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अपने-अपने अज्ञेय

मोहन कृष्ण बोहरा
चुनिन्दा आलेखों का विश्लेषणात्मक विवेचन
ओम थानवी द्वारा सम्पादित बृहत्काय ग्रन्थ अपने अपने अज्ञेय चरित-नायक विषयक लेखकों के संस्मरणों की एक अद्भुत मंजूषा है यद्यपि यही इसकी सीमा नह है। इसकी शेष सामग्री में भी नायक के व्यक्तित्त्व की परतें खुलती चली गई हैं। कोई शताधिक लेखकों ने अपने-अपने ढंग से अज्ञेय को याद किया है। हिन्दी के एक साहित्यकार का इतने लेखकों द्वारा किया गया यह स्मरण स्वयं में साहित्य-जगत की एक विरल घटना है। लगभग ग्यारह सौ पृष्ठों का यह ग्रन्थ दो खण्डों में प्रकाशित हुआ है।
ऐसे ग्रन्थ के विषय में आशंका यह रहती है कि वह चरित-नायक का निपट स्तुति-गान होकर ही न रह जाए! इससे उसमें एकरसता भी आ जाएगी।
चरित-नायक की प्रशस्ति इसमें भी है, खूब है; कदाचित् उसका न-होना ही अस्वाभाविक अधिक होता; लेकिन विशेषता इसकी यह है कि इसमें स्मरणीय प्रसंगों में दोहराव नह है। व्यक्तित्त्व-विवेचन में पिष्टपेषण भी नह या कम है।
कुछ तो चरित-नायक के जीवनगत उतार-चढावों ने, कुछ उसके कार्य-क्षेत्र के बहुमुखी विस्तार ने और सबसे बढकर लेखकों की दृष्टिगत भिन्नता ने सामग्री की प्रकृति को बदला है इसलिए ग्रन्थ आद्यन्त जीवन्त बना रहा है।
इसमें अधिसंख्य रचनाएँ संस्मरण हैं, लेकिन क्योंकि स्मरणीय प्रसंग सभी लेखकों के अलग-अलग रहे हैं इसलिए उस पटल पर भी इसमें एकरसता नह है। इसमें रिपोर्ताज, इन्टरव्यू, निबन्ध, गद्य-काव्य, आलोचना आदि का विनियोग भी हुआ है। इसमें और भी कुछ ऐसा है जिसने इसे अलग चरित्र दिया है; इस प्रकृति के ग्रन्थों से अलग।
प्रायः ऐसे ग्रन्थ को चरित-नायक की आलोचना से बचाया जाता है परन्तु सम्पादक ने इतनी वस्तुनिष्ठता बल्कि उदारता बरती है कि नायक पर कडवी टिप्पणी करने वाले ही नह, उसकी तीखी आलोचना करने और आक्षेप लगाने वाले आलेख भी बिना काट-छाँट के प्रकाशित कर दिए हैं जबकि वह स्वयं नायक का अकुण्ठित प्रशंसक रहा है! इतना ही नह, जिनमें नायक के निकटवर्तियों के लिए जो उपहासकारक विशेषण हैं और जिनके कुछ छींटे स्वयं सम्पादक पर भी पडते हैं, उसने उन्हें भी हटाया नह है। ऊपर जिसे ग्रन्थ का अलग चरित्र कहा गया है, वह इस उदारता से ही उसे मिला है।
सम्पादक ने इस ग्रन्थ का शीर्षक भी सूझबूझ से रखा है- अपने-अपने अज्ञेय। इसमें एक ओर जहाँ अपने अपने अजनबी उपन्यास की अनुगूँज है जो इसे सीधे अज्ञेय से जोडे रखती है, तो दूसरी ओर, ऐसी समाई भी इसमें है कि वह लेखकों को अज्ञेय विषयक अपने भावों, प्रभावों-अनुभवों, स्मृतियों, विचारों आदि को व्यक्त करने की पूरी स्वतन्त्रता भी दे देती है यद्यपि इस स्वतन्त्रता का अति दोहन भी ग्रन्थ में हुआ है।
अज्ञेय के व्यक्तित्त्व के किसी भी पहलू-विशेष पर एकाधिक आलेख इसमें मिलेंगे। ऐसे आलेखों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में पढा जाए, तो उससे उस पहलू-विशेष पर अच्छा प्रकाश पडता देखा जा सकेगा।
इला डालमिया ने अपने आलेख- मौन का शिल्प में अज्ञेय की संक्षिप्त जीवनी लिखी है। पद्मा सचदेव ने बिच्छुओं के बीच नंगे पाँव शीर्षक से, अज्ञेय का जो साक्षात्कार लिया था, उसे उसके पूरक के रूप में पढा जा सकता है। यदि इसके पहले जैनेन्द्र और रूपवती के आलेख और बाद में पदमा सचदेव का साक्षात्कार पढा जाए, तो एक पक्ष अपनी पूर्णता पा लेगा।
प्रफुल्लचन्द्र ओझा मुक्त ने अज्ञेय की आकृति का जो चित्रण किया है, नरेश मेहता द्वारा वर्णित अज्ञेय की दैहिक भव्यता के साथ उसे पढने पर यह चित्र पूर्णता पा लेता लगता है।
अज्ञेय के जीवन के विषय में जानकारी कई जगह बिखरी हुई है। इला डालमिया ने संक्षिप्त जीवनी में उन जीवन-तथ्यों को समेकित किया है। उन्हें यह जानकारी स्वयं अज्ञेय से ही मिली होगी, इसलिए इसे प्रामाणिक ही मानना चाहिए।
इलाजी से तो अपेक्षा थी कि वे उस जीवन पर कुछ लिखतीं, जो उन्होंने अज्ञेय के संग जिया था। उस पक्ष पर इस ग्रन्थ में कोई सामग्री है भी नह, अतः उसकी उपादेयता असंदिग्ध होती।
अपने जीवन का काफी-कुछ साझा अज्ञेय ने रामकमल राय और विद्यानिवास मिश्र से भी किया था, लेकिन इन लेखकों ने भी उस पक्ष को गोपन ही रहने देकर अज्ञेय के प्रति अपनी निष्ठा निभाई है जबकि कुछ जिम्मेदारी उनके जीवनीकार होने के नाते, साहित्य-जगत के प्रति भी बनता ही थी! अस्तु।
पद्मा सचदेव ने जब अज्ञेय से बातचीत की, तब उनकी रुचि उनके वैवाहिक जीवन को जानने में नह, उनके प्रेम-प्रसंगों में अधिक थी, परन्तु लगता है, इस पक्ष में उनके हाथ कुछ भी नह लगा! अवश्य ही, अज्ञेय के बचपन, कैशोर्य, पिता के साथ जीवन, शिक्षा-काल और उससे जुडे प्रसंगों पर और अन्य अनेक पहलुओं पर भी इस वार्ता से कुछ प्रकाश पडा है।
अज्ञेय के जीवन और व्यक्तित्त्व पर लिखने वाले अनेक लेखकों का ध्यान उनकी मोहक आकृति और भव्य देह-यष्टि पर भी गया है, परन्तु उसका विशेष वर्णन उन्होंने नह किया है। इस दृष्टि से नरेश मेहता और प्रफुल्ल चन्द्र ओझा मुक्त हमारा ध्यान विशेष रूप से खींचते हैं। मुक्तजी ने यद्यपि लिखा संक्षेप में ही है, लेकिन उनका चित्रण कुछ-कुछ महादेवी के लहजे में है-
ग्रीक-मूर्तियों को चुनौती देती उनकी मुखाकृति, दीर्घ देह-यष्टि, भरी-पूरी कद-काठी, प्रशस्त ललाट, लम्बी नासिका, गहरी झील की प्रशान्ति समेटे अतलस्पर्शिनी आँखें और करीने से तराशी हुई दाढी-यह धीर-गम्भीर और प्रभामण्डित छवि थी, सच्चिदानन्द वात्स्यायन अज्ञेय की। (139)।

ग्रीक मूर्तियों को चुनौती देने वाली इस तेजोमयी देह-यष्टि के अप्रतिम सौन्दर्य को पौर्वात्य और पाश्चात्य जीवन के यादगार प्रतिमानों के समकक्ष रखकर दिखाने का जो उद्यम नरेश मेहता ने किया है, वह सचमुच चकित करता है-
वात्स्यायन में सुदर्शन व्यक्तित्त्व का वैशिष्ट्य था, परन्तु साधारण अर्थ में नह। उनकी देह-यष्टि में ग्रीक मूर्तियों का-सा सौन्दर्य, लालित्य या लयात्मकता ही नह थी बल्कि आचरण और व्यवहार में भी वे निष्णात् तराशी धवल प्रतिमा की प्रतीति कराते थे। एक ऐसा सुषमात्व था जिसे विरल ही कहा जा सकता था। पुरुष-सौन्दर्य का यह मूर्ति-तत्त्व हमारे भारतीय उपमहाद्वीप में केवल कद्दावर पठानों के गान्धारपन में ही सहज देखा-पाया जा सकता है।
पण्डित हजारीप्रसाद द्विवेदी के कथनानुसार पाणिनी पठान थे, आर्य थे इसलिए अनुमान किया जा सकता है कि उस अप्रतिम वैयाकरणी मेधा में भी माइकेल एंजिलों की अनिंद्य प्रतिमा वाली अपूर्वता सम्भव है, वही हो। पाणिनी के बाद सम्भवतः सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय को देख-सुन कर आर्य-सौष्ठव की उस पुरुष-माधवता का आभास मिलता है, जो कभी सम्राट समुद्रगुप्त में रही होगी या धूमकेतु खारवैल में। हम चाहें तो इस सन्दर्भ में सोफोक्लीज का भी स्मरण कर सकते हैं, जो न केवल अपनी ट्रैजेडियों के कारण ही प्रसिद्ध रहा बल्कि जीवन भर स्वयं सौन्दर्य का मानक-व्यक्तित्त्व भी माना जाता रहा। निश्चित ही वात्स्यायन हिन्दी साहित्य की देशगतता पर सौष्ठव की विषुवत-रेखा हैं, तो कालगतता में सर्जनात्मक ऊर्ध्व-शिखर। (78)।
कहने की आवश्यकता नह कि अज्ञेय के देह-सौन्दर्य के वर्णन में नरेशजी ने एक ओर भारतीय उप-महाद्वीप में पाणिनी और समुद्रगुप्त को, तो दूसरी ओर ग्रीक सौन्दर्य में सोफोक्लीज, सिसेरो, सिकन्दर अपोलो तक का स्मरण कर महादेवी के सौन्दर्य-चित्रण को एक नई व्याप्ति, एक सर्वथा नया आयाम दे दिया है।
अज्ञेय के देह-सौन्दर्य के चित्रण में भारतीय और यूनानी प्रतिमानों के साथ नरेशजी ने हिन्दी के दिग्गज कवि निराला का, उनकी पूरी गरिमा में, स्मरण किया है-
वैसे तो कद-काठी और प्रभावी मूर्ति-व्यक्तित्त्व की दृष्टि से निराला उन्नीस नह थे, परन्तु एक असंग व्यक्तित्त्व वाला ग्राम-देवता का विग्रह था, तो दूसरा होठों में भाषा का बीडा दबाए रोमन दरबार का एक सम्भ्रान्त सामन्त जैसे सिसेरो। निराला गाँव किनारे के पीपल के नीचे खुले में प्रस्थापित अनावृत्त मारुति की आराध्य-मूर्ति थे, वात्स्यायन म्यूजियम में करीने से रखी अपोलो, सिकन्दर या किसी ग्रीक वीर योद्धा की ऐतिहासिक विरल प्रतिमा। (80)।
अज्ञेय के देह-सौन्दर्य की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करने और उन्हें सर्जन का ऊर्ध्व शिखर कहने वाले नरेशजी ने आगे चल कर अज्ञेय के जो संस्मरण लिखे हैं, उनमें वे बिल्कुल ही अलग लेखक नजर आते हैं। वहाँ अन्तर्ध्वनि उनकी यह जान पडती है कि अज्ञेय की निकटता की कोई लालसा उन्हें कभी नह थी! जब भी जरूरत हुई, अज्ञेय ही उनके निकट आए थे! दूसरा सप्तक के लिए कविताएँ माँगने वे ही उनके पास आए थे! उनकी लम्बी कविता समय देवता भी पूरी करने का अनुरोध भी उन्होंने ही किया था! वे ही उनके उपन्यास की भूमिका भी लिखना चाहते थे, लेकिन स्वयं उन्होंने ही उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया!
अज्ञेय नये लेखकों में प्रतिभा देखते, तो उन्हें प्रेरित और प्रोत्साहित करते थे। अनेक लेखकों के संस्मरण इसके साक्षी हैं। केदारनाथ सिंह की कविताएँ लाने वे उनके कमरे पर चले गए और अपनी नोट-बुक में उन्हें उतार लाए! गोविन्द मिश्र से उनकी कहानी माँगने उनके घर पर चले गए! इसमें वे अपने को बडा-छोटा हुआ नह समझते थे। यह उनकी कार्य प्रणाली थी। यही कार्य उन्होंने नरेशजी के लिए भी किया। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उस व्यक्ति की सदाशयता को नरेशजी ने अपनी खुशामद और उनकी कमजोरी समझ लिया! और, इसके सहारे उनका महत्त्व कम करने तक का प्रयत्न किया!
अज्ञेय का महत्त्व कम करने के लिए ही उन्होंने सप्तकों के प्रति भी उदासीनता दिखाई है। यह तो जब उनका ध्यान इस ओर गया कि दूसरे सप्तक में तो उनकी कविताएँ भी हैं, तब उन्होंने अपना स्वर बदला और लिखा- आज भले ही हम कह लें कि सप्तकों में आ जाने से होता क्या है, पर उन दिनों सचमुच ही कुछ होता था, इसे मान लिया जाए तो क्या हर्ज है ? लेकिन अगले सप्तकों पर आते हुए वे अपनी बात बदल देते हैं। उन पर उनकी टिप्पणी है कि - कालान्तर में तीसरा और चौथा सप्तक भी प्रकाशित हुए, पर शायद लकीर पीटने जैसा ही सिद्ध हुआ। उससे न कविता और न कवि को ही कोई खास लाभ हुआ। (82)।
अज्ञेय से जुडे एक प्रसंग का स्मरण करते हुए उन्होंने लिखा है कि एक बार वे अपनी पुस्तक लेने उनके निवास पर गए। वे कपिलाजी के साथ बैठे हुए थे। उन्हें देखा, तो भीतर गए और पुस्तक लाकर उन्हें दे दी, लेकिन शिष्टाचारवश भी उन्हें बैठने के लिए नह कहा। यह बात उन्हें अपना निरादर जान पडी, विशेषकर इसलिए कि वे पूर्व सूचना देकर गए थे।
इस प्रसंग में संभावना यही जान पडती है कि सूचना उन्हें न मिली हो, अन्यथा उन्होंने किसी का अनादर किया हो, और वह भी घर आए व्यक्ति का, ऐसा प्रसंग विरल ही मिलेगा। नरेशजी के अज्ञेय से वैमनस्य का कोई ठोस कारण इन संस्मरणों में नह है (आगे चलकर तो सुलह भी हो गई; भोपाल में सम्मान उन्होंने अज्ञेय के हाथों से ही ग्रहण किया था,) लेकिन यहाँ अज्ञेय को अपना मुखापेक्षी दिखाते हुए उनकी स्थापित छवि का तो उन्होंने कोई विचार किया ही नह है, इस बात की भी चिन्ता नह की है कि स्वयं उन्होंने उन्हें जो सर्जन का ऊर्ध्व शिखर और आचरण और व्यवहार में निष्णात् कहा है, उससे उसकी संगति कैसे बैठेगी? लगता है, अज्ञेय के बहाने नरेशजी ने स्वयं को प्रोजेक्ट करने का उद्यम ही अधिक किया है।
अशोक वाजपेयी का आलेख भी काफी विस्तृत है। इसमें उन्होंने अपनी काव्य-रुचि के निर्माण-काल में अज्ञेय के प्रति आकर्षण और व्यक्तिशः उनसे बढती निकटता की चर्चा की है, तो दूसरी ओर काल-क्रम में उनसे बढती गई दूरी के सन्दर्भ में अपना पक्ष स्पष्ट किया है।
अगले सोपान पर उन्होंने मुक्तिबोध, श्रीकान्त वर्मा आदि वाम-कवियों और कृति जैसी पत्रिकाओं की ओर बढते अपने रुझान का निदर्शन भी किया है। अभी जबकि अज्ञेय से उनके सम्बन्धों में आत्मीयता की ऊष्मा थी, अज्ञेय का काव्य-संग्रह कितनी नावों में कितनी बार प्रकाशित हुआ। उन्होंने (याने अशोक ने) इस संग्रह की समीक्षा धर्मयुग में प्रकाशित करवाई। समीक्षा काफी तीखी थी। उसके प्रकाशन के बाद अज्ञेय से उनके सम्बन्ध बिगड गए।
इस समीक्षा पर साहित्य-जगत में हुई प्रतिक्रिया का आकलन करते हुए उन्होंने लिखा है कि मेरे जैसे उनके निकट माने जाने वाले लेखक के एक मूर्धन्य पर इस तरह के प्रहार ने बहुतों को चकित और उनके अनेक निन्दकों को प्रसन्न किया। कइयों को यह अज्ञेय के कवि-रूप के ढलने की पहली उग्र निशानदेही लगी। पर हुआ यह कि अज्ञेय के साथ मेरे निजी सम्बन्ध खराब हो गए। (304)।
उन्होंने यह भी लिखा है कि कम-से-कम अस्थायी तौर पर अज्ञेय का वर्चस्व घट गया लगता था। अज्ञेय को अपदस्थ कर मुक्तिबोध को केन्द्र में लाने का एक विशद आलोचनात्मक अभियान चल निकला था। इस दौरान अज्ञेय का अवमूल्यन-सा होने लगा और मुझे भी उस अभियान में शामिल मान लिया गया। (305)।
यह मान लिया जाना सर्वथा अकारण तो नह कहा जा सकता। अज्ञेय के कवि-रूप का ढलना देखने में उनकी अपदस्थता भी उन्होंने लगभग मान ही ली थी।
अनन्तर ज्ञानपीठ पुरस्कार के निर्णय में अज्ञेय के विरोध में अपना मत देकर स्वयं उन्होंने साहित्य-जगत में अपने अज्ञेय-विरोधी होने की धारणा पुष्ट हो जाने दी। हम स्मरण यह भी कर सकते हैं कि अज्ञेय को जब साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था, तब भी वे उनसे टकराव में आ गए थे यद्यपि समीक्षा प्रसंग में टकराव का रूप बिल्कुल अलग प्रकृति का था। उस विरोध में भी उनकी अपेक्षा और आकांक्षा यह भी रही कि अज्ञेय उस समीक्षा को देखें। इस समीक्षा की सीमाएँ स्वीकार करते हुए भी उसे सही परिप्रेक्ष्य में नह देखे जाने की शिकायत करते हुए अशोकजी ने बडे दर्द से लिखा है कि-
उसमें आवेग कुछ ज्यादा था, शायद वह एकतरफा थी। पर उसमें एक युवा आलोचक का ईमानदार दुस्साहस था जिसे अज्ञेय अलक्षित करें, यह मुझे दुखद और निराशाजनक लगा। उनसे बरसों से चला आ रहा सम्बन्ध टूट गया। (304)।
ऐसा ही क्लेश उनके मन में अज्ञेय द्वारा किए जा रहे भारत-भवन के बहिष्कार के लिए भी था। उन्हें कष्ट यह सालता था कि-
भारत-भवन जैसी बडी पहल से अज्ञेय का कोई सम्बन्ध नह था जबकि उसके महत्त्व और ऐतिहासिक जरूरत को समझने और उत्साहित करने की सबसे अधिक क्षमता और समझ उन्हीं के पास थी। (305)।
इस स्थिति पर कुछ और विचार करते हुए उन्होंने यह भी पाया कि-
मेरी असफलता यह थी कि मैं उन्हें या उन जैसे कुछ औरों को यह नह समझा पा रहा था कि मध्यप्रदेश में सांस्कृतिक विकास का एक बिल्कुल नया मॉडल विकसित हो रहा था जिसमें सरकार के धन और साधन थे, पर हस्तक्षेप बिल्कुल नह था। (309)।
अशोकजी के इस दर्द को जैनुइन ही कहना होगा। कोई भी व्यक्ति अपने लिए जिसे आदरास्पद पाता है, अपने कार्य-कलापों और लेखन से, उसे चकित कर उससे प्रशंसा और प्रोत्साहन पाना चाहता है। अशोक की अज्ञेय से ऐसी ही अपेक्षा थी, लेकिन उनके समीक्षा-लेख ने उनको क्षुब्ध कर दिया। अपनी आलोचना वे गले नह उतार पाए।
प्रभाकर माचव ने भी लिखा है कि उन्होंने अपने-अपने अजनबी की जो समीक्षा लिखी थी, उसे पढकर वे उनसे नाराज हो गए! (128) परमानन्द श्रीवास्तव ने भी सागर मुद्रा की समीक्षा में उन्हें चुका हुआ कवि लिखा था। कुछ समय बाद जब उनकी उनसे भेंट हुई, तब उन्होंने उनसे पूछा इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं? उत्तर में उनकी व्यंग्योक्ति थी, इधर चुक गया हूँ। (606)। जाहिर है, इस उत्तर में वे उनकी उस समीक्षा के प्रति अपनी नाराजगी ही प्रकट कर रहे थे।
जिस व्यक्ति ने कभी अपना घनघोर विरोध झेला, निन्दा-प्रस्ताव सहे, शेखर की प्रतियों का जलाया जाना देखा, वही धीर, गम्भीर, शान्त और मौनव्रती साहित्यिक-समीक्षाओं से विचलित हो जाए, यह विस्मयकारी ही लगता है।
वैसे तो, यह मनुष्य मात्र की वृत्ति मानी गई है कि वह अपनी प्रशंसा ही पाना चाहता है, अपनी आलोचना उसे ग्राह्य नह होती। इन प्रसंगों के रहते, यही कहा जा सकता है कि अज्ञेय भी इसके अपवाद नह थे।
अज्ञेय में एक दुर्बल वृत्ति यह भी थी कि अपनी रचना, साहित्य में अपने स्थान, अपने अवदान आदि पर बात करना भी उन्हें रुचता था। साहित्य अकादमी के लिए लिखा गया उनका इण्डियन लिटरेचर लेख तो सर्व विदित-सा ही है, एक प्रसंग का उल्लेख मुकुन्द लाठ के संस्मरणों में भी है। उन्होंने लिखा है- एक दिन उन्हें हिन्दी साहित्य की आधुनिकता पर और उसमें उनके अपने स्थान पर एक अनौपचारिक, पर अच्छा लम्बा व्याख्यान देते सुना। (472)। इसे भी एक सहज मानवीय दुर्बलता के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अस्तु।
भारत-भवन के बहिष्कार का जहाँ तक प्रश्न है, अज्ञेय के उस निर्णय में कोई अनौचित्य नह जान पडता। जिस आयोजक की अज्ञेय के प्रति धारणा यह हो कि कवि-रूप उनका ढल गया है, वर्चस्व उनका घट रहा है, अवमूल्यन हो रहा है, वे केन्द्र में नह रह गए हैं आदि-आदि, तो उसके किसी आयोजन में जाना उन्हें गँवारा न हो, तो उसे उचित ही कहा जाएगा। स्वयं अशोक को तो वत्सल-निधि के वृन्दावन-शिविर प्रसंग में अपनी स्व-कल्पित उपेक्षा का दंश इतना गहरा चुभ गया कि फिर अज्ञेय के किसी भी आयोजन में वे शायद ही कभी गए! ऐसे में, अज्ञेय के बहिष्कार को अनुचित कैसे कहा जाएगा ?

अज्ञेय और अशोक के सम्बन्धों में तनाव का एक बडा कारक अशोक का स्वभावगत अहंकार भी रहा। इस आलेख को ध्यान से पढें, तो इसमें उनके अहंकार की व्यंजना पग-पग पर पाई जा सकती है। अज्ञेय के सन्दर्भ में यह उसकी प्रबल अभिव्यक्ति है-
मेरी भी जिद थी कि मैं उस मोर्चे पर गलत या कमजोर नह हूँ और अगर अज्ञेय की जिद है, तो मेरी जिद भी बनी रहे। (312)।
वे यह जता देना चाहते थे कि उनकी भी अपनी हैसियत है और वह अज्ञेय से कम नह है। उनके इस अहंकार ने ही उनकी दृष्टि को आत्मनिष्ठ बना दिया। परिदृश्य का वस्तुनिष्ठ आकलन वे कर ही नह पाए।
अज्ञेय के भारत-भवन के बहिष्कार के विषय में अशोकजी का मत यह था कि अज्ञेय इस गलतफहमी के शिकार थे कि अशोक नामवर सिंह के इशारे पर काम कर रहे हैं जबकि वास्तव में ऐसा नह था। (317)। अशोकजी ने अनुमान यह भी किया है कि अज्ञेय ने भारत-भवन, सांस्कृतिक विभाग, प्रलेस आदि को एक ही अभियान में शामिल मान कर उनसे अपना असंतोष प्रगट किया। (310)।
यदि अशोकजी के अनुमान को सही मान लें, तो यह भी मानना होगा कि अज्ञेय कच्ची जानकारी के आधार पर चलते थे; और, यह भी कि अपने समय की साहित्यिक राजनीति से वे अनभिज्ञ थे! क्या ऐसा मानना उचित भी होगा ? विशेषकर जबकि वे पत्रकार भी थे!
वस्तुतः उन दिनों का जो आकलन अशोक ने किया है, वह दृश्य का एक पक्ष है। वामपंथी संगठन तो अपने मनोनीत लेखकों को जो प्रोजेक्ट करने में लगे हुए थे, वह तो उनकी दलीय निष्ठा का तकाजा था। दृश्य के दूसरे पक्ष में झाँकें, तो वहाँ स्वयं अशोक भी उन्हें ही (याने वामपंथियों को ही) रिझाने की रणनीति पर काम कर रहे थे! एक ओर वे उन्हें पीठासीन कर रहे थे, तो दूसरी ओर श्रीकान्त-प्रसंग जैसे आयोजन भी कर रहे थे! अज्ञेय उनसे ना-वाकिफ नह थे। लेकिन वाम-पक्ष जो अज्ञेय को हाशिये पर धकेलने के मुद्दे पर एकजुट होकर अभियान चला रहा था, उसके प्रति बाखबर होते हुए भी, वे (याने अशोक) बेखबर ही रहे!
यह तो जब अपनी समस्त कोशिशों के उपरान्त भी अशोकजी वामपंथियों को भारत-भवन से जोडे रखने में सफल नह हुए बल्कि जब वाम-पक्ष ने समवेत रूप से भारत-भवन का बहिष्कार कर दिया, तब वे अज्ञेय-उन्मुख हुए!
इस उन्मुखता में भी उनकी दृष्टि उस सलूक पर नह थी जो वामपंथी आलोचक अज्ञेय के साथ कर रहे थे। पूर्वग्रह (स्तम्भ फिर बैतलवा डाल पर) में नया प्रतीक की आलोचना करके अज्ञेय-विरोधी आग में ईंधन तो वे स्वयं झोंक रहे थे जबकि आवश्यकता उस मोर्चे को सम्भालने की सबसे अधिक थी! वस्तुतः अशोकजी की चिन्ता केवल अपनी जिद-पूर्ति के लिए अज्ञेय को जैसे-तैसे भारत-भवन ले जाने की थी!
अन्ततः अज्ञेय की नाराजगी के विषय पर उन्होंने (अशोक ने) इलाजी से भेंट की। उन्होंने उनके सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने अपनी बौद्धिक और वैचारिक स्वतन्त्रता के प्रति अज्ञेय की प्रतिक्रिया से निराशा जताई। उन्होंने यह भी कहा कि अज्ञेय को नाराज होना क्यों चाहिए जबकि व्यक्ति की स्वतन्त्रता का पाठ एक तरह से हम में से कइयों ने अज्ञेय की पाठशाला से ही सीखा था!
उन्होंने इलाजी से यह भी कहा कि अज्ञेय के चेहरे पर मेरे साथ न्याय नह हुआ का जो स्थायी भाव अंकित हुआ रहता है, वह निराधार है। हिन्दी-समाज उन्हें अपने सर्वश्रेष्ठ अलंकरण दे चुका, अब उसे और क्या करना चाहिए ? (314)
हैरानी यह देखकर होती है कि एक कवि के चेहरे पर अंकित स्थायी भाव पढ सकने वाला कवि उस दर्द की वर्णमाला के प्रति अबोध ही बना रहा, चेहरा जिसका ज्ञापक था!
बडे अलंकरण पाकर कवि को तोष तो मिलता ही है, लेकिन सत्-कवि को जो गहरी तसल्ली इस बात से मिलती है कि उसे सही समझा गया है, उसका उचित मूल्याँकन हुआ है, विज्ञजनों ने उसे सराहा है, वैसा तोष उसे और किसी बात से नह मिलता; बडे से बडे अलंकरणों से भी नह! भवभूति व्यर्थ ही पाठक के लिए अनन्तकाल तक प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नह थे !
यह खिन्न विस्मय की बात है कि अज्ञेय की पीडा को अशोक अलंकरणों के बाँटों से ही मापते-तोलते रहे जबकि दूसरी तरफ वामपंथियों की अनर्गल आलोचना, अज्ञेय को बिना पढे ही हाशिये पर धकेलने में, उन्हें नकारने में और एक बडे प्रबुद्ध वर्ग को उन्हें पढने और उनके निकट जाने से भी विमुख करने में लगी हुई थी। अशोकजी उन्हीं के भाल को तिलकित करने के लिए चन्दन घिस रहे थे!
जो भी हो, इलाजी के प्रयत्नों से ही बर्फ पिघली। अज्ञेय ने अपनी अनुकूलता का संकेत वृन्दावन-शिविर-प्रसंग में दे दिया था। उन्होंने अशोकजी को देश के युवा लेखकों के नाम सुझाने के लिए कहा। स्वयं अशोकजी का नाम उस सूची में रखना अनुचित होता क्योंकि शिविर युवा लेखकों के लिए ही था। अवश्य ही, कुछ प्रौढ लेखक बुलाए गए थे, पर अन्यान्य कारणों से। अशोकजी ने इसे अपनी उपेक्षा समझा। यह उपेक्षा उन्हें खटक भी गई।
बाद में, उन्हें अज्ञेय की 75वीं वर्षगाँठ पर आयोजित समारोह में बुलाया गया, लेकिन तब तक भी वे अपनी उस स्व-कल्पित उपेक्षा के दंश को भुला नह पाए थे। फिर उन्हें प्रतिष्ठित और अनुभवी कवि के रूप में वाल्मीकि नगर-शिविर में बुलाया गया। लेकिन उनके अहंकार को तोष उस आमन्त्रण को भी ठुकरा कर ही हुआ। शायद वे जता यह भी देना चाहते थे कि आमन्त्रण ठुकराना अज्ञेय का ही एकाधिकार नह है, अशोक वाजपेयी की भी हैसियत है, ठुकराना वह भी जानता है!
लेकिन दूसरी ओर अज्ञेय को भारत-भवन बुलाने का उद्यम भी उन्होंने छोडा नह। शायद इलाजी की समझाइश से ही यह सम्भव हुआ कि अज्ञेय ने भारत-भवन में कविता-पाठ और पाठ-रिकॉर्डिंग आदि के लिए भी अपनी स्वीकृति दे दी! फिर, वे आलोचना-समवाय और कवि-भारती जैसे आयोजनों में भी गए। इस तरह, अशोकजी अपनी जिद में सफलकाम हुए यद्यपि अज्ञेय से निकटता का अर्थ अब वही नह रह गया था जो महफिल के लिए आलेख लिखे जाने वाले दिनों में था!
अज्ञेय के साथ अशोक के सम्बन्धों की इस पडताल से कुछ बातें उभर कर आती हैं। इन सम्बन्धों के बिगडने के विषय में अशोकजी ने अपनी जो सफाई दी है, वह आत्मनिष्ठ ही अधिक है। इसमें लक्ष्य हम यह भी करते हैं कि जाने-अनजाने, बल्कि अनजाने क्यों, कहना चाहिए, सजगतः उन्होंने स्वयं को प्रोजेक्ट करने का उद्यम भी किया है बल्कि जितना उन्होंने अज्ञेय को याद किया है, उससे अधिक उन्होंने खुद को प्रोजेक्ट किया है।
प्रारम्भ में ही यह कह कर कि वह नई कविता की प्रतिष्ठा की लडाई का दौर था और अज्ञेय उसके निर्विवाद सेनापति थे, (292), वे अपने लिए अगले दौर के कर्णधार का पद सुगमतापूर्वक आरक्षित करा लेते हैं। आत्म-प्रशंसा का संकोच छोडकर वे निर्द्वंद्व लिखते हैं कि उनके लिए उनकी पुस्तक फिलहाल के प्रकाशन के साथ ही फिर शुरू हुआ एक लम्बा दौर जिसमें साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में मेरी सक्रियता तेजी से बढी-फैली। किसी हिन्दी प्रदेश में होने वाली इस सदी की सबसे बडी व्यापक सांस्कृतिक पहल का मैं लगभग कर्णधार बना। (305)।
इस कथन में सत्याँश है, इसमें संदेह नह, लेकिन शील का तकाजा था कि वे संयम बरतते। यह आत्म-श्लाघा उनकी गरिमा कितनी बढाएगी, वे इसका भी कुछ विचार कर लेते तो अच्छा होता!
बहरहाल, आलोचना समवाय और कवि-भारती जैसे आयोजनों में अज्ञेय को बुलाकर जहाँ उन्होंने प्रकटतः उनकी केन्द्रीयता और प्रासंगिकता के बरकरार रहने की प्रतीति उन्हें करानी चाही थी, वहीं प्रच्छन्नतः उन्हें अपनी योजनाशील दृष्टि और आयोजन-क्षमता और कौशल का कायल करना भी चाहा हो, तो उससे भी इंकार कैसे किया जाएगा ?
लेकिन आलेख के अन्तिम भाग में एक पक्ष और भी है, उसे ओझल रहने देना भी न्याय-संगत नह होगा। इलाजी से अशोक ने चाहे यह कह दिया हो कि हिन्दी-समाज अपने सर्वश्रेष्ठ अलंकरण उन्हें दे चुका है, अब उसे और क्या करना चाहिए, लेकिन बाद में अनुभव उन्होंने (अशोकजी ने) यह भी किया और लिखा भी है कि अज्ञेय वास्तव में, अकेले ही रहे हैं। अपने अलंकरणों के साथ भी वे अकेले थे! अपने हजारों शब्दों और इतनी सारी रचनाओं के साथ भी अकेले! (318)।
कहने को उन्होंने इलाजी से यह भी कह दिया था कि अज्ञेय के चेहरे पर जो स्थायी भाव अंकित हुआ रहता है कि मेरे साथ न्याय नह हुआ, वह निराधार है, लेकिन गहरे पैठने पर उन्होंने यह भी पाया और लिखा भी कि अज्ञेय के साथ सचमुच हिन्दी-लेखक-समाज ने न्याय नह किया, उनके जीवन-काल में उनके कृतित्त्व का जैसा गंभीर विश्लेषण और मूल्यांकन हमारे मूर्धन्य आलोचकों आदि को करना चाहिए था वह नह हुआ, पुनर्विचार करने पर उन्होंने यह भी पाया कि बरसों तक एकाध-दो साहित्यिक आन्दोलन अपनी मूल्य-दृष्टियों की प्रतिष्ठा के साथ-साथ अज्ञेय को साहित्य में हाशिये पर धकेलने का, अब लगता है, विफल ही, प्रयत्न करते रहे। (314)।
इन अन्तिम अंशों में अशोकजी को उन आक्षेपों का मार्जन करते देखा जा सकता है जो कभी स्वयं उन्होंने भी लगाए थे और जिनके पक्ष में वे तब भी खडे थे, जब वे इलाजी से भेंट करने गए थे।
कहना कठिन है कि बाद में किया गया यह मार्जन स्वयं उनके द्वारा अज्ञेय पर लगाए जाते रहे आक्षेपों पर किया गया पश्चाताप है या अपने भविष्य की उस दुश्चिन्ता से निसृत उनका मनन-मंथन है जिसने निम्नांकित कथन में अपनी अभिव्यक्ति पाई है-
क्या अज्ञेय की नियति में, बिना पढे अप्रासंगिक मान लिए जाने में हम कई लोगों की भी नियति का पूर्वाभास नह है? क्या एक क्रूर अन्त हम सब की भी प्रतीक्षा नह कर रहा है ? (318)।
बहरहाल, इतना ही कहा जा सकता है कि अन्त भला, सो सब भला।
निर्मल वर्मा ने अज्ञेय का स्मरण करते हुए उनके साथ अपने जीवन की चर्चा नह की है। उन्होंने अपने को उस सलूक पर केन्द्रित किया है, जो वामपंथी आलोचना ने अज्ञेय के साथ किया था। उन्होंने याने वामपन्थी आलोचकों ने अज्ञेय-विरोधी जो अभियान चलाया था, निर्मल ने उसका तीक्ष्ण विश्लेषण किया है। उनका कहना है कि सोवियत सत्ता द्वारा वहाँ के लेखकों की स्वतन्त्रता को और स्वयं लेखकों को भी जिस तरह कुचला गया (और जैसी अमानुषिक यातनाएँ उन्हें दी गईं), हमारे यहाँ के माक्र्सवादी लेखकों को वे भी निंदनीय तो क्या, अनुचित भी नह जान पडी थीं! उन्हें हमारे यहाँ का आपातकाल भी कैसे अखरता! ऐसे में, हिन्दी का अज्ञेय जैसा एक स्वाधीनचेता लेखक उन्हें कैसे बर्दाश्त होता! (73)।
ऐसे आलोचकों के निकट स्वतन्त्रता लेखक का सहजात धर्म नह होकर अभिजात वर्ग का लक्षण बन कर रह गई! और, उसी नाते से अज्ञेय अभिजात वर्ग के लेखक! जबकि सामन्ती या अभिजात वर्ग से उनका कभी कोई नाता नह रहा।
उन्हें अपने बन्धे साँचे में अँटता नह पाकर वे आलोचक उनके विरूद्ध आक्रामक हो गए और उन्हें अमेरिकी एजेन्ट और पूँजीपतियों का दलाल तक कहकर लांछित करने लगे! उन्हें पढकर उनकी आलोचना करना दुष्कर था, एजेन्ट और दलाल कह कर खारिज कर देना आसान। यही उन्होंने किया भी। (74)।
आवश्यकता इस अज्ञेय-विरोधी अभियान के विरूद्ध आगे आकर अज्ञेय की सीमाओं और उनके अवदान का सम्यक मूल्याँकन किए जाने की थी जबकि अशोक वाजपेयी तो स्वयं उस अभियान में ही शामिल हो गए!
निर्मल वर्मा का आलेख एक ओर अशोक के आलेख के पूरक के रूप में पढा जा सकता है (वामपंथी आलोचना के वास्तविक चरित्र को पहचानने के अर्थ में), तो, दूसरी ओर, अनेक वामपंथी लेखकों के संस्मरणों की पूर्व-पीठिका के रूप में भी देखा जा सकता है। ये संस्मरण निर्मल वर्मा के तीखे विश्लेषण को सत्यापित करते जान पडेंगे। एक तरह से उसके खरेपन पर मुहर-सी लगाते हुए। कुछ लेखकों ने दबे स्वर में, तो कुछ ने खुलकर, स्वीकार किया है कि उन्हें वामपंथी दिग्गजों द्वारा अज्ञेय से विमुख रखा गया!?
विश्वनाथ त्रिपाठी बनारस में रहते अज्ञेय को देख चुके थे। वे उनके व्यक्तित्त्व से प्रभावित भी थे लेकिन उन्हें बताया यह गया कि वे उच्च भ्रू लोग हैं। हमारा उनसे लेना-देना नह है। उन्हें उनसे दूर ही रहना है! (237)।
यह तो जब वे स्वयं दिल्ली चले गए और वहाँ रहते उनसे (अज्ञेय से) मिलने गए, तब पाया कि (जैसा उन्हें बताया गया था, उसके ठीक विपरीत) वे अत्यन्त सहज व्यक्ति हैं। वे बडे स्नेह से मिले और देर तक उनकी बातें सुनते।
प्रसंगवश यहाँ यह कह देना भी उचित ही होगा कि अज्ञेय के आत्मीय-वृत्त में रहते हुए भी ओम थानवी की आवाजाही माक्र्सवादी हल्कों में भी अनवरुद्ध रही। वस्तुतः अपनी पत्रकारिता में उन्होंने साहित्य के लिए जो स्थान संभव किया; उस नाते से, और अपनी व्यवहार-कुशलता की वजह से भी, साहित्यिक बिरादरी के सभी वर्गों में उनकी पैठ और नाता-रिश्ता बना रहा। इसी वजह से वे उन माक्र्सवादी लेखकों से भी अज्ञेय-विषयक उनके संस्मरण लिखवा सके, अज्ञेय के जीवन-काल में जो उनसे मिलने से भी कतराते थे!
वे उन्हें आत्म-विश्वासी भी लगे थे। उन्हें यह भी लगा कि यह उनका आत्म-विश्वास ही था जो लोगों को उनका अहंकार लगता था!
अपने लेखन-काल के प्रारम्भ में परमानन्द श्रीवास्तव भी अज्ञेय की ओर आकर्षित हुए थे। अपना पहला कविता-संग्रह उन्होंने जाँच और परामर्श के लिए अज्ञेय को ही भेजा था! उन्होंने परिमल के राष्ट्रीय सम्मेलन में भी भागीदारी की थी। परन्तु मुख्य जुडाव आपका प्रलेस से था। परिमल के सम्मेलन में ही मार्कण्डेय ने आपको सावधान किया था कि ये लोग याने परिमल वाले और अज्ञेय भी, कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम से सम्बद्ध हैं। इनके झाँसे में मत आना। (605)।
अज्ञेय के अन्य आयोजनों में भी आपने भाग लिया, लेकिन इस शंकालु, मानसिकता के साथ कि मेरी दुविधा माक्र्सवाद। (606)। स्पष्ट है, वे अपने को दिग्गजों के दबाव के आगे लाचार पाते थे!
स्थिति राजेश जोशी की भी भिन्न नह थी। उनकी बडी इच्छा अज्ञेय का काव्य-पाठ सुनने की थी और उससे भी बडी लालसा उनके साथ खडे होकर कविता-पाठ करने की! भोपाल में कार्यक्रम बन भी गया था, लेकिन अज्ञेय नह आ पाये इसलिए मन की इच्छा मन में ही रह गई! उन्हें बडा दुख इस बात का भी हुआ कि अपना दुख वे खुलकर व्यक्त भी नह कर सके। उन्होंने लिखा भी है कि - अज्ञेय को लेकर उन दिनों सहमतियों-असहमतियों का जो दौर था, उसमें इस इच्छा को खुलकर व्यक्त करने का साहस मुझमें नह था! (714)।
इस कथन से भी जाहिर है कि वामपंथियों ने अज्ञेय को लेकर साहित्य-जगत में छुआछूत की-सी बडी विकट स्थिति उत्पन्न कर रखी थी और युवा कवियों को आतंकित कर रखा था! निराला ने अपनी स्थिति के लिए कहा था, ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत, परन्तु अज्ञेय मौन ही रहे अन्यथा वामपंथी हल्कों में स्थिति उनकी भी भिन्न नह थी।
राजेश और विश्वनाथ त्रिपाठी ने जो बात दबे स्वर में स्वीकार की है, गोविन्द मिश्र ने उसे कुछ स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने लिखा है, वे कहानी माँगने मेरे घर आए। मैं ठहरा करीब-करीब नया लेखक। मैंने जब इस बात का जिक्र अपने साहित्यकार मित्रों से किया, तो वे मुझे तरह-तरह से आगाह करने लगे - तुम नया प्रतीक में छपोगे, तो बदनाम हो जाओगें, उनसे जुडोगे, तो तुम्हारी छवि प्रतिक्रियावादी की हो जाएगी। (467)। साहित्य-जगत की राजनीति का यह पहला झटका था जो उन्हें लगा था, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नह की। वे उनके निकट भी गए।
गंगाप्रसाद विमल ने अपनी स्थिति कुछ और भी खोल कर रखी है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि जब मैं दिल्ली आया था, तब समाजवादी प्रभाव में था। उन दिनों अज्ञेय को कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम जैसी संस्थाओं और उनके प्रकाशनों से जुडा मानकर उनकी चर्चा प्रगतिशील हल्कों में वर्जित-सी चीज बना दी गई थी। (695)।
उनका अपना मिलना अज्ञेय से कभी-कभी होता रहता था। उन्होंने यह श्रेय भी लिया है कि चेकोस्लोवाकिया से जो महिला एक श्रेष्ठ भारतीय लेखक की तलाश में भारत आई थी, अज्ञेय का नाम उसे उन्होंने (विमल ने) ही सुझाया था! लेकिन इसके बावजूद लेखकीय स्वाधीनता के पक्षधर होते हम उन्हें कहीं भी नह देखते।
नवल किशोर प्रारम्भ से ही उदारवादी माक्र्सवादी रहे इसलिए उनके दृष्टिकोण में कट्टरता नह मिलती लेकिन विचारधारा का दबाव वे भी अनुभव करते थे। यह उनकी आत्म-स्वीकृति है कि आज लगता है, मैं अज्ञेय को जितना मानता था, उससे कहीं ज्यादा मानना चाहिए था! (614)। यह ज्यादा मानना जो तब सम्भव नह हुआ, उसमें बडा योग उस दबाव का समझना चाहिए जो वामपंथी विचारधारा उन दिनों लेखकों पर डाल रही था। अन्यथा विदेशी संस्थाओं से उनके सम्बन्ध को तो उन्होंने यह कह कर खारिज कर दिया है कि उन दिनों विश्व-भर के बडे लेखकों के उनसे सम्बन्ध थे, अज्ञेय कोई अपवाद नह थे। व्यक्ति-अज्ञेय जो स्वतन्त्रता-सेनानी होकर भी सेनानी-पेंशन नह ले रहे थे, उससे वे विशेष प्रभावित हुए। ऐसे व्यक्ति को उन्हें अमेरिका एजेन्ट या दलाल कहा जाना भी उन्हें क्षोभकर ही लगा।
रामशरण जोशी के संस्मरणों से ज्ञात होता है कि रचनाकारों को ही नह, पत्रकारों को भी अज्ञेय से दूर रखने का प्रयत्न किया गया। उन्होंने लिखा है कि जब मैं अज्ञेय से मिलने नवभारत टाइम्स कार्यालय में गया, तब इस अभिजात और व्यक्तिवादी लेखक के प्रति काल्पनिक पूर्वग्रहों से भरा हुआ था! मुझे मेरे कतिपय वामपंथी लेखक मित्रों ने विभिन्न उदाहरणों से समझा रखा था कि अज्ञेयजी घोर वामपंथ-विरोधी हैं। इनसे सौ मील फासले पर रहना चाहिए! (88)। परन्तु अज्ञेय से मिल कर जोशीजी ने पाया कि वे न केवल विरोधी मत वालों से सहज भाव से मिलते थे बल्कि अपने अखबार में विरोधी विचारधारा के लिए भी स्थान रखते थे!
इस तरह, माक्र्सवादी आलोचना की जो बखिया निर्मल वर्मा ने उधेडी है, उसकी सच्चाई की पुष्टि वामपंथी लेखकों के ये संस्मरण भलीभाँति कर देते हैं। इन संस्मरणों का अन्यथा महत्त्व भी है ही, उसका यथास्थान निदर्शन किया गया है।
केशवचन्द्र वर्मा के उल्लेख का एक अलग हेतु भी है। इला डालमिया और पद्मा सचदेव ने अज्ञेय के जीवन-पक्ष पर जो प्रकाश डाला है, उसमें उनका इलाहाबाद-जीवन छूट-सा गया है। (मानस मुकुल दास ने उनके इस काल का स्मरण किया है, लेकिन वह प्रमुखतः उनके पारिवारिक जीवन से अज्ञेय की आत्मीयता तक ही सीमित रहा है)।
इस काल में उनके सार्वजनिक साहित्यिक जीवन का कुछ लेखा नरेशजी में भी मिलता है, लेकिन उनकी दृष्टि पूर्वग्रह-दूषित अधिक रही है। उनके याने अज्ञेय के इलाहाबाद छोडने का उल्लेख भी वे व्यंगात्मक भंगिमा में ही करते हैं- वात्स्यायन अपना बोरिया- बक्सा समेट कर दिल्ली जा चुके थे। (85)
पूर्वग्रह का आक्षेप केशवचन्द्र पर भी चाहे लगे, इलाहाबाद-काल के अज्ञेय के सार्वजनिक साहित्यिक जीवन की और परिमल से उनके सम्बन्ध की, और सम्बन्ध टूटने की भी, जो तस्वीर हमें केशव में मिलती है, उसका कुछ सत्यापन अन्य लेखकों के संस्मरणों से भी होता है। स्वदेश भारती के संस्मरणों में अज्ञेय से बातचीत का जो हवाला है, उसमें स्वयं अज्ञेय भी उनके मत की पुष्टि-सी करते हैं कि इलाहाबाद में वे छले गए! (634)।
वैसे, केशवचन्द्र का आलेख दो भिन्न पहलुओं का गठजोड है। इसके एक भाग में कविता और संगीत के सम्बन्धों पर विचार किया गया है। यह सही है कि संगीत कविता की शक्ति रहा है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि संगीत की वैशाखी हटा कर ही कविता अपना स्वावलम्बन पा सकी है। विचारणीय पहलू यह भी है कि अज्ञेय की उत्तर-कविता पाठक को जिस गहराई में ले जाती है, एक प्रकार का संगीत उस तल से भी स्फुरित होता है जो हमें अपने में निमग्न कर लेता है। पद्य-नाटक के विवेचन में एलियट भी अनहद प्रकृति के जिस संगीत की बात करता है, अज्ञेय उससे अनभिज्ञ नह हो सकते थे। यह भी अकारण नह है कि उत्तर प्रियदर्शी की रचना पद्य में हुई है। ये सब बातें भी विचारणीय बनती हैं।
बहरहाल, यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि केशवचन्द्र वर्मा ने अज्ञेय की कविता में संगीत पर या कहें, संगीत के अभाव पर जो विचार किया है, वह स्वयं में विचारणीय वस्तु है। लेकिन इसके साथ ही यह जोडना भी उतना ही आवश्यक है कि अपने मूल में वस्तु यह आलोचना के क्षेत्र की ही कही जाएगी, संस्मरण की नह। संस्मरण की दृष्टि से अज्ञेय के परिमल से सम्बन्धों वाला पहलू ही ध्यान देने योग्य है।
अज्ञेय ने परिमल के सदस्यों के साथ मिलकर उसकी गतिविधियों को आगे बढाया था। लेखक और राज्य विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन भी किया, लेकिन जब भी उन्होंने उसमें कुछ स्वतन्त्र रूप से किया, या करना चाहा, तब सदस्यों को वह गले नह उतरा। सदस्यों से परामर्श किए बिना उन्होंने मराठी लेखक प्रभाकर माचवे को आमंत्रित कर लिया। इसका तीव्र विरोध हुआ। एक प्रस्ताव उन्होंने सर्व-सम्मति से पारित कराना चाहा, उसका भी विरोध हुआ। इससे वे क्षुब्ध थे। केशव ने लिखा है- परिमल के भीतर से उभरता हुआ अपने को मुक्तकरने का अन्दाज वात्स्यायन को कहीं गहरे स्तर पर परिमल के कार्य-कलापों से काट गया।’ (618)।
इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए केशव ने यह भी लिखा है कि उन्हें सदा आँखें मूँद कर साथ चलने वालों की तलाश थी जो परिमल से अन्ततः उन्हें नह मिला। सारतः इलाहाबाद से वात्स्यायन को विरति हो गई। (618)।
बात गलत नह है लेकिन अज्ञेय के व्यक्तित्त्व, उनकी कार्य-शैली और जीवन-शैली को देखते हुए यह कहना ज्यादा सही होगा कि वे अपना पथ स्वयं बनाने के अभ्यासी थे। दूसरे के बनाए रास्ते पर वे ज्यादा दूर तक नह चल सकते थे; साथी की प्रकृति को देखकर और अपने कार्य की प्रकृति के साथ उसके मेल को देखकर वे उसे चुनते थे। दूसरा कोई व्यक्ति उनकी नकेल अपने हाथ में ले ले, यह उन्हें गँवारा नह था। दूसरे के बनाए साँचे में बँधकर भी वे नह रह सकते थे। यही कारण था कि परिमल में वे ज्यादा नह रह सके।
जो हो, इलाहाबाद उन्हें रास नह आया और वे उसे छोडकर दिल्ली चले गए। रामकमल राय और रामस्वरूप चतुर्वेदी के संस्मरणों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि इलाहाबाद का सार्वजनिक साहित्यिक जीवन उन्हें ज्यादा रास नह आया। लेकिन दिल्ली में भी कोई मनोनुकूल माहौल उन्हें नह मिला। अन्ततः इसकी पूर्ति उन्होंने वत्सल निधि की स्थापना करके की और उसके द्वारा आयोजित शिविरों और यात्राओं से भी की।
जो भी हो, अज्ञेय के व्यक्तित्त्व को समग्रतः पाने में इलाहाबाद-काल का निश्चित योग है। प्रतीक और दो सप्तकों के प्रकाशन की दृष्टि से तो उसका महत्त्व है ही, अन्यथा भी रचनाकार अज्ञेय को समझने की दृष्टि से भी इस सोपान का महत्त्व है।
अज्ञेय के जीवन के विषय में कुछ नई जानकारी जोडने का उद्यम पंकज बिष्ट ने किया है, लेकिन वह विवादास्पद ही रही है।
अज्ञेय से पंकज के सम्बन्ध प्रारम्भ से ही प्रथम ग्रासे मक्षिका पात वाले ही रहे। अज्ञेय के सम्पादन में नवभारत टाइम्स में छपी अपनी कहानी का पहला स्वीकृत ही नह, सुधारा हुआ पारिश्रमिक भी उन्हें नितान्त असंतोषप्रद लगा। इसे लेकर वे अज्ञेय से रुष्ट हो गए। जब अज्ञेय को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, तब उन्होंने सरकारी पत्रिका आजकल में (जिसमें वे तब कार्यरत थे) उन पर सामग्री और उनका साक्षात्कार सचित्र प्रकाशित करना चाहा। लेकिन मैं सरकारी पत्रिकाओं को साक्षात्कार नह देता कहकर अज्ञेय ने उनका उत्साह बुझा दिया। यह जानकर कि पहले अज्ञेय आकाशवाणी में स्टाफ-आर्टिस्ट रह चुके है और आकाशवाणी तब भी सरकारी उपक्रम ही था, (इस न्याय से) सरकारी-पत्रिका कहकर आजकल को साक्षात्कार देने से मना करना, पंकज को अज्ञेय का पाखण्ड जान पडा। पंकज के तर्क में औचित्य जान पडता है। अच्छा होता वे यह पक्ष अज्ञेय के सामने भी रखते ताकि उनका मत भी सामने आ जाता। खैर, जैसे भी हुआ, साक्षात्कार का जुगाड उन्होंने जगदीश गोयल के दबाव से कर लिया, लेकिन तब तक बात बदमजा तो हो ही गई थी। पंकज ने अपनी बौखलाहट अज्ञेय के सैन्य-काल से जुडे कुछ तथ्यों पर प्रश्न-चिह्न लगाकर प्रकट की।
पंकज का संस्मरण अक्षरशः प्रकाशित करते हुए सम्पादक ने दिखाया है कि उनमें तथ्यों को तोड-मरोड कर और दूसरों के कथन अधूरे उद्धृत कर अपना मंतव्य स्थापित करने की प्रवृत्ति है। शोधकर्ता के लिए यह प्रवृत्ति नितान्त अवांछनीय है।
ध्यान देने की बात यह भी है कि जीवन-विषयक शोध या विवाद का स्थान जीवनी या स्वतन्त्र लेख में ही होगा; संस्मरण में नह। वहाँ लेखक के साथ या साक्षी में घटित घटनाओं का आलेखन ही प्रमुख रूप से रहता है, विवादास्पद मुद्दे छेडने के लिए यह उपयुक्त स्थान नह है। यदि पंकज को अज्ञेय के जीवनगत तथ्यों में शंका है, तो उन्हें प्रमाण जुटाकर अपनी बात पृथक से कहनी चाहिए। अस्तु।
प्रभाकर माचवे को अज्ञेय के निकट रहने के अनेक अवसर मिले थे, इसलिए उनके संस्मरणों में कहीं-कहीं अज्ञेय के व्यक्तित्त्व के अल्प-चर्चित पहलुओं पर भी प्रकाश मिल जाता है। आगरा-काल का एक प्रसंग है; अज्ञेय ने एक हरिजन बालिका को चेचक से पीडित देखा, तो उसकी माँ के मना करते रहने पर भी, बिना नाक-भौं सिकोडे, उसे कंधे पर उठाया और पैदल चलकर, दूर स्थित अस्पताल पहुँचाया। यह प्रसंग उनकी भेदभाव-मुक्त मानवीय दृष्टि, सेवा-भावना और वात्सल्य का समवेत निदर्शक है।
अज्ञेय के इलाहाबाद, कलकत्ता, इन्दौर आदि कई शहरों के प्रसंग भी इन संस्मरणों में दर्ज हैं। यदि लेखक ने स्थान, विषय, काल आदि में से किसी भी क्रम का निर्वाह किया होता, तो ये संस्मरण बिखराहट और पुनरावृत्ति से तो बचते ही, सुगठित भी होते और अधिक प्रभावी भी।
अज्ञेय के साहित्यिक-पक्ष पर भी माचवेजी ने कुछ टिप्पणियाँ की हैं। कहीं-कहीं ये (टिप्पणियाँ) वैयक्तिक राग-द्वेष के स्तर पर उतर आई है-
कवि के नाते उनका अहं स्फीत था। शेष सब हिन्दी कवियों को या तो वे अपना शिष्य मानते थे या अपना शत्रु। शिष्य कब शत्रु हो जाए, इसका भी कोई ठिकाना नह। मामेकं शरणं व्रज वाली अव्यभिचारिणी भक्ति अपने अनुयायियों से चाहते थे। जरा भी खटका हुआ, हो गई कुट्टी (120)।

हम देख सकते हैं कि लेखक की स्वर-भंगिमा ही तीखी नह है, उसका आक्षेप वैयक्तिक भी हो गया है। अपेक्षा होती है, लेखक कुछ संयत होता ताकि शालीनता बनी रहती।
खिन्न विस्मय तो यह देखकर होता है कि जो लेखक अपने संस्मरणों के अधिकांश भाग में अज्ञेय का गुण-ग्राहक और प्रशंसक रहा है, उसने इस बात पर कोई विचार तक नह किया है कि उसकी प्रशंसा की, इस तरह की टिप्पणी से कोई संगति कैसे बैठेगी! यह कहते हुए, तो उन्होंने उनसे अपनी निकटता से भी पल्ला झाड लिया है कि मैं अज्ञेयजी का शिष्य या उनकी गुह्य-मण्डली का सदस्य यानी पिछलगा नह रहा। (114)
यह समझना कठिन है कि अपने व्यक्तित्त्व को उन्होंने इतना कमजोर कैसे मान लिया कि एक बडे व्यक्तित्त्व की निकटता मात्र से ही उन्हें उनका शिष्य या पिछलगा मान लिया जाएगा!
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी भी प्रभाकर माचवे की तरह ही अज्ञेय के साथ अपने सम्बन्धों को लेकर अनावश्यक ही कुण्ठित रहे जान पडते हैं।
साहित्य-जगत में उनकी छवि यह रही है कि वे अज्ञेय का आदर करते थे और अज्ञेय में भी उनके लिए स्नेह, सौहार्द और आदर था। वे एकाधिक बार उनके घर भी गए थे। वहाँ भोजन भी किया था। एक बार जब शिविर से लौटते हुए वे गोरखपुर आए, तब शिविरार्थी गोरखनाथ दर्शन के लिए जाना चाहते थे, इस पर अज्ञेय बोले, आप जाइये अपने गोरखनाथ, हम जाएँगे अपने विश्वनाथ। याने गोरखपुर उनके लिए विश्वनाथ तिवाडी का वाचक था! तिवारीजी के संस्मरण भी अज्ञेय के लिए उनके आदर की पुष्टि करते हैं।
ऐसी स्थिति में इन संस्मरणों में ही यह पढकर हैरानी होती है कि ये ही तिवारीजी जब दिल्ली जाते थे, तब अज्ञेय से मिलने जाने से भी कतराते थे! यह उन्हीं का कथन है कि -
मैं प्रायः दिल्ली जाता था और उनसे नह मिलता था। अपनी दिल्ली यात्राओं में मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जाता था और या तो वहीं ठहरता था या उसके गोमती गेस्ट हाउस में। (432)।
यदि यह ताकि सनद रहे प्रकृति की आत्म-स्वीकृति पढने में नह आती, तो इस बात पर विश्वास करना भी कठिन होता कि अज्ञेय से आदर पाने वाला व्यक्ति उनसे मिलने से भी कतराता था! कि उनका व्यक्तित्त्व इतना कमजोर था कि सहारे के लिए उसे वामपंथी वैशाखी की आवश्यकता होती थी!
जे.एन.यू. अज्ञेय-विरोधियों का गढ था। वे वहाँ जाना प्रायः टालते थे। अपने विनोद में वे कहते भी थे कि मैं ज.ला.ने और हिं.सा. (हिन्दी साहित्य सम्मेलन) में प्रायः नह जाता।
यह सब जानते हुए भी तिवारीजी वहीं ठहरते थे! इस स्थिति के लिए क्या कहा जाए? स्वयं तिवारीजी का कहना है कि मेरा अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व था और उसे मैंने बनाए रखा। लेकिन प्रश्न उठता है कि बनाए रखा किस तरह ? वामपंथी अनुकूलता पाए रहने और अज्ञेयवादी होने के आक्षेप से बचने के लिए उन्होंने वामपंथियों के गढ, को अपना रैन-बसेरा बनाया और दस्तावेज के लेखक-केन्द्रित पहले अंक को रामविलासजी पर प्रकाशित किया।
दूसरी ओर, अज्ञेय की उदारता के प्रति वे आश्वस्त थे। वे उनके प्रति ईमानदार भी थे। ज.ला.ने. में अपने रैन-बसेरे की बात भी वे उनसे छिपाते नह थे!
स्वयं उनकी शिकायत चाहे रही हो कि अज्ञेय ने मुझे अपना अन्तरंग नह समझा, ये संस्मरण ही बोलते हैं कि अज्ञेय ने उनको अपने निकट मान लिया था। व्यक्ति की अज्ञेय की परख लगभग अचूक थी। तिवारीजी की सदाशयता और ईमानदारी पर उन्होंने विश्वास कर लिया था। शिविरों में तो वे विरोधी विचार वालों को भी आमंत्रित करते थे लेकिन घर वे उन्हीं के जाते थे जिन्हें चाहते थे और जिनमें अहैतुकी प्रेम पाते थे।
अज्ञेय के उत्तर-जीवन पर मानस ने, और अन्य लेखकों ने भी कुछ नह लिखा है; विष्णुकान्त शास्त्री के संस्मरणों में, अवश्य ही, इसकी चर्चा आई है।
केशव मलिक और कुछ अन्य लेखकों का भी, मत रहा है कि अज्ञेय अनीश्वरवादी थे (234)। लेकिन अमरकण्टक के सह-यात्री राजेन्द्र मिश्र को तो वे निर्भ्रान्त कहते ही हैं कि नास्तिक मैं नह हूँ। सियारामशरणजी को तो उन्होंने एक बार तमक कर कहा कि आपसे किसने कह दिया कि मैं नास्तिक हूँ।
शास्त्रीजी ने लिखा है कि पिछले दो दशकों में वे उत्तरोत्तर भागवत सत्ता की ओर अपनी अन्तर्यात्रा में अग्रसर होते गए हैं। (219)।
उनसे बातचीत में शास्त्रीजी ने पाया कि वे आत्मा की अमरता को मानते थे; परमात्मा को भी मानते थे; और, यह भी कि साधना द्वारा आत्मा का परमात्मा में विलय संभव है। (219)। उन्होंने स्वीकार यह भी किया कि उनके उत्तर काव्यों में भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति भी होने लगी है। (219)। इसी अवधि में वे स्वामी अखण्डानन्दजी की ओर भी आकर्षित हुए थे। वृन्दावन-शिविर स्वामीजी के आश्रम में ही हुआ था! इसे देखते हुए उनके (याने अज्ञेय के) धार्मिक-आध्यात्मिक विचारों पर कुछ प्रभाव स्वामीजी का भी संभव है। प्रभावित वे कृष्णमूर्ति से भी हुए थे। लेकिन उनकी यह धर्मोन्मुखता जीवन-जगत से पलायन नह थी। वे इस राह से जगत को अधिक सारयुक्त बनाने की अन्तर्दृष्टि पाना चाहते थे।
हिन्दू धर्म में सभी धर्मों के प्रति आदर का भाव जो अन्तर्गुंफित मिलता है, उसे देखते हुए उनका मत था कि भारत में हिंसक क्रांति सम्भव नह है। लोकतंत्र भी पडोसी देशों की अपेक्षा यहाँ अधिक टिकाऊ होगा। (223)। उनके इन विचारों की पुष्टि उनके पत्रकारी लेखन से भी होती है और रचनात्मक सर्जन से भी।
अज्ञेय से मिलने से पहले तक शास्त्रीजी संकोच में थे। मिलते रहने के बाद उन्होंने लिखा कि वे मिलते सभी से सहज भाव से थे, पर खुलते किससे कितना थे, कहना कठिन है। (210)।
वैसे, इस विषय पर लेखकों के अनुभव अलग-अलग रहे हैं। कुछ लेखकों का मानना है कि उनके गुरू-गम्भीर रूप ने उनक सहज रूप को आच्छादित कर दिया था।
कृष्ण बलदेव वैद का मत है कि सहज वे कभी रहे ही नह। सदैव गुरु-गंभीर ही बने रहे। यह गम्भीरता उनका नकाब थी। इसीलिए अपने काल्पनिक इंटरव्यू के प्रारम्भ में ही वे उनसे कहते हैं कि पहले आप अपना नकाब उतार दीजिए, फिर बातें होंगी। छायामूर्ति उत्तर देती है कि जिसे आप लोग नकाब समझते रहे, वही मेरा असली चेहरा है। (546)।
एक गम्भीर चिन्तक-कवि-उपन्यासकार के चेहरे पर गुरु-गम्भीरता का भाव बना रहे तो उसे स्वाभाविक ही कहा जाएगा। सभा-सम्मेलनों में और विचार-विमर्श के समय ही नह, कविता-पाठ के अवसर पर भी अज्ञेय गम्भीर मुख-मुद्रा में ही होते थे। यह उनका सहज रूप ही होता था।
मनोहर श्याम जोशी ने भी यह लिखते हुए कि वे अन्यथा कुछ हो ही नह सकते थे, गम्भीरता को ही उनका सहज रूप माना है। (54)। अवश्य ही, जागतिक सम्बन्धों से उनकी असम्पृक्ति को उन्होंने कुछ अतिरेकी महत्त्व दिया है, यह कहते हुए कि न वह किसी का सुख-दुख जानना चाहता है और न वह किसी को भी अपना व्यक्तिगत सुख-दुख बताता है। (54)।
चन्द्रकान्त बान्दिवडेकर यह कहते हुए उनकी इस असम्पृक्ति को और भी अति पर ले गए हैं कि आंतरिक स्नेह से गहरे स्तर पर जुडे व्यक्ति की मृत्यु की वार्ता सुनकर तीव्र मानसिक आघात के क्षण को भी वे चुपचाप झेल लेते थे। (444)। यह गुण मनस्वी में होता ही है, लेकिन उसे इस तरह का अभिधायी रंग देने का भी कोई औचित्य नह है कि वे स्नेहीजन की मृत्यु से भी अविचलित रहते थे! ऐसा मान लेने पर उन्हें हृदयहीन या फिर अति-मानवीय कहना होगा। क्या वह उचित भी होगा ?
इसमें संदेह नह कि ऐसा मानसिक संतुलन गहन अनुशासन बल्कि साधना से ही साधा जा सकता है, लेकिन उन्होंने इसे जो स्पृहणीय विशेषता के रूप में देखा है, उससे सहमत होना कठिन है।
कहीं-न-कहीं चन्द्रकान्तजी को भी उनकी निस्पृहता को निरपेक्षता की सीमा तक ले जाना अखरा अवश्य है। लोगों की आड में ही सही, उन्हें भी इसमें हृदयहीनता ही दिखाई पडी है। उनका टैक्सी-ड्राइवर भी, जो घण्टे भर तक चन्द्रकान्तजी का बोलना सुनता रहा और साथ बैठे साब की चुप्पी लक्ष्य करता रहा, आखिर बोल ही पडा, साब, राइटर बहुत बडे होंगे, लेकिन घमण्डी बहुत लगते हैं। (444)। ड्राइवर का कथन तो यह है ही, लेकिन स्वयं लेखक के किसी मनो-स्तर ने भी इसमें अपनी व्यंजना नह पाई है, इससे इन्कार कैसे किया जाएगा? अन्यथा, संस्मरण में ड्राइवर-प्रसंग की आवश्यकता ही क्या थी ?
इस सन्दर्भ में व्यक्ति-अज्ञेय के उस पक्ष को भी हम ओझल नह कर सकते जिसमें हम पाते हैं कि बीमार मुक्तिबोध और एम.एन.रॉय को देखने वे जिदपूर्वक गए थे! और, बीमार रेणु और शमशेर को देखने के लिए तो उन्होंने लम्बी यात्राएँ भी की थीं।
गिरिराज किशोर ने अपनी और शान्ति की नौकरी पर आए संकट के निवारण में उनको जो चिंतित और यत्नशील पाया था, उसकी अनदेखी हम कैसे करेंगे? याने उस असामान्य के भीतर एक सामान्य मनुष्य भी बसता था। तात्पर्य यह कि उनके वास्तव को पाने के लिए हमें उनके सभी पहलुओं को देखना होगा।
नरेश मेहता ने व्यक्ति-अज्ञेय की असामान्यता को एक अलग ही कोण से देखा है। उन्होंने लिखा है कि यदि उनके साथ तत्कालीन मित्रों, लेखकों ने समवयस्कीपन का भाव और आचरण किया होता, तो वात्स्यायन काफी कुछ सहज हो सकते थे। पूरी तरह उनके मानवीकरण या साधारणीकरण की आशा तो बेकार ही थी। (84)।
अपनी इस असामान्य गम्भीरता, इस असहजता को चाहे उन्होंने आत्मानुशासित जीवन जी कर अर्जित किया हो, चाहे मित्रों ने उनक महिमा-मण्डित किया हो, अधिकतर का मानना यही रहा है कि उनके व्यक्तित्त्व में अभेद्य गुरु-गम्भीरता थी। लेकिन उनके मानवी-रूप की अवहेलना को उचित नह कहा जा सकता। अवश्य ही, यह गम्भीरता इतनी सघन होती थी कि मनोहर श्याम जोशी कहते हैं कि अनेक बार यह अनेक लेखकों में हीनता जगाती थी। कईं एक तो उनके पास जाने से ही हिचकते थे!
राजेश जोशी का भी अनुभव कुछ ऐसा ही रहा। उनके संस्मरणों में अज्ञेय के व्यक्तित्त्व का जो विश्लेषण हुआ है, उससे उनके व्यक्तित्त्व के इस पक्ष को समझने में कुछ सहायता मिलती है। उन्होंने लिखा है कि अज्ञेय की छवि ऐसी थी कि वे सहजता से अपने निकट आने की इजाजत नह देती थी। वे आसानी से नह खुलते थे। उनके व्यक्तित्त्व की भव्यता और उनके कवि का वैभव ही नह, उनकी जानकारियाँ की बहुलता का भी एक आतंक था। उनके निकट जाने में एक संकोच भी होता और एक किस्म का डर भी बना रहता। यह छवि साहित्यिकों के बीच शायद कम ही टूट पाती थी। साहित्य की दुनिया से बाहर, लेकिन अज्ञेय को देखना शायद अलग अनुभव था। (711-712)।
रंगश्री की बैठक में भाग लेने अज्ञेय भोपाल आए थे। बैठक में राजेश भी थे। बैठक के बाद राजेश ने देखा, प्रभात गाँगुली ने उन्हें सिगरेट देनी चाही; वे पहले तो झिझके, फिर ले ली। ऐसे ही, असमय होते हुए भी पीने का गिलास भी उठा लिया। इससे राजेश की धारणा बनी नह, मित्रों के बीच ही खुलते थे। ये अज्ञेय ही सहज अज्ञेय थे यद्यपि जैसा कि हम देखेंगे, मित्रों के लिए भी उन्होंने सीमा-रेखा खींच रखी थी।
अज्ञेय का एक अधिक सहज रूप परिजनों के बीच दिखाई पडता है; चाहे प्रातःकालीन नाश्ते के समय, चाहे शारदीय चाँदनी के उत्सव में। जब वे मेहमानों को खिला-पिला रहे होते हैं, तब अधिक खुले होते हैं। अज्ञेय के यहाँ नाश्ते का और उसमें उनकी तल्लीनता का जो चित्र मानस ने अंकित किया है, वह अज्ञेय के जीवन का विरल चित्र है।
खुशी बाँटने से बढती है, यह वे जानते थे और उसके लिए वे अवसर निकाल लेते थे। एक बार नई किताब छप कर आई, तो इलाजी से बोले, रामकुमार के यहाँ चलकर सैलिब्रेट करेंगे। याने परिजनों की तरह ही गहरे परिचितों और आत्मीयजनों के बीच वे सहज होते थे।
उनकी सहजता अपने लिए और भी खुला आँगन पाती थी, जब वे बच्चों के बीच होते थे। वहाँ उनके वात्सल्य को खुलकर खेलने का अवसर मिलता था और वे उसका अकुण्ठित आनन्द उठाते थे। वात्सल्य के अनेक प्रसंग लेखकों के संस्मरणों में आए हैं लेकिन पुष्पा भारती ने अपने बच्चों के साथ अज्ञेय के खेलने का जो वर्णन किया है, वह खूब खिलन्दडा है। तरह-तरह के खेल खेलने के बाद बच्चे अज्ञेयजी की दाढी से खेलने लग गए! यह जानने के बाद कि अंकल अपनी दाढी मेले से लाये हैं, बच्चे जिद करने लगे कि वह नरम-मुलायम दाढी उन्हें दे दी जाए। उनकी मम्मी ने समझाया, कल वे उन्हें बाजार से ला देंगी, बच्चे कहने लगे, दूसरी दाढी अंकल को ला देना, हमें तो अंकल की दाढी ही चाहिए! (782)।
मुक्तजी परिवार में हम उन्हें मन्द-बुद्धि महिमा के गंदे बिस्तर पर कंकड-पत्थर से खेलते देखते हैं। शालिनी, बालकनी में बैठी हुई फूलों से खेल रही थी। अज्ञेय ने पूछा, क्या कर रही हो, तो उनकी बुद्धि पर तरस खाती हुई बोली, इतना भी नह समझते? अज्ञेय इस वाक्याँश को दोहरा कर इसका रस लेते रहे।
विद्या बिन्दु सिंह अज्ञेय के भाषण में अपने बेटे को साथ ले गई। बच्चा व्याख्यान क्या सुनता, वह बैठा-बैठा अज्ञेय का स्कैच बनाता रहा। व्याख्यान के बाद अज्ञेय उधर से निकले, तो बच्चे का बनाया स्कैच देखा और बडी ममत्व भरी दृष्टि से उसे निहारा। विद्या अभिभूत हो गई। (825)। शायद अज्ञेय को मेरठ-सम्मेलन याद आ गया होगा। एक सभा में एक के बाद एक वक्ता मंच पर आ रहे थे। श्रोताओं के बीच, प्रफुल्ल चन्द्र ओझा मुक्त के पास बैठे अज्ञेय हर वक्ता का स्कैच बना रहे थे! (141)।
इस प्रसंग में हम यह भी याद कर सकते हैं कि गंगाप्रसाद विमल अपने शरारती बच्चे को स्पेतोफन खिलौना देने का वादा करके ही चुप करा पाए थे। उस समय अज्ञेय बीच में बोले, वह तो मैंने लाकर रखा है, तुम आकर ले लेना। दूसरे दिन घर बुलाकर उसे वह खिलौना दिया भी। (697)। लगता है, वे जब विदेश जाते थे, कोई अनूठा खिलौना देखते, तो ले आते थे। उपयुक्त पात्र बच्चा दिखाई पडता तो उसे दे देते थे। वे देने का आनन्द भी खूब उठाते थे और उसमें खूब सहज होते थे।
उनका खूब खुलना हम कुछ और प्रसंगों में भी देखते हैं। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में कुलपति सुमनजी ने प्रभात कुमार भट्टाचार्य के निर्देशन में उत्तर प्रियदर्शी का मंचन करवाया था। प्रस्तुति देखने के लिए अज्ञेय भी आमंत्रित थे। प्रभावी प्रदर्शन ने अज्ञेय को खुशी से इतना भर दिया कि वे अपने को रोक नह सके; मंचन की समाप्ति पर सीधे मंच पर गए और प्रभात को गले लगा लिया। उत्कृष्ट निर्देशन के लिए उनकी अकुण्ठित प्रशंसा की। इस दृश्य पर चकित सुमनजी ने प्रभात से कहा, तुम खुश-किस्मत हो प्रभात। अज्ञेयजी इतनी खुल कर तारीफ नह करते। अज्ञेय के विषय में यह एक आम धारणा थी। लेकिन तत्काल इसका प्रतिवाद करते हुए अज्ञेय बोले, यह आपसे किसने कह दिया, सुमनजी! मैं खुल कर तारीफ भी करता हूँ, मगर फिजूल नह। (869)।
वे इस बांग्ला-परिवार से खूब खुल भी गए थे। प्रभात की पत्नी का नाम प्रणति था। प्रभात उन्हें प्रनोति बुलाते थे। ण का उच्चारण टाल देते थे; पूछने पर उन्होंने बताया, ण कर्कश ध्वनि है। अपनी प्रिय (कोमल) पत्नी के नाम में मैं कर्कश ध्वनि कैसे आने दे सकता हूँ। यह उत्तर सुनकर अज्ञेय अपनी हँसी रोक नह सके; उनकी मुस्कराहट खिलखिलाहट में बदल गई। (875)।
हम स्मरण कर सकते हैं कि रामगोपाल बजाज ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अपने छात्र-काल में उत्तर प्रियदर्शी के मंचन के लिए कई प्रयत्न किए थे। लेकिन नामचीन विद्वानों ने उसका विरोध किया था। बजाज अपने संस्मरणों ने विद्यालय की भीतरी राजनीति को अच्छी तरह उजागर किया है। बहरहाल।
अज्ञेय के खुलकर हँसने के दो प्रसंग लेखनीय हैं। अमरकण्टक के सह-यात्री राजेन्द्र मिश्र ने उनको अपनी बांग्ला भाषी खास से मिलवाया। उन्हें उनसे बांग्ला में बातें करते देखकर मिश्रजी को विस्मय हुआ। यह चुप्पा कवि अड्डा मारना भी खूब जानता है! आपसे पट जाए, तो आपको घण्टों बाँधे रख सकता हैं।
एक अन्य प्रसंग के साक्षी जवाहरलाल कौल रहे। अज्ञेय का एक किसान-मित्र उनसे मिलने उनके कार्यालय में पहुँच गया। क्रांतिकारी दिनों में अज्ञेय उसके घर में छिपकर रहते थे। उसे पहचान कर तपाक से उठे और उसका स्वागत किया। हँसी-मजाक का दौर चला। कौल ने पहली बार देखा कि वात्स्यायन इतने भी अज्ञेय नह थे! वे खुलकर हँस भी लेते हैं, मजाक कर सकते हैं और सह भी सकते हैं। लेकिन यह हास्य-विनोद का वातावरण अधिक देर तक नह रहा क्योंकि किसान तो वही किसान था, लेकिन वात्स्यायन अज्ञेय हो चुके थे। (904)।
मित्र ने सर्वथा सहज और अनौपचारिक भाव से उनसे पूछ लिया, शादी-वादी कर ली है न! बच्चे-वच्चे हैं कि नह। लेकिन इन प्रश्नों ने ही जैसे विनोद के वातावरण को बोझिल बना दिया। सुहास सु उडि गयो हंस की नाई। लगा, खुला आकाश जैसे घटाओं से घिर गया हो।
सामान्य धारणा तो यही होती है कि अज्ञेय के दो-एक बाल-मित्र होते, सर्वथा अनौपचारिकता बरत सकने का हक रखने वाले मित्र, तो उनका जीवन ज्यादा खुला। होता लेकिन यह घटना दर्शाती है कि अज्ञेय के लिए यह बात लागू नह होती। उन्होंने कहीं कहा है कि एक सीमा है जिसके आगे मैं अस्पृश्य रहना ही पसन्द करता हूँ। (482)। वह सीमा ऐसे पारिवारिक प्रश्नों से ही बनी जान पडती है। दूसरों के जीवन के पारिवारिक प्रश्न नह छेड कर ही वे यह संदेश देते जान पडते हैं कि उनके इस जीवन-क्षेत्र में दूसरों के प्रवेश पर निषेधाज्ञा है।
कौल का मत है कि खुलापन ही उनका सहज रूप था, गम्भीरता वे धारण कर लेते थे, लेकिन प्रश्न यह है कि एक गम्भीर चिन्तक हर समय खुला भी कैसे रह सकता है। इन संस्मरणों से हमें ज्ञात होता है कि उनके जीवन का एक पक्ष उनका खुलापन भी था। उसे उनका मूल रूप चाहे न भी कहें, उसका आकलन किए बिना उन्हें अधूरा ही पाया जा सकता है। अस्तु।
प्रसंगवश हम यहाँ उनके आत्मीय-वृत्त पर भी कुछ विचार कर सकते हैं। साहित्य-जगत में प्रचलित धारणा यह रही है कि जिन लेखकों ने उन पर प्रशंसात्मक लिखा है, वे उनसे घिरे रहते हैं। वैसे तो जिन लेखकों ने उन पर विवेकसंगत लिखा, वे उनके आत्मीय रहें, यह स्वाभाविक ही है, लेकिन तथ्य यह है कि इन संस्मरणों में ऐसे साक्ष्य कहीं नह हैं जो उनके सदा कुछ लोगों से घिरे रहने की पुष्टि करते हों। सच्चाई तो यह है कि आत्मीय वृत्त में अधिसंख्य व्यक्ति वे रहे जिन्होंने शायद ही कभी उन पर कुछ लिखा हो! अतः इस वृत्त पर किया गया व्यंग्य ईर्ष्याप्रसूत ही अधिक जान पडता है।
आत्मीय-वृत्त के लेखकों के संस्मरणों को देखें, तो उनमें चरित-नायक के व्यक्तित्त्व को समझने या उनकी विशेषताओं के निदर्शन का प्रयत्न ही अधिक मिलता है, उनमें महिमा-मण्डन की प्रवृत्ति नह, मिलती है; स्वयं लेखकों का आत्म-प्रक्षेपण चाहे जहाँ-तहाँ मिल जाए।
अपने जीवन-तथ्य अज्ञेय ने रामकमल राय के अलावा विद्यानिवास मिश्र से भी साझा किए थे यद्यपि उनकी लिखी जीवनी मेरे देखने में नह आई है। अपने संस्मरणों में उन्होंने देश-विदेश में अज्ञेय के साहचर्य को याद किया है। उन पर विदेशी होने का आक्षेप किया जाता रहा है, उस सन्दर्भ में मिश्रजी ने लक्ष्य किया कि देश हो या विदेश भारत, भारतीय नारी, भाषा और संस्कृति का उपहास तो क्या, उस पर ठेस भी उन्होंने कहीं भी बर्दाश्त नह की। दिल्ली में रहें, चाहे बर्कले में, जहाँ भी रहते, वहाँ उनके व्यक्तित्त्व की छाप अवश्य रहती थी।
उनके व्यक्तित्त्व का विवेचन करते हुए मृदुला गर्ग ने लिखा है कि उनका सब कुछ तराशा हुआ होता था। मिश्रजी का मत है कि यह तराश उनकी आत्मा में गहरे तक गई है। उनका समस्त साहित्य उनका आत्मान्वेषण ही जान पडता है। मानस मुकुलदास ने भी कुछ ऐसा ही मत व्यक्त किया है।
नन्दकिशोर आचार्य के संस्मरण में उनका एक पर्यवेक्षण ध्यान आकर्षित करता है। उनका कहना है कि वात्स्यायनजी के साहित्य और व्यक्तित्त्व का बहुत निम्न स्तर पर जाकर विरोध करने वालों को मैंने उनकी उपस्थिति में गद्गद् भाव से प्रशंसा करते देखा है। (327)। वस्तुतः उनकी प्रशंसा करके वे उनकी दृष्टि में अपने निरावृत्त हो चुके पक्ष को ढँकने का विफल प्रयत्न करते थे।
अज्ञेय की कविता में कहीं-कहीं व्याख्या की शिकायत करने वाले आचार्य इस ओर से बेखबर ही रहे हैं कि व्याख्या ने उनके संस्मरणों में भी घुसपैठ पाई है।
यहाँ हम वेद प्रकाश बटुक का स्मरण कर सकते हैं। अज्ञेय-विरोधियों का बौनापन उन्होंने भी दिखाया है। (729)। बटुक स्वयं को अज्ञेय-परिवार के अधिक निकट मानते थे।
रमेशचन्द्र शाह ने अपने प्रति अज्ञेय की आत्मीयता उनके पत्रों में भी दिखाई है और व्यवहार में तो इतनी कि प्रस्थान के लिए बाँधा हुआ सामान भी उन्हें खोलना पड जाता था! उस गुरु-गम्भीर व्यक्तित्त्व का पूरक पक्ष भी उन्होंने देखा था; वे तीव्र भावावेगों के व्यक्ति थे; छोटी-सी बात पर रूठ जाते थे, तब उन्हें मनाना पडता था। इसी तरह, छोटी-सी बात पर वे मोद-मगन भी हो जाते थे। यह उनका सहज रूप था। शाह इस दिशा में कुछ बढते तो संस्मरण का मैं केन्द्रित रूप कुछ सन्तुलन भी पा लेता।
राजी सेठ अपने शब्द-चयन में जितनी अतिरिक्त सतर्कता बरतती है, वैसी ही कुछ विधायी सजगता भी रखतीं, तो इस संस्मरण में उनका आत्म-प्रक्षेपण संयत हो सकता था। तत्सम को लेकर किया गया विमर्श आलोचना की वस्तु अधिक है, वे उसे संस्मरण की बना पाती, तो वह उनकी बडी सफलता होती। अवश्य ही, प्राची उनके हाथों स्मरणीय चरित्र बन गई है; उससे अज्ञेय का वात्सल्य भी उभरा है।
निर्मला ठाकुर श्रीराम वर्मा की राह से अज्ञेय से परिचित हुईं। धीरे-धीरे अपने सांगीतिक कौशल के बल पर वे उनकी आत्मीय बन गई। उनकी कुछ कविताओं को उन्होंने सुर दिया था, उसे उन्होंने पसन्द किया। वे चाहते थे कि इस दृष्टि से कविताएँ चुनकर उन्हें भी सुर-बद्ध कर दिया जाए, परन्तु वे यह कार्य कर नह सकीं।
अज्ञेय के आत्मीय-वृत्त में ऐसे लेखक भी कम नह रहे जिन्होंने उनके साहित्य पर तो शायद ही कुछ लिखा (कुछ लिखा भी हो तो मुझे उसकी जानकारी नह है।) परन्तु उनके संस्मरण बताते हैं कि उनसे सम्बन्ध उनके घनिष्ठ हो गए थे। रामगोपाल बजाज से उनके सम्बन्ध ऐसे ही थे। उनसे होती रहने वाली भेंट में अज्ञेय ने लक्ष्य किया कि कविता-वाचन का गुण उनमें कुछ विशेष है। उन्होंने चाहा कि वे अपनी अभिनेता-चाचिक की दृष्टि से उपयुक्त कविताओं का चयन कर दें ताकि उनका पृथक संग्रह प्रकाशित करवाया जा सके। लेकिन स्वयं बजाज अपनी चयन-दृष्टि के प्रति आश्वस्त नह थे इसलिए इस कार्य को टालते ही रहे, नतीजतन अज्ञेय की यह इच्छा भी पूरी नह हो सकी।
कैलाश वाजपेयी अपने फ्री-लांसिंग दिनों में अज्ञेय के ज्यादा निकट आ गए थे। वे हर तरह की सांस्कृतिक-साहित्यिक सहायता लेने अज्ञेय के पास आ जाते थे। विवाह के बाद उनकी पत्नी भी साथ आने लगी। कपिलाजी की उससे पटने लगी, तब सम्बन्धों में और भी प्रगाढता आ गई।
रमेश ऋषिकल्प ने पत्रकारिता का प्रशिक्षण उनसे पाया। उन्होंने उनको लोगों का इंटरव्यू लेना और लिखना सिखाया। उनकी उनसे पारिवारिक निकटता हो गई थी। उनके विवाह पर अज्ञेय ने बहुमूल्य उपहार दिया था। बाद में, इलाजी को नाराज करके भी इस परिवार ने आई.आई.सी. में उनसे मिलना जारी रखा।
प्रयाग शुक्ल को चित्रकारों से मिलने व प्रदर्शनियों की रिपोर्टिंग की दिशा में उन्होंने ही प्रेरित किया। कैसे अपना मन्तव्य दूसरे पर थोंपे बिना, सिफल सांकेतिक विधि से कार्य करना वे सिखाते थे, इसे प्रयाग शुक्ल ने कृतज्ञतापूर्वक याद किया है।
रघुवीर सहाय सम्पादन कार्य में उनके (अज्ञेय के) सहायक रहे। कोई कार्य वे सहायक से किस रूप में चाहते थे, उसे वे बोल कर नह समझाते थे, वैसा स्वयं करके संकेत दे देते थे। उनसे इस तरह मिले शिक्षण ने उन पर जो गहरा प्रभाव डाला और जो आगे भी हर समय लिखते वक्त उनकी चेतना का नियामक रहा, इसे उन्होंने नपे-तुले शब्दों में व्यक्त किया है और इस शिक्षण के लिए उनका कृतज्ञ स्मरण किया है।
मनोहर श्याम जोशी ने व्यक्ति-अज्ञेय को और उसके आचरण-व्यवहार को भी ध्यान से देखा-समझा था और साहित्य-जगत पर उनके व्यक्तित्त्व के प्रभाव का आकलन भी किया था। संस्मरणों में उन्होंने इस पक्ष पर और स्वयं पर उनके प्रभाव का वस्तुनिष्ठ विवेचन किया है।
पवन चौधरी मनमौजी ने अज्ञेय से परामर्श ले-लेकर विधि विषयों पर लिखना प्रारम्भ किया और शीघ्र ही उनके इतने निकट चले गए कि एक दिन उनसे अपने मकान का शिलान्यास करने तक का अनुरोध कर डाला! अधिक विस्मयकारी यह रहा कि उन्होंने उनका अनुरोध स्वीकार भी कर लिया! और, एक दिन शिलान्यास कर भी दिया! फिर, गृह-प्रवेश के अवसर पर भी गए! अज्ञेय की सहजता का यह रूप चकित करता है!
उनके सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति का संचरण-क्षेत्र इतर भाषा या कला रही हो, तो वह उन्हें सहज ही प्रिय हो जाता था। चित्रकार रामकुमार तो उन्हें इतने प्रिय रहे कि उनको उन्होंने एक मेज बनाकर भेंट की! जर्मन अनुवाद में सहायक होने की वजह से लोठार लुत्से उनके प्रिय हो गए। अंग्रेजी अनुवाद में सहायक होने के नाते हरीश त्रिवेदी उनके आत्मीय हुए; मानस दास के मित्र होने के नाते से प्रवेश तो उन्हें पहले ही मिल ही गया था! उर्दू में उनकी गति किंचित जाँच कर उन्होंने शीन काफ निजाम को भी आत्मीय बना लिया और उन्हें हिन्दी विद्वानों के साथ विमर्श के लिए अवसर भी दिया! एलियट के काल-चिन्तन जैसे जटिल विषय में रुचि देखकर उन्होंने अंजु ढड्ढा मिश्र को शिविर में आमंत्रित किया।
रुचि-समधर्मिता भी अज्ञेय को आकर्षित करती थी। बालिका शम्पा की पॉटरी में रुचि ने उनका ध्यान आकर्षित किया था। अपने बचपन से ही जब-तब घर में आते रहने वाले अज्ञेय का स्नेह पाकर ही वह बडी हुई थी। अपनी पॉटरी में उन्हें रुचि लेते देखकर वह प्रफुल्लित हो गई। उसका संस्मरण उसकी इस प्रफुल्लता की खूब सधी हुई और प्रभावी अभिव्यक्ति है।
अज्ञेय की गहरी रुचि फोटोग्राफी में थी। यही रुचि ओ. पी. शर्मा से उनकी निकटता का आधार बनी। जानकी-जीवन यात्रा में अज्ञेय के काफिले को कुछ सिरफिरे युवकों ने रोक लिया। उस घोर अँधेरी रात में समूह का फोटो खींचने का सवाल आया। यदि काफिले की सभी गाडियों की एकत्र हैड-लाइट समूह पर केन्द्रित की जाए, तो फोटो सम्भव हो जाएगा, इस सूझ ने उस रात की विकट घडी को स्मरणीय प्रसंग बना दिया।
इस विवेचन से देख सकते हैं कि जिनमें उन्होंने अपने प्रति जिज्ञासा पाई और जिनमें सदाशयता, निरछलता और प्रतिभा देखी, उन्हें आत्मीय बना लिया। स्पष्ट है, आत्मीय वृत्त पर लगाए गए माचवेजी, अंचलजी आदि के आक्षेप रुग्ण मनोवृत्ति-प्रसूत ही थे।
कुछ लेखकों ने स्मरणीय प्रसंग विरल होने पर भी संस्मरण लिखे हैं। कृष्णदत्त पालीवाल, अंचल जैसे लेखकों ने संस्मरण के अभाव की पूर्ति नायक के साहित्य के विवेचन से की है। जवाहर लाल कौल ने तो स्मरणीय प्रसंगों के रहते भी अज्ञेय की भाषा के विवेचन का लोभ सँवरण नह कर पाए हैं। ज्योत्स्ना मिलान उनकी कविता के विवेचन में प्रवृत्त हुई हैं जबकि वस्तु वह आलोचना के क्षेत्र की है। अर्चना वर्मा तो, इस दृष्टि से देखे, तो अपनी जानकारी के प्रदर्शन के लोभ में ज्यादा ही भटक गई हैं।
कुछ संस्मरण ऐसे भी हैं जो अज्ञेय को समझने के लिए अपरिहार्य हैं, उनके लेखक उनके अधिक निकट चाहे न भी रहे हों।
व्यक्ति अज्ञेय की विनम्रता और सेवा-भावना विष्णु प्रभाकर के संस्मरण में मिलती है, तो उनकी अडिग दृढता और मूल्यों के लिए उनके आग्रह ने अपनी चरितार्यता अरुणेश नीरन के संस्मरण में पाई है। अज्ञेय का पैंसठवाँ जन्मदिन कुशी नगर में मनाया गया था। जल-पान एक नेताजी की कोठी पर होना था। इन नेताजी ने अज्ञेय-संस्थान के लिए दस हजार रु. देने का प्रस्ताव किया था। समारोह स्थल से अतिथियों को कोठी तक एक वयोवृद्ध सज्जन मजीठियाजी अपने वाहन से ले गए। अतिथियों की पहली खेप कोठी पर पहुँची कि मजीठियाजी को देखकर नेताजी भडक गए। उन्होंने मजीठियाजी के साथ दुर्व्यवहार किया। अज्ञेय इसे देखते रहे। जब सभी अतिथि पहुँच गए और जल-पान का अनुरोध दोहराया गया, तब अज्ञेय खडे हुए और बोले, चलो। उनके साथ सभी खडे हुए और बाहर निकल आए। जब कारण पूछा गया, तब उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति व्यवहार में वृद्ध व्यक्तिके साथ शिष्टता भी नह बरत सकता, उसके यहाँ खान-पान कैसा! उन्होंने अरुणेशजी से कहा कि उस व्यक्ति द्वारा दी गई राशि लौटा दी जाए। एक अन्य प्रसंग में उन्होंने चाँदी के बर्तनों में भोजन करने से इंकार कर दिया और स्टील की प्लेट में खाया। ऐसे प्रसंग दैनन्दिन आचरण में मूल्यों के निर्वाह के प्रति उनकी सजगता और दृढता दर्शाते हैं।
कवि अज्ञेय को समझने के लिए प्रभाकर श्रोत्रिय के संस्मरण के दो प्रसंग द्रष्टव्य हैं। दोनों सभाओं में अज्ञेय मौजूद थे बल्कि उन्होंने वहाँ भाषण भी दिया, परन्तु बार-बार अनुरोध किए जाने पर भी कविता-पाठ नह किया। कारण शायद यह था कि कविता-पाठ पूर्व-निर्धारित नह था। वे चाहते थे, कवि की तरह ही कविता को भी मान दिया जाए। श्रोत्रिय का कहना है कि अकस्मात आग्रह पर कविता नह पढकर उन्होंने अपनी पीढी को भी अनकहे प्रशिक्षण दिया था। (649)। अकस्मात भाषण करने का कुलपति बालकृष्ण राव का अनुरोध भी उन्होंने स्वीकार नह किया था।
रमेश मेहता ने जम्मू में उनके काव्य-पाठ की व्यवस्था की थी, लेकिन व्यवस्था को लेकर जब उन्हें ज्यादा चिंतित देखा, तो पूछ ही लिया कि आप इतने चिंतित क्यों हैं ? इस पर उन्होंने उत्तर दिया, मैं काव्य-वाचन को एक परफोर्मेंस मानता हूँ इसीलिए काव्य-वाचन से पहले आवश्यक तैयारी करना जरूरी समझता हूँ। (858)। यह उत्तर काव्य-पाठ के नकार का औचित्य भी समझा देता है।
इस नियम से हटकर वाचन करते भी हम उन्हें देखते हैं लेकिन वहाँ या तो श्रोता-समूह उनके काव्य का रसिक होता है या फिर वह उनके काव्य का उपजीव्य। अतः वहाँ विरोधाभास नह रहता।
अज्ञेय के चिर-प्रतिद्वन्द्वी रहे नामवरजी के संस्मरण हमारा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। इन दिग्गजों की गंगा-यमुना का संगम जोधपुर बना। कुलपति वी. वी. जॉन अनभिज्ञ नह थे कि वे जिन दिग्गजों को विश्वविद्यालय में ला रहे हैं, वैमनस्य उनमें गहरा है। लेकिन नामवरजी ने अपने इन संस्मरणों में यथाशक्य उसे झलकने नह दिया है। नामवर तो आ गए थे, लेकिन अज्ञेय की राह में नियमों की अडचनें थीं। चतुर कुलपति ने अडचने दूर करने के प्रस्ताव नामवरजी से ही करवाए! अज्ञेय की अगवानी करने भी उन्हें ही भेजा। उदारता नामवरजी ने भी दिखाई कि अज्ञेय के स्वतन्त्र आवास का प्रबन्ध होने तक, कोई दसेक दिनों तक, उन्हें अपने साथ ही रखा। अज्ञेय भी दिल्ली से अपनी कार लाते समय नामवरजी को साथ लेकर आए। एक संगोष्ठी में भाग लेने दोनों साथ ही बीकानेर गए, साथ ही लौटे। वे यह लक्ष्य किए बिना नह रहे कि अज्ञेयजी कार बहुत अच्छी चलाते हैं।
उनके व्यवहार के बारे में अपना पर्यवेक्षण दर्ज करते हुए नामवरजी ने लिखा है कि कुल मिलाकर समूचा व्यक्तित्त्व जो वात्स्यायनजी का रहा, उसका एक स्तर था, उसके नीचे वे कभी नह गए। उनके व्यक्तित्त्व में शालीनता थी और उसकी एक मर्यादा थी। (164)।
अज्ञेय के साथ उनके सम्बन्धों पर जोधपुर-प्रवास के प्रभाव का आकलन करते हुए उन्होंने लिखा है कि एक बहुत बडा परिवर्तन हुआ था जोधपुर में साथ रहने के कारण। साथ रहे तो उससे एक-दूसरे को समझने का मौका मिला....... जोधपुर हमारे लिए तपोवन हो गया था। दो साल तक साथ रहने पर उनको नजदीक से जानने का बहुत मौका मिला।
यह उन्होंने नह बताया है कि वात्स्यायनजी से उनके सम्बन्ध बिगडे क्यों? लेकिन लिखा उन्होंने यह भी है कि वात्स्यायनजी से मेरा सम्बन्ध जोडने में प्रारंभ में भूमिका द्विवेदीजी की रही, तो बाद में वी. वी. जॉन और विद्यानिवास मिश्र की भी रही। लेकिन इतिहास गवाह है कि भूमिका किसी की भी काम नह आई। मनोमालिन्य का बडा कारण क्या रहा, इस पर कोई प्रकाश वे नह डालते।
अज्ञेय का आचरण तो स्वयं उन्होंने स्तर से नीचे गिरा नह पाया। जोधपुर को उन्होंने तपोवन कहा है, आचरण उसके अनुरूप ही था। परन्तु आगे चलकर वे यह कहते हुए अपनी ही बात उलट देते हैं कि उस शहर में हम दोनों साथ रहने के लिए अभिशप्त थे। तपोवन में ऐसा क्या घटा कि वहाँ जीवन शापित हो गया, इसका खुलासा संस्मरणों में नह है। आधा गाँव पाठ्यक्रम में लगाए जाने पर शहर में नामवर-विरोधी आँधी आ गई। अज्ञेय तब भी सैद्धान्तिक स्तर पर उनके साथ थे जबकि विश्वविद्यालय या बाहर साहित्यिक-जगत कोई भी उनके पक्ष में नह था।
जो हो, तब भी अज्ञेय अपने स्तर से नीचे नह गिरे। लेकिन जोधपुर छोडने के नामवरजी अपने अज्ञेय-विरोधी अभियान पर पुनः लौट गए और अज्ञेय को कोसने में जुट गए। अब, अज्ञेय की भाषा उन्हें गुलशन नन्दा के स्तर की लगने लगी तथा आकृति उनकी चिंपाजी जैसी नजर आने लगी। (436-37)। इस तरह, निकट आए दोनों दिग्गज फिर विरोधी हो गए।
ओम थानवी के संस्मरण हैं, उनका नाम अज्ञेय के गिने-चुने आत्मीय-जनों में लिया जा सकता है। कईं लेखकों ने लिखा है कि अज्ञेय कम खुलते थे और कम लोगों से खुलते थे, लेकिन थानवीजी का अनुभव यह भी रहा कि जिनसे खुल जाते थे, सब दीवार-खाइयाँ ढहा देते थे। ऐसे प्रचण्ड प्रसंग इन संस्मरणों में नह हैं, परन्तु पहले शिविर के लिए की गई लखनऊ-यात्रा में संभागियों का मनोविनोद कर रहे अज्ञेय में इसकी झलक थानवीजी ने दिखाई है।
अरण्य अज्ञेय को अच्छे लगते थे; बीहड, अनछुए बीहड और भी अच्छे। ऐसा ही बीहड वन-प्रान्तर उन्होंने अपने आवास के पार्श्व में ही बसा लिया था या कहें बसे हुए को उन्होंने काटा-छाँटा नह था, बने रहने दिया था। उनके निकट आने वाले सभी व्यक्तियों ने इसे देखा नह था; जिन्हें उन्होंने यह दिखाया था, ओम थानवी उनमें से एक थे।
इतवारी पत्रिका के सम्पादक के रूप में वे अज्ञेय के अधिक निकट चले गए। पत्रिका के लिए वे उनसे परामर्श लेते थे और पत्रिका का परिष्कार करते थे। इसी राह से वे धीरे-धीरे उनके परिवार के अंग बन गए। अपने पर्यवेक्षण से उन्होंने उनके वैयक्तिक जीवन की अनेक विशेषताओं को लक्ष्य किया, उनके ये संस्मरण इन्हीं का आलेखन हैं। शायद ही उनका कोई गुण हो, जिसे उन्होंने छोडा हो। उनके वर्णन में जगह-जगह उनकी निजता की छाप है।
ग्रन्थ के सम्पादन में जो वस्तुनिष्ठता और विशालता उन्होंने दिखाई है, वह इस प्रकृति के ग्रन्थों के लिए और पत्रकारिता के लिए भी, अनुकरणीय कही जाएगी।
इस ग्रन्थ पर किए गए विचार का समापन करने से पहले इसमें जहाँ-तहाँ मिलने वाली तथ्य एवं तिथिगत भ्रांतियों का उल्लेख करना भी अनुचित नह होगा।
इलाजी ने अज्ञेय की शिक्षा के लिए लिखा है - 1921 में बी.एससी/एम.ए (184)। 1911 में जिसका जन्म हुआ, वह 1921 में बी.एससी का छात्र कैसे होगा? इस ओर इलाजी का ध्यान गया ही नह है। मानस मुकुल दास को अज्ञेय के पुस्तकालय में अंग्रेजी-साहित्य के चैंबर-इतिहास के तीनों भाग मिले। इनमें से दूसरा व तीसरा भाग द्वितीय वर्ष विज्ञान के छात्र अज्ञेय को पुरस्कार में मिले थे। इन पुस्तकों की भीतरी जिल्द पर लिखा हुआ है- मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के द्वितीय वर्ष - 1926-27 के छात्र एस. एच. वात्स्थायन को जूनियर मिलर पुरस्कार के बतौर भेंट। (353)। स्पष्ट है, 1921 में अज्ञेय का जो बी. एससी. पास होना लिखा गया है, वह सही नह है।
लोठार लुत्से के आलेख में भी ऐसा ही गलत तथ्यात्मक उल्लेख है- अज्ञेय का देहावसान उसी दिन सुबह, उनके 76वें जन्मदिन से ठीक एक महीने पहले, हो गया। (197) जबकि निधन लगभग एक माह बाद हुआ। (जन्म 7 मार्च 1911, निधन 4 अप्रेल 1987)।
राजेश जोशी रंगश्री लिटिल बैले ट्रप की कार्य-समिति के सदस्य थे। उन्होंने लिखा है कि अज्ञेय रंगश्री लिटिल बैले ट्रुप के अध्यक्ष थे। 1984 से 1987 में मृत्यु तक अज्ञेय ही इसके अध्यक्ष रहे। (712)। उधर, अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि - यह संयोग ही हुआ कि उनकी अध्यक्षता का कार्यकाल समाप्त होने पर मुझे नया अध्यक्ष चुना गया। इस चुनाव में उनकी भी पूरी सहमति थी। (313)। जाहिर है, ये कथन विरोधी हैं। तथ्य की पुष्टि की जानी चाहिए।
इस बृहत् ग्रन्थ के अन्त में चरित-नायक के प्रमुख जीवन-प्रसंगों का तिथिवार उल्लेख होना चाहिए था। इसी तरह, उनकी कृतियों की सूची भी रहनी चाहिए थी। विस्तार भय से लेखकों का परिचय न भी रहे, उनके पते रहने चाहिए थे। इन बातों से ग्रन्थ की उपादेयता बढती।
कुल मिलाकर यह ग्रन्थ शताधिक लेखकों द्वारा अज्ञेय को दी गई श्रद्धांजलि है और उनके कृतित्त्व की तरह ही उनका स्मारक है। उनके जीवनीकार के लिए उनके जीवन के विषय में जानकारियों का यह अक्षय स्त्रोत है।
सम्पर्क - मनीष मंजिल, रघुनाथपुरा,
शिवांची गेट के भीतर, जोधपुर- ३४२००२
मो. ९४१३३४१४४१

* यह आलेख प्रो. मोहनकृष्ण वोहरा के अस्सीवें जन्मदिवस पर प्रकाशित चौपाल के एक विशेषांक में प्रकाशित हुआ है।