा। इस भयावहता के बारे में सोचने पर अहिंसा की महत्ता भी समझ आती है और मनुष्यों की विकास - नीति और संस्कृति निहित असीमित स्वार्थ, लिप्सा और ऋूरता भी। इससे ज्ञात होता है कि हिंसा का औचित्य निरूपण करने वाली सैद्धांतिकी का कितनी खतरनाक है और प्रकृति-विरोधी भी।
क्या प्रकृति की पूरी संरचना को नजरंदाज करने वाले विचार - दर्शन मानव विरोधी नह माने जाने चाहिए?

संदर्भ-संकेत एवं टिप्पणियाँ
1. अहिंसा का उत्तर आधुनिक परिप्रेक्ष्य - श्रीप्रकाश प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर, प्रथम संस्करण 2021, पृ. 7
2. वही पृ.
3. वही, पृ.
4. वही, पृ.15
5. स्त्री मुक्ति : यथार्थ और यूटोपिया, सम्पादक - राजीव रंजन गिरि, अनुज्ञा बुक्स, नई दिल्ली प्रथम संस्करण - 2022, में देखें, नारीवाद की भारतीयता
6. नयी साहित्यिक - सांस्कृतिक सिद्धान्तिकियाँ - सुधीश पचौरी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली पेपरबैक प्रथम संस्करण 2022, पृष्ठ - 9
7. अहिंसा का उतर - आधुनिक परिप्रेक्ष्य, पृ.17
8. वही पृ.
9. अहिंसा की संस्कृति : नंद किशोर आचार्य, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
10. अहिंसा का उत्तर- आधुनिक परिप्रेक्ष्य, पृ. 18
11. वही पृ.
12. वही पृ. 18-19
13. अहिंसा की संस्कृति, पृ.
14. अहिंसा का उत्तर-आधुनिक परिप्रेक्ष्य, पृ. 19-20
15. वही पृ
16. Violence - SlavoJ Zizek, profile Books, London Paperback edition200
जिजेक ने इस पुस्तक के छठे अध्याय Divine Violence में इस हिंसा की औचित्य स्थापना करनेवाले विचारों का विश्लेषण किया है।
17. गाँधीवाद रहे न रहे, संपादक : राजीव रंजन गिरि, अनन्य प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथी आवृत्ति, 2019, पृ 12
17. वही, पृ. 13
18. अहिंसा का उत्तर-आधुनिक परिदृश्य, पृ. 29
19. वही, पृ
20. पहल - 78 में प्रकाशित राधागोविंद चट्टोपाध्याय का निबन्ध परिवर्तनशील मूल्यबोध की वैज्ञानिक व्याख्या देखना चाहिए। बांग्ला में लिखित इस निबन्ध का हिन्दी अनुवाद प्रमोद बेडिया ने किया है।
21. सोच-विचार - गिरधर राठी, संभावना प्रकाशन, हापुड, उ. प्र., प्रथम संस्करण-2019, पृ. 236-238 न्यायी हत्यारे के अनुवादक सच्चिदानंद सिन्हा ने लिखा है कि आज जो आतंकवादी हिंसा हो रही है - चाहे जिहाद के लिए हो, मायोवादियों द्वारा नया समाज बनाने के लिए हो या राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्वायत्तता के लिए संघर्ष करनेवालों के द्वारा हो-सभी बडे पैमाने पर निर्दोष व्यक्तियों की चाहे-अनचाहे हत्याएँ हो रही है। इतना ही नह पुलिस या फौजी कार्रवाइयों के दौरान अनेक ऐसे लोगों की मृत्यु होती है, जिन्हें व्यवस्था ने अपने ही कानूनों की दृष्टि से दोषी साबित नह किया होता है।
22. वही, पृ. 238
23. वही, पृ. 238 - 239
24. वही, पृ. 239
25. वही, पृ. 240
26. नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट - सच्चिदानंद सिन्हा, रोशनाई प्रकाशन, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल, प्रथम संस्करण - 2000, दूसरा परिवर्धित संस्करण 2008 ( इस निबन्ध में दूसरे संस्करण का उपयोग किया गया है )
27. सशस्त्र क्रांतिकारियों की अंदरूनी दुनिया समझने के लिए देखे Waiting for swaraj : inner lives of indian revolutionaries - Aparna Vaidik, Cambridge University Press, New Delhi First Edition 2021
28. नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट - पृ. 70
29. वही पृ.
30. वही पृ.
31. वही पृ.
32. वही, पृ. 74-75
33. वही, पृ. 76
34. वही पृ.
35. वही, पृ. 78
36. वही, पृ. 78
37. वही, पृ. 78-79 पर उधृत
38. समास-16 में प्रकाशित अहिंसा का विचार शीर्षक निबन्ध, पृ. 327-331
समास - सम्पादक उदयन वाजपेयी, जुलाई - सितम्बर 2017, वर्ष 1, अंक 1, द रजा फाउण्डेशन नई दिल्ली
39. वही, पृ. 328
40. नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट पृ. 79-80
41. देह ही देश, गरिमा श्रीवास्तव, राजपाल एँड सांस, नई दिल्ली
42. नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट, पृ. 79-80
43. वही, पृ. 80
44. पहचान के नाम पर हत्याएँ - अमीन मालूप (अनुवाद शरद चंद्रा) राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2012
45. हिंसा और अस्मिता का संकट - अमर्त्य सेन, राजपाल एँड संस, नई दिल्ली संस्करण 2011
46. समास -16, पृ. 328
47. अहिंसा का उत्तर आधुनिक परिप्रेक्ष्य, पृ. 36
48. वही, पृ. 37

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