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अज्ञातवास का हमसफर

राजेन्द्र मोहन भटनागर
अंद्रेई आया। उसने पूछा, साहिब, मैम साहब ठीक हैं?
क्यों?
हम लोग आज भी चल सकते हैं। मौसम भी खुला हुआ है पॉपकॉर्न की तरह।
कब तक निकलना होगा?
लन्च लेकर भी चल सकते हैं। अंद्रेई ने कहा, उससे पहले भी यदि लन्च पैक करवा लेते हैं।... और वो सम्भव है यदि आप चाहें तो मैं होटल के मालिक से बात कर लूँगा।
थोडा-सा वक्त चाहिए। हम मैम साहिब की राय भी ले लें।
ठीक है। कहकर अंद्रेई चलने लगे। अचानक वह रूककर पूछने लगा.....कितनी देर बाद आऊँ ।
आधेक घण्टे बाद कभी भी।
उसके जाने के बाद सुभाष सोचने लगे। एक दिन पहले। पर क्यों? इस पर अंद्रेई कुछ *यादा ही खुश नजर आया था।
इसी समय वहाँ लीदिया आ गई। आते ही वह पूछने लगी, आज भी चल सकते हैं क्या?
अंद्रेई आया था क्या?
हाँ, यह प्रस्ताव उसी ने रखा था। उसे यहीं से लौटना है, क्योंकि उसके मालिक ने उसे वापस बुला लिया है।
यह बात उसने मुझे नहीं बताई थी।
आगे उसका साथी ले जाएगा। उसकी आगे सब जगह, सब चौकियों पर और अन्य जगह भी, जहाँ बीच-बीच में सन्देह उठने की नौबत आएगी, जान-पहचान है। लीदिया ने दोहराया।
तब तो
क्या सोचा है?
तुम्हें आगे का रास्ता मालूम है।
नहीं। मैं प्लेन से सीधे जापान आई थी और वहाँ से यहाँ।
तब क्या?
मैं भी इस रास्ते से अपरिचित हूँ यद्यपि मैंने मैप का खूब अध्ययन किया है। सुभाष कुछ गम्भीर हो गए।
मैप तो मैंने भी देखा है, परन्तु इस रास्ते में खतरनाक मोड, भयानक जलवायु के खतरे हैं।... बीच में कहीं कोई परिचित जगह भी नहीं है। लीदिया ने सोचते हुए कहा।
तो क्या सोचती हो?
इन्कार हो सकते हैं। बीमारी का कारण भी है।... लीदिया ने रुक-रुक कर सोचा। फिर वह आसमान की ओर ताकने लगी।
सुभाष में अन्तर्द्वन्द्व गहराया। रास्ता क्या है? किधर से है? बारम्बार उनके मन में गोबी का ठण्डा रेगिस्तान दूर-दूर तक साँय-साँय करने लगा। कोई ध्वनि नहीं। कोई प्रकाश नहीं। घना अँधेरा साइबेरिया ही साइबेरिया। हिम का रेगिस्तान। अज्ञात की ओर। अंद्रेई ने कहा था, अपर्याप्त है ठण्ड से बचने का यह इन्तजाम ! हम जिस रास्ते से गुजर रहे हैं। वह बेहद ठण्डा और हिमानी आँधी वाला है।, तूफान, बाढ और रास्तों पर पडने वाले अनिश्चित कटाव और अनसोचे भयावह यथार्थ के स्वप्न दर स्वप्न।
तब?
आप चाहें तो रास्ते में एक छोटी सी जगह पडेगी। प्रायः उस रास्ते से मास्को जाने वाले लोग वहाँ से सामान खरीदते हैं। मास्को वहाँ से तीन हजार मील से अधिक दूर है। साइबेरिया, हिम का ऐसा अरण्य हैं, जिसका ओर छोर नहीं। अंद्रेई ने कार को मोडा।
और तुम, अंद्रेई।
मुझे तो वहाँ रूकना है। वहाँ से मुझे किराये पर एक फर का कोट, वाटरप्रूफ चमडे की बॉस्कट, बडे-बडे जूते आदि मिल जाएँगे।
ठीक है, हम भी कुछ खरीद लेंगे।
वहाँ से सामान खरीदा गया। अब लीदिया को वैचारिक आभास होने लगा कि ह जिस तरफ कदम उठा रही है, वह अज्ञात संकटों भरा जान लेवा रास्ता है। चाहे तो अब भी लौट सकती है। क्या लौटना उसकी कमजोरी सिद्ध नहीं करेगा?
सुभाष ने सन्नाटे की तन्हाई में बहते सोच के लुप्त होते दरियों को कुरेदने की कोशिश करते हुए कहा, लीदिया, तुम एक दफे फिर सोच सकती हो। जरूरी नहीं कि...।
मुझे अपना निर्णय बदलना नहीं आता। यह मेरी मजबूरी है। जबकि लीदिया अन्दर ही अन्दर हिल उठी थी किसी अज्ञात भूकम्प के आने की पूर्व सूचना के डर से।
सुभाष वर्तमान स्थिति का मन ही मन जायजा लेते हुए एक मोड पर आकर रुके और कहने लगे, एक-दो दिन रुक भी गए, तो क्या होगा, लीदिया? सच तो यह है इन हालात में हमें पता ही नहीं है कि हम किसकी और क्यों जानिबदारी (तरफदारी) कर रहे हैं। क्या तुम जानती हो, लीदिया?
कतई नहीं।
और मान लो हमने इनकार कर दिया और यहाँ से लौटना चाहा तो भी ये लोग क्या हमें आसानी से लौटने देंगे या?
लीदिया में भी सोच ने करवट ली और फिर उसने धीरे से पाँव पसारे ताकि सोच को कुछ राहत मिल सके। सुभाष कह रहे थे कि कभी-कभी तुरन्त एक्साइटेड होने पर हम जमीन से नाता तोड लेते हैं और बाद में उसके लिए पछताते हैं।
लीदिया कुछ समझ नहीं सकी। सुभाष ने आगे कहा, मुझे तुम्हारी चिन्ता हैं।
अपनी चिन्ता, या देश के आजाद होने की चिन्ता। एक को तो इनमें से छोडना होगा।
आपने अपनी चिन्ता छोड दी। लीदिया ने इतना कहकर सुभाष को घूरा।
मुझे तो...। सुभाष इतना ही कह पाए कि लीदिया ने कहा, पहले अंद्रेई को लौटने दो। इनकार हो जाने के बाद उसकी प्रतिक्रिया आने दो।

या वह आगे चलने की नई व्यवस्था को समझा जाए। सुभाष ने कहने का क्रम जारी रखा, उनकी अन्दरूनी मंशा को समझा जाए। फिर मौका देखकर लौटने की इच्छा भी व्यक्त की जा सकती है।
लीदिया चुप रह गई, क्योंकि उसने खिडकी से देख लिया कि अंद्रेई आ रहा है। वह बोली, वह आ रहा है।
चलो, यह अच्छा रहा।
क्यों?
क्योंकि अब जो होना है, वह हो सकता है। सम्भावनाओं की आँधी की छुट्टी। अंद्रेई आ गया। चुप बना रहा। वे भी दोनों चुप रहे। आखिर अंद्रेई ने ही चुप्पी तोडी यह पूछकर कि क्या निर्णय लिया?
तुमने मुझे यह नहीं बताया कि तुम आगे हमारे साथ नहीं होगे।
भूल गया था।
तुमने बिना हमसे पूछे, यह नई व्यवस्था स्वयं क्यों कर डाली?
आपको आगे जाना है।
तुम्हारे साथ। तुम ले जा रहे थे कि नहीं, अंदे*ई।
हो। अंद्रेई ने धीमे से कहा।
हम हर एक के साथ नहीं जा सकते। लीदिया बोली।
और हमें जाना ही होगा तो उसका प्रबंध हम स्वयं कर सकते हैं, उसके लिए हमे किसी से मदद लेने की जरूरत नहीं है।
इस बार अंग्रेई ने कहा, साहिब जी, आपको यहाँ तक पहुँचाने का अनुबंध हमारी कंपनी से हुआ और हमें किसी जरूरी काम से लौटना है। ऐसी सूरत में हम पल्ला तो नहीं झाड सकते। सारी जिम्मेदारी तो हमारी ही है। फिर हम उसका प्रबंध नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? अब तक हम तो प्रबंध भी कर चुके हैं। उन्हें पेशगी भी दे चुके है।
यह हम नहीं जानते। लीदिया ने कहा।
मैडम, सच बात यह है कि उनकी गाडी उधर ही जा रही है। यदा कदा ऐसा भी हो जाता है। वह गाडी मास्को से आई है। वहीं की है। उसे वहाँ तक की या रास्ते की सवारी का यहाँ इंतजार करना पडेगा। फिर उनकी जान-पहचान इससे बहुत *यादा है। आखिर आपको वहाँ पहुँचना ही तो है। प्लीज इस बात पर ध्यान दीजिए।
और यदि हम आज नहीं जा सके तो?
वे इंतजार करेंगे।
वे कितने हैं? सुभाष ने पूछा।
उनके पास दो गाडियाँ हैं। आरामदायक गाडियों हैं। उनमें आप सोते हुए भी जा सकते हैं। कृपया एक बार उन गाडियों को देख तो लीजिए। अंद्रेई आग्रह कर उठा।
पहले हम डॉक्टर के पास हो आएँ। पता करें वह क्या कहते हैं? सुभाष की ओर देखकर लीदिया ने कहा।
सुभाष चुप रहे।
अंद्रेई लौट गया।
फिर वे दोनों उठे।
अंद्रेई ने कहा, मैं आपका नीचे इतजार कर रहा हूँ।
सुभाष का सिर चकराया। बुरे फँसे। वह मन ही मन सोच गए। उन्हें पेशावर से काबुल और काबुल से जर्मनी तक की यात्रा का स्मरण हो आया इतालवी दूतावास के अधिकारी ओलैंडो मैजेंटा के प्रतिनिधि बने थे। मैजेंटा के स्थान पर उनकी फोटो लगी थी।..तब वह पेशावर से काबुल की यात्रा भी तो उन्होंने गुप्त की थी। संकट तो उसमें भी आए थे। वे तो आएँगे ही।
डॉक्टर ने लीदिया को देखा। बुखार नहीं था। खराश भी नहीं थी। नब्ज भी ठीक चल रही थी। डॉक्टर ने उसे यात्रा के लिए अनुमति दे दी। साथ में जरूरी दवाएँ भी रख दीं।
रास्ते में अंद्रेई एक जगह रूका और बाहर जाकर तुरन्त लौटा। आकर कहा, साहिबजी, जरा उन गाडियों को देख लीजिए।
गाडियों को क्या देखें।
फिर भी साहिब जी, एक बार उन पर निगाह डाल लीजिए। सुभाष और लीदिया बाहर आए। उन्होंने गाडियाँ देखीं। चकित रह गए। वातानुकूलित गाडियाँ। पीछे सोया भी जा सकता है। वे गाडी में अन्दर भी बैठे। बेहद आरामदायक गाडियाँ थीं। अंद्रेई ने पूछा, साहिबजी कैसी लगी गाडियाँ?
अच्छी। सुख सविधा युक्त। सुभाष ने कहा, अब चलें।
सुभाष ने सोचा कि इतनी बढिया गाडियाँ जब वह जापान के प्रधानमंत्री और सम्राट से मिलने गए थे तब ऐसी ही गाडियाँ थीं। एक में, वह बैठे थे, और दूसरी गाडी उनकी सुरक्षा के लिए थी ।
साहिबजी, इन गाडियों में आपकी यात्रा बेहतर अरामदायक रहेगी और सुरक्षित भी।
हाँ, यह तो है।
अगर आप इनमें यात्रा करना पसन्द करें...। कहता- कहता अंद्रेई रुक गया।
तो क्या?
साहिबजी, पैसे ज्यादे लगेंगे। साथ ही यात्रा में समय भी कम लगेगा।
सुभाष ने गहरी साँस लेकर लीदिया की ओर देखा।
उनके पास स्लीपिंग बैग भी हैं। अंद्रेई ने पुनः कहा।
रास्ते में ठहराने व खाने-पीने की बढिया व्यवस्था भी रहेगी।
क्या करना चाहिए? कहते हुए उन्होंने लीदिया की ओर देखा। लीदिया की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसके मन में सन्देह उठ भी रहा था और सन्देह पर यह प्रश्न भी उठ रहा था कि बिना किसी कारण के वह ऐसी सुविधाजनक यात्रा को कैसे नजरअदाज कर दें। परन्तु उसने कुछ कहा नहीं। होटल आ गया।
अंद्रेई ने कहा, आप लन्च ले लीजिए।..आपको इन गाडियों में यात्रा करने के लिए लगभग दोगुना किराया देना होगा।
दोगुना किराया। इसलिए तुमने यह व्यवस्था की है?
आप सोच लीजिए।...हिमानी हवाओं के वज्र प्रहारों से भी बचा जा सकता है। वो तो ये लोग लौट रहे हैं। इसलिए उतने कम किराए पर ले जाने के लिए तैयार हुए हैं। अंद्रेई ने एक साँस में कह डाला। फिर उन दोनों की और देखा। लीदिया ने कहा, हम लोग इतना नहीं दे सकते हैं।
फिर कितना?
तुम उनसे पूछ कर बताओ। हमारी पॉकेट इजाजत देगी तो तुम्हें बता देंगे वरना आगे तुम्हें ही सोचना पडेगा। यह डील मुझसे तय हुई थी इसलिए इसका फैसला भी मुझे ही करना होगा। और इस डील को तुम्हारे मालिक ने भिक्षु कोबोदेशी के बीच में पडने पर स्वीकार किया था। लीदिया के चेहरे पर तनाव छलछला आया और वह यह कहने से नहीं चूकी कि उनका मालिक भिक्षु बन्धु का परम भक्त है। उनको मालूम हो गया तो? लीदिया ने इस दफे तनिक तेज स्वर में कहा।
ठीक हैं, मैं उनसे बात करता हूँ। फिर भी तय रकम से कुछ *यादा देना होगा। अंद्रेई गर्दन लटका कर चला गया।
अब समस्या सुभाष और लीदिया के बीच अटकी रह गई। लीदिया कह रही थी कि उनको इतनी लम्बी दूरी की सवारी आसानी से नहीं मिल सकती। सुभाष फिर भी चुप रहे। उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता था । उनको कभी ऐसा काम ही नहीं पडा था।
दो घण्टे बाद अंद्रेई आया। बात बन गई। कल सुबह आठ बजे तक निकलना तय हुआ। वह चला गया। सुभाष अपने कमरे में चले आए। लीदिया का मन डूबने लगा। वह घर-बार छोडकर चुपचाप अपनी जोखिम भरी जिम्मेदारियों से स्वतः मुक्त हो गई थी और उसका बढिया, गंधहीन तथा पारदर्शक सरस-सा जीवन जेलीफिश सा बिना काँटे के झूलता रह गया था। उसे अब वह फिर से हासिल करना चाह रही थी।
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सुभाष लीदिया को सम्मोहन के तिलिस्म से बाहर लाना चाहते थे, अतः उन्होंने लीदिया को दूर तक साथ निकल जाने से पहले यह कहकर चौंका दिया, लीदिया, हमारे यहाँ भाई-बहन का रिश्ता बहुत पाक है, अमर है। तुम मेरे से उम्र में छोटी हो और निर्मल मन की दीप्तिवान् भी हो। तुम्हें बहन के रूप में पाकर मुझे फख्र हैं ।...
लीदिया कुछ क्षणों के लिए अवसन्न रह गई। उसकी बोलती बन्द। अन्त में अपने को सम्भालती हुई लीदिया बोली, वही बहन, जो भाई की कलाई में राखी बाँधती हैं।
हाँ, कहकर सुभाष ने भाई बहन के पवित्र रिश्ते के सम्बन्ध में कई ऐतिहासिक कहानियाँ सुना डालीं।
लीदिया का चेहरा बादलों से घिर रहे दूज के चाँद सा लटक कर फिसलने से बचना चाह रहा था।
रात के दो बजने की सूचना दीवार घडी की दो टंकारों ने दी उनकी आँखें भारी हो रही थीं। अब अपने को सम्भालने में असमर्थ अनुभव कर पता नहीं, कब आँख लग गई और लगी आँखों में स्वप्न उभर उठा सन् 1941 माह अप्रैल तीन का।
सुभाष ने एमिली शैंकल को पत्र लिखा था बर्लिन पहुँचते ही। लिखा था कि तुम्हें यह पत्र पाकर और यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैं परसों दोपहर को बर्लिन पहुँचा और अगली सुबह तुम्हें पत्र लिख डाला। यहाँ के सारे होटल फुल मिले। बडी मुश्किल से एक रूम पा सका और कल सुबह मैं यहाँ के नर्न फरगर हॉफ (होटल) में पहुँच रहा हूँ।
भविष्य का कार्यक्रम अभी तय नहीं हैं परंतु सम्भावना यही है कि मेरा मुख्यालय बर्लिन ही रहेगा। मैं नहीं जानता कि मैं वियना आ सकूँगा या नहीं। इस वजह से तुम बर्लिन में आकर मुझसे मिलो। क्या तुम आ सकोगी? यह तुम अच्छी तरह समझ सकती हो कि मैं तुमसे मिल कर कितना खुश होऊँगा। मुझे यहाँ एक सचिव की भी जरूरत है। क्या तुम उसके लिए यहाँ आ सकती है? क्या तुम्हारी मदर और सिस्टर इसके लिए तैयार हो जाएँगी। अभी तक मेरा पासपोर्ट ओलैण्डो मैजोटा नाम से ही है इसलिए तुम जो कुछ लिखो, वह मैजोटा नाम से लिखना और इस बात को अत्यन्त गोपनीय रखना कि मैं यहाँ हूँ। यदि तुम्हें विश्वास हो कि तुम्हारी मदर और सिस्टर इस सम्बन्ध में किसी को नहीं बताएँगे, तो तुम यह उन्हें बता सकती हो। लौटती डाक से उत्तर देना कि तुम मेरी सहायता सचिव के रूप में कर सकोगी या नहीं।1
एमिली शैंकल दूसरे दिन दोपहर में ही आ पहुँची होटल नर्न बरगर हॉफ, नजदीक एनहॉल्टर बेनहॉफ, बर्लिन।
सुभाष आराम कर रहे थे। रुक-रुककर बूँदा बाँदी चल रही थी। एमिली शकल ने सुभाष का पत्र अपनी सिस्टर को दिखाया था। उसने पत्र के पाँचवें पैराग्राफ को पढकर एमिली शैंकल को आडे हाथ लिया था।
उसने व्यंग्य से पूछा था, तुम इस महापुरुष की दीवानी हो और उसे क्रांतिकारी मानती हो। कहती हो कि वह भी तुम से प्यार करता है।... पगली, यह तुम्हारा इस्तेमाल करना चाहता है सिर्फ इस्तेमाल।
दीदी, बिना सोचे-समझे तुम्हें मेरे प्यार को कोसने की जरूरत नहीं है। यह क्यों नहीं समझने की कोशिश करती हो कि वह दूसरे के नाम से बने अपनी फोटो लगे पासपोर्ट से बर्लिन में आ ठहरा हैं। एमिली ने अपने को सम्भालते हुए धीरे-धीरे कहा था। ताकि घर में किसी अन्य को भनक न लग सके।
तभी तो उस भले मानुष ने तुम से ऐसे छह सवाल किए हैं, जो एक मालिक और नौकर के बीच हो सकते हैं। तभी तो वह तुम से पूछ रहा है कि यदि तुम उसकी सक्रेटरी बनोगी तो क्या सैलरी लोगी? वर्तमान में तुम क्या सैलरी पा रही हो?... क्या तुम जिस ब्यूरो में काम करती हो, वहाँ से कुछ समय के लिए अवकाश ले सकती हो? यदि तुम यहाँ आती हो तो क्या तुम ट्रेवलिंग एक्सपेंसेज स्वयं वहन कर सकोगी और यहाँ रहने का भी प्रबन्ध कर सकोगी...ये क्या है? मैं नहीं समझती कि वह तुमसे प्रेम करता है।
फिर भी, मैं जाना चाहूँगी यदि तुम मदद करो, दीदी।
तुम्हारी दीदी तुम्हारे प्रेमी की तरह न तंगदिल है और न कंजूस।
जानती हूँ पर मम्मी?
वह किसी का व्यक्तिगत खत नहीं पढतीं। तुम पहले ब्यूरो से अवकाश ले लो। यही उचित होगा।
वह मिल जाएगा।
इसी कारण एमिली शैंकल वहाँ पहुँच पाई। उसे देखते ही सुभाष गद्गद होकर बोले, मुझे उम्मीद थी कि तुम जरूर आओगी। एक सौ एक जरूरी काम छोडकर भी आओगी।
क्यों नहीं? क्यों नहीं। आना ही पडेगा। आखिर मालिक का कॉल था, सरवेंट उससे इनकार कर खाता क्या? एमिली शैंकल ने ताना कसा ।
यह तुम क्या कह रही, शैंकल।
जो तुमने अपने पत्र में छह सवालों में कहा है, वही सुभाष, अपनी ओर से कुछ नहीं कह रही हूँ। सिस्टर ने पत्र पढकर मुझे सावधान किया था कि वह कंजूस बनिया है।
कंजूस बनिया! कहकर सुभाष हँस पडे।
करेला और नीम चढा। एमिली शैंकल ने कहावत का सहारा लिया।
शैकल, हम बनिए नहीं, कायस्थ हैं - सरस्वती यानी विद्या के उपासक और काली यानी शक्तिके उपासक।...पगली, यह पत्र बहुत सोच-समझकर लिखा और वह भी मैजोटा यानी इटली के रहने वाले के नाम से। तुम समझदार ही नहीं, बडे दिल की भी हो और यह भी अच्छी तरह जानती हो कि मैं किस दौर से गुजर रहा हूँ। यहाँ हिटलर से मदद लेना चाहता हूँ।
नामुमकिन। तुम नहीं जानते कि डॉनकार्क की घटना के पीछे क्या था? अंग्रेजों के प्रति हिटलर की सहानुभूति।.. यदि 29 मई और 14 जून को जर्मनी फौज को हिटलर ने आदेश दे दिया होता तो ब्रिटिश सत्ता का सफाया हो जाता। परन्तु स्वजातीय प्रेम ने हिटलर को यह कहने पर मजबूर किया था कि जर्मन संसार में सर्वोच्च नस्ल है। दो तिहाई धरती का स्वामी अंग्रेज है। जर्मन की नसों में भी वही रक्त बह रहा है। हिटलर ब्रिटेन को मिटाना कभी नहीं चाहता। हाँ, ब्रिटेन झुके, आत्मसमर्पण करे, यह उसकी इच्छा अवश्य है।... तुम्हें उम्मीद है कि ब्रिटेन के विरुद्ध तुम उससे कुछ पा सकोगे। नथिंग, सुभाष, कुछ नहीं । यदि तुम जर्मनी में यही मकसद लेकर आए हो तो लौट जाओ। एमिली शैंकल ने फटाफट दो टूक फैसला कर डाला बिना। रूके कुरसी पर बैठ-बैठे आराम से।
गुस्सा थूको, शैंकल, पहले रेस्ट करो। ये बातें फिर भी हो जाएँगी।
फिर कब?
क्यों?
कल मुझे लौटना है।
तुम इतनी दूर से आई हो।
गलत ।... खैर तुम जो मानो।
मेरे आने का केवल यही एक मकसद है कि मुझे तुम्हारी नौकरी पसंद नहीं है। जनाब के कितने ऊँचे ख्याल है कि यदि तुम एक सप्ताह के ट्रिप के लिए बर्लिन अपने खर्च नहीं आ सकती हो तो उधार लेकर खर्चे का प्रबंध कर लो।...यह था तुम्हारा फुटनोट पत्र के साथ। तो मुझे पत्र की बजाय अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए यहाँ आना जरूरी था। एमिली शैंकल का स्वर व्यंग्यात्मक था। उसके तेवर बदले हुए थे और नाक कुछ फूल-सी लग रही थी।
शैंकल, लगता है तुम पत्र पाने से लेकर अब तक बेहद तनाव में हो और यह भी है कि तनाव मुक्त करने के लिए मुझे तुम्हारे गुस्से का उसी प्रकार स्वागत करना चाहिए, जिस प्रकार मैं तुम्हारे प्यार का करता रहा हूँ। तुम्हें मेरी ओर से पूरी पूरी स्वतंत्रता है कि तुम सहज होने तक जो चाहे कह सकती हो, कर सकती है और भी जो तुम चाहो। सुभाष का चेहरा हल्की-हल्की मुसकान लिए था। उनकी आँखों में प्यार था जो रिमझिम वर्षा-सा बरस रहा था।
एमिली शकल के नथुने फडकने अभी बन्द नहीं हुए थे। उसके अरुण अधरों पर कसावट की छाया थी। सुभाष ने तब तक कॉफी मँगवा ली। वेटर काफी रखकर चला गया तब वह बोले, कॉफी तो लीजिए।
इच्छा नहीं है।
फिर भी, जितनी इच्छा हो। प्लीज, कॉफी पर गुस्सा नहीं।
एमिली शॅकल क्या करे, क्या नहीं, वह उन्हें देखकर हैरान थी, क्योंकि वह एकदम शांत और स्थिर चित्त थे। उसने कॉफी उठा ली। सुभाष ने भी। कुछ क्षण बाद दोनों कॉफी सिप कर उठे। कॉफी बिना दूध की थी। ब्लैक तो नहीं थी, परन्तु कहते उसे ब्लैक ही हैं। पर क्यों? यह सोच कर सुभाष को अपने प्यार पर और प्यार आ गया। वह कहने लगे, तुम्हें शुगर कम लग रही होगी, शैंकल।
नहीं ठीक है।
सच शैंकल।
हाँ, सच। एमिली शैंकल ने तनाव की गाँठ को खोलने के नेक इरादे से नहीं कहा था।
तो सच सुनो। सच यह है, माई हार्ट, कॉफी में शुगर है ही नहीं। एमिली शॅकल चाहकर भी अपने मुसकान नहीं रोक सकी। हाँ, अन्दर ही अन्दर उसे अपने को डाँट डपटने की कोशिश जरूर की।
सुभाष ने उसे ताड लिया और कहने लगे, एक बार हमने....यह तो तुम भी जानती हो कि डॉक्टर की राय को और तुम्हारी बिगडती आँख को अनदेखा करने में हमें उस समय बडा मजा आता है जब हम किसी दूसरे के घर पर लंच-डिनर ले रहे होते हैं, तब हम से कोई कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि हम वहाँ मुख्य अतिथि होते हैं।... तो एक बार क्या हुआ कि हम बातों में मशगूल थे। सामने कस्टर्ड था। दूध और कार्नफ्लाउर से बना अत्यंत स्वादिष्ट । हमने बातों ही बातों में शुगर पाट से चम्मच भर कर अपने प्याले में डाल दिया और चना लिया। तब मेजबान अपनी ईरानी पत्नी की जो अति सुन्दर थी, तारीफ करता हुआ यह कहना नहीं भूल रहा था कि वह कस्टर्ड बनाने में माहिर है।
और आपने कस्टर्ड में शुगर के स्थान पर एक चम्मच नमक डाल लिया था। इसके बावजूद हम बिना नाक भौं सिकोडे स्वाद से बेहद नमकीन और कडुवाहट भरा कस्टर्ड लेते रहे उनकी तारीफ की कद्र करते हुए हम तुम्हारी तरह बिगड नहीं रहे थे बिना यह जाने कि हमने क्या-क्या एहतियात लेते हुए तुम्हें वह पत्र लिख था। हम यहाँ तक किन-किन परेशानियों से गुजरते हुए, जान जोखिम में डालकर आ पाए और वह भी इटैलियन कूटनीतिक पार पत्र पर मैजोटा के छद्म नाम से - नाम उसका और फोटो हमारा...एक दुर्गम और दिल दहलाने वाली यात्रा पूरी तरह जोखिम भरी। हिन्दुकुश दर्रे से ऊपर आना, आराल सागर में गिरने वाली आक्सस (अखसूस) नदी को पार कर समरकन्द पहुँचना, वहाँसे ट्रेन से मास्को और मास्को से फ्लाइट पकडकर 3 अप्रैल को यहाँ पहुँचना। फिर भी, तुम सोचती हो कि मैं तुम्हें लव-लेटर लिखता। हूंऊ, शैंकल? तुम मेरी मानसिकता का अंदाज नहीं लगा सकती। सुभाष का स्वर अचानक दर्दीला हो उठा।
एमिली शैंकल को अपने कहे पर पछतावा हुआ। वह तो उसकी बहन ने उसे भडका दिया था अन्यथा वह उन प्रश्नों का बुरा नहीं मानती। सीधी बर्लिन चली आती। उसका हृदय पिघल उठा और उसने तुरन्त सॉरी बोल दिया। उसके चेहरे पर पीडा उद्वेलित हो उठी। उसकी आँखें झुक गईं।
सुभाष समझते थे कि वह भावुक है और निश्छल हृदय की मनीषिता है। वह तुरन्त कहने लगे मूल विषय से हटकर, वह तुम्हीं थी, जिसने शुगर पॉट के स्थान पर साल्ट पॉट का ढक्कन हटाकर रखा था और अपनी निगाहें पॉट हुक पर तिरछी कर ली थीं, ताकि तुम्हारी उस चालाकी का पता नहीं चल सके। परंतु तुम्हें यह नहीं मालूम था कि प्यार में नमक भी मिठास देता है और विष अमृत हो जाता है।
हाँ, सुभाष, तुमने हमसे कुछ कहा भी नहीं था। ये ही गुण तो हमें तुम्हारे सम्मोहन में बँध जाने के लिए बाध्य करते हैं। इस बार एमिली शकल ने प्यार से विश्वास से और सहानुभूति से सुभाष की ओर देखा।
सुभाष का हृदय पिघल गया और वह कहने लगे, शैंकल, मुझे अपने देश को आजाद कराने के लिए अपना देश छोडकर, दूसरे देशों से गुजरते हुए यहाँ आना पडा है।
यहाँ क्या हिटलर के पास ? यहाँ नाजियों का राज्य हैं। नात्सी पार्टी के खूँखार दरिंदे बैठे हुए हैं, जिन्हें न मानवता का रत्ती भर ख्याल है और न किसी अन्य मत के मानने वाले का।
परन्तु मेरे सामने और कोई रास्ता नहीं हैं। ब्रिटिश सरकार मुझे पकड कर बर्मा की सडी जेल में डालकर भूल जाएगी अथवा गोली से उडवा देगी यह कहकर कि सुभाष जेल से भाग लिए थे... मैं पानी के बुलबुले की तरह मरना नहीं चाहता। सुभाष ने अपना मन हल्का करते हुए कहना जारी रखा। यहाँ मेरा अपना तुम्हारे अतिरिक्त कौन है? किसे बुलाता? किस पर अपना मन खोलता?
वह सब ठीक है, परंतु तुम्हें हिटलर पर भरोसा नहीं करना चाहिए।...ही इज डू वालि (धूर्त-चालाक) एज ए फॉक्स...ए विनडिक्टिव विलन (क्षमा न करने वाला शैतान) जस्ट लाइक ए वाइपर (छोटा विषैला सर्प)। एमिली शैंकल गम्भीर हो गई थी। यदाकदा वह फ्लेयर के नाम से ही काँप उठती थी।
अब जो भी हो, देखा जाएगा।
यानी तुम अपनी गर्दन उसके हाथ में देने के निश्चय से यहाँ आए हो तो कृपया लौट जाएँ।
मुझे अपनी चिन्ता नहीं है, शैंकल।
पर मुझे हैं।
तभी तो हमने अब तक तुमसे शादी नहीं बनाई। मैं नहीं चाहता कि तुम टूटते हुए तारे के साथ बँध कर अपना भविष्य नष्ट कर बैठो।
क्या तुमने मुझे इतना स्वार्थी समझा है सुभाष, माना कि मैं ऑस्ट्रेलियन मूल की हूँ, इण्डियन नहीं हूँ। परन्तु मुझे मालूम है कि एक भारतीय पत्नी क्या होती है। वह अपने पति के लिए क्या कर सकती हैं मैं उसकी मिसाल बनना चाहती हूँ।

सुभाष पहले की तरह ही उसके गुलाबी चेहरे पर दृढता, आत्मविश्वास और शौर्य की दिव्य आभा का आभास पा सके। वह कहने लगे, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है शैंकल, तभी मैं यहाँ आया हूँ।
एमिली शैंकल का हृदय कांप गया। उसके अधर हिले और उसकी आँखों में अज्ञात परछाइयाँ उतरने लगीं। वह धीरे से कहने लगी, मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूँगी। सिर्फ एक उदाहरण प्रस्तुत करती हूँ। कुछ रुककर वह यों कहने लगीं सुभाष, मैं कभी इतिहास की विद्यार्थी नहीं रही, परन्तु हाल के इतिहास में रुचि बनी। इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री नेविल चेंबरलेन त्यागपत्र दे बैठे और चर्चिल प्रधानमंत्री बने। वह समय इंग्लैण्ड के लिए दुर्भाग्य का था। उसे भयानक नुकसान उठाना पडा था।
रूडल्फ हेस हिटलर का अत्यन्त विश्वसनीय डिप्टी था। वह जानता था कि हिटलर इंग्लैण्ड को तबाह नहीं करना चाहता। इस कारण वह बिना हिटलर को बताए वहाँ जा पहुँचा। उसने सोचा था कि यदि वह इंग्लैण्ड से चुपचाप संधि करके लौट आया तो हिटलर उससे खुश हो जाएगा। हॉलैण्ड पहुँचकर उसने ड्यूक ऑफ हैमिल्टन से बात की। संधि की शर्तें समझायीं, जिन्हें हैमिल्टन ने स्वीकार नहीं किया।
हिटलर को जैसे ही उसकी इस शर्मनाक भूमिका का पता चला, वैसे ही वह आगबबूला हो गया। उसने उसे काले कैदखाने में डलवा दिया। कुछ कहते हैं कि गोली मरवा कर उसकी लाश अँधे कुएँ में फिकवा दी।
जरा सोचो, सुभाष जब वह हेस के प्रति इतना कठोर हो सकता है। तब...। कहते-कहते एमिली शैकल रुक गई और कुछ देर बाद वह भरे कण्ठ से बोली, मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती। तुम शैतान से दोस्ती करने आए हो, सुभाष । कृपया लौट जाओ। मैं तुम्हारे साथ हूँ हर मोरचे पर, हर मुसीबत में।
शैकल, पहले मेरे साथ कुछ दिन शेयर करो मुझे भी जानने-समझने दो। मैं पत्र व्यवहार करना चाहता हूँ। यहाँ से निकल पाना इतना आसान नहीं हैं। तुम रहोगी न यहाँ।
या कहीं और।
वह पत्र का मजमून था, यह मेरी आत्मा...का आग्रह है कि तुम यहीं रहो। इसी वक्त दरवाजे पर थाप पडने लगी। सुभाष ने लाइट ऑन की, लाइट नहीं थी। वह धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढे। अब तक दरवाजे पर पडने वाली थाप बन्द हो चुकी थी। सुभाष ने एक बार पुनः आँख मली और बाहर की ओर झाँका। बाहर उजाला था।
20
सुभाष लीदिया का पत्र पढ रहे थे। लीदिया ने लिखा था
डियर सुभाष,
मैंने बहुत सोचा। मुझे लगा कि हमारे आफ रास्ते अलग-अलग हैं। वह मेरा बचपना था कि मैंने तुम्हारे साथ चलने की जिद्द की। मैं कुछ समय के लिए भूल गयी थी कि भावुकता कच्चा धागा होती है, वह किसी ठोस वस्तु का आधार नहीं बन सकती ।
मैंने कई बार सोचा कि आपसे मिल कर लौटू, परंतु मेरी हिम्मत जवाब दे बैठी। मजबूरन मुझे आपसे बिना मिले लौटना पड रहा है। उम्मीद करती हूँ कि आपने मुझे छोटी बहन माना है तो उसकी इस नासमझी को नजरअन्दाज कर सकेंगे। आपकी यात्रा के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी लीदिया।
पुनश्च : मैं तुम्हें एक गिफ्ट देना चाहती थी और उसके लिए मैंने बंगला की एक पुस्तक मँगवाई थी। मैं बंगला नहीं जानती। न लाने वाला। आप पढना और सोचना कि पुस्तक गिफ्ट करने वाली क्या वह गिगलिट लडकी (फूहड लडकी) थी या इंक्लेवबल गर्ल (बेकसूर लडकी) ।

शायद फिर मिलना अब क्या होगा, परन्तु यादें मिट नहीं सकेंगी। मैंने इस पुस्तक में अंदाजे से चिह्न बनाए हैं। वे क्या हैं। मैं समझती हूँ, उनसे एक आत्मा की पहचान भी बन सकती है। बशर्ते वे चिह्न आत्मा ने लगाए हो।
सुभाष ने पढा। पढकर पत्र अटैची के हवाले कर दिया। तभी खटर पटर होने लगी। सुभाष ने पूछा, यह कैसी खटर पटर है?
साहिब, होटल खाली हो रहा है।
क्यों?
यहाँ छापा पडने वाला है, ऐसी खबर आई है। आप जल्दी कीजिए, वरना लेने के देने पड जाएँगे।
ये कौन लोग हैं?
यह हम नहीं जानते। हमें इतना ही मालूम है कि वे बुरे लोग हैं। उन्हें किसी व्यक्ति की तलाश है, जिसे वे जिन्दा या मुरदा ले जाना चाहते हैं, इससे पहले ऐसा किया भी है कि कई व्यक्तियों को पकडा और नंगा किया। फिर गाडी में ठूँस दिया। जाहिल दरिंदे हैं। आप सोच विचार बाद में कर लेना पहले आप यहाँ से निकलें। आपको मॉस्को भी जाना है।
हाँ।
सामान रखें। समय कतई नहीं है। हमें चौकी पार करनी है और इस वक्त चौकी पर अपना आदमी है। आठ बजे उसकी ड्यूटी चेंज होनी है। घडी की ओर देखकर वह कहता है, हमारे पास कुल बीस मिनट बचते हैं।...प्लीज हरि अप। सुभाष ने देखा। बाहर धुँध है। क्लाउड फिर खटपट। पहले से भी तेज।
लीदिया चली गई। उन्हें चलना है। फिर सोचना क्या? वक्त कहाँ है? वह आज उठे भी बहुत देर से हैं। रात सोये भी थे देर से परन्तु ।
वह चल पडे। अटैची उनके आदमी ने उठाई। नीचे आए। बडी गाडी थी । उनसे कहा कि पीछे बैठना ठीक रहेगा। आरामदायक भी। फिलहाल उनको भी अनुकूल लगा। वह पीछे बैठ गए। वहाँ लेटने की भी सुविधा थी।
आज सुभाष पूजा नहीं कर सके। नहाये भी नहीं थे। प्रमाद उन पर छाया हुआ था। स्वप्न का भी असर था। कुल मिलाकर वह कुछ ठीक से निर्णय नहीं कर पा रहे थे।
चौकी आई। कार रुकी। फिर चल पडी। आगे बैठे आदमी में से एक ने पूछा, कॉफी लीजिएगा।
हाँ। सुभाष को कॉफी पीने की इच्छा भी हो रही थी।
कुछ बिस्कुट और कॉफी उनकी ओर बढा दिए। बिस्कुट उम्दा क्वालिटी के थे। कॉफी सिप की तो मन खुश हो गया। वह बोले आपकी चॉइस अच्छी है। बिस्कुट बढिया हैं। कॉफी बेहद टेस्टफुल है.. डिलिशस एक प्याला और लूंगा। सुभाष कॉफी सिप करते रहे।
कुछ पता है, वहाँ कौन छापा मारने वाले थे?
शायद ब्रिटिश खुफिया विभाग से कुछ लोग थे। किसी खतरनाक व्यक्ति की उन्हें तलाश थी। उनमें से मोटे आदमी ने कहा।
तो सारा होटल क्यों फटाफट खाली कराया गया?
होटल का मालिक किसी पचडे में नहीं पडना चाहता है। इसी वजह से पहले एक बार किसी पचडे में तीन माह की जेल काट चुका है।
तो क्या यहाँ ऐसे लोग ही आते हैं?
किसी के माथे पर नहीं लिखा होता है कि कौन कैसा है?
यह सच है।
आपको तो मास्को जाना है और हमें भी। अब हम वहाँ और नहीं रुक सकते थे। झंझट तो हमारे साथ भी शुरू हो सकता था। फिर उनसे दिमाग कौन लगाए । वे जो चाहे कर सकते हैं। वही व्यक्ति कहता जा रहा था।
उनमें से एक दूसरे लम्बे से व्यक्ति ने कहा, आज के लिए दोनों वक्त का भोजन पैक करवा लिया था। पानी भी है। कोई चिन्ता नहीं कीजिए। अब आप सुरक्षित हैं। लेटना चाहे तो लेट जाइए। मार्ग जनविहीन और ऊबड-खाबड है, देखने लायक कुछ नहीं ही आज सूरज भी नहीं निकला है। फिर भी आपका मन हो तो हमारे पास बढिया कैमरा है। स्नेप्स उसे ले सकते हैं।
थँक्स। कहकर सुभाष कॉफी सिप करने लगे। कार की खिडकियों से कुछ खास नजर नहीं आ रहा था। उनको नींद आने लगी। वह सो गए।
कार अपनी रफ्तार से चलती रहीं। एक जगह कार रुकी। सुभाष की नींद की भी खुल गई। वह बैठ गए। उन्होंने पूछा, क्यों रुके?
लन्च यहीं ले लिया जाए।
सब बाहर आ गए। उनमें से एक व्यक्ति ने कहा, यहाँ मात्र अण्डे और दूध मिलता है। वह भी सामने एक पुराने से मकान में। वे सब वहीं गए। वहाँ स्टूल पडे थे। प्लेटें निकालीं। खाना परोसा। फिर वे सब लंच लेने लगे। खाना स्वादिष्ट था। शरीर को थोडी-सी राहत मिली।
इस गाँव का क्या नाम है?
पता नहीं। यहाँ की भाषा भी अलग है। लोग बेहद गरीब है।
यह इलाका रूस का हिस्सा ही है न।
बेशक, साहिब।
फिर गरीबी?
विश्वयुद्ध ने रूस की कमर तोड दी। सारी विकास की योजना धरी की धरी रह गई।
काश जर्मनी ने संधि को धता नहीं बताया होता तो रूस कष्ट में नहीं आता। परन्तु साम्राज्यवादियों को चैन कहाँ हैं। सुभाष कहते रहे घूमते हुए।
लगता है, साहिब, ये दुनिया ऐसी ही चली है। ये ऐसी ही चलेगी। युद्ध विकास की कमर तोडेंगे। फिर कमर सीधी करने के प्रयास होंगे। सिर उठेंगे। फिर द्वेष तनेगा। अहंकार सिर चढकर बोलेगा और फिर इससे भी भयानक घमासान युद्ध होंगे। दुनिया के अन्त की घोषणाएँ होंगी।
इस बार सुभाष का ध्यान उस व्यक्ति पर गया जो अब तक ड्राइविंग कर रहा था। वह सामान्य ड्राइवर नहीं हो सकता। सुभाष पूछने लगे, फिर तुम चाहते क्या हो कि क्या हो, जिससे युद्ध की दावाग्नि का स्थायी अन्त हो सके?
वह व्यक्ति गाडी को मोड से घुमाते हुए कहने लगा- युद्ध का भी अपना अस्तित्व है, साहिब। वह अवश्यभावी है। उसे टाला नहीं जा सकता। वह जीने की अनिवार्य शर्त है। हम एक भयानक युद्ध के बौने साक्षी हैं। दुनिया की भारी भरकम ताकत और दिन रात-एक करके हो रहे चतुर्दिक विकास में परस्पर क्या सम्बन्ध है? अन्दर ही अन्दर लडाई की तैयारी ऊपर से शांति और विकास के कार्यक्रमों से क्या सन्देश जाता है? वह एक गम्भीर दार्शनिक की तटस्थ भूमिका में आ चुका था।
सुभाष सजग हुए। सोचने लगे कि ये लोग कौन है? कहीं...। अब वह क्या करें? वह पूछे बैठे, हम कहाँ जा रहे हैं।
जहाँ आप जाना चाहते हैं. साहिब?
सुभाष नक्शे को ध्यान से देख रहे थे। पहचानना चाह रहे थे कि कार किस दिशा में बढ रही हैं। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जरूर दाल में कुछ काला है। वह पूछने लगे, अब कौन-सी जगह आने वाली है?
पहले, उसे आने तो दीजिए। उनमें से एक व्यक्ति ने बेरुखी से कहा। ?
किसे?
उनमें से किसी ने ना जवाब दिया और न पलट कर देखा। ब्राउन रंग की कार हिचकोले खाती हुई कुछ उछली और उछल कर तेजी से आगे बढी। सुभाष ने पुनः अपना प्रश्न दोहराया।
क्या आप बता सकते हैं कि आप कौन हैं?
...मैं, मैं लेकिन तुम्हें इससे मतलब! मैं एक मुसाफिर हूँ और मैंने भाडे पर कार तय की है। सुभाष ने दृढता से उत्तर दिया।
आप कुछ छिपा रहे हैं।
कुछ नहीं। फिर तुम्हारा ऐसा प्रश्न करने से अर्थ क्या है?
मात्र जिज्ञासा।
कैसी जिज्ञासा?
अपने मुसाफिर के सम्बन्ध में।
आप अपने को छिपाना चाहते हैं तो हमें क्या? छिपाए रहिए ।
वैसे आप जैसे क्रांतिवीर से हमें ऐसी आशा नहीं थी।
सुभाष जान गए कि कुछ अनहोना घटने वाला है पर क्या? उन्हें क्या करना चाहिए? कहीं ये लोग संभावनाओं को तो नहीं तराशने लगे हैं।
अभी युद्ध बाकी है। उनमें से एक-दूसरे व्यक्ति ने हवा में वाक्य उछाला।
सुभाष कुछ नहीं बोले। वे आपस में रह-रहकर बातें करने लगे।
कैसी धरपकड चल रही है।
अब दूध का दूध और पानी का पानी साफ नजर आने लगेगा कि किस-किस ने इस महायुद्ध में क्या भूमिका निभाई ? राख में छिपे अब उन अंगारों को तलाशा जा रहा है, जिन्होंने मित्र राष्ट्रों की जडे खोदनी चाही थीं।
कभी-कभी जनता का ध्यान मुख्य समस्या से मोडने के लिए ऐसे भी होता है। क्या जीतने वालों को उसी कतार में नहीं खडा किया जा सकता है, जिसमें ध्रुव शक्तियों को हारने पर खडा किया जा रहा है? आखिर हैं तो दोनों ही अपराधी कोई भी जनता का हितैषी नहीं है।
यह तू क्या कह रहा है?
वही जो मैं शुरू से सोचता रहा हूँ। सबके वही रंग-ढंग हैं- सत्ता-सम्पत्ति दोनों को ही चाहिए। उनको भी जो समाज में समता का जाल फैला रहे हैं।
क्या? ..ये तू क्या कहता है?
कितने निर्दोष प्राणी मारे गए दोनों तरफ से।... करोडों-करोड की सम्पत्ति स्वाहा हो गई।... कोई देश कभी स्वतंत्र नहीं होता है। तुम देश जानते हो ?
देश!... देश देश है।
स्वतंत्र और परंतत्र देश जानते हो।
तुम कहना क्या चाहते हो?
जो स्वतंत्र देश हैं, वहाँ भी सत्ता की मनमानी जनता के हितों की सुरक्षा के नाम पर उसी तरह चल रही है, जिस तरह परतंत्र देशों में। फर्क है तो इतना कि स्वतन्त्र देशों में उनके अपने आदमी हैं और परतन्त्र में दूसरे देश के सत्ता का प्रयोग और उसकी कार्यशाली वही है जो पूर्व से चली आ रही है। आदमी और तन्त्र बदलने से कुछ नहीं बदलता। बदलाव जो ऊपर से आता है, वह फैशन है। बदलाव अन्दर से आना चाहिए। वह कभी आएगा नहीं। चाहे जितने ईसा जन्म ले लें या मुहम्मद अथवा राम कृष्णा, बुद्ध आदि कुछ भी नहीं होगा। जनता बराबर पिसती रहेगी। उसे वे सब लूटेंगे जो सत्ता के साथ हैं ऊपर से निचले पायदान तक सेठ साहूकार, ठिकानेदार, ठाकुर जागीरदार, जन प्रतिनिधि, पुजारी, मौलवी, पादरी आदि। यह एक जबर्दस्त षड्यंत्र हैं, साजिश है और मक्कारी भरा प्रचार है।
सबकी बोलती बन्द ।
जार सत्ता गई । लेनिन सत्ता में आए। साम्यवाद ने पाँव फैलाए। जनता ने उसके लिए कुर्बानियाँ दीं। अब जोसेफ स्टालिन जो कर रहे हैं, क्या वह एक डिक्टेटर का चरित्र नहीं है?
चुप कर डिक्टेटर के नाना। वोदका चढाई नहीं कि बेसिर पैर का हाँकना शुरू।
तुम मुझे गलत समझ रहे हो।
नशा उतरने दे, फिर तू हमारे हाथ-पाँव जोडता नजर आएगा।....
वह जोर से हँसा, ये नशे का ही खेल था, कॉमरेड, जो विश्वयुद्ध की भट्टी में सबको ले डूबा।
चुप। आगे कुछ नहीं। वरना तुझे उतारकर यहीं छोड जाएँगे। फिर तुझे कोई साधन भी नहीं मिलेगा और तू यहीं भयानक ठंड में दफन हो जाएगा।
वहाँ तुम्हारा बाप पूछेगा कि वो । तुम तीन गए थे। दो कैसे? तीसरा कहाँ है?
वह दुश्मन की गोली का शिकार हो गया।
वह जोर से हँसा। फिर रूककर बोला, तुम उस शैतान की औलाद को नहीं जानते, वो हलक में हाथ डलवा कर सब खाया-पिया, आगे-पीछे का बाहर निकलवा लेगा।... वह पागल कुत्ता है।
इसे सम्भाल। तूने ही इसको साथ लेने की सलाह दी थी।
चुप भी कर, मेरे बाप! कुछ तो लाज रख। पीकर घोडे पर सवार मत हो जाया कर ।

यों वे आपस में उलझते रहे। कार उछलती-तैरती रफ्तार से आगे बढती रही। सुभाष को पता नहीं कब नींद आ गई। इतनी गहरी नींद आ गई कि उन्हें कुछ पता ही नहीं चला। कहाँ वह जरा-सी खटखट से जाग जाते थे।
संदर्भ -
1 द्रष्टव्य : लेटर्स टू एमिली शैंकल- 1934-1948, वॉल्यूम 7 पृ. सं. 216-217

सम्पर्क - शशिनिवास, 105 सेक्टर 9ए,
हिरणमगरी, उदयपुर- ३१३००२

* लेखक का यह नवीन उपन्यास हिन्दी-अंग्रेजी में डायमण्ड बुक्स, नई दिल्ली से शीघ्र प्रकाशय।