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जीवन जल से भरा भारहीन आकाश

अरुण कमल
प्रख्यात कवि, विचारक कृष्ण किशोरजी की कविता पुस्तक नदी घर का प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना है। लम्बे समय से कवि रूप में निरन्तर सक्रिय और अन्यथा सरीखी पत्रिकाओं के माध्यम से एक नवीन साहित्य वायुमण्डल की रचना करने वाले मनीषी किशोरजी की कविता पुस्तक का दीर्घ प्रतीक्षा के बाद प्रकाश में आना सुखद भी है और किंचित् सोचनीय भी। जो निस्पृह, साधक लेखक हैं उनकी ओर हमारी उदासीनता अक्षम्य है। कृष्ण किशोरजी की कविताएँ अपनी रवानी,जबान पर फौरन चढ जाने वाली भाषाई आत्मीयता और जीवन के गहरे दार्शनिक विवेचन की शक्ति के कारण मुझे हमेशा आकर्षित करती रहीं हैं। ऐसी सरल पर वर्तुल,घूर्णों भरी भाषा विरल है। और कविता को बादलों की तरह भारहीन बना देने की कला या हिकमत भी विरल है, हाँलाकि वे बादल हमेशा जीवन- जल से भरे होते हैं। हमें उनकी कविताओं के सम्पूर्ण संकलन का भी इंतजार है। लेकिन जो हमें अभी मिला है वह खुद एक अनमोल काव्योपहार है-नदीघर !
इसे खण्डकाव्य भी कहा गया है, लेकिन जैसा कि कवि ने कहा है, नदीघर एक लम्बी कविता है। कोष्ठक में खण्डकाव्य भी दिया गया है। लेकिन लम्बी कविता कहना शायद *यादा उपयुक्त होगा जैसे- असाध्य वीणा,अँधेरे में या वेस्ट लैण्ड की सममिति की तर्ज पर। खण्डकाव्य में प्रायः एक कथा या वृत्तांत या उसका छायाभास होता ही है, जबकि लम्बी कविता मुख्यतः भाव व विचार सरणि होती है और यह आधुनिक विश्व कविता की निजी विशिष्टता है। इसी बृहत्तर अर्थ में नदी घर एक लम्बी कविता है। किशोरजी आगे कहते हैं- इस प्रयास के तेरह अलग अलग पडाव हैं। विचार,परिस्थिति और प्रकृति से प्रेरित। किशोर जी की छोटी-सी भूमिका, जिसे वे विनम्रतावश विशेष कुछ नहीं बताते हैं, इस कविता को खोलने की कुञ्जी है, बल्कि वह हमारे समय,समाज और प्रकृति के सम्बन्धों की गहन छानबीन भी है और कविता के नेपथ्य को भी आलोकित करती है।
इस संसार को भीतरी बाहरी शक्तियों ने मरघट बना रखा है और घरों को कारागार। नदीघर इसी यात्रा पर निकल पडने का प्रयास है। हवा पानी,धरती, आकाश और हमारा सूर्य हमारे साथ है ही। हमारे भीतर और बाहर प्रकृति का विस्तार भी हमारे साथ है।
साथ ही यह स्मार-पंक्ति कि हम भूल गये हैं कि हम सब प्रकृति के तत्त्वों से ही बने हैं।
नदीघर अपने आशय, प्रक्षेप और प्रभाव में महाकाव्यात्मक है। ऐसी कृतियाँ कवि के जीवन या जीवनानुभवों का सारांश होती हैं। इसीलिए यह कृति एक साथ हमारे भाव एवं विचार जगत को सम्बोधित है। हमसे जिरह करती है। हमें उद्विग्न करती है। और अन्त तक हमें साथ लिए चलती हैं। जैसा कि शीर्षक से ध्वनित होता है, यहाँ नदी का सतत प्रवाह है और एक घर का ठहराव या स्थिरता भी। और कृष्ण किशोरजी ने अद्भुत लय-क्षिप्रता और शब्दों के स्थापत्य से इसे मूर्त किया है। नदीघर तेरह खण्डों या उच्छ्वासों में विभक्त है। प्रतीक्षा से लेकर अन्यथा तक। कविता इन पंक्तियों के साथ खुलती है :
एक माँसल व्यवस्था है
जिसके काँटे चुभ रहे हैं
रोम-रोम में..
माँसलता और काँटे की अन्तर्विरोधी युग्मिता पूरी कविता के स्वभाव और भविष्य को तय कर देती है। वक्तव्य की सादगी और आकस्मिकता पाठक को अपने विश्वास में ले लेती है। जैसे-जैसे कविता आगे बढती है, मन्तव्य खुलता जाता हैः
मुझे रात भर जागना है क्योंकि
मेरा भविष्य सिर्फ अँधेरे में
उजागर होता है.
यानी यह एक भविष्य की खोज है। जागने और इन्तजार की बेचैनी लगातार हमें भी संक्रमित करती है और इसका कुछ-कुछ शमन तब होता है, जब हम सुनते हैं- प्रतीक्षा में हूँ वह क्रांति क्षण आएगा। यानी एक क्रांति की प्रतीक्षा,लेकिन यह क्रांति बाहर और भीतर दोनों ही स्तर पर,समाज और व्यक्ति दोनों ही के सम्पूर्ण परिवर्तन पर ही निर्भर है। नदीघर विचार,शोध और प्रश्न करती कविता है। कईं बार वह आभ्यन्तर की चेतना-धारा का स्वरूप ग्रहण कर लेती है क्योंकि खोजबत्ती बाहर से भीतर की ओर मुडती है,ठहरती है और अन्त्यपरीक्षण सरीखी तीक्ष्णता और तत्परता प्रदर्शित करती है। काँटों के चुभने से लेकर प्रतीक्षा तक पाठक को एहसास होने लगता है कि यह तकलीफों भरी यात्रा है,एक अनन्त प्रतीक्षा। और इसी मानसिक वातावरण के साथ शुरू होता है दूसरा खण्डः विमोह -उस क्रांति क्षण की प्रतीक्षा।
और यह खण्ड कटुतम आत्म-निरीक्षण तथा भर्त्सना का हैः
मैं अकेला एक तरफ -प्रबुद्ध,गरिमावान !
पेट में कीडों की तरह
इच्छाएँ पालता
भोर तक बिस्तर में कुलबुलाता,
सपनों की दलदल में धँसता- मैं !
यह पढते हुए बेसाख्ता मुझे अकविता के बिम्बों और स्वर की याद आयी। लगभग वैसी ही बेधडक, बेबाक अन्दाज में कही गयी बात। फर्क का अन्दाज आखिरी बन्द में होता है जब मुक्ति की क्षति प्रतीति होती हैः
जिस्म के तर्क से आजाद करता ..
मेरे लिए-अब ये छतें,खिडकियाँ,दरवाजे
छोटे पड गए हैं
या हैं ही नहीं
हवा का घर केवल आकाश है..
अब स्पष्ट होने लगता है कि यह कविता वास्तव में मुक्ति की तलाश की कविता है। लेकिन यह मुक्ति न तो निपट निजी है न सार्वजनिक। जीने का अर्थ तलाश करता कविता-वाचक पाता है कि मुक्त होकर अकर्मण्य खडा हूँ..
अर्थात् मुक्ति को सकर्मक होना है,सर्वसमावेशी। पाँचवें खण्ड में विपुल पृथ्वी के कुछ नायाब दृश्य हैं,भरेपूरेपन और ऐश्वर्य के एहसास को जगाते। यहाँ देवदार हैं, हिमद्वीप और शिलाएँ हैं और उन सबसे तादात्म्य की बेचैनी। कवि ने फैण्टेसी का भी निपुण प्रयोग किया है जो यथास्थान मुक्तिबोध की याद दिलाता है। एक और खास बात यह है कि यह कविता कभी भी प्रत्यक्षतः राजनीतिक नहीं है,लेकिन अपने आशय और संरचना में,शक्ति केन्द्र और व्यवस्था के निरन्तर उपस्थित संकेतों, दबावों में यह विद्रोही और व्यवस्थापलट (सबवर्सिव)कविता है। प्रकृति के विराट पट से लेकर पगडण्डियों तक,जो हाथों की लकीरों की तरह हैं । नदी घर अद्भुत भूदृश्यावली की कविता भी है -जहाँ व्यक्ति प्रकृति का अंग है और पूर्णतः निमज्जितः
सितारों के बीच सितारा बनकर जम जाता हूँ
मेरी आँखें ऊपर भी हैं आकाश पर
और भीतर भी
अब यह दो पाटों के बीच का संगर है,भीतरी और बाहरी। और मुक्ति दोनों ही स्तरों पर होनी है। भीतर की अँधेरी सीलन से मुक्ति, उस अँधेरी जिन्दगी से,प्रार्थनारत जिन्दगी से, स्वार्थ से मुक्ति,उस शव-अवस्था से मुक्तिः
सब देवी देवताओं से
एक ही प्रार्थना करते हैं ये शव
रक्ष अस्मान प्रभु,जीवेम शरदः शतम्
किशोरजी ने आधुनिक भारतीय मन की गजापति और जहालत की कठोर भर्त्सना तरते हुए निरन्तर इस स्वार्थ से मुक्ति की कामना की है,याचना नहीं क्योंकि वे जानते हैं -
ये मजबूर लोग जो कुछ माँग रहे हैं
बस वही इन्हें नहीं मिलना है
क्योंकि ये सिर्फ माँग रहे हैं
इन्सान से या अपने भगवान से
इस अन्धस्थिति या शव अवस्था से उबरना शुरू हो जाता है जब लगता है कि मैं भी थोडा-थोडा जीवित शव था। इस जागरण के साथ ही उसे निष्कासित कर दिया जाता है क्योंकि उसका वर्गान्तरण हो रहा है,नवजागरण। तब आत्मसंघर्ष के कुछ तीव्र क्षण आते हैं। अकेले मुक्ति नहीं, सबके साथ,जैसा मुक्तिबोध कहते हैं। वाचक निर्वासित नहीं होना चाहता,वापस वहीं जाना चाहता है,उन्हें जीवन का स्पर्श कराने-

इन्हें पता है जीवन कितनी जल्दी फैलने वाला रोग है।
किन्तु क्या एकाकी मैं ही सत्य है?
किशोरजी मानव इतिहास का समाहार प्रस्तुत करते हैं (इतिहास भी आधुनिक कविता का एक प्रिय विषय है):
याद नहीं आता कोई भी युद्ध
महाभारत के कृष्ण से लेकर
मध्यपूर्व के ईसा तक
और सिकन्दर से लेकर हिटलर तक
जो लडा गया हो
दैनिक,व्यक्तिगत अतिक्रमणों के विरूद्ध
एक व्यक्ति-एक मानव-
एक जीवन केन्द्र रहा हो--
किसी युद्ध का याद नहीं
व्यक्ति कभी किसी भीड से बडा हुआ हो
भीड कभी व्यक्ति के लिए लडी हो-
याद नहीं
इस ऐतिहासिक ढाँचे में नदीघर नयी, बृहत्तर अर्थवत्ता ग्रहण करती है। व्यक्ति और समूह के सम्बन्ध रेखांकित होते हैं जो आधुनिक कविता की एक केन्द्रीय चिन्ता रहा है। इसका कोई समाधान यहाँ नहीं मिलता, न देने की कोई प्रतिज्ञा ही है। किन्तु एक आह्वान है निर्भय हो जाने काः
अपने कानों पर हाथ रख कर
अपना ही गीत सुनने का
आँखें बन्द कर-
अपने अपने भीतर बहती नदी को
समर्पित हो जाने का..
..अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का गीत सुनने दो सब को
तुम सब की अपनी-अपनी नदी है..
.केवल एक बहाव है अपनी ही दिशा में,अपनी ही नदी पर सवार ..अनन्त ही अन्त है।
आज तुम्हारी सब की साझी और अलग अलग चुनौती है।
और यह सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु है-साझी भी और अलग अलग भी। .
कल प्रातः के बाद तुम्हारा युद्ध सर्वव्यापी होगा
अपने अन्तिम पदों में भी यह कविता कोई सूत्र या उपसंहार नहीं छोडती। वह बस सोचने और करने को बेचैन करती है। नदीघर नदी के भँवरों,घूर्णों की तरफ ले जाती है,महासमुद्र की तरफ। नदीघर निश्चय ही एक ऐसी यात्रा पर निकलने का आमंत्रण और आह्वान है जो इस दुनिया को उन ताकतों से मुक्ति दे जिनके चलते घर कारागार हो गये हैं और अपना वजूद एक बोझ। आह्वान है कि अपने लघु महामानव रूप को प्रगट करें। लघुमानव लघु महामानव बन जाएगा। यह लम्बी कविता पीडा, संघर्ष और आत्म-परीक्षण का अप्रमेय बौद्धिक दस्तावेज है। इस पुस्तक के जरिये कृष्ण किशोर आज सबसे अलग,विलक्षण कवि के तौर पर प्रकाशित होते हैं। उनकी अन्य पुस्तकों और संग्रहों की प्रतीक्षा रहेगी। जीवनदायी तुम्हारी गीली आँखें!
नदीघर इक्कीसवीं शताब्दी के दृष्टि-बिन्दु से पर्यवेषित सम्पूर्ण मनुष्यता के अतीत और भविष्य की आत्म-प्रवाहित गाथा है, कामायनी से लेकर मुक्तिप्रसंग और बाघ की याद दिलाती हुई। अनन्त ही अन्त है। इतनी शक्ति और वेग से अपने भँवर में खींचता यह नदीघर एक विलक्षण कृति है। ऐन्द्रिकता,प्रज्ञा और आत्मा का सर्वोत्तम रस।

पुस्तक का नाम : नदी घर
लेखक : कृष्ण किशोर
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
वर्ष : 2022
मूल्य : 190/-
विधा : कविता
सम्पर्क - फ्लैट नं. 7, मैत्री शान्ति भवन,
बी.एम.दास रोड, पटना - ८००००४
मो. ९९३१४४३८६६