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पराजित कालरात्रि की गाथा

रंजना अरगडे
किसी भी देश की, उसकी सभ्यता की पराजित कालरात्रि कैसी हो सकती है, कितनी करुणा हताशा और एक हद तक वितृषणा से भरी हो सकती है, यह जानना और समझना हो, तो सुनील गंगोपाध्याय का सेई समय उपन्यास अवश्य पढना चाहिए। एकबारगी आपको ऐसा लगने लगे कि शुक्र है आप उस समय पैदा नह हुए थे। कोई समय ऐसा भी हो सकता है कि जब कोई व्यक्ति व्यापक समाज के हित में, अपने समय और समाज की बदियों और इसकी मर्यादाओं को लाँघने के लिए अपना सब कुछ दाँव पर भी लगा सकता है , यह जानने के लिए भी इस उपन्यास को पढना चाहिए। सम्पत्ति का अतिरेक मनुष्य को किस हद तक अ- नैतिक, अशिष्ट और अभद्र बना सकता है और धन का अभाव मनुष्य को कितना लाचार, मनुष्यत्व से हीन बना सकता है, क्या-क्या क्या नह करवा सकता यह लगभग प्रत्यक्ष देखने के लिए भी इस उपन्यास को पढा जाना चाहिए। समाज के पवित्र माने जाने वाले सम्बन्ध निजि स्वार्थ के कारण कितने अ पवित्र हो सकते हैं और कितने करुण अंजाम तक पहुँचा सकते हैं इसका भी ब्योरा इस उपन्यास में है। सामाजिक जीवन के सभी प्रकार के - अच्छे -बुरे, ग्राह्य-अग्राह्य अनुभवों का एक साथ ऐसा व्यापक और बारीक, सूक्ष्म चित्रण सेई समय में हमें मिलता है कि यह कहने का मन होता है कि इसमें जो कुछ है उससे बाहर संसार में कुछ भी नह है।
इस उपन्यास का समय प्लासी के युद्ध के बाद के बंगाल से आरम्भ हो कर 1857 की सिपाही कार्रवाई तक है। यह वही समय/दौर है। जमीनदारी का वैभव और पतनशीलता को, तीन परिवारों- सिंघ, मुखर्जी और मलिक परिवारों को केन्द्र में रख कर उसके इर्द-गिर्द के समाज और जीवन के माध्यम से, उजागर किया है। इस उपन्यास में विधवाओं, खास कर बाल विधवाओं के ना-उम्मीदी से भरे हताश जीवन का करुण चित्र आँका गया है। विधवा पुनर्विवाह के लिए ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के अथक प्रयासों को जानकर लगता है कि ऐसा व्यक्तित्व शताब्दियों में एकाध ही हो सकता है। केशवचन्द्र सेन तक आते आते ब्राह्मो समाज की रचना में क्या -क्या पापड बेलने पडे थे इसका विवरण यह बोध कराता है कि परम्परागत स्थापित धर्म से विद्रोह कर के नए धर्म की स्थापना करना खेल नह है। सहसा मन इस बात का अन्दाजा लगाने लगता है कि बुद्ध और महावीर का काम कितना कठिन रहा होगा। जो बातों और तथ्यों को हम इतिहास में दो पंक्तियो का स्थान देते हैं, वह हकीकत में कितनी दुश्वार होती हैं। स्त्री शिक्षा का पथ हिमालय चढने से भी अधिक कठिन था और आज भी जब लडकियों को पढाने के लिए आम जनता को इतना मनाना पडता है, तब लगता है कि ढाई सौ वर्षों में भी हम उस लक्ष्य को पूरी तरह पा नह सके हैं। जहाँ सफलता नह मिली है वहाँ आज भी सामाजिक जागृति की कितनी अधिक आवश्यकता है। इन अत्यन्त दुरूह और असंभव-सी राहों पर चलने वाले हमारे पूर्वजों के प्रति सिवा सिर झुकाने के और कोई भाव मन में नह आता। यह वह समय था जब बंगाली भाषा को काव्य क्षम बनाया जा रहा था। माइकेल मधुसूदन दत्त को यह श्रेय मिलता है। पर अंग्रेजी के जबरदस्त समर्थक मधुसूदन दत्त किस प्रकार यहाँ तक पहुँचते हैं, वह प्रक्रिया भी साधारण और सामान्य नह थी। यही वह समय था जब बंगाली नाटक का नव-जन्म हुआ। जात्रा से भिन्न, प्रशिष्ट नाटक के बीज इसी समय में बोए गए थे।
कम्पनी के अत्याचारों और अंग्रेजों की पक्षपाती नीति जैसे - जैसे उजागर होती है अंग्रेजी शासन के प्रति उपजते विद्रोह को इसी कथानक के बीच खोला गया है। नील की खेती के सन्दर्भ में किसानों के संघर्ष को मिलता जमीनदारों का समर्थन, वैश्या-पुत्र के शिक्षा सम्बन्धी अधिकार का कारुणिक परिणाम उस समय की शिक्षा व्यवस्था का चित्र खींचता है। यह वही समय था जब अभी तक मुस्लमानों के मन में यह उम्मीद थी कि अंग्रेजों का जाना इसलिए जरूरी था कि वे अपनी खोई सत्ता पुनः प्राप्त कर सकें। वाजिद अली शाह और बादशाह जफर के करुण अन्त के साथ मुस्लमानों के सपनों के टूटने की बे-रहम करुणा इस उपन्यास में अंकित है। कंपनी के अत्याचार पूर्ण व्यवहार का अर्थ मुसलमानों के लिए अलग था, प्रशिष्ट एवं प्रतिष्ठित हिन्दू वर्ग के लिए अलग था और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे दृष्टाओं के लिए अलग था। समर्थन और विरोध के बीच झूलते अंग्रेजों को हटाए जाने की अनिवार्यता का दृढ दृष्टकोण का निर्माण 1857 के बाद हुए अंग्रेजों के बदले की भावना से भरे अनावश्यक दमन में संभव होता है।
सम्पूर्ण महाभारत का बंगाली में अनुवाद भी इसी समय हुआ था। जाति गौरव के लिए जरूरी होता है भाषा के प्रति गौरव का भाव, सम्मान का भाव। अंग्रेजी भाषा के प्रति समाज के विशिष्ट वर्ग की बढती जाती प्रीति का सामना करने के लिए बंगाली भाषा अनुवादों में, कविता में, गद्य में, अखबारी लेखों के द्वारा संघर्ष कर रही थी। उस समय के कुछ जागृक विचारक यह काम कर रहे थे। ऐसे में कौतुक होता है कि हमारे अपने वर्तमान समय में भी भारतीय भाषाओं को अपनी जगह पाने के लिए भी संघर्ष करना पड रहा है। यह सोचकर लगता है कि वे प्रयास जो उस समय हुए थे, क्या नव-जागरण और स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी व्यर्थ ही चले जाएँगे?
अंग्रेजी के वर्चस्व की शिक्षा पद्धति जो क्लर्क पैदा करने के लिए अंग्रेजों ने आरंभ की थी उसके प्रति भी उस समय एक चेतना बनी थी जिसका परिपक्व परिणाम नव-जागरण काल में शांति निकेतन जैसी संस्थाओं में परिणमित हुआ। इसका संघर्ष भी प्रथम आलो में सुनील गंगोपाध्याय ने किया है।
लेकिन यह सब कुछ एक सशक्त औपन्यासिक कथ्य के बीच हमें मिलता है।
मुख्यतः सिंघ तथा मुखर्जी परिवार के बीच फैले इस कथानक के इतने अधिक जटिल और उलझे हुए कथा तन्तु हैं कि अगर मास्टर उपन्यासकार नह हो, तो यह कथा खो सकती है, इसके बिखर जाने की पूरी संभावना है। हर छोटा-बडा चरित्र अपनी कथा के साथ उस समय के व्यापक और विशाल चित्र को बडी वारिकी और कौशल के साथ बुनता दिखाई पडता है। जातिगत उच्चतावचता के कारुणिक परिणाम क्या हो सकते हैं इसका मार्मिक आलेखन सिंघ और मुखर्जी परिवार के परस्पर सम्बन्ध में देखा जा सकता है। अक्षम पति की वंश परम्परा को जारी रखने के लिए किए गए कुन्ति के महाभारतकालीन प्रयासों का पुनरावर्तन बिम्बवति और बिधुभूषण मुखर्जी के अ-नैतिक संयोग से हुए नवीन कुमार सिंघ के जन्म की घटना में देखा जा सकता है। लेखक ने इस पूरे प्रसंग को उपन्यास में जिस नजाकत के साथ निभाया है, वह केवल एक सशक्त उपन्यासकार के द्वारा ही संभव है। प्रत्येक प्रसंग बहुत धीरज के साथ अपने अन्त को पाता है। हर सूत्र अत्यन्त सावधानी के साथ आरम्भ किया गया है और बहुत ही सुलझे हुए ढंग से अपने अन्त की तरफ जाता है। कहीं कोई हडबडी नह दिखाई पडती। किसी भी उप प्रसंग को अनिश्चितता के साथ अथवा अनगढता के साथ इसमें प्रयोजित नह किया है। लगभग सौ वर्षों का वह समय एक महीन, सुसम्बद्ध तथा संपूर्ण चित्र के रूप में प्रस्तुत होता है। लेखक ने जमीनदारी और जमीनदारों के जीवन के सुख-दुखों, ऐयाशी-अनैतिकता, खुले-छिपे सम्बन्धों को जितने विस्तार से उकेरा है उतनी ही तन्मयता के साथ उनके नौकरों की जीवन शैली को , उनके सुख-दुख-अभावों, नैतिक -अनैतिक आचरण को भी उकेरा है। गर्भ गिराने की भयावह पद्धतियाँ, अपने पति की ऐयाशियों, लालसाओं और अनैतिकता को केवल जमीनदार परिवार की स्त्रियाँ ही नह झेलती थीं, परन्तु पति की कृपा-दृष्टि को बनाए रखने के लिए नौकरों की मुकादम सोहागबाला भी झेलती है।
उस समय के सामाजिक सम्बन्धों की जटिलताएँ एक ओर जाति प्रथा से तथा नैतिक-अनैतिक प्रतिमानों से प्रभावित एवं ग्रसित दिखाई पडती है, तो दूसरी तरफ नए विचारों के कारण हो रहे सामाजिक एवं धार्मिक परिवर्तनों से भी प्रभावित थीं। विधवा पुनर्विवाह के लिए चलाए जाने वाले आंदोलन-धर्मी कार्य और परम्परागत हिन्दू धर्म के सामने हो रहे ब्राह्मो समाज, तत्त्वबोधिनी सभा की गतिविधियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार थीं। सेई समय तथा प्रथम आलो दोनों को मिलाकर कोई एक अद्भुत चरित्र उभर कर आता है, तो वह है ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का- जिनकी दृष्टि के केन्द्र में स्व से अधिक व्यापक समाज के सामान्य जन के जीवन को बेहतर बनाना था।
जैसे कोई हिलोर लेता समुद्र हो और प्रत्येक लहर द्रुत-धीमी गति से समुद्र को हिलोडती है, लेकिन कोई भी लहर मर्यादा नह लाँघती, कुछ इस तरह लेखक ने इसके चरित्रों के जीवन की घटनाओं को प्रस्तुत किया है। चरित्रों के माध्यम से लेखक ने अनपेक्षित और अद्भुत जक्स्टापोजिशन हमारे सामने रखे हैं। परिस्थितियाँ ही कार्यों के अर्थघटन को बदलती हैं। माता-पिता की मृत्यू का कारण संतति भी हो सकती है- इसके दो विभिन्न ध्रुवी चित्र देखे जा सकते हैं। मधूसूदन दत्त जो जमीनदरी के सारे सुखों के साथ माता पिता के अथाह प्रेम के बावजूद केवल पिता के विरोध में मिलने वाले सुख और इंग्लैण्ड जाने की लालच के फलस्वरूप ईसाई धर्म अंगीकार कर लेता है। उसे सम्पत्ति से बे- दखल कर दिया जाता है। लेकिन इसके आघात से माँ और पिता का देहान्त भी हो जाता है। यह अगर एक सिरा है, तो दूसरा जाने-अनजाने अपने स्वार्थ के लिए दुलाल किस तरह अपने माता-पिता की मृत्यु का कारण बनता है, यह इस उपन्यास में देखा जा सकता है।
इसमें गंगानारायण-बिन्दु -वनज्योत्स्ना की कथा एक आशा भरे अन्त को दर्शाती है। बिधु मखर्जी की विधवा बेटी बिन्दु के प्रति रामकमल सिंघ का गोद लिया बेटा गंगानारायण का आकर्षण एक अन्त के बाद विधवा वनज्योत्सना से उसके विवाह में परिणत होता है जो बिन्दु की ही भाँति पढने लिखने में रुचि रखती है। यह पूरे औपन्यासिक यथार्थ चित्रण में गोया फिक्शनल लगता है, परन्तु अविश्विसनीय नह। अगर सत्य नह, तो संभावना अवश्य लगता है।
उस समय के छूटे हुए सूत्रों को अगली शताब्दी किस तरह बुनती है , यह प्रथम आलो में देखा जा सकता है। यूं दो अलग उपन्यास और यूं एक दीर्घ नैरेटिव्ह को रचने वाले सुनील गंगोपाध्याय को निश्चित रूप से हमारे समय का सबसे बडा और महत्त्वपूर्ण भारतीय उपन्यासकार कहा जा सकता है।

सम्पर्क - द्वारा प्रवीण पाण्डया, 402, बिल्डिंग नं. 2,
विंडसर, अरालिया, होलीक्रॅस स्कूल के सामने, कोलार रोड,
भोपाल- ४६२०४२ - मो. ९४२६७००९४३