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टुकडों में बँटी मुलाकातें

दिनेश विजयवर्गीय
सर्दी की सुहानी धूप खिली हुइ थी। नवीन के माता-पिता उस दिन बहुत खुश थे। उनके एक मात्र पुत्र का चयन लोकसेवा आयोग से अंगे*जी व्याख्याता के लिए जो हुआ था। बून्दी जिले की धार्मिक नगरी केशवराय पाटन के राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय के लिए उसे नियुक्ति आदेश मिला था।
सोमवार को सुबह वह के.पाटन के लिए जाने को हुआ तो उसकी माँ ने उसे दही खिलाकर और उसके सिर पर हाथ रख कर मंगलकामना की। उसने अपने माता-पिता के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और दो कि.मी. दूर बस स्टेण्ड के लिए पैदल ही चल दिया।
जब वह बस स्टैण्ड पहुँचा तो उस समय नौ बज रहे थे। उसने पूछताछ कार्यालय से के.पाटन जाने वाली बस के समय के बारे में पूछा। मालूम चला कि बस अभी आधे घण्टे बाद जाएगी। वह प्रतीक्षालय के बाहर गुनगुनी धूप में खडा हो गया। लेकिन बसों का आना-जाना बना रहने से वह दूर नीम के पेड के नीचे लगी बैंच पर बैठ गया।
वहाँ थोडी देर बाद कंधे पर बैग झुलाये एक युवती भी आकर बैठ गई। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। वे एक-दूसरे की सुन्दरता को देख मन ही मन प्रसन्न होकर रह गए। बैंच पर बैठी पच्चीस वर्षीय युवती समता जैन भी के.पाटन के राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय में अंग्रेजी की वरिष्ठ अध्यापिका थी। उसकी भी पिछले माह ही नियुक्ति हुई थी। वे दोनों आपस में कुछ बोले-करे नह। अनजान रिश्तों को आपस में बुनते रहे।
आधा घण्टा बीत गया, तो नवीन फिर वहाँ गया, जहाँ के.पाटन जाने वाली बस खडी होती है। बस अभी भी नह लगी थी। पूछने पर मालूम हुआ कि बस दस बजे चलेगी। अभी कण्डक्टर नह आया।
वह पूछताछ कर फिर उसी बैंच पर आकर बैठ गया। वहाँ अब वह युवती नजर नह आई। उसने टाइम पास करने के लिए अपने बैग से बच्चों की पत्रिका निकाली जिसमें उसकी बाल कहानी प्रकाशित हुई थी। वह उसे पढने लगा।
सरस्वती की कृपा थी नवीन पर। वह अपनी साहित्य सृजन यात्रा में अपनी स्वस्थ जागरूकता व गतिशीलता बनाए हुए था। अतः उसकी कहानी कविता चाहे बडों के लिए हों या बच्चों के लिए, उसकी सृजनात्मकता से उसकी साहित्य जगत में पहिचान बनने लगी थी।
वह कहानी पढ ही रहा था कि वह युवती फिर से बैंच पर उसी के पास आकर बैठ गई। अब उसने ही नवीन से बातचीत शुरू की। आपको भी किसी बस का इन्तजार है? उसके एकाएक प्रश्न करने पर उसने पत्रिका पढना छोडकर उसकी ओर देखा और फिर बोला जी। केशवरायपाटन जाने वाली बस का। दस बजे करीब जाएगी। मैं अभी पूछकर आया हूँ।
आपको भी कहीं जाना है ? नवीन ने भी उत्सुकता वश पूछा।
मुझे भी केशवरायपाटन ही जाना है। आज थोडा लेट हो गई। अब प्रिसिंपल मैडम की शिकायत सुननी पडेगी।
आप वहाँ टीचर है? उसने भी बातों में रूचि जताई।
मेरी एक माह पूर्व ही गर्ल्स स्कूल में सैकण्ड ग्रेड अंग्रेजी शिक्षक के पद पर नियुक्त हुई है। अभी रोज अप डाउन कर लेती हूँ। लगभग पैंतालीस कि.मी. की दूरी है। इस रूट पर लोकल बसें ही चलती हैं। रोड भी ठीक नह है। बसें भी एक घण्टे के अन्तराल से संचालित होती है।
उसके बारे में इतनी जानकारी प्राप्त करने के बाद नवीन भी लगे हाथ अपना परिचय देने लगा। मैं भी आपकी ही राहों का साथी हूँ। मुझे भी उसी स्कूल में जाना है, जहाँ आप जा रही है।
क्या आपका नाम नवीन माहेश्वरी है तो नह?
हाँ, मैं ही नवीन माहेश्वरी हूँ।
कल प्रिंसिपल मैडम बता रही थी, कोई नया अंग्रेजी विषय का व्याख्याता नियुक्त हुआ है।
आपने सही पहचाना। आज मैं पहली बार शिक्षक के रूप में नौकरी ज्वाइन करने जा रहा हूँ।
आप बून्दी के ही रहने वाले हैं क्या ? यहाँ कहाँ रहते है ?
वर्षों से यहीं रह रहा हूँ। मेरे पिता भी रिटायर टीचर है। और माँ गृहिणी। रजत कॉलोनी में रहता हूँ।
और आप? उसने भी उसके बारे में और अधिक जानना चाहा।
मैं सफलोर रोड पर जैन मन्दिर के सामने वाली मधुबन कॉलोनी में रहती हूँ। संयोग से मेरे पापा भी टीचर थे। वे भी रिटायर हो गए। मेरे एक बडे भाई है, जो बारां ट्रेजरी में अकाउण्टेण्ट हैं। माँ गृहिणी हैं।
नवीन ने बातों में मीठा पन घोलने के लिए पास के होटल वाले से दो गिलास चाय मँगवाली। चाय देख वह बोली-सर, यह क्या किया ? अभी बस चलने को है। आपने चाय मँगवाली।
अभी दस मिनट बाकी हैं, तब तक बातें चलती रहेंगी। अब तो हम बहुत कुछ एक-दूसरे को जानने लगे हैं। अरे हाँ, आपका नाम तो जाना ही नहीं?
मेरा छोटा सा प्यारा नाम है-समता जैन। मैंने भी अंग्रेजी में एम.ए किया है। बी.ए. में मेरे ड्राइंग, हिन्दी विषय भी रहे हैं।
चलो अच्छा है, अब दोनों का अध्यापन विषय एक ही रहेगा। वहाँ स्कूल का माहौल कैसा है ?
गर्ल्स स्कूल है। प्रिसिंपल मैडम कोटा से स्वयं की गाडी से आती जाती हैं। वह अनुशासन प्रिय है। कभी कोई क्लास खाली नह रहती। पूरे आठों पीरियड पढाई होती है। वहाँ बोर्ड कक्षाओं का परीक्षा परिणाम भी अच्छा रहता है।
समय हुआ, तो वे चाय पीकर बस के लिए चल दिए। दोनों एक ही सीट पर बैठ गए। जैसे ही ड्राइवर आया, बस रवाना हो गई। थोडी ही देर में बस हवा से बात करने लगी। लगा ड्राइवर कम समय में पहुँचा देगा। दोनों के बीच बातें स्वाभाविक रूप से चलती रहीं।
समता ने अपना टिकिट लेने के लिए बैग से रूपये निकाले, तो देखा कि आज वह जल्द बाजी में घर पर कम्प्यूटर टेबिल पर ही लन्च बॉक्स भूल आई। यह बात उसने नवीन से कहाँ तो वह बोला-मेरे पास भी लंच बॉक्स है। माँ ने पर्याप्त भोजन रखा है। अपन शेयर कर लेंगे।
समता बोली- नह सर, ऐसी कोई खास बात नह। ये मानलूंगी कि आज कोई व्रत है।
नह आप चिंता न करें। मेरे खाना कम नह रहेगा। मैं अभी इसकी व्यवस्था करता हूँ। नवीन ने टिफिन की एक पोलीथिन की थैली में दो आलू के परांठे रख दिए।
अरे, आप व्यर्थ ही कष्ट कर रहे हैं। समता ने सहज भाव से कहा। अपनों के लिए कष्ट कैसा अपनी राहें और मंजिल एक ही तो है। फिर परायापन कैसा? नवीन ने अपना पन दिखाते हुए कहा।
समता सोचने लगी नवीन साहित्यिक शब्दों की मिठास घोल कर बात करने लगा है।
नवीन ने बातों को नया मोड देते हुए समता से पूछा-आप कह रही थी कि बी.ए. में ड्राइंग सबजेक्ट भी रहा है, तो क्या कुछ बनाया ड्राइंग में?
मोर्डन आर्ट के साथ लैण्डस्कैप में रूचि रही है। लेकिन मेरी विशेष रूचि स्केच कला में रही। मैं हमेशा बैग में पेन्सिल व स्केच बुक रखती हूँ। जब कहीं भी कोई अच्छा दृश्य देखने को मिल जाए, उसे ही पहले रफली, स्केच कर लेती हूँ। फिर फुर्सत में उसे डवलप कर चित्र बना लेती हूँ।
आप स्केच कला में सिद्ध हस्त है, तो किसी व्यक्ति का स्केच कितनी देर में बना लेती है?
यदि एकाग्रता बनी रही तो दस मिनट में ही स्केच बन जाता है।
आप मेरा स्केच कितने समय में बना सकती है? फिर नवीन ने समता से उत्तर सुने बिना ही कहा-छोडिये फिर कभी देखते है।
बातों में पता ही नह चला कब के.पाटन आ गया। स्कूल पहुँचे तब पहला पीरियड समाप्त होने को था। वे एक साथ प्रिसिंपल रूप में गए। नवीन ने अपना परिचय दिया, तो उन्होंने कुर्सी पर बैठने को कहा। समता के मेरे साथ होने से उससे कुछ अधिक कहा नह, बस क्लास संभालों कह कर ही चुप हो गई। मैडम ने घण्टी बजाकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी-चपरासिन से पानी मँगवाया। नवीन ने संक्षिप्त में अपना परिचय देते हुए ड्यूटी ज्वॉइन की।
मैडम ने बारहवीं कक्षा की बोर्ड कक्षाओं में अंग्रेजी विषय की पढाई के बारे में बताया। उन्होंने कहा छात्राओं को पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त ग्रामर पर विशेष ध्यान देना। ताकि छात्राएँ स्वयं अंग्रेजी में वाक्य सृजन कर सकें।
जब तीसरा पीरियड शुरू हुआ तो प्रिसिंपल मेडम नवीन को बारहवीं क्लास ले गयी और नवीन सर का छात्राओं से परिचय कराते हुए कहा अब तुम्हारी क्लास लेकर तुम्हारी अंग्रेजी की गुणतत्ता बढाएगी।
स्कूल छुट्टी के बाद शाम को नवीन व समता बूंदी लौटने लगे। बस स्टेण्ड पर बस जाने के लिए तैयार खडी थी। दोनों उसमें बैठ गए। बस में भीड अधिक होने से दोनों आगे पीछे की सीट पर बैठ पाए। तीस कि.मी सफर के बाद बस कुछ खाली हुई तो फिर वे दोनों एक ही सीट पर बैठ गए। समता ने पूछा- कैसा लगा स्कूल?
स्कूल भी अच्छा और गर्ल्स भी अच्छी और मेडम अनुशासन प्रिय लगीं। पूरे स्कूल में पढने-पढाने का मन-वातावरण है। यह एक शिक्षण संस्थान के लिए पहली जरूरत है। नवीन ने अपना अनुभव बताया।
बून्दी आने को था। समता ने कहा-सर! कल साढे आठ वाली बस से चलना पडेगा, तभी समय पर पहुँच पाएँगे। उन्होंने एक-दूसरे को अपने मोबाइल नम्बर दिए। बूंदी आते ही दोनों अपने घर की राहों की ओर चल दिए।
समता ने अपने ममी-पापा को बताया -यहीं के एक युवा नवीन माहेश्वरी हमारे स्कूल में अंग्रेजी के व्याख्याता जाने लगे हैं। वे गम्भीर व्यक्तित्व और साहित्य सृजन में रूचि रखते हैं। अब दोनों का साथ रहेगा। उधर नवीन भी ईश्वर से प्रार्थना कर कृतज्ञता प्रगट करने लगा कि उसने पहली बार में ही एक सुन्दर चेहरे वाली हमराही से मुलाकात करा दी। वह उसके आकर्षण और उससे हुई बातों के बारे में सोचता रहा। अब दोनों को सुबह समय पर पहुँचने की चिन्ता थी।
सरकारी नौकरी लगने के बाद नवीन के माता-पिता को अब उसकी शादी के बारे में विचार करने लगे। कोई अच्छा रिश्ता मिल जाए, तो जल्द ही शादी कर दें। समता के मम्मी-पापा भी उसकी शादी के बारे में सोचने लगे। कमाऊ लडकी है, अच्छा रिश्ता होने की संभावना है। इसके लिए उन्होंने भी प्रयास शुरू कर दिए। अजमेर से आगे ऑफर पर उन्होंने लडकी देखने आने को भी कह दिया। लडका अभी सरकारी स्कूल में थर्डग्रेड टीचर है।
दूसरे दिन नवीन और समता दोनों लगभग साथ ही बस स्टेंड पहुँचे बस भी समय पर चल दी। वे दोनों एक ही सीट पर साथ ही बैठे थे। दोनों कुछ समय तो भीड-भाड के चलते चुप ही रहे। नवीन ने अपने बैग से एक पत्रिका निकाली, जिसमें उसकी कहानी प्रकाशित हुई थी। वह उसे ही पढने लगा। समता भी पत्रिका के उस पेज पर जिसमें नवीन की कहानी मय फोटो परिचय के साथ छपी थी उसे आँखे गडाये देखती रही। बस तीस कि.मी. चलने के बाद उसमें यात्री कम रहने से कुछ शान्ति हुई। खिडकी से ठण्डी हवा आ रही थी। समता को कंपकपी लगी तो नवीन ने खिडकी का काँच पूरी तरह बन्द कर दिया।
आज टिफिन में क्या लाये हो सरजी? समता ने बातचीत का सिलसिला छेडा। मुझे पता नह माँ ने क्या कुछ बना कर रख रखा है। खाते समय ही देख लेंगे। और आप क्या कुछ विशेष लाई हो? नवीन ने भी उसी अंदाज में पूछ लिया। समता ने टिफिन की ओर देखते हुए कहा-माँ पराठे के साथ दूध मिश्री के लडडू भी रख दिए।
ओह! तो आज मुँह मीठा कराओगी। नवीन मे हँसते हुए कहा।
बिल्कुल जब के.पाटन बस स्टेंड पहुँचेंगे, तब आपका मीठा मुँह कराऊँगी। दोनों की रस भरी बातें चलती रही। इन्हीं बातों के अपनेपन से वह एक-दूसरे के निकट आते रहे।
बस केशवरायपाटन बस स्टेण्ड पर पहुँची तो सवारियाँ भी उतर गई। ड्राइवर कण्डक्टर चाय पीने होटल पर चले गए। बस में वे दोनों रह गए, तो समता ने लड्डू नवीन के मुँह में डाला और एक स्वयं ने लेकर मुँह मीठा किया। बस से उतर वे स्कूल की ओर चल दिए।
जिस पत्रिका में विनय की कहानी प्रकाशित हुई थी वह एक लोकप्रिय पत्रिका है। जो स्कूल में भी आया आती है। प्रिंसिपल मैडम ने भी उसे कल ही देखा था। नवीन का फोटो देख उसे खुशी हुई कि एक लेखन शिक्षक स्कूल में जुडा।
लंच टाइम में चाय के समय स्टाफ मेम्बर्स के बीच प्रिंसिपल मैंडम ने नवीन का परिचय कराते हुए कहा कि यह साहित्य सृजन की क्षमता भी रखते हैं। मैडम ने अपने साथ लाई पत्रिका में छपी कहानी को सबको दिखलाया। सबने उनको बधाई दी। मेडम ने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि इनके अध्यापन से छात्राओं को अंग्रेजी में बहुत अच्छा सीखने समझने को मिलेगा।
तीसरे दिन समता के बिना ही नवीन ने सफर किया। उसे आज बस का सफर बडा बोरियत सा लगा। समता के साथ तो मालूम ही नह पडता था कि कब सफर कट गया। आज नह आने के लिए उसने कल बताया नह और न आज मोबाइल पर भी जानकारी दी।
स्कूल से घर लौट आया। कुछ ही देर में माँ ने उसके लिए चाय बना दी। चाय पीते वह पत्रिकाएँ देखता रहा। वह खुश हो गया कि उसकी एक पत्रिका में कहानी व एक में कविता प्रकाशित हुई थी। वह अपनी रचनाएँ पढने लगा।
रात को जब सोने लगा तो आँखों में नींद ही गायब थी। रह रह कर बस यही बात सता रही थी, आखिर समता ने उसे नह आने के बारे पहले से क्यों कुछ नह बताया।
अगले दिन वह स्कूल जाने के लिए बस स्टेंण्ड समय पर पहुँच गया। उसने देख आज भी समता अभी तक नह आई थी। बस रवाना हो गई। वह उसे बस खिडकी से दूर तक देखता रहा। आती हुई नजर आए, तो बस रुकवादे। पर वह आयी नह। उसने आज भी मोबाइल पर न आने के बारे में कोई जानकारी नह दी।
नवीन शाम को स्कूल से लौट आया। वह अपने रूम में बैठ, चाय पीता उसी की यादों में खोया हुआ था। उसकी इच्छा हुई कि उससे मोबाइल पर बात करे। पर दूसरे ही पल उसने अपना विचार बदल कर, अपनी अधूरी पढी कहानी को आगे पढने में लगा।
अगले दिन सुबह भी वह बस स्टेंड पहुँच गया। उसने इधर-उधर देखा, लेकिन अभी तक भी समता नजर नह आई। बस रवाना होने लगी तो वह निराश मन से उसमें बैठ गया। वह उसी के बारे में सोचता रहा। उसने कुछ ही दिनों में जान पहिचान ने जैसे उस पर कोई जादू कर दिया। उसकी सुन्दरता और उसकी अभिव्यक्ति कला से वह खुश था। अब तो वह मन ही मन सोच ने लगा कि कितना अच्छा हो वह उसी की जीवन संगिनी बन जाए। पर यह सब उसको लिए सपने देखने जैसा था। अभी तो वह सिफल थोडा बहुत ही समता को जानने ही लगा है।
समता आज स्कूल के लिए देर होने से बस से सफर नह कर जीप से चली गई। जब पहुँची प्रार्थना चल रही थी। नवीन की निगाह उस पर गई तो वह प्रसन्न हो गया। वह आज रंग-बिरंगी आकर्षक पहनावें में थी। जब उसने उसे पास से देखा तो लगा, चेहरा आज चमक दमक रहा था। लगा जैसे ब्यूटीपार्लर से होकर आई हो।
दोनों की आज व्यस्तता के चलते बातचीत नह हो पाई। बस आँखों ने ही आँखों की भाषा समझली। स्कूल के बाद जब वह बस में साथ बैठ लौट रहे थे, तो नवीन ने अधिकार जताते हुए उससे पूछा-कल क्यों नह आई? मैं बस में बैठा देर तक प्रतीक्षा करता रहा।
प्रतीक्षा क्यों करी? यह तो मेरी सुविधा है। जब जिस बस से चाहूँ, आऊँ-जाऊँ? समता ने उसके मन के धीरज को टटोलते हुए रूखापन जताया। नवीन को सपने में भी समता से ऐसे उतर की आशा नह थी। वह बहुत देर तक चुप्पी साधे बैठा रहा। कहाँ तो वह इसे अपना जीवन साथी बनाने की सोच बनाने लगा था और कहाँ उसने उसे पल भर में तपते रेगिस्तान में धकेल दिया।
बून्दी आते ही वे दोनों अपनी राहों की ओर चुप-चुप चले गए। नवीन ने आज चाय के साथ, समता को याद तो किया, लेकिन यह उसके एकाएक पलटे रूख पर बेचैन हो गया। उसे लगा कि वह व्यर्थ ही प्यार की डोर में उससे लिपटने की कोशिश कर रहा था। उसने निश्चय किया कि वह भी उसके प्रति बेरूख ही होकर व्यवहार करेगा। उसने आज वह मन बहलाने के लिए माता-पिता के साथ ही खाना खाने बैठा। खाना खाते माँ ने कहा। बेटा, अब तुम्हारे लिए रिश्ते आने लगे हैं तुम भी उन पर विचार करना। जो तुम्हें अच्छा लगे उसी से बात आगे बढाएँगे।
माँ आप ठीक कह रही हैं। पर अभी मैं कुछ और ठहर कर अपने प्रस्ताव पर विचार करूँगा। मैं कॉलेज लेक्चरर शिप की तैयारी के लिए मन बना रहा हूँ।
ठीक है, जब तू कहेगा तब बात करेंगे। पर बेटा अच्छे ऑफर हाथ से निकल जाते हैं। जो प्रस्ताव आया है, वह भी सरकारी स्कूल में थर्ड ग्रेड टीचर है। उसके पिता भी रिटायर बाबू हैं और माँ गृहिणी।
माँ के विचार सुन नवीन ने सोच लिया कि यदि लडकी सुन्दर और सकारात्मक विचारों की होगी, तो विचार कर लेगा। माँ सही कहती है आए रिश्तों पर ध्यान न दो, तो हाथ से निकल जाते हैं और फिर कभी मजबूरी में जैसा मिल जाए, उसे ही स्वीकरना पडता है।
दो दिन फिर समता स्कूल की ओर से दिए गए सरकारी काम से बून्दी के जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय मे जाने से स्कूल नह जा पाई। अब नवीन का भी सोच उसके साथ आने-जाने के प्रति मोह भंग हो गया। वह बेकार ही इतने दिन बेगानी शादी में अब्दुला दीवाना बना हुआ था।
फिर एक सुबह स्कूल जाने के लिए दोनों बस स्टेण्ड समय पर पहुँच गए। आज हमेशा की तरह वे एक सीट पर नह बैठे। नवीन ने भी मन बना लिया था कि यदि वह नह बोलना चाहे तो उसकी मर्जी। वह भले ही उसे कितना ही पसन्द करे पर चुप्पी साधे रहा। बस अभी पच्चीस कि.मी. चली कि अचानक बन्द हो गई। ड्राइवर ने कहा-कुछ सवारियाँ उतरो, और धक्का लगाओ। इस रूट पर ये खटारा बसें ही चलती हैं। कभी भी कुछ हो जाए। पर इससे किसको क्या फर्क पडता है? नवीन के पास बैठा एक व्यक्ति बोला। सभी जेन्ट्स उतर गए। बस में रह गई तीन महिलाएँ।
समता दूर बैठी नवीन के मनोभावों को समझ रही थी। जरूर मुझसे बोले बिना, बिना पानी मछली की तरह तडप रहा होगा। कहता नह जिससे क्या हो। मेरी भी तो यही स्थिति है। अब फिर से प्यार की सरगम बनना चाहिए। यही सोच वह आज घर से ही एक पत्र लिख कर लाई थी। जिसे उसने नवीन के बैग में रख दिया। बस स्टार्ट हुई तो सारी सवारियाँ बस में बैठ गई।
स्कूल पहुँचे। रोज की तरह वे अपने काम में व्यस्त हो गए। लंच टाइम में आज नवीन स्टाफ में चाय पीने नह गया। उसने एक खाली कमरे में ही बैठ अपने पास रखी पत्रिका पढने के लिए बैग खोला। पत्रिका निकाली, तो देखा उसमें एक लिफाफा निकला, जिसमें एक कागज भी था। यह कागज ही नह एक पत्र था। पत्र में नीचे लिखा था -समता।
वैसे आज समता कुछ बोली करी नह। केवल देखकर मुस्काराई। फिर यह पत्र? उसे आश्चर्य हुआ। वह उत्सुक हो पढने लगा।
नवीन सर!
मैं जानती हूँ कि उस दिन आपको बेरूखा जवाब देने और बस में भी दूरी बना कर बैठने से, आपको असुविधापूर्ण तथा मेरा व्यवहार आशा प्रतिकूल लगा होगा। मैंने आपको बहुत निकट से परखा है। आप भी मुझे पसन्द करने लगे हो और मैं भी आपको दिल से चाहती हूँ। सीधे रास्ते पर चलने का उतना मजा नह आता जितना टेडे मेडे रास्तों में सफर करने में। ऐसे रास्तों में धीमी गति से आगे बढने का आनन्द होता है। मैंने उस दिन जो रूखा पन दिखाया वह ऐसे ही टेडे रास्तों पर चलने जैसा है।
मैं एक दिन अवकाश और दो दिन सरकारी कार्य से नह आई थी। अवकाश तो इसलिए लेना पडा कि उस दिन एक थर्ड ग्रेड टीचर अजमेर से मुझे देखने आने वाला था। वह मुझसे जुडनें के लिए बहुत-सी बातें करने लगा था। पर वह थर्डग्रेड और मैं सैकण्ड ग्रेड, मेरा तो जल्द ही प्रोमोशन भी हो सकता है।
आफ व्यक्तित्व के सामने वह कहीं नह ठहरता था। पर मैंने तो पहले से ही मन बना लिया था आफ साथ जीवन जीने का। यही मेरी दिल की सच्चाई है। मैं हमेशा आपकी पलकों बीच रहना चाहती हूँ। मैंने उससे रिश्ता जोडने को लेकर कोई जवाब नह दिया। मैंने अपने मम्मी-पापा को यह कहकर सन्तुष्ट कर दिया। फिर देखेगे। अभी मुझे इतनी जल्दी नह है।
पत्र पढकर नवीन के उदास दिल में फिर से इन्द्रधनुषी रंगीन फुलझडियाँ छूटने लगीं। प्रेम की रसधार फिर लहर बनकर उछालें मारने लगी।
स्कूल के बाद घर लौटते समय आज बस में अधिक भीड थी। सो वे एक साथ नह बैठ पाए।
घर पहुँच कर उन्होंने चाय पी। और एक-दूसरे के बारे में सोचने लगे। एक दूसरे के लिए सपने बुनते रहे। हर रोज दोनों के बीच प्रेम की बगिया में मीठापन घुलता रहा। उनकी बातें स्कूली टीचिंग से हटकर बस अपने तक ही सीमित रहने लगी। नवीन और समता साथ ही बैठे थे। अब उनकी बाते धीमी आवाज में होती रहती है। अब उनका यह सफर पता ही नह चलता कब कट जाता एक दिन स्कूल जाते बस तीस कि.मी. चली कि एकाएक वह बन्द हो गई। ड्राइवर कोशिश करता रहा। पर कुछ हुआ नह। अब सवारियाँ अगली बस आने की प्रतीक्षा करने लगी। जो एक घण्टे बाद आने को थी।
कुछ यात्री बस से उतर कर अन्य साधनों से जाने लगे। पर नवीन और समता नीचे उतर कर पास की एक चाय की गुमटी पर चले गए। सडक के दोनों ओर खेतों में सरसों की फसल महक रही थी। उसका आकर्षण देख दोनों एक खेत मे जाकर एक दूसरे के मोबाइल से फोटो लेने लगे। सेल्फी भी ली। दोनों प्रसन्न होते चाय की गुमटी पर चाय पीने लगे।
दूसरी बस आई तो वह उसमें बैठकर स्कूल पहुँचे। प्रिंसिपल मैडम ने दोनों को देरी से आता देख पूछा-आज देरी कैसे? मैडम बस खराब होने से दूसरी बस आने पर उसमें बैठकर आना हुआ। नवीन ने जवाब दिया- लेकिन आगे से ध्यान रखिये, नह तो बेहतर होगा यहीं रहने लग जाएँ। मैडम के इस सुझाव पर दोनों एक दूसरे को देखने लगे, जैसे उन्हें उनका सुझाव पसन्द आया हो।
दोनों के बीच टुकडों में बँटी मुलाकातें इसी तरह चलती रहीं। एक सुबह नवीन के पास एक और नयी पत्रिका थी। पत्रिका मे नवीन की कहानी तथा फोटो व परिचय भी प्रकाशित हुआ था परिचय में उसकी जन्म तिथि है पत्रिका देख रही समता ने ध्यान दिया। पन्द्रह दिसम्बर प्रकाशित थी। यानी कल ही इनकी जन्म तिथि है।
समता और नवीन टाइम से बस स्टेण्ड पहुँच गए। पर अभी तक भी के.पाटन जाने वाली बस कण्डक्टर के नह आने से बस रवाना नह हो पाई थी। पन्द्रह मिनट निकल गए। नवीन बस से नीचे उतर गुनगुनी धूप में खडा हो गया। समता ने सीट पर रखा नवीन का बैंग खोला और उसमें एक लिफाफे में पत्र, एक रूमाल तथा अच्छा सा बाल पेन रख दिया। तभी कण्डक्टर सीटी बजाता आया और बस रखाना हो गई।
दोनों स्कूल में प्रार्थना के बाद क्लास टीचिंग में लग गए। तीसरा पीरियड नवीन का खाली था। वह स्कूल पुस्तकालय मे जाकर अन्य पत्र-पत्रिका देखने लगा। तभी उसने एक पत्रिका का पता नोट करने के लिए बैग खोला तो उसमें वह लिफाफा मिला जिसमे समता ने एक पत्र रख छोडा था। उसने उसे खोल कर देखा। पत्र में संक्षिप्त पंक्तियों लिखी थी-जन्म दिन की शुभकामनाएँ। आपका भविष्य मंगलमय हो। आफ लिए छोटी-सी भेंट। नीचे लिखा था आपकी हम सफर -समता।
पत्र पढकर और उपहार देखकर उसे आश्चर्य हुआ कि समता ने कैसे मालूम कर लिया उसके जन्म दिन के बारे में। उसका दिल खुशियों से झूम उठा। उसे लगा कि अभी समता नजर आ जाए, तो उसे बाहों में समेट ले।
शनिवार का दिन। अभी चौथा पीरियड शुरू हुआ ही था कि प्रिंसिपल ने नवीन को अपने कक्ष में बुलाया और एक अप्रिय समाचार सुना दिया।-नवीन आपका ट्रान्सफर बून्दी जिले आखरी छोर-सुमेरगंजमण्डी हो गया। परसों तक ज्वॉइन करना है। मैडम ने दुख प्रकट करते हुए कहा-आफ टीचिंग से छात्राएँ प्रसन्न थी। आपका व्यवहार और सहयोग से हम कुछ ही दिन लाभान्वित हो सके। अब आपको बून्दी शहर से एक सौ कि.मी. दूर जाना होगा। रोज आना-जाना संभव नह होगा।
ऑफ टाइम में सभी स्टाफ मेम्बर्स के बीच प्रिंसिपल मैडम ने नवीन के टीचिंग की सराहना की। उन्हें उपहार भेंट किया। उन्होंने आशा व्यक्त करी कि जल्द ही इन्हें जीवन संगिनी मिल जाए, ताकि इनका भावी जीवन सहज व सुखद रूप से आगे बढता रहे।
जीवन संगिनी की बात सुनते ही समता ने नवीन की ओर देखा। उसे लगा कितना अच्छा होता कि अभी वहीं खडी होकर कह दे। मैंडम मैं बनूंगी इनकी जीवन संगिनी।
स्कूल के बाद नवीन रिलीव होकर आज यहाँ से विदा हो रहा था। रोज की तरह सफर में साथ रहने वाली समता जो उसका सम्बल बनी हुई थीं वह आज सुबह जितनी खुश थी उतनीं ही अभी दुखी हो रही थी। ईश्वर ने ये कैसा क्या किया, कि कुछ दिनों के साथ के बाद उन्हें बिछुडा दिया। रास्ते भर समता दुखी मन से उससे जुडकर बातें करती रही थी। जब वे बस से उतरे, तो अपनी राहों में आगे बढने से पहले समता ने कहा-नवीन सर! कल रविवार सबुह आप चाय पर मेरे यहाँ आमंत्रित है। मैं इन्तजार करूँगी।
नवीन ने अपने ट्रान्सफर की बात जब अपने माता-पिता को बताई तो उन्हें भी दुख हुआ। अभी तक तो रोज आना-जाना बना रहता था। लेकिन अब तो सप्ताह दो सप्ताह में ही आना सम्भव होगा। यही सोचकर माँ ने कहा-नवीन हम तुम तुम्हारी शादी जल्द ही करने की सोच रहे है। जो अभी तक प्रस्ताव आए हैं उनमें अभी तक वह थर्डग्रेड वाली सरकारी स्कूल टीचर ही सही है। बस तुम्हारी सहमति की जरूरत है। नवीन माँ की बात पर चुप हो गया। वह क्या जाने कि नवीन के मन में क्या कुछ चल रहा है।
इधर समता ने भी नवीन के बारे ने माँ को बहुत कुछ बता दिया था। माँ भी समझने लगी थी कि समता के दिल में क्या चल रहा है। उसने समता से पूछ ही लिया क्या नवीन पसन्द है तेरी? वह मुस्करा कर रह गई। माँ ने समता व नवीन के बारे में उसके पिता व भाई को बताया। रविवार को सुबह दस बजे नवीन अपनी मोटर साइकिल से समता के घर पहुँच गया। उस दिन समता का भाई भी आया हुआ था। ड्राइंगरूम में समता की माँ-पिता और भाई भी बैठ गए। लगा कहीं समता ने मेरे रिश्ता जोडने के बारे में तो नह बता दिया, पर उनकी बातों से ऐसा लगा नह।
समता की माँ ने कहाँ यह आफ सहयोग की प्रशंसा करती रहती है। आपका तो साथ ही छूट गया। दोनों एक दूसरे का सहारा बने हुए थे। अब आपका ट्रांसफर सुमेरगंजमण्डी हो गया। अब वहीं रहना होगा। अभी अकेले ही है। जल्द ही कोई लडकी पसन्द कर शादी कर लों।
हाँ, मेरी माँ भी कल यही कह रही थी। अब शादी करलो। नवीन ने फिर कहा जब योग होगा तब देखा जाएगा। हम दोनों का सफर रोज अच्छे से कट जाता था।
नाश्ते चाय के समय, समता की माँ ने कहा आपकी माँ सही कह रही है, अब शादी कर ही लो। वह उसने इतना भर कहा जब योग होगा तब देखा जाएगा।
योग तो आज ही बिठादें। माँ ने समता की ओर देखते हुए कहा। वह चौंका। उसे संदेह हुआ कि हो न हो शायद समता के परिजन उससे सम्बन्ध जोडने को सहमत है। तभी तो आज ही योग बैठने वाली बात कह रहे हैं।
अब सीधे से समता की माँ ने नवीन से पूछ ही लिया क्या आपको, समता पसन्द है ? यह आपकी जीवन संगिनी बनना चाहती है।
नवीन को तो सपने मे भी ऐसी स्थिति की आशा नह थी। समता ने तो मित्रतावश चाय के लिए बुलाया था। यद्यपि वह भी उसे दिल से चाहता है। उसने भी अनुकूल अवसर देखकर अपनी ओर से सहमति दे दी।
समता के परिजन ने नवीन से उसके माता-पिता की सहमति के लिए बात की। नवीन ने कहा मैं उनसे बातचीत करूँगा। यदि वह भी इस रिश्ते से सहमत हुए तो मैं उन्हें ही यहाँ ले आऊँगा।
समता ने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की, सब कुछ उसके मन की इच्छानुसार होने के लिए। नवीन भी लन्च के समय अपनी माँ पिताजी से बोला-माँ आप मेरी शादी की बात कर रही थी। हाँ, बेटा। क्यों तुम उस रिश्ते से तैयार हो तो, आज ही सहमति भेजदें।
नह माँ, वह नह। एक और मेरी पसन्द का रिश्ता है।
कौन है बेटा? माँ ंपिताजी ने एक साथ उससे जानना चाहा।
माँ, जिस दिन से मैं के.पाटन जाने लगा था, तभी से एक युवती समता जैन भी मेरे साथ आने जाने लगी थी। वह भी उसी स्कूल में सैकण्ड ग्रेड अंग्रेजी की टीचर है।
ठीक है। तुम्हारी पसन्द है तो बात कर लेंगे।
माँ! मैं आज सुबह समता के ही घर गया था। उन सबकी इच्छा भी यही है। आप चाहे तो, आज शाम को उन्हीं से चल कर बात कर लें।
ठीक है, चल चलेंगे, तेरी पसन्द है। तो हमें भी कोई आपत्ति नह।
नवीन के साथ उसके माता-पिता शाम को समता के घर पहुँचे। वह समता की सुन्दरता और योग्यता को देख, खुश हो गए। उन्होंने विचार विमर्श कर रिश्ता स्वीकृत कर लिया। वहीं समता और नवीन ने एक-दूसरे को माला पहना दी।
जनवरी माह में दोनों का विवाह सम्पन्न हो गया। आज समता और नवीन के दिलों की इच्छा पूरी हो गई। दोनों परिवार भी इस रिश्ते से खुश थे। उनका मानना था कि भगवान ने ही बनाई है यह जोडी।
नवीन और समता पति-पत्नी बनकर माउण्ट आबू घूमने निकल गए। अब वह अपने रिश्तों में प्रगाढता की मिठास घोलने लगे थे।

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