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नारी स्वांतत्र्य और सुभद्राकुमारी चौहान की कहानियाँ

राजेन्द्र उपाध्याय
कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की समकालीन कवयित्रियों में महादेवी वर्मा तो थीं ही - सुश्री किशोरी देवी, राजकुमारी, विद्यावती, कोकिल भी थी। इनमें से महादेवी वर्मा और विद्यावती, कोकिल को छोडकर किसी ने इतना विपुल गद्य नह लिखा - जितना महादेवी और सुभद्रा ने सुभद्रा को जीवन भी छोटा मिला केवल 44 वसन्त उन्होंने देखे - फिर भी इस दौरान उन्होंने विपुल साहित्य सृजन किया।
राष्ट्रीय आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी और अनवरत जेलयात्रा के बावजूद उनके तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए - बिखरे मोती (1932), उन्मादिनी (1934) सीधे-सादे चित्र (1947)। इस कथा संग्रहों में कुल 38 कहानियाँ (क्रमश, पन्द्रह, नौ और चौदह) है। सुभद्राजी की समकालीन स्त्री-कथाकारों की संख्या अधिक नह थी। सुभद्राकुमारी चौहान की कहानियों के प्रस्थान बिन्दु हमारी आज भी मदद करते हैं। 1940 के आसपास उस वक्त के सर्वाधिक चर्चित युवा आलोचक आचार्य हजारीप्रसाद द्धिवेदी ने इसे सबसे पहले रेखांकित किया था। उन्होंने इन चारों लेखिकाओं के संदर्भ में लिखा था कि आलोच्य पुस्तकों में से अधिकांश कहानियाँ का मूल उपादान मध्यवर्ग के हिन्दू परिवार की अशांतिजनक अवस्था है। सास, जेठानी और पति के अत्याचार, स्त्री की पराधीनता, उसे पढने-लिखने या दूसरों से बात करने में बाधा इत्यादि बातें ही नाना भावों और नाना रूपों में कही गईं है। सुभद्रा देवी के बिखरे मोती इस विषय में सर्वप्रथम है। ऐसे प्रसंगों पर सर्वत्र एक दुखपूर्ण स्वर कहानी का परिणाम होता है जो चरित्र के भीतरी विकास से नह बल्कि सामाजिक बाध्य परिस्थितियों के साथ दुखी व्यक्ति के असामंजस्य के कारण होती है। कल्पलता हजारीप्रसाद द्धिवेदी जी (1940) लिखते हैं कि सुभद्राजी की कहानियों में से अधिकांश बहुओं, विशेषकर शिक्षित बहुओं के दुखपूर्ण जीवन को लेकर लिखी गई है। निसंदेह वे इसकी अधिकारिणी हैं - किन्तु उन्होंने किताबी ज्ञान के आधार पर या सुनी-सुनाई बातों को आश्रय करके कहानियाँ नह लिखी वरन् अनुभवों को ही कहानियों में रूपान्तरित किया है। निसंदेह उनके स्त्री-चरित्रों का चित्रण अत्यन्त मार्मिक और स्वाभाविक हुआ है, फिर भी जो बात अत्यन्त स्पष्ट है वह यह है कि उनकी कहानियों में समाज व्यवस्था के प्रति एक नकारात्मक घृणा ही व्यक्त होती है। पाठक यह तो सोचता है कि समाज युवतियों के प्रति कितना निर्दय और कठोर है, पर उनके चरित्र में ऐसी भीतरी शक्ति या विद्रोह की भावना नह पायी जाती जो समाज की इस निर्दयतापूर्ण व्यवस्था को अस्वीकार कर सके। उनके पाठक-पाठिकाएँ इस कुचक्र के छूटने का कोई रास्ता नह पातीं। इन कहानियों में शायद ही कहीं वह मानसिकता दृढता चरित्र को मिलती हो जो स्वेच्छापूर्वक समाज की बलि-वेदी पर बलि होने का प्रतिवाद करें। इसके विरूद्ध उनके चरित्र अत्यन्त निरूपाय से होकर समाज की वन्हिशिखा में अपने को होम करके चुफ से दुनियाँ की आँखों से ओझल हो जाते हैं। स्पष्ट ही यह दोष है, परन्तु इस अवस्था के साथ जब सचमुच ही परिस्थिति की तुलना करते हैं, तो स्वीकार करना पडता है कि अधिकांश घटनाएँ ऐसी ही हो रही हैं अपने प्रिय पात्रों के अन्तस्तल में वे बडी आसानी से पहुँच जाती हैं। सुभ्रदाजी के पात्रों की सहज बुद्धि बिहार की अपेक्षा परिहार की ओर, जूझने की अपेक्षा भागने की ओर, क्रिया की अपेक्षा निष्क्रयता की ओर अधिक झुकी हुई है (वहीं पृ 82) मनोविज्ञान के पण्डित इसके निगेटिव कैरेक्टर या नकारात्मक चरित्र के लक्षण बताते हैं। जहाँ स्त्री शिक्षा का अभाव है, पुरूष और स्त्री की दुनिया अलग-अलग है, वहाँ तो निश्चित रूप से स्त्री में नकारात्मक चरित्र की प्रधानता होती है और समाज स्त्री के लिए जिन भूषण रूप आदर्शों का विधान करता है उनमें एकान्तनिष्ठा, क्रीडा, आत्मगोपन और विनयशीलता आदि नकारात्मक गुणों की प्रधानता होती है। इस दृष्टि से सुभद्राजी की कहानियों में भारतीय स्त्री का सच्चा चित्रण हुआ है। वे भारतीय स्त्रीत्व की सच्ची प्रतिनिधि बन सकी है। (हजारीप्रसाद द्धिवेदी)।

भाषा कथ्य और एप्रोच की दृष्टि से हिंदी कहानी के इस आरम्भिक दौर में प्रेमचन्द की तरह जमीन से उठाई गई सहज भाषा में और उससे जुडे अनुभव तीस के दशक तक किसी दूसरे रचनाकार कहानीकार में दिखाई देते हैं, तो वे केवल सुभद्राकुमारी चौहान में है। उस दौर में अधिकांश कहानीकार बना रहे थे। सुभद्राजी की कहानियों का कथ्य ही नहीं, उनकी भाषा और अभिव्यंजना कहाँ तक कि उनकी निजी जीवन प्रक्रिया सब कुछ अपने समय के यथार्थ और निजी स्वाधीनता के मूल्यों की भित्ति पर टिके हुए थे। (बटरोही, सुभद्राकुमारी चौहान और हिंन्दी में स्त्री लेखन की परम्परा)।
सुभद्राकुमारी चौहान ने स्त्री की निजी स्वधीनता और उससे जुडे यथार्थ को अभिव्यक्ति देने के लिए अपनी कविताओं और कहानियों में छायावादी भाषा से विद्रोह किया। छायावादी काव्य की मूलभूत प्रवृत्तियों के साथ समान रूप से उनके जुडाव के साथ ही यह तथ्य है सहज और जरूरी सरोकारों से जुडी हुई थीं। सुभद्राजी के साहित्य में इसीलिए जमीन का यह स्पर्श हमें दिखाई देता है जो हिन्दी के पहले बडे कथाकार प्रेमचन्द में हैं। फिर भी उन्हें प्रेमचन्द की परम्परा में नह माना जाता है। हिन्दी के दर्शन आतंकित, शास्त्रार्थप्रिय, जिन्दगी के यथार्थ की अपेक्षा में वह कला नह दिखाई दी, जिसे वे जिन्दगी से अलग करके देखने के आदी हैं अन्यथा कला और जिन्दगी को अलग-थलग तथा कभी-कभी एक दूसरे का विरोधी मानने में साहित्यिक बडप्पन समझते हैं।
स्वयं को गम्भीर कलात्मक अतएव उत्कृष्ट घोषित करने वाली संघर्षविरत साहित्य दृष्टि ने सुभद्राजी जैसी संघर्षणकारी साहित्य धारा को आज एक किनारे का दिया है। उस निगाह से देखें तो, सुभद्राजी की कहानियाँ अलंकृत, सरल और जहाँ-तहाँ से अनगढ भी हो सकती हैं। किन्तु अपनी यथार्थदृष्टि और सादगी में वे आज भी इतनी विचारमयी और मर्मवेधी हैं कि उन्हें भूल पाना कठिन होगा। उनकी कहानियों के पात्र इतने सहज, निश्छल और पारदर्शी हैं, इतने आवेगपूर्ण और तरल कि हमें मजबूरन उनके प्रति आकृष्ट होना पडता है। उनकी रचनाएँ पढने के लिए पण्डितों की भाषा जानने की आश्यकता नह, उनकी रचनाएँ तो हदय की भाषा में लिखी गई हैं।
सुभद्राजी की कहानियों की भाषा अपने वातावरण की अनुगूँज लिए हुए हैं। कहानियों को पढते हुए बार-बार हमारा ध्यान इसी वातावरण की ओर जाता है। उन्होंने जैसा जिया, वही रचा, और जो रचा वही किया। डॉ. विजयबहादुर सिंह ने ठीक ही लिखा है कि निःसंदेह ये कहानियाँ पढाकू पण्डितों, महानगीय अभिजात सहदयों और कला पारखियों के लिए नह लिखीं गई हैं। यह तो प्रत्यक्ष जीवन यथार्थ से निकलकर उस समाज की लोकस्मृति का हिस्सा बन जाना चाहती हैं जो सार्वभौम सहदयता का स्वामी है। जो कहानी को कहानीकला पर मुग्ध होने के लिए नह, जीवन की बंकिम अदाओं पर न्यौछावर हो जाने के लिए पढता या सुनता है।
सुभद्राजी के पास सहज मानवीय संवेदना से पाए गए आस-पास, पास-पडौस और रोजमर्रा की पारिवारिक जिन्दगी के विविधता, तीव्रता और सहजता में समेटती और उजागर करती है अपने अनुभूत वास्तव के प्रति उनमें कोई दुख और संकोच नह है, बल्कि एक साहसपूर्ण आदरभाव और स्वीकृति है। डॉ. धनंजय वर्मा ने तो यहाँ तक लिखा है कि सुभद्राजी की कहानियों में यथार्थ की जितनी सहज और सीधी पकड है, उतनी उनकी कविताओं में भी नह है।
अपने वक्त के सपनों और वास्तविकताओं के बीच मौजूद अन्तर्विरोधों के प्रति उनकी चेतना में एक संपृक्त सुधारक का-सा नजरिया है और साथ ही यह विश्वास भी है कि बेहतरी के लिए राजनीतिक बदलाव के साथ सामाजिक बदलाव भी जरूरी है। अपने वक्त के यथार्थ को अपने वास्तविक सामाजिक अनुभवों के प्रतीक चरित्रों के माध्यम से वे जिस तरह रूपायित करती है वह इस बात का सबूत है। यह ठीक है कि तत्कालीन परिवेश में उनकी संलग्नता और आस्था गाँधी और गाँधीवाद में रही है, सत्याग्रह और नैतिक रूप परिवर्तन के प्रसंग उनकी कहानियों में भरे पडे हैं लेकिन अपने समय और राजनीतिक आन्दोलनों के अन्तर्विरोधों के प्रति वो मौन नह है, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक विसंगतियों के खिलाफ एक सक्रिय और तीखा प्रतिवाद भी उनमें हैं। उनकी कहानियों में स्वाधीनता आन्दोलन, झण्डा आन्दोलन, सत्याग्रह, जेल, सांप्रदायिक एकता जैसे समसामयिक विषय है।
सुभद्राजी की कहानियों की संवेदना ही नह, सक्रिय भागीदारी भी उस वर्ग के साथ है जो शोषित और दलित है। उनकी कहानियों में जो औरत है, वह न सिर्फ दलित और शोषित है बल्कि वह उस वर्ग की प्रतीक भी है। इसके अलावा सीधे-सीधे उस वर्ग के राजमार्ग के संघर्ष, तकलीफ और यातना में उसकी सक्रिय हिस्स भी हैा उनकी संवेदना तीन बच्चे भिखारियों, जेल की अपराधियों, हींगवाले, ताँगेवाले, परित्यक्ताओं, विधवाओं और सामाजिक विसंगतियाँ भोगती औरतों और समाज के उस वर्ग के साथ है जिसे हम सर्वहारा कह सकते हैं।
सामाजिक रूढियों और विसंगतियों को लेकर एक गहरा क्षोभ उनकी सारी कहानियों में व्याप्त है। पारिवारिक त्रासदियों, आदमी और औरत के रिश्तों के संकटों और यातनाओं के प्रति उनमें गहरा मानवीय सरोकार है। तीन बच्चे पुरूष अत्याचार से मुक्ति की कहानी है, तो कल्याणी, मछुए की बेटी तथा कैलासी नाना नारी केन्द्रित है।
सुभद्राकुमारी चौहान की कहानियों को समझने के लिए हमें खुद उनकी गुलाबसिंह कहानी में लिखी लेखकीय टिप्पणी पढनी पडेगी - यह कहानी कहाँ की है। किसकी है। हम क्या बताएँ। यह फ्रांस की राज्य क्रांति की हो सकती है। यह रूस की राज्य क्रांति की हो सकती है। यह हिंदुस्तान की सन 42 की क्रांति की भी हो सकती है, क्योंकि यह घटना चिरंतन है, अनंत है, यह जैसे पेरिस में, मास्कों में, वैसे जबलपुर में हो सकती है। जबलपुर में उनकी कहानियाँ जबलपुर में स्थित होकर भी संपूर्ण भारत की कहानियाँ हो सकती हैं।
आज के फार्मूलाबद्ध नारीवाद से हटकर है उनकी कहानियाँ। स्त्री-विमर्श का ढिंढोरा न पीटकर उन्होंने अपनी कहानियों में स्त्री विमर्श को मार्मिकता के साथ रेखंकित किया है। स्त्री-स्वांतत्र्य की बातें उन्होंने बहुत स्पष्टता और दृढता के साथ उस समय दृष्टिकोण कहानी में कही है - जी हाँ, जितना इस घर में आपका अधिकार है, उतना ही मेरा भी है। यदि आप अपने किसी चरित्रहीन पुरूष मित्र को आदर और सम्मान के साथ ठहरा सकते हैं, तो मैं भी किसी असहाय अबला को कम से कम आश्रय तो दे ही सकती हैं। दृष्टिकोण की निर्मला में हमें सुभद्रा का यही व्यक्तित्व मिलता है जो पुरूष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बगैर किसी लिंग भेदभाव के चलती थी।
भग्नावरोव कहानी की कवयित्री भी सुभद्रा ही है जो कहती है लिखने पढने की बाबत आप मुझसे न पूछे।
स्त्री का स्त्री के प्रति अत्याचार साथ ही औरत आदमी के सामाजिक भेद का चित्रण भी दृष्टिकोण में प्रमुखता के साथ हुआ है। किस्मत कहानी में विधवा बहू पर साथ का अत्याचार है। असमंजस कहानी में विधवा - विवाह की पहल, अभियुक्त में अनाथ लडकी पर दोषारोपण, सोनी की कण्ठी में स्त्री के आभूषण प्रेम का उतरा मुलम्मा, अँगूठी की खोज और परिवर्तन में पुरूष द्वारा छली गई स्त्री, मछुए की बेटी तिन्नी पर आसक्ता राजकुमार। कहानियों में कहीं-कहीं स्त्री स्थितियों के समक्ष समर्पण करती नजर आती हैं, कहीं-कहीं वह विद्रोहणिी का रूप धारण कर लेती हैं। कदम्ब के फूल में वह स्त्री मोर्चा लेने को तैयार उठ खडी होती है - मारो, देखूं कैसे मारती हो। मुझे वह बहू न समझ लेना जो सास की मार चुपचाप सह लेती हो।
आहूति, अनुरोध और चढा दिमाग में एक लेखिका कवयित्री की वास्तविक स्थिति का चित्रण हुआ है। अमराई और पापी पेट में स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भारतीय मध्यवर्ग की मानसिक स्थिति और लाचारी का अच्छा चित्रण हुआ है। सुभद्राजी साम्प्रदायिकता की घोर विरोधी थी। एकादशी कहानी में उन्होंने ब्राहमण बाल विधवा का विवाह मुस्लिम युवक से कराया है और धर्मों की टकराहट भी दिखाई है।
सुभद्राजी ने अपनी कहानियों के जटिल और गंभीर संकेत सहज सुबोध शैली में किए हैं। होली, कदम्ब के फूल, राही आदि कहानियों की शुरूआत रोचक बातचीत से होती है।
उन्मादिनी, थाती, कहानियाँ आत्मकथात्मक शैली में है। एकादशी, भग्नावशेष आदि कहानियों में फ्लैशबैक का प्रयोग कुशलता के साथ किया है जबकि उस समय तक यह एक नई बात थी।
भाषा बहुत मंजी हुई है, हिंदुस्तानी है- हिंदी- उर्दू मिश्रित है। अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी बेधडक किया है। उस समय के लिए यह कला कितना क्रांतिकारी विचार था - सात भँवरे फिर लेने के बाद राधेश्याम को तो उसके शरीर की पूरी मोनोपाली-सी मिल चुकी थी न। (आहूति)
एक ही कहानी के एक ही संवाद में लोकोक्तियों और मुहावरों का जो धाराप्रवाह प्रयोग किया है वह देखते ही बनता है- उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। चोरी की चोरी ऊपर से सीना जोरी। मैं ईर्ष्या करूँगी तुमसे। तुम हो किस खेल की मूली । (मंझली रानी)
उनकी कहानियों को किसी भी तराजू पर तोल ले। उनमें स्त्री सरोकारों की बात देखेगी, तो सामाजिक राजनीतिक विसंगतियों की कसौटी पर भी वे खरी उतरेंगी। उनकी कहानियाँ स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर की नारी का मानसिक पटल प्रस्तुत करती है। आजादी के पूर्व की भारतीय नारी की दशा और दिशा को समझने में वे हमारी बडी मदद करती है। उनकी नारी केवल राजनीतिक आजादी नह चाहती जबकि सभी प्रकार की गुलामी से मुक्ति चाहती है। वह स्वतंत्रता नह, स्वराज्य चाहती है। परतंत्रता नह, स्वानुशासन चाहती है। रूढियों-बँधनों से मुक्त होकर वह स्व-नियंत्रण में रहना चाहती है। सुभद्राजी की सभी कहानियों को हम एक तरह से सत्याग्रही कहानियाँ कह सकते हैं। उनकी स्त्रियाँ सत्याग्रही स्त्रियाँ हैं। दलित चेतना और स्त्रीवादी विमर्श को उठानेवाली सुभद्राकुमारी चौहान हिंदी की पहली कहानीकार है। पथ दिखा गई वह, सीखा गई वह, सीख जो सिखानी थी।

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