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नफा-नुकसान

संगीता माथुर
धूप चढने लगी थी, पर नन्दा थी कि अभी तक निश्शंक सो रही थी। मायके आकर वह हमेशा ऐसे ही बेफिक्र हो जाती थी। उसे लगता था यदि स्वर्ग नाम की कोई चीज है, तो वह मायका ही है। माँ उसकी ससुराल की भागदौड भरी दिनचर्या से वाकिफ थी। इसलिए ये चन्द दिन उसे अपनी जिन्दगी जीने के लिए छोड देती थी। रसोई से उठती भीनी-भीनी खुशबू बेकरार करने लगी, तो आखिरकार नन्दा को रजाई से बाहर निकलना पडा।
क्या बना रही हो माँ? उसने जाकर पीछे से माँ के गले में अपनी बाँहें डाल दी।
एक चीज हो तो बताऊँ। बहुत कुछ बना रही हूँ। तेरे पापा के नए बॉस और उनकी पत्नी खाने पर आ रहे हैं। स्टार्टर तो बाजार से मँगवा लिए हैं। गरम-गरम रोटी कमला बना देगी। पर डेजर्ट, सब्जियाँ, पुलाव, रायता, सूप, सलाद सभी कुछ मुझे ही तैयार करना है।
आपने मुझे क्यूँ नह उठाया? चलो अभी भी देर नह हुई है। मैं नहाकर फ्रेश होकर आती हूँ।
गुनगुने पानी की धार सर पर पडी, तो नन्दा का दिमाग खुलने लगा। माँ कितनी सहृदया और मिलनसार हैं। मेहमाननवाजी तो उनकी रग-रग में बसी हुई है। नन्दा बचपन से देखती आ रही है बेहद दयालु और धार्मिक प्रवृत्ति की माँ ने नाते रिश्तेदारों से लेकर घर में आने वाले धोबी, मेहतर, बाई तक के दिलों में एक विशिष्ट सम्मानीय स्थान बना रखा था। नन्दा के पापा कई बार मजाक में नन्दा को कहते थे, तुम्हारी माँ जानबूझकर 4 की बजाय 6 लोगों का नाश्ता खाना पकाती है। ताकि बच जाए और फिर वह घर में आने वाले हर ऐरे गैरे,नत्थू खैरे को भकोसती रहे। माँ इशारा समझ जाती थीं।
तो इसमें गलत क्या है? ये बेचारे कहाँ जाकर खाएँगे? ये भी हमारी तरह हाड माँस के इंसान हैं। इनकी रगों में भी वही खून बहता है जो हमारी रगों में बहता है। हमें खाता देख इनका भी तो मन ललचाता होगा? सर्दियों में जब हमारा रजाई से बाहर मुँह निकालने को भी मन नह करता, ये ठण्ड में ठिठुरते आकर हमारा काम करते हैं। दस बार ठण्डे पानी में हाथ डालते हैं। क्या एक गरम चाय की प्याली पर भी इनका हक नह बनता? माँ पापा के मजाक पर भी तुनक उठती थीं और वार्तालाप को गम्भीर मोड पर ले आती थीं। ऐसे मौकों पर पापा आत्मसमर्पण करते तौलिया लेकर बाथरूम में घुस जाते। पर नन्दा मोर्चे पर डटी रहती।
अच्छा माँ, जब आप यह मानती हैं कि ये हमारी ही तरह हाड माँस के इन्सान हैं, इनकी रगों में भी वही खून बहता है जो हमारी रगों में तो फिर आप इनके बर्तन अलग क्यों रखती हैं? नन्दा का इशारा जीने की सीढी पर रखे बर्तनों की ओर होता था। डण्डी टूटे कप, किनारे टूटे प्याले, दरार आई तश्तरियों की संख्या हर दीवाली की सफाई के बाद आश्चर्यजनक रूप से बढ जाती थी। नन्दा की बात से माँ एकबारगी तो सकपका गई थीं। उन्हें उससे ऐसे आक्रामक सवाल की उम्मीद नह थी। पर फिर तुरन्त उनका जवाब हाजिर था, हमारे बडे बुजुर्गों ने यदि कुछ नियम कायदे बनाए हैं, तो सोच समझकर ही बनाए होगें। यदि उनकी पालना से कोई नुकसान नह हो रहा, तो हमें उनकी भावनाओं को ठेस नह पहुँचानी चाहिए।
नन्दा के पापा तब तक नहाकर आ चुके होते थे और माँ-बेटी का वार्तालाप भी सुन चुके होते थे। नन्दा बेटी, तुम्हारी माँ के अपने मौलिक विचार होते हैं और उन्हें न्यायसंगत ठहराने के अपने मौलिक तर्क। इसलिए उनसे बहस करके पंगा मत लिया करो। इस तरह मजाक में आरम्भ हुई बात अन्ततः मजाक पर ही जाकर समाप्त हो जाती थी। माँ का पैसे, कपडे, बिस्तर, राशन आदि देकर जरूरतमन्दों की मदद का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा।
शॉवर बन्द करते हुए नन्दा विचारों की दुनिया से लौट आई। फटाफट तैयार होकर वह माँ का हाथ बँटाने रसोई में पहुँच गई। सब्जियाँ काटती नन्दा को माँ प्यार से निहार रही थी। कितनी जिम्मेदार हो गई है मेरी बच्ची! शादी से पहले तो हर काम के लिए दस बार कहना पडता था और अब देखो खुद आगे बढकर सब काम कर रही है।
अच्छा तो नह लग रहा 4 दिन के लिए मायके आई बेटी से काम करवाते हुए। पर तेरे पापा का स्वभाव तो तू जानती ही है। हर सप्ताह पार्टी न करें तो उन्हें अपच हो जाती है।
हाँ, यह तो है। पर मैं तो ये पार्टियाँ वहाँ बहुत मिस करती हूँ। रोहन को भी बताती रहती हूँ कि हमारे यहाँ पार्टी नह, पूरा एक आयोजन होता है। तरह-तरह के व्यंजन तो बनते ही हैं इसके अलावा पूरे घर की साजसज्जा, अलग-अलग तरह की क्रॉकरी, मेहमानो के लिए बुके, तोहफे और भी जाने क्या क्या! और अब जब पापा के नए बॉस सपत्नीक आ रहे हैं तो फिर तो कहना ही क्या?
फोन की घण्टी बजी तो नन्दा फोन रिसीव करने दौड पडी। रमा मौसी का फोन था। नन्दा की अपनी मौसी और उनकी बेटी तान्या से गहरी छनती थी। तान्या का प्रशासनिक सेवा में चयन हो गया है, यह सुनकर वह खुशी से उछल पडी। एक ही साँस में नन्दा ने माँ-बेटी को ढेरों बधाइयाँ दे डाली। फिर फोन पास आ चुकी माँ को पकडा दिया। माँ ने भी खूब बधाइयाँ दीं। अब इसके लिए जल्दी से सुपात्र ढूँढकर इसके भी हाथ पफले कर डाल। अब तो लडका भी आइ.ए.एस, आई.पी.एस ढूँढना पडेगा। क्यूँ?
वही तो दीदी! इसीलिए तो सबसे पहले तुम्हें फोन कर रही हूँ। तुम्हारे और जीजाजी के तो इतने कॉन्टेक्ट्स हैं। आए दिन घर पर पार्टियों का दौर चलता रहता है। कोई अच्छा प्रशासनिक अधिकारी लडका हो, तो बताना। दूसरी कास्ट का भी चलेगा। पर अब आई.ए.एस, आई.पी.एस से कम नह चलेगा।
हाँ हाँ बिल्कुल! यह भी कोई कहने की बात है! अब फोन रखती हूँ। आज भी एक पार्टी है। माँ फोन रखकर फिर से सामान्य भाव से सब्जी हिलाने लगी थीं। लेकिन नन्दा तो तान्या की शादी की बात सुनकर उछल ही पडी थी।
माँ, तान्या की शादी हो रही है। मैं तो खूब डाँस करूँगी। खूब ड्रेसेज बनवाऊँगी। अब आप यह मत कहना कि अभी तेरी शादी में तो इतनी बनवाई थीं। मुझे तान्या के हर फंक्शन के लिए नई ड्रेस चाहिए। नन्दा ठुनकने लगी।
ओ शेखचिल्ली! तान्या की शादी की अभी ईंट भी नह रखी गई है और तूने पूरा महल चुन दिया है। जरा जल्दी हाथ चला, टेबल भी तुम्हें ही सजानी है। माँ ने प्यार से झिडका, तो नन्दा फटाफट रसोई का काम खत्म कर डाइनिंग हॉल में आ गई और टेबल सजाने लगी।
यह नह वो महँगा वाला डिनरसेट लगा जो तेरे पापा कोरिया से लाए थे। और उधर साइड वाली दराज में एक नया कोस्टरसेट रखा है वो भी लगा देना। नैपकिन्स सारे अलग अलग फोल्ड करके रखना। सेलेड पर क्लिंग रेप चढाया या नह?
माँ के निर्देशों से स्पष्ट था कि आने वाले मेहमान विशिष्ट ही नह अतिविशिष्ट हैं और उनकी आवभगत में जरा-सी भी लापरवाही नह रखनी थी।
निश्चित समय पर मेहमान आए तो घर के सदस्य ही नह वरन घर का कोना-कोना मेहमानों का स्वागत करता प्रतीत हो रहा था। माँ और पापा को मेहमानों के स्वागत में बिछा-बिछा जाता देखकर नन्दा ने भी औपचारिक अभिवादन के बाद घर के अन्दर की कमान मुस्तैदी से सम्भाल ली। बीच-बीच में उसके कान बैठक में चल रही बातचीत का जायजा भी ले रहे थे। जैसा कि सामान्यतः होता है सामान्य औपचारिक वार्तालाप से आरम्भ हुआ आपसी संवाद शीघ्र ही दो गुटों में विभक्त हो गया। दोनों पुरूष ऑफिस ऑफिस खेलने लग गए थे और दोनों महिलाओं ने फैशन, गहने, घरगृहस्थी की बातों का पिटारा खोल लिया था। कितने आश्चर्य की बात है सैंकडों पूर्व मुलाकातों के बाद भी दो पुरूष जब मिलते हैं, तो उनकी गाडी उसी घिस-पिटे विषय ऑफिस या राजनीति पर घिसटती रहती है जबकि दो महिलाएँ पहली ही मुलाकात में सौन्दर्य, फैशन, स्वास्थ्य, मौसम,भोजन, कपडे, गहने, सास, बाई, बच्चे, पति जैसे भाँति-भाँति के विषय मिनटों में कॅवर कर डालती हैं। माँ और आगंतुक महिला भी कई विषय कॅवर करने के बाद अपने-अपने बच्चों के बारे में जानकारी दे रही थीं।
बडा बेटा आई.ए.एस है...
इतना सुनते ही नन्दा के कान चौकन्ने हो गए थे। रसोई कमलाबाई के हवाले कर वह परदे के पीछे आ खडी हुई थी। उसके कानों में तान्या की शादी की शहनाई गूँजने लगी थी। आगंतुक महिला का एक एक शब्द वह उत्सुकता से निगलने लगी, ....उसका प्रोबेशन पीरियड समाप्त हो गया है। कलक्टर के तौर पर पहली नियुक्ति अभी मिली है। बहुत ही शर्मीला और सीधा है। हम तो पूछ-पूछकर थक गए हैं कि भई तेरी पसन्द की कोई हो तो बता दे। अब शादी की उम्र हो गई है। कब तक कुंआरा रहेगा? दूसरी जाति की भी चलेगी।
नन्दा का मन बल्लियों उछलने लगा था। मन कर रहा था झटके से परदा हटाकर अन्दर चली जाए और तान्या का रिश्ता पक्का कर आए। यह माँ कुछ बोल क्यूँ नह रही? अच्छा, अभी आँटी की बात समाप्त नह हुई है। नन्दा फिर कान लगाकर सुनने लगी।
.... पर उसे तो काम से फुर्सत मिले तब लडकियों की ओर आँख उठाकर देखे ना? कहता है आप जिसे पसन्द कर लेगी उसी से शादी कर लूँगा। बताओ, आज के जमाने में ऐसा गऊ जैसा लडका होना मुमकिन है?
नह। माँ भी हाँ में हाँ मिला रही थी।
आपकी नजर में कोई उसके लायक लडकी हो, तो बताइएगा। प्रशासनिक अधिकारी हो तो बहुत ही अच्छा। अब मुझ पर भरोसा करके बच्चे ने मुझे इतनी बडी जिम्मेदारी सौंपी है तो उसके स्तर की तो लानी पडेगी न? वरना कहेगा मम्मी ने मेरे लिए बीवी नह, खुद के लिए बहू ढूँढी है। दूसरी जाति की भी चलेगी। पर होनी उसके स्तर की चाहिए। आपकी नजर में कोई है?
जी,अभी तो नह है। कोई आएगी नजर में तो अवश्य बताऊँगी। आपने सूप लिया? स्टार्टर तो यों के यों रखे हैं। आप लोग तो कुछ ले ही नह रहे। लगता है, पसन्द नह आया? माँ औपचारिक आवभगत में लगी थी और उधर नन्दा मन ही मन झुँझला रही थी। माँ तान्या की बात क्यों नह कर रही? दिमाग से तो नह उतर गया? पर कैसे उतर सकता है अभी पाँच मिनट पहले तो मौसी से बात हुई है? शायद माँ पहले मौसी से बात करना चाहती हों? ऐसे मामलों में जल्दबाजी अच्छी नह होती न?
नन्दा खाना लगवा दो बेटी! माँ की पुकार सुन नन्दा हडबडाती फिर से रसोई में पहुँच गई थी। और खाना लगवाने लगी थी। उसका दिल कर रहा था जल्द से जल्द यह खाने का तामझाम समाप्त हो तो वह और माँ रमा मसी से बात करें। तान्या की शादी की बात सोच सोचकर ही वह खुशी से पागल हुई जा रही थी। आखिर मेहमान विदा हुए। पापा को भी किसी जरूरी काम से निकलना पडा। एकान्त पाते ही नन्दा ने माँ को पकड लिया।
आपने इनके आई.ए.एस बेटे से तान्या की शादी की बात क्यूँ नह की? अभी-अभी तो आपसे रमा मौसी ने बोला था।
पागल हुई है जो इनसे रिश्ता जोडने की बात कर रही है? तुझे पता भी है ये किस जाति के हैं?
किसी भी जाति के हों मौसी ने कहा तो था और ये आंटी भी तो यही कह रही थीं।
माँ नन्दा का हाथ पकडकर खींचती हुई दूर कोने में ले गई ताकि रसोई में बर्तन धोती कमलाबाई न सुन ले।
नीची जात के हैं वे! आरक्षण वर्ग के! समझीं?
नन्दा सन्न रह गई थी। यह सोचकर कि जात-पांत की इतनी एहतियात बरतने वाली माँ सब कुछ जानते हुए भी उन लोगों के साथ कितना घुल-मिल रही थी, यहीं साथ बैठकर खा पी रही थी। नन्दा की दृष्टि डाइनिंग टेबल पर टिक गई। कीमती डिनरसेट का कुछ सामान वहाँ अब भी मौजूद था। नन्दा का तार्किक मन शान्त न रह सका। तो फिर आपने उनके लिए यह बेशकीमती डिनरसेट क्यों लगवाया? उनके साथ बैठकर क्यों खाया पीया? आप तो बुजुर्गों के बनाए नियम कायदों में विश्वास रखती हैं न?
नन्दा ने देखा माँ आत्मसमर्पण की मुद्रा में पास रखी कुर्सी पर ढेर हो गई थीं। वह तुरन्त उनके लिए पानी का ग्लास ले आई। माँ ने पानी पीया। तू भी बैठ जा.... उन नियम कायदों में मेरा विश्वास अब भी है। पर अब उन नियम कायदों से भी ऊपर कानून का डण्डा आ गया है। तेरे पापा के बॉस की बात छोड अब तो ऐसा भेदभाव घर में काम करने आने वाले बाई, मेहतर, धोबी, माली किसी के साथ भी नह रख सकते। क्या पता किसकी नीयत कैसी हो? कल कौन कानून के कठघरे में खडा कर दे? माँ बहुत धीमे स्वर में बात कर रही थीं। नन्दा की नजरें अनायास ही जीने वाली सीढी की ओर उठ गईं। उत्सुक नजरें कुछ खोज रही थ। आश्चर्य! टूटे कप, प्यालों और तश्तरियों का ढेर नदारद था।
नन्दा के मुख से खुशी और आश्चर्य की मिली जुली चीख-सी निकल गई। तो क्या आपने उन्हें भी अच्छे बर्तनों में खिलाना पिलाना आरम्भ कर दिया?
नह, मैंने सब कुछ बन्द ही कर दिया। जो अपने हक के नाम पर हमारी सहृदयता को भुला हमें जेल की सलाखों के पीछे करे, आरक्षण के नाम पर हमारी ही प्रगति में रोडे अटकाए उनके लिए कुछ करने को अब दिल ही नह करता। माँ की आवाज में दुख भी था और मजबूरी भी।
नन्दा आश्चर्य से माँ को देख रही थी। पापा ठीक कहते हैं तुम्हारी माँ की अपनी सोच और अपने तर्क हैं। उनसे बहस में जीतने की कोशिश मत किया करो। नन्दा का प्रबुद्ध मन कुछ और ही सोचने लगा था। बात जीत हार की नह, नफा नुकसान की है। इंसान कई बार एक छोटी सी चीज पाने के लिए अनजाने ही कितनी बडी चीजों की कुर्बानी दे बैठता है। समान बरतनों में खाने का अधिकार मात्र पाने के लिए ये लोग कितने दिलों की सहृदयता से हाथ धो बैठे हैं। नफे में तो शायद कोई भी नह रहा- न देने वाला, न पाने वाला। क्योंकि दिलों में बढती दूरियाँ ऐसा नुकसान है जिसकी आसानी से भरपाई नह हो सकती। उद्देश्य सही होते हुए भी शायद हमने उस तक पहुँचने का रास्ता गलत चुन लिया। खुद को सक्षम बनाने की बजाय विरोध, प्रदर्शन, धरना जाने क्या-क्या उपाय कर लिया! उम्र भर गालिब यही भूल करता रहा। धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा।

सम्पर्क - बी-11, स्टॉफ कॉलोनी, राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय,
कोटा- ३२४०१० मो. ९४६१५१५७६०