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रमेशचन्द्र शाह : पाँखुरी-दर-पाँखुरी खुलता एक फूल

श्यामसुन्दर दुबे
मुझे याद नहीं आ रहा है कि मैंने रमेशचन्द्र शाह का नाम पहली बार कब सुना। १९६९ईं. के सितम्बर माह की १९ तारीख को मैं अम्बिकापुर पहुँचा। वहाँ डॉ. देवेन्द्र दीपक थे। मेरे विभागाध्यक्ष। हमने एक काव्य संकलन के प्रकाशन की योजना बनाई। काव्य संकलन का नाम दिया सार्थक एक! इस संकलन के के पीछे उद्देश्य यह था कि कविता की सार्थकता को विभिन्न काव्य आन्दोलनों के बीच कैसे जाना जाए और कैसे उसे बचाया जाए। देश के अनेक कवियों तक हमारा परिपत्र और आमंत्रण पहुँचा। अच्छा प्रतिसाद मिला। सार्थक- एक प्रकाशित हुआ। पत्र जिन कवियों को भेजे गए थे, उनमें रमेशचन्द्र शाह का भी नाम था। वे उन दिनों पन्ना के कॉलेज में अँग्रेजी के अध्यापक थे। संभवतः डॉ. देवेन्द्र दीपक उनके साथ या उनसे आसञनास रहे थे। उन्हीं दिनों पन्ना को केन्द्र बनाकर एक रिपोर्ताज जैसा कुछ रमेशचन्द्र शाह ने लिखा, जो धर्मयुग में प्रकाशित हुआ था। मैं धीरे-धीरे उनके कर्तृत्त्व और व्यक्तित्व से परिचित होने लगा।
अम्बिकापुर में १९७०ई. के लगभग अशोक वाजपेयी कलेक्टर बनकर आए। वाजपेयी एकदम युवा थे। उन्होंने हम लोगों में नयी कविता जो उस समय युवा कविता कही जाती थी के प्रति एक हलचल-सी-जगायी, उनके साथ हमारी गोष्ठी होने लगी। कलेक्टर बंगला हमारे लिए जैसे खुला हुआ था। वाजपेयी ने इसी समय अंबिकापुर में एक लेखक शिविर भी आयोजित किया। वे उस समय पहचान सीरीज भी निकाल रहे थे। इस शिविर में श्रीकान्त वर्मा, शमशेर बहादुर सिंह, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभात त्रिपाठी, विनोद कुमार शुक्ल सौमित्र मोहन के साथ-साथ रमेशचन्द्र शाह और उनकी पत्नी ज्योत्सना मिलन भी सम्मिलित थे। शिविर की सभी गोष्ठियाँ कलेक्टर बंगले में ही सम्पन्न होती थी। जन सामान्य वहाँ पहुँच ही नहीं सकता था। लेकिन दीपक जी और मैं बाकायदा उसमें पहुँचते थे। वाजपेयी ने हम लोगों को गोष्ठियों में रहने के लिए कह रखा था। इस शिविर में रमेशचन्द्र शाह को हमने पहली बार दिखा था। वे दुबले-पतले, नाक से मोटे काँच का चश्मा लगाये धीरे-धीरे एक-एक कर बोलने वाले मनधुन्ने और अनखुले व्यक्ति मुझे लगे। मुझे लगा कि शाह अपने आप को बहुत ही रिजर्व किए हुए हैं। बहुत दिनों तक मेरी यह धारणा उनके प्रति बनी रही। वे भोपाल पहुँच गए थे। आजकल पत्रिका में मध्यप्रेदश के साहित्य सृजन पर एक विशेषांक निकाला। उसमें मध्यप्रदेश के कथाकारों पर लेख पढा होगा। एक कार्यक्रम के दौरान मैं भोपाल में था। शाह से मुलाकात हुई, वे आजकल के लेख की चर्चा करने लगे। वे खुश थे और बातें कर रहे थे।
रमेशचन्द्र शाह का लम्बा सान्निध्य मुझे वृन्दावन में आयोजित वत्सल निधि शिविर में प्राप्त हुआ। वे अज्ञेय और विद्यानिवास मिश्र के प्रियजनों में से रहे हैं। हो सकता है हम जैसे लोगों को देखकर उन्हें लगा हो कि अज्ञेय भी कैसे-कैसे जनों को बुलाते रहते हैं। शाह सर्जक हैं- समीक्षक हैं, अध्येता है और ज्ञान-पिपासु भी हैं। उन्हें गीता लगभग कण्ठस्थ-सी है। वे एक खास पीढी के हैं, जो साधना को महत्त्वपूर्ण मानती रही है। विद्वान जन कुछ-कुछ ऊँचा सोचने वाले होते हैं, वह ऊँचा सोचना कभी-कभी कुछ जनों को नजरअंदाज करने वाला ही बन जता है। शाह मुझ से प्रेमपूर्वक मिले, पर खुले नहीं। उन्हें यह अंदाजा लग गया था कि मैं विद्यानिवासजी और अज्ञेयजी के कारण यहाँ हूँ। इस शिविर में कुछ तेज तर्रार युवा तुर्क भी थे। राजकुमार कुम्भज की कहानी अलग ही थी। वे विरोध में मुख थे। शाह ने अपना परचा एक गोष्ठी में पढा। कुम्भज ने कुछ विपरीत कह दिया। शाह शान्त रहे। विशेष कुछ नहीं बोले। पर कुछ अनुचित तो हो ही गया था। हो सकता है उनके मन पर इस घटना का असर रहा होगा। शाह की समीक्षापरक दृष्टि गहरी और व्यापक है। छायावाद पर जो उनकी पुस्तक छायावाद की प्रासंगिकता आई थी, वह छायावाद के अने पक्षों विशेष रूप से छायावाद की सांस्कृतिक दृष्टि के उन्मोचन में एक नवीन उन्मेषी समीक्षा का सूत्रपात करती लगती है। वे कोई आलेख या लेख बिना तैयारी के नहीं लिखते। उनकी दृष्टि भारतीय है, किन्तु वे वैश्विक चिन्तन में चिरंतन के अन्वेषक हैं।-
शाह का विवेक जागृत है। वे सामान्यतः प्रशंसापरक नहीं है। उनका जाँचना कठिन है। शायद ही वे प्रथम श्रेणी के अंक देते हैं। यदि किसी को दे दें, तो समझ लीजिये कि वह सौ टंच है। वे औसत में विश्वास नहीं रखते हैं। वृन्दावन शिविर में एक लेखक अपने प्रचार-प्रसार में आत्म सजग थे। उन्होंने अज्ञेय से शिविरार्थियों का फोटो ग्रुप लेने के लिए निवेदन किया और उन्हें राजी कर लिया। वे सभी को इस सामूहिक फोटो सेशन में शामिल होने हेतु उनके कमरों से बाहर बुला रहे थे। शाह को बुलाने मुझे जाना पडा। शाह की प्रतिक्रिया थी, यहाँ प्रचार को नहीं छोडा जा रहा है। वे फोटो सेशन में शामिल हुए, पर बेमन से। वे प्रदर्शन और प्रलोभन और आत्म विज्ञापन को पसन्द नहीं करते है। यही कमल है उनका कि आज भी दुनिया के सच का पालन न करते हुए भी वे वह प्राप्त कर रहे हैं जिसे जुगाडू भी पाने में फेल हो जाते हैं। यह उनकी प्रतिभा और उनकी साधना का ही परिणाम है। वे तुरता-फुरता टिप्पणीकार नहीं है। ऐसे स्थलों पर वे चुप लगा जाना बेहतर समझते हैं। वे कुछ समय परचने में लेते हैं। जैसे आग परचने में कुछ वक्त लगता है। आग का परचना और आदमी को परचना में परचना अलग-अलग अर्थों वाला शब्द नहीं है। भले ही वह आदमी के सन्दर्भ में परिचय से बना हो। आग जब झरझरा कर प्रज्ज्वलित होती तब वह किसी काम की नहीं रहती है, धीरे-धीरे वह कण्डे में अपना अस्तित्त्व स्थापित करती है- उसकी पोर-पोर में जुगजुगाती है। पूरे कण्डे में आँच बन दहकती है। शक्कड ऐसी परची आग पर ही सेंकी जाती है। ठीक इसी तरह सज्जन का साथ अपने साथी के झरझराते स्वरूप में नहीं रमता है। वह अपनी कसौटी पर साथ वाले को कसता है, उससे परचता है। फिर उसमें रसना शुरू करता है।
बरगीनगर (जबलपुर) में भी वत्सल निधि लेखक शिविार में वे थे। हम लोगों की कविताएँ वरिष्ठजन मनोयोगपूर्वक सुन रहे थे। मैंने किसान पर कविता सुनायी। कविता में कुछ अच्छे प्रतीक थे। शाह ने मेरी कविता की कुछ पंक्तियों को कोट करते हुए मेरी प्रशंसा की। हल चलाते हुए किसान को हल के फाल से झरती मिट्टी कविता के झरने जैसी लगती है। बाद में शाह ने मुझ से व्यक्तिगत बातचीत में मेरी कविता की प्रशंसा की थी। वे धीरे-धीरे लोगों को परच रहे थे। वे महात्मा गाँधी, महर्षि अरविन्द और अनेक पाश्चात्य दार्शनिकों के अध्येता हैं। अपने व्याख्यानों और अपने आलेखों में वे जब इनके हवाले से बात करते हैं, तब वे लम्बे-लम्बे सन्दर्भ, उद्धरण देते चलते हैं। मुझे लगता है वे पढते खूब हैं। अब जो निरन्तर इतनी महानतम प्रतिभाओं से उनके विचारों के माध्यम से मिलता रहे- वह कामधूनु का दुग्ध पीने वाले के लिए औसत प्रतिभाओं से छेरी कौन दुहावे जैसा ही है। अब यह अलग बात है कि औसत और सामान्य में भी कुछ ऐसा होता है, जो श्रेष्ठ में भी कुछ न कुछ जोडता है। वे पुस्तकें पढते भी हैं- और उनका नोटिस भी लेते हैं तथा मन हुआ, तो उस पर अपनी टीप पोस्टकार्ड पर या अन्तर्देशीय पर जरूर भेजते हैं। वे औसत को महत्त्व भले न दे, लेकिन वे जानते हैं कि इसके आधार पर ही श्रेष्ठ बनता है- और श्रेष्ठ की जडें औसत से ही रस लेती हैं। वे पुस्तक वही पढते हैं, जिसमें मन लग जाए। सहज और सर्वसंवेद्य तथा कुछ नया कहने वाली पुस्तक पढना वे पसन्द करते हैं- विशेष रूप से गाँव-घर और लोक जीवन के प्रसंगों में वे रूचि लेते हैं। मेरी ऐसी किताबों पर वे अपनी टीप देते रहे हैं।
शाह का प्रारंभिक जीवन अल्मोडा में बीता है। पहाडों का सौन्दर्य उन्होंने आत्मसात किया है, तो कस्बाई जीवन की अनेक लोकधर्मी अनुभूतियों से वे लबालब हैं। दरअसल भारतीयता का सच्चा स्वाद तो उसके लोक जीवन में ही पा सकता है। यह स्वाद जिन रचनाधर्मियों के पास होता है, वे जडबन्द होते हैं। वे कुछ भी रचें, प्रत्येक रचना में उनकी ये जडें अपने रसस्रावी आचरण को उदग्र किये रहती हैं। शाह का रचना-कर्म बहुआयामी है। उन्होंने ललित निबन्ध लिखे, उपन्यास लिखे, कविताएँ लिखी, समीक्षाएँ की, बच्चों के लिए रचा। इस सम्पूर्ण रचनात्मकता में वे मनुष्य के स्वभाव की खोज करते हुए मनुष्य और समाज के अन्तःसंबंधों की बहुविधि तलाश करते हैं।
मैंने शाह को अक्सर कार्यक्रमों में आते-जाते देखा है। वे भोपा में अक्सर इसी तरह मिल जाते हैं। वे केवल मंचप्रेमी नहीं है। वे दर्शक दीर्घा में भी बडे मन से बैठते हैं और मुझे तो यह लगता है कि वे वहाँ बैठकर अधिक सुखी हाते हैं। उनमें दूसरों को सुनने का धैर्य है। इस रूप में शाह की सहजता उनकी सरलता भी है। आज जब वयप्राप्त जन और थोडा-सा समादर पाने वाले केवल और केवल उसी कार्यक्रम में जाते हैं जिसमें उन्हें अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनाया जाए और तुर्रा यह कि वे पूरे कार्यक्रम में उपस्थित भी नहीं रहते हैं, तब शाह की यह खुलापन उनको गुणग्राही और समाजव्यापी दृष्टि से परिचय तो देता ही है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति.... की पावस व्याख्यान माला का आयोजन था। एक इस सत्र में लोक के माधुर्य पर संवाद था। मुझे इस सत्र में बोलना था। मंच पर मैं था और वक्तागण भी थे। मैंने सामने देखा तो दर्शकों की प्रथम पंक्ति में रमेशचन्द्र शाह बैठे हुए थे। मुझे यह देखकर अच्छा लगा। मेरा क्रम आया, तो मैंने बोलना प्रारम्भ किया। वक्ता अपनी वक्तृता से कितना कैसा प्रभावित कर रहा है, यह श्रेताओं के चहरे से झलकने लगता है। मैं बोलते-बालते शाह की ओर भी एकाध नजर डाल लेता था। वे मनोयोगपूर्वक सुन रहे थे। उनके चेहरे पर सन्तोष भाव था। बोलना समाप्त हुआ। शाह ने तालियाँ बजायी। मैं खुश था कि उन्होंने मुझे सुना।
मैं मंच से नीचे आया, तो शाह ने मुझे अपने पास बुलाया। बोले, आपने लोक माधुर्य को रस-बोध तक विस्तारित किया। आप बोल रहे थे और मुझे आचार्य विद्यानिवास मिश्र याद ओ रहे थे। उनकी यह संक्षिप्त-सी टिप्पणी प्रोत्साहन परक थी। भोजन का समय हो रहा था। वे बोले आज मैं आफ साथ भोजन करूँगा। मुझे कुछ विलम्ब लग रहा था। एक सज्जन आए उन्होंने मुझे से कहा कि भोजन पर शाहजी आपकी प्रातीक्षा कर रहे हैं। मैं पहुँचा, तो मैंने लक्षित किया कि उन्होंने अपनी बाजू से मेरी प्लेट लगवा रखी थी। उन्होंने कहा हम आफ लिए ही रूके थे। मैं लज्जित-सा हो उठा। भोजन करते-करते वे उन अतीत के प्रसंगों में भी खोय जिनमें कहीं हम साझेदार थे। मुझे बिहारी याद आ रहे थे। बिहारी ने कहा है कि एक तो सज्जन सबसे नेह नहीं करते, किन्तु जब किसी से करते हैं, तो फिर वह स्थायी और गाढा होता है। यदि कहीं किसी कारणवश उनका नेह घटेगा भी तो वह अपनी चटख नहीं छोडेगा और समाने वाले को यह पता भी नहीं चलने देगा कि नेह में कुछ कमी आई है। चटख न छाँडत घट तू सज्जन नेह गंभी। फीको परै न वरू घटै रंगो चोल रंग चीर। सज्जन का नेह मंजिष्ठ का रंग होता है- कपडे पर चढ गया, तो फीका नहीं पडेगा, भले ही कपडा फट जाए।
कभी-कभी भोपाल पहुँचने पर मैं शाह के निराला नगर वाले निवास पर पहुँचता रहा हूँ। ज्योत्स्नाजी के निधन के बाद मैं उनसे मिलने गया था। ज्योत्स्नाजी प्रख्यात लेखिका थीं। उनका जाना हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति तो थी ही, शाह के जीवन में भी बडी रिक्ति थी। शाह ने ज्योत्स्नाजी का स्मरण करते हुए उस समय कहा था कि उन्होंने उपचार के लिए वक्त ही नहीं दिया, उनका विषद समझ में आ रहा था। वे मुझे अकेले पडने की पीडा से ग्रस्त लगे, फिर भी वे अपने परिवार में व्यस्त रहकर इस पीडा को कुछ कम करने का प्रयत्न कर रहे थे। यद्यपि वे अपने अध्ययन, चिन्तन और मनन में भले ही वीतरागी जैसे रहे हों, किन्तु यह एक विषम और दुःखद परिस्थिति थी, जिसमें परमझानी भी वेदना का अनुभव करते हैं। मुझे यह जरूर उस समय लगा कि शाह के पास जो रचनात्मक शक्ति है, वह उनको इस विषद्नद से पार लगाने समर्थ है। मैंने उनसे यही कहा कि वे अपने रचनाकार को जागृत रखें और परिवार को धैर्य बनाए रखने में अपनी भूमिका को प्रस्तुत करें। शाह को यह बडा झटका था, किन्तु वे अपनी प्राण शक्ति को अपनी रचनात्मकता के बलबूते बढाते रहे हैं।
दमोह में स्नातकोत्तर शासकीय महाविद्यालय का नामकरण ज्ञानचन्द्र श्रीवास्तव के नाम से किया गया है। ज्ञानचन्द्र श्रीवास्तव के सुपुत्र अपने स्वर्गीय पिताजी की स्मृति में शिक्षक दिवस पर व्याख्यात आयोजित करते हैं। वे देश के किसी भी प्रसिद्ध व्यक्ति को व्याख्यान देने आमंत्रित करते हैं। इस बार रमेशचन्द्र शाह को इस कार्यक्रम हेतु बलाया गया था। उनकी स्वीकृति प्राप्त हो चुकी थी। वे भोपाल से यथासमय रवाना हो गए थे, आयोजकों से चलते समय उन्होंने कहा था कि दमोह में वे अकेलापन अनुभव करेंगे, अतः हदा से श्यामसुन्दर को बुला लिया जाए। आयोजकों ने मुझे उनके संदेश से अवगत कराया, तो मैं दमोह पहुँच गया था। उन्हें प्रतीक लॉज के कमरे में ठहराया गया। मैं पहुँचा। वे प्रसन्न हुए। बातें होने लगीं। उनका अकेलापन दूर क्या हो रहा था मैं ही उनका सान्निध्य पाकर अपनी निस्तब्धता तोड रहा था। कार्यक्रम में वे शिक्षा पर केन्द्रित होकर बोले। वे उस छात्र के लिए बोले जो मेरिट में नहीं आता, लेकिन परिश्रम करता है, उसके माता-पिता के लिए बोले कि आप उसे स्नेह दे, दुलार दें! वे औसत का पक्ष ले रहे थे, और मैं प्रसन्न हो रहा था कि शाह ने अपने अंकों का दायरा औसत तक खोल दिया है। दमोह के डॉ. शिवहरे शाह के इस वक्तव्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शाह को नाश्ते पर अपने घर आमंत्रित कर लिया। मैं भी साथ था। डॉ. शिवहरे औसत की पक्षधरता से प्रभावित थे।
शाह घुमक्कडी में रूचि लेते हैं। कहीं भी किसी भी कार्यक्रम में निमित्त जाएँ, वहाँ के आस-पास का वे जरूर भ्रमण करते हैं। उनके भ्रमण के लिए कुण्डलपुर और जागेश्वरनाथ धाम, गाँदकपुर को तय किया गया। आयोजनकों ने गाडी का इंतजाम किया, शाह के साथ मैं था। गाडी का ड्राईवर था। यात्रा में कुल तीन लोग थे। हमारी गाडी दमोह नगर पार कर ही रही थी कि शाह ने पान की इच्छा प्रकट की और यात्रा में उपयोग के लिए साथ में पान बँधाने को भी कहा। ड्राईवर से वे यह भी बोले कि बाल्डर सुपारी ही पान में डलवाना। वे पान के शौकीन है। पान पर चर्चा चल पडी और शाह ने बडे मनोरंजक ढंग से पान के सौन्दर्य का उद्घाटन किया। पान आ गए थे। गाडी आगे बढी तो रोड पर आजू-बाजू गाँव मिलने लगे। शाह ने अपनी डायरी में ग्राम नाम लिखन शुरू कर दिया। उन पर चर्चा भी होने लगी। देव डोंगरा गाँव पडा, तो वे बोले बया यहाँ कोई पहाडी है, मैंने बताया कि बीच गाँव में ही पहाडी है। वे प्रसन्न हुए बोले- शब्द कैसी कैसी यात्रा करते रहते हैं। डूँगर शब्द राजस्थानी का है। यहाँ डूँगर का अर्थ होता है - पहाडी, डँगर से डूँगरी बन गया। यहाँ बुंदेलखण्ड में यह डोंगरा हो गया। यह गाँव जहाँ पहाडी पर देवता वास करते है- देवडोंगरा हुआ। शाह यात्रा-संस्मरण भी लिखते हैं- वे डायरी लेखन भी करते हैं। ये जो डायरी और कलम लेकर वे ग्राम-नाम नोट कर रहे थे, ये इसी तरह के लेखन की पूर्व तैयारी थी। हम पहले बाँदकपुर गए। शाह वहाँ परिदृश्य को देखकर विचलित हो गए। बोले - हम देव स्थानों में भी साफ-सफाई नहीं रख सकते। मन्दिर के कपाट बन्द थे, इसलिए शिव-दर्शन नहीं हो पाए। हमने मन्दिर को ही प्रणाम किया और कुण्डलपुर को प्रस्थि हुए। कुण्डलपुर पहाडियों से घिरा क्षेत्र है। पहाडियों पर ही जैन मन्दिर बने हैं। यात्रा पूर्ण हुई। हम दमोह वापस आ गए। शाह दमोह की इस परिक्रमा से प्रसन्न थे। उन्होंने उत्साहित होते हुए मुझ से कहा था कि कभी-कभी ऐसे कार्यक्रम स्वीकार कर लेना चाहिए। वे चुने हुए कार्यक्रमों में ही जाते हैं। अब शारीरिक व्यवधान के कारण वे उतना बाहर नहीं जा पाते हैं। अन्यथा उन्हें घूमने का शौक है। शाह सम्बन्ध निभाना जानते हैं। यही व*ाह है कि वे कभी अकेले नहीं पडते हैं। वे भोपाल शहर के गौरव है।
सम्पर्क - श्री चण्डी जी वार्ड, हटा (दमोह) मध्यप्रदेश ४७०७७५
मो. ९९७७४२१६२९