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यह तो हद है

अनिरुद्ध उमट
आप के एक पत्र से पता चला कि इस पत्र से पहले आप ने मुझे बेहद मन से एक विस्तृत पत्र लिखा था और आपकी हार्दिक इच्छा थी कि वह पत्र मुझे जरूर मिले क्योंकि आप के शब्दों में आपने मेरे लेखक जीवन के लिए उस में अपना जी उंडेल दिया था। अफसोस यह है कि उस पत्र की खबर इस पत्र से मिली* मगर वह नह मिला। मेरी बेचैनी की आप को कैसे खबर हो जिस के लिए इस क्षति की कोई पूर्ति सम्भव नह। इस मामले में विकल्पहीन है दुनिया ।
मुझ से रहा नह गया और मैंने अपने जी से विवश होते आप से यही निवेदन किया कि आप संक्षेप में ही सही मगर कुछ तो बता ही दें कि आखिर आप ने लिखा क्या था। मेरे इस अति आग्रह से शायद आप कुछ खीज गए लगे। उस खीज को व्यक्त करते आप का पोस्टकार्ड आया तो मुझ को और भी कुढन हुई कि अपनी खीज मिटाने के लिए आप मेरे पत्र का जवाब दे रहे हैं, किन्तु मूल नुकसान के बारे में आप को लिखना स्वीकार नह।
आप ने 18.01.1995 के पत्र में लिखा, मैं दिमाग पर बहुतेरा जोर डाल रहा हूँ, मगर याद नह आ रहा कि - मैंने क्या लिखा था उस पत्र में। अज्ञेयजी की एक चिट्ठी (मुझे लिखी गई) खो गई थी। उन के कथनानुसार, वह उन के द्वारा अपने जीवन में लिखी गई सबसे लम्बी चिट्ठियों में से एक थी। जब मैंने उन से कहा...कुछ याद है...क्या लिखा था...बता दीजिए। तो, वे खिन्न और खफा हो गए। कहने लगे, आप कैसी बात कर रहे हैं? वह घटना मैं कभी भूल नह सकता। सोचो, ऐसा भी होता है। उन के पचासों पत्र मुझे बाकायदा बदस्तूर मिले, पर वही एक पत्र खो गया जिस के खो जाने का उन्हें (और मुझे) सबसे ज्यादा अफसोस हुआ। इसे क्या कहा जाए? संयोग? विडम्बना? दुर्भाग्य? और इसका इलाज क्या है? किसी भी क्षति की क्षतिपूर्ति सम्भव है क्या? नह है।
अनहोनी, अशुभ, अप्रिय अभी भी आप का और मेरा पीछा नह छोड रहे थे। मैंने कुछ कविताएँ आप को पढने भेजी थी ताकि हमेशा की तरह आप के नीर-क्षीर विवेचन से समृद्ध हो सकूँ, और आपने हमेशा की तरह ही बेहद आत्मीयता से, मेहनत से एक-एक कविता पर विस्तार से चर्चा करते एक ठसाठस भरा अन्तर्देशीय पत्र मुझे पोस्ट किया। वह खोया भी नह बल्कि समय पर मिल भी गया। यह और बात है कि उस पर आपने दिनांक नह लिखी थी।
जब वह मुझे मिला, तो यह तय कर पाना मुश्किल था कि वह समय पर पहुँचा है या भटकता हुआ। मगर जब उसे मैंने देखा तो स्तब्ध रह गया। समझ नह आ रहा था कि यह क्या क्रूर खेल मेरे साथ हुआ है। वह अन्तर्देशीय पत्र जिस अवस्था मे मुझ तक पहुँचा था उसे देख यूँ लग रहा था जैसे किसी मानव रूपी चूहे ने उस के चारों तरफ के कोनों को इस तरह काट दिया था जैसे कोई कईं दिनों का भूखा हो। इस बदहाल स्थिति से भौचक मैंने किसी तरह खुद को बटोरा और उसे खोलने में जुट गया। जैसे-तैसे उस के पल्लों को खोल उसे उसकी वांछित अवस्था दी, तो उसकी छिन्न भिन्न स्थिति बता रही थी कि उसकी चारों दिशाओं पर किस कदर हमला हुआ है। वह पत्र कम जर्जर इमारत अधिक लग रहा था। मैंने भरपूर कोशिश की कि आप की इबारत को उसकी खण्डित अवस्था में भी उसकी मूल आत्मा में ग्रहण कर लूँ, लेकिन किसी भी तरह बात अपने टूटे पुलों को प्राप्त नह कर पा रही थी। हर जतन के बाद मन टूटे घुटनों के साथ फिर उठता, मगर बिछडे शब्द किसी भी सूरत अपना पता नह दे पा रहे थे। कटी पूँछ-सी वे अधूरी पंक्तियाँ मुझे गूँगा बना चुकी थी। यह कोई भी अनुमान लगा सकता है कि एक युवा कवि की रचनाओं पर बुजुर्ग लेखक के संवाद-राय का क्या महत्त्व होता है। मेरे जीवन की यह अनमोल पूँजी रही है।

यह आज के समय में तो लगभग अविश्वसनीय ही प्रतीत होगा जो आप का व मेरा रचनात्मक संवाद, विश्लेषण रहा है। एक नितान्त नए, प्रयासरत युवा लेखक की हर रचना को इस कदर महत्त्व देते हुए आप का उसके एक-एक अंश पर ध्यान केन्द्रित करते हुए उसकी कमी बेशी के बारे में अवगत कराना व उसे अनुभव से सम्पन्न करते हुए यह आश्वस्ति प्रदान करना कि बहुत उज्ज्वल, सकारात्मक मार्ग पर है। आप के व मेरे इस आपसी संवाद की मिसाल आज ढूँढे नह मिलेगी।
जब हर जतन मैं निराश हो गया, तो लगभग कलपते हुए आप को पत्र लिखा दुनिया जहान लुट जाने की हृदय विदारक खबर पहुँचाते बताया कि कैसी मार हम पर पडी है। पहली प्रतिक्रिया में तो आप भी स्तब्धता के तल में जा गिरे थे और इस सर्वथा नयी परिस्थिति से निपटने का आप के अनुभव पिटारे में कोई सूत्र नह था। फिर कुछ चेतना लौटने पर आप ने मुझे पत्र भेजा कि तुम मूल पत्र मुझे वापस भेजो, उसके हाल देख कर ही कोई उपचार सोचता हूँ, बाकी अनिरुद्ध इससे पता चलता है अगर हम में यह हठी प्रवृत्ति न हो, तो सोचो हमारे विरुद्ध कैसे-कैसे प्रतिकूल खन्दक रचे गए हैं। मैंने एक लिफाफे में वह अन्तर्देशीय पत्र डाल कर किसी गम्भीर रोगी की तरह आपात इलाज हेतु आप तक भेज दिया। आप की पीढी में अपने कर्म अपनी साधना के प्रति किस कदर समर्पण व अनुराग होता है इसे आने वाली पीढियाँ शायद ही जान पाए।
आज आप के इस कदर सहज उपलब्ध होने, निस्वार्थ अपना स्नेह अनुभव बाँटने को देखें, तो यह किसी और ही काल की बात लगेगा। मगर मेरा सौभाग्य था कि मुझे आप सरीखे विद्वजन का सान्निध्य मिला। एक बनते हुए लेखक को किस तरह एक बुजुर्ग लेखक अपने को उंडेलते अपना श्रेष्ठ देने का जतन करता है यह किसी ऋषि के वश की ही बात होगी।

जब वह अन्तर्देशीय पत्र लिफाफे की एम्बुलेंस में आप की टेबल पर पहुँचा, तो आपने उसकी शल्य क्रिया की। सबसे पहले आपने उस कटे-फटे पत्र की फोटो स्टेट करवाई उसके बाद जहाँ-जहाँ के हिस्से फटे थे उन खाली जगहों पर आपने कटी पंक्तियों को पूरा किया, उन्हें उनके वांछित, बिछडे शब्द लौटाए। कुछ दिनों बाद एक लिफाफेनुमा एम्बुलेंस मेरे घर आई जिस में मरीज अपनी अपेक्षित शल्य क्रिया करवा कर लौटा था। 24.11.07 के पत्र में इसका वर्णन आप ने इस तरह किया, सुबह से उस दुर्भाग्यपूर्ण अन्तर्देशीय पर बैठा हूँ: अपनी ही लिखावट पर रोना पडे--इससे बुरा क्या होगा? कई वरिष्ठ-कनिष्ठ लेखक बन्धु शिकायत कर चुके हैं--अज्ञेयजी समेत (निर्मलजी ने कभी नह की)--हद है, कि मेरा आचरण सुधरा नह। अब आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमा होंगे। तो भी आइन्दा ख्याल रखा जाएगा, छोटा ख्याल हुआ तो, बडे ख्याल का जिम्मा अभी भी नह लेता...।
यह सब दृश्य इसलिए रच रहा हूँ ताकि आने वाले समय में यह दर्ज रहे कि आप के व मेरे आपसी सम्बन्ध व संवाद किस शिद्दत के थे, किन गहरे रचनात्मक सरोकारों से आप्लावित थे। किस तरह अपने आप का सम्पूर्ण अपने सखा को सौंपने में जीवन की सार्थकता महसूस की जाती थी। विनोद में कही गयी बात या कर्म मात्र विनोद नह होता असल में गाम्भीर्यता खरे विनोद के अभाव में विकलांग रह जाती है।
तो अब उस पत्र को पढा जाए शाह साहब, जो आज सिर्फ आप के पुरुषार्थ के चलते ही जीवित है। यह आत्मप्रचार नह है, सान्निध्य की अनमोल निधि है।
प्रिय अनिरुद्ध,
तुम्हारी वे कविताएँ अचानक जिस तरह गायब हुई थीं, उसी तरह प्रगट भी हो आईं। कामों की भीड में कहीं यह बात - तुम्हारी इन कविताओं को पढ कर तुरन्त-तत्काल अपना मन लिख डालने की बात कहीं बिखर न जाए, इसे निरे गद्य में लपेट कर रख देना चाहता हूँ।
इस में कोई शक नह तुम अब एक नए अनुभव-लोक, और नए जीवन बोध (मृत्यु-बोध जिस में अनिवार्यतः शामिल है और उस जीवन-बोध का अनिवार्य घटक सरीखा भी लग रहा है) और इसीलिए एक फ्रेश मुहावरे की देहरी पर आ खडे हुए हो। नए में थोडा अटपटापन होता है, उस की अभ्यस्ति नह होती; बात को उस की पूरी गोलाई में झेलने, पकाने अन्य बातों के साथ-यानी अपने ही अन्य अनुभवों, भाव-बोधों के साथ टकराने देने, निथरने देने और, इस तरह एक सन्शलिष्ट-समग्र काव्य-रूपाकार में ढलने देने की तैयारी नह होती। एक तीखी अनुभूति अचानक अपने आईने सरीखे बिम्ब या बिम्बो की श्रृंखला का आभास पाते ही उसी के द्वारा इस एकदम नई सूझ और संवेदना की पहचान गढ देना चाहती है। इस हिसाब से देखने पर पढने वाले के सिर पर चढ कर बोलने वाली अभिव्यक्ति है ये कविताएँ। अनिरुद्ध उमट की अब तक की कविताओं से गुजरे हुए पाठक को भी एक नया संवेदनाघात देती हुई...और उस की जानी-पहचानी चीजों, स्थितियों को भी एक असह्य रूप से तीखी और नई संवेदना में ढालती हुई।
पर पहले मैं तो देखूँ कि इन में से कौन-सी कविताएँ मुझे सिर्फ फीलिंग या संवेदनात्मक प्रतिक्रिया के स्तर पर ही उत्तेजक-प्रभावी न लग कर मुकम्मिल कविता की तरह यानी जिसे पढ के कवि न केवल एक अतिरिक्त अनुभव से रूबरू हुआ होगा -उससे बिंध गया होगा बल्कि उसे उपयुक्त आवाज और भाषा में मूर्त कर के, भीतर से बाहर करके उससे सचमुच उबर भी आया यानी अपने भोगे, सोचे जीवनानुभव को किसी अर्थ तक उठा कर - किसी अर्थ में उन्मुक्त करके स्वयं भी उबर आया और अपने सहचर पाठक को भी उबार लाया। यह नह, कि सिर्फ फँसकर या पाठक को फँसा कर एक चीख जैसी विह्वल अभिव्यक्ति पा कर कृतार्थ हो गया।

भीख जी का रेवड। केवल बीच की दो पंक्तियों को छोडकर (जो फालतू है) अपनी सुस्पष्ट इमेज और बडी मार्मिक इमेजेज के साथ अपने से परे भी कुछ अर्थ गुंजाने वाली कविता है। भीखजी हर कोई भी है,....व्यक्ति-विशेष भी है....और, इससे भी विचित्र बात...वह नर भी है जिसकी अनझिप आँखों में नारायण की व्यथा भी (अज्ञेय की एक कविता कर शब्द उधार लेते हुए) झिलमिलाती- यहाँ तक कि, हँसती-मुस्कराती महसूस होती है। अनायास अर्थ समृद्ध कविता है यह।
इस के बरक्स अगली कविता अर्थ के गर्भगृह में घुसती ही नहीं। मात्र उसकी बाहर दिखती चित्र-विचित्र सूझों की, वैचित्र्य की परिक्रमा करती रह जाती है। यहाँ तक कि समापक पंक्तियाँ भी सारी भावुक उद्गारमयता के बावजूद, शिवशंभु के आह्वान और उन के आशुतोष वरदान के बाद भी इस कविता को कविता नह बना पाती।
यूँ है मजेदार; हर सूत्र और सूक्ति पर वाह-वाह बटोर सकने वाली चीज।
रात की रेल फिर कविता को लौटाल लाती है। यहाँ भी चमत्कार है, पर वह विघ्न नह डालता। काव्यार्थ को खिलने देता है अनायास।
लाठी लाठी की तरह नह पडी। मनोरंजन हो करके रह गयी।
याचना में बडी वेदना, बडी विह्वलता, बडी पुकार है...पर कहीं कुछ कमी है-नह कह सकता क्या? जो इस को लाठी वगैरह से बेहतर कविता बनाते हुए भी कहीं अधूरी छोड जाती है। मैं पूरे नम्बर नह दे सकूँगा इसे। हालाँकि फर्स्टक्लास की देहरी पर ठिठक जाऊँगा।
विस्मृत चक्की में कवि अपने ही अनुभव की अव्यवस्था और अराजकता में लिपट गया है। बना नह पाया उसका कुछ रसायन। खमीर उठने से पहले ही उतार ली हाँडी उस ने।

शरण अपनी संक्षिप्त सघनता और शब्द मितव्ययिता में अकेला और संयुक्त में एक साथ पन में, एक अच्छी कविता है।
तुम्हें भी ले गया साथ के बारे में अनिश्चित हूँ। काफी अच्छी लग रही है, मगर ऐसा कहते हुए थोडा रुक कर ठिठकने-सोचने को मन होता है। कि क्या वह सचमुच कविता बन पाई है कि सिर्फ एक विशिष्ट अनुभूति को अभिव्यक्त कर देने के कारण जीवन्त बन गई है। अर्थात् जीवंत; किन्तु पर्याप्त व्यंजक और अर्थोन्मेषकारी नह।
ऐसा तो नह, पर कुछ-कुछ ऐसा ही अपनी भावुकता के साथ मोह में पडने का अहसास भी पैदा करता है।
निर्वसन रात भी सन्तुष्ट नह कर सकी। इस में कई चमत्कार सूक्तियाँ और सूझें हैं, पर वे कुछ विशिष्ट खास काव्यार्थ संप्रेषित नह करती।
कहीं का भी पता नह अच्छी लगी। पर क्यों अच्छी लगी- इसका पता नह।
अब आया जघन्य बुद्धिजीवी!! मुझे बख्शो। भेडें कहो, चींटियाँ कहो, मक्खियाँ कहो, गिरगिट कहो, जघन्य बुद्धिजीवी अगर कहीं इन में प्रकट-अप्रकट छुपे हैं, तो उन्हें अपने-आप बोलने दो न, तुम यानी कवि पहले से अर्थ की पिटारी का ढक्कन मत उघाडो।
इन सभी में कुछ न कुछ बात है। एक सार्थक श्रृंखला है यह। इसे फिर से सानो, फिर से गूँथो, फिर से बेलो, फिर से सेंको और जब देखो हर फुल्का पूर्णवृत्त या पूर्ण गोला बन कर सौंधी महक दे रहा है तभी निःशंक हो कर रसिकों को परोसो।
हाँ, आउटलुक में छपी तुम्हारी कविताएँ पहले देखने की याद नह। अभी देखने पर बडी फ्रेश, बडी सौंधी-मुलायम, खस्ता और बहुत-बहुत प्यारी लगीं। दोनों बढिया कविताएँ हैं। दोषहीन। सुघड।

सब से खुशी की बात -इन कविताओं को पढने पर कहीं यह पक्की और खाँटी प्रतीति हुई कि तुम्हें एक नई डगर मिल गई है जो तुम्ही ने खोजी है और जो तुम्हें कहीं ले जाएगी। किसी बढिया जगह। तीर्थकारी-तीर्थंकर डगर साबित हो सकती है यह। बशर्ते, तुम अपनी सूझों का भी सँवरण कर लेना सीख लो, अर्थमय और संकेतमयता को फोकस में रखो। अनुपात और मात्रा-ज्ञान से भी काम लो।
जियो !!!
जयी होओ !!!
स्वस्थ-निरोगी रहो, स्फूर्ति-ऊर्जा भरे।
स्नेहपूर्वक,
रमेशचन्द्र शाह
आज इस पत्र को पढते शाह साहब हमारे इतने सुन्दर साथ-संवाद को याद करते देखता हूँ कि आगे जब चयन किया गया, संग्रह तय किया गया उस में इन में से एकाध ही कोई रचना शामिल थी। बाकी कविताएँ टाल दी थीं। यही रियाज, यही इस्लाह, यही संगत मुझे गढती रही।
(शीघ्र प्रकाश्य संस्मरण पुस्तक शाह-संगत तुम हो तुम में है, से एक अंश)

सम्पर्क - माजीसा की बाडी, गर्वमेन्ट प्रेस के सामने, बीकानेर-३३४००१।
मो. ९२५१४१३०६०