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मेवाड की अनमोल धरोहरः नाहर नृत्य

अभिषेक श्रीवास्तव
भीलवाडा जिला मुख्यालय से तकरीबन 15 किमी. दूर स्थित माण्डल कस्बा वर्तमान में भीलवाडा जिले का एक महत्त्वपूर्ण उपखण्ड मुख्यालय है। यह बनास नदी की सहायक कोठारी नदी के किनारे स्थित है। स्वर्णिम चतुर्भुज (राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-44) तथा अजमेर-मुम्बई रेल्वे लाइन इसके निकट से गुजरते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से मुगलकाल माण्डल के लिए स्वर्णिम काल माना जाता है। मुगल बादशाह जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के काल में माण्डल मेवाड में मुगल राजनीति का प्रमुख केन्द्र रहा। माण्डल कोई रजवाडा या रियासत नहीं था। प्रारम्भ से ही यह एक खालसा ग्राम रहा जिस पर केन्द्रीय मुगल शासन का प्रत्यक्ष नियंत्रण होता था। माण्डल को केन्द्र बनाकर बादशाह जहाँगीर ने मेवाड के महाराणा अमरसिंह के विरुद्ध वर्ष 1608 ई. से वर्ष 1615 ई. तक अलग-अलग सेनापतियों के नेतृत्व में युद्ध अभियान छेडे। इन युद्ध अभियानों का एकमात्र ध्येय था महाराणा अमरसिंह को मुगल शासन के प्रति निष्ठावान बनाना। ध्यातव्य है कि इससे पूर्व भी अपने पिता बादशाह अकबर के कार्यकाल में जहाँगीर ने शहजादा सलीम के रूप में (बादशाह बनने से पूर्व जहाँगीर का नाम) वर्ष 1603 ई. में उक्त अभियान का संचालन किया था। कई प्रयोग कर लेने के उपरान्त जहाँगीर ने अपने पुत्र शहजादा खुर्रम (भावी बादशाह शाहजहाँ) के नेतृत्व में दिनांक 17 दिसंबर 1613 ई. को अजमेर से मेवाड अभियान के लिए सेना भेजी। मुगल सेना ने कई दिनों तक अपने महत्त्वपूर्ण थाने माण्डल में पडाव डाले रखा और वहीं से मेवाड की समस्त गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।
माण्डल स्थित तालाब की पाल मुगल सेना का पडाव स्थल था। तत्कालीन माण्डल के लोगों ने शहजादा खुर्रम के स्वागत-सत्कार में कोई कमी नहीं छोडी। वर्ष 1614 ई. में शहजादा खुर्रम तथा उनकी सेना के मनोरंजन हेतु माण्डल के लोक-कलाकारों ने जिस नृत्य को प्रस्तुत किया वह था-नाहर नृत्य। दरअसल इस नृत्य का आरंभिक नाम नृसिंह नृत्य था जो कि समय के साथ अपभ्रंशित हो कर नाहर कहलाने लगा। इस प्रकार नृसिंह नृत्य को नाहर नृत्य कहा जाने लगा। इस नृत्य को देखकर शहजादा खुर्रम इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुगल शासन की ओर से इसे हर वर्ष किए जाने के सम्बन्ध में एक प्रशस्ति-पत्र जारी करवाया। यह प्रशस्ति-पत्र माण्डल के पाराशर परिवार के पास आज भी सुरक्षित है। माण्डल कस्बे में विगत 409 वर्षों से निरन्तर इस नृत्य का आयोजन किया जा रहा है।
इस नृत्य को यहाँ प्रतिवर्ष रंगतेरस (चैत्र कृष्ण त्रयोदशी) के दिन प्रस्तुत किया जाता है। यह होली (फाल्गुन पूर्णिमा) के बाद का तेरहवाँ दिन होता है। माण्डल में रंगतेरस का पर्व आमजन के लिए विशेष महत्त्व का होता है जिसे बडी ही धूम-धाम से मानाया जाता है। इस दिन यहाँ जमकर होली खेली जाती है। स्थानीय स्तर पर इसे होली का न्हावण दिवस भी कहा जाता है।
गौरतलब है कि मेवाड अंचल में होली के दिन होली नहीं खेली जाती वरन् किसी अन्य दिवस पर खेली जाती है। उदाहरणार्थ चित्तौडगढ में रंगपंचमी (चैत्र कृष्ण पंचमी) पर, उदयपुर और भीलवाडा में शीतला सप्तमी (चैत्र कृष्ण सप्तमी) पर तथा माण्डल में रंगतेरस (चैत्र कृष्ण त्रयोदशी) पर होली खेली जाती है। संभवतः ऐसा इसलिए है कि 28 फरवरी 1572 को होली पर्व के दिन ही मेवाड के महाराणा उदयसिंह की मृत्यु हुई थी। अतः होली के पर्व को मेवाड में स्थाई रूप से शोक दिवस के रूप में मान लिया गया।
माण्डल निवासी रंगतेरस पर्व की तैयारियाँ होली के दिन से ही प्रारम्भ कर देते हैं। घरों में मेहमानों के लिए विशिष्ट पकवान बनाए जाते हैं। रंगतेरस पर माण्डल के लोग प्रातःकाल से ही होली खेलना प्रारम्भ कर देते हैं जो कि दोपहर तक जमकर खेली जाती है। इस दिन होली खेलने के दौरान लगभग 1 बजे के आस-पास बाजार की ओर से स्वांगधारी बादशाह की सवारी तथा तालाब की पाल की ओर से स्वाँगधारी बेगम की सवारी निकाली जाती है। सवारी के लिए बादशाह और बेगम को अलग-अलग पालकियों में बैण्ड-बाजों की धुन पर नाचते-गाते हुए तथा हवा में गुलाल उडाते हुए लाया जाता है। यह सम्पूर्ण दृश्य काफी हास्यास्पद होता है। बाद में इन दोनों ही सवारियों को एक-साथ कस्बे के मुख्य मार्ग से होते हुए माण्डल के तहसील कार्यालय पर लाया जाता है जहाँ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बादशाह और बेगम का स्वागत किया जाता है। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारी तथा स्थानीय लोग आपस में होली खेलते हैं। इसी के साथ होली खेलने का दौर समाप्त हो जाता है और नाहर नृत्य की तैयारियाँ प्रारम्भ की जाती हैं।
नाहर नृत्य अपने आप में एक अनूठा नृत्य है। राजस्थान में ऐसा नृत्य माण्डल के अतिरिक्त कहीं और नहीं किया जाता। यह शौर्य प्रदर्शन तथा भक्तिभाव से परिपूर्ण नृत्य है। दरअसल इस नृत्य में कुल पाँच व्यक्ति मुख्य भूमिका में होते हैं। चार व्यक्ति नाहर का एवं एक व्यक्ति भोपा का स्वांग धारण करते हैं। स्वाँग धारण करने से पूर्व इन नर्तकों (नाहरों) को पवित्र जल से नहलाया जाता है। उनके शरीर पर तालाब की काली चिकनी मिट्टी का लेप किया जाता है और उस पर सिर से लेकर पैर तक कपास के फाहे चिपकाए जाते हैं। बाद में कपास के इन फाहों को पतली डोरियों से बाँध दिया जाता है। बाँस की खपच्चियों के प्रयोग से नाहरों के सींग तथा लोहे के पतले तार अथवा रस्सी के प्रयोग से इनकी पूँछ बनाई जाती है। भोपा को केसरिया रंग के वस्त्र पहनाए जाते हैं।
नाहर नृत्य सामाजिक समरसता तथा सांप्रदायिक सौहार्द का द्योतक है। नृत्य में भाग लेने वाले चारों नर्तक (नाहर) समाज के चार वर्णों यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालाँकि समय के साथ इस परिपाटी में कुछ बदलाव अवश्य देखा गया है। अब कोई भी व्यक्ति नाहर का स्वाँग धारण कर अपनी प्रस्तुति दे सकता है। वर्तमान में अधिकांशतः ब्राह्मण, माली और दर्जी समाज के लोग नाहर बन कर अपनी प्रस्तुति देते हैं। बगैर किसी सांप्रदायिक भेद-भाव के लोगों की भारी भीड इस नृत्य को देखने के लिए जुटती है।
नृत्य को आरम्भ किए जाने से पूर्व स्वांगधारी ये नाहर पाराशर समाज के घरों के निकट स्थित शीतला माता के चबूतरे पर तथा बडा मन्दिर, श्री शेषशायी धाम में धोक लगाने जाते हैं। धोक लगाने के उपरान्त इनकी भी आम लोगों द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है तथा उन्हें फूल माला पहनाई जाती है। ऐसा किए जाने के बाद ही नृत्य प्रारम्भ किया जाता है। नाहरों को मजबूत सुरक्षा के बीच आयोजन स्थल पर लाया जाता है।
पहले इसका आयोजन माण्डल के तेजाजी चौक (नई नगरी) में किया जाता था किन्तु अत्यधिक भीड जुट जाने के कारण यह स्थान छोटा पडने लगा अतः अब इसका आयोजन तेजाजी चौक के अतिरिक्तबडा मन्दिर (श्री शेषशायी धाम, माण्डल) में भी किया जाता है। इस प्रकार अब यह नृत्य माण्डल कस्बे में दो अलग-अलग स्थानों पर आयोजित किया जाता है। इस नृत्य के आयोजन का सम्पूर्ण प्रबन्धन नाहर नृत्य उत्सव सेवा समिति की ओर से किया जाता है जिसमें स्थानीय प्रशासन का भी सहयोग लिया जाता है।
नाहर नृत्य को मंच पर प्रदर्शित किया जाता है। यह मंच जमीन से लगभग 3-4 फीट की ऊँचाई पर चतुर्भजाकार होता है। इस नृत्य का प्रदर्शन रात 8 बजे से प्रारम्भ होता है जिसे लगभग 1 घण्टे तक किया जाता है अतः मंच पर रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाता है। मंच को रंग-बिरंगी लाइटों, फूल-मालाओं व गुब्बारों से सजाया जाता है। ध्वनि प्रसारण यंत्रों की उचित व्यवस्था की जाती है।
नाहर नृत्य विशुद्ध रूप से पुरुष प्रधान नृत्य है जिसमें महिलाएँ भाग नहीं लेती हैं। इस नृत्य में नाहरों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया जाता है। चारों नाहर अपने-अपने हाथों में दो-दो छडें लेकर नृत्य को प्रस्तुत करते हैं। एक नाहर हुंकार भरते हुए आगे बढकर दूसरे नाहर को पीछे की ओर धकेलने की कोशिश करता है। फिर यही क्रम दूसरा नाहर पहले वाले नाहर पर दोहराता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो ये नाहर एक-दूसरे के साथ दंगल कर रहे हों। नृत्य के दौरान कोई भी गीत नहीं गाया जाता। इस नृत्य में परम्परागत ढोल तथा बाँकिया (एक प्रकार का सुषिर वाद्य) ही मुख्य वाद्य यंत्र होते हैं। चारों ही नाहर ढोल की थाप और बाँकिया की धुन पर मंच पर अपना स्थान बदलते हुए मन्द गति से थिरकते रहते हैं। नाहरों द्वारा किया जाने वाला पद संचालन ही इस नृत्य का मुख्य आकर्षण होता है। नृत्य के दौरान केसरिया कपडे तथा शंक्वाकार केसरिया टोपी पहने एक भोपा अपने हाथ में मयूरपंख लेकर मंच पर इधर से उधर विचरण करता है। नृत्य प्रदर्शन के दौरान संचालक की ओर से मंच संचालन का कार्य किया जाता है। मंच संचालक नृत्य के बीच-बीच में सिंह की हुंकार के समान ध्वनि निकालता रहता है। सिंह की विस्मयकारी गर्जना से संपूर्ण वातावरण रोमांचित हो उठता है।
मुख्य समारोह के समाप्त हो जाने के उपरान्त अर्थात् रात 9 बजे के बाद ये नाहर तथा भोपा कस्बे के लोगों के घर-घर जा कर उनके मनोरंजन के लिए नृत्य करते हैं। लोग उन्हें पारितोषिक स्वरुप रुपए, मिठाइयाँ तथा उपहार भेंट करते हैं।
शोधार्थी की ओर से किए गए अवलोकन के दौरान यह पाया गया कि इस नृत्य को देखने हेतु लगभग चार से पाँच हजार की संख्या में भीड दो अलग-अलग स्थानों यथा तेजाजी चौक तथा बडा मंदिर (श्री शेषशायी धाम, माण्डल) में जमा हो जाती है। इससे इस नृत्य की लोकप्रियता का अन्दाजा लगाया जा सकता है। मकानों और दुकानों की छतों से भी लोग इस नृत्य को देखते नजर आते हैं। क्या बच्चे और क्या बूढे, चारों ओर बस भीड ही भीड दिखाई देती है। जमीन पर पैर रखने की जगह तक नहीं बचती। लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। ऐसे में किसी भी प्रकार की कोई अनहोनी को टालने तथा कानून-व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए रखने के लिए जिले के अलग-अलग थानों से पुलिस बल को बुलाकर यहाँ तैनात किया जाता है।
शोधकार्य के दौरान प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 और 2021 में लगे कोरोना प्रतिबन्धों के अनुरूप नाहर नृत्य का सार्वजनिक मंचन नहीं किया जा सका। नृत्य की परम्परा तथा निरन्तरता को बनाए रखने के लिए उक्त दोनों ही वर्षों में प्रतीकात्मक तौर पर तथा आम-जन की गैर-मौजूदगी में श्री शेषशायी धाम परिसर में नाहर नृत्य का औपचारिक आयोजन किया गया।
समस्याएँ एवं सुझाव
शोधार्थी की ओर से रंगतेरस के दिन किए गए अवलोकन के दौरान यह पाया गया कि इस नृत्य को देखने आए लोगों के बैठने के लिए कहीं कोई व्यवस्था नहीं की जाती। भारी भीड में लोग इस नृत्य को ठीक तरह से देख भी नहीं पाते। कई लोग तो बैंचों व दीवारों पर खडे हो कर इसे देखते नजर आते हैं। ऐसे में दुर्घटना की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर इस प्रकार की अव्यवस्थाओं में नृत्य का भरपूर आनन्द नहीं लिया जा सकता। नृत्य की ऐतिहासिकता तथा लोकप्रियता को देखते हुए इसका आयोजन अन्यत्र किसी बडे खुले स्थान अथवा किसी स्टेडियम में किया जा सकता है, जहाँ लोगों के बैठने के लिए कुर्सियाँ लगी हों। सभी लोग इस नृत्य को देखने का आनन्द ले सकें इसके लिए बडी-बडी एल. ई. डी. स्क्रीनों के माध्यम से उसके प्रसारण की भी व्यवस्था की जा सकती है। समग्र रूप से कहें तो नाहर नृत्य समारोह को और अधिक नियोजित व व्यवस्थित ढंग से आयोजित किए जाने की आवश्यकता है।
स्थानीय कलाकारों तथा छोटे व्यापारियों को भी लाभ मिले
नाहर नृत्य कार्यक्रम को और अधिक रोचक बनाने के लिए इसके पूर्व तथा इसके बाद में कई अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं-जैसे कवि सम्मेलन, संगीत कार्यक्रम आदि। इससे स्थानीय कलाकारों को भी इस कार्यक्रम के माध्यम से अपनी कला को प्रदर्शित करने हेतु मंच प्राप्त हो सकेगा। इससे दर्शकों को ज्यादा लंबे समय तक कार्यक्रम से जोडे रखा जा सकेगा। जब इस नृत्य कार्यक्रम का आयोजन किसी बडे खुले स्थान अथवा किसी स्टेडियम में किया जाने लगेगा तो इसका प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ स्थानीय छोटे व्यापारियों जैसे-टेण्ट वाले, आइसक्रीम वाले, खिलौने वाले, गुब्बारे वाले, फल वाले आदि को भी मिल सकेगा। कार्यक्रम में शामिल होने वाले दर्शकों तथा उनके साथ आने वाले बच्चों के लिए इन छोटे व्यापारियों को अपने माल को विक्रय करने का मौका मिल सकेगा।
बेहतर नियोजन तथा बेहतर सुरक्षा
नाहर नृत्य कार्यक्रम का आयोजन दो अलग-अलग स्थानों पर किए जाने से यह अव्यवस्थित सा प्रतीत होता है। इसके लिए प्रशासन को दो अलग-अलग स्थानों के लिए तैयारी करनी पडती है। इससे लोगों की सुरक्षा में चूक होने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बजाए इसके यदि नाहर नृत्य कार्यक्रम को किसी स्टेडियम में आयोजित किया जाता है तो इसके संदर्भ में प्रशासन को नियोजन करने में सुविधा होगी। उसे दो अलग-अलग स्थानों की बजाए एक ही स्थान के बारे में विचार करना होगा। पुलिस बल को भी एक ही स्थान पर कानून और व्यवस्था को संभालना होगा। इससे प्रशासन को कम मशक्कत करनी होगी। इससे न सिर्फ इस कार्यक्रम का बेहतरीन आयोजन किया जा सकेगा अपितु लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकेगी।
प्रचार-प्रसार सामगं*ी का अभाव
देश के विभिन्न राज्यों यथा दिल्ली (केन्द्रशासित प्रदेश), उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में नाहर नृत्य का मंचन विशिष्ट अवसरों पर किया जा चुका है। श्री पीरू माली जी इस नृत्य के प्रसिद्ध नर्तक हैं जो विगत चालीस वर्षों से अपनी प्रस्तुति देते आए हैं। बावजूद इन सबके न तो नाहर नृत्य का मंचन कभी भी किसी अंतर्राष्ट्रीय पटल पर किया गया है और न ही कोई विदेशी सैलानी इसे देखने के लिए माण्डल आया है। इससे पता चलता है कि इस नृत्य को अभी और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। नाहर नृत्य के सम्बन्ध में लिखित में कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है। अतः बाहरी लोगों के लिए इस नृत्य को जानने का एकमात्र स्रोत यू-ट्यूब पर उपलब्ध वीडियोज ही हैं जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध भी हो सकती है। शोधार्थी की ओर से नाहर नृत्य के सम्बन्ध में लिखित सामग्री तैयार करने का यह एक छोटा-सा प्रयास है जिसे निकट भविष्य में और अधिक विस्तार दिया जाएगा। शोधार्थी की ओर से राज्य सरकार को यह सुझाया जाता है कि नाहर नृत्य के आयोजनकर्त्ताओं को इसके विदेशी धरा पर मंचन के संबन्ध में सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। इसके अतिरिक्त अधिकाधिक विदेशी सैलानियों को रंगतेरस के दिन माण्डल बुलाने का मार्ग सुगम किया जाए ताकि इस नृत्य के बहाने यहाँ पर्यटन विकास को उचित दिशा प्रदान की जा सके।
निष्कर्ष
नाहर नृत्य उत्सव सेवा समिति अपने स्तर पर इस नृत्य का प्रचार-प्रसार देश के अन्य राज्यों में करती आई है। इसके अतिरिक्त रंगतेरस के दिन देश के विभिन्न राज्यों से लोग नाहर नृत्य को देखने आया करते हैं। नाहर नृत्य तथा रंगतेरस पर खेली जाने वाली होली प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पर्यटकों को आकृष्ट करते हैं। माण्डल में इस दिन शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसके घर कोई मेहमान नहीं आता हो। माण्डल की पहचान बन चुके नाहर नृत्य को यहाँ आने वाला हर व्यक्ति बस एक बार अपनी आँखों से देख लेना चाहता है। लोगों द्वारा इस नृत्य को नजदीक से देखना किसी सौभाग्य से कम नहीं समझा जाता। एक प्रकार से देखा जाए तो रंगतेरस का दिन ही माण्डलवासियों के लिए पर्यटन दिवस होता है।

संदर्भ ग्रंथ
1. तुजुक-ए-जहाँगीरी, भाग-1, पृ.125
2. गोपीनाथ शर्मा, 2020, मेवाड-मुगल सम्बन्ध, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, पृ. 95
3. माण्डल के पाराशर परिवार के सदस्य श्री महेश पाराशर जी का लिया गया साक्षात्कार, दिनांक 22 मार्च
2022, दिन मंगलवार, समय शाम 7:00 से 9:00 बजे।
4. हुकुमचंद जैन और नारायण लाल माली, 2020, राजस्थान का इतिहास, संस्कृति, परम्परा एवं विरासत,
राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, पृ. 45
5. शोधकर्त्ता द्वारा माण्डल में रंगतेरस के दिन, दिनांक 30 मार्च 2022, दिन बुधवार, समय शाम 7:00 बजे से
रात 10:00 बजे तक किया गया सर्वेक्षण।


सम्पर्क - शोधार्थी एवं सहायक आचार्य संगम विश्वविद्यालय, भीलवाडा (राज.)
shanu9144@gmail.com